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महाकाली--देवराज चौहान और मोना चौधरी सीरिज़

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आओ बाहर देखें।” देवराज चौहान ने कहा।

देवराज चौहान और जगमोहन बाहर निकलते चले गए। बीस मिनट बाद वे लौटे।

नगीना आई सत्या?” देवराज चौहान ने पूछा।

नहीं जी।” देवराज चौहान कुर्सी पर जा बैठा। जगमोहन बेचैनी से चहलकदमी करने लगा।

“मुझे हैरानी है कि मोना चौधरी, नगीना के पास यहां आई और फिर दोनों ही गायब हो गए।” देवराज चौहान बोला।

“भाभी खतरे में है। मैंने पूर्वाभास में, भाभी को अजीब सी जगह पर बेहोश पड़े देखा था। मैं जानता हूं कि मेरा पूर्वाभास गलत नहीं हो सकता। हर बार वो सही निकला है।” जगमोहन बोला



“मैं मोना चौधरी को नहीं छोडूंगा।” देवराज चौहान का चेहरा कठोर हो चुका था।

जगमोहन ने ठिठककर देवराज चौहान को देखा। कुछ पल देवराज चौहान को देखने के बाद व्याकुल स्वर में कह उठा। “ये जथूरा की चाल है।”

देवराज चौहान ने सख्त नजरों से जगमोहन को देखा।

मोना चौधरी इस तरह नगीना के पास आकर गड़बड़ नहीं कर सकती, फिर भाभी भी कम नहीं है। कुछ बात तो है ।” ।

“नगीना के पास मोना चौधरी आई और उसके बाद नगीना गायब हो गई।”

“हां, ऐसा हुआ है, परंतु ये सब जथूरा की चाल है, हमें कालचक्र को नहीं भूलना चाहिए। हम जानते हैं कि जथूरा हम सब को लड़वाने की चेष्टा कर रहा है। पोतेबाबा ने भी ये बात स्वीकारी है।” जगमोहन होंठ भींचकर बोला—“हमें सब्र के साथ काम लेना है। जथूरा की चाल को पहचानना है कि...”

देवराज चौहान उठ खड़ा हुआ।

“तुम सब्र के साथ काम लो।”

देवराज चौहान ने कड़वे स्वर में कहा “मैं मोना चौधरी को देखता हूं।”

जल्दबाजी मत करो।” जगमोहन और भी ज्यादा परेशान हो उठा।

ये तो स्पष्ट है कि नगीना के गायब होने के पीछे मोना चौधरी का हाथ है।”

हां लेकिन।”

अब क्या तुम ये कहना चाहते हो कि वो मोना चौधरी होकर भी मोना चौधरी नहीं थी।”

“ये नहीं कहना चाहता।”

मैं समझने की चेष्टा कर रहा हूं कि जथूरा कैसी चाल चल रहा है?"

“वो कोई भी चाल नहीं चल रहा। नगीना के गायब होने के पीछे मोना चौधरी है, मैं ये जानता हूं।”

“मैं इंकार नहीं करता, परंतु ये भी कहता हूं कि इन सब हरकतों के पीछे जथूरा काम कर रहा है।” |

“मैं नहीं मानता।”

तुम्हें मानना पड़ेगा।” जगमोहन ने तेज स्वर में कहा—“पोते बाबा ने स्पष्ट कहा है कि जथूरा अब हम सबके लिए कालचक्र छोड़ेगा। हम सबमें झगड़ा करवा देगा, ताकि हम लड़ मरें और पूर्वजन्म के सफर के काबिल न रहें। जथूरा हमें पूर्वजन्म के सफर से रोकना चाहता है, शायद हमारा वो सफर उसके लिए, नुकसान से भरा है। हम पहले ही तय कर चुके हैं कि हम सब्र से काम लेंगे और झगड़ा नहीं करेंगे। अब तुम बे-सब्र हुए जा रहे हो।”

नगीना मेरी पत्नी है।”

मेरी भी भाभी है वो। मुझे उसकी चिंता है।”

जितनी मुझे है, उतनी चिंता तुम्हें नहीं हो सकती जगमोहन ।” देवराज चौहान ने होंठ भींचकर कहा।

| जगमोहन ने देवराज चौहान की आंखों में झांका और गम्भीर स्वर में बोला।

“हो सकता है कि मुझे तुमसे भी ज्यादा चिंता हो।”

तुम मुझे समझो मैं...।”

मैं सब समझ रहा हूं, तभी तो शांत हूं।”

क्या मतलब?”

