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महाकाली--देवराज चौहान और मोना चौधरी सीरिज़

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परसू को भूल गया तू?” “ओह पारसनाथ–समझ गया।”

उसे भी बेहोश करना है कि पिशाच उसे ले जा सके।” “उसके बाद तो मुझे छुट्टी मिलेगी।”

थोड़ी-सी, ज्यादा नहीं।”

ज्यादा क्यों नहीं?”

क्योंकि अब तूने जग्गू की जगह लेनी है। जग्गू बनकर देवा के साथ रहेगा और उनकी मुसीबतें बढ़ाएगा। मिन्नो के प्रति उसे भड़काएगा कि देवा मिन्नो को खत्म कर देना चाहे। इस दौरान सब लोग वहां पर होंगे। झगड़ा कराना है सबमें।”

ये काम तो मेरे लिए आसान है।”

“तू ये काम करना, फिर बताना कि आसान है या कठिन।” शौहरी की फुसफुसाहट कानों में पड़ रही थी।

“तो कमला रानी कोई काम नहीं करेगी तब?” मखानी ने पूछा। “वो भी तेरे पास ही रहेगी।”

किस रूप में?”

नया रूप देखेगा तू वहां कमला रानी का। ये तेरे को वहीं पे पता चलेगा।”

तो मैं कमला रानी को पहचानूगा कैसे?”

“कमला रानी ही तेरे से बात कर लेगी तब। अब तू ज्यादा मत पूछ और देवा का काम खत्म कर। कालचक्र को अपना काम समय-सीमा के भीतर पूरा करना है। कालचक्र को जब काम सौंपा जाता है तो उसे समय-सीमा से बांध दिया जाता है।”

“ओह, मगर काम समय-सीमा के भीतर पूरा न हो तो?”

“तो कालचक्र से बंधा हर कोई जान गंवा बैठेगा। मत भूल, अब तू भी कालचक्र से बंध चुका है।” |

“ये तो मुसीबत वाली बात बताई। फिर तो मुझे सारे काम जल्दी करने पड़ेंगे।” मखानी ने फंसे स्वर में कहा।

नगीना घंटा-भर आराम करके ड्राइंग हॉल में आ पहुंची। देवराज चौहान लम्बे सोफे पर अधलेटा सा था। शाम के सात बज रहे थे। अंधेरा होना शुरू हो चुका था। जगमोहन ने बंगले की लाइटें रोशन कर दीं।

“जगमोहन ।” नगीना बोली-“अपने भैया को कॉफी पिला। थोड़ी-सी मुझे भी दे देना।”

“अभी बनाता हूँ भाभी।” कहकर जगमोहन किचन की तरफ बढ़ गया।

नगीना बैठती हुई देवराज चौहान से बोली।

आप चिंतित क्यों होते हैं।”

“चिंता में नहीं, परेशान हूं।” देवराज चौहान बोला—“जथूरा की हरकतों का मतलब नहीं समझ पा रहा।”

जो भी होगा, सामने आ जाएगा। क्या पता मेरी तरह सब सामने आ जाएं। बच आएं।”

“वो जगह याद करके बताओ कि कौन-सी थी, जहां तुमने खुद को होश में आने के बाद पाया।”

“मैं जानती तो आपको पहले ही बता देती। जब मैं होश में आई तो अपने को वहां पाकर मैं घबरा गई। कुछ पल तो मुझे कुछ भी समझ में नहीं आया कि मैं कहां हूं, फिर मैं उठी जिधर रास्ता मिला, भाग निकली। मुझे डर था कि मोना चौधरी पास में न हो

और मुझे फिर उससे झगड़ा करना पड़े। इसी घबराहट में मैं सड़क पर आ पहुंची। वहीं टैक्सी मिल गई तो बैठकर मैं आ गई। मैंने तो टैक्सी वाले से भी नहीं पूछा, वो जगह कौन-सी है।”

देवराज चौहान ने आंखें बंद कर लीं।

“पता तो कीजिए, कहीं दूसरे लोग भी वापस आ गए हो।” नगीना बोली।

सोहनलाल, बांके-रुस्तम आते तो, यहीं आते या फोन पर बात अवश्य करते ।”

मोना चौधरी या महाजन लौट आए हो?"

“जगमोहन से कहकर, पारसनाथ को फोन करवाता हूं।”
 
तभी जगमोहन ट्रे में कॉफी के तीन प्याले रखे वहां आ पहुंचा। एक प्याला उसने देवराज चौहान की तरफ टेबल पर रखा। दूसरा नगीना की तरफ, तीसरा खुद थामे एक तरफ बैठ गया। | देवराज चौहान उठ बैठा और कॉफी का प्याला थामे, जगमोहन से बोला।

“पारसनाथ को फोन करके पूछो कि क्या कुछ नया हुआ

बैठ गया जगमोहन

“कॉफी के बाद फोन करता हूं।” जगमोहन बोला।

तीनों कॉफी पीने लगे। साथ-साथ थोड़ी-बहुत बात भी चल रही थी।

दो मिनट ही बीते होंगे कि नगीना की आंखें बंद होने लगीं।

कमला रानी।” भौरी की फुसफुसाहट उसके कानों में पड़ी—“होश में आ, क्या हो रहा है तुझे ।”

“नींद आ रही है।” नगीना के होंठ से मध्यम-सा स्वर निकला। । “ओह, तो मखानी ने दवा वाली कॉफी तेरे को दे दी।”

परंतु कमला रानी कोई जवाब न दे सकी। कॉफी का प्याला उसके हाथ से छूट गया और उसकी गर्दन लुढ़क गई।

देवराज चौहान चौंका।

मखानी समझ गया कि उसने दवा वाली कॉफी गलती से, कमला रानी को दे दी है।

भाभी।” जगमोहन के होंठों से निकला। देवराज चौहान की आंखें सिकुड़ गईं। उसने उठकर नगीना को चैक किया।

नगीना गहरी बेहोशी में थी।

“क्या हुआ भाभी को?” जगमोहन घबराया-सा कह उठा।

कॉफी के कुछ घंट लेते ही बेहोश हो गई है।” देवराज चौहान ने तीखी नजरों से जगमोहन को देखा।

“कॉफी के घंट?” जगमोहन बोला–“वो ही कॉफी तो हम पी रहे हैं। मैंने बनाई है कॉफी ।” ।

इस बात पर देवराज चौहान उलझन में पड़ गया कि वो ही कॉफी उन्होंने पी है।

देवराज चौहान की तीखी नजर अभी तक जगमोहन पर थी।

“मुझे क्यों देखे जा रहे हो?” जगमोहन कह उठा।

“मुझे तुम पर शक होने लगा है।” देवराज चौहान ने स्पष्ट कहा।

शक? कैसा शक?”

“कि तूने ही कॉफी में कुछ मिलाया। परंतु गलती से तूने, मेरी अपेक्षा वो कॉफी नगीना को दे दी।”

“पागलों वाली बात मत करो, मैं ऐसा सोच भी नहीं सकता। तुम बेवकूफों की तरह मुझ पर शक कर रहे हो।” *

“कुछ तो गड़बड़ है ही।” देवराज चौहान ने पुनः नगीना को चैक किया।

। “कैसी है भाभी?”

बेहोश है, ऐसी बेहोशी नशीली दवा से ही आती है और मुझे पूरा विश्वास है कि कॉफी में बेहोशी की दवा थी।”

“कमाल है। ऐसा कैसे हो सकता है?” जगमोहन कह उठा।

“कॉफी बनाते वक्त तुम हर वक्त पास में ही रहे?”

