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महाकाली--देवराज चौहान और मोना चौधरी सीरिज़

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और जथूरा की कोशिश को मैंने नाकाम करना है।” जगमोहन गम्भीर स्वर में कह उठा–“वैसे मुझे मोना चौधरी से ऐसा कोई मतलब नहीं, वो जिंदा रहें या मरें। परंतु मैं उसे इसलिए बचाऊंगा कि उसकी हत्या के बारे में मेरे को पहले ही पता चल गया है।”

मोन्नो चौधरी से मिल्ले बोत देर हो गई म्हारे को, क्यों छोरे?”

“हां बाप ।” रुस्तम राव के चेहरे पर गम्भीरता थी।

तुम जाने क्यों मुझे रोक रहे थे उस पर गोली चलाने को।” जगमोहन बोला-

“वो कौन था?" ।

“मुझे क्या पता, अभी वो वक्त आया नहीं कि तुम्हें बता सकें वो कौन था।” सोहनलाल ने कहा।

“वो मेरे पास से निकला था।” जगमोहन होंठ सिकोड़कर कह उठा–“मैं उसका चेहरा नहीं देख सका। पीठ ही देखी...”

“म्हारी बात सुन ।” बांकेलाल ने कहा-“थारे को सोहनलालो रोको हो, गोली चलाने से।”

“हां ।”

“ईब अपणों दिमाग में भर लयो कि थारो को उस पर गोली नेई चलानी ।”

“मैं भी कुछ ऐसा ही सोच रहा हूं। सोहनलाल नहीं चाहता कि मैं उस पर गोली चलाऊं तो अवश्य कोई बात होगी। लेकिन मैं उसे कुछ न कहूंगा तो वो मोना चौधरी पर गोली चला देगा। जथूरा का हादसा सफल हो जाएगा।”

“यो बात तो हौवे हीं ।”

ये सब बातें ।” सोहनलाल ने कहा-“मौके पर सोची जानी चाहिए। इस वक्त कोई फायदा न होगा।”

मुझे मोना चौधरी से पहले ही बात कर लेनी चाहिए। मैं उसके पीछे नहीं रहूंगा।”

उससे क्या होगा?”

मैं मोना चौधरी को सतर्क करूंगा कि कोई उसे मारने की कोशिश करने वाला है।” ।

वो थारी बात की परवाह न करो हो ।”

“मेरे ख्याल में वो मेरी बात गम्भीरता से सुनेगी। मैं उसे मैट्रो स्टेशन की उन सीढ़ियों की तरफ ही नहीं जाने दूंगा। जहां उस पर गोली चलाई जानी है। मैं उस वक्त मोना चौधरी की जगह हीं बदल

“अंम भी थारे संग दिल्ली चलो हो ।”

“बेशक चलो।” जगमोहन ने कहा-“हमें ये हादसा हर हाल में रोकना है।”

कोशिश तो पुरों करो हो अंम—आगे भगवान मालिको हौवे ।”

सोहनलाल ने खामोश बैठे रुस्तम राव से कहा। “तुम क्यों चुप हो रुस्तम?” ।

बाप, आपुन को कुछ ठीक नेई लग रेईला ।

” क्या मतलब?” ।

“इधर आपुन सब लोगों का इकट्ठा होना। उधर कल मोना चौधरी के पास पौंचना। पोतेबाबा ठीक कहेला कि आपुन लोग पूर्वजन्म की धरती पर फिर जाईला । आपून लोग नई मुसीबत में फंसेला बाप ।”

“तुम पोतेबाबा की बात पर भरोसा कर रहे हो ।” सोहनलाल ने कहा।

“क्यों नेई करेला बाप ।

” “हम उसे नहीं जानते—वो ।”

उसे पूरी तरह झूठा मत समझेला बाप। आधी बातें तो वो सच कहेला ही ।” ।

“छोरे। तू पूर्वोजन्मो के सफर की परवाह क्यों करेला। इधर जथूरा को ‘वड' देगा अंम ।”

“मैं रुस्तम की बात से सहमत हूं।” जगमोहन ने कहा-“मेरी हरकतें पूर्वजन्म के सफर की तैयारी हो सकती हैं। लेकिन इस बारे में हमें ज्यादा नहीं सोचना है। हमें सोचना है कल के बारे में। मोना चौधरी को बचाने के बारे में।”

“मैं प्लेन में टिकटें बुक कराता हूं। ट्रेबल एजेंसी वाला अपना यार है। उसे कहता हूं।” सोहनलाल ने कहा।

म्हारी भी करा लयो। भूलो मत जाइयो ।”

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मोमो जिन्न ने अंगड़ाई ली और सामने बैठे लक्ष्मण दास को देखा।

लक्ष्मण दास उसे ही देख रहा था। चार फुटा मोमो जिन्न उठा और टहलने लगा फिर कह उठा।

जथूरा महान है। वो अद्भुत है। उसकी शक्तियां असीमित हैं। उसका कोई मुकाबला नहीं कर सकता। उसके द्वारा रचित हादसे क्रूरता का सबसे बड़ा उदाहरण हैं। वो बहुत तरक्की करेगा और भी आगे जाएगा।”