“जो जथूरा चाहता है, उसे होने से रोक रहा हूं।”

देवराज चौहान जगमोहन को देखने लगा।

“जथूरा चाहता है कि हम झगड़े। जगमोहन ने पुनः कहा—“और हम ऐसा करेंगे नहीं ।” ।

। “और नगीना?” देवराज चौहान का चेहरा क्रोध से भरा हुआ था।

उसके बारे में कोई रास्ता निकालते हैं कि उसे तलाश कर सकें। तुम्हारे पास मोना चौधरी का फोन नम्बर है?”

“नहीं।”

मेरे पास पारसनाथ का नम्बर है।” जगमोहन बोला-“मैं अभी उससे बात करता हूं।”

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दिल्ली! मोती नगर का एक फ्लैट

बूढ़ा और बूढ़ी औरत वहां रहते थे। पैंसठ-सत्तर बरस की उनकी उम्र रही होगी। बूढ़ा रंगीन मिजाज था और इस उम्र में भी पीने-पिलाने का शौक छूटा नहीं था, जबकि उसकी पत्नी उसकी पीने की आदत से चिढ़ती थी। इस वक्त रात के दस बज रहे। थे कि घर में तू-तू, मैं-मैं हो रही थी। बूढ़ा एक पैग लगा चुका था और दूसरा गिलास भर रखा था जबकि उसकी पत्नी बोले जा रही थी।

“पांव मौत के दरवाजे पर पड़े हैं और तुम्हें पीने की पड़ी है। बूढे ।” वो बोली-“भगवान का नाम ले ले थोड़ा सा। सारे पाप धुल जाएंगे। ऊपर वाले से डर, जाकर उसके सामने खड़े होना है

“मैं क्यों डरूं।” बूढ़ा चूंट भरता कह उठा–“मैंने कोई पाप नहीं किया।”

नहीं किया?

” जरा भी नहीं।”

“ज्यादा बड़बड़ मत कर । जवानी के दिनों में तू रातों को गायब रहता था।”

वो तो दोस्तों के साथ पीने के चक्कर में रात निकल जाती...

” मैं सब जानती हूं।” वो हाथ नचाकर बोली ।

क्या जानती है।” बूढ़ा मजे लेता कह उठा-“मैं भी तो जानू?”

“मेरा मुंह मत खुलवा ।”

“खोल दे, मैं डरता नहीं हूं।” नशे में बूढ़ा शेर हो रहा था।

“वो जो तेरे आफिस में काम करती थी, तू उसके आदमी के साथ पीता था।”

तो क्या हो गया। मोना की बात कर...।” ।

वो ही, वो ही कलमुंही। उसके घर बैठकर पीता था तु । उसके आदमी को ज्यादा पिलाकर टुन्न कर देता था और बाद में उस कलमुंही के साथ मजे लेता था और सुबह लटका मुंह लेकर मेरे पास आता था।”

तेरे को ये किसने कहा?”

उसी कलमुंही के आदमी ने एक बार बताया था।”

वो तेरे को कहां मिला?

” मिल गया था एक बार। वो अपनी कलमुंही से बहुत दुखी था। बेचारा, मुझे तो उसका चेहरा याद आता है, जब वो सारी बात मुझे बता रहा था। उसकी बीवी ने खा जाने वाले स्वर में कहा।।

बूढ़े ने गिलास होंठों से लगाया और एक ही सांस में खाली कर दिया।

“साली, क्या चीज थीं वो भी।” बूढ़ी बड़बड़ा उठा।

उस कलमुंही की बात कर रहा है।” । मैं तो गिलास में पड़ी शराब की बात कर रहा हूं।

” हां...हां, मैं सब जानती हूं।

” “जवानी के दिन भी क्या दिन थे।” ।

क्यों नहीं होंगे। इधर-उधर मुंह मारने को जो मिल जाता था।” बूढ़ी जल-भुनकर बोली।

“मुंह तो मैं अब भी मार लें।” बूढे ने आह भरी।।

“अब तो तू गैस का पिचका गुब्बारा है। गाय की लात पड़ी तो पूरा फूट जाएगा।”

