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महाकाली--देवराज चौहान और मोना चौधरी सीरिज़

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जगमोहन वापस कमरे में आ गया और धीमे स्वर में बोला।

देवराज चौहान नगीना के वापस आने पर शक कर रहा है। शौहरी ।”

“तू क्यों फिक्र करता है।” शौहरी की फुसफुसाहट कानों में पड़ी—“वो कालचक्र के खेल से बच नहीं सकता।”

रुस्तम और बांके भी कुछ शक में हैं।”

कालचक्र के सामने उसकी हस्ती मिट्टी है। तू अपने काम किए जा ।”

रुस्तम और बांके को बेहोश करूं?”

कर। लेकिन सावधान, देवा को शक न हो तुझ पर। कालचक्र को अड़चन पसंद नहीं ।”

कालचक्र है कौन?” ।

“ये जथूरा के भाई सोबरा की शक्तियों का समुद्र है, जो कभी सोबरा ने जथूरा को खत्म करने के लिए, जथूरा पर छोड़ा था। परंतु तब जथूरा को पहले ही खबर मिल गई कि सोबरा ने कालचक्र छोड़ दिया है तो जथूरा ने कालचक्र पर अपना मायाजाल फैला दिया। मायाजाल ने कालचक्र को धोखे से अपने आगोश में कैद कर लिया

और फिर जथूरा कालचक्र का मालिक बन बैठा। कालचक्र को अपने काबू में कर लिया और सोबरा को बुरी मात मिली, कालचक्र हाथ से निकल जाने से। अब वक्त आने पर जथूरा ने इन सब पर उसी कालचक्र का इस्तेमाल किया है। कालचक्र के भीतर मौजूद हम सब पहले सोबरा के सेवक थे, अब जथूरा का हुक्म मानते हैं, लेकिन काम कालचक्र के ही कर सकते हैं। क्योंकि हम कालचक्र से बंधे पड़े हैं।”

तुम्हारी बातें उलझन से भरी हैं शौहरी ।”

“तू फालतू बातें पूछता ही क्यों है, अपने काम से मतलब रख।” ।

तभी रुस्तम राव ने भीतर प्रवेश किया और जगमोहन के पास ही बेड पर बैठता कह उठा।

बाप ये पूर्वाभास तेरे को कौन कराईला है?”

“मुझे क्या पता?” जगमोहन मुस्करा पड़ा।

वो तेरे से बात नेई करेला?”

मुझे सिर्फ पूर्वाभास ही होता है।” जगमोहन बोला—“पोतेबाबा ने कहा था जथूरा की कोई दुश्मन शक्ति, पूर्वाभास कराकर मुझे खबरें दे रही है। परंतु वो मेरे से बात नहीं कर रही ।”

“वो तेरे को पूर्वाभास काये को कराईला?”

वो जो भी है, ये चाहती है कि हम पूर्वजन्म में प्रवेश कर जाएं। वहां का सफर करें ।” जगमोहन ने गम्भीर स्वर में कहा।

क्यूं बाप?”

“अभी तक जो बातें सामने आई हैं, उससे ये स्पष्ट है कि अगर हम पूर्वजन्म में प्रवेश कर गए तो, हमारा टकराव जथूरा से होगा

और वो टकराव जथूरा के लिए नुकसानदेह हो सकता है, इसलिए जथूरा हमें रोकने की चेष्टा कर रहा है। देवराज चौहान और मोना चौधरी के पूर्वजन्म में प्रवेश करने पर, दोनों के ग्रह मिलकर एक बड़ी ताकत बन जाते हैं, जो कि जथूरा पर भारी पड़ेंगे। इसलिए जथूरा देवराज चौहान और मोना चौधरी में झगड़ा कराकर, जड़ को खत्म करा देना चाहता है, ताकि जथूरा के लिए हमेशा के लिए खतरा टल जाए।”
 
“आपुन लोग जथूरा की चाल में नेई फंसेला बाप ।”

कोशिश तो यही है ।” जगमोहन मुस्कराकर बेड से उतरा और दरवाजे के पास पहुंचकर बाहर झांका–“लेकिन जथूरा भी कम नहीं है।” जगमोहन पलटा–“खासतौर से उसका कालचक्र । जथूरा अपनी चालें चल रहा है।” कहते हुए जगमोहन आगे बढ़ा और बेड के पास पड़ा छोड़ा साइड टेबल उठा लिया और हम हैं। कि जथूरा को कोई जवाब नहीं दे पा रहे हैं।”

कम्भी तो जथूरा फंसेला बाप ।”

जगमोहन साइड टेबल थामे, बेड पर बैठे, रुस्तम राव की तरफ बढ़ता बोला।

“ये टेबल देखो, इसके नीचे क्या है।” कहकर जगमोहन ने टेबल आगे किया।

रुस्तम राव ने टेबल थामने के लिए हाथ बढ़ाया।

उसी पल फुर्ती से जगमोहन ने वो छोटा टेबल ऊंचा किया और रुस्तम राव के सिर पर दे मारा।। | रुस्तम के होंठों से तीव्र कराह निकली और वो बेहोश होकर बेड पर ही लुढ़क गया।

“तूने तो कमाल कर दिया मखानी।” शौहरी की फुसफुसाहट कानों में पड़ी।

“जल्दी से पिशाचों को बुला कि इसे ले जाएं।” जगमोहन ने कहा-“कोई आ गया तो गड़बड़ हो जाएगी।”

