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1914 में वे एनी बेसेंट से मिलीं और उनकी प्रिय सहेली बन गईं। उन्होंने रेशमी कपड़ों की होली जलाई और खुरदुरी खादी की साड़ी पहनने लगी। और सिर्फ इतना ही नहीं खादी के कपड़ों की गठरी उठाकर वे गली-गली घूम-घूम कर बेचतीं भी। उनके भाषण जोश जगानेवाले होते। नशाबंदी के पक्ष में वे शराब के दुकानों के आगे धरना देतीं। उनके सारे कदम सरकार द्वारा लगाई गई रोकों के खिलाफ थे। 1934 में वे कैद कर ली गईं और उन्हें बेलौर जेल में रखा गया। इस जेल में कई तरह की महिला कैदी तरह-तरह की अपराधों की सजा भुगत रही थीं। उन्होंने उनके जीवन को आधार बना कर भी उपन्यास लिखा। उनका जीवन-काल 1901 से 1960।
नंदिता नोट्स लिखने के साथ-साथ सोच रही थी लिखना अपने आप में कितना महान कार्य होता है। किसी उद्देश्य के लिए, समाज को बेहतर बनाने के लिए लिखना... कोदैबनायकी ने अपनी इस क्षमता का कितना बेहतर उपयोग किया... और एमी भी तो रात-रात भर जाग कर लिखती रहती है... बेचैन सी। और वह बेवकूफ निहारती रहती थी उसे बस। उसे कोई जरूरत न पड़ जाए इस आशा में जागती सी। वह तब भी कहती एमी से... काश, मैं भी लिख पाती तुम्हारी तरह... लिखना कितना अच्छा लगता होगा न।
एमी हँसती, कहानी लिख सकती है तू... कोशिश तो करके देख... पर उसे हमेशा लगता एमी उसका दिल रखने के लिए कह रही है... बस।
हनीफ सर जाने को खड़े हुए थे। हमेशा की तरह न नंदी उन्हें रोकना चाहती थी न वे रुकना। बस मन उनका बहुत खाली-खाली सा हो चला था। वे सोच रहे थे खुद... आखिर क्या हुआ है ऐसा... वे सोच रहे थे इतने दिनों से। नंदिता से उन्हें धीरे-धीरे एक दूरी बनानी है... उसका थीसिस पूरा हो जाए बस। पर ऐसा करते हुए... याकि जब सचमुच ऐसा हो रहा है वे उदास क्यों हैं इतने आखिर। ... जैसे कोई चीज छूट रही है उनके हाथों से। जैसे खरगोश का कोई नन्हा बच्चा उनकी हथेलियों की कैद से आजाद हो कर भागने की तैयारी में हो। और उसे यूँ आजाद होते देखना उसे पसंद न हो...
नंदी ने भी तय कर लिया है, जाएगी वह हनीफ सर के साथ और वहीं कहेगी उनसे सब कुछ सच-सच... आगे... आगे सर की मर्जी... उसने देखा, खिड़की से जाते हुए सर ने एक बार भी पलट कर नहीं देखा उसकी तरफ... वह उदास नहीं होना चाहती थी पर कुछ खाली-खाली सा तैरने लगा था उस सूनेपन में। नंदिता ने सर की दी किताब उठा ली थी। उलट-पुलट कर देखा था उसे... कितनी कितनी बार... पर एक पिंड था समय का जो न आगे खिसक रहा था न पीछे। अपनी जगह पर जड़ा-अड़ा सा बैठा था। मनाने की चाह में रूठ कर बैठे बच्चे की तरह... उसका मन भारी-भारी हो आया था।
13
जब दरवाजे की घंटी बजी तो नंदिता के मन में हठात यह प्रश्न उगा था, कौन हो सकता है इस वक्त? आखिर कौन? वह जानती थी हनीफ सर तो बिल्कुल भी नहीं हो सकते। जाने के एक दिन पहले तो वह कभी भी उसके घर नहीं आएँगे। यह वक्त उनके हिसाब से उनकी पत्नी और उनके परिवार के लिए होता है। और वह भी तब जब उन्हें दस दिनों के लिए बाहर जाना हो। तो क्या वसीम...? उसने खुद को बरजा था। वह क्यों चाहती है कि वसीम उस तक आए। उसने खुद ही तो उसे यहाँ आने से मना किया है... फिर उसका इंतजार क्यों?... उसने जैसे खुद को ही झुठलाया वह क्यों करेगी उसका इंतजार...? उसे वसीम से क्या मतलब? जैसे आया था अचानक उसकी जिंदगी में उसे उसी तरह चले भी जाना होगा। उसके भीतर बसी किसी दूसरी मैं ने कहा था... क्या सचमुच...?
इसी ताने-बाने में उलझी वह दरवाजे तक आ चुकी थी। उसने एक बार अपने बालों में उँगलियों से कंघी की फिर उन्हें पीछे की तरफ सहेजा। सबके सब चेहरे पर फिसले आ रहे थे। चेहरे पर फिसलना एक मुहावरा हो सकता है लेकिन अनायास ही उसके इस प्रयोग से उसे फिर वसीम की याद हो आई... उसके बीमार चेहरे पर फिसलती उसकी उँगलियाँ, उसका ताप हरती उँगलियाँ... क्या यह सब कुछ एक चेहरे को देख कर फिसलने जैसा था... बस देख कर मर मिट जाने जैसा कुछ... और नहीं तो क्या? कितना जानता है वह उसके बारे में... वही कुछ न जितना उसने बताया होगा भावोद्रेक के क्षणों में... कितने समय से... पर दावे इतने बड़े-बड़े... बातें इतनी गहरी। यह सब कुछ सिवाय क्षणिक आकर्षण के और क्या...
