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परसू को भूल गया तू?” “ओह पारसनाथ–समझ गया।”
उसे भी बेहोश करना है कि पिशाच उसे ले जा सके।” “उसके बाद तो मुझे छुट्टी मिलेगी।”
थोड़ी-सी, ज्यादा नहीं।”
ज्यादा क्यों नहीं?”
क्योंकि अब तूने जग्गू की जगह लेनी है। जग्गू बनकर देवा के साथ रहेगा और उनकी मुसीबतें बढ़ाएगा। मिन्नो के प्रति उसे भड़काएगा कि देवा मिन्नो को खत्म कर देना चाहे। इस दौरान सब लोग वहां पर होंगे। झगड़ा कराना है सबमें।”
ये काम तो मेरे लिए आसान है।”
“तू ये काम करना, फिर बताना कि आसान है या कठिन।” शौहरी की फुसफुसाहट कानों में पड़ रही थी।
“तो कमला रानी कोई काम नहीं करेगी तब?” मखानी ने पूछा। “वो भी तेरे पास ही रहेगी।”
किस रूप में?”
नया रूप देखेगा तू वहां कमला रानी का। ये तेरे को वहीं पे पता चलेगा।”
तो मैं कमला रानी को पहचानूगा कैसे?”
“कमला रानी ही तेरे से बात कर लेगी तब। अब तू ज्यादा मत पूछ और देवा का काम खत्म कर। कालचक्र को अपना काम समय-सीमा के भीतर पूरा करना है। कालचक्र को जब काम सौंपा जाता है तो उसे समय-सीमा से बांध दिया जाता है।”
“ओह, मगर काम समय-सीमा के भीतर पूरा न हो तो?”
“तो कालचक्र से बंधा हर कोई जान गंवा बैठेगा। मत भूल, अब तू भी कालचक्र से बंध चुका है।” |
“ये तो मुसीबत वाली बात बताई। फिर तो मुझे सारे काम जल्दी करने पड़ेंगे।” मखानी ने फंसे स्वर में कहा।
नगीना घंटा-भर आराम करके ड्राइंग हॉल में आ पहुंची। देवराज चौहान लम्बे सोफे पर अधलेटा सा था। शाम के सात बज रहे थे। अंधेरा होना शुरू हो चुका था। जगमोहन ने बंगले की लाइटें रोशन कर दीं।
“जगमोहन ।” नगीना बोली-“अपने भैया को कॉफी पिला। थोड़ी-सी मुझे भी दे देना।”
“अभी बनाता हूँ भाभी।” कहकर जगमोहन किचन की तरफ बढ़ गया।
नगीना बैठती हुई देवराज चौहान से बोली।
आप चिंतित क्यों होते हैं।”
“चिंता में नहीं, परेशान हूं।” देवराज चौहान बोला—“जथूरा की हरकतों का मतलब नहीं समझ पा रहा।”
जो भी होगा, सामने आ जाएगा। क्या पता मेरी तरह सब सामने आ जाएं। बच आएं।”
“वो जगह याद करके बताओ कि कौन-सी थी, जहां तुमने खुद को होश में आने के बाद पाया।”
“मैं जानती तो आपको पहले ही बता देती। जब मैं होश में आई तो अपने को वहां पाकर मैं घबरा गई। कुछ पल तो मुझे कुछ भी समझ में नहीं आया कि मैं कहां हूं, फिर मैं उठी जिधर रास्ता मिला, भाग निकली। मुझे डर था कि मोना चौधरी पास में न हो
और मुझे फिर उससे झगड़ा करना पड़े। इसी घबराहट में मैं सड़क पर आ पहुंची। वहीं टैक्सी मिल गई तो बैठकर मैं आ गई। मैंने तो टैक्सी वाले से भी नहीं पूछा, वो जगह कौन-सी है।”
देवराज चौहान ने आंखें बंद कर लीं।
“पता तो कीजिए, कहीं दूसरे लोग भी वापस आ गए हो।” नगीना बोली।
सोहनलाल, बांके-रुस्तम आते तो, यहीं आते या फोन पर बात अवश्य करते ।”
मोना चौधरी या महाजन लौट आए हो?"
