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महाकाली--देवराज चौहान और मोना चौधरी सीरिज़

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आगे के घुड़सवार बीस-तीस कदम अवश्य आगे निकल गए थे, परंतु वे पलटकर करीब आ गए।

तभी एक घुड़सवार फौरन बग्गी के पास आ पहुंचा। “हुक्म रानी साहिबा।” वो अदब से बोला।

रानी साहिबा 35 से 50 तक की, किसी भी उम्र की हो सकती थीं।

वो खूबसूरत थी। चोली-घारा और चुनरी में थी वो। कभी वो ज्यादा उम्र की झलकती तो कभी कम उम्र की लगती।

“उस पत्थर के पीछे कोई छिपा है।” रानी साहिबा ने कहा और उठ खड़ी हुई।

“मैं अभी देखता हूं।”

“नहीं, मैं देखेंगी।” कहने के साथ ही रानी साहिबा एक ही छलांग में बग्गी से नीचे आ गई। उसके पांव नगे थे।

“आप क्यों तकलीफ करती...” उस घुड़सवार ने कहना चाहा।

“मुझे लगता है, कालचक्र से मुझे मुक्ति मिलने वाली है।” रानी साहिबा ने गम्भीर स्वर में कहा“उस पुरानी किताब में ये ही लिखा था कि सफर के दौरान मैं एक पत्थर के पीछे छिपे युवक को देखेंगी, जो कि असल में दो होंगे। वे कालचक्र का हिस्सा नहीं होंगे। कालचक्र में फंसकर यहां पहुंचे होंगे। वो ही मेरी मुक्ति का साधन बनेंगे।”

आपने दो युवकों को देखा?” घुड़सवार ने पूछा।

नहीं, एक को। अगर वो दो हैं तो, किताब की बात सच हो सकती है। शायद ये वहीं हो। तुम यहीं ठहरो।” रानी साहिबा आगे बढ़ती कह उठी_“मैं वहां जाकर देखेंगी।”

*आपको वहां खतरा...।”

चुप रहो।”

रानी साहिबा तीस-चालीस कदम का फासला तय करके पत्थर के पीछे की तरफ पहुंची।

जगमोहन तो रानी साहिबा से नजर मिलते ही, दुबक गया था। परंतु उसी पल ही घोड़ों की खामोश होती दापों का उसे एहसास से गया था कि काफिला अचानक ही रुक गया है।

जगमोहन को लगा कि इस तरह झांककर उसने गलती कर दी है। सोहनलाल उस वक्त गोली वाली सिग्रेट सुलगा रहा था। हालांकि कुएं में सिग्रेट-माचिस गीली हो गई थी, परंतु सिग्रेट-माचिस को कोई नुकसान नहीं पहुंचा था। उसने सिग्रेट सुलगाकर कुश लिया कि तभी सामने आ खड़ी, रानी साहिबा पर उसकी नजर पड़ी।

रानी साहिबा सोहनलाल को धुआं उड़ाते देख रही थी। सोहनलाल हड़बड़ाया-सा रानी साहिबा को देखने लगा।

“हम मुसीबत में पड़ गए हैं सोहनलाल।” जगमोहन ने धीमे स्वर में कहा।

क्यों?” “ये रानी साहिबा है और मुझे देखने के बाद ही इसने अपना काफिला रोका है।”

तभी रानी साहिबा उनके करीब आने लगीं। दोनों की निगाह उस पर जा टिकी थी।

स्वागत है धुआं उड़ाने वाले इंसान।” रानी साहिबा चार कदम पर ठिठककर मुस्कराकर बोली।

म...मैं?” सोहनलाल फौरन सीधा हुआ।

तुम ही। उस किताब में लिखा है कि एक इंसान धुआं उड़ा रहा होगा। वो ही मुझे मुक्ति दिलाएगा।”

“कौन-सी किताब?” ।

कालचक्र की किताब। जब मुझे कालचक्र के भीतरी हिस्से में स्थापित किया गया था, तभी वो किताब लिख दी गई थी कि धुओं उड़ाने वाले इंसान ही मुझे मुक्ति दिलाएगा, अगर मैं उसे खुश कर सकी तो...।”

खुश? मैं... मैं तो खुश ही हूं।” सोहनलाल के होंठों से निकला।

ये खुश नहीं, दूसरा खुश। वो खुश तुम्हें मैं करूंगी। अपनी बांहों में समेटकर। झूला झुलाकर ।”

सोहनलाल ने जगमोहन को देखा। जगमोहन मुस्कराया। “ये क्या कह रही है?” “तुम्हें कह रही है। मुझे नहीं।”

 
ये मुझे खुश करने को कह रही है, लेकिन मैं...दुखी ही कब था।” सोहनलाल के होंठ सिकुड़ चुके थे।

जगमोहन मुस्करा रहा था। सोहनलाल ने रानी साहिबा को देखा। रानी साहिबा हौले से हंस पड़ी, फिर कह उठी।

