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मेरठ की एक घटना वर्ष २०12
जब मै उस गली में घुसा तो जहाँ-तंहा लोग खड़े थे, कोई दो के समूह में और कोई चार के समूह में, लगता था कोई आयोजन हो या कोई दुर्घटना घटी हो. काहिर हमने हॉर्न बजा बजा कर रास्ता बनाया और एक घर के सामने आ कर गाड़ी रोकी, अंदर से जय प्रसाद आये, शर्मा जी ने आगे-पीछे करके गाड़ी एक जगह लगा दी, हम अब उतरे गाड़ी से! और जय प्रसाद हमे अंदर ले गए! अंदर धार्मिक गाने चल रहे थे, रिश्तेदार आदि लोग बैठे थे वहाँ, कुछ पडोसी भी! धूपबत्ती, अगरबत्ती और दिए जल रहे थे! जय प्रसाद हमे एक कमरे में ले गए और हमको बिठा दिया वहाँ, हम बैठ गए! घर अच्छा बनाया था, एक सरकारी महक़मे में अच्छे पद पर आसीन थे वे!
उन्होंने आवाज़ दी, उनकी लड़की पानी ले कर आ गयी, उम्र होगी उस लड़की की कोई अठारह या उन्नीस बरस, आधुनिक लिबास पहने! हमने पानी पिया और रख दिए गिलास वापिस,
"ये दिए वगैरह क्यूँ जला रखे हैं?" मैंने पूछा,
"जी एक भोपा महाराज ने बताया था" वे बोले,
"अच्छा" मैंने कहा,
"रविशा कहाँ है?" मैंने पूछा,
"अंदर कमरे में" वे बोले,
तभी कीर्तन की आवाज़ आने लगी!
"चलिए, मुझे दिखाइये रविशा को" मैंने कहा,
"चलिए" वे उठे और हम उनके पीछे चल पड़े, उस कमरे में पहुंचे!
बड़ा ही अजीब माहौल था वहाँ! थालियाँ सजाई गयीं थीं, उनमे मिठाई, मेवे और नारियल, फल-फूल और न जाने क्या क्या रखा था! और सबसे बड़ी एक बात! वहाँ मल-मूत्र की दुर्गन्ध आयी!
और अब देखिये!
बिस्तर पर रविशा बैठी थी, किसी देवी की तरह! एक हाथ में धामिक ग्रन्थ लिए और दूसरा हाथ अभय-मुद्रा में किये! केश खुले! बदन एक धोती में लिपटा, अंतःवस्त्र कोई नहीं!
कमाल था!
मुझे हंसी आ गयी!
"क्या नाम है तेरा?" मैंने लड़की से पूछा,
मेरा ऐसा सवाल सुन कर वहाँ बैठे लोग मेरे शत्रु हो गए! तब शर्मा जी और जय प्रसाद में सभी को बाहर निकाला वहाँ से! वे चले गए मुझे घूरते हुए!
"हाँ, अब बता, क्या नाम है तेरा?" मैंने पूछा,
उसने आँखें खोलीं और रोने लगी, जय प्रसाद उसके आंसू पोंछने के लिए झुके तो मैंने मना कर दिया! वो तो अब बुक्का फाड़ फाड़ कर रोने लगी!
मैंने तभी एक झापड़ दिया उसको! वो पीछे गिर गयी! हाथों में रखा सारा सामान गिर गया!
उसने अपने बाप को देखा!
मैंने उसको देखा!
आँखें गोल कीं उसने!
बिना आवाज़ दांत भींचे अपशब्द कहे उसने!
"नाम बता अपना?"
कुछ न बोले वो!
"नाम बता?" मैंने कहा,
"देवी!" वो बोली,
"देवी?" मैंने हैरत से पूछा,
"हाँ!" उसने गर्दन हिला के कहा!
"कौन सी?" मैंने पूछा,
"लुहाली देवी" वो बोली!