 
बहुत हिम्मत बाकी है अभी ।

” मुझे तो नजर नहीं आती।”

तुझ जैसी बूढ़ी को देखकर तो, सारा मूड खराब हो जाता है।”

हीरो है न तू जो मुझे बूढ़ी कहता है।” ।

तुझे क्या मैं तो अपने को भी बूढ़ा कहता हूं। जवानी के दिन भी क्या दिन थे। जिधर दिल चाहा उड़ जाओ।”

मैं तो तेरी आदतों से तंग, कब का तेरे को तलाक दे देती।

” तो दिया क्यों नहीं?” ।

रहने दे, कहानी मत पूछ, नहीं तो तेरे को दुख होगा ।”

“नहीं होगा, तू बता।” बूढ़े ने नशे में सिर हिलाकर कहा।

क्यों अपनी रात की नींद खराब करता है। नशा भी उतर जाएगा।” बूढ़ी मुंह बनाकर बोली। |

“ये बात है तो ठीक है, कल बता देना।” कहकर बूढ़ा उठा। जोरों से डगमगाया।

हजम नहीं होती तो मत पिया कर।”

क्यों नहीं हजम होती, बाहर का चक्कर लगाकर आता हूँ, फिर एकदम हल्का हो जाऊंगा।”

“पियक्कड़ कहीं का।” बूढ़ा घर का दरवाजा खोलकर बाहर निकला तो पीछे से बूढ़ी बोली ।।

घर का रास्ता मत भूल जाना। नम्बर याद है न घर का ।

” तेरे को कैसे भूल सकता हूँ मेरी जान ।”

“जा-जा, गैस के पिचके गुब्बारे ।”

बूढ़ा खुली हवा में पहुंचा और तारों भरे चमकते आसमान को देखकर आह भरी, इतने में ही वो जोरों से लड़खड़ाया, परंतु संभल कर अपने से बड़बड़ा उठा।

“आज नशा हो गया लगता है। ज्यादा ले ली।” फिर टहलने के अंदाज में आगे बढ़ गया। अपनी तरफ से तो उसे लग रहा था कि वो सही चल रहा है, परंतु चाल में स्पष्टतया लड़खड़ाहट थी।

पास में ही छोटा सा पार्क था, वो पार्क में प्रवेश कर गया। कुछ लोग वहां टहल रहे थे। वो आगे बढ़ा और एक बैंच पर जा बैठा।

मध्यम सी हवा चल रही थी। उसने आंखें बंद कर लीं। दस-बारह मिनट तक वो ऐसे ही बैठा रहा और जवानी के दिनों

को याद करने लगा कि जिंदगी का असली मजा तो तब था।

एकाएक उसके सिर को तीव्र झटका लगा। वो हड़बड़ाया। उसने आंखें खोलीं।

उसे ऐसा लगा जैसे कोई उसके सिर में प्रवेश कर आया हो। उसके दिमाग में बैठ गया हो।

कौन हो?” उसके होंठों से निकला। उसने सिर पर हाथ फेरा।

मैं शौहरी हूं।” लगा जैसे उसके कान में कोई फुसफुसाया हो।

“शौहरी?” बूढे के होंठों से निकला।

“हां ।”

लेकिन तू मेरे सिर में क्यों आ गया?

” तेरी सोचों को पढ़कर, जवानी की बहुत याद आ रही है तुम्हें?

” “बहुत।” बूढ़े ने गहरी सांस ली–“वो दिन, भुलाए नहीं भूलते।”

लेकिन अब तो तू बूढ़ा हो गया।”

 
लेकिन अब तो तू बूढ़ा हो गया।”

हां ।”

जवान कैसे होगा?” ।

नहीं हो सकता। लेकिन तू है कौन जो मेरे से बातें कर रहा है।” बूढ़े ने कहा।

“मैं शौहरी हूं। सोबरा के कालचक्र का मामूली-सा अंश हूं। परंतु वो कालचक्र जथूरा के कब्जे में है। अब कालचक्र जथूरा के ही इशारे पर काम कर रहा है। मैं नहीं जानता कि अब मेरा मालिक सोबरा है कि जथूरा।”

सोबरा–जथूरा कौन हैं?”