“तुम घबरा रहे हो धुआं उड़ाने वाले, जबकि मैं तुम्हारे इंतजार में 50 साल की होने पर भी कुंआरी हूं।”

“म...मेरे इंतजार में ।” सोहनलाल ने सकपकाकर जगमोहन को देखा।

जन्मों का साथ लगता है।” जगमोहन मुस्कराकर सोहनलाल से बोला।

ऐ धुआं उड़ाने वाले, तू मुझसे घबरा मत, मैं तेरे को फूलों की तरह रसुंगी ।” वो कह उठी।।

फूलों की तरह।” सोहनलाल ने रानी साहिबा को देखा।

“हां, मैं तेरे को हर पल खुश रखेंगी। क्योंकि तू ही मेरे को कालचक्र से मुक्ति दिलाएगा। तेरे इंतजार में मैं मरी जा रही थी कि तू कब मिलेगा मुझे। किताब में लिखा है कि 50 बरस की होने पर, मुझे धुआं उड़ाने वाला मिलेगा। सब कुछ सच लिखा है उसमें । मेरे को ये पहले ही पता था ।”

रानी साहिबा बराबर मुस्करा रही थी—“मेरी तलाश पूरी हुई। मेरी उदासी के दिन दूर हुए। अब हम दोनों बहुत अच्छा जीवन व्यतीत करेंगे।”

“ये मुझे पागल कर देगी।” सोहनलाल जगमोहन से कह उठा।

“हम किसी बड़ी मुसीबत में फंसने जा रहे हैं।” जगमोहन् गम्भीर हो गया था।

“तुम्हारा सेवक तुम्हें अम में डाल रहा है। मैं मुसीबत नहीं हूं। मैं तुम्हारा प्यार हूं धुआं उड़ाने वाले। कब से तुम्हारा ही इंतजार कर रही थीं। तुम्हारे लिए अभी तक मैं कुंआरी रही। वरना मेरे को पाने के लिए लोग लड़ाइयां लड़ते रहे, परंतु मैंने किसी के संग प्यार नहीं किया। क्योंकि उस किताब में लिखा है कि अगर मैं तुम्हारे मिलने तक कुंआरी रही तो तभी तुम्हारे द्वारा मैं मुक्ति पा सकेंगी।” कहकर वो आगे बढ़ी और हाथ आगे किया—“मेरा हाथ थामो।”

“क्यों?” सोहनलाल के होंठों से निकला।

मैं तुम्हें अपने महल में ले चलूंगी। वहां हम प्रेम से रहेंगे।” सोहनलाल ने व्याकुल से अंदाज में जगमोहन को देखा।

जगमोहन उलझन भरी नजरों से रानी साहिबा को देख रहा था।

“तुम मुझसे बात करते-करते अपने सेवक को क्यों देखने लगते हो। क्या उससे डरते हो?” ।

रानी साहिबा का हाथ अभी भी सोहनलाल की तरफ बढ़ा हुआ था।

थाम लो मेरा हाथ।”—वो बोली।

नहीं।” सोहनलाल कह उठा।

मैं तुम्हें अच्छी नहीं लगती? क्या मैं सुंदर नहीं जो तुम...।”

“मैं तुम्हें नहीं जानता।”

मेरे साथ चलोगे तो जान जाओगे।”

मैं तुम्हारे साथ नहीं जाऊंगा।”

रानी साहिबा ने हाथ पीछे कर लिया और नाराजगी भरी नजरों से सोहनलाल को देखा।

“मेरा नाम नानिया है। लोग मुझे रानी साहिबा कहते हैं।” वो कह उठी।

सोहनलाल खामोश रहा। तुम्हें मेरे साथ चलना ही होगा।”

“नहीं ।”

मेरे पहरेदार तुम्हें जबर्दस्ती साथ ले जा सकते हैं।” नानिया बोली-“लेकिन मैं नहीं चाहती कि तुम्हारे साथ जबर्दस्ती हो। क्योंकि तुम्हारे इंतजार में मैं कब से बैठी थी।” ।

“तुम जानती हो, ये कालचक्र है?” जगमोहन ने कहा।

“अवश्य सेवक। कालचक्र की भीतरी परतों में मुझे डाला गया है।” नानिया कह उठी।

किसने किया ऐसा?”

सोबरा ने। परंतु अब कालचक्र पर जथूरा का कब्जा हो चुका है। जथूरा के इशारे पर ही इस वक्त कालचक्र काम कर रहा है।”

हमें कालचक्र ने फंसाकर यहां फेंका है।”

जानती हूं। तभी तो तुम दोनों यहां तक आ गए। परंतु तुम्हें आना ही था। वो किताब में लिखा है ऐसा।”

कहां है किताब?” ।

मेरे पास मेरे महल में।” कुछ पल वहां चुप्पी रही।

“ऐ सेवक। क्या तुम अपने मालिक को मेरे साथ चलने पर तैयार कर सकते हों?”