उसने चलते-चलते फिर खुद को बरजा था। दरवाजे पर कोई है। उसने अपने टॉप को पीछे से खींच कर सीधा किया, पाजामे के नाड़े को अंदर समेटा और फिर दरवाजा खोलने को उद्धत हुई। उद्धत होने की इस प्रक्रिया में कुछ क्षण जरूर बीते होंगे। अचानक उसे खयाल आया बेल एक बार बजने के बाद दुबारे नहीं बजी। क्या सामनेवाला व्यक्ति लौट चुका है। पर नहीं। खिड़की पर कोई आड़ी-तिरछी परछाई बन रही थी... जड़ जैसी, बिना हिल डुल। उसे सामनेवाले व्यक्ति के धैर्य पर आश्चर्य हो आया था...
सामने कोई चालीस-पैंतालीस वर्ष की महिला थी, घुँघराले बाल, मृदु चेहरा, शहद सा रंग। कुल मिला कर सब कुछ बहुत मीठा और सहज सा। वह हैरत में खड़ी की खड़ी है। कौन है यह, क्यों मिलने आई है उससे। गलत पते पर तो नहीं आ गई... उसने जुबान को जबरन सहेजा है... जी आप? जवाब में कोई उत्तर नहीं मिला है। दो निगाहें जो देख रही हैं उसे... पहचान-परख रही है बड़े प्यार से। इसीलिए तो उनका यूँ एकटक देखना भी उसे घूरना नहीं लगता... उत्तर में भी एक प्रतिप्रश्न ही... तुम नंदिता हो, है न? हाँ, वह सिर्फ इतना कह कर चुप हो जाती है। जबकि वह जानती है कि उस औरत की जगह कोई और होता तो वह जरूर कहती ... आपको क्या लगता है? या आप किससे मिलने आई हैं। उसने सोचा क्षण भर को, इस औरत में कुछ तो है ऐसा जो दूसरे के मन की कटुता और तीतेपन को भी प्रभावित करता है। क्या प्रभामंडल इसे ही कहते हैं, उसने गौर से देखा था। कोई आभा, कोई प्रभा नहीं थी उसके चारों तरफ। थी तो बस एक सहज सी मिठास। उसी मिठास से बंध कर कहा था उसने अंदर आइए... भीतर आ कर बातें करते हैं, आराम से। वह सरक कर उसके ठीक बगल से भीतर को आ रही थी और वह सोच रही थी ऐसा तो पहले कभी नहीं हुआ कि बिना नाम-परिचय जाने हुए उसने किसी को घर के भीतर घुसने दिया हो। यह कोई सेल्स गर्ल हुई तो... या फिर... नाम पता तो कहीं से मालूम किया जा सकता है। औरत ने शायद उसके पशोपेश को भाँपा था... मैं वसीम की अम्मी हूँ। उसने यह नहीं कहा था कि मैं हनीफ मियाँ की पत्नी हूँ। ऐसा उसने जान बूझ कर किया था। पर नंदिता को लगा जैसे उसने कहा हो, मैं हनीफ मियाँ की पत्नी हूँ। वह चौंक पड़ी थी अचानक। अपने पर कोई काबू नहीं रह गया था उसका... उठ कर खड़ी हो चली थी यूँ ही। फिर यह सोचा था कि वह उठी क्यों, तो सिकुड़ती-सिमटती सी बैठ गई थी अपने आप में। यह जानते हुए भी कि यूँ सिकुड़ना-सिमटना उसकी फितरत नहीं है।
उन्होंने कहा था नंदिता से... वसीम तुम्हारी बहुत बातें करता है। उसने फिर सुना... हनीफ मियाँ तुम्हें इतना पसंद क्यों करते हैं... चुप रहने के सिवा कोई दूसरा उत्तर नहीं था उसके पास, कहे और अनकहे दोनों प्रश्नों के जवाब में।
उन्होंने फिर पूछा था तबीयत कैसी है तुम्हारी...? ...उसने सुना था तुमने वसीम को भी इसी तबीयत के बहाने छीन लिया न मुझसे...? उसे अजीब सी बेचैनी हो रही थी; एक सकपकाहट जो उसने पहले कभी नहीं महसूस किया था। जैसे कोई चोर हो मन में। ...यह सब अहसास नंदिता के लिए नया-नया था। वरना उसने हमेशा जो भी किया था सीना तान कर किया, उसे अपने जीवन का सबसे बड़ा सच माना... और जो भी निर्णय लिए दिल की बात को सुनते हुए ही... कहते हैं दिल की आवाज कभी गलत नहीं होती। ...तो अब क्यों हो रही थी... नंदिता अपराधी सी किसी के सामने आखिर कैसे? क्या सच्चाई व्यक्ति सापेक्ष भी होती है, समय और समाज सापेक्ष की तरह। सामनेवाले व्यक्ति की चुप्पी, उसका सदाचार, उसकी सहिष्णुता तुलनात्मक रूप से उसे छोटा बना रहे थे; कुछ-कुछ ओछा भी। वरना नंदी को भी गर्व था अपने पर और और वह भी बेतरह। नंदी अब तक लगातार चुप ही चुप थी। वह समझ भी नहीं पा रही थी कि बोले भी तो क्या बोले। वह पानी लाने के बहाने उठी थी कि इसी बहाने वह अपने व्यवहार और प्रतिक्रियाओं को संयमित कर सके... यह तय कर सके कि उसे किस तरह से पेश आना है...