बुलावा भेज दिया है पिशाचों को, वो आते ही होंगे।”

“तू पहले क्यों नहीं बुला के रखता।”

पिशाचों को बहुत काम होते हैं। वो इंतजार नहीं करते। उन्हें जल्दी जाना होता है।”

“तुम तो...।”

जगमोहन के शब्द मुंह में रह गए। | किसी के कदमों की आहट सुनी, जो इस तरफ आ रही थी।

कोई आ रहा है मखानी ।” शौहरी की फुसफुसाहट कानों में पड़ी।

मखानी ने फुर्ती से बेड पर उकडू पड़े रुस्तम राव को सीधा किया कि देखने पर लगे कि वो नींद में है। फिर वो साइड टेबल उठाकर बेड के पास वापस रखा, जैसा पहले पड़ा था। उसी पल बांकेलाल राठौर ने भीतर प्रवेश किया।

“मैं हाल में आ ही रहा था।” जगमोहन बोला।

यो म्हारो छोकरो लौटन लागो हो?”

“कह रहा था घंटा भर नींद लूंगा।” जगमोहन ने बांकेलाल को देखा–“एक घंटे बाद उठा देना।”

“ईबी तो घनी नींद मार के उठो हो। ईबी फिर नींद मारो हो। लगो म्हारो छोकरो जवान हो गयो हो ।” ।

जगमोहन कमरे के दरवाजे की तरफ बढ़ा। बांकेलाल राठौर भी उसके साथ ही बाहर आता कह उठा।

लंच का, का प्रोग्राम हौवो हो। नाश्तो से तो म्हारी भूखो ही न मिटो हो। बढ़ियो रेस्टोरेंट से मुर्गे मंगायो, म्हारे वास्तो।”

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मोमो जिन्न की इच्छाएं बढ़ती ही जा रही थीं।

लक्ष्मण दास और सपन चड्ढा उसकी मांगों से परेशान होने लगे थे।

| इस वक्त मोमो जिन्न के शरीर पर सपन चड्ढा का कीमती सूट था। टाई लगा रखी थी। चूंकि जूते सपन चड्ढा के पूरे नहीं आए थे, इसलिए पांवों में स्लीपर पहन रखे थे। यूं उसे समझाने को दोनों ने बहुत चेष्टा की कि ये गर्मियों का मौसम है और इस मौसम में सूट नहीं पहना जाता। परंतु मोमो जिन्न सूट पहनकर ही रहा। सुबह उसने जलेबी-रबड़ी खाई। सुबह-सुबह नौकर कार पर गया और जाने कहां से ढूंढकर लाया। उसके बाद मोमो जिन्न के मन में सूट पहनने की इच्छा जागी तो वो भी पहन लिया। सूट पहनकर वो अजीब-सा लगने लगा था। कानों में कुंडल, चोंचदार नाक। बड़े-बड़े कान और कद चार फीट और ढीला सूट। एक बारगी तो ऐसा लगता था कि जैसे उसने कोई मोटा कम्बल लपेट रखा हो।

फिर उसने तेज मसालेदार चिकन और कबाब खाने को कहा। नौकर भेजकर वो भी मंगवाया।

सारे का सारा वो खा गया, जबकि वो चार लोगों के लिए खाने का सामान था।

उसके बाद उसने सूट उतारना शुरू कर दिया। अंत में वो सपन चड्ढा के वीआईपी के अण्डरवियर में दिखने लगा। उसके चेहरे पर नाराजगी के भाव आ गए थे।

“तुम्हारा सूट अच्छा नहीं है।” मोमो जिन्न ने कहा।

मैंने तो तुम्हें पहले ही कहा था।” सपन चड्ढा ने तुरंत सिर हिलाया।

“मुझे ये दो, जो तुमने पहना है।”

ये?" सपन चड्ढा ने अपने शरीर पर पड़े कुर्ते-पायजामे को देखा।

“हां, मैं ये पहनूंगा। ये मुझे अच्छा लगेगा।”

“तुम तो कुर्ता पहनकर ही छिप जाओगे, पायजामा कहां पहनोगे।” सपन चड्ढा सकपकाकर बोला।

इसका दिमाग खराब हो गया है?” लक्ष्मण चड्ढा ने मुंह बनाया।

मोमो जिन्न ने अपने को सिर से पांव तक देखा, फिर सपन चड्ढा के पहने कुर्ते को।। । “तुम ठीक कहते हो। मेरा शरीर कुर्ते में ही छिप जाएगा।”

मोमो जिन्न बोला।

“तुम कुछ और लम्बे क्यों नहीं हो जाते?” सपन चड्ढा ने

कहा।।

“नहीं, अपने शरीर से छेड़छाड़ करना ठीक नहीं होगा, अब ।”

क्यों?”