"कहाँ की है?" मैंने पूछा,
"राजस्थान" उसने कहा,
अब मेरी हंसी छूट गयी!
"गढ़वाल से सीधी राजस्थान!" मैंने कहा,
"चुप! चुप!" वो बोली,
हाथ से श्श्श किया!
ये तो खेल था!
पक्का एक खेल!
एक ज़बरदस्त खेल!
"नाम बता ओ लड़की?" मैंने ज़ोर से पूछा,
वो चुप रही!
"नहीं बताएगी?" मैंने धमका के पूछा,
वो अब भी चुप!
"ऐसे नहीं बताएगी तो तू?" मैंने कहा,
वो अब भी चुप!
"ठीक है, मत बता!" मैंने कहा,
अब मैंने वहाँ रखी हुई झाड़ू उठा ली, उसके ऐसे तैयार किया कि जैसे मै उस उसके सर पर मारने वाला हूँ!
और इस से पहले कि मै कुछ करता, वो तपाक से बोली,"बेटा कोई देवी माँ के साथ ऐसा करता है?"
"कौन देवी?" मैंने पूछा,
"लुहाली देवी" उसने उत्तर दिया,
"अच्छा! तो तू इस पर क्यों आई है?" मैंने उसकी ही बात बड़ी करी ऐसा पूछ कर,
"मुझे भुला दिया इन्होने" वो बोली,
"किसने?" मैंने पूछा,
"ओम प्रकाश ने!" उसने कहा,
"कौन है ये ओम प्रकाश?" मैंने पूछा,
"वो इस से पूछ ले बेटा" उसने अपने पिता की तरफ इशारा करके कहा,
"कौन है ये ओम प्रकाश?" मैंने उनसे ही पूछा,
"मेरे पिता जी" वे बोले,
"अब कहाँ हैं?" मैंने पूछा,
"जी उनका स्वर्गवास हो गया है एक महीने पहले" वे बोले,
"ओह!" मेरे मुंह से निकला,
"अब ओम प्रकाश तो स्वर्गीय हो गए, अब कौन बतायेगा?" मैंने उस लड़की से पूछा,
"राधेश्याम बतायेगा" वो बोली,
"वो कौन हैं?" मैंने पूछा,
"ये बतायेगा" उसने अपने पिता जी का कुरता पकड़ते हुए और देखते हुए कहा,
"कौन हैं ये राधेश्याम?" मैंने उनसे ही पूछा,
"जी..मेरे बड़े भाई" वे बोले,
"अब कहाँ हैं?" मैंने पूछा,
"यही रहते हैं, लेकिन हमारे और उनके परिवार में मनमुटाव हैं, बातचात नहीं है" वे बोले,
"ले लड़की, ये रास्ता भी बंद है!" मैंने कहा,
उसने कंधे उचकाए!
"तो मै क्या करूँ?" उसने कहा,
"बताएगी तो तू ही?" मैंने कहा,
"मै नहीं बताउंगी" वो बोली,
"कैसे नहीं बताएगी?" मैंने गुस्से से कहा,
"मै लुहाली देवी हूँ" उसने कहा,
"तो क्या हुआ?" मैंने कहा,
"कुछ भी नहीं हुआ?" उसने आँखें तरेड़ के कहा!
"हाँ, कुछ भी नहीं! तेरी जैसी देवियाँ पेड़ों पर लटकी पड़ी हैं!" मैंने कहा,
अब वो गुस्से से खड़ी हो गयी!
"ओये?" वो चिल्लाई मुझ पर!
"हाँ?" मैंने पूछा,
"निकल यहाँ से?" उसने कहा,
"नहीं तो?" मैंने पूछा,
"फूंक दूँगी तुझे" उसने नथुने फुला के कहा,
इतने में कई लोग आ गए वहाँ, आपत्ति जताने लगे! देवी पूजने लगे!
आखिर मुझे बाहर आना ही पड़ा!
