S
StoryPublisher
Guest
मैं मेरी टीम की एक सदस्यके साथ हमारे ऑफिस के ही बगल के कॉफ़ी शॉप में कॉफ़ी पी रही थी। मुझे साथ वाली कैबिन में से योगराज की आवाज़ सुनाई पड़ी। योगराज भी अपने कुछ साथीदारों से कुछ बात कर रहे थे। हमें उनकी आवाजें स्पष्ट सुनाई पड़ रही थीं। योगराज की एक महिला साथीदार ने योगराज से हमारी ही ऑफिस की एक और टीम की बड़ी सफलता के बारे में कहा।उसने कहा की वह सफलता में एक महिला का बड़ा योगदान था और उसके योगदान के लिए वह महिला को कंपनी ने बड़ा सराहा और एक प्रमोशन और बढ़ावा भी दिया। यह सुनकर योगराज तिलमिला उठे और जोर से बोलने लगे, "बकवास है। उस महिला का क्या योगदान था? क्या उसे अपनी काबिलियत के लिए वह प्रशंशा, प्रमोशन और बढ़ावा मिला था या फिर उस महिला को अपनी खूब सूरत जाँघों को प्रदर्शित करने के लिए मिला था?" योगराज के जोर से बोले हुए यह वचन सुनकर कमरे में बैठे हुए सारे लोग सकते में आ गये। योगराज हमारी कंपनी का एक जिम्मेवार एवं सीनियर लीडर था। उसके वाक्य कंपनी के कर्मचारियों के लिए मायने रखते थे। मेरे लिए इतना सुनना ही काफी था। मैं मारे गुस्से के लाल हो गयी और अपने दोनों हाथों को मोड़ कर अपनी कमर पर दोनों हाथोंकी हथेलियों को टिकाकर आग बबूला हो कर योगराज के सामने आ खड़ी हुई।
मैं गुस्से भरी नजर से योगराज की और देखते हुए कहा, "अच्छा! तो आप कहते हो की उस महिला को अपनी काबिलियत के लिए नहीं बल्कि उसकी खूबसूरत जाँघों के लिए वह सब प्रशंशा, प्रमोशन और दूसरे पारितोषिक मिले ठीक है? क्या इसका मतलब यह हुआ की आप उन सब लोगों से ज्यादा अक्लमंद हो जिन्होंने उस महिला की कार्य क्षमता को परखा?" शायद मेरे शब्दों से कहीं ज्यादा मेरी धमकी भरी अंगभंगिमा देख कर योगराज कुछ देर तक मुझे स्तब्ध हो कर ताकते ही रहे। उन्हें पता नहीं था की मैं भी वहाँ उनकी बातें सुन रही थी। उन्होंने फिर मुझे ऊपर से निचे आँखे घुमाकर प्रशंशा भरी नजर से देखा और फिर थोड़ा मुस्कुराकर वही लोलुप नज़रों से देखते हुए बोले, "बापरे! माफ़ करना श्रीमती जी, मैं किसी को भी नीचा दिखाने की कोशिश नहीं कर रहा था। भाई अब मैं मानता हूँ की निर्णायकों का कोई भी दोष नहीं है। अगर मैं भी उनकी जगह होता और मुझे भी तुम्हारी जैसी सुन्दर फिगर वाली सेक्सी महिला की कार्यदक्षता का मूल्यांकन करना होता तो मैं भी वही करता जो उन्होंने किया।" योगराज की बातें सुनकर मुझे सारे कमरे के लोगो के चेहरे पर कटाक्ष भरी हंसी दिखाई दी। यह तो उलटा हो गया। मैं योग की बात काटने चली थी और इधर मेरी ही फिरकी उड़ गयी। मैं सब को हँसते देख कर खिसिया गयी और गुस्से में कॉफ़ी शॉप से उँफ की आवाज़ कर के बाहर निकल गयी।
मैं मुश्कल से थोड़ा ही चली थी की योगराज मेरे पीछे भागते हुए आये और पीछे से मेरी कमर अपने दोनों हाथोँ में पकड़ कर मुझे अपनी तरफ घुमा कर बोले, " प्रिया, आई ऍम वैरी सॉरी। प्रिया डार्लिंग, मेरी बात तो सुनो। तुम गुस्से में इतनी सुन्दर लग रही थी की मैं अपने आप पर नियत्रण नहीं रख पाया। सच बोलता हूँ डार्लिंग तुम इतनी सेक्सी लग रही थी की उस वक्त मेरा मन किया की मैं तुम्हें वहीँ पर...... डालूं।" योगराज ने वह शब्द नहीं बोले जो शायद वह बोलना चाह रहे थे। फिर चारों और नजर घुमाके उन्होंने देखा की कोई नजदीक सुन नहीं सकता था तो वह अपने मुंह