मेरी इच्छाएं जाग चुकी हैं। अभी ये बात जथूरा के पहरेदार नहीं जानते। मुझे यही आदेश है कि मैं तीन इंच का बनू या फिर चार फीट का। मैं चार फीट से बड़ा हुआ तो वो फौरन मशीनों से जांच करेंगे कि मैंने अपने को बड़ा क्यों बनाया। क्या जरूरत पड़ गई। जांच में उन्हें पता चलेगा कि मुझे कोई जरूरत नहीं थी अपने शरीर को बड़ा करने की। तब वो मेरे से सम्पर्क करके पूछेगे कि मैं बड़ा क्यों बना, तो मैं क्या जवाब दूंगा उन्हें ।”

“ये तुम्हारी समस्या है।”

“अगर तब ठीक जवाब न दिया तो वो शक में आकर, मेरे शरीर को चैक करेंगे तो उन्हें पता चल जाएगा कि मेरी इच्छाएं जाग चुकी हैं। वो उसी पल मेरे को खत्म कर देंगे।”

“तुम्हारी बात, तुम जानो।” लक्ष्मण चड्ढा ने मुंह बनाया।
 
ये तुम लोगों की भी बात है।” क्यों?”

मेरी इच्छा को खत्म पाकर उन्होंने मुझे मारा तो तुम दोनों फिर फंस जाओगे। वो फिर तुम्हारे पास किसी दूसरे जिन्न को भेज देंगे, जो तुम लोगों पर, जथूरा पर, जथूरा के आदेश के मुताबिक हकूमत करेगा। ये मत भूलो कि मुझमें इच्छाएं आ जाने के कारण तुम दोनों भी मजे कर रहे हो। वरना अब तक डरे-सहमे से एक तरफ बैठे होते।”

लक्ष्मण दास और सपन चड्ढा की नजरें मिलीं। “कहां फंस गए?” लक्ष्मण दास बोला।

तुम यहां से भाग क्यों नहीं जाते?” सपन चड्ढा बोला।

भागकर कहां जाऊंगा?” मोमो जिन्न मुस्करा पड़ा।

“कहीं भी जाओ—तुम तो...।”

वो मुझे ढूंढ लेंगे।” मोमो जिन्न गम्भीरता से बोला–“मेरे शरीर में एक ऐसा यंत्र डाला हुआ है जथूरा के पहरेदारों ने कि मैं कहीं भी चला जाऊं, वो यंत्र उन्हें बता देगा कि मैं कहां हूं और वो मुझे पकड़ लेंगे।”

“ओह।”

लेकिन सोबरा मुझे बचा सकता है। जथूरा से मुझे आजाद करवाने की ताकत उसके पास है।”

सोबरा कौन?

” जथूरा का भाई।” ।

ये कौन से इलाके में रहता है?”

“पूर्वजन्म की ही दुनिया में रहता है। अगर मैं वहां उसके पास पहुंच जाऊं तो मेरे बचने की उम्मीद हो सकती है।”

| “तो उसके पास कैसे पहुंचोगे?”

अभी नहीं जानता। तुम पहले मुझे ऐसा कुर्ता-पायजामा, मेरे साइज का सिलवा कर दो।” ।

“अभी?”

“हां, अभी ।” मोमो जिन्न ने जिद भरे स्वर में कहा।

लक्ष्मण दास ने मुस्कराकर सपन चड्ढा से कहा। *भुगत ।”

दोनों ही भुगत रहे हैं।” सपन चड्ढा ने जले-भुने स्वर में कहा।।

“तुम हमें छोड़कर क्यों नहीं जाते। अब हम तुम्हारे किस काम के हैं।”

“अभी इस बारे में मुझे अगला आदेश नहीं मिला। आदेश मिलने तक मुझे तुम लोगों के पास ही रहना होगा।”

“तो हमारे सिर पर सवार रहोगे?”

“दूर भी जा सकता हूं। लेकिन तब अपनी इच्छाएं पूरी करने के लिए मुझे उत्पात मचाना पड़ेगा। तब इस बात की संभावना हो सकती है कि उत्पात की खबर जथूरा के पहरेदारों को लग जाए और वो जान जाएं कि मुझमें इच्छाएं आ गई हैं। इसलिए ठीक यही है कि मुझे यहीं रहने दो और मेरी इच्छाएं पूरी करते रहो। तुम भी बचे रहोगे और मैं भी।” ।

“तुम में इच्छाएं डाली किसने हैं?” सपन चड्ढा झल्लाकर बोला।

“जथूरा के किसी दुश्मन ने। पहले भी बताया था तुम्हें । कोई जथूरा का काम बिगाड़ने के लिए, ऐसा कर रहा है। मेरे में इच्छाएं डालकर मुझे काम से भटका दिया। अब मैं अपनी इच्छाएं पूरी करने में ही व्यस्त रहता हूं, तो जथूरा का काम करने के लिए वक्त कैसे निकालूंगा। मेरी इच्छाएं ही मुझे चैन से बैठने नहीं दे रहीं।”

अजीब मामला है।” बोला सपन चड्ढा।।

मेरा कुर्ता-पायजामा लाकर दो। जो मुझे पूरा आए और मुझे विमल सूटिंग्स की कमीज-पैंट भी बनवा दो। रैड टेप के जूते भी ले आना मेरे साइज के। परफ्यूम वो हो जो...।”

“अबे मैं तेरा नौकर हूं...।” सपन चड्ढा झल्लाकर कह उठा।

मोमो जिन्न ने उसे कठोर नजरों से देखा। सपन चड्ढा फौरन संभलकर बोला। “ठीक है, अभी किसी को भेजकर, सब कुछ मंगवा देता

जलेबी और रबड़ी भी मंगवा लेना।

” अभी तो तूने चिकन और बिरयानी खाई...।”