“तुम क्या कह रहे हो। मेरी तो समझ में कुछ भी नहीं आ रहा।” लक्ष्मण दास बोला।

तू सिर्फ इतना कह कि जथूरा महान है।”

क्यों कहूं?" ।

कह ।” मोमो जिन्ने ने उसे घूरा।

जथूरा महान है।”

“शाबास ।” मोमो जिन्न मुस्कराया—

“जथूरा का सेवक बनने के सारे गुण तुझमें मौजूद हैं। मैं तुझे अपने साथ जथूरा की नगरी में ले जाऊंगा। वहां तुझे किले के प्रवेश द्वार की नौकरी दिलवाऊंगा। एक तरफ बैठा तू ये ही कहा करेगा कि जथूरा महान है। खुश हो जाएगा जथूरा, तुझ जैसा सेवक पाकर।”

“ये क्या नौकरी हुई। मैं यहीं खुश...।”

तू मेरा गुलाम है।” मोमो जिन्न गुर्रा उठा–“जो मैं कहूंगा, तू मानेगा, वरना तेरी जान ले लूंगा।”

लक्ष्मण दास ने सूखे होंठों पर जीभ फेरी। अगले ही पल मोमो जिन्न मुस्करा पड़ा।

“शाम के पांच बज रहे हैं।” लक्ष्मण दास कह उठा-

“देवराज चौहान मेरे फोन का इंतजार कर रहा होगा। मैंने कल उसे फोन करके कहा था कि सुबह उसे मोना चौधरी की खबर दूंगा। परंतु अब तो शाम हो गई।”

जल्दी मत कर। वरना देवा को तेरे पे शक हो जाएगा।”

“ओह।”

फिर लक्ष्मण दास ने मोमो जिन्न को देखा जो एकाएक ठिठक पड़ा था और आंखें बंद करके इस तरह सिर हिलाने लगा जैसे किसी की बात सुन रहा हो।

आधा मिनट यहीं सब रहा फिर मोमो जिन्न आंखें खोलकर बोला।

“तेरे लिए फरमान आ गया है।”

“फरमान? कहां से आ गया?”

“जथूरा के सेवक ने अभी मुझसे बात की। वो कहता है कि तु देवा को फोन पर कह, कल सुबह 11.30 पर मिन्नो राजीव चौक के मैट्रो स्टेशन पर आएगी।”

देवराज चौहान को ये बात कह दूं?”

कह ।”

मोना चौधरी कल वहां न पहुंची तो देवराज चौहान मेरी गर्दन पकड़ लेगा।”

वो आएगी।”

लक्ष्मण दास ने तुरंत सामने रखा फोन उठाया और देवराज चौहान के नम्बर मिलाने लगा।

मोमो जिन्न उसके सामने कुर्सी पर आ बैठा।।

लक्ष्मण दास घबराया हुआ था। मोमो जिन्न से उसे घबराहट होती थी, परंतु ये था कि पीछा छोड़ने को तैयार नहीं था। बात-बात पर उसे गुलाम कह रहा था। लक्ष्मण दास सोचता था कि इतना सब कुछ होने के बाद भी ये पीछा छोड़ दे तो बड़ी बात होगी।

अच्छी-भली जिंदगी बीत रही थी, ये जाने कहां से आ गया। । दूसरी तरफ बेल होने लगी फिर देवराज चौहान की आवाज कानों में पड़ी।

"हैलो।”

“देवराज चौहान, मैं लक्ष्मण दास ।” लक्ष्मण दास जल्दी से बोला–“अभी सपन चड्ढा के मैनेजर का फोन आया था।”

“कोई नई बात?" ।

मोना चौधरी कल किसी से मिलने राजीव चौक मैट्रो स्टेशन पहुंचेगी। दिन के 11.30 बजे ।”

 
“मैट्रो स्टेशन के भीतर के बाहर?" ।

“भीतर के बाहर?” कहते हुए लक्ष्मण दास ने मोमो जिन्न को देखा तो मोमो जिन्न ने भीतर का इशारा किया—“स्टेशन के भीतर ।” लक्ष्मण दास फौरन कह उठा–“ये तुम देख लेना कि वो कहां पर होगी।”

खबर पक्की है?”