नहीं, लॉबी में आ गया था, ओह तो बंगले पर कोई और भी है, उसी ने कॉफी में...।”

“अगर पूरी कॉफी में कुछ मिलाया होता तो हम भी बेहोश हो गए होते। सिर्फ एक कप में ही नशे की दवा थी।” देवराज चौहान का चुभता स्वर जगमोहन के कानों में पड़ा।

“तुम मुझ पर शक करना छोड़ो, ये ही तो चाहता है जथूरा।”

है, उसी ने काफी में ही नशे के

जगमोहन पलटते हुए बोला-“मैं बंगले में नजर मारकर आता हूं कि कोई भीतर है तो नहीं। ये सब शरारत उसी ने की हो।”

जगमोहन बंगले की लॉबी में आ पहुंचा।

“तूने बहुत बड़ी गलती कर दी।” शौहरी की मध्यम-सी आवाज कानों में पड़ी—“जो कप देवा को देना था, वो नगीना को दे दिया।”

“हो गई गलती ।” मखानी झल्लाया–“अब क्या करूं?”

अब तेरे को अकेले ही देवा पर काबू पाना है। तूने गलती की तो तू भुगत। अगर असफल रहा तो तुझे सजा मिलेगी।”

मखानी के दांत भिंच गए।

“कमला रानी तेरे साथ होती तो देवा पर हाथ डालने में आसानी हो जाती। अब तो खतरा और भी बढ़ गया है।”

वो कैसे?”

देवा को तुझ पर शक हो गया है कि काफी के कप में दवा तुमने ही मिलाई है।”

मखानी के दांत भिंचे रहे। “तू अपना काम पूरा कर।”

मैं देवा का मुकाबला कर पाऊंगा?”

तेरे में जग्गू जितनी ताकत है।” शौहरी की आवाज कानों में पड़ी थी—“मुकाबला नहीं कर पाएगा। तू मुकाबले की सोचता ही क्यों है। चालाकी से काम करेगा तो, शायद काम हो जाए।”

“काम न हुआ तो?”

तो मैं तुझे छोड़कर चला जाऊंगा। तब तू मर जाएगा। तेरा जीवन खत्म जो जाएगा। कमला रानी तुझे कभी नहीं मिलेगी। कालचक्र कभी भी किसी को, एक गलती के बाद दोबारा मौका नहीं देता।” ।
 
“मैं सफल होकर रहूंगा। देवा को बेहोश कर दूंगा।” मखानी के होंठों से गुर्राहट निकली।

“कर। मैं भी देखता हूं कि ये काम कैसे पूरा करता है। अपना जीवन बचा पाता है कि नहीं?”

मखानी वापस हाल में पहुंचा।

देवराज चौहान बेहोश कमला रानी को सोफा चेयर से उठाकर, लम्बे सोफे पर लिटा चुका था। | देवराज चौहान ने जगमोहन को आते देखा। उसकी आंखें सिकुड़ीं।।

जगमोहन के चेहरे के भाव उसे बदले-बदले लगे। एक हाथ पीठ पीछे कर रखा था।

देवराज चौहान कुछ सतर्क हुआ।

पास पहुंचते हुए जगमोहन ने पीछे कर रखा हाथ सामने किया। हाथ में डंडा थाम रखा था, पांच फीट का।

देवराज चौहान सतर्क-सा उसे देखे जा रहा था।

“भीतर एक आदमी मिला।” जगमोहन गुस्से से बोला—“मैंने उसे बेहोश कर दिया है डंडा मारकर ।”

कौन आदमी?” ।

मैंने उसे पहले कभी नहीं देखा। तुम देखो उसे कि, क्या तुमने उसे पहले कभी देखा है।”

देवराज चौहान कमला रानी के पास से उठ खड़ा हुआ। । “कहां है वो?” ।

*भीतर लॉबी में। मुझे पूरा विश्वास है कि उसी ने कॉफी के प्याले में बेहोशी की दवा डाली होगी। उसे मौका नहीं मिल पाया कि तीनों प्यालों में वो दवा डाल सके।” जगमोहन के स्वर में गुस्सा था।

देवराज चौहान उसके साथ चल पड़ा।

जगमोहन की बातें सुनकर देवराज चौहान उसके प्रति लापरवाह हो गया था। उसने सोचा कि वो यूं ही जगमोहन पर शक कर रहा था। और इसी लापरवाही का फायदा उठाया मखानी ने।

देवराज चौहान दो कदम आगे निकल गया, या यूं कह ले कि मखानी ही धीमा होकर दो कदम पीछे हट गया था और पीछे से मखानी ने डंडे का भरपूर वार, देवराज चौहान के सिर पर किया।

देवराज चौहान के होंठों से पीड़ा भरी कराह निकली। वो बिजली की तरह घूमा। और एक हाथ से डंडा पकड़ लिया। चेहरा क्रोध और पीड़ा से धधक उठा था। | मखानी के भी दांत भिंचे हुए थे।

तो तुम जगमोहन नहीं हो। मेरा शक ठीक निकला।”

तभी मखानी ने जूते की ठोकर देवराज चौहान की टांगों के बीच मारी।। | देवराज चौहान चीख पड़ा। डंडा उसके हाथ से छूट गया। दोनों हाथ टांगों के बीच रख लिए।

| पागल हो चुके मखानी ने दोनों हाथों से डंडा थामकर पूरी ताकत से देवराज चौहान के सिर पर मारा।

ये वार घातक सिद्ध हुआ।

नीचे जा गिरा देवराज चौहान । सिर से बहता खून चेहरे और फर्श पर बिखरने लगा।

“तू ठीक समझा कि मैं जगमोहन नहीं हूं, मैं मखानी हूं-मखानी।”

देवराज चौहान बेहोश हो चुका था।

शौहरी ।” मखानी ने डंडा फेंकते हुए, ऊंचे स्वर में पुकारा। तूने तो कमाल कर दिया मखानी।”

“मैंने अपनी जिंदगी बचाई है। मैं मर जाता तो कमला रानी का क्या होता।”

उसकी फिक्र क्यों करता है। कमला रानी को कोई दूसरा मिल जाता।”

ऐसा मत कह । कमला रानी सिर्फ मेरे से ही प्यार करेगी।” जथूरा के हंसने की आवाज कानों में पड़ी। पिशाचों को बुला कि...।” ।

वो रास्ते में हैं, आ रहे हैं।”

कमला रानी को होश कब आएगा?”

अभी आ जाएगा। भौरी उसके भीतर गई बेहोशी की दवा का असर खत्म कर रही है। कुछ ही देर में कमला तेरे सामने खड़ी होगी।” ।
 
“अगला काम पारसनाथ को बेहोश करना है?" पूछा मखानी ने।

उसके बाद ।” ।

“बाद की तेरे को बता ही चुका हूं। परसू को भी बेहोश कर। कमला रानी के साथ ही उसके पास जाना। तू जगमोहन के रूप में ही उसके पास जाएगा और कमला रानी, नगीना के चेहरे में ही...।”

“कुछ देर मैं यहीं पर कमला रानी के साथ रहूंगा ।” मखानी एकाएक मुस्कराकर बोला।

“सिर्फ कुछ देर। उसके बाद मैं और भौरी तुम दोनों को परसू के पास दिल्ली पहुंचा देंगे।”

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रात के बारह बज रहे थे।

पारसनाथ रेस्टोरेंट के ऊपर अपने घर में था। रेस्टोरेंट बंद किया जा रहा था। सितारा राधा के पास थी । न तो महाजन का कुछ पता था और न मोना चौधरी का। इन हालातों में वो खुद को अकेला महसूस कर रहा था। मन-ही-मन ये भी सोचता कि जथूरा ने सबको बुरी तरह चक्कर में डाल रखा है। उसने सब कुछ तहस-नहस कर दिया है। साथ ही ये भी उसे महसूस होता कि ये सब तो शुरुआत भर है। अगर पूर्वजन्म में प्रवेश करना पड़ गया तो पता नहीं वहां के खतरनाक हालातों का सामना कर पाएगा कि नहीं?