मामला संगीन था!
जब मै उस गली में घुसा तो जहाँ-तंहा लोग खड़े थे, कोई दो के समूह में और कोई चार के समूह में, लगता था कोई आयोजन हो या कोई दुर्घटना घटी हो. काहिर हमने हॉर्न बजा बजा कर रास्ता बनाया और एक घर के सामने आ कर गाड़ी रोकी, अंदर से जय प्रसाद आये, शर्मा जी ने आगे-पीछे करके गाड़ी एक जगह लगा दी, हम अब उतरे गाड़ी से! और जय प्रसाद हमे अंदर ले गए! अंदर धार्मिक गाने चल रहे थे, रिश्तेदार आदि लोग बैठे थे वहाँ, कुछ पडोसी भी! धूपबत्ती, अगरबत्ती और दिए जल रहे थे! जय प्रसाद हमे एक कमरे में ले गए और हमको बिठा दिया वहाँ, हम बैठ गए! घर अच्छा बनाया था, एक सरकारी महक़मे में अच्छे पद पर आसीन थे वे!
उन्होंने आवाज़ दी, उनकी लड़की पानी ले कर आ गयी, उम्र होगी उस लड़की की कोई अठारह या उन्नीस बरस, आधुनिक लिबास पहने! हमने पानी पिया और रख दिए गिलास वापिस,
"ये दिए वगैरह क्यूँ जला रखे हैं?" मैंने पूछा,
"जी एक भोपा महाराज ने बताया था" वे बोले,
"अच्छा" मैंने कहा,
"रविशा कहाँ है?" मैंने पूछा,
"अंदर कमरे में" वे बोले,
तभी कीर्तन की आवाज़ आने लगी!
"चलिए, मुझे दिखाइये रविशा को" मैंने कहा,
"चलिए" वे उठे और हम उनके पीछे चल पड़े, उस कमरे में पहुंचे!
बड़ा ही अजीब माहौल था वहाँ! थालियाँ सजाई गयीं थीं, उनमे मिठाई, मेवे और नारियल, फल-फूल और न जाने क्या क्या रखा था! और सबसे बड़ी एक बात! वहाँ मल-मूत्र की दुर्गन्ध आयी!
और अब देखिये!
बिस्तर पर रविशा बैठी थी, किसी देवी की तरह! एक हाथ में धामिक ग्रन्थ लिए और दूसरा हाथ अभय-मुद्रा में किये! केश खुले! बदन एक धोती में लिपटा, अंतःवस्त्र कोई नहीं!
कमाल था!
मुझे हंसी आ गयी!
"क्या नाम है तेरा?" मैंने लड़की से पूछा,
मेरा ऐसा सवाल सुन कर वहाँ बैठे लोग मेरे शत्रु हो गए! तब शर्मा जी और जय प्रसाद में सभी को बाहर निकाला वहाँ से! वे चले गए मुझे घूरते हुए!
"हाँ, अब बता, क्या नाम है तेरा?" मैंने पूछा,
उसने आँखें खोलीं और रोने लगी, जय प्रसाद उसके आंसू पोंछने के लिए झुके तो मैंने मना कर दिया! वो तो अब बुक्का फाड़ फाड़ कर रोने लगी!
मैंने तभी एक झापड़ दिया उसको! वो पीछे गिर गयी! हाथों में रखा सारा सामान गिर गया!
उसने अपने बाप को देखा!
मैंने उसको देखा!
आँखें गोल कीं उसने!
बिना आवाज़ दांत भींचे अपशब्द कहे उसने!
"नाम बता अपना?"
कुछ न बोले वो!
"नाम बता?" मैंने कहा,
"देवी!" वो बोली,
"देवी?" मैंने हैरत से पूछा,
"हाँ!" उसने गर्दन हिला के कहा!
"कौन सी?" मैंने पूछा,
"लुहाली देवी" वो बोली!
