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अगले दिन दशहरा था तो घर के सब लोग इस पर्व को देखने की तैयारी में लगे हुए थे। एक दो बार निम्मो आई मेरे कमरे में चाय वाय देने और हर बार वो मेरी और मुस्करा कर चली जाती थी।
थोड़ी देर बाद आई यह कहने के लिए कि ‘खाना तैयार है’ तो मैं उठा और झट से निम्मो को अपनी बाहों में ले लिया और कस कर उसको जफ्फी मारी।
वो कसमसाती रही लेकिन मैंने भी नहीं छोड़ा और एक दो चुम्मियाँ उसके गीले होटों पर जड़ दी और उसके गोल मोटे स्तनों को भी दबाता रहा और उसके गालों को चूमता रहा।
वो बोलती रही- छोड़ दो छोटे मालिक, कोई देख लेगा… जाने दो मुझको!
लेकिन मैंने भी नहीं छोड़ा और अच्छी तरह से उसको हाथ वाथ लगा कर ही छोड़ा।
शाम को हम सब कार में बैठ कर बारी बारी रामलीला मैदान में जाने के लिए तैयार हो गए और मेहमानों को भेज कर ही मैं और कम्मो कार में बैठे लेकिन अभी कार चली भी ना थी कि वो दोनों लड़कियाँ भागती हुई आई और कार के बाहर खड़ी होकर इंतज़ार करने लगी कि कैसे बैठेंगी कार में!
मैं कार में से निकला और उनको पिछली सीट पर बिठा दिया जहाँ कम्मो और निम्मो भी बैठी थी, उन दोनों के बैठ जाने के बाद अब कोई जगह नहीं बची थी तो मैंने कहा- आप लोग चलो, मैं पैदल आता हूँ!
लेकिन कम्मो भी घाघ थी, वो बोली- नहीं छोटे मालिक, आप आ जाओ, इनमें से एक लड़की मेरी गोद में बैठ जायेगी, आप आ जाओ! आपके लिए जगह हो जायेगी।
मैं भी ज़बरदस्ती बैठ गया और मैंने ध्यान से देखा तो मैं उस गोरी लड़की के साथ बैठा था जिसका नाम रेवा था।
बैठते ही मेरी कोहनी उसके गोल मुम्मों में जाकर टिक गई और मैं बिल्कुल बेखबर हुआ उसके साथ जांघों के साथ जांघों को जोड़ कर बैठा हुआ था और ऐसा बेखबर बैठा था जैसे कि कुछ हुआ ही नहीं।
रेवा का भी हाथ एक दो बार मेरे लौड़े के ऊपर रखा हुआ लगा था लेकिन मैंने भी उसकी तरफ देखा तक नहीं।
जब दशहरा के मैदान पर पहुँचे तो कम्मो ने दोनों लड़कियों के हाथ पकड़े और मुझसे कहा कि आप सब पीछे पीछे आओ!