मेरी इच्छा, मैं जो भी खाऊ ।” मोमो जिन्न ने मुस्कराकर कहा—“जिन्न की इच्छाएं भी कमाल की होती हैं। अक्सर हममें ये इच्छा भी जागती है कि हम इंसानों को खा जाएं।”

क्या?” सपन चड्ढा के चेहरे का रंग उड़ गया। रगड़ देगा ये हमें।” लक्ष्मण दास ने सूखे होंठों पर जीभ फेरी।

घबराओ मत। अभी तक मेरे मन में इंसान को खाने की इच्छा नहीं जागी। जब ऐसा होता है तो हम जिन्नों के दांत लम्बे होकर होंठों से बाहर झांकने लगते हैं। नाक थोड़ी ऊपर चढ़ जाती है, आंखें कुछ फैल जाती हैं और मुंह से पानी बहता है।”

लक्ष्मण दास और सपन चड्ढा की नजरें मिलीं। दोनों के चेहरे फक्क थे।

“सुना तूने, अब ये हमें खाएगा।” लक्ष्मण चड्ढा ने घबराए स्वर में कहा।

“मैंने पहले ही कहा है कि घबराओ मत। ऐसा तब होता है। जब जिन्न की इच्छाएं पूरी न हो। तुम तो मेरी हर इच्छा पूरी कर रहे हो।”

“ह...हां ।” सपन चड्ढा जल्दी-से बोला—“तुम जो कह रहे हो, वो हम तुम्हें दे तो रहे हैं।”

| “फिर क्यों घबराते हो। मेरी इच्छाएं पूरी करो और मौज करते रहो। मेरी तरह।”

“मौज?” सपन चड्ढा ने मुंह लटकाकर कहा-“तुम्हारी इच्छाएं पूरी करते-करते मेरी जिंदगी बीत जाएगी।” ।

जिंदा तो रहोगे।” ।

लक्ष्मण दास सपन चड्ढा से बोला। इसने जो-जो मांगा है, वो जल्दी से लाकर दे इसे ।”

तू इसे अपने घर क्यों नहीं ले जाता?” ।
 
अपने...? नहीं यहीं ठीक है। हम दोनों यार हैं। तेरे-मेरे घर में फर्क ही क्या है। जल्दी कर, जो इसने मांगा है, वो लाकर दे। नौकर भेज के मंगवा। देर हुई तो गड़बड़ हो जाएगी।” ।

सपन चड्ढा जल्दी से कमरे से बाहर निकल गया। लक्ष्मण दास मोमो जिन्न के पास जाकर धीमे स्वर में बोला। “एक बात कहूं-मानेगा?”

बोल । अब तो हम दोस्त हैं।”

अगर तेरी इंसान को खाने की इच्छा करे तो पहले सपन चड्ढा को खाना, मुझे नहीं।” ।

वो तेरा दोस्त है—तू...।”

“जब जीने-मरने का सवाल आए तो दोस्त-वोस्त कुछ नहीं होता। तू पहले सपने को खाना। मुझे नहीं ।”

“ठीक है। तेरी बात मान लेता हूं।”

“तू कितना अच्छा है। ला, मैं तेरी टांगें दबाता हूं।”

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रुस्तम कहां है?" अपने कमरे की तरफ गया जगमोहन, वापस आकर देवराज चौहान और बांके से बोला।

वो तो थारो बिस्तरों पर ई नींद मारो हो।”

वहां नहीं है वो।” ।

बगलो वाले कमरो में हौवो?”

“वहां भी नहीं है। मैंने कई जगह देखा है। बंगले से बाहर जाता तो वो यहीं से निकलता।”

“बाथरूम वगैरह चैक करो।” देवराज चौहान उठते हुए बोला–“वो मिल जाएगा।” ।

उसके बाद तीनों ने रुस्तम राव को बंगले में तलाशा। परंतु रुस्तम राव नहीं मिला।

देवराज चौहान और बांकेलाल राठौर परेशान थे कि रुस्तम राव कहां चला गया। जगमोहन के बहरूप में मखानी भी चिंतित होने का भरपूर दिखावा कर रहा था। वो सोच भी नहीं सकते थे कि जगमोहन के रूप में कालचक्र उसके पास मौजूद है।

“म्हारो तो खोपड़िया खराब हो गयो हो कि छोरो कां पे चल्लो गयो।”

“सच में ये हैरानी वाली बात है।” जगमोहन परेशान-सा कह उठा।

“हमारी निगाहों में आए बिना रुस्तम बंगले से बाहर जाएगा ही क्यों?” देवराज चौहान बोला–“मेरे खयाल में कुछ हुआ है, जिसका हमें आभास नहीं हो सका। जथूरा के कालचक्र ने इस बंगले पर भी पांव फैलाने शुरू कर दिए हैं।”

“का कहत हो देवराज चौहानो।” बांकेलाल राठौर हड़बड़ाकर बोला—“कालचक्रो इधरो आयो हो?”

