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आगे के घुड़सवार बीस-तीस कदम अवश्य आगे निकल गए थे, परंतु वे पलटकर करीब आ गए।
तभी एक घुड़सवार फौरन बग्गी के पास आ पहुंचा। “हुक्म रानी साहिबा।” वो अदब से बोला।
रानी साहिबा 35 से 50 तक की, किसी भी उम्र की हो सकती थीं।
वो खूबसूरत थी। चोली-घारा और चुनरी में थी वो। कभी वो ज्यादा उम्र की झलकती तो कभी कम उम्र की लगती।
“उस पत्थर के पीछे कोई छिपा है।” रानी साहिबा ने कहा और उठ खड़ी हुई।
“मैं अभी देखता हूं।”
“नहीं, मैं देखेंगी।” कहने के साथ ही रानी साहिबा एक ही छलांग में बग्गी से नीचे आ गई। उसके पांव नगे थे।
“आप क्यों तकलीफ करती...” उस घुड़सवार ने कहना चाहा।
“मुझे लगता है, कालचक्र से मुझे मुक्ति मिलने वाली है।” रानी साहिबा ने गम्भीर स्वर में कहा“उस पुरानी किताब में ये ही लिखा था कि सफर के दौरान मैं एक पत्थर के पीछे छिपे युवक को देखेंगी, जो कि असल में दो होंगे। वे कालचक्र का हिस्सा नहीं होंगे। कालचक्र में फंसकर यहां पहुंचे होंगे। वो ही मेरी मुक्ति का साधन बनेंगे।”
आपने दो युवकों को देखा?” घुड़सवार ने पूछा।
नहीं, एक को। अगर वो दो हैं तो, किताब की बात सच हो सकती है। शायद ये वहीं हो। तुम यहीं ठहरो।” रानी साहिबा आगे बढ़ती कह उठी_“मैं वहां जाकर देखेंगी।”
*आपको वहां खतरा...।”
चुप रहो।”
रानी साहिबा तीस-चालीस कदम का फासला तय करके पत्थर के पीछे की तरफ पहुंची।
जगमोहन तो रानी साहिबा से नजर मिलते ही, दुबक गया था। परंतु उसी पल ही घोड़ों की खामोश होती दापों का उसे एहसास से गया था कि काफिला अचानक ही रुक गया है।
जगमोहन को लगा कि इस तरह झांककर उसने गलती कर दी है। सोहनलाल उस वक्त गोली वाली सिग्रेट सुलगा रहा था। हालांकि कुएं में सिग्रेट-माचिस गीली हो गई थी, परंतु सिग्रेट-माचिस को कोई नुकसान नहीं पहुंचा था। उसने सिग्रेट सुलगाकर कुश लिया कि तभी सामने आ खड़ी, रानी साहिबा पर उसकी नजर पड़ी।
रानी साहिबा सोहनलाल को धुआं उड़ाते देख रही थी। सोहनलाल हड़बड़ाया-सा रानी साहिबा को देखने लगा।
“हम मुसीबत में पड़ गए हैं सोहनलाल।” जगमोहन ने धीमे स्वर में कहा।
क्यों?” “ये रानी साहिबा है और मुझे देखने के बाद ही इसने अपना काफिला रोका है।”
तभी रानी साहिबा उनके करीब आने लगीं। दोनों की निगाह उस पर जा टिकी थी।
स्वागत है धुआं उड़ाने वाले इंसान।” रानी साहिबा चार कदम पर ठिठककर मुस्कराकर बोली।
म...मैं?” सोहनलाल फौरन सीधा हुआ।
तुम ही। उस किताब में लिखा है कि एक इंसान धुआं उड़ा रहा होगा। वो ही मुझे मुक्ति दिलाएगा।”
“कौन-सी किताब?” ।
कालचक्र की किताब। जब मुझे कालचक्र के भीतरी हिस्से में स्थापित किया गया था, तभी वो किताब लिख दी गई थी कि धुओं उड़ाने वाले इंसान ही मुझे मुक्ति दिलाएगा, अगर मैं उसे खुश कर सकी तो...।”
खुश? मैं... मैं तो खुश ही हूं।” सोहनलाल के होंठों से निकला।
ये खुश नहीं, दूसरा खुश। वो खुश तुम्हें मैं करूंगी। अपनी बांहों में समेटकर। झूला झुलाकर ।”