मेरे खयाल में तो पक्की है। सपन चड्ढा का मैनेजर झूठ क्यों कहेगा। मेरे से पैसे लेता है खबर देने के ।”

“ठीक है।” देवराज चौहान की आवाज कानों में पड़ी।

उसे मार देना।” लक्ष्मण चड्ढा कह उठा।

तुम्हारा काम हो जाएगा। निश्चिंत रहो।” कहने के साथ ही उधर से देवराज चौहान ने फोन बंद कर दिया था।

लक्ष्मण दास ने फोन बंद करके रखा। मोमो जिन्न को देखा।

तेरे गुण रोज के रोज बढ़ते जा रहे हैं, देखना एक वक्त ऐसा आएगा, तू जथूरा का महान सेवक बन जाएगा।”

लक्ष्मण दास ख़ामोश रहा।

चलता हूं, तेरे यार सपन चड्ढा से भी बात करनी है। घूम जा।”

लक्ष्मण दास उठा और घूमते हुए खड़े-खड़े चक्कर काटा, जब सामने को देखा तो मोमो जिन्न को वहां से गायब पाया। लक्ष्मण दास ने लम्बी सांस ली फिर फोन उठाकर सपन चड्ढा के नम्बर मिलाने लगा।

सपन चड्ढा दिन-भर से ही घर में था। क्योंकि मोमो जिन्न ने उसे कहीं भी जाने को मना किया था। मन-ही-मन मोमो जिन्न को ढेरों गालियां देता, सपन चड्ढा उखड़ा हुआ था कि उसका फोन बजा।।

"हैलो।”

सपन, मैं लक्ष्मण दास ।”

तू ।” सपन चड्ढा ने लम्बी-गहरी सांस ली–“किस मुसीबत में फंसा दिया तूने ।”

मुसीबत, मतलब कि मोमो जिन्न?"

“वो ही तो, उसी की बात कर रहा हूं।” तभी सपन चड्ढा के पास तीन इंच का मोमो जिन्न प्रकट हुआ और बातें सुनने लगा।

“मैंने भी उसी के वास्ते तेरे को फोन किया है। अभी वो मेरे पास था, अब तेरे पास आने वाला है।”

“मेरे पास, जाने इस मुसीबत से कब पीछा छूटेगा। हमें गुलाम कहता है।” सपन चड्ढा बोला–“दिल तो करता है कि पकड़कर इसे इतना मारूं कि उठने के काबिल ही न रहे।”

तीन इंच के मोमो जिन्न ने उसे देखते हुए गर्दन हिलाई।

मेरे से देवराज चौहान को फोन करवाया कि मोना चौधरी कल सुबह 11.30 बजे राजीव चौक मैट्रो स्टेशन पहुंचेगी।”

“ऐसे कैसे वो पहुंचेगी?”

“मुझे क्या पता कि मोमो जिन्न के मन में क्या है?” लक्ष्मण दास की आवाज कानों में पड़ी।

इससे पीछा छुड़ाने की कोई तरकीब बता ।”

“मैं क्या बताऊ, फंसा पड़ा हूं। कुछ कहता हूं तो धमकी देता है, कि नंगा करके सड़क पर घुमा देगा।”

क्या पता धमकी यूं ही हो। तू एक बार विद्रोह करके देख।” ।

तू कर ऐसा, मुझमें तो हिम्मत नहीं है।”

“मुझमें हिम्मत होती तो तेरे को करने को क्यों कहता। कहता है मैं हमेशा के लिए उसका गुलाम हूं।” ।

मुझे भी ऐसा ही कहता है। उल्लू का पट्ठा।”

तीन इंच के मोमो जिन्न ने पुन सिर हिलाया।

“अब क्या करें?" ।

वो जो कहता है, करेंगे और मौके का इंतजार भी करेंगे कि कब उसकी गर्दन तोड़ने का मौका हमें मिले ।”

“वो बहुत चालाक है।”

हरामी है साला।”

कोई रास्ता सोच, इसके हाथों से बचने का। मैं उसे और नहीं सह सकता।”

“मुझे कोई रास्ता मिला तो बताऊंगा। तू भी सोचता रह बंद करता हूं। वो आने वाला होगा।” कहकर सपन चड्ढा ने फोन बंद किया और वो बड़बड़ा उठा–‘मोमो जिन्न को तो सबक सिखाऊंगा।'

उसी पल तीन इंच का मोमो जिन्न बड़ा होता चार फूट का हो गया।

 
उसी पल तीन इंच का मोमो जिन्न बड़ा होता चार फूट का हो गया।

उस पर नजर पड़ते ही सपन चड्ढा उछल पड़ा।

तुम?” उसके होंठों से निकला।

मैं उल्लू का पट्टा हूं।” मोमो जिन्न प्यार से बोला।

म...मैंने कब कहा?” सपन चड्ढा हड़बड़ाया।

“तू मेरी गर्दन तोड़ेगा।”

तु...तुमने गलत सुना है।”

“अपने यार को बोलता है कि मेरे से विद्रोह करे। भड़काता है उसे।”

“म...मैंने नहीं कहा।” सपन चड्ढा का चेहरा सफेद हो गया।

“तू मुझे सबक सिखाएगा।”

“व...वो तो यूं ही गुस्से में कह दिया था।” “मैं—मुसीबत हूं।”