क्यों हम तुम्हारे साथ चलें?”

मुझे मुक्ति चाहिए कालचक्र से और किताब में लिखा है कि धुआं उड़ाने वाला ही मुझे मुक्ति दिलाएगा।”

 
तुम धोखा भी हो सकती हो, हमारे लिए...।”

“क्या मैं तुम्हें ऐसी लगती हूं?”

कालचक्र में कुछ भी हो सकता है।” नानिया ने गहरी सांस ली और बोली।

तो मुझे धुआं उड़ाने वाले के साथ जबर्दस्ती करनी ही पड़ेगी।” तभी सोहनलाल कह उठा।

मैं तुम्हारे साथ चलने को तैयार हूं।” ।

नानिया का चेहरा खिल उठा। “तुम सच में मुझे प्यार करते हो धुआं उड़ाने वाले...”

मेरे खयाल में ये गलत होगा।” जगमोहन ने सोहनलाल से कहा।

यहां हमारे लिए सब कुछ अनजाना और नया है। कहीं तो हमें कदम आगे बढ़ाने ही हैं।”

परंतु इसके साथ जाने से हम किसी बड़ी मुसीबत में..." ।

इसके साथ नहीं गए तो क्या गारंटी है कि हम मुसीबत में नहीं फंसेंगे।” सोहनलाल ने कहा।

जगमोहन के होंठ भिंच गए।

हम कालचक्र में हैं। यहां हमारे लिए सिर्फ खतरे हैं। जो तुम्हें जथूरा के हादसों का पूर्वाभास करा रहा था, उसने भी कुएं में हमें यहीं कहा कि कालचक्र की गहरी परतों में हमारे सामने खतरे आएंगे, जिनसे बचना कठिन है। अगर बच गए तो उस स्थिति में ही हम पूर्वजन्म में प्रवेश कर सकेंगे।”

जगमोहन ने गहरी सांस ली। नानिया को देखा। नानिया मुस्कराकर सोहनलाल से बोली।

मैंने तुम दोनों की बातें सुनीं। तुम दोनों आशंका में फंसे हो। परंतु मेरे से तुम्हें कोई नुकसान नहीं होगा।” ।

“नुकसान क्यों नहीं होगा।” सोहनलाल बोला—“तुम भी तो कालचक्र का ही हिस्सा हो।”

तुम्हारा शक जायज है, परंतु मैं तुम्हें नुकसान नहीं पहुंचाऊंगी, एक बार मेरे साथ चल के तो देखो।”

एक बार साथ चलने पर ही हमारा काम हो गया तो..."

धुआं उड़ाने वाले, तुम तो बहुत डरपोक हो। ऐसे में मुझे क्या मुक्ति दिलाओगे?”

मैंने कब कहा कि मैं तुम्हारे लिए कुछ करूंगा।” ।

“तो उस किताब में ऐसा क्यों लिखा है?” नानिया ने सोच-भरे स्वर में कहा।

और क्या-क्या लिखा है उस किताब में?”

बहुत कुछ, परंतु वो मुझे समझ नहीं आता। अपने मतलब की बात ही समझ पाती हूं।”

“किसने लिखी वो किताब?” ।

सोबरा ने। जब उसने कालचक्र की भीतरी परतों में मुझे बिठाया तो वो किताब भी मुझे दे दी थी, कहा कि ये किताब मुझे कालचक्र से आजाद कराएगी।”

“हैरानी है। सोबरा ने कालचक्र का निर्माण किया और वो तुम्हें कालचक्र से मुक्ति का रास्ता भी बता रहा है।”

“शायद तब सोबरा को आशंका रही होगी कि कालचक्र पर उसका भाई जथूरा, अपना कब्जा जमा सकता है।”

नानिया बोली-“इस बात पर मैंने भी बहुत बार सोचा, परंतु किसी नतीजे पर नहीं पहुंच सकी। अब तुम चलों मेरे साथ। देर क्यों कर रहे हो। यहां गर्मी भी बहुत है। महल में पहुंचकर तुम मेरे साथ गुलाब जल में नहाना।”

सोहनलाल ने जगमोहन को देखा।

अब मैं क्या करूं?”

“जैसा तुम चाहो ।” जगमोहन ने गम्भीर स्वर में कहा।

“तुम बात-बात पर अपने सेवक से इजाजत क्यों लेते हो?” नानिया तीखे स्वर में बोली।

इजाजत नहीं सलाह ले रहा हूं। ये मुझे सलाह देने की सेवा करता है।

ओह समझी।” नानिया ने सिर हिलाया-“तो क्या सलाह दी इसने?”