मुझे भी यही लगता है।” जगमोहन ने गम्भीर स्वर में कहा।

“सोहनलाल नहीं आया अभी तक?” देवराज चौहान ने जगमोहन से पूछा।

आ जाएगा।” देवराज चौहान ने फोन निकाला और सोहनलाल के नम्बर मिलाने लगा। वो चिंता में था। | देवराज चौहान ने बार-बार नम्बर मिलाया, परंतु उधर बजने वाली बेल कानों में नहीं पड़ी।

क्या हुआ?” जगमोहन ने पूछा।

नम्बर नहीं लग रहा।” देवराज चौहान कह उठा।

नेटवर्क में समस्या होगी।” जगमोहन ने कहा-“आ जाएगा वो। मैं तो रुस्तम के बारे में चिंतित हूं।” ।

“छोरा जवानो हो गयो हो। इस तरहो इसको गायब हो जानो, ठीको न हौवो।” ।

“मैं एक बार फिर बंगला देखता हूं।” कहकर जगमोहन बंगले के भीतर वाले हिस्से की तरफ बढ़ गया।

| बांकेलाल राठौर ने देवराज चौहान को देखा।

देवराज चौहान के चेहरे पर गम्भीरता के भाव नजर आ रहे थे।

देवराज चौहानो। म्हारो छोकरो किधर जायो हो?”

“मुझे भारी खतरे का अंदेशा हो रहा है।” देवराज चौहान बोला।

भारी खतरो?”

“रुस्तम के इस तरह बंगले से गायब हो जाने के पीछे, जथूरा की शक्तियों का ही हाथ है।” ।

“यो जथूरा म्हारे को मिल्लो तो अंम उसी को ‘वड' दयो।” बांकेलाल राठौर गुर्रा उठा।

“हम कुछ नहीं कर सकते बांके ।” देवराज चौहान गम्भीर था—“हमारे पास कुछ भी करने को रास्ता नहीं है। हम नहीं जानते कि जथूरा सबका अपहरण करके उन्हें कहां रख रहा है। हम नहीं जानते कि जथूरा कहां रहता...।”

वो पूर्वोजन्मो में हौवे। चल्लो हंम उधरो चल्ले ।”

पूर्वजन्म में प्रवेश करने का रास्ता हमें नहीं मालूम ।”

वो रास्तो किधर से मिल्लो हो?” ।

“मैं नहीं जानता। लेकिन जब पूर्वजन्म में प्रवेश करने का वक्त आएगा, हम रास्ते के सामने होंगे। ये ठीक है कि जथूरा की शैतानी शक्तियों के काम करने का एहसास हमें हो रहा है, परंतु मुझे पूरा विश्वास है कि पवित्र शक्तियां भी इस काम में आ चुकी हैं। पूर्वजन्म की जब बुरी शक्ति हमारे खिलाफ हरकत में आती हैं तो, अच्छी शक्तियां भी हमारे बचाव में सामने आ जाती हैं। हमारे पूर्वजन्म में प्रवेश करने की ये शुरुआत-भर है। खेल तो अभी शुरू होना है।”

जथूरो तो चाहो कि अंम पूर्वजन्म में ना जायो।” ।

“हां, वो इसी कोशिश में लगा है कि इस बार हमें पूर्वजन्म के सफर से रोक ले। वो अपनी भरपूर कोशिशें कर रहा है, मेरे खयाल से जब पूर्वजन्म के सफर का वक्त आता है, तो हमें वहां जाना ही पड़ता है। परंतु एक बात अजीब है बांके।”

बोल्लो ।”

“हमने जब-जब पूर्वजन्म में प्रवेश किया है, उससे पहले पेशीराम (फकीर बाबा) अवश्य हमारे पास आया। हमें पहले ही आगाह कर देता था आने वाले हालातों से, परंतु इस बार, अभी तक पेशीराम हमारे पास क्यों नहीं आया?”

वो बुडूढो हौवे, मरो खपो गयो हौवे ।”

नहीं वो मर नहीं सकता।” देवराज चौहान ने इंकार में सिर हिलाया।
 
“पेशीराम ने ही पहले जन्म में मोना चौधरी को मेरे खिलाफ भड़का-भड़काकर, नगरी में झगड़ा पैदा किया था। जिसका अंत बुरा हुआ था। तब पवित्र बड़ी शक्तियों ने पेशीराम को श्राप दिया था कि जब तक वो देवा और मिन्नो में दोस्ती नहीं करा देता, तब तक उसे मोक्ष (मृत्यु) की प्राप्ति नहीं होगी।”

“यो बात थारे को कौन्नो बताये हो?"

पेशीराम ने स्वयं बताई थी।” समझो...।”

यही वजह है कि पेशीराम मेरे और मोना चौधरी की दोस्ती करवाने का यत्न करने में लगा हुआ है। श्राप से ग्रस्त वो मर नहीं सकता। वो अवश्य कहीं पर व्यस्त होगा।”

“थारे को यादो हौवे पूर्वजन्मो के कांडो की?” ।

नहीं, लेकिन पूर्वजन्म में प्रवेश करने के बाद, कभी-कभी अपने उस जीवन की याद आ जाती है। ऐसा लगता है जैसे सब कुछ मेरी आंखों के सामने हुआ हो ।”