सपन चड्ढा उसे देखता रहा। कुछ कह न सका। घबराया हुआ था वो।

मोमो जिन्न आगे बढ़ा और कुर्सी पर बैठता, प्यार भरे स्वर में कह उठा।

तेरे को शिक्षा देनी पड़ेगी।

” शिक्षा?” सपन चड्ढा ने सूखे होंठों पर जीभ फेरी।

“हां, तेरे में दूसरों के लिए आदर भाव जरा भी नहीं है, जबकि मैं सोचता था कि तेरे में जथूरा का सेवक बनने की काबिलीयत

मैं जथूरा का सेवक क्यों बनूंगा। मेरा अपना बिजनेस है। मैं...।”

जथूरा महान है। उसका सेवक बनना अपने आप में गर्व की बात है।”

सपन चड्ढा फंसे अंदाज में मोमो जिन्न को देखता रहा। “बोल, जथूरा महान है।”

होगा।” सपन चड्ढा ने बेचैनी से पहलू बदला–“मुझे क्या?”

जो मैंने कहा है बोल, वरना नंगा करके अभी बाहर सड़क पर घुमाऊंगा।” मोमो जिन्न गुस्से से कह उठा।।

“ज...जथूरा महान है।” सपन चड्ढा जल्दी से कह उठा।

इंसान तू बुरा नहीं। तेरे को पढ़ाने की जरूरत है। धीरे-धीरे सीख जाएगा तू।” ।

सपन चड्ढा चुप ।।

मिन्नो को फोन कर ।”

म...मोना चौधरी को?”

हां। वो ही। उसे कह कि तेरे को पता चला है देवा कल 11.30 पर राजीव चौक के मैट्रो स्टेशन आएगा।”

क्या मतलब?" “देवा और मिन्नो में झगड़ा करवाकर, एक को खत्म करवाना

क्यों?"

ऐसा होते ही जथूरा पर मंडराने वाले खतरे के बादल हट जाएंगे। नहीं तो बहुत बड़ा खतरा आने वाला है।”

कैसा खतरा?"

मोमो जिन ने सपन चड्ढा को घूरा।

 
करता हूं।” सपन चड्ढा ने कहकर जल्दी से अपना फोन उठाया।

तू सवाल बहुत पूछता है। एक बार तेरे को नंगा करके, बाहर सड़क पर...।”

कर तो रहा हूं फोन। तू ऐसी बात क्यों करता है?" जल्दी ही सपन चड्ढा की मोना चौधरी से बात हो गई। “कहो।” मोना चौधरी की आवाज कानों में पड़ी।

मोना चौधरी, मुझे पता चला है कि कल 11.30 पर देवराज चौहान राजीव चौक मैट्रो स्टेशन पर होगा।”

कहां पर?”

ये तो पता नहीं, परंतु खबर पक्की है कि देवराज चौहान 11.30 पर वहां आएगा ।”

“ठीक है। मैं उसे ढूंढ लेंगी।” मोना चौधरी का कठोर स्वर कानों में पड़ा-“वो बचेगा नहीं कल के बाद ।”

सपन चड्ढा ने फोन बंद किया। गहरी सांस ली और मोमो जिन्न से बोला।

अब तो खुश है न—मैंने फोन कर दिया।

मैं कभी भी खुश या दुखी नहीं होता।

” क्यों?"

“क्योंकि मेरी कोई इच्छा नहीं है। जथूरा ने मेरी इच्छाशक्ति को खत्म कर रखा है। मैं सिर्फ जथूरा का सेवक हूं और मैंने जो भी करना है जथूरा की खातिर करना है। वो मेरा मालिक है। जथूरा महान है।”

तूने जो कहा मैंने कर दिया, अब तो मुझे छोड़ दे।” ।

“तू मेरा गुलाम है। जिस पर मेरी छाया पड़ जाती है, वो मेरा गुलाम बन जाता है। तू अब मुझसे दूर नहीं जा सकता।”

“तूने तो वादा किया था कि इस काम के बाद तू मुझे छोड़ देगा।”

“तू बेवकूफ है जो मेरे वादे पर विश्वास कर लिया। मेरे पास इच्छा नहीं तो वादा कैसा?”

“मतलब कि तेरे शब्दों की कोई कीमत नहीं?”

“मुझे सिर्फ जथूरा ही नजर आता है। मेरे कानों में उसका आदेश रहता है। बस, यहीं मेरा जीवन है।”

तू कमीना है।”

मैंने पहले ही कहा है कि तेरे में शिक्षा की कमी है, इंसान तू बुरा नहीं।”

सपन चड्ढा जवाब में दांत पीसकर रह गया।

जगमोहन, रुस्तम राव, बांकेलाल राठौर और सोहनलाल दिल्ली पहुंचे।

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रात के 10.45 हो रहे थे।

करोलबाग के होटल में चलते हैं।” सोहनलाल बोला–“वहां का मैनेजर मुझे पहचानता है।”

“म्हारे होतो हुए तंम होटल में ठहरो। म्हारी मूछों कटवाओगे क्या?" बांकेलाल राठौर बोला—“थारे को पूसा रोड की शानदार कोठी में रुकवाओ। उधर नौकर भी हौवो और नौकरानी भी।”