“इसे तुम पर भरोसा नहीं। फिर भी ये कहता है कि एक बार तुम्हें आजमाकर देख लें।” ।

 
“सलाह तो समझदारी वाली है परंतु देखने में ये इतना समझदार नहीं लगता।”

जगमोहन ने दूसरी तरफ मुंह फेर लिया। नानिया ने सोहनलाल की तरफ हाथ बढ़ाया।

सोहनलाल ने गहरी सांस ली और उसके हाथ पर अपना हाथ रख दिया।

“ओह, कितना अच्छा लग रहा है, तुम्हारा हाथ अपने हाथों में पाकर। आओ, मेरे साथ आओ।”

सोहनलाल उसके साथ चल पड़ा। जगमोहन होंठ सिकोड़े चार कदम पीछे था।

वे चट्टानों के पीछे से निकले तो सामने बग्गी और घुड़सवार दिखने लगे।

“तुम्हारा नाम क्या है धुआं उड़ाने वाले?”

सोहनलाल ।”

कितना अच्छा नाम है, तुम तो...।”

आगे के शब्द नानिया के होंठों में ही रह गए। दूर धूल का गुब्बार उड़ता दिखा।

“ओह।” नानिया के होंठों से निकला–“इस दिशा से तो बोगस के आदमी आते हैं।”

“बोगस कौन?” सोहनलाल ने कहा। तभी एक घुड़सवार घोड़े को दौड़ाता पास आया।

रानी साहिबा, ये बोगस के आदमी हैं। यहां से निकल चलिए। उनकी संख्या ज्यादा लगती है।”

आओ।” नानिया चीखीं। फिर वे सब बग्गी की तरफ दौड़े।

नानिया ने सोहनलाल का हाथ थाम रखा था।

आनन-फानन वे तीनों बग्गी में बैठे। चलो।” वो घुड़सवार चीखा। इसके साथ ही काफिला पुनः दौड़ पड़ा।

सोहनलाल नानिया के साथ ही बग्गी पर बैठ गया था जबकि जगमोहन को बैठने के लिए जगह नहीं मिली तो वो नीचे बग्गी के फर्श पर बैठ गया था। दौड़ती बग्गी में खड़ा रह पाना आसान नहीं था। दोनों सेविकाओं ने बड़ा-सा छाता अभी भी संभाल रखा था। परंतु बग्गी की रफ्तार छाते को डगमगा रही थी।

रफ्तार तेज करो।” एक घुड़सवार चीखा। काफिला बहुत तेजी से दौड़ रहा था। धूल उड़ रही थीं। घोड़ों की टापों की आवाज वातावरण में गूंज रही थी।

नानिया ने गर्दन घुमाकर उधर देखा, जिधर से बोगस वाले घुड़सवार आ रहे थे। | वो अब स्पष्ट नजर आने लगे थे। उनकी रफ्तार भी कम नहीं थीं। वे दस से ज्यादा लग रहे थे।

तभी सामने जंगल नजर आने लगा।

नानिया विचलित-सी हो उठी।

“हम भागकर निकल नहीं सकेंगे। आगे जंगल आ गया है। हमारी रफ्तार कम हो जाएगी।” वो बड़बड़ाई।

तो उनकी रफ्तार भी तो कम हो जाएगी।” सोहनलाल ने कहा।

“उनकी और हमारी स्थिति में फर्क है। वो झगड़ना चाहते हैं और हम झगड़े से बचना चाहते हैं।”

तो तुम उससे डर रही हो?”

“मुझे तुम्हारी चिंता है सोहनलाल।”

मेरी चिंता?” सोहनलाल के होंठों से निकला।

हो। तुम्हारे दम पर मैं कालचक्र से मुक्ति पा लेना चाहती हूं, जैसा कि किताब में लिखा है। तुम मुझे इस कालचक्र से आजाद करा दोगे। इस झगड़े में अगर तुम्हें कुछ हो गया तो कालचक्र से मुझे मुक्ति कभी नहीं मिलेगी।”

सोहनलाल मुस्करा पड़ा। तभी नीचे बैठा जगमोहन बोला।

बोगस है कौन–क्यों तुम लोगों से झगड़ा करना चाहता है?”

“वो मुझे पाना चाहता है। बरसों से इसी चेष्टा में लगा है।”

फिर तो तुम्हें डरना नहीं चाहिए।” सोहनलाल बोला।

“क्यों?" ।

“ज्यादा से ज्यादा यहीं होगा कि वो तुम्हें पा लेगा।” नानिया के चेहरे पर कड़वे भाव उभरे।

फ्तार तेज करो।” एक घुड़सवार के चीखने की आवाज आई।

सोहनलाल, मैंने तुम्हें बताया था कि मैं 50 साल की उम्र तक भी कुंआरी क्यों रही।”

याद है।”

“तो मुझे तुम्हारे अलावा किसी और ने पा लिया तो मैं कालचक्र से मुक्ति नहीं पा सकेंगी। कालचक्र से बाहर निकलने तक मुझे तुम्हारी बनकर ही रहना होगा। तुम्हें खुश रखना होगा। तुम नहीं जानते कि बोगस बहुत बुरा आदमी है। उसने मुझे पकड़ लिया तो नौकरानी बनाकर रखेगा मुझे। जब चाहेगा ऊपर चढ़ जाएगा, जब चाहेगा नीचे उतर जाएगा। मेरे आदमी उसे हर बार हरा देते हैं, जब भी उसने मुझे पाने की चेष्टा की।” ।