“जगमोहन से कहकर, पारसनाथ को फोन करवाता हूं।”
उसे भी बेहोश करना है कि पिशाच उसे ले जा सके।” “उसके बाद तो मुझे छुट्टी मिलेगी।”
थोड़ी-सी, ज्यादा नहीं।”
ज्यादा क्यों नहीं?”
क्योंकि अब तूने जग्गू की जगह लेनी है। जग्गू बनकर देवा के साथ रहेगा और उनकी मुसीबतें बढ़ाएगा। मिन्नो के प्रति उसे भड़काएगा कि देवा मिन्नो को खत्म कर देना चाहे। इस दौरान सब लोग वहां पर होंगे। झगड़ा कराना है सबमें।”
ये काम तो मेरे लिए आसान है।”
“तू ये काम करना, फिर बताना कि आसान है या कठिन।” शौहरी की फुसफुसाहट कानों में पड़ रही थी।
“तो कमला रानी कोई काम नहीं करेगी तब?” मखानी ने पूछा। “वो भी तेरे पास ही रहेगी।”
किस रूप में?”
नया रूप देखेगा तू वहां कमला रानी का। ये तेरे को वहीं पे पता चलेगा।”
तो मैं कमला रानी को पहचानूगा कैसे?”
“कमला रानी ही तेरे से बात कर लेगी तब। अब तू ज्यादा मत पूछ और देवा का काम खत्म कर। कालचक्र को अपना काम समय-सीमा के भीतर पूरा करना है। कालचक्र को जब काम सौंपा जाता है तो उसे समय-सीमा से बांध दिया जाता है।”
“ओह, मगर काम समय-सीमा के भीतर पूरा न हो तो?”
“तो कालचक्र से बंधा हर कोई जान गंवा बैठेगा। मत भूल, अब तू भी कालचक्र से बंध चुका है।” |
“ये तो मुसीबत वाली बात बताई। फिर तो मुझे सारे काम जल्दी करने पड़ेंगे।” मखानी ने फंसे स्वर में कहा।
नगीना घंटा-भर आराम करके ड्राइंग हॉल में आ पहुंची। देवराज चौहान लम्बे सोफे पर अधलेटा सा था। शाम के सात बज रहे थे। अंधेरा होना शुरू हो चुका था। जगमोहन ने बंगले की लाइटें रोशन कर दीं।
“जगमोहन ।” नगीना बोली-“अपने भैया को कॉफी पिला। थोड़ी-सी मुझे भी दे देना।”
“अभी बनाता हूँ भाभी।” कहकर जगमोहन किचन की तरफ बढ़ गया।
नगीना बैठती हुई देवराज चौहान से बोली।
आप चिंतित क्यों होते हैं।”
“चिंता में नहीं, परेशान हूं।” देवराज चौहान बोला—“जथूरा की हरकतों का मतलब नहीं समझ पा रहा।”
जो भी होगा, सामने आ जाएगा। क्या पता मेरी तरह सब सामने आ जाएं। बच आएं।”
“वो जगह याद करके बताओ कि कौन-सी थी, जहां तुमने खुद को होश में आने के बाद पाया।”
“मैं जानती तो आपको पहले ही बता देती। जब मैं होश में आई तो अपने को वहां पाकर मैं घबरा गई। कुछ पल तो मुझे कुछ भी समझ में नहीं आया कि मैं कहां हूं, फिर मैं उठी जिधर रास्ता मिला, भाग निकली। मुझे डर था कि मोना चौधरी पास में न हो
और मुझे फिर उससे झगड़ा करना पड़े। इसी घबराहट में मैं सड़क पर आ पहुंची। वहीं टैक्सी मिल गई तो बैठकर मैं आ गई। मैंने तो टैक्सी वाले से भी नहीं पूछा, वो जगह कौन-सी है।”
देवराज चौहान ने आंखें बंद कर लीं।
“पता तो कीजिए, कहीं दूसरे लोग भी वापस आ गए हो।” नगीना बोली।
सोहनलाल, बांके-रुस्तम आते तो, यहीं आते या फोन पर बात अवश्य करते ।”
मोना चौधरी या महाजन लौट आए हो?"
“जगमोहन से कहकर, पारसनाथ को फोन करवाता हूं।”