लोग पूसा रोड, कोठी पर पहुंचे तो 11.45 हो रहे थे।

“आपुन तो अब जमके नींद मारेला बाप ।” रुस्तम राव बोला।

कोटी में नौकर थे। उनकी जरूरतों को पूरा करने लग गए। | जगमोहन सोहनलाल के पास आकर गम्भीर स्वर में कह

उठा।

“मैं सोच रहा हूं कि मोना चौधरी से रात में ही मिलकर उसे सतर्क कर दें।”

“उसका ठिकाना कहां है?” सोहनलाल ने अजीब निगाहों से उसे देखा।

“पारसनाथ का रेस्टोरेंट जानता हूं। उसके माध्यम से मोना चौधरी से बात की जा सकती है।”

“मुझे ये ठीक नहीं लगता।” सोहनलाल ने सोच-भरे स्वर में कहा।

क्यों?”

मोना चौधरी तेरी बात पर जरा भी विश्वास नहीं करेगी, बल्कि वो तेरी हंसी उड़ाएगी।”

जगमोहन के होंठ भिंच गए।

कल देखेंगे कि राजीव चौक, मैट्रो स्टेशन पर क्या किया जा सकता है।” सोहनलाल बोला।

“लेकिन मैं एक बार पारसनाथ से मिलना चाहता हूं। मोना चौधरी मेरी बात का बेशक यकीन न करे, परंतु सतर्क तो हो जाएगी।”

“कोशिश बेकार होगी। फिर भी तुम जो करना चाहते हो, कर लो। मैं भी तुम्हारे साथ चलता हूं।”

जगमोहन और सोहनलाल पारसनाथ के रेस्टोरेंट पहुंचे तो रात के 12 बज रहे थे। रेस्टोरेंट बंद किया जा रहा था। उन्हें डिसूजा मिल गया, जो एक टेबल पर बैठा खाना खा रहा था। एक कर्मचारी उन्हें वहां तक छोड़ गया। खाना खाते डिसूजा ने उन्हें देखा तो उसकी निगाह जगमोहन पर जा टिकी।

मैंने तुम्हें कहीं देखा है।” डिसूजा बोला।

जरूर देखा होगा। मैं जगमोहन हूं।”

देवराज चौहान का साथी?” उसके होंठों से निकला। वो सतर्क दिखने लगा था।

जगमोहन ने सिर हिलाया।

ये?” डिसूजा का इशारा सोहनलाल की तरफ था।

सोहनलाल ।”

नाम सुन रखा है। लेकिन रात के इस वक्त तुम यहां क्यों आए हो?”

पारसनाथ से मिलना है।”

अब तो मुलाकात नहीं हो सकती।” डिसूजा ने इंकार में सिर हिलाया–“सर तो नींद में हैं।”

“नींद में हैं तो उठा दो। मुझसे ड्रामा मत करो।” जगमोहन ने तीखे स्वर में कहा।

काम क्या है?"

तुमसे नहीं कहा जा सकता। पारसनाथ को खबर करो कि हम मिलना चाहते हैं।” | डिसूजा ने जेब से फोन निकाला और नम्बर मिलाते हुए वहां से दूर हो गया।

बीस सेकंड में ही बात करके पास आ गया और खाने पर पुनः बैठता हुआ कह उठा।

कुछ खाना हो तो कह दो ।

” नहीं ।”

दो मिनट ही बीते कि पारसनाथ आता दिखा। उसने नाइट सूट पहन रखा था।

जगमोहन और सोहनलाल खड़े हो गए।

पास आकर पारसनाथ ने दोनों से हाथ मिलाया और खोज भरी निगाहों से उन्हें देखा।

। “तुम दोनों को यहां देखकर मुझे अजीब सा लग रहा है।” पारसनाथ बोला।

“ज्यादा अजीब तो नहीं लगना चाहिए।” जगमोहन ने कहा-“तुमसे खास बात करनी है।”

आओ, उस तरफ टेबल पर बैठते हैं।” । तीनों एक टेबल पर जा बैठे।

पारसनाथ दोनों से, ये सोचकर सतर्क था कि ये देवराज चौहान का फैलाया कोई चक्कर न हो।

“तुम नाइट सूट के पायजामे में रिवॉल्वर रखकर नींद लेते हो।”

 
आधी रात को तुम जैसे मेहमान आएं तो, रिवॉल्वर को साथ रख लेना ठीक होता है।” पारसनाथ बोला।

“मैं तुमसे बात करने आया हूं। निश्चिंत रहो मेरी तरफ से।”

पारसनाथ जगमोहन और सोहनलाल को देखने लगा।

“मैं इन दिनों अजीब सी स्थिति में फंसा हुआ हूं।” जगमोहन गम्भीर स्वर में कह उठा–“मुम्बई से सीधा, तुम्हारे पास ही आ रहा हूं। जो बात मैं तुमसे करना चाहता हूं, उसके लिए, सब बताना जरूरी है, तभी तुम मेरी बात समझोगे ।”