तभी इंटरकॉम बजा।

नीचे से उसके नौकर ने बताया कि जगमोहन किसी युवती के साथ आया है और उससे मिलना चाहता है।

। जगमोहन को इस प्रकार अचानक आया पाकर, पारसनाथ को हैरानी हुई।

वो तुरंत नीचे जा पहुंचा। जगमोहन के करीब पहुंचा। “तुम यहां कैसे?” ।

देवराज चौहान भी अन्य लोगों की तरह गायब हो गया है।” जगमोहन ने कहा।

“ओह, ये तो...।” तभी उसकी निगाह दो कदम दूर खड़ी नगीना पर पड़ी—“ये...ये तो नगीना है, जिसे मोना चौधरी ने गायब किया था।”

“हां, ये वापस आ गई है।”

कैसे?” पारसनाथ उलझन से बोला।

होश आया इसे तो वहां से भाग निकली।”

ओह, तो क्या बाकी लोग भी वहां थे?”

“नहीं” कमला रानी पास आकर बोली-“मैं अकेली थी वहां और वो जगह भी नहीं जानती–मैं तो...।”

“ये बातें बाद में।” जगमोहन पारसनाथ से कह उठा–“जरा बाहर चलो, तुम्हें कुछ दिखा दें।”

क्या?”

कार में रखा है कुछ। मेरे खयाल में हमने जथूरा का रहस्य पा लिया है।”

ओह, दिखाना मुझे, क्या दिखाना चाहते हो?”

तीनों बाहर पहुंचे। बाहर अंधेरा था। रेस्टोरेंट के साइन बोर्ड की रोशनी अवश्य फैली थी। जगमोहन पारसनाथ के साथ था। तीन कदम पीछे कमला रानी थी। कमला रानी ने पहले से ही एक तरफ रखी ईंट उठाई और दबे पांव पारसनाथ के पीछे पहुंचकर वेग के साथ जोरों से तीन-चार बार, सिर पर चोट कर दी।

पारसनाथ को संभलने का मौका नहीं मिला और वो बेहोश होकर नीचे गिरता चला गया।

“ले शौहरी।” मखानी बोला–“तेरा काम खत्म कर दिया।”

काम तो अब शुरू होगा ।” शौहरी के हंसने की आवाज आई।

*अब तो मैं कुछ देर कमला रानी के साथ बिता सकता हूं।” मखानी कह उठा।

“अभी तो मुम्बई में देवा के बंगले पर तुम दोनों ने...”

“वो तो जल्दी-जल्दी...।” ।

“तू तो पागल है मखानी, ज्यादा अच्छा नहीं...।”

“मखानी।” कमला रानी पास आकर प्यार से कह उठी–“चल, हम कार में चलते हैं।”

“कार में?" ।

समझा कर ।”

हां-हां, चल । मैं तो कंट्रोल से बाहर होता जा रहा हूं।” मखानी ने कमला रानी की कमर में हाथ डाल दिया।

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लक्ष्मण दास और सपन चड्ढा का हाल देखने वाला था।

मोमो जिन्न एक के बाद एक अपनी फरमाइश किए जा रहा था। | इस वक्त मोमो जिन्न के शरीर पर उसके साइज का सिल्क का कुर्ता था। नौकर एक घंटे में हाथोहाथ बनवा के लाया था। ये बात अलग थी कि उसे पहनकर वो कार्टून जैसा दिखने लगा था।

“अब बस भी कर।” लक्ष्मण दास बोला-“तू भी कुछ आराम कर ले और हमें भी करने दे।”

“जिन्न को ज्यादा आराम की जरूरत नहीं होती।” मोमो जिन्न ने कहा-“मैं तो बहुत खुश हूं कि मेरी इच्छाएं जाग उठी हैं, वरना मैं व्यर्थ की जिदंगी जी रहा था और जथूरा की गुलामी कर रहा था। अब मैं अपने लिए जी रहा हूं।”

“तू तो जी रहा है, लेकिन हमारी जिंदगी क्यों खराब कर रहा है, हमें इस तरह दौड़ा-दौड़ाकर?”

मैं तो अब तुम लोगों को तंग नहीं कर रहा।”

“तेरी इच्छाएं तो तंग कर रही हैं।”

उन पर मेरा बस नहीं। मैं भी कभी इंसान था। जिसने भी चालाकी से मेरे भीतर इच्छाएं जगाई हैं, उसने इंसानी इच्छाओं वाला हिस्सा मेरे मन में डाला है, इसलिए मेरी इच्छाएं इंसानों जैसी हैं।”

“खून पीने की इच्छा तो इंसानों में नहीं होती।” सपन चड्ढा जल्दी से कह उठा।

। “हां, वो तो इंसानों में नहीं होती।” मोमो जिन्न ने सिर हिलाया-“तभी तो अभी तक मेरे मन में खून पीने की इच्छा नहीं उठी।” ।

“इसका मतलब तू हमारा खून नहीं पिएगा।” सपन चड्ढा ने चैन भरे स्वर में कहा।

“भविष्य में क्या होगा, मैं कैसे बता सकता हूं।” लक्ष्मण दास ने सपन चड्ढा से कहा।

इसका कोई भरोसा नहीं, कब क्या कर दे। ये न तो इंसानों में है और न ही प्रेत योनि में।”

“ये ठीक कहता है।” मोमो जिन्न मुस्कराया—“मेरा शरीर जिन्न का है। दिमाग जिन्न का है और इच्छाएं इंसानों वाली।”

एक बात तो बता ।”

लक्ष्मण दास एकाएक कह उठा।

बोल–पूछ?”

तेरे में औरत को पाने की इच्छा नहीं होती। इंसान में, मर्दो को तो बहुत जरूरत पड़ती है।”

जिन्न ये काम नहीं करते।” मोमो जिन्न बोला।

“क्यों?”

“क्योंकि औरत पाने की इच्छा के लिए, जिस चीज का होना आवश्यक है, वो चीज हमारे पास नहीं होती।”

लक्ष्मण दास ने हड़बड़ाकर सपन चड्ढा से कहा।

सुना।”

शुक्र है कि हम जिन्न नहीं हैं।” सपन चड्ढा ने लम्बी सांस ली।

“मेरे में अभी-अभी तरबूज खाने की इच्छा जागी है।” मोमो जिन्न कह उठा।।

तरबूज?” सपन चड्ढा के होंठों से निकला।

मिल जाएगा।” लक्ष्मण दास हाथ हिलाकर बोला–“आजकल बाजार में तरबूज आया हुआ है।”

“मैं नौकर को भेजता हूं।” सपन चड्ढा कहकर उठने लगा। तभी मोमो जिन्न के होंठों से निकला।

रुक जा।” सपन चड्ढा ठिठका।।

मोमो जिन्न सिर को जरा-सा टेढ़ा करके, इस तरह सिर हिलाने लगा, जैसे कोई कुछ कर रहा हो और वो सुन रहा हो। इस दौरान मोमो जिन्न की आंखें बंद हो गई थीं।

लक्ष्मण दास और सपन चड्ढा की नजरें मिलीं।

दोनों का हाल ऐसा था कि मौका मिले तो भाग लें और पीछे पलटकर भी न देखें।

“ठीक है।” मोमो जिन्न सिर हिलाकर बोला-“मैं इन दोनों के साथ अभी वहां जाता हूं।” |

फिर मोमो जिन्न ने आंखें खोलीं और गर्दन सीधी करके खड़ा होकर, पहना कुर्ता-पायजामा उतारने लगा। देखते ही देखते सारे कपड़े उतार दिए और जल्दी से एक कोने में पहुंचकर, वहां पड़ा अपना पुराना कपड़ा उठाकर कमर के बीच की जगह में लपेटने लगा। ये करते हुए जल्दी में लग रहा था वो।

“क्या हुआ?” सपन चड्ढा ने पूछा-“नए कपड़े उतारकर तुमने पुराने क्यों पहन लिए?" ।

“जाना है।”

“ओह, जा रहे हो।” सपन चड्ढा मुस्कराकर बोला-“जाते-जाते तरबूज तो खा जाते ।”
 
“तुम दोनों को भी मेरे साथ चलना है।” मोमो जिन्न ने कमर में कपड़ा लपेट लिया।

“हमें?”