मैदान एकदम खचाखच भरा हुआ था तो कम्मो ने मुझको अपने आगे कर लिया और मैं दोनों लड़कियों के एकदम पीछे हो गया और चलते चलते मेरे हाथ कभी रेवा के चूतड़ों पर लग रहे थे या फिर सांवरी को लग रहे थे और कम्मो कोशिश करती रही कि मैं उन दोनों लड़कियों के पीछे ही रहूँ और उस खींचा तानी में अक्सर मेरे लौड़ा रेवा की गांड में फिट हो जाता था और उसको सख्त लौड़ा बार बार टच करता रहा और वो भी कभी हाथ लगा कर लौड़े को छू रही थी और सांवरी तो कई बार लौड़े को छू चुकी थी।
एक जगह हम भीड़ के रेले में फंस गए और अब मेरा पूरा खड़ा लौड़ा रेवा को छू रहा था, उसके गोल चूतड़ों को बार बार छेड़ रहा था।
उधर सांवरी अब कोशिश करके मेरे पीछे हो गई और उसके मुम्मे मुझको मेरी पीठ पर रगड़ रहे थे और उसकी उभरी हुई चूत भी मुझ को बार बार मेरे चूतड़ों पर लग रही थी।
अब मैं अपने हाथ भी रेवा के चूतड़ों पर रखने लगा ताकि किसी और मर्द का हाथ वहाँ ना लग जाए और यह हकीकत रेवा से छुपी नहीं थी, वो भी अपने चूतड़ों को आगे पीछे करके मेरे और ज़्यादा नज़दीक आने की कोशिश कर रही थी।
अब मैं एक किस्म से दोनों लड़कियों के बीच में था यानि आगे रेवा थी और पीछे सांवरी थी और दोनों ही मुझ को दबा रही थी।
यह सारा तमाशा कम्मो देख रही थी और वो मुस्करा भी रही थी क्यूंकि उसको लग रहा था कि ये दोनों अनछुई कलियाँ भी शायद मेरे हरम में दाखिल होने के लिए काफी तैयार लग रही थी।
कम्मो की वजह से हम सब सही सलामत आगे विशिष्ट मेहमानों के लिए लगी कुर्सियों पर बैठने के लिए पहुँच गए और जो कुर्सियाँ खाली पड़ी थी उनमें से एक में रेवा बैठ गई और दूसरी पर मैं, उसके साथ वाली पर सांवरी बैठ गई और कम्मो, निम्मो और पर्बती हमारे पीछे वाली सीटों पर बैठ गई।
जब सब बैठ गई तो मैंने अपने चारों तरफ देखा तो सबसे आगे सीटों पर मम्मी पापा और विशिष्ट अतिथि उनके साथ बैठे थे और बाकी की सीटों पर कई स्त्रियाँ और कन्यायें बैठी थी, जिनको मैं नहीं जानता था।
अब मैंने अपनी बाईं तरफ देखा तो रेवा और मेरी दायें तरफ सांवरी बैठी थी और हम सबकी टांगें एक दूसरे को छू रही थी और मैंने अपनी टांगों का दबाव दोनों अनछुई कलियों की टांगों पर बनाये रखा, वे भी इस दबाव का जवाब हल्के से दबाव से दे रही थी।
मैंने पीछे मुड़ कर देखा और जब मेरी नज़र कम्मो से मिली तो मैंने एक हल्की सी आँख उसको मारी।
थोड़ी देर बाद रामलीला के राम जी रावण, मेघनाद और कुम्भकर्ण को जलाने के लिए आगे बड़े और अपने जलते हुए तीर उन तीनों पर बारी बारी से चला दिए।
इन तीनों के बुतों पर तीर लगते ही वो एकदम से धू धू कर जल उठे और उनमें भरे हुए पटाखे बहुत तीव्र आवाज़ से फट पड़े और उनके फटने की ध्वनि से लड़कियाँ औरतें और बच्चे घबरा से गए और उठने लगे अपनी सीटों से लेकिन मैंने रेवा और सांवरी को बिठाए रखा और ऐसा करते हुए मैंने उन दोनों को अपने और भी निकट बिठा लिया और दोनों की कमर में अपने हाथ डाल कर अपने से चिपटाए रखा।