पारसनाथ का पूरा ध्यान जगमोहन पर था।

कुछ दिनों से मुझे पूर्वाभास हो रहा है। होने वाली घटनाओं, या यूं कहो कि हादसों या एक्सीडेंट का आभास मुझे पहले ही हो जाता है और इस तरह मैं पहले कई बुरे हादसों को रोक चुका

ये कैसे सम्भव है।” ।

“सम्भव है। चूंकि तुम भी पूर्वजन्म से ही हमसे सम्बंध रखते हो, इसलिए मेरी बात को ज्यादा जल्दी समझ सकोगे। हमारे पूर्वजन्म में कोई जथूरा नाम का व्यक्ति था। वो अब उसी दुनिया में हादसों का देवता बन चुका है। जथूरा ही हमारी दुनिया के हादसों को रचकर, यहां भेज देता है और जैसा हादसा उसने रचा होता है, वैसा ही हो जाता है।”

‘हैरानी है।”

परंतु उसके कुछ खास हादसों का आभास मुझे हो रहा है और मैं उन हादसों को रोके जा रहा हूं। मैं ऐसा न करूं, इसके लिए जथूरा ने पोतेबाबा नाम के अपने सेवक को मेरे पास भेजा हुआ है, जो मुझे समझा रहा है कि मैं जथूरा के रास्ते में न आऊ, उसके हादसों को खराब न करूं । वो स्पष्ट नजर नहीं आता। कहता है कि उसने अदृश्य होने की दवा खा रखी है। परंतु वहां धुआं फैला दो तो उसमें फंस कर उसकी आकृति नजर आने लगती है। मैंने दो बार उससे मुकाबला करके उसे पकड़ना चाहा, परंतु वो बेहद ताकतवर है, मैं उसका कुछ न बिगाड़ सका। उसके बाद मैंने सोहनलाल, बांकेलाल राठौर और रुस्तम राव के साथ मिलकर उसे जकड़ लिया, परंतु वो अपनी शक्तियों के सहारे एक पल में ही आजाद हो गया। पोतेबाबा हर तरफ से ही बे-पनाह ताकत रखता है।”

“और वो तुम्हें रोकना चाहता है कि जथूरा के जिन हादसों का तुम्हें एहसास होता है, उन्हें तुम रोको नहीं ।”

हां ठीक समझे ।

” तो वो तुम्हें क्यों नहीं खत्म कर देता?”

इसके जवाब में पोतेबाबा कहता है कि जथूरा पर मेरा कोई एहसान है, इसलिए जथूरा मुझे नुकसान नहीं पहुंचाना चाहता। पोतेबाबा बार-बार मुझे चेतावनी दे रहा है कि मैं जिन-जिन हादसों को रोके जा रहा हूँ, उसकी वजह से मैं पूर्वजन्म में प्रवेश कर सकता हूं, जहां जथुरा से मेरा सामना होगा और मैं जथूरा का मुकाबला नहीं कर सकता। मारा जाऊंगा। जबकि जथूरा चाहता है। कि पूर्वजन्म में मेरा प्रवेश ही न हो। ये झगड़ा ही न हो।”

तो तुम ही पीछे क्यों नहीं हट जाते ।”

पारसनाथ ।” जगमोहन गम्भीर स्वर में बोला“अगर तेरे को पता हो कि फलानी-फलानी जगह पर कोई हादसा होने वाला है। तो क्या तू उसे होने देगा या रोकने की चेष्टा करेगा।”

क्षण भर खामोश रहकर पारसनाथ बोला।

रोकने की चेष्टा करूंगा।”

वो ही मैं कर रहा हूं।”

“लेकिन ये तो तेरे को अब पता ही है कि तेरी भाग-दौड़ तेरे को पूर्वजन्म के सफर पर ले जाएगी। ऐसे में तेरे को पीछे हटकर खामोश बैठ जाना चाहिए। क्योंकि पूर्वजन्म में प्रवेश कर जाने का मतलब है मौत का खेल शुरू।”

“मैं जथूरा को हमारी दुनिया में होने वाले हादसों को रचने दें। वो खामखाह लोगों की जान लेता रहे?"

" “ये तेरी सोच है—जो तू ठीक समझे कर। परंतु मैं इतना जानता हूं कि जब-जब भी पूर्वजन्म का सफर हुआ है, वो सफर हम सबने मिलकर पूरा किया है। पूर्वजन्म में प्रवेश होने के रास्ते जरूर अलग-अलग रहे हैं, परंतु मंजिल एक ही रही। ऐसे में तुम अकेले कैसे पूर्वजन्म का सफर शुरू कर सकते हो।” पारसनाथ ने कहा।

 
“मैं अकेला नहीं हूं। हम सब इकट्ठे होते जा रहे हैं।” जगमोहन बेहद गम्भीर था।

“हम सब कैसे इकट्ठे हो रहे हैं?”