“हां, जथूरा के सेवकों की तरफ से मुझे आदेश मिला है कि तुम लोगों के साथ वहां पहुंचे जहां, देवा, मिन्नो, नील सिंह, परसू, नगीना बेहोश पड़े हैं।” मोमो जिन्न ने कहा।

लेकिन हमारे उधर जाने की क्या जरूरत है?” सपन चड्ढा घबराकर बोला।

वहां तुम लोगों ने काम करने हैं।”

काम?” ।

हां। क्या काम करने हैं, वहीं पहुंचकर बताऊंगा। मेरा क्या होगा, समझ में नहीं आ रहा।” ।

तेरे को क्या होना है। मुसीबत तो हम दोनों पर...।” । “

तुम दोनों समझते नहीं। मेरे में इच्छाएं जाग उठी हैं। मैं कैसे अपनी इच्छाओं पर काबू पाऊंगा। अगर ये भेद खुल गया कि मेरे में इच्छाएं आ गई हैं तो जथूरा के सेवक मुझे भस्म कर देंगे।” मोमो जिन्न परेशान नजर आ रहा था—“तुम दोनों ये बात किसी को न बताना।”

इच्छाओं वाली?”

हो ।”

तुम हमें साथ मत ले जाओ, तो हम ये बात किसी से नहीं कहेंगे।” लक्ष्मण दास ने कहा।

“मैं तुम दोनों को छोड़ नहीं सकता। तुम लोगों को साथ ले जाने का हुक्म मिला है।” मोमो जिन्न बोला।

“तो हम वहां पहुंचकर सबको बता देंगे कि तुममें इच्छाएं आ गई हैं।” लक्ष्मण दास ने कहा। ।

“हां-हां, हम बता देंगे।” सपन चड्ढा ने फौरन सिर हिला दिया।

मोमो जिन्न घबराकर दोनों के पास आ पहुंचा।

ये क्या कह रहे हो।” मोमो जिन्न जल्दी से बोला—“मेरा भेद खुल गया तो, तुम दोनों को कोई दूसरा जिन्न आकर गुलाम बना लेगा।” ।

“हम अब भी तुम्हारी गुलामी कर रहे हैं।”

“गलत मत समझो। इस वक्त हम दोस्त हैं। तुम अपने ढंग से फंसे हो और मैं अपने ढंग से। लेकिन तुमसे वादा करता हूं कि मौका मिलते ही तुम दोनों को आजाद कर दूंगा। परंतु इस वक्त मेरी बात मान लो और मेरे साथ ऐसे चलो, जैसे मैंने तुम दोनों पर काबू पा रखा है। बेशक दो-चार गालियां भी मुझे देते रहना। किसी को ये मत बताना कि मेरे में इच्छाएं आ गई हैं। मेरा विश्वास करो, वक्त आने पर तुम लोगों के लिए मैं अपनी जान भी दे दूंगा, लेकिन इस वक्त मेरी मजबूरी समझो।”

सच कह रहे हो? जाने दोगे?” सपन चड्ढा बोला।

मुझ पर अविश्वास मत करो। दिल को दुख होता है।” मोमो जिन्न कह उठा।

सपन चड्ढा ने लक्ष्मण दास को देखा। “क्या कहता है?”

जाना ही है इसके साथ तो नखरे क्या दिखाने । भाव क्यों बढ़ाने।” लक्ष्मण दास बाहरी सांस लेकर बोला—“अभी तो ये हमें इज्जत देकर कह रहा है, न माने तो साला हमें उलटा लटकाकर भी राजी कर लेगा।”

मोमो जिन्न उन्हें देखता, सहमति से सिर हिला उठा।

देख तो हरामी कैसे सिर हिला रहा है।”

मोमो जिन्न दांत फाड़कर मुस्करा पड़ा।

ये हमारा पीछा छोड़ने वाला नहीं ।” सपन चड्ढा ने कहा।

देखते हैं। जब तक निभती है, तब तक निभाते हैं, बाद की बाद में देखेंगे।” लक्ष्मण दास ने मन मारकर कहा।

“ये हुई बात, बोलो, जथूरा महान है।” दोनों ने मोमो जिन्न को घूरा।।

नहीं बोलेंगे।”

“समझा करो। जरूरी है बोलना, ये बोलने से तुम लोगों के शब्द जथूरा के सेवकों तक पहुंचेंगे और उन्हें लगेगा कि सब ठीक-ठाक चल रहा है। ये शब्द उन्हें न सुनाई दें तो, वो शक करने लगते हैं।” मोमो जिन्न ने कहा।

“ये शब्द भला उन तक कैसे पहुंच जाएंगे?” सपन चड्ढा उलझन से कह उठा।

“मेरे में सैंसर लगा हुआ है, जो ‘जथूरा महान है' शब्दों को कैच करके आगे भेज देता है और जथूरा के सेवकों के सैंसर, उन शब्दों को कैच करके वहां खुले मेरे खाते में डाल देते हैं कि मोमो जिन्न का काम ठीक चल रहा है।”

कितनी अजीब बातें करता है ये।” सपन चड्ढा ने कहा।

अजीब नहीं है, साधारण बात है ये। मैं देवा और मिन्नो के पूर्वजन्म के, इस हिस्से से वास्ता रखता हूं, जहां के लोगों ने बहुत तरक्की कर ली है विज्ञान में। जथूरा सबसे बड़ा वैज्ञानिक

“वैज्ञानिक?”

हां ।”

कैसी दुनिया है वो, जहां वैज्ञानिकों के सेवक जिन्न हैं। वो जादू नगरी है या वैज्ञानिक नगरी?”