“भयानको हुओ सबो ।” ।

“हां, बहुत ही बुरा हुआ था।” देवराज चौहान जाने कहां गुम होता कह उठा–“मैं मिन्नो की जान नहीं लेना चाहता था । जानता था कि वो पेशीराम की भड़काई हुई है। परंतु मिन्नो को कौन समझाता। वो तो पागल थी मुझे जान से मार देने को। वो शाम कभी-कभी याद आती है मुझे । धुंधली-धुंधली सी याद। नगरी में युद्ध छिड़ा था। मिन्नो तब नगरी की मालकिन बन चुकी थी अपनी युद्ध कला के दम पर। उसके साथ नीलसिंह और परसू तथा नगरी के सैनिक थे। मेरे साथ जग्गू, गुलचंद, भंवर सिंह और त्रिवेणी के अलावा और भी बहुत लोग थे। युद्ध हो रहा था हममें कि तभी मिन्नो मेरे हाथ पड़ गई। वो घोड़े पर थी, मैं पैदल। हम दोनों के हाथ में तलवारें थीं, आंखों में खून उतरा हुआ था। मैं उसे समझाना चाहता था, लेकिन उसने तलवार मेरे पेट में भौंक दी थी। वो पागल हुई पड़ी थी। ऐसा होते ही मैंने उसके घोड़े की लगाम पकड़ ली। मिन्नो को घोड़े से नीचे गिरा दिया। इससे पहले कि वो उठ पाती, मैंने अपनी तलवार उसकी छाती में घुसेड़ दी। हम दोनों ही मर गए थे। बाकी सब भी इसी लड़ाई में मर गए थे।”

“बोत जुल्म हौयो ।”

“ये सब पेशीराम की वजह से हुआ था ।”

“बोत बुरो इंसानो हौवो पेशीराम तो?”

“तब था। अब ऐसा नहीं है। तपस्या कर-करके अब वो विद्वान बन चुका है। परंतु अभी भी श्राप में ग्रस्त है। वो जीना नहीं चाहता, लेकिन श्राप की वजह से वो जीने को मजबूर है। उसका शरीर बूढ़ा हो चुका है और उसी शरीर के साथ उसे जीना पड़ रहा है।”

बांकेलाल राठौर की निगाह देवराज चौहान पर थी।

देवराज चौहान का चेहरा बता रहा था कि वो कहीं खोया हुआ है। बांके ने पहले कभी देवराज चौहान को इस हाल में न देखा mथा। बांके उसे इन बातों से बाहर निकालने के लिए बोला।

अंम जल्दो ही जथूरा का कोई इंतजामो करो हो ।”

देवराज चौहान ने गहरी सांस लेकर उसे देखा फिर कह उठा।

ये बातें मुझे कभी याद नहीं आतीं। परंतु आज जाने कैसे ये सब कुछ मेरी सोचों में आ गया।”

“अम जगमोनो को देखो हो, किधरो हौवे ।”

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“मखानी।” जगमोहन के कानों में शौहरी की फुसफुसाहट पड़ी।

बोल ।” ।

भंवर सिंह को भी बेहोश करना है।”

बेहोश करने की जरूरत क्यों होती है?” मखानी के होंठ हिले।

“पिशाचों को शोर से नफरत है। शिकार होश में होगा तो शोर करेगा ही। तब पिशाच गुस्से में उसकी जान ले लेंगे।”

पिशाचों को मना कर दो कि शिकार की जान नहीं लेनी है।” मखानी ने राय दी।

“पिशाच की जात ही ऐसी है कि शोर सुनते ही वो गुस्से में भर जाते हैं।”

“तो ये काम किसी और को...।”

“जो काम पिशाच कर सकते हैं, वो दूसरा नहीं कर सकता। ये काम पिशाचों के लिए ही है।”

“तुम लोगों की दुनिया मेरी समझ से बाहर है।”

“तूने करना भी क्या है समझ के?” शौहरी की फुसफुसाहट कानों में पड़ी—“भंवर सिंह को बेहोश कर। कमला रानी से नहीं मिलना?”

“क्यों नहीं मिलना ।” मखानी कह उठा“उससे मिलने के लिए तो मैं कुछ भी कर...।”

रास्ता साफ होगा तो कमला रानी आएगी।

” मैं अभी मुच्छड़ को बेहोश करता हूं।”

“वो तुझे ढूंढता ही आ रहा है।”

मुच्छड?”

“हां, भंवरसिंह ।”

जगमोहन इस वक्त बंगले की लॉबी में था कि बांके वहां आ पहुंचा।

तम उधरो हौवे, छोरो दिखो का?”

नहीं। वो बंगले में नहीं है।”

“पक्को ?”

हां। मेरा दिल तो बुरी आशंका से घबरा रहा है। रुस्तम के साथ कुछ बुरा न हो गया हो ।”

बांकेलाल राठौर के दांत भिंच गए।

“पोतोबाबे आए क्या?”

नहीं ।” ईब वो आयो तो म्हारे को बतायो।” बांकेलाल राठौर गुर्रा उठा।

“क्यों?"

अंम उसो को ‘वड' दयो। वो ई सबो कुछ करो हो और जथूरा का नाम ले दयो ।”

तभी जगमोहन दीवार के पास पहुंचा और नीचे देखता कह उठा।

बांके ये देख, क्या है।” बांकेलाल राठौर करीब आया। बोला ।

किधरो?”

“इधर, नीचे।” पास आकर बांकेलाल राठौर देखने के लिए नीचे झुका।

उसी पल फुर्ती से मखानी ने बांके का सिर थामा और दीवार पर दे मारा।

ये का करो हो। मन्ने का थारी भैंसों को खोल लयो हो ।” बांकेलाल राठौर गुस्से से बोला और छिटककर दो कदम दूर हट गया।

दोनों की नजरें मिलीं।

जगमोहन खतरनाक निगाहों से बांकेलाल राठौर को देख रहा था।

बांकेलाल राठौर हाथ से अपना सिर रगड़ता जगमोहन को देखते ही चौंका।

“तंम जगमोनो न हौवे। थारी यो मुस्कान, उसो की न हौवो।” बांके के होंठों से निकला।

“ठीक पहचाना तूने भंवर सिंह।”

“भंवर सिंह, थारे को म्हारा नामो भी पतो हौवे, पैले जन्मो का, तंम-तंम कौनो हौवे?”