हालात ऐसे बने कि मुझे सोहनलाल, रुस्तम राव और बांकेलाल राठौर को बुलाना पड़ा। उसके बाद अब तुम्हारे पास आ गया।”

लेकिन तुम मेरे पास क्यों आए?"

जाना तो मुझे मोना चौधरी के पास चाहिए, परंतु उसका ठिकाना नहीं जानता तो तुम्हारे पास आया।”

बात क्या है?”

“कुछ घंटे पहले मुम्बई में पूर्वाभास हुआ कि दिल्ली के राजीव चौक के मैट्रो स्टेशन पर कल 11.30 बजे कोई मोना चौधरी को गोली मारने जा रहा है।” जगमोहन ने कहा।

पारसनाथ की आंखें सिकुड़ीं।।

अब तुम क्या कहते हो कि मैं मोना चौधरी को मरने दें।”

तों तुम्हें वो भी दिखा होगा जिसने मोना चौधरी को शूट...।”

" “उसकी पीठ मैंने देखी। वो मेरे पास से ही निकला था, तब मैं मोना चौधरी को उस खतरे से बचाने के लिए, उसके पीछे था। लेकिन ये नहीं जानता कि बचा सका कि नहीं। वो मोना चौधरी को गोली मारने जा रहा था। तब पीछे से मैंने उस पर फायर करना चाहा कि तभी मोना चौधरी के सामने की तरफ से आता सोहनलाल चीखकर मुझे गोली चलाने को मना कर रहा है। ये बहुत उलझा हुआ पूर्वाभास था। समझ में नहीं आता कि सोहनलाल मुझे क्यों फायर न करने को कह रहा था। कोई खास ही वजह रही होगी कि सोहनलाल मुझे...।”

वो वजह मैं जानता हूं।” पारसनाथ गम्भीर-खुरदरे स्वर में कह उठा।

क्या वजह?” ।

“मोना चौधरी पर गोली चलाने वाला देवराज चौहान है।”

जगमोहन चिहुंक उठा।।

सोहनलाल के मस्तिष्क को भी तीव्र झटका लगा।

क्या कह रहे हो?" जगमोहन के होंठों से अजीब-सा स्वर निकला।

ये कैसे सम्भव है?” सोहनलाल व्याकुलता से बोला।

“तो तुम दोनों को यहां के हालातों का पता नहीं ।” पारसनाथ ने अपने गालों पर हाथ फेरा।

“यहां के हालात, क्या हुआ है यहां के हालातों को?” जगमोहन के माथे पर बल पड़े।

मोना चौधरी ने तीन करोड़ में देवराज चौहान को मारने की सुपारी ली है।” पारसनाथ ने बताया।

“ओह।” सोहलाल के चेहरे पर बेचैनी झलक उठी।

ये बात देवराज चौहान को पता चल गई। वो भी दिल्ली में ही है। कल मेरे पास आया था।”

“क्यों?”

मोना चौधरी का पता पूछने, या फिर मैं मोना चौधरी को बता देता कि देवराज चौहान यहां है।” ।

“तो—तुमने क्या किया?”

“मैंने कुछ भी नहीं किया। क्योंकि मैं देवराज चौहान और मोना चौधरी को आमने-सामने नहीं पड़ने देना चाहता था। लेकिन अब हालात ये हैं कि देवराज चौहान और मोना चौधरी, दोनों ही एक-दूसरे की तलाश में हैं। मैंने महाजन को बुलाकर उसे सारे हालातों से वाकिफ कराया। हम दोनों ने मोना चौधरी को समझाने की चेष्टा की, परंतु वो नहीं मानी। फिर महाजन ने किसी तरह देवराज चौहान को तलाश किया, उससे बात की कि वो पीछे हट जाए। परंतु वो भी नहीं माना।” ।

 
“सब ।” सोहनलाल के होंठों से निकला–

“सब इकट्ठे होते जा रहे हैं, ये जरूर पूर्वजन्म की तैयारी है।”

“मुमकिन है।” पारसनाथ गम्भीर स्वर में बोला फिर जगमोहन से कहा-“तुम देवराज चौहान को क्यों नहीं समझाते?”

“वो नहीं मानेगा। ये मोना चौधरी का मामला है।” जगमोहन ने होंठ भींचकर कहा-“कोई फायदा नहीं होगा।”

कुछ पल उनके बीच खामोशी रही। फिर पारसनाथ बोला।

कभी ऐसा हुआ है कि तुम्हारा पूर्वाभास कभी गलत निकला हो?”