“वहां सब कुछ मिलता है। जथूरा की दुनिया तुम्हारी इस दुनिया से बहुत आगे है।” मोमो जिन्न बोला–“वहां पर जिन्न, प्रेतों और पिशाचों को भी मशीनों से कंट्रोल किया जाता है। वहां जीते-जागते लोग भी काम करते हैं और रोबोट भी।”

“रोबोट?” लक्ष्मण दास ने हडबड़ाकर कहा-“पूर्वजन्म के वक्त में ।” ।

मोमो जिन्न मुस्कराया।

तो तुम लोग क्या सोचते हो कि जथूरा की दुनिया आदमयुग की है। जथूरा सच में महान है। लेकिन मैं उसका गुलाम बनकर नहीं जीना चाहता। अब मेरे में इच्छाएं जाग गईं। अब सिर्फ उसके हाथों से आजाद होना बाकी है। एक बार पूर्वजन्म में, सोबरा की शरण में चला गया तो वो मुझे जथूरा की गुलामी से आजाद करा देगा। वो मेरे दर्द को समझेगा ।”

तुम्हारी बातें हमारी समझ से बाहर हैं।”
 
तुम्हारी बातें हमारी समझ से बाहर हैं।”

तो मैं कहां कह रहा हूं कि मेरी बात को समझो। तुम जैसे नन्हे नादान जथूरा के साम्राज्य को नहीं जान सकते हैं। जो देखता है, वो ही समझता है। मात्र सुन-सुनकर जथूरा के बारे में नहीं जाना जा सकता। बोलो, जथूरा महान

| लक्ष्मण दास और सपन चड्ढा ने एक दूसरे को देखा।

“बोलो। वहां मेरे खाते में इस बात की एंट्री हो जाएगी कि मेरे यहां सब ठीक चल रहा है। मैं ड्यूटी पर हूं।”

“बोल दे सपन।” लक्ष्मण दास ने मुंह बनाकर कहा-“ये हमारा यार बना हुआ है, तभी तो सब बातें बता रहा है।”

“इसने हमें नंगा करके सड़क पर घुमा दिया तो, तब भी कहना पड़ेगा। पहले तू बोल ।”

दोनों एक साथ बोलते हैं—बोलो...” । मोनो जिन्न मुस्कराकर कह उठा।।

“तुम दोनों बहुत अच्छे हो, जो मेरी बात मान जाते हो। चलो, अब मेरे पास आकर मेरी बांहें थाम लो। हमें यहां से रवाना होना है, जहां देवा मिन्नो, नगीना, नील सिंह, परसू, भंवर सिंह और त्रिवेणी मौजूद हैं।”

दोनों उठकर मोमो जिन्न के पास पहुंचे।

मोमो जिन्न ने दोनों बांहें फैला दीं। लक्ष्मण दास और सपन चड्ढा ने उसकी एक-एक बांह थाम ली।

हम जा कहां रहे हैं?” सपन चड्ढा बोला।

वहां पहुंचकर देख लेना ।”

“हम कार पर नहीं जा सकते।”

वहां कार नहीं जाती।”

ऐसा कैसे हो सकता है?” लक्ष्मण दास कह उठा।

“वहां पहुंचोगे तो पता चल जाएगा। एक बार फिर बोलो, जथूरा महान है।”

जथूरा महान है।” दोनों फंसे स्वर में कह उठे। अगले ही पल, मोमो जिन्न के साथ-साथ लक्ष्मण दास और सपन चड्ढा का शरीर भी धुंधला-सा पड़ने लगा। देखते-ही-देखते उनके शरीर जैसे हवा में घुलते गायब होते चले गए।

अब ऐसा लग रहा था जैसे कोई वहां था ही नहीं।

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जगमोहन और सोहनलाल कुएं में फंसे ऊपर देख रहे थे। ऊपर धूप और आसमान नजर आ रहा था, जबकि भीतर अंधेरा था। बहुत कम, बाहर की रोशनी नीचे पहुंच पा रही थी। ऊपर से आती रस्सी अभी तक नीचे लटक रही थी, जिसके साथ बाल्टी बंधी थी। वो अगर खींचते तो पूरी की पूरी रस्सी नीचे गिर जानी थी। उन्हें इंतजार था कि कोई कुएं पर आए और उन्हें बाहर निकाले। सोहनलाल जगमोहन को देखकर बोला।

“हम तो बुरे फंस गए।”

बेवकूफ हैं हम।” जगमोहन ने झल्लाकर कहा।

वो कैसे?” उसके शब्दों पर सोहनलाल मुस्करा पड़ा।

“वो मोना चौधरी नहीं थी, उसका बहरूप था। ये हम जानते थे। हमने उसे देखा तो, सोचने लगे कि उसका पीछा करके, बहुत बड़ा तीर मार रहे हैं जबकि हकीकत ये थी कि वो हमें फंसाने के लिए जानबूझकर हमारे सामने आई थी कि हम उसके पीछे जाएं और वो हमें इस तरह फंसा दे।”

जगमोहन ने कुढ़कर कहा-“जथूरा का कालचक्र सच में बहुत चालाक है।”

“अब तो जो होना था, जो चुका ।”

“मुझे आशंका है कि बंगले में देवराज चौहान, बांके और रुस्तम के साथ भी बुरी घटना पेश आई होगी।”

“ये जरूरी तो नहीं ।”

“जरूरी है। जथूरा का कालचक्र हर उसके लिए है, जो पूर्वजन्म से सम्बंध रखता है।” जगमोहन बोला।

“परंतु वो तो हम लोगों को गायब कर रहा था, अब हमें इस तरह फंसा क्यों दिया।” सोहनलाल ने कहा।

“क्या पता कालचक्र ने हमें क्या सोचकर कुएं में फंसाया है। जरूर इसके पीछे कोई बड़ी चाल है।” जगमोहन ने गहरी सांस लेकर कहा-“मैं उस बुढ़िया को पहचान न सका। मैं क्या मेरी जगह कोई भी होता धोखा खा जाता। वो ही पहले मोना चौधरी के रूप में थी, जो बुढ़िया हमें मिली। मैं कुएं की मुंडेर पर हाथ रखे नीचे झांक रहा था कि कितनी आसानी से उसने मेरी दोनों टांगें उठाईं और मुझे नीचे फेंक दिया।”

“तेरे को तो फिर भी उसने इज्जत से फेंका।” सोहनलाल ने मुंह बनाया–“मुझे तो बच्चों की तरह उठाकर नीचे फेंक दिया।

ये तो अच्छा हुआ कि मैं तेरे ऊपर नहीं गिरा। मुझे तो अपने इस हाल पर तरस आ रहा है।”

जगमोहन ने कुछ नहीं कहा।

“उधर देवराज चौहान, बांके, रुस्तम हमारा इंतजार कर रहे होंगे। शाम होने वाली है।”

“पता नहीं यहां कितनी देर रहना पड़ेगा। ऊपर कुएं पर कोई गांव वाला अभी तक पानी निकालने आया नहीं।”

तभी जगमोहन को अपने बेहद करीब से, धीमी-सी आवाज सुनाई दी।

“जग्गू।”

जगमोहन की नजर तेजी से कुएं में हर तरफ घूमी। परंतु कोई न दिखा।

“कौन है?" जगमोहन के होंठों से निकला।

“मैं वही हूँ जग्गू, जो तेरे को जथूरा के हादसों का पूर्वाभास करा रहा था।” आवाज पुनः सुनाई दी।

इस बार सोहनलाल ने भी उस आवाज को सुना।

कौन हो तुम?” ।

इस वक्त मैं तुझे अपने बारे में नहीं बता सकता।”

“क्यों?" ।

तुम कालचक्र के भीतरी हिस्से में आ फंसे हो। यहां मैंने अपना नाम बताया तो कालचक्र सुन लेगा।”

“तुम कालचक्र से डरते हो?”

“मैं नहीं जानता कि इसका क्या जवाब दें, परंतु मैं नहीं चाहता कि अभी कालचक्र मेरे बारे में जाने। वैसे तू मुझे अच्छी तरह से जानता है। मेरी आवाज सुनकर तू मुझे पहचान सकता है।” वो धीमी आवाज दोनों को सुनाई दे रही थी।

“तो मैं तुझे पहचान क्यों नहीं रहा?”