नंदिता जब उठकर पानी लाने गई नसीमा यही सोच रही थी कि यह लड़की उतनी सहज-सरल नहीं। इससे कुछ भी अपने मन का कुबूल करवा लेना इतना आसान नहीं जितना कि वह सोच कर निकली थी। उन्हें कल की रात लगता रहा था कि वसीम इतना परेशान क्यूँ है। ऐसी तो कोई बात हुई ही नहीं। दुनिया की कौन सी लड़की होगी जो इतना प्यार करनेवाले लड़के और वह भी जब वह शक्ल-सूरत से भी माशाअल्लाह इतना खूबसूरत हो, उसे मना कर सकती है। पर वह ताब-आब है इस लड़की में। एक अजीब सी तटस्थता, वीतराग जैसे अपने उम्र से बहुत-बहुत बड़ी और समझदार हो वह। उसने सोचा वह एक माँ की तरह सोच रही थी। आखिरकार उसका कलेजा भी तो एक माँ का ही था। 'भी' उसने इसलिए सोचा कि 'ही' सोचते हुए उसका मन और ज्यादा काँप रहा था...। खुद अपनी खातिर ही नहीं वसीम की खातिर भी। उसने पूछा था वसीम से कि वह तो उसे पसंद करता है, पर क्या नंदिता... जवाब में वसीम के हर तरफ बस एक लंबी सी चुप्पी थी। उस अंतहीन चुप्पी से घबराकर उसने बातों का रुख दूसरी तरफ कर लिया था... वह चुप्पी उसे अब परेशान कर रही थी। और फिर कल रात का सपना रह-रह के उसकी आँखों को गड़ने लगता था। वसीम से बात होने के बाद जो सपना कहीं अतल कोहरे में गुम हो गया था अभी मुँह उठाकर इस चेत में भी दिखने लगा। वसीम पर उस दिन उसे बहुत प्यार आया था। हमेशा से भी ज्यादा। उसके लाड़ले बेटे ने उसकी सारी परेशानियाँ खत्म कर दी। वह जानता है क्या कि एक ही चिंता है उसकी अम्मी को, कहे कि न कहे मुँह से वह? और उसने अपनी पूरी ताकत से उस परेशानी की जड़ को ही उखाड़ फेंकने की कोशिश की थी। ऐसे ही वह वसीम को अपना लाड़ला बेटा नहीं मानती थी...
...और चली जाना हो तो रातोंरात चली जाए वह वसीम की जिंदगी से। एक से एक खूबसूरत और सलीकेमंद लड़कियाँ मिल जाएँगी उसके वसीम की खातिर। वह तो...
पल भर को वह स्वार्थी हो चली थी। पर जब वसीम के जर्द चेहरे पर उसकी नजर गई तो फिर वे ऐसा नहीं सोच सकीं। उनका लाड़ला बेटा... उसे उसकी चाही हुई हर चीज मिले दुनिया में। और इसके लिए उन्हें भी चाहे जो कुछ करना पड़े करेंगी।
नंदिता जितनी देर लगा रही थी, उन्हें उतनी ही राहत थी। वे तैयार कर सकती हैं इस बीच खुद को। कैसे कहेंगी वे उससे कुछ? क्य कहेंगी?... नंदिता ने भी ट्रे में नमकीन, बिस्किट, पानी सजाते-सजाते खुद को तैयार कर लिया था, हर सवाल, हर स्थिति के लिए। नंदिता जब उनके सामने आई उन्होंने फिर एक बार गौर से देखा। नंदिता का चेहरा सपने में देखी गई नंदिता के चेहरे से मिलता है क्या? उन्हें राहत मिली उसका चेहरा उस नंदिता से बिल्कुल नहीं मिलता। उन्होंने फिर गौर से देखा और एक बार फिर राहत की साँस खींची। सच सामनेवाला वह चेहरा कुदैशा बेगम की जवानी की पुरानी तस्वीर जैसा था। लेकिन फिर कुछ खटका और गड़ा भीतर तेजी से... वो नंदिता की बेधती हुई आँखें थी... ठीक सपनेवाली नंदिता जैसी... उससे पूछती हुई... हनीफ सर ने अगर मुझसे प्यार किया, वसीम ने अगर मुझे पसंद किया तो इसमें मेरा क्या कुसूर?