मखानी।

” “मखानो?”

मखानी हूँ मैं ।” जगमोहन के होंठों से खतरनाक, धीमा स्वर निकल रहा था—“त्रिवेणी के पास जाना है तेरे को?”

छोरे को तंमने गायब करो हो ।”

जगमोहन मुस्कराकर, बांकेलाल राठौर की तरफ बढ़ने लगा। बांकेलाल राठौर सतर्क हो गया।
 
“तंम जगमोनो नेई, उसी का बहरूपो हौवे हो। अंम थारो को ‘वड' दयो हो।” वो गुर्राया।

“छोड़ना नहीं मखानी।” जगमोहन के कानों में शौहरी की फुसफुसाहट पड़ी—“जैसे भी हो, बेहोश कर दे इसे। इसके बाद कमला रानी तेरे पास आएगी। वो भी तेरे से मिलने को बेचैन जगमोहन बांके के पास पहुंचता जा रहा था।

ये बहुत खतरनाक है मखानी, ये...।” तभी बांकेलाल राठौर, पास आते जगमोहन पर झपट पड़ा। तेजी से जगमोहन से टकराया।

जगमोहन के पांव उखड़ गए। वो पीछे को गिरने को हुआ तो उसने बांके की कमीज पकड़ ली। नतीजा ये हुआ कि दोनों ही नीचे आ गिरे। बांके ने फुर्ती दिखाई और जगमोहन के ऊपर चढ़ बैठा।।

“अंम थारे को ‘वड' दयो।” कहने के साथ ही बांकेलाल राठौर ने रिवॉल्वर निकाल ली। चेहरे पर खतरनाक भाव बिखरे हुए थे। आंखों में क्रोध की लाली दिख रही थी। उसने रिवॉल्वर जगमोहन के गले पर लगा दी।

“अपने जगमोहन को मारेगा तू?" मखानी जल्दी-से बोला।

तंम जगमोनो न होवोतंम...।”

ये शरीर तो जगमोहन का है।” मखानी ने चालाकी से उसे बातों में फंसाने की कोशिश की।

। “यो शरीरो।” ।

“हां । ये शरीर तो जगमोहन का है। मैं जगमोहन के भीतर हूं। मेरा क्या है, मैं तो निकल जाऊंगा, हवा की तरह। तू जो भी करेगा, उसमें जगमोहन के शरीर को क्षति पहुंचेगी।”

बांकेलाल राठौर के दांत भिंच गए। वो मखानी की बातों में फंसता दिखा।

“अब तू क्या करेगा मुच्छड़?”

“तंम म्हारे को मुच्छड़ बोल्लो हो ।”

“हां।” जगमोहन के होंठों पर मुस्कान उभरी–“तू मुझे गोली मार दे।”

“थारी बॉडी किधर हौवे, यो तो जगमोहन की बॉडी हौवे ।”

हां। समझ चुका है मेरी बात ।” मखानी हंसा–“फंस गया तू। मुझे मारेगा तो जगमोहन मरेगा। नहीं मारेगा तो मैं तेरे को बेहोश कर दूंगा। बोल अब क्या करेगा?”

बांके दांत भींचे उसे देखता रहा।

रिवॉल्वर हटा ले । घोड़ा दब गया तो जगमोहन मर जाएगा।”

बांके ने रिवॉल्वर गले से हटा ली।

ऊपर से हट, जगमोहन को तकलीफ हो रही है।”

“थारे को कैसे पतो कि जगमोनो को तकलीफ हौवो हो?” बांके के माथे पर बल पड़े।

“मैं उसके भीतर हूं। वो जो भी सोचता महसूस करता है, मुझे पता चल जाता है।” मखानी ने कहा।

न चाहते हुए भी बांके जगमोहन के ऊपर से उठ खड़ा हुआ।

मखानी खड़ा हुआ और जेब से चाकू निकालकर उसे खोल लिया।

“यो का करो हो?”

मैं जगमोहन को चाकू मारने जा रहा हूं।”

न...नहीं ।” बांके के होंठों से निकला “यो मत करो हो। जगमोहन को मतो मारो।”

ना मारूं?”

“भगवानो वास्तो नेई मारो।” बांकेलाल राठौर का स्वर कांप सा उठा था।

रिवॉल्वर फेंक ।”

बांके ने तुरंत रिवॉल्वर फेंक दी।

“तू तो अच्छा यार है जगमोहन का ।” मखानी रिवॉल्वर उठाते हुए कह उठा।
 
बांके क्रोध भरी निगाहों से उसे घूर रहा था। मखानी उसके पास पहुंचा और बोला।

मैं तो तेरे को त्रिवेणी के पास भेज रहा हूं।

” वो किधर हौवो?” तभी मखानी का रिवॉल्वर वाला हाथ घूमा और नाल की तीव्र चोट उसकी कनपटी पर की।

बांके के होंठों से दबी-दबी कराह निकली।

मखानी ने उसी पल दूसरी चोट की।

बांके की आंखों के सामने लाल-पीले सितारे नाचे और वो बेहोश होकर नीचे जा लुढ़का।।

मखानी ने चाकू और रिवॉल्वर अपनी जेब में रख लिए।

वाह मखानी, तूने तो बढ़िया ढंग से काम निबटा डाला। मैं तेरे को अपने साथ ले जाऊंगा।” शौहरी की आवाज कानों में पड़ी।

“कहां?”