ऐसा कभी नहीं हुआ। पूर्वाभास का वक्त तक ठीक निकलता है।” जगमोहन ने दृढ़ स्वर में कहा।

पारसनाथ के होंठ भिंच गए। तभी डिसूजा पास आ पहुंचा।

सब ठीक है।” पारसनाथ ने डिसूजा से कहा-“किसी को कॉफी और स्नैक्स लाने को कहो ।”

डिसूजा चला गया।

सवाल ये पैदा होता है कि इन हालातों में हम क्या करें । क्या करना चाहिए?” जगमोहन ने उखड़े स्वर में कहा।

“देवराज चौहान और मोना चौधरी को सामने नहीं पड़ने देना चाहिए।” सोहनलाल ने कहा।

“ज्यादा देर तक हम इस बात को नहीं रोक सकते। कल 11.30 बजे, राजीव चौक मैट्रो स्टेशन। दोनों सामने पड़ जाएंगे।”

“मैं महाजन को बुला लेता हूं। इन बातों में उसका होना भी जरूरी है।” पारसनाथ ने फोन निकालते हुए कहा-“शायद हम सब मिलकर कोई बढ़िया फैसला ले सके।” ।

“ये तो पक्का है कि ये हालात हम सबको पूर्वजन्म के सफर की तरफ धकेल रहे हैं ।” सोहनलाल होंट भींचे कह उठा–“सबका एक साथ इकट्ठे होते चले जाना, इसी बात की तरफ इशारा करता है कि हम बहुत बड़ी मुसीबत में फंसने जा रहे हैं।”

नम्बर लग गया। पारसनाथ महाजन से बात करने लगा।

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राजीव चौक, मैट्रो स्टेशन । 11.20 बजे।।

मोना चौधरी ने सेंट्रल पार्क की तरफ से, मैट्रो स्टेशन में प्रवेश किया। टोकन लिया और बैरियर पार करके खुले हाल में आ पहुंची। दाईं तरफ द्वारका जाने वाली मैट्रो अभी-अभी आई थी। लोग मैट्रो में प्रवेश करते जा रहे थे। सामने ऊपर जाने वाली सीढ़ियां नजर आ रही थीं। मोना चौधरी विठकी-सी, हर तरफ नजरें घुमाने लगी।

उसे देवराज चौहान की तलाश थी।

सपन चड्ढा ने कहा था कि देवराज चौहान साढ़े ग्यारह बजे राजीव चौक मैट्रो स्टेशन पर होगा। उससे ये पूछना भूल गई थीं कि ये बात उसे कैसे पता चली? मोना चौधरी ने वहां लगीं डिजीटल घड़ी में वक्त देखा। 11.25 होने जा रहे थे। मोना चौधरी बेहद सतर्क थी। देवराज चौहान कभी भी, नजर आ सकता था।

नजरें देवराज चौहान को तलाश कर रही थीं।

अगले ही पल वो चौंकी। आंखें सिकुड़ती चली गईं।

उसकी आंखें धोखा नहीं खा सकती थीं। वो सोहनलाल ही था। देवराज चौहान का खास बंदा । सोहनलाल उससे दस कदमों की दूरी पर से निकलकर एक तरफ जा रहा था। साथ ही वो फोन पर बात करने में व्यस्त था। उसने मोना चौधरी की तरफ नहीं देखा था। मोना चौधरी इतने में ही सतर्क हो चुकी थी।

| इसका मतलब खबर सही थी कि देवराज चौहान यहां आने वाला है। सोहनलाल पर नजर रखकर देवराज चौहान तक आसानी से पहुंच सकती है। | इस विचार के साथ ही मोना चौधरी सावधानी से, सोहनलाल के पीछे लग गई।

सब ठीक हो रहा है।” फोन पर जगमोहन की आवाज, वहां से निकलते सोहनलाल पर पड़ रही थी—“मोना चौधरी तेरे को देख चुकी है, वो सतर्क सी दिखने लगी है। ऐसे ही चलता रह

* “मेरे पीछे आई कि नहीं?” सोहनलाल ने चलते हुए फोन पर पूछा। " “अभी नहीं, लेकिन वो तेरे पीछे जरूर आएगी । वो सोचेगी कि तेरे द्वारा देवराज चौहान तक पहुंच सकती...मोना चौधरी तेरे पीछे चल पड़ी है। हमारी योजना कामयाब रही। उसे, उसी तरफ ले आ, जिधर तेरे को कहा था। पलटकर पीछे जरा भी मत देखना । फोन को इसी तरह कान से लगाए रख। मैं फोन बंद कर रहा हूं।”

सोहनलाल ने फोन कान से लगाए रखा और आगे बढ़ता रहा।

एकाएक मोना चौधरी को अपने पीछे धीमी आहट उभरी।।

उसने पलटना चाहा कि तभी उसकी कमर से रिवॉल्वर आ लगी।

मोना चौधरी चौंकी। | उसकी निगाह हर तरफ घूमी तो उसे एहसास हुआ कि इस वक्त वो मैट्रो स्टेशन के सुनसान हिस्से में पहुंच चुकी है। ओह, तो ये सब चाल थी। सोहनलाल को चारे के तौर पर, उसके सामने किया गया और वो जाल में फंस गई।

तभी उसने सामने जाते सोहनलाल को ठिठकते फिर पलटते देखा।

 
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