नसीमा बी के सारे प्रश्न, सारी समझाइशें बिना कहे-सुने अपने आप में सकुचा गई थीं। वे झुँझला उठीं खुद पर। अब एक बार खुद को नए सिरे से सजाओ, तैयार करो... पर तैयार करने की जरूरत ही नहीं पड़ी उन्हें खुद को। हड़बड़ाहट ने अपनी तरफ से एक सवाल दाग ही दिया था, और उन्हें सँभालना था अब सब कुछ उसी सिरे को पकड़ कर... वसीम तुम्हें कैसा लगता है... कैसा मतलब? नंदिता सचेत थी अब यूँ ही निरस्त होनेवाली नहीं...। कैसा मतलब कैसा...। उसने फिर पूछा कैसा क्या...? वे चुप हो गई थीं... वे क्या कहें, जैसे उन्हें समझ में ही नहीं आ रहा था... फिर नंदी ने ही बात आगे बढ़ाई... एक अच्छा शरीफ इनसान, एक अच्छा दोस्त... वे सँभल चुकी थीं थोड़ी-थोड़ी... उस दोस्त या कि अच्छे इनसान के लिए इतना प्यार है मन में कि उसके साथ जिंदगी गुजारने की सोच सको...? क्या कहा आपने... जैसे उसने ठीक-ठीक सुना न हो ऐसे आहत स्वरों में पूछा था। जैसे ऐसे सवाल की अपेक्षा उसे सामनेवाले से बिल्कुल ही न हो। नसीमा बी पहली बार सकुचाई थीं... देखो, वसीम तुमसे प्यार करता है... वह तुम्हारे साथ जिंदगी गुजारने के सपने देखता है और तुम्हारी बेरुखी से टूटा हुआ है बुरी तरह। एक माँ होने के नाते मैं साफ करने आई हूँ सब कुछ। क्या तुम्हें भी उससे प्यार है... नहीं। नंदिता बिल्कुल साफ थी। फिर मैं पूछना चाहती हूँ तुमसे, वसीम को आखिर यह भरम हुआ तो कैसे... थोड़ी देर की चुप्पी के बाद नंदिता ने कहा था - दोस्ती को प्यार समझने की गलती दुनिया में हजारों लोग करते हैं अगर यह गलती उससे भी हुई तो इसमें मैं क्या कर सकती हूँ... नसीमा बी बिल्कुल झुँझला उठी थी। कितनी ढीठ लड़की है यह। सामनेवाले की भावनाओं का इसे जरा भी खयाल नहीं... अब इससे पूछे कोई कि...
नंदी रौ में थी और वह झिझकी नहीं थी सच कहने से... अगर यह सब आप उस रात की घटना के कारण कहने आई हैं तो सुनिए, उस रात के घट जाने से मेरे जीवन में कुछ भी नहीं बदला... और वह मेरे लिए किसी नए रिश्ते का कारण नहीं हो सकता। उसे घटना था, घट गया; उसके घटने में मैंने वसीम को भी दोषी नहीं माना है, वर्ना दोस्त के दर्जे से भी कहीं दूर ले जा कर फेंकती वह नाम। पर नहीं... माना कि देह अहम होता है एक स्त्री-पुरुष के रिश्ते के बीच... पर महज देह की खातिर कोई रिश्ता बन सकता है क्या... और जहाँ देह नहीं वहाँ कोई रिश्ता ही नहीं हो यह भी तो जरूरी नहीं...
नसीमा बी भौंचक थीं... यह बित्ते भर की लड़की कैसी बातें कर रही है... 'उस रात' से इसका मतलब? क्या वसीम के रुकने भर से या कि कुछ और भी अहम्... उँह... नहीं... यह तो देह-देह जैसा कुछ कह रही है। नसीमा बी ने जैसे खुद को सहेजने की कोशिश कि... वे सकते में थीं। कैसी है यह लड़की... आजकल की लड़कियाँ तो... वसीम ने तो अपनी तरफ से उसे कुछ भी नहीं कहा था; इतने करीब होने के बावजूद और यह लड़की तो चीख-चीख कर कहे जा रही है... उसने खुद के बारे में भी सोचा... वह तो किसी से न कह पाए ऐसा कुछ... और कोई क्या, उसने तो आज तक हनीफ मियाँ से भी... आखिर यह लड़की इशारों-इशारों में ही उसे बताना चाहती है तो क्या... पर वे मुँह नहीं खोलेंगी उन मुद्दों पर, खासकर उससे तो हर्गिज नहीं... अपने भरोसे पर उन्हें भरोसा है, और उसे थामे रहना है उन्हें बिना किसी शक-सुबहा के... उन्हें भरोसा है अपने भरोसे पर क्योंकि सिवाय उस भरोसे के उनके पास चारा भी कहाँ है कोई दूसरा। रात का सपना फिर उन्हें मुँह चिढ़ा रहा था। अपना वह यकीन भी, जिसे वे अपने साथ ले कर आई थीं और जिसके सहारे वसीम के आँसू पोंछे थे उन्होंने...
उन्होंने अंतिम बार कहा था नंदिता से, और निर्णय के स्वरों में - मुझे कोई जल्दी नहीं है, सोच लो तुम, तुम्हें जितना भी वक्त लेना है... उनकी उम्मीद के अनुसार पहली बार नंदिता ने यह नहीं कहा था - 'मैं सोच चुकी हूँ अच्छी तरह, या कि मेरा निर्णय अंतिम है'... अब चाहे तो इसे ही अपना अंतिम सहारा मान उठ चलती वो संतोष से... पर नहीं, संतोष उन्हें नहीं था, बिल्कुल भी नहीं। वह इस लड़की से फिर-फिर हार गई थीं।
नंदिता ने नसीमा बी के जाने के बाद भी देखा वह कुर्सी खाली नहीं थी, वे अब भी वहाँ थीं, लगातार... अपनी इच्छाओं, सवालों के साथ... उसने नजरें चुराने की खातिर सामने पड़ी पुस्तकों को देखा था। हवा से फड़फड़ा कर खुले उस पन्ने पर लिखा था 'सप्तभंगवाद'... उसने ध्यान से पढ़ा - विरोधी दृष्टिकोण पर भी विचार करना चाहिए। कई बार जो बातें विरोधी मालूम पड़ रही है, उन्हें विचार करने के बाद तुम अपनी बातों के समान ही पाओगे। अपने चित्त से संकीर्ण विचारों को निकालो। दूसरों के दृष्टिकोण और समझ को सहानुभूति पूर्वक देखो...