“भाई हैं, परंतु पक्के दुश्मन ।”

कहां रहते हैं ये कौन से इलाके में?”

तू नहीं जानता उस जगह को।

” क्यों?”

ये पूर्वजन्म की वो दुनिया है, जिसके बारे में वो ही जानकारी रख सकता है, जो कभी उससे जुड़ा रहा हो।”

“अजीब बात है।” ।

साधारण बात है।

” मेरे से क्या चाहता है तू?”

सोच रहा हूँ तू क्या सच में जवान होना चाहता है?”

“हां, लेकिन अब कहां हो पाऊंगा?”

मैं तेरे को जवान बना दूं तो?

” बूढ़ा नशे में हंस पड़ा।

क्यों मेरे से मजाक करता है।”

मैं सच कह रहा हूं। तेरे को एकदम कड़क मूंछों वाला जवान बना दूंगा।”

पागल है।” बूढ़ा बड़बड़ाया।

“पागल नहीं मैं, मैं तेरे को सच कहा रहा हूँ, तू हां बोल, अभी जवान बनाता हूं तेरे को।”

बना।”

“मेरा क्या फायदा होगा?”

फायदा तेरे को क्या फायदा चाहिए?

जवान बनकर तू मेरे लिए काम करेगा। मेरा हुक्म मानेगा।

” तेरा गुलाम बन जाऊँ मैं?”

नहीं। जब मुझे तेरे से काम होगा, तू काम करेगा, नहीं काम होगा तो मौज-मस्ती करना। पैसे मैं दूंगा तेरे को।”

कितने?”

जो तू कहेगा, जितने तू मांगेगा।

” मैं तो बहुत ज्यादा मांग लूंगा।

” “मैं दूंगा।” ।

तू मजाक कर रहा है मेरे से?

” नहीं, सच कह रहा हूं, आजमा के देख ले।

” “ठीक है। बना मेरे को जवान। मैं तेरी नौकरी करूंगा, जैसा कि तूने कहा है।”

“जवान बनने के बाद तू अपनी पत्नी के पास नहीं जाएगा।

 
वैसे भी वो तेरे को पहचानेगी नहीं। क्योंकि मैं अपनी जरूरत के मुताबिक तेरा चेहरा भी बदल दूंगा। जवानी और नया चेहरा। तेरे को मजा आएगा।”

“मुझे औरतें मिलेंगी?”

बहुत ।”

“तू देगा?”

नहीं, तेरे को अपना इंतजाम खुद करना होगा। मैं तेरे को पैसे दूंगा।”

नशे में बूढे का दिमाग तेजी से चल रहा था। “तू मेरे पास ही क्यों आया?” ।

क्योंकि बूढ़े इन बातों में जल्दी फंस जाते हैं। जवान होने की तमन्ना किसमें नहीं होती। हम बूढ़ों को जवान बनाते हैं और वो जवान बनकर हमारे लिए काम करते हैं।” उसके कानों में फुसफुसाहट जारी थी।

तेरी बातें मेरी समझ में नहीं आ रहीं।”

जितनी समझ आ रही हैं, तू उससे ही काम चला। बता, तेरे को जवान बना दें?”

मानूंगा। तू मुझे जवान बना के दिखा।” ।

“ठीक है। तेरे को दो मिनट के लिए तकलीफ होगी। सह लेना।”

“तू क्या करने वाला है मेरे साथ?”

*अभी समझ जाएगा।”

अगले ही पल उसके शरीर में पीड़ा भरती चली गई। उसने छटपटाकर चीखना चाहा।

परंतु ऐसा लगा जैसे किसी ने उसके होंठों पर हाथ रख दिया हो ।

उसने अपने शरीर में कई बदलाव महसूस किए। सब कुछ दो मिनट में ही हो गया। देख ले अब अपने को।” कानों में शौहरी की फुसफुसाहट पड़ी।

“ये...ये मुझे क्या हो गया था। तूने क्या किया?” बूढ़ा बैंच से उठता कह उठा।

“तेरे को जवान बना दिया।”

बूढ़ा अपने को टटोलने लगा। चेहरे पर हाथ फेरा तो मूंछे थीं। कद भी कुछ लम्बा हो गया था।

“मजा आया।” शौहरी के हंसने वाली फुसफुसाहट सुनाई दी।

म...मैं सच में जवान हो गया हूं।” ।

हां। रोशनी में जाकर अपने को देख ले। तेरा नाम क्या है?