* “तुम्हारे आदमियों ने उसे मारा क्यों नहीं?” नीचे बैठा जगमोहन बोला।।

 
उसे मारा नहीं जा सकता। कालचक्र वाले आपस में किसी की जान नहीं ले सकते। सोबरा ने हमें बनाया ही इस तरह है। अगर हम आपस में झगड़कर मरते रहे तो कालचक्र तबाह हो जाएगा।”

“ओह।”

परंतु किसी को भी कैद करके रख सकते हैं। मेरे सिपाही इस बार भी बोगस और उसके आदमियों का मुकाबला करके उन्हें हरा देते, परंतु मुझे सिर्फ तुम्हारी चिंता है कि तुम्हें न कुछ हो जाए।”

“मुझे कुछ नहीं होगा। तुम्हें जो करना है करो। मैं अपनी रक्षा और सुरक्षा, दोनों ही कर सकता हूं।”

लेकिन मुझे तुम्हारी बात पर भरोसा नहीं।”

“क्यों?”

“तुम कालचक्र के बाहर के हो। बोगस तुम्हारी जान ले सकता है। तुम मर सकते हो। मर गए तो मैं कालचक्र से कभी मुक्त नहीं हो पाऊंगी। इस बार बिना झगड़े के, हमें बचकर ही निकलना होगा।”

काफिला तेजी से दौड़ा जा रहा था। टापों की घड़ाघड़ आवाजें गूंज रहीं थीं। सामने का जंगल अब करीब आ गया था।

पीछे दाईं तरफ से सोबरा के 12-14 घुड़सवार दौड़े आ रहे थे। पहले की अपेक्षा वो अब करीब थे। यही गति रहती तो कुछ देर बाद उन्होंने करीब आ जाना था। परंतु अब मुख्य समस्या ये थी कि सामने जंगल था और जंगल में घोड़ों को रफ्तार से दौड़ाना सम्भव नहीं था।

यानी कि नानिया और बोगस के आदमियों में झगड़ा होना ही था। तभी एक घुड़सवार बग्गी के साथ दौड़ता चिल्ला उठा।

“आगे जंगल है रानी साहिबा। वहां हमारी रफ्तार खत्म हो जाएगी। घोड़ों को चलकर जंगल पार करना होगा और इस स्थिति में बोगस के आदमियों से झगड़ा होगा। वो हमारे पास पहुंच जाएंगे।” ।

“ऐसा है तो हमें मुकाबले के लिए तैयार रहना चाहिए।” नानिया दृढ़ स्वर में कह उठी—“मैं इस सोहनलाल की वजह से मुकाबला टालना चाहती थी। ये वो ही है, जो मुझे कालचक्र से आजाद कराएगा। परंतु अब मुकाबला टल नहीं सकता तो तैयार रहो, जंगल में पहुंचते ही, फौरन घात लगा लो। बोगस और उसके आदमी जब जंगल में प्रवेश करें तो उन पर हमला बोल दो। उन्हें संभलने मत दो और हरा दो।” ।

“ठीक हैं रानी साहिबा ।”

मैं सोहनलाल के साथ जंगल में निकल जाऊंगी। रुकेंगी नहीं।”

हम सब कुछ संभाल लेंगे।” कहने के साथ ही वो घुड़सवार और तेज हो गया और आगे अपने साथियों से जा मिला।

“तो हम तुम्हारे सैनिकों से अलग हो जाएंगे।” सोहनलाल ने नानिया से कहा।

इस वक्त इसी में हमारा भला है। मैं तुम्हें बचाना चाहती हूं।” नानिया व्याकुल थी।

| उसी पल जगमोहन सिर उठाकर कह उठा।

ऐसा तो नहीं कि तुम स्वयं बोगस से डर रही हो और भागने के लिए सोहनलाल की आड़ ले रही हो ।”

नानिया ने जगमोहन को घूरकर देखा फिर सोहनलाल से कहा। “तुम्हारा सेवक बकवास बहुत करता है।”

इसकी परवाह मत करो। इसे चुप रहने की आदत नहीं है। वैसे क्या इसने सही नहीं कहा?”