“पूर्वजन्म में चलेगा?”

कमला रानी के बिना मैं कहीं नहीं जाऊंगा।” ।

“वो भी यही कहती है कि तेरे बिना कहीं नहीं जाऊंगी।” शौहरी की आवाज में हंसी आ गई–“वो तेरे साथ कहीं भी जाने को तैयार

“तो मैं उसके साथ ही पूर्वजन्म में जाऊंगा।”

“ठीक है तुम दोनों चलना पूर्वजन्म में । भौरी के साथ इस बारे में मेरी बात हो चुकी है।”

“इसे ले जाने के लिए पिशाचों को बुला । देवराज चौहान इधर आ गया तो...।”

बुलावा भेज दिया है उन्हें। वो आते ही होंगे। तू देवा के पास जा, कि वो इधर न आए।” | मखानी लॉबी से बाहर की तरफ बढ़ गया।

देवराज चौहान सोफा चेयर पर बैठा सिगरेट के कश ले रहा था, जब जगमोहन वहां पहुंचा।

देवराज चौहान ने जगमोहन को देखा।

“रुस्तम बंगले में है ही नहीं।” जगमोहन ने बैठते हुए चिंतित स्वर में कहा।। |

“वो खतरे में फंस चुका है।” देवराज चौहान ने कठोर स्वर में कहा।

“समझ में नहीं आता कि बंगले में उसके लिए क्या खतरा आ सकता है।”

“कुछ तो हुआ ही है। बांके कहां है?”

“किचन में है। कॉफी बना रहा है।” जगमोहन बोला-“जो कुछ भी हो रहा है, उसके बचाव में करने को हमारे पास कुछ नहीं?”

“नहीं। मेरी समझ में तो कुछ नहीं, तुम ही बता दो अगर कुछ किया जा सकता है।”
 
जगमोहन चुप कर गया। थोड़ा वक्त बीता कि देवराज चौहान उठकर किचन की तरफ बढ़ा।

कहां चले?"

बांके के पास । अब तक उसे आ जाना चाहिए था। अब ये जगह सुरक्षित नहीं रही।” देवराज चौहान ने जाते हुए कहा।

जगमोहन उसे जाते देखता रहा।

“मखानी ।” शौहरी की फुसफुसाहट कानों में पड़ी–“अब देवा को पता चल जाएगा कि भंवर सिंह भी बंगले पर नहीं है।”

“पिशाच उसे ले गए?” जगमोहन के होंठ हिले।

“कब के। भंवर सिंह को तो अब तक, बाकी लोगों के पास पहुंचा दिया होगा।”

कहां पर?"

ये तेरे जानने के लायक नहीं है। तू ज्यादा बातें न पूछा कर। कालचक्र के सेवक सिर्फ अपने काम से मतलब रखते हैं।”

मैं कालचक्र का सेवक नहीं हूं।”

“अब तू भी कालचक्र से जुड़ चुका है। ये बात तेरे को पहले भी समझाई थी।”

कमला रानी भी कालचक्र से जुड़ गई है?

” हां, वो भी।”

कमला रानी कब आएगी यहां?” । ।

“जग्गू और गुलचंद को मंजिल पर पहुंचाकर, नगीना के रूप में वो यहां पहुंचेगी।”

तभी देवराज चौहान आता दिखा।

बांके किचन में नहीं है।” देवराज चौहान बोला–“बंगले में भी नहीं लग रहा।”

“ये कैसे हो सकता है।” जगमोहन कहते हुए तेजी से किचन की तरफ बढ़ा और जोर से पुकारा–“बांके।”

देवराज चौहान की अजीब-सी निगाह जगमोहन पर थी। जगमोहन निगाहों से ओझल हो गया।

पांच मिनट बाद जगमोहन वापस लौटा। चेहरे पर हैरानी-परेशानी के भाव थे।

“बांके कहीं भी नहीं है। रुस्तम की तरह गायब हो गया। आखिर वो कहां गया?” जगमोहन का स्वर तेज था।

“इस बात का जवाब मुझसे ज्यादा तुम बेहतर जानते हो ।” देवराज चौहान ने चुभते स्वर में कहा।

क्या मतलब?” जगमोहन की नजर, देवराज चौहान पर जा बैठी।

कौन हो तुम?”

मैं?” जगमोहन चौंका–“मैं जगमोहन हूं।” उसके होंठों से निकला।

अब मुझे तुम पर शक होने लगा है।”

“क्या कह रहे हो?” जगमोहन अचकचाया। आंखें फैलकर चौड़ी हो गई थीं।

“मस्त रह मखानी।” कानों में शौहरी की फुसफुसाहट पड़ी—“देवा अंधेरे में तीर चला रहा है।”

“रुस्तम को तुम अपने बिस्तर पर सोया छोड़कर आए और वो गायब हो गया।” देवराज चौहान बोला।

“तो इसमें मेरा क्या कसूर है।” ।

“बांके को तुम किचन में छोड़कर आए और वो गायब हो गया ।”
 
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