” जवाहर मखानी।” “मखानी, हूं।”

मैं...मैं किसके जैसा बन गया हूं?

” भंवर सिंह जैसा, जिसका इस जन्म में बांकेलाल राठौर नाम

“बांकेलाल राठौर?”

“मैं अभी तेरे में बांकेलाल राठौर की सारी चीजें डाल देता हूँ कि सामने वाला तुझे बांकेलाल राठौर ही समझे।”

सारी चीजें क्या मतलब?”

उसका बोलने का ढंग, चाल-ढाल। उसकी ताकत। सब कुछ तेरे में आ जाएगा।”

“तू ऐसा क्यों कर रहा है। मुझे बांकेलाल राठौर जैसा क्यों बना

रहा है?"

 
“बांकेलाल राठौर बनकर जो तेरे को काम करने हैं। मेरे काम ही ऐसे हैं।”

लेकिन ।

” कुछ पल चुप रह।” फिर मखानी पर जैसे अजीब-सा नशा सवार होता चला गया।

आधा मिनट ही ये सब रहा, फिर वो सामान्य हो गया।

“शौहरी ।” मखानी के होंठों से निकला–“यो म्हारे को का हो गयो हो?”

बन गया तू बांकेलाल राठौर, लेकिन एक कमी है।”

“म्हारे को बता, का कमी हौवे?

“तेरा दिमाग अभी, बांकेलाल राठौर जैसा नहीं है, वो भी कर देता हूं।”

तंम का जादूगरो हौवे ।”

नहीं, मैं कालचक्र का मामूली-सा अंश हूं। अब मैं तेरा दिमाग बदलता हूं।”

अगले ही पल मखानी के मस्तिष्क में सितारे जैसी रोशनी चमकी।

मखानी चकराकर बैंच पर जा बैठा। फिर वो सामान्य हालत में आ गया।

अब ठीक है। अब तेरे में दो दिमाग हैं। जवाहर मखानी का और बांकेलाल राठौर का।” ।

हां, मुझे अजीब-सा महसूस हो रहा है। मेरे दिमाग में बहुत कुछ आ रहा है। देवराज चौहान, जगमोहन, थापर, मोना चौधरी, महाजन, पारसनाथ और भी बहुत कुछ...”

तू बांकेलाल राठौर जैसी भाषा में बात कर ।”

“ठीको। म्हारो जैसो कहो, वैसो ही बातो करो ।” मखानी बोला–“वो देखो, म्हारी बूढ़ी पार्क में आयो हो म्हारी तलाश में।”

मखानी की नजरें पार्क के छोटे से प्रवेश गेट पर थीं। जहां से उसकी पत्नी ने भीतर प्रवेश किया था।

“अब वो तुम्हारी पत्नी नहीं है।”

लगो हो उसो ने म्हारे को पैचान लयो हो । वो इधर ही आयो हो ।

” वो तुम्हें नहीं पहचान सकती। तुम अब बांकेलाल राठौर हो ।

” बूढ़ी पास आकर कह उठी।।

बेटा, तुमने यहां बूढ़े से आदमी को देखा है, व...वो कुछ नशे में था।”

 
म्हारे से बोल्लो हो।” मखानी ने पूछा।

हां, तुमने कहीं उस बूढ़े को देखा हो।”

“मरो पड़ो हो कंई पे वो। म्हारे को का।”

“क्या?” बूढ़ी अचकचा उठी।

वो स्वर्ग सिधार गयो। ईब वो कभी वापस नेई आयो हो ।”

तेरे मुंह में भूसा।” बूढ़ी गुस्से में कह उठी-“तू मेरे आदमी को मार रहा है।”

“अंम ही थारा बूढ़ा हौवे ।”

“भाग यहां से।” बूढ़ी पलटते हुए बोली-“मैं भी किस पागल से बात करने लगी।” वो चली गई।

“मैंने तेरे को कहा था कि वो तेरे को नहीं पहचानेगी।

” “अंम भी, एक बारो चैक करो हो उस को।” मखानी ने कहा।

“अब तू काम के लिए तैयार हो जा।

” “अम्भी ?”