दोनों ने मेरी तरफ बड़ी प्यार भरी नज़रों से देखा।
जब रावण जल गया तो हम सब खड़े हो गए लेकिन मैंने उन सबको रुके रहने के लिए कहा ताकि भीड़ निकल जाने दें और फिर चले।
इस सारे समय मैंने दोनों लड़कियों को कमर से पकड़ रखा था और अपने से चिपकाए रखा था और अँधेरा भी बढ़ गया था सो किसी ने कोई ख़ास ध्यान नहीं दिया।
फिर जब भीड़ छंट गई तो हम भी कार की तरफ चल दिए लेकिन कार तो मम्मी और पापा को लेकर चली गई, हम सब वहीं खड़े कार का इंतज़ार करते रहे और जब कार वापस आई तो मैंने सबसे पहले दोनों भाभियों को और बाकी लड़कियों को बिठा दिया।
रेवा और सांवरी को भी कहा कि वो चली जायें लेकिन दोनों ने कहा ‘वो मेरे साथ जाएंगी…’
हम वापसी में भी एक दूसरे को हाथ लगाते हुए घर पहुँचे।
वो रात आये हुए सब मेहमानों की आखिरी रात थी हमारी हवेली में तो बहुत ही अच्छा और उम्दा खाना बनाया गया था जिसको खाकर सबने बहुत तारीफ की और पर्बती को शाबाशी दी गई।
कम्मो को मैंने मेले में हुई बातों से वाकिफ करवा दिया था और उसका भी मानना था यह दोनों लड़कियाँ भी तैयार हो जाएँगी।
मैंने कम्मो को उनसे पूछने को कहा।
खाने के बाद हम सब बच्चे और दोनों भाभी जान बैठक में बैठे हुए गप्पें मार रहे थे। मैं रेवा और सांवरी के बीच बैठा था और बाकी सब सामने वाले सोफे पर बैठी थी और अक्सर मेरा हाथ उनके बाज़ू से टकरा जाता था और एक दो बार रेवा का हाथ मेरी गोद में आ लगा लेकिन मैंने कोई ध्यान नहीं दिया।
जब हम सब उठने वाले थे तो बड़ी भाभी बोली- सोमू भैया, जाने से पहले एक छोटी सी मुलाकात हो जाए तुम्हारे कमरे में क्यों?
मैंने कम्मो की तरफ देखा और उसने बात को शुरू किया- भाभी जी, अब छोटे मालिक के कमरे में जाना ठीक नहीं होगा। मम्मी पापा भी अभी जाग रहे हैं तो आप अपने कमरे में सब लेट जाओ, मैं वहाँ आकर बता दूँगी कि क्या कैसे करें? ठीक है ना?
मैं अब अपने कमरे में आ गया और और अपना कुरता पजामा पहन कर इंतज़ार करने लगा।
थोड़ी देर बाद आई यह कहने के लिए कि ‘खाना तैयार है’ तो मैं उठा और झट से निम्मो को अपनी बाहों में ले लिया और कस कर उसको जफ्फी मारी।
वो कसमसाती रही लेकिन मैंने भी नहीं छोड़ा और एक दो चुम्मियाँ उसके गीले होटों पर जड़ दी और उसके गोल मोटे स्तनों को भी दबाता रहा और उसके गालों को चूमता रहा।
वो बोलती रही- छोड़ दो छोटे मालिक, कोई देख लेगा… जाने दो मुझको!
लेकिन मैंने भी नहीं छोड़ा और अच्छी तरह से उसको हाथ वाथ लगा कर ही छोड़ा।
शाम को हम सब कार में बैठ कर बारी बारी रामलीला मैदान में जाने के लिए तैयार हो गए और मेहमानों को भेज कर ही मैं और कम्मो कार में बैठे लेकिन अभी कार चली भी ना थी कि वो दोनों लड़कियाँ भागती हुई आई और कार के बाहर खड़ी होकर इंतज़ार करने लगी कि कैसे बैठेंगी कार में!
मैं कार में से निकला और उनको पिछली सीट पर बिठा दिया जहाँ कम्मो और निम्मो भी बैठी थी, उन दोनों के बैठ जाने के बाद अब कोई जगह नहीं बची थी तो मैंने कहा- आप लोग चलो, मैं पैदल आता हूँ!