 
“गलत कहा है। तुम भी इसकी बातों में आ रहे हों। मेरी ताकत नहीं जानते तुम दोनों। जानते होते तो ये सब न कहते। इस वक्त हालात मेरे विपरीत हैं, क्योंकि मेरे साथ सैनिक बहुत कम हैं।” नानिया का स्वर कठोर हो गया—“लेकिन अब मैं सबसे पहला काम बोगस के ठिकाने पर हमला बोलकर, उसे बंदी बनाऊंगी।”

ये बात तो तुमने बहादुरी वाली कही।” सोहनलाल मुस्करा पड़ा।

तभी उनका काफिला तेजी से जंगल में प्रवेश करता चला गया।

फैले पेड़ों की डालों से दौड़ती बग्गी अटक रही थी। उसकी रफ्तार कम हो गई थी। युवतियों ने संभाल रखा छाता तो कब का जंगल में प्रवेश करते ही पेड़ में अटककर पीछे छूट गया था। फिर एकाएक घोड़े हिनहिनाकर ठिठक गए। आगे घना जंगल शुरू हो रहा था। घने पेड़ों की मोटी-मोटी डालें नीचे तक झुकी हुई थीं।

कोचवान बग्गी से उतरता कह उठा।

रानी साहिबा, घने जंगल की वजह से बग्गी अब आगे नहीं जा पाएगीं। वो रास्ता दूसरा था जहां से हम बग्गी ले जाते थे।”

“मेरे ख्याल में हम सुरक्षित हैं।” नानिया बग्गी से उतरती कह उठी_“हम पैदल ही आगे जाएंगे।”

सोहनलाल, जगमोहन और दोनों सेविकाएं भी नीचे आ गईं। सोहनलाल ने पीछे देखा, जहां से वे आए थे। परंतु उधर जंगल ही दिखा।

बोगस के आदमियों की परवाह मत करो।” नानिया सोहनलाल से बोली-“मेरे आदमी उन्हें हरा देंगे।”

“ऐसा है तो हमें वापस चलना चाहिए।” जगमोहन बोला।

नहीं। वापस जाकर मैं सोहनलाल की जान खतरे में नहीं डालूंगी।” नानिया बोल पड़ी।

जगमोहन ने मुस्कराकर सोहनलाल से कहा।

यहां तेरी वैल्यू बढ़ गई हैं।” “भगवान जाने, किस्मत में क्या लिखा है।” सोहनलाल बड़बड़ा उठा।।

नानिया ने आगे बढ़कर सोहनलाल का हाथ थामा और मुस्कराई।

सोहनलाल ने उसे देखा।

क्या तुम्हें मुझ पर भरोसा नहीं सोहनलाल?” नानिया प्यार-भरे स्वर में कह उठी। ।

“भरोसा हो या न हो, क्या फर्क पड़ता है।” सोहनलाल मुस्कराया। *

“बहुत फर्क पड़ता है। अगर तुम मुझ पर भरोसा करो तो मैं खुश हो जाऊंगी। फिर तुम्हें भी खुश रचूंगी।”

तभी कोचवान कह उठा।

रानी साहिबा हमें फौरन आगे बढ़ना चाहिए। अभी हम खतरे से बाहर नहीं हैं।”

“चलो।” नानिया सोहनलाल का हाथ पकड़े रही। सब आगे बढ़ने लगे।

आगे कोचवान फिर नानिया, सोहनलाल और जगमोहन। सबसे पीछे नानिया की दोनों सेविकाएं चल रही थीं।

बेहद घना जंगल था ये। आसमान तो स्पष्ट नजर ही नहीं आ रहा था। न ही आसमान से रोशनी जंगल की जमीन तक पहुंच रही थी। गुम-सुम सा उजाला था जैसे अंधेरा और रोशनी घुल-मिल गए हो।

कोंचवान ने अपनी तलवार निकालकर हाथ में ले रखी थी कि खतरे का सामना कर सके। जंगल की मिट्टी में नमी की वजह से उनके कदमों की आवाजें भी ठीक से नहीं सुनाई दे रही थीं।

तभी चलते-चलते सोहनलाल बोला।

तुम्हारा महल कितनी दूर है?”

“अभी दूर है।”

कितनी?”

इसी तरह दिन भर चलते रहें तो महल तक पहुंच जाएंगे।”

अभी तक कितना दिन बीता है?”

आधा दिन।

” थक जाऊंगा मैं चलते-चलते।” फिक्र मत करो। मेरी सेविकाएं तुम्हें उठा लेंगी।”

“इतना भी बुरा हाल नहीं होगा कि ऐसी नौबत आए ।”

जगमोहन ने मुस्कराकर सोहनलाल को देखा।

तुम्हारी ऐसी खातिर पहले कभी नहीं हुई होगी।” जगमोहन ने कहा।।

 
“ठीक कहते हो। ये पहला मौका है।” सोहनलाल ने गहरी सांस ली।।

“मुझे लगता है कि तुम्हारा सेवक तुम्हें ठीक से इज्जत नहीं देता।” नानिया बोली।

“हां, मैंने इसे ज्यादा सिर पर चढ़ा रखा है।” वे सब तेजी से आगे बढ़ते जा रहे थे। जंगल घना हो चुका था।

तुम धुआं नहीं उड़ा रहे।” नानिया ने चलते-चलते सोहनलाल को देखा।

उड़ाऊ क्या?” “हां, तुम्हारा धुआं उड़ाना मुझे अच्छा लगता है। नानिया ने प्यार से कहा।