नंदिता नोट्स लिखने के साथ-साथ सोच रही थी लिखना अपने आप में कितना महान कार्य होता है। किसी उद्देश्य के लिए, समाज को बेहतर बनाने के लिए लिखना... कोदैबनायकी ने अपनी इस क्षमता का कितना बेहतर उपयोग किया... और एमी भी तो रात-रात भर जाग कर लिखती रहती है... बेचैन सी। और वह बेवकूफ निहारती रहती थी उसे बस। उसे कोई जरूरत न पड़ जाए इस आशा में जागती सी। वह तब भी कहती एमी से... काश, मैं भी लिख पाती तुम्हारी तरह... लिखना कितना अच्छा लगता होगा न।
एमी हँसती, कहानी लिख सकती है तू... कोशिश तो करके देख... पर उसे हमेशा लगता एमी उसका दिल रखने के लिए कह रही है... बस।
हनीफ सर जाने को खड़े हुए थे। हमेशा की तरह न नंदी उन्हें रोकना चाहती थी न वे रुकना। बस मन उनका बहुत खाली-खाली सा हो चला था। वे सोच रहे थे खुद... आखिर क्या हुआ है ऐसा... वे सोच रहे थे इतने दिनों से। नंदिता से उन्हें धीरे-धीरे एक दूरी बनानी है... उसका थीसिस पूरा हो जाए बस। पर ऐसा करते हुए... याकि जब सचमुच ऐसा हो रहा है वे उदास क्यों हैं इतने आखिर। ... जैसे कोई चीज छूट रही है उनके हाथों से। जैसे खरगोश का कोई नन्हा बच्चा उनकी हथेलियों की कैद से आजाद हो कर भागने की तैयारी में हो। और उसे यूँ आजाद होते देखना उसे पसंद न हो...
नंदी ने भी तय कर लिया है, जाएगी वह हनीफ सर के साथ और वहीं कहेगी उनसे सब कुछ सच-सच... आगे... आगे सर की मर्जी... उसने देखा, खिड़की से जाते हुए सर ने एक बार भी पलट कर नहीं देखा उसकी तरफ... वह उदास नहीं होना चाहती थी पर कुछ खाली-खाली सा तैरने लगा था उस सूनेपन में। नंदिता ने सर की दी किताब उठा ली थी। उलट-पुलट कर देखा था उसे... कितनी कितनी बार... पर एक पिंड था समय का जो न आगे खिसक रहा था न पीछे। अपनी जगह पर जड़ा-अड़ा सा बैठा था। मनाने की चाह में रूठ कर बैठे बच्चे की तरह... उसका मन भारी-भारी हो आया था।
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जब दरवाजे की घंटी बजी तो नंदिता के मन में हठात यह प्रश्न उगा था, कौन हो सकता है इस वक्त? आखिर कौन? वह जानती थी हनीफ सर तो बिल्कुल भी नहीं हो सकते। जाने के एक दिन पहले तो वह कभी भी उसके घर नहीं आएँगे। यह वक्त उनके हिसाब से उनकी पत्नी और उनके परिवार के लिए होता है। और वह भी तब जब उन्हें दस दिनों के लिए बाहर जाना हो। तो क्या वसीम...? उसने खुद को बरजा था। वह क्यों चाहती है कि वसीम उस तक आए। उसने खुद ही तो उसे यहाँ आने से मना किया है... फिर उसका इंतजार क्यों?... उसने जैसे खुद को ही झुठलाया वह क्यों करेगी उसका इंतजार...? उसे वसीम से क्या मतलब? जैसे आया था अचानक उसकी जिंदगी में उसे उसी तरह चले भी जाना होगा। उसके भीतर बसी किसी दूसरी मैं ने कहा था... क्या सचमुच...?
इसी ताने-बाने में उलझी वह दरवाजे तक आ चुकी थी। उसने एक बार अपने बालों में उँगलियों से कंघी की फिर उन्हें पीछे की तरफ सहेजा। सबके सब चेहरे पर फिसले आ रहे थे। चेहरे पर फिसलना एक मुहावरा हो सकता है लेकिन अनायास ही उसके इस प्रयोग से उसे फिर वसीम की याद हो आई... उसके बीमार चेहरे पर फिसलती उसकी उँगलियाँ, उसका ताप हरती उँगलियाँ... क्या यह सब कुछ एक चेहरे को देख कर फिसलने जैसा था... बस देख कर मर मिट जाने जैसा कुछ... और नहीं तो क्या? कितना जानता है वह उसके बारे में... वही कुछ न जितना उसने बताया होगा भावोद्रेक के क्षणों में... कितने समय से... पर दावे इतने बड़े-बड़े... बातें इतनी गहरी। यह सब कुछ सिवाय क्षणिक आकर्षण के और क्या...