सोहनलाल ने जगमोहन को देखा। जगमोहन मुस्कराया। “ये क्या कह रही है?” “तुम्हें कह रही है। मुझे नहीं।”
तभी एक घुड़सवार फौरन बग्गी के पास आ पहुंचा। “हुक्म रानी साहिबा।” वो अदब से बोला।
रानी साहिबा 35 से 50 तक की, किसी भी उम्र की हो सकती थीं।
वो खूबसूरत थी। चोली-घारा और चुनरी में थी वो। कभी वो ज्यादा उम्र की झलकती तो कभी कम उम्र की लगती।
“उस पत्थर के पीछे कोई छिपा है।” रानी साहिबा ने कहा और उठ खड़ी हुई।
“मैं अभी देखता हूं।”
“नहीं, मैं देखेंगी।” कहने के साथ ही रानी साहिबा एक ही छलांग में बग्गी से नीचे आ गई। उसके पांव नगे थे।
“आप क्यों तकलीफ करती...” उस घुड़सवार ने कहना चाहा।
“मुझे लगता है, कालचक्र से मुझे मुक्ति मिलने वाली है।” रानी साहिबा ने गम्भीर स्वर में कहा“उस पुरानी किताब में ये ही लिखा था कि सफर के दौरान मैं एक पत्थर के पीछे छिपे युवक को देखेंगी, जो कि असल में दो होंगे। वे कालचक्र का हिस्सा नहीं होंगे। कालचक्र में फंसकर यहां पहुंचे होंगे। वो ही मेरी मुक्ति का साधन बनेंगे।”
आपने दो युवकों को देखा?” घुड़सवार ने पूछा।
नहीं, एक को। अगर वो दो हैं तो, किताब की बात सच हो सकती है। शायद ये वहीं हो। तुम यहीं ठहरो।” रानी साहिबा आगे बढ़ती कह उठी_“मैं वहां जाकर देखेंगी।”
*आपको वहां खतरा...।”
चुप रहो।”
रानी साहिबा तीस-चालीस कदम का फासला तय करके पत्थर के पीछे की तरफ पहुंची।
जगमोहन तो रानी साहिबा से नजर मिलते ही, दुबक गया था। परंतु उसी पल ही घोड़ों की खामोश होती दापों का उसे एहसास से गया था कि काफिला अचानक ही रुक गया है।
जगमोहन को लगा कि इस तरह झांककर उसने गलती कर दी है। सोहनलाल उस वक्त गोली वाली सिग्रेट सुलगा रहा था। हालांकि कुएं में सिग्रेट-माचिस गीली हो गई थी, परंतु सिग्रेट-माचिस को कोई नुकसान नहीं पहुंचा था। उसने सिग्रेट सुलगाकर कुश लिया कि तभी सामने आ खड़ी, रानी साहिबा पर उसकी नजर पड़ी।
रानी साहिबा सोहनलाल को धुआं उड़ाते देख रही थी। सोहनलाल हड़बड़ाया-सा रानी साहिबा को देखने लगा।
“हम मुसीबत में पड़ गए हैं सोहनलाल।” जगमोहन ने धीमे स्वर में कहा।
क्यों?” “ये रानी साहिबा है और मुझे देखने के बाद ही इसने अपना काफिला रोका है।”
तभी रानी साहिबा उनके करीब आने लगीं। दोनों की निगाह उस पर जा टिकी थी।
स्वागत है धुआं उड़ाने वाले इंसान।” रानी साहिबा चार कदम पर ठिठककर मुस्कराकर बोली।
म...मैं?” सोहनलाल फौरन सीधा हुआ।
तुम ही। उस किताब में लिखा है कि एक इंसान धुआं उड़ा रहा होगा। वो ही मुझे मुक्ति दिलाएगा।”
“कौन-सी किताब?” ।
कालचक्र की किताब। जब मुझे कालचक्र के भीतरी हिस्से में स्थापित किया गया था, तभी वो किताब लिख दी गई थी कि धुओं उड़ाने वाले इंसान ही मुझे मुक्ति दिलाएगा, अगर मैं उसे खुश कर सकी तो...।”
खुश? मैं... मैं तो खुश ही हूं।” सोहनलाल के होंठों से निकला।
ये खुश नहीं, दूसरा खुश। वो खुश तुम्हें मैं करूंगी। अपनी बांहों में समेटकर। झूला झुलाकर ।”
सोहनलाल ने जगमोहन को देखा। जगमोहन मुस्कराया। “ये क्या कह रही है?” “तुम्हें कह रही है। मुझे नहीं।”