हां। तेरे को नए कपड़े दिलवा देता हूँ और समझा देता हूं तूने अब क्या काम करना है और कैसे करना है।” शौहरी की फुसफुसाहट जवाहर मखानी के कानों में पड़ी।

बांकेलाल राठौर टैक्सी से उतरा तो रात के ग्यारह बज रहे थे। टैक्सी वाले को पैसे देकर पारसनाथ के रेस्टोरेंट की तरफ बढ़ गया, जो कि सामने था। रेस्टोरेंट में अब काफी हद तक शांति थीं। ज्यादा भीड़ नहीं थी। दस-बारह टेबलें ही भरी हुई थीं। भीतर पहुंचकर बांकेलाल राठौर ने मूंछों पर हाथ फेरकर हर तरफ देखा।

तभी एक तरफ खड़ा डिसूजा, बांकेलाल राठौर की तरफ बढ़ने लगा।

“मखानी।” शौहरी की फुसफुसाहट, बांकेलाल राठौर के कानों में पड़ी—“वो जो तुम्हारी तरफ आ रहा है, वो डिसूजा है और...।”

“अम जाणो हो उसो को शौहरी ।”

ये तो अच्छी बात है।” तभी डिसूजा पास आ पहुंचा। मुस्कराकर बोला। “आप बांके साहब हैं, देवराज चौहान की पहचान वाले ।”

म्हारी यादों हौवे थारे को?”

“मैं आपको कैसे भूल सकता हूं।” डिसूजा ने कहा-“आप डिनर के लिए यहां आए हैं तो आपको शानदार खाना...।”

। “म्हारे को रोटी की जरूरत न होवे।” बांकेलाल राठौर पेट पर हाथ फेरकर बोला–“पारसनाथो किधर हौवे?”

ऊपर हैं, काम है तो उन्हें बुला देता...।”

“अंम ही ऊपरो जावे ।

” पल भर के लिए डिसूजा हिचकिचाया फिर बोला।

एक मिनट रुकिए।” कहकर वो काउंटर की तरफ चला गया।

ईब पूछो हो पारसनाथो से।” बांकेलाल राठौर हड़बड़ाया।

उसी क्षण शौहरी की फुसफुसाहट उसके कानों में पड़ी। “मालूम है तेरे को क्या करना है, कैसे बात...।

” “सबो कुछ मालूम हौवे ।” बांकेलाल राठौर कह उठा।

“तुम्हें घबराना जरा भी नहीं है तुम...” ।

अंम क्यों घबराव हो। अंम इस वक्तो बांकेलाल राठौर हौवे। वो ही दिमाग, वो ही शरीर, वो ही ताकत ।”

“खूब ।” शौहरी की हंसी कानों में पड़ी—“मैंने तुम्हें चुनकर अच्छा किया।”

“मखानी, बोत काम का हौवे शौहरी।”

तभी डिसूजा पास आकर मुस्कराकर बोला।

आप उस खाली टेबल पर बैटिए। सर, अभी आ रहे हैं।”

“तो म्हारे को वो ऊपरो न बुलावे हो। कोई बातो ना।” बांकेलाल राठौर सिर हिलाता टेबल की तरफ बढ़ गया।

डिसूजा उसके साथ रहा। बांकेलाल राठौर बैठा तो डिसूजा ने पूछा। *आप क्या लेना पसंद करेंगे?” ।

तंम म्हारी खातिरदारी करो हो। ठीको, म्हारे को लस्सी चाहियो। मक्खनों का गोला डालो के ।”

“अभी हाजिर करता हूं।” कहने के साथ ही डिसूजा चला गया।

कैसा लग रहा है मखानी?” शौहरी की फुसफुसाहट कानों में पड़ी।।

 
“बोतो बढ़िया । म्हारे को विश्वास न आयो कि अंम जवान हो गया हो।”

“अभी तो तुमने जवानी का मजा लूटना है।”

सच्ची में। कोई छोकरी है क्या?