उसने चलते-चलते फिर खुद को बरजा था। दरवाजे पर कोई है। उसने अपने टॉप को पीछे से खींच कर सीधा किया, पाजामे के नाड़े को अंदर समेटा और फिर दरवाजा खोलने को उद्धत हुई। उद्धत होने की इस प्रक्रिया में कुछ क्षण जरूर बीते होंगे। अचानक उसे खयाल आया बेल एक बार बजने के बाद दुबारे नहीं बजी। क्या सामनेवाला व्यक्ति लौट चुका है। पर नहीं। खिड़की पर कोई आड़ी-तिरछी परछाई बन रही थी... जड़ जैसी, बिना हिल डुल। उसे सामनेवाले व्यक्ति के धैर्य पर आश्चर्य हो आया था...
सामने कोई चालीस-पैंतालीस वर्ष की महिला थी, घुँघराले बाल, मृदु चेहरा, शहद सा रंग। कुल मिला कर सब कुछ बहुत मीठा और सहज सा। वह हैरत में खड़ी की खड़ी है। कौन है यह, क्यों मिलने आई है उससे। गलत पते पर तो नहीं आ गई... उसने जुबान को जबरन सहेजा है... जी आप? जवाब में कोई उत्तर नहीं मिला है। दो निगाहें जो देख रही हैं उसे... पहचान-परख रही है बड़े प्यार से। इसीलिए तो उनका यूँ एकटक देखना भी उसे घूरना नहीं लगता... उत्तर में भी एक प्रतिप्रश्न ही... तुम नंदिता हो, है न? हाँ, वह सिर्फ इतना कह कर चुप हो जाती है। जबकि वह जानती है कि उस औरत की जगह कोई और होता तो वह जरूर कहती ... आपको क्या लगता है? या आप किससे मिलने आई हैं। उसने सोचा क्षण भर को, इस औरत में कुछ तो है ऐसा जो दूसरे के मन की कटुता और तीतेपन को भी प्रभावित करता है। क्या प्रभामंडल इसे ही कहते हैं, उसने गौर से देखा था। कोई आभा, कोई प्रभा नहीं थी उसके चारों तरफ। थी तो बस एक सहज सी मिठास। उसी मिठास से बंध कर कहा था उसने अंदर आइए... भीतर आ कर बातें करते हैं, आराम से। वह सरक कर उसके ठीक बगल से भीतर को आ रही थी और वह सोच रही थी ऐसा तो पहले कभी नहीं हुआ कि बिना नाम-परिचय जाने हुए उसने किसी को घर के भीतर घुसने दिया हो। यह कोई सेल्स गर्ल हुई तो... या फिर... नाम पता तो कहीं से मालूम किया जा सकता है। औरत ने शायद उसके पशोपेश को भाँपा था... मैं वसीम की अम्मी हूँ। उसने यह नहीं कहा था कि मैं हनीफ मियाँ की पत्नी हूँ। ऐसा उसने जान बूझ कर किया था। पर नंदिता को लगा जैसे उसने कहा हो, मैं हनीफ मियाँ की पत्नी हूँ। वह चौंक पड़ी थी अचानक। अपने पर कोई काबू नहीं रह गया था उसका... उठ कर खड़ी हो चली थी यूँ ही। फिर यह सोचा था कि वह उठी क्यों, तो सिकुड़ती-सिमटती सी बैठ गई थी अपने आप में। यह जानते हुए भी कि यूँ सिकुड़ना-सिमटना उसकी फितरत नहीं है।
उन्होंने कहा था नंदिता से... वसीम तुम्हारी बहुत बातें करता है। उसने फिर सुना... हनीफ मियाँ तुम्हें इतना पसंद क्यों करते हैं... चुप रहने के सिवा कोई दूसरा उत्तर नहीं था उसके पास, कहे और अनकहे दोनों प्रश्नों के जवाब में।
उन्होंने फिर पूछा था तबीयत कैसी है तुम्हारी...? ...उसने सुना था तुमने वसीम को भी इसी तबीयत के बहाने छीन लिया न मुझसे...? उसे अजीब सी बेचैनी हो रही थी; एक सकपकाहट जो उसने पहले कभी नहीं महसूस किया था। जैसे कोई चोर हो मन में। ...यह सब अहसास नंदिता के लिए नया-नया था। वरना उसने हमेशा जो भी किया था सीना तान कर किया, उसे अपने जीवन का सबसे बड़ा सच माना... और जो भी निर्णय लिए दिल की बात को सुनते हुए ही... कहते हैं दिल की आवाज कभी गलत नहीं होती। ...तो अब क्यों हो रही थी... नंदिता अपराधी सी किसी के सामने आखिर कैसे? क्या सच्चाई व्यक्ति सापेक्ष भी होती है, समय और समाज सापेक्ष की तरह। सामनेवाले व्यक्ति की चुप्पी, उसका सदाचार, उसकी सहिष्णुता तुलनात्मक रूप से उसे छोटा बना रहे थे; कुछ-कुछ ओछा भी। वरना नंदी को भी गर्व था अपने पर और और वह भी बेतरह। नंदी अब तक लगातार चुप ही चुप थी। वह समझ भी नहीं पा रही थी कि बोले भी तो क्या बोले। वह पानी लाने के बहाने उठी थी कि इसी बहाने वह अपने व्यवहार और प्रतिक्रियाओं को संयमित कर सके... यह तय कर सके कि उसे किस तरह से पेश आना है...