"कहाँ की है?" मैंने पूछा,
"राजस्थान" उसने कहा,
अब मेरी हंसी छूट गयी!
"गढ़वाल से सीधी राजस्थान!" मैंने कहा,
"चुप! चुप!" वो बोली,
हाथ से श्श्श किया!
ये तो खेल था!
पक्का एक खेल!
एक ज़बरदस्त खेल!
"नाम बता ओ लड़की?" मैंने ज़ोर से पूछा,
वो चुप रही!
"नहीं बताएगी?" मैंने धमका के पूछा,
वो अब भी चुप!
"ऐसे नहीं बताएगी तो तू?" मैंने कहा,
वो अब भी चुप!
"ठीक है, मत बता!" मैंने कहा,
अब मैंने वहाँ रखी हुई झाड़ू उठा ली, उसके ऐसे तैयार किया कि जैसे मै उस उसके सर पर मारने वाला हूँ!
और इस से पहले कि मै कुछ करता, वो तपाक से बोली,"बेटा कोई देवी माँ के साथ ऐसा करता है?"
"कौन देवी?" मैंने पूछा,
"लुहाली देवी" उसने उत्तर दिया,
"अच्छा! तो तू इस पर क्यों आई है?" मैंने उसकी ही बात बड़ी करी ऐसा पूछ कर,
"मुझे भुला दिया इन्होने" वो बोली,
"किसने?" मैंने पूछा,
"ओम प्रकाश ने!" उसने कहा,
"कौन है ये ओम प्रकाश?" मैंने पूछा,
"वो इस से पूछ ले बेटा" उसने अपने पिता की तरफ इशारा करके कहा,
"कौन है ये ओम प्रकाश?" मैंने उनसे ही पूछा,
"मेरे पिता जी" वे बोले,
"अब कहाँ हैं?" मैंने पूछा,
"जी उनका स्वर्गवास हो गया है एक महीने पहले" वे बोले,
"ओह!" मेरे मुंह से निकला,
"अब ओम प्रकाश तो स्वर्गीय हो गए, अब कौन बतायेगा?" मैंने उस लड़की से पूछा,
"राधेश्याम बतायेगा" वो बोली,
"वो कौन हैं?" मैंने पूछा,
"ये बतायेगा" उसने अपने पिता जी का कुरता पकड़ते हुए और देखते हुए कहा,
"कौन हैं ये राधेश्याम?" मैंने उनसे ही पूछा,
"जी..मेरे बड़े भाई" वे बोले,
"अब कहाँ हैं?" मैंने पूछा,
"यही रहते हैं, लेकिन हमारे और उनके परिवार में मनमुटाव हैं, बातचात नहीं है" वे बोले,
"ले लड़की, ये रास्ता भी बंद है!" मैंने कहा,
उसने कंधे उचकाए!
"तो मै क्या करूँ?" उसने कहा,
"बताएगी तो तू ही?" मैंने कहा,
"मै नहीं बताउंगी" वो बोली,
"कैसे नहीं बताएगी?" मैंने गुस्से से कहा,
"मै लुहाली देवी हूँ" उसने कहा,
"तो क्या हुआ?" मैंने कहा,
"कुछ भी नहीं हुआ?" उसने आँखें तरेड़ के कहा!
"हाँ, कुछ भी नहीं! तेरी जैसी देवियाँ पेड़ों पर लटकी पड़ी हैं!" मैंने कहा,
अब वो गुस्से से खड़ी हो गयी!
"ओये?" वो चिल्लाई मुझ पर!
"हाँ?" मैंने पूछा,
"निकल यहाँ से?" उसने कहा,
"नहीं तो?" मैंने पूछा,
"फूंक दूँगी तुझे" उसने नथुने फुला के कहा,
इतने में कई लोग आ गए वहाँ, आपत्ति जताने लगे! देवी पूजने लगे!
आखिर मुझे बाहर आना ही पड़ा!
मामला संगीन था!