” बता दूंगा, बात तुझे करनी होगी।”

सबो कुछ अंम ही करो हो। तबो थारी जरूरतो न हौवे ।” बांकेलाल राठौर न दांत फाड़े।

“मैं तेरे को जिंदगी का भरपूर मजा दिलाऊंगा।”

धन्यवाद थारा।” ।

ये काम बढ़िया ढंग से करना।”

तंम म्हारे को बारो-बारो कार्य को ये बात कहो हो। अंम थारा कामो बढ़िया करो हो ।”

खुश हो मखानी।” शौहरी की हंसी उसके कानों में पड़ीं।।

“म्हारी जवानो वापस आ गयो। अंम बोत खुशो हौवे । मन्ने जिंदगी में कभी मूछे न रखो हो, ईब तो म्हारी मूढ़े भी हौवो हो ।

म्हारे को सब कुछ बोत जंचो हो। थारो शुक्र हौवौ ।” ।

“शुक्रिया कैसा। तुम मेरा काम करो, मैं तुम्हारा काम करूंगा। मैं भी खुश तुम भी खुश।”

मैं तो थारे से ज्यादा खुश हूं।”

“पारसनाथ आ रहा है।” शौहरी की फुसफुसाहट कानों में पड़ी। बांकेलाल राठौर ने देखा पारसनाथ को आते।

पारसनाथ पास पहुंचा। बांकेलाल राठौर ने बैठे-बैठे उससे हाथ मिलाया।

पारसनाथ उसके सामने वाली कुर्सी पर बैठ गया। तभी वेटर बड़ा गिलास लस्सी का सामने रख गया। बांकेलाल राठौर पारसनाथ को देख रहा था।

“आज सुबह ही हम मिले थे।” पारसनाथ बोला—“मैंने तो सोचा था कि तुम मुम्बई चले गए हो।”

*अंम मुम्बई से ही वापसो आयो हो।” बांकेलाल राठौर का स्वर तीखा हो गया।

 
“मुम्बई से वापस—मेरे पास क्यों?"

“नगीना भाभी किधर हौवे?”

“नगीना?” पारसनाथ की आंखें सिकुड़ीं।

“थारी मोनो चौधरो उसी को मुम्बई से ले उड़ो।” ।

नहीं ।”

“यो हौवे पारसनाथो।” बांकेलाल राठौर का स्वर कठोर हो गया।

ये नहीं हो सकता।” |

अगले ही पल बांकेलाल राठौर का घूसा पारसनाथ के गाल पर पड़ा।

कुर्सी पर बैठा पारसनाथ थोड़ा-सा लड़खड़ाया फिर संभला। पारसनाथ के चेहरे पर हैरानी के स्पष्ट भाव उभरे। डिसूजा फौरन पास आ पहुंचा। पारसनाथ ने डिसूजा को हाथ से रुकने का इशारा किया। उसकी नजरें एकटक बांके पर थीं। पारसनाथ ने अपना गाल मसला और शांत स्वर में कह उठा।

देवराज चौहान की पत्नी नगीना को कोई ले गया?

” “हां ।” बांकेलाल राठौर के दांत भिंचे थे।

तुम कहते हो कि उसे मोना चौधरी ले गई।”

कौन कहता है?" ।

“नगीना की नौकरानी सत्यो बोले हो। वो मोन्नो चौधरी को देखे

ये नहीं हो सकता।

” बांकेलाल राठौर का हाथ फिर घूमा।।

परंतु पारसनाथ सतर्क था। उसने उसी पल बांकेलाल का हाथ थाम लिया।

“होश में रहो।” पारसनाथ कठोर-खुरदरे स्वर में कह उठा–“मत भूलो तुम कहां पर हो इस वक्त” ।

“तंम म्हारे को डरावे हो?" बांकेलाल राठौर गुर्राया। ।

“समझा रहा हूं। अपने को संभालो वरना आज के बाद कोई तुम्हें देख भी नहीं पाएगा।” । *

“तंम म्हारे को धमकी दयो हो। अंम थारो को ‘वड” दयो पारसनाथो ।” बांकेलाल राठौर गुर्राया।

पारसनाथ ने उसका हाथ छोड़ते हुए कहा। *अब अपने पर काबू रखना। वरना...”

थारी वरनों की अंम परवाह न करो हो । तंम म्हारे को मोन्नो चौधरी का पतो दयो, अंम उसो को वडेगा।”

पारसनाथ ने फोन निकाला और नम्बर मिलाने लगा।

किसो मारो हो फोन्नो को?

” मोना चौधरी से बात कर रहा हूं।”

 
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