नंदिता जब उठकर पानी लाने गई नसीमा यही सोच रही थी कि यह लड़की उतनी सहज-सरल नहीं। इससे कुछ भी अपने मन का कुबूल करवा लेना इतना आसान नहीं जितना कि वह सोच कर निकली थी। उन्हें कल की रात लगता रहा था कि वसीम इतना परेशान क्यूँ है। ऐसी तो कोई बात हुई ही नहीं। दुनिया की कौन सी लड़की होगी जो इतना प्यार करनेवाले लड़के और वह भी जब वह शक्ल-सूरत से भी माशाअल्लाह इतना खूबसूरत हो, उसे मना कर सकती है। पर वह ताब-आब है इस लड़की में। एक अजीब सी तटस्थता, वीतराग जैसे अपने उम्र से बहुत-बहुत बड़ी और समझदार हो वह। उसने सोचा वह एक माँ की तरह सोच रही थी। आखिरकार उसका कलेजा भी तो एक माँ का ही था। 'भी' उसने इसलिए सोचा कि 'ही' सोचते हुए उसका मन और ज्यादा काँप रहा था...। खुद अपनी खातिर ही नहीं वसीम की खातिर भी। उसने पूछा था वसीम से कि वह तो उसे पसंद करता है, पर क्या नंदिता... जवाब में वसीम के हर तरफ बस एक लंबी सी चुप्पी थी। उस अंतहीन चुप्पी से घबराकर उसने बातों का रुख दूसरी तरफ कर लिया था... वह चुप्पी उसे अब परेशान कर रही थी। और फिर कल रात का सपना रह-रह के उसकी आँखों को गड़ने लगता था। वसीम से बात होने के बाद जो सपना कहीं अतल कोहरे में गुम हो गया था अभी मुँह उठाकर इस चेत में भी दिखने लगा। वसीम पर उस दिन उसे बहुत प्यार आया था। हमेशा से भी ज्यादा। उसके लाड़ले बेटे ने उसकी सारी परेशानियाँ खत्म कर दी। वह जानता है क्या कि एक ही चिंता है उसकी अम्मी को, कहे कि न कहे मुँह से वह? और उसने अपनी पूरी ताकत से उस परेशानी की जड़ को ही उखाड़ फेंकने की कोशिश की थी। ऐसे ही वह वसीम को अपना लाड़ला बेटा नहीं मानती थी...
...और चली जाना हो तो रातोंरात चली जाए वह वसीम की जिंदगी से। एक से एक खूबसूरत और सलीकेमंद लड़कियाँ मिल जाएँगी उसके वसीम की खातिर। वह तो...
पल भर को वह स्वार्थी हो चली थी। पर जब वसीम के जर्द चेहरे पर उसकी नजर गई तो फिर वे ऐसा नहीं सोच सकीं। उनका लाड़ला बेटा... उसे उसकी चाही हुई हर चीज मिले दुनिया में। और इसके लिए उन्हें भी चाहे जो कुछ करना पड़े करेंगी।
नंदिता जितनी देर लगा रही थी, उन्हें उतनी ही राहत थी। वे तैयार कर सकती हैं इस बीच खुद को। कैसे कहेंगी वे उससे कुछ? क्य कहेंगी?... नंदिता ने भी ट्रे में नमकीन, बिस्किट, पानी सजाते-सजाते खुद को तैयार कर लिया था, हर सवाल, हर स्थिति के लिए। नंदिता जब उनके सामने आई उन्होंने फिर एक बार गौर से देखा। नंदिता का चेहरा सपने में देखी गई नंदिता के चेहरे से मिलता है क्या? उन्हें राहत मिली उसका चेहरा उस नंदिता से बिल्कुल नहीं मिलता। उन्होंने फिर गौर से देखा और एक बार फिर राहत की साँस खींची। सच सामनेवाला वह चेहरा कुदैशा बेगम की जवानी की पुरानी तस्वीर जैसा था। लेकिन फिर कुछ खटका और गड़ा भीतर तेजी से... वो नंदिता की बेधती हुई आँखें थी... ठीक सपनेवाली नंदिता जैसी... उससे पूछती हुई... हनीफ सर ने अगर मुझसे प्यार किया, वसीम ने अगर मुझे पसंद किया तो इसमें मेरा क्या कुसूर?