सोहनलाल ने सिग्रेट सुलगाकर कश लिया।

“ओह।” नानिया ने गहरी सांस ली–“इस धुएं की खुशबू कितनी अच्छी है।”

ये तुम्हें डुबो देगी।” जगमोहन ने कहा। “तुम ऐसा क्यों कहते हो सेवक।” नानिया ने जगमोहन को

देखा।।

मैं पागल हूं, इसलिए ।”

कभी-कभी तुम मुझे पागल ही लगते...।”

तभी आगे चलता कोचवान ठिठक गया। सब टिके।। उनके कानों में घोड़े की टापों की आवाज़ पड़ी। सबकी नजरें इधर-उधर घूमने लगीं।

जगमोहन ने ये बात फौरन महसूस कर ली कि वो एक ही घोड़े की टापों की आवाज है।

एक घोड़ा है।” सोहनलाल ने जगमोहन को देखा।

नानिया का कोई साथी होगा।” जगमोहन बोला।

“तुमने मेरा नाम लिया।” नानिया का स्वर कठोर हो गया—“सब मुझे रानी साहिबा कहते हैं।”

“कहते होंगे। मैं तुम्हारा सेवक या तुम्हारी जागीर का हिस्सा नहीं हूं।” जगमोहन बोला।

बहुत बदतमीज हो तुम।” ।

“मेरे सेवक को कुछ मत कहो।” सोहनलाल बोला।

ठीक है, तुम कहते हो तो, नहीं कहती। मैं अपने सोहनलाल को खुश रचूंगी। जो तुम चाहोगे, वही करूंगी।”

क्या कहने।” जगमोहन व्यंग से कह उठा। घोड़े की टापों की आवाज करीब आ गई थी। वो सब वहीं खड़े नज़रें घुमाते रहे। तभी कोचवान बोला।

खतरा है।” ।

ये तुमने कैसे कहा कोचवान?”

रानी साहिबा। मैं अपने घोड़ों की टापों की आवाज पहचानता हूं। ये हमारे घोड़े की टापों की आवाज नहीं है।”

तुम्हें धोखा भी हो सकता है।”

नहीं रानी साहिबा। अपनी बात पर मुझे भरोसा है।

” वों रहा।” तभी जगमोंन कह उठा। पेड़ों के बीच में से वो घुड़सवार पचास कदम दूर नजर आ रहा था। वहां आकर उसने घोड़ा रोक लिया था।

ये...ये तो बोगस है।” नानिया के होंठों से निकला-अपने आदमियों को वहां मुकाबले के लिए छोड़ आया है और मुझे ढूंढ़ने के लिए जंगल तक आ गया।” नानिया के शब्दों में कठोरता आ गई। थी।

 
“मैं उसे सबक सिखाता हूं।” कहकर कोचवान ने उस तरफ जाना चाहा।

“रुक जाओ कोचवान ।” नानिया बोली-“क्या पता वो हताश होकर वापस चला जाए।”

कोचवान ठिठक गया। “मुझे एक मौका दें रानी साहिबा ।” ।

“तुम उसका मुकाबला नहीं कर सकोगे। वो ज्यादा बहादुर है। तुम्हें गिरा देगा।”

मैं उसे सबक सिखा दूंगा।” तभी जगमोहन कह उठा।। उसने हमें देख लिया है।”

ये सुनते ही नानिया का चेहरा कठोर हो गया। “सोहनलाल ।” नानिया चिंतित स्वर में बोली-“जब वो पास आए तो तुम कहीं छिप जाना।”

क्यों?”

“मुझे तुम्हारी जान बचानी है। तुम कालचक्र का हिस्सा नहीं हो। बोगस तुम्हें मार सकता है।”

मैं उसकी परवाह नहीं करता।”

“समझा करो वो...” ।

वो अब हमारी तरफ आ रहा है।” जगमोहन बोला।

पेड़ों के बीच में से नजर आता वो घुड़सवार, जगह बनाता इसी तरफ आ रहा था धीरे-धीरे। घोड़े की बेहद धीमी टापों की आवाज कभी कभार कानों में पड़ जाती थी।

सबकी निगाह उस पर रहीं।

आखिरकार वो करीब और सामने आ गया। वो बोगस ही था। पांच फीट का गठीले बदन वाला व्यक्ति। एक हाथ में लगाम थी तों दूसरे में तलवार। सिर पर कम मात्रा में बाल थे। उसकी उम्र पचास के आसपास थी। सुर्ख-सा चेहरा था उसका। कमर में कपड़ा बांध रखा था। घोड़े पर वो जिस अंदाज में बैठा था, उससे वो लड़ाका लग रहा था।

“तुम्हें इतने करीब से देखकर मुझे बहुत अच्छा लगा नानिया।” बोगस कह उठा।

नानिया का चेहरा कठोर हो गया।

तुम मुझसे झगड़ा क्यों करती हो?” बोगस बोला “मैं तो तुम्हें सिर्फ पाना चाहता हूं।”