लेकिन कम्मो भी घाघ थी, वो बोली- नहीं छोटे मालिक, आप आ जाओ, इनमें से एक लड़की मेरी गोद में बैठ जायेगी, आप आ जाओ! आपके लिए जगह हो जायेगी।
मैं भी ज़बरदस्ती बैठ गया और मैंने ध्यान से देखा तो मैं उस गोरी लड़की के साथ बैठा था जिसका नाम रेवा था।
बैठते ही मेरी कोहनी उसके गोल मुम्मों में जाकर टिक गई और मैं बिल्कुल बेखबर हुआ उसके साथ जांघों के साथ जांघों को जोड़ कर बैठा हुआ था और ऐसा बेखबर बैठा था जैसे कि कुछ हुआ ही नहीं।
रेवा का भी हाथ एक दो बार मेरे लौड़े के ऊपर रखा हुआ लगा था लेकिन मैंने भी उसकी तरफ देखा तक नहीं।
जब दशहरा के मैदान पर पहुँचे तो कम्मो ने दोनों लड़कियों के हाथ पकड़े और मुझसे कहा कि आप सब पीछे पीछे आओ!
मैदान एकदम खचाखच भरा हुआ था तो कम्मो ने मुझको अपने आगे कर लिया और मैं दोनों लड़कियों के एकदम पीछे हो गया और चलते चलते मेरे हाथ कभी रेवा के चूतड़ों पर लग रहे थे या फिर सांवरी को लग रहे थे और कम्मो कोशिश करती रही कि मैं उन दोनों लड़कियों के पीछे ही रहूँ और उस खींचा तानी में अक्सर मेरे लौड़ा रेवा की गांड में फिट हो जाता था और उसको सख्त लौड़ा बार बार टच करता रहा और वो भी कभी हाथ लगा कर लौड़े को छू रही थी और सांवरी तो कई बार लौड़े को छू चुकी थी।
एक जगह हम भीड़ के रेले में फंस गए और अब मेरा पूरा खड़ा लौड़ा रेवा को छू रहा था, उसके गोल चूतड़ों को बार बार छेड़ रहा था।
उधर सांवरी अब कोशिश करके मेरे पीछे हो गई और उसके मुम्मे मुझको मेरी पीठ पर रगड़ रहे थे और उसकी उभरी हुई चूत भी मुझ को बार बार मेरे चूतड़ों पर लग रही थी।
अब मैं अपने हाथ भी रेवा के चूतड़ों पर रखने लगा ताकि किसी और मर्द का हाथ वहाँ ना लग जाए और यह हकीकत रेवा से छुपी नहीं थी, वो भी अपने चूतड़ों को आगे पीछे करके मेरे और ज़्यादा नज़दीक आने की कोशिश कर रही थी।
अब मैं एक किस्म से दोनों लड़कियों के बीच में था यानि आगे रेवा थी और पीछे सांवरी थी और दोनों ही मुझ को दबा रही थी।
यह सारा तमाशा कम्मो देख रही थी और वो मुस्करा भी रही थी क्यूंकि उसको लग रहा था कि ये दोनों अनछुई कलियाँ भी शायद मेरे हरम में दाखिल होने के लिए काफी तैयार लग रही थी।
कम्मो की वजह से हम सब सही सलामत आगे विशिष्ट मेहमानों के लिए लगी कुर्सियों पर बैठने के लिए पहुँच गए और जो कुर्सियाँ खाली पड़ी थी उनमें से एक में रेवा बैठ गई और दूसरी पर मैं, उसके साथ वाली पर सांवरी बैठ गई और कम्मो, निम्मो और पर्बती हमारे पीछे वाली सीटों पर बैठ गई।
जब सब बैठ गई तो मैंने अपने चारों तरफ देखा तो सबसे आगे सीटों पर मम्मी पापा और विशिष्ट अतिथि उनके साथ बैठे थे और बाकी की सीटों पर कई स्त्रियाँ और कन्यायें बैठी थी, जिनको मैं नहीं जानता था।