नसीमा बी के सारे प्रश्न, सारी समझाइशें बिना कहे-सुने अपने आप में सकुचा गई थीं। वे झुँझला उठीं खुद पर। अब एक बार खुद को नए सिरे से सजाओ, तैयार करो... पर तैयार करने की जरूरत ही नहीं पड़ी उन्हें खुद को। हड़बड़ाहट ने अपनी तरफ से एक सवाल दाग ही दिया था, और उन्हें सँभालना था अब सब कुछ उसी सिरे को पकड़ कर... वसीम तुम्हें कैसा लगता है... कैसा मतलब? नंदिता सचेत थी अब यूँ ही निरस्त होनेवाली नहीं...। कैसा मतलब कैसा...। उसने फिर पूछा कैसा क्या...? वे चुप हो गई थीं... वे क्या कहें, जैसे उन्हें समझ में ही नहीं आ रहा था... फिर नंदी ने ही बात आगे बढ़ाई... एक अच्छा शरीफ इनसान, एक अच्छा दोस्त... वे सँभल चुकी थीं थोड़ी-थोड़ी... उस दोस्त या कि अच्छे इनसान के लिए इतना प्यार है मन में कि उसके साथ जिंदगी गुजारने की सोच सको...? क्या कहा आपने... जैसे उसने ठीक-ठीक सुना न हो ऐसे आहत स्वरों में पूछा था। जैसे ऐसे सवाल की अपेक्षा उसे सामनेवाले से बिल्कुल ही न हो। नसीमा बी पहली बार सकुचाई थीं... देखो, वसीम तुमसे प्यार करता है... वह तुम्हारे साथ जिंदगी गुजारने के सपने देखता है और तुम्हारी बेरुखी से टूटा हुआ है बुरी तरह। एक माँ होने के नाते मैं साफ करने आई हूँ सब कुछ। क्या तुम्हें भी उससे प्यार है... नहीं। नंदिता बिल्कुल साफ थी। फिर मैं पूछना चाहती हूँ तुमसे, वसीम को आखिर यह भरम हुआ तो कैसे... थोड़ी देर की चुप्पी के बाद नंदिता ने कहा था - दोस्ती को प्यार समझने की गलती दुनिया में हजारों लोग करते हैं अगर यह गलती उससे भी हुई तो इसमें मैं क्या कर सकती हूँ... नसीमा बी बिल्कुल झुँझला उठी थी। कितनी ढीठ लड़की है यह। सामनेवाले की भावनाओं का इसे जरा भी खयाल नहीं... अब इससे पूछे कोई कि...
नंदी रौ में थी और वह झिझकी नहीं थी सच कहने से... अगर यह सब आप उस रात की घटना के कारण कहने आई हैं तो सुनिए, उस रात के घट जाने से मेरे जीवन में कुछ भी नहीं बदला... और वह मेरे लिए किसी नए रिश्ते का कारण नहीं हो सकता। उसे घटना था, घट गया; उसके घटने में मैंने वसीम को भी दोषी नहीं माना है, वर्ना दोस्त के दर्जे से भी कहीं दूर ले जा कर फेंकती वह नाम। पर नहीं... माना कि देह अहम होता है एक स्त्री-पुरुष के रिश्ते के बीच... पर महज देह की खातिर कोई रिश्ता बन सकता है क्या... और जहाँ देह नहीं वहाँ कोई रिश्ता ही नहीं हो यह भी तो जरूरी नहीं...
नसीमा बी भौंचक थीं... यह बित्ते भर की लड़की कैसी बातें कर रही है... 'उस रात' से इसका मतलब? क्या वसीम के रुकने भर से या कि कुछ और भी अहम्... उँह... नहीं... यह तो देह-देह जैसा कुछ कह रही है। नसीमा बी ने जैसे खुद को सहेजने की कोशिश कि... वे सकते में थीं। कैसी है यह लड़की... आजकल की लड़कियाँ तो... वसीम ने तो अपनी तरफ से उसे कुछ भी नहीं कहा था; इतने करीब होने के बावजूद और यह लड़की तो चीख-चीख कर कहे जा रही है... उसने खुद के बारे में भी सोचा... वह तो किसी से न कह पाए ऐसा कुछ... और कोई क्या, उसने तो आज तक हनीफ मियाँ से भी... आखिर यह लड़की इशारों-इशारों में ही उसे बताना चाहती है तो क्या... पर वे मुँह नहीं खोलेंगी उन मुद्दों पर, खासकर उससे तो हर्गिज नहीं... अपने भरोसे पर उन्हें भरोसा है, और उसे थामे रहना है उन्हें बिना किसी शक-सुबहा के... उन्हें भरोसा है अपने भरोसे पर क्योंकि सिवाय उस भरोसे के उनके पास चारा भी कहाँ है कोई दूसरा। रात का सपना फिर उन्हें मुँह चिढ़ा रहा था। अपना वह यकीन भी, जिसे वे अपने साथ ले कर आई थीं और जिसके सहारे वसीम के आँसू पोंछे थे उन्होंने...
उन्होंने अंतिम बार कहा था नंदिता से, और निर्णय के स्वरों में - मुझे कोई जल्दी नहीं है, सोच लो तुम, तुम्हें जितना भी वक्त लेना है... उनकी उम्मीद के अनुसार पहली बार नंदिता ने यह नहीं कहा था - 'मैं सोच चुकी हूँ अच्छी तरह, या कि मेरा निर्णय अंतिम है'... अब चाहे तो इसे ही अपना अंतिम सहारा मान उठ चलती वो संतोष से... पर नहीं, संतोष उन्हें नहीं था, बिल्कुल भी नहीं। वह इस लड़की से फिर-फिर हार गई थीं।
नंदिता ने नसीमा बी के जाने के बाद भी देखा वह कुर्सी खाली नहीं थी, वे अब भी वहाँ थीं, लगातार... अपनी इच्छाओं, सवालों के साथ... उसने नजरें चुराने की खातिर सामने पड़ी पुस्तकों को देखा था। हवा से फड़फड़ा कर खुले उस पन्ने पर लिखा था 'सप्तभंगवाद'... उसने ध्यान से पढ़ा - विरोधी दृष्टिकोण पर भी विचार करना चाहिए। कई बार जो बातें विरोधी मालूम पड़ रही है, उन्हें विचार करने के बाद तुम अपनी बातों के समान ही पाओगे। अपने चित्त से संकीर्ण विचारों को निकालो। दूसरों के दृष्टिकोण और समझ को सहानुभूति पूर्वक देखो...