“मुझे कोई नहीं पा सकता।”

पागल हो तुम जो खुद को तुमने कुंआरा रखा हुआ है अभी तक। तुम जिसका इंतजार कर रही हों, वो कभी नहीं आएगा। क्यों अपने शरीर को बेकार कर रही हो, इसका इस्तेमाल करो। मैंने हमेशा तुमसे दोस्ती ही चाही, परंतु तुमने झगड़ा किया।” बोगस शांत स्वर में कह रहा था—“आओ, हम एक हो जाएं नानिया। मैं तुम्हें बहुत प्यार करूंगा।”

नानिया के दांत भिंचे रहे। कोचवान बार-बार नानिया को देख रहा था।

ये लोग कौन हैं?” बोगस ने जगमोहन और सोहनलाल को देखा–“पहले इन्हें देखा नहीं।” ।

“ये।” नानिया ने सोहनलाल का हाथ थामकर कहा-“वो ही है, जिसका मुझे इंतजार था।”

“नहीं।”

सच कहा मैंने।”

फिर तो आज तुम्हें पाने की इच्छा को छोड़कर, इसे मारूंगा।” बोगस का स्वर कठोर हो गया।

नानिया कुछ व्याकुल हुई।

यहां से चले जाओ बोगस ।” नानिया का स्वर गुस्से से कांपा–“वरना आज तुम बचोगे नहीं।”

 
“तुम मेरा कुछ भी नहीं कर सकती। हम सब कालचक्र के अंश हैं। हम तभी मर सकते हैं, जब कालचक्र का अंत हो जाए। परंतु कालचक्र इतना शक्तिशाली है कि कोई इसका कुछ नहीं बिगाड़ सकता।” बोगस ख़तरनाक स्वर में बोला “इस वक्त तुम्हारे साथ आदमी नहीं हैं। इसका फायदा मुझे मिलेगा। पहले मैं तुम्हारे आशिक की जान लूंगा फिर तुम्हें पाऊंगा। ये कालचक्र के बाहर से आया है। इसे मैं मौत दे सकता हूं।”

“मुझे हुक्म दीजिए रानी साहिबा ।” तलवार थामे कोचवान कह उठा।

“जाओं और सबक सिखा दो इस कमीने को।” नानिया गुर्रा उठी।

कोचवान उसी पल तलवार थामे सतर्कता से, बोगस की तरफ बढ़ने लगा।

घोड़े पर बैठा बोगस कह उठा।

“तू मेरा क्या मुकाबला करेगा। कोचवान भी तलवार चलाने लगे अब तो।”

भूल में है तू, कोचवान बनने से पहले मैं लड़ाका था।”

पर मैंने तो तेरे को तलवार थामे कभी नहीं देखा।” बोगस हंसा।

जगमोहन और सोहनलाल की नजरें मिलीं। वो खामोश रहे। तभी नानिया सोहनलाल के कान में बोली।

तुम यहां से भाग जाओं सोहनलाल। मैं तुम्हें दोबारा तलाश कर लूंगी।”

फिक्र मत करो। इसे तो मेरा सेवक ठीक कर देगा।”

“तुम भागते क्यों नहीं?” परेशान सी नानिया कह उठी।

मेरा सेवक सब ठीक करेगा। तुम देखती रहो।” ।

“पागल मत बनो। बोगस बहुत अच्छी तलवार चलाता है।”

मैं भाग गया और बोगस ने तुम्हें हासिल कर लिया तो तुम्हारी मुक्ति पाने का सपना, सपना ही रह जाएगा।”

नानिया ने सख्ती से होंठ भींच लिए।

इसलिए मेरे जाने या न जाने से कोई फर्क नहीं पड़ता।” सोहनलाल बोला–“हमें कुछ नहीं होगा।”

तुम बोगस को नहीं जानते सोहनलाल ।”

तुम मेरे सेवक को नहीं जानती।” सोहनलाल मुस्करा पड़ा। बोगस घोड़े पर बैठा था, तलवार थामे।

पास पहुंचकर कोचवान ने पूरी ताकत से तलवार का वार बोगस पर किया। | बोगस ने उसी पल अपनी तलवार से उसके वार को रोका और थोड़ा-सा नीचे झुकते हुए तलवार को कोचवान की छाती में धंसा दिया। कोचवान जोरों से चीख़ा। तलवार हाथ से छूटकर नीचे जा गिरी। बोगस ने अपनी तलवार झटके से उसके सीने से खींच ली तो कोचवान नीचे जा गिरा और गहरी-गहरी सांसें लगा। फिर उठ न सका।

बोगस ने हंसकर नानिया को देखा। नानिया का चेहरा चिंतित था।

अब कहो नानिया। तुम मेरे पास आती हो या तुम्हारे आशिक को मार दूं।”

“तुम...तुम मेरी दोनों सेविकाओं को ले लो। ये कम उम्र की हैं। तुम्हें आनंद देंगी।” नानिया बोली।

 
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