अब मैंने अपनी बाईं तरफ देखा तो रेवा और मेरी दायें तरफ सांवरी बैठी थी और हम सबकी टांगें एक दूसरे को छू रही थी और मैंने अपनी टांगों का दबाव दोनों अनछुई कलियों की टांगों पर बनाये रखा, वे भी इस दबाव का जवाब हल्के से दबाव से दे रही थी।
मैंने पीछे मुड़ कर देखा और जब मेरी नज़र कम्मो से मिली तो मैंने एक हल्की सी आँख उसको मारी।
थोड़ी देर बाद रामलीला के राम जी रावण, मेघनाद और कुम्भकर्ण को जलाने के लिए आगे बड़े और अपने जलते हुए तीर उन तीनों पर बारी बारी से चला दिए।
इन तीनों के बुतों पर तीर लगते ही वो एकदम से धू धू कर जल उठे और उनमें भरे हुए पटाखे बहुत तीव्र आवाज़ से फट पड़े और उनके फटने की ध्वनि से लड़कियाँ औरतें और बच्चे घबरा से गए और उठने लगे अपनी सीटों से लेकिन मैंने रेवा और सांवरी को बिठाए रखा और ऐसा करते हुए मैंने उन दोनों को अपने और भी निकट बिठा लिया और दोनों की कमर में अपने हाथ डाल कर अपने से चिपटाए रखा।
दोनों ने मेरी तरफ बड़ी प्यार भरी नज़रों से देखा।
जब रावण जल गया तो हम सब खड़े हो गए लेकिन मैंने उन सबको रुके रहने के लिए कहा ताकि भीड़ निकल जाने दें और फिर चले।
इस सारे समय मैंने दोनों लड़कियों को कमर से पकड़ रखा था और अपने से चिपकाए रखा था और अँधेरा भी बढ़ गया था सो किसी ने कोई ख़ास ध्यान नहीं दिया।
फिर जब भीड़ छंट गई तो हम भी कार की तरफ चल दिए लेकिन कार तो मम्मी और पापा को लेकर चली गई, हम सब वहीं खड़े कार का इंतज़ार करते रहे और जब कार वापस आई तो मैंने सबसे पहले दोनों भाभियों को और बाकी लड़कियों को बिठा दिया।
रेवा और सांवरी को भी कहा कि वो चली जायें लेकिन दोनों ने कहा ‘वो मेरे साथ जाएंगी…’
हम वापसी में भी एक दूसरे को हाथ लगाते हुए घर पहुँचे।
वो रात आये हुए सब मेहमानों की आखिरी रात थी हमारी हवेली में तो बहुत ही अच्छा और उम्दा खाना बनाया गया था जिसको खाकर सबने बहुत तारीफ की और पर्बती को शाबाशी दी गई।
कम्मो को मैंने मेले में हुई बातों से वाकिफ करवा दिया था और उसका भी मानना था यह दोनों लड़कियाँ भी तैयार हो जाएँगी।
मैंने कम्मो को उनसे पूछने को कहा।
खाने के बाद हम सब बच्चे और दोनों भाभी जान बैठक में बैठे हुए गप्पें मार रहे थे। मैं रेवा और सांवरी के बीच बैठा था और बाकी सब सामने वाले सोफे पर बैठी थी और अक्सर मेरा हाथ उनके बाज़ू से टकरा जाता था और एक दो बार रेवा का हाथ मेरी गोद में आ लगा लेकिन मैंने कोई ध्यान नहीं दिया।
जब हम सब उठने वाले थे तो बड़ी भाभी बोली- सोमू भैया, जाने से पहले एक छोटी सी मुलाकात हो जाए तुम्हारे कमरे में क्यों?
मैंने कम्मो की तरफ देखा और उसने बात को शुरू किया- भाभी जी, अब छोटे मालिक के कमरे में जाना ठीक नहीं होगा। मम्मी पापा भी अभी जाग रहे हैं तो आप अपने कमरे में सब लेट जाओ, मैं वहाँ आकर बता दूँगी कि क्या कैसे करें? ठीक है ना?
मैं अब अपने कमरे में आ गया और और अपना कुरता पजामा पहन कर इंतज़ार करने लगा।