“अभी तेरे को पूर्वजन्म की याद नहीं आई। जब भी तेरे मस्तिष्क में पूर्वजन्म की यादें आएंगी, तू मुझे पहचान लेगा ।”

हमें यहां से बाहर निकलो।” जगमोहन ने कहा।

ये मेरे बस में नहीं। मैं सीधे-सीधे कालचक्र से नहीं टकरा सकता।”

तो तुम हमारे लिए क्या कर सकते हो?” ।

मैं तुम पर आने वाली मुसीबतों से तुम्हें बचा सकता हूं।” वो आवाज पुनः सुनाई दी–“तुम दोनों को कालचक्र, अपने भीतर निगलने वाला है। वहां तुम दोनों के लिए ढेरों खतरे सामने आएंगे। कोई भी खतरा तुम लोगों की जिंदगी ले लेगा। तब मेरे से जितनी सहायता हो सकेगी, करूंगा, तुम्हें बचाऊंगा।”

“आखिर हमारी मंजिल क्या है?” ।

“पूर्वजन्म में प्रवेश करना। लेकिन कालचक्र तुम दोनों को अपने भीतर समेट चुका है। तुम दोनों के सामने इतने खतरे आएंगे कि बच न सकोगे, अगर बच गए तो खुद को पूर्वजन्म के प्रवेश द्वार पर खड़े पाओगे। परंतु शायद बच न सकोगे।”

“ओह!” ।

लेकिन मैं तुम्हारे साथ हूं। भरसक चेष्टा करूंगा कि तुम लोग कालचक्र से बचे रह सको।”

जगमोहन और सोहनलाल के चेहरे पर गम्भीरता के भाव थे।

“तुम मुझे जथूरा के हादसों का पूर्वाभास क्यों कराते रहे, अब तुम मेरी सहायता क्यों कर रहे हो?” । “वक्त आने पर तुम्हें तुम्हारे सवालों का जवाब मिल जाएगा जग्गू। अभी इन बातों का जवाब देकर मैं कालचक्र के सामने अपना भेद नहीं खोलना चाहता। इस वक्त तुम लोग बहुत भारी खतरे में हो।” ।

“तुम सामने क्यों नहीं आते?”

नहीं आ सकता। ये ही बहुत बड़ी बात है कि मैं कालचक्र के भीतर पहुंचकर तुमसे बात कर रहा हूं।” ।

“ओह।”

अब मेरी बात ध्यान से सुनो। जल्द हीं तुम लोग कालचक्र के भीतरी हिस्से में पहुंचने वाले हो। ये बात मन से निकाल दो कि तुम लोग इस कुएं से बाहर निकल सकोगे। ये कुआं नहीं, कालचक्र का प्रवेश द्वार है। बाहर गांव वालों को ये कुआं नजर नहीं आता। क्योंकि ये मायावी है। कुछ ही देर में ये कुआं भी गायब हो जाएगा।”

“तुम तो हमारे में डर पैदा कर रहे हो।”
 
डरो मत। हौसले से काम लो। तभी आने वाले खतरों का सामना करके जिंदा रह पाओगे।” वो आवाज उनके कानों में पड़ रही थी—“कुछ ही देर में कालचक्र तुम दोनों को अपने भीतर समेटकर, मौत की राह पर फेंकने जा रहा है। वहां तुम्हें दो रास्ते नजर आएंगे। तुम्हें गुलचंद के साथ बाईं तरफ वाले रास्ते में जाना है।”

“बाईं तरफ वाला रास्ता?”

“हां ।”

“वहां क्या होगा—जो...।”

मैं नहीं जानता कि बाईं तरफ वाले रास्ते में क्या होगा, परंतु इतना जान लिया है मैंने कि उस रास्ते पर जाने से, तुम लोग अगले खतरे के आने तक, जिंदा रह सकते हो। ये मत सोचना कि बाईं तरफ वाले रास्ते पर तुम लोग सुरक्षित हो। खतरे वहां भी होंगे, लेकिन कम होंगे। सतर्क रहे तो बचे रह सकते हो। भूलना मत, बाईं तरफ वाले रास्ते पर जाना है तुम दोनों ने। अब मैं जाता हूं, कालचक्र के भीतर की रहस्यमय परतों के बारे में पता लगाना है। कि वहां क्या-क्या खतरे भरे पड़े हैं, ताकि तुम दोनों को बचाकर पूर्वजन्म के प्रवेश द्वार तक ले जा सकें। इसमें मुझे भी खतरा है। कालचक्र मुझ पर भी अपना जाल फेंक सकता है। मुझे भी सावधानी से काम करना होगा।”

फिर कब आओगे हमारे पास?”

जल्दी लौटुंगा।”

लेकिन मेरे या सोहनलाल के पूर्वजन्म में प्रवेश कर लेने से क्या होगा। हम दोनों वहां के खतरों का सामना नहीं कर सकते। जब-जब भी हमने पूर्वजन्म में प्रवेश किया है, सबके साथ ही किया

“कालचक्र ने देवा, मिन्नो, भंवर सिंह, परसू, नीलसिंह, नगीना को भी बुरा फंसा रखा है। वो भी इस वक्त जहां पहुंच चुके हैं, वहां खतरे ही खतरे हैं, वो लोग भी खतरों से बच नहीं सके, जो बचेगा, वो ही पूर्वजन्म के प्रवेश द्वार तक पहुंच सकेगा।” । “ओह।” जगमोहन चिंतित स्वर में बोला–“वो सब लोग हैं।

कहां?” ।

“उनके बारे में सोचकर वक्त बर्बाद मत करो, अपने बारे में सोचो। याद रखना बाईं तरफ वाले रास्ते पर जाना है। अब मैं जा रहा हूं।” इसके साथ ही आवाज आनी बंद हो गई।

जगमोहन और सोहनलाल की नजरें मिलीं।

ये तो फंस गए हम।” जगमोहन गहरी सांस लेकर बोला। । “बुरे फंसे हैं।” ।

तभी कुएं में कम्पन उभरा।

दो पल के लिए लगा जैसे कुएं की गोल दीवार गिरने वाली हो, फिर वो गोल दीवार धीरे-धीरे, गोल-गोल घूमने लगी। जैसे लट्टू घूमता है। हर बीतते पल के साथ उसकी रफ्तार तेज होती जा रही थी । जगमोहन और सोहनलाल कुएं के पानी के बीचोबीच खड़े थे। हैरत की बात तो ये थी कि पानी शांत था, कुएं की गोल दीवारों के गोल-गोल घूमने पर भी, पानी अपनी जगह पर स्थिर था। तेज-तेज ऐसी आवाजें आ रही थीं, जैसे पत्थर आपस में रगड़ खा रहे हों।

तभी सोहनलाल की निगाह ऊपर पड़ी तो उसके मुंह से निकला।

ओह, हम जमीन के भीतर जा रहे हैं।” जगमोहन ने सिर उठाकर ऊपर देखा तो खुद को सुरंग जैसी जगह में महसूस किया। बाहर की रोशनी और आसमान बहुत दूर, बिंदु की तरह दिखे।

‘ये कैसी मुसीबत है।' जगमोहन बड़बड़ाया। वे दोनों अब घुप्प अंधेरे में, पानी में थे। फिर ऊपर बिंदु जैसी रोशनी नजर आनी बंद हो गई।

देर तक उन्हें पत्थरों के रगड़ने की आवाज सुनाई देती रही। फिर एकाएक ही सब कुछ थम गया। सन्नाटा सा उभर आया वहां। चुप्पी ऐसी थी कि उन्हें अपनी सांसों की आवाजें स्पष्ट सुनाई दे रही थीं। एकाएक ही उन्हें पुनः पत्थरों के रगड़ खाने की आवाज सुनाई दी और देखते-ही-देखते सामने दो दरवाजे जैसी जगह नजर आने लगी। जिनके पार दिन का उजाला फैला था। वहां पेड़ थे, मैदान था, हवा चल रही थी, उनकी नजरें दोनों दरवाजों पर थीं। ना उनके लिए हैरत की बात तो ये थी कि दोनों दरवाजों के पास एक ही जगह थी। बाएं से भीतर जाएं या दाएं से, पहुंचेंगे एक ही जगह पर, फिर उसने क्यों कहा कि वो बाईं तरफ वाले दरवाजे से भीतर प्रवेश करे। ये उलझन खुद-ब-खुद ही उनके मस्तिष्क में आ ठहरी थी।

जगमोहन ने ऊपर देखा। कुआं पाइप की तरह बंद दिखा।

ये सब क्या है?” सोहनलाल बोला।

“हम कालचक्र के भीतरी हिस्से में आ फंसे हैं।” जगमोहन ने गम्भीर स्वर में कहा।

“लेकिन ये दो दरवाजों का क्या मामला है। उसने कहा था कि हम बाईं तरफ वाले दरवाजे से भीतर प्रवेश करें। जबकि दोनों दरवाजे तो एक ही जगह पर लगे हैं। बाएं दरवाजे से जाएं या दाएं से, बात तो एक ही है।” सोहनलाल बोला।

“कुछ तो बात होगी जो उसने हमें बाईं तरफ वाले दरवाजे से जाने को कहा।”

“क्या पता वो कौन था। ये भी कालचक्र की कोई चाल न हो।”

जगमोहन सोहनलाल को देखने लगा । सोहनलाल की बात सही हो सकती थी।

जगमोहन को खामोश पाकर सोहनलाल कह उठा।

क्या सोचा, कौन-से दरवाजे से भीतर जाएं?”

“हमारे लिए दोनों रास्ते अंजाने हैं।” जगमोहन ने गम्भीर स्वर में कहा—“किसी से भी भीतर प्रवेश करें। कोई फर्क नहीं पड़ता। वो जो कोई भी था, हम उस पर भरोसा करके, बाईं तरफ वाले दरवाजे से भीतर जाएंगे।”

एक बार फिर सोच ले।” सोहनलाल ने बेचैन स्वर में कहा।

सोच लिया।” जगमोहन की आवाज में दृढ़ता थी। इसके साथ ही वो कुएं के पानी में आगे बढ़ा और ऊपर चढ़कर बाईं तरफ वाले दरवाजे से उस हरे-भरे, पेड़ों-भरे मैदानी हिस्से में प्रवेश कर गया।

सोहनलाल वहीं खड़ा देखता रहा। जगमोहन ने मुस्कराकर सोहनलाल से कहा। बहुत ठंडी हवा चल रही है, तू भी आ जा।” सोहनलाल के होंठ भिंच गए।

“सब ठीक है। फिक्र क्यों करता है।” जगमोहन पुनः कह उठा–“आ, अब, देर न कर।”

सोहनलाल कुएं के पानी में आगे बढ़ा और फिर वो भी बाईं तरफ वाले दरवाजे से निकलकर, जगमोहन के पास जा पहुंचा। तभी गड़-गड़ की आवाजें उभरीं। उन्होंने चौंककर कुएं की दीवारों में नजर आ रहे दरवाजों की तरफ देखा। आवाजें वहीं से उभरी थीं। उनके देखते-ही-देखते वो दरवाजे जैसे रास्ते बंद हो गए। वहां कुएं की दीवार नजर आने लगी। जहां से वो आए थे, वो रास्ता बंद हो चुका था और कुआं वहां किसी मीनार की तरह खड़ा था।

जगमोहन और सोहनलाल की नजरें वहां दूर-दूर तक घूमी।

परंतु वहां इंसान तो क्या, जानवर या चिड़िया तक भी नजर न आई। ऐसे हरियाली भरे वातावरण में किसी पक्षी को भी नजर न आना, उलझन में डालने वाली बात थी।

वो क्या है?” तभी सोहनलाल के होंठों से निकला।

जगमोहन ने सोहनलाल की निगाहों का पीछा करते हुए उस तरफ देखा। | वो कोई घुड़सवार था, जो कि तेजी से इसी दिशा की तरफ दौड़ा चला आ रहा था।

दोनों उसी घुड़सवार को देखते रहे। वो अब काफी पास आ चुका था। उसके शरीर पर गहरे नीले रंग के कपड़े थे। वर्दी की तरह, वो कैप्टन या फिर किसी सिपाही या ऐसे ही किसी ओहदे जैसी वर्दी में था। जब वो पास से निकला तो उसने घोड़े की रफ्तार धीमी करते हुए चिल्लाकर कहा।। । “ऐ तुम लोग यहां क्या कर रहे हो, रानी साहिबा की सवारी

आ रही है, जल्दी से रास्ता साफ कर दो। इस बात का ढिंढोरा पहले ही पिटवा दिया था कि कोई नजर न आए, फिर तुम दोनों रानी साहिबा की राहों में क्यों खड़े हो। जल्दी से दूर हट जाओ, वरना बेहद कठोर सजा मिलेगी।”

इसके साथ ही वो घुड़सवार पुनः तेजी से आगे को दौड़ता चला गया।

जगमोहन और सोहनलाल की नजरें मिलीं।

“ये सब क्या हो रहा है, ये कैसी जगह है?” सोहनलाल के होंठों से निकला।

“यहां मत खड़े रहो। कोई जगह ढूंढ़ो छिपने की, वरना नई मुसीबत में फंस जाएंगे।” जगमोहन ने कहा।

“ये रानी साहिबा कौन है जो...।”

“कहीं छिपकर देखते हैं कि रानी साहिबा और उसकी सवारी कैसी है, आओ उधर, उस पत्थर के पीछे...।”

दोनों जल्दी से कुछ दूरी पर मौजूद बड़े-से पत्थर की तरफ दौड़ते चले गए। अभी उस पत्थर के पीछे पहुंचकर, उन्होंने दो-चार सांसें ही ली होंगी कि काफी दूर धूल का छोटा सा गुब्बार उठता दिखा, साथ ही घोड़ों की बेहद मध्यम टप-टप की आवाजें, उनके कानों में पड़ने लगी थीं।

“रानी साहिबा की सवारी आ रही है।” धूल के गुब्बार को देखते हुए जगमोहन कह उठा।

। “मुझे घोड़ों की टॉपों की आवाजें सुनाई दे रही हैं।” सोहनलाल बोला।।

“पता नहीं, कहां आकर फंस गए हैं।” जगमोहन गहरी सांस लेकर सोहनलाल को देखते हुए मुस्करा पड़ा।

दोनों की निगाह दूर उठते धूल के गुब्बार पर थी, जो इसी तरफ आता जा रहा था।

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पोतेबाबा --देवराज चौहान और मोना चौधरी सीरिज़

दो शब्द–लेखक की कलम से

पाठकों को अनिल मोहन का नमस्कार!

हाजिर है, देवराज चौहान और मोना चौधरी एक साथ वाला नया उपन्यास–“पोतेबाबा'। | इससे पहले प्रकाशित ‘जथूरा' तो आपने पढ़ ही लिया होगा

और मजा भी आया होगा। अगर नहीं पढ़ा तो चिंता की कोई बात नहीं, ‘पोतेबाबा' को आप संभालकर रखें और बाजार से जथूरा’ लेकर पहले उसे पढ़े। पोतेबाबा को संभालकर रखने के लिए इसलिए कहा है कि 'जथूरा’ समाप्त होते ही आप फौरन ‘पोतेबाबा' को पढ़ना चाहेंगे और बाजार से लाने-ढूंढने में आपका वक्त जाया न हो और मजा भी बराबर बना रहे। मैं पाठकों को ये बात स्पष्ट कर देना चाहता हूं कि पहले ‘जथूरा पढ़े, उसके बाद ही ‘पोतेबाबा' पढ़े वरना ‘पोतेबाबा' में आपकी कुछ भी समझ में नहीं आएगा कि कौन-सी बात कब शुरू हुई और अब क्या हो रहा है। ‘पोतेबाबा' में जथूरा' की कहानी का सारांश भी नहीं है, क्योंकि एक पूरे उपन्यास का सारांश 5-10 पेजों में लिखना असम्भव सा काम होता है और इससे उपन्यास पढ़ने की रवानगी में बोझिलता भी आती है। यूं आज तक तो ये ही होता आया है। कि दो भागों में उपन्यास हो तो पहले उपन्यास का सारांश उल्टा-पुल्टा लिखकर, जिम्मेवारी से मुक्ति पा ली जाती है, जबकि ऐसा करना सिरे से ही गलत है। उपन्यास का मजा दस पेजों में

आ जाता तो फिर उपन्यास दस पेजों के ही होते, न कि 300-400 पेज के। इसलिए पहले जथूरा’ पढ़े फिर ‘पोतेबाबा' और पूरे-का-पूरा मजा लें। मजा आएगा, इस बात की जिम्मेवारी मेरी है। क्योंकि देवराज चौहान और मोना चौधरी की पूर्वजन्म की रहस्यमय दुनिया से वास्ता रखते हादसों में मजा ही मज़ा भरा है। रोमांस है। सनसनीखेज स्थिति आ जाने पर दिल की धड़कनें जोरों से बढ़ जाती हैं। कदम-कदम पर उलझनों का जाल है।

मेरा आगामी नया उपन्यास है—‘महाकाली।

 
पोतेबाबा

प्रस्तुत उपन्यास ‘पोतेबाबा' वहीं से शुरू करते हैं, जहां पूर्व प्रकाशित उपन्यास ‘जथूरा’ समाप्त हुआ था। ‘जथूरा’ में तब आखिरी दृश्य चल रहा था कि जगमोहन और सोहनलाल को, कालचक्र कमला रानी के माध्यम से कुएं में फिंकवा देता है और कालचक्र का वो कुआं जमीन में धंसता हुआ अंजानी दुनिया में जा पहुंचता है, वहां जब जगमोहन और सोहनलाल कुएं से बाहर निकलते हैं तो खुद को अजीब सुनसान जगह पर पाते हैं। तभी सामने से एक घुड़सवार, जिसने नीली वर्दी पहन रखी है, तेजी से आता है और उन्हें बताता है कि रानी साहिबा का काफिला आ रहा है, रास्ते से हट जाओ। ये कहकर वो आगे बढ़ जाता है और जगमोहन, सोहनलाल पास के एक बड़े से पहाड़ी पत्थर के पीछे छिप जाते हैं। कि उन्हें काफी दूर धूल का उठता गुब्बार दिखाई देता है।

जगमोहन और सोहनलाल की निगाह दूर धूल के उठते गुब्बार पर टिकी थी, जो कि पल-प्रतिपल बड़ा होता जा रहा था। देखते ही देखते धूल का गुब्बार अब स्पष्ट होने लगा। वो काफी सारे घुड़सवार थे, जो कि नीली वर्दी में थे। वो कतार में थे। उनके पीछे छत्र लगी बग्गी दिखीं और बग्गी के पीछे भी घुड़सवार थे।

ये रानी साहिबा का काफिला है।” जगमोहन बोला। लेकिन रानी साहिबा है कौन?” सोहनलाल ने गहरी सांस ली।

क्या पता। हमें कालचक्र ने अंजानी जमीन पर पहुंचा दिया है, हम...।” ।

“हम पूर्वजन्म में तो नहीं पहुंच गए?” सोहनलाल ने गर्दन घुमाकर जगमोहन को देखा।

जगमोहन की निगाह भी सोहनलाल पर गई।

कुछ पलों तक उनके बीच चुप्पी रही फिर जगमोहन गम्भीर स्वर में कह उठा।

ये जगह पूर्वजन्म का हिस्सा नहीं हो सकती।”

“क्यों?”

“जथूरा ने कालचक्र हमारे पीछे डाला था कि वो हमें पूर्वजन्म के सफर के लिए रोक सके। ऐसे में कालचक्र हमें पूर्वजन्म में क्यों पहुंचाएगा।” जगमोहन ने सोच भरे स्वर में कहा।।

सोहनलाल की निगाह काफिले की तरफ गई, जो कि अब पास आता जा रहा था।

“तुम उसे भूल गए, जो मुझे जथूरा के हादसों का पूर्वाभास करा रहा है, वो कुएं में अदृश्य रूप से हमें मिला और हमसे बात की थी। उसने कहा था कि हम लोग कालचक्र के भीतरी हिस्से में आ फंसे हैं।” जगमोहन ने कहा-“उसके मुताबिक कालचक्र हमें अपने भीतर निगल रहा है, जहां हमारे लिए ढेरों खतरे हैं। परंतु वो जो भी है, वक्त-वक्त पर हमारी सहायता करता रहेगा। लेकिन उसने ये भी कहा था कि अब हमारे सामने इतने खतरें आएंगे कि हम बच न सकेंगे।”

“जबकि हम पूर्वजन्म में प्रवेश करना चाहते हैं।” सोहनलाल ने कहा। । “मजबूरी में। वैसे पूर्वजन्म में प्रवेश करके ख़तरों का सामना करने की हमारी इच्छा नहीं है।” जगमोहन की निगाह काफिले की तरफ उटी–“जथूरा हमें पूर्वजन्म में प्रवेश करने पर रोकना चाहता है, यही वजह है कि हम जिद में पूर्वजन्म में प्रवेश करने की सोच रहे हैं कि देखें, आखिर जथूरा क्यों नहीं चाहता कि हम पूर्वजन्म में प्रवेश करें।”

“हम जथूरा के फेंके कालचक्र की भीतरी परतों में फंस चुके हैं। मेरे खयाल में तो यहां से बच जाना सम्भव नहीं लगता। हमारी जिंदगी यही खत्म हो जाएगी।” सोहनलाल बोला।

काफिला करीब आ चुका था। दोनों की निगाह उस तरफ जा टिकी थी।

उस बग्गी के आगे छः घुड़सवार थे। पीछे भी छ: घुड़सवार ही थे। सबकी कमर से बंधी तलवारें नजर आ रही थीं। बग्गी में दो घोड़े लगे थे। वहां एक युवती या औरत बैठी नजर आ रही थी। उसके अगल-बगल, कुछ पीछे की तरफ दो युवतियां थीं जिन्होंने बड़े से छाते की रॉड थाम रखी थी ताकि रानी साहिबा के ऊपर छाया रहे। दौड़ती बग्गी में इस तरह उस भारी छाते को सम्भाले रखना

आसान नहीं था। कोचवान बग्गी संभाले दौड़ा रहा था।

काफिला अब उस बड़े पत्थर के उस पार से गुजरने लगा था, जिसके पीछे वे छिपे थे।

परंतु तभी जगमोहन से गलती हो गई।

जब बग्गी पत्थर के पीछे से निकल रही थी तो उसने सिर आगे करके, बग्गी के भीतर बैठी रानी साहिबा को देख लेना चाहा और ये ही वो वक्त था कि रानी साहिबा नाम की औरत की निगाह यूं ही इस तरफ ही थी।

रोको।” रानी साहिबा एकाएक तेज स्वर में कह उठी–“बग्गी रोको ।”

फौरन ही कोचवान ने बग्गी रोक दी। पीछे आते घुड़सवार भी थम गए।
 
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