को मेरे कान के पास लाकर बड़ी ही धीमी और मीठी आवाज़ में बोले, "प्रिया डार्लिंग, तुम इस अंदाज में इतनी सेक्सी और चुदक्कड़ लग रही हो की वाकई मैं मेरा मन तुम्हें चोदने के लिए बाँवला हो रहा है। डार्लिंग मैं तुम्हें सचमुच चोदना चाहता हूँ।" यह तो योग के असभ्यता की हद ही हो गयी! हालांकि यह सही था की वह मुझे चोदने की बात मेरे कानों में बोले, पर जिन्होंने भी उसे देखा होगा उन्हें साफ़ अंदाज लग ही गया होगा की योग मेरे कानों में क्या कह रहे थे। मुझे समझ नहीं आया की इस आदमी के माफ़ी मांगने की विचित्र तरीके से मैं कैसे निपटूं? वह मुझसे माफ़ी मांग रहे थे या मेरा मजाक उड़ा रहे थे? क्या वह मुझे चुदवाने के लिए निमत्रण दे रहे थे? अगर योग ने मुझे अलग ही माहौल में और अलग ही संजोग में यही चीज़ कही होती तो मैं शायद उसके निमत्रण का सकारात्मक जवाब देती। योग से चुदवाने के बारे में सोचने भर से मेरा गला सूखने लगा और मेरी टाँगे कमजोर पड़ने लगी। मैंने महसूस किया की मेरी टाँगों के बिच में से मेरा स्त्री रस रिसना शुरू हो गया। मेरी निप्पलं फूलने लगीं। पर उसके शब्द याद आते ही मरे मन में गुस्से की ज्वाला भड़क उठी। योग ने मेरा हाल देखा। वह मेरे करीब आये और उन्होंने मुझे अपनी बाँहों में जकड़ा। मैं थोड़ी लड़खड़ा गयी तो उन्होंने मुझे कमर से पकड़ा और मैं उनकी बाँहों में झूलती रह गयी। मेरा चेहरा उनके चेहरे के बराबर सामने था। उनकी आँखें मेरी आँखों में झांक रही थीं। हमारे होँठ लगभग चुम्बन की स्थिति में ही थे। शायद मेरी भाव भंगिमा से वह समझ गए थे की जब उन्हों ने मुझे चोदने की बात कही तो मैं नर्वस हो गयी थी। हम दोनों उसी पोज़ में कुछ देर तक खड़े रहे। मैं योग के कार्य कलाप से कुछ अचंभित थी।
मैं गुस्से भरी नजर से योगराज की और देखते हुए कहा, "अच्छा! तो आप कहते हो की उस महिला को अपनी काबिलियत के लिए नहीं बल्कि उसकी खूबसूरत जाँघों के लिए वह सब प्रशंशा, प्रमोशन और दूसरे पारितोषिक मिले ठीक है? क्या इसका मतलब यह हुआ की आप उन सब लोगों से ज्यादा अक्लमंद हो जिन्होंने उस महिला की कार्य क्षमता को परखा?" शायद मेरे शब्दों से कहीं ज्यादा मेरी धमकी भरी अंगभंगिमा देख कर योगराज कुछ देर तक मुझे स्तब्ध हो कर ताकते ही रहे। उन्हें पता नहीं था की मैं भी वहाँ उनकी बातें सुन रही थी। उन्होंने फिर मुझे ऊपर से निचे आँखे घुमाकर प्रशंशा भरी नजर से देखा और फिर थोड़ा मुस्कुराकर वही लोलुप नज़रों से देखते हुए बोले, "बापरे! माफ़ करना श्रीमती जी, मैं किसी को भी नीचा दिखाने की कोशिश नहीं कर रहा था। भाई अब मैं मानता हूँ की निर्णायकों का कोई भी दोष नहीं है। अगर मैं भी उनकी जगह होता और मुझे भी तुम्हारी जैसी सुन्दर फिगर वाली सेक्सी महिला की कार्यदक्षता का मूल्यांकन करना होता तो मैं भी वही करता जो उन्होंने किया।" योगराज की बातें सुनकर मुझे सारे कमरे के लोगो के चेहरे पर कटाक्ष भरी हंसी दिखाई दी। यह तो उलटा हो गया। मैं योग की बात काटने चली थी और इधर मेरी ही फिरकी उड़ गयी। मैं सब को हँसते देख कर खिसिया गयी और गुस्से में कॉफ़ी शॉप से उँफ की आवाज़ कर के बाहर निकल गयी।
मैं मुश्कल से थोड़ा ही चली थी की योगराज मेरे पीछे भागते हुए आये और पीछे से मेरी कमर अपने दोनों हाथोँ में पकड़ कर मुझे अपनी तरफ घुमा कर बोले, " प्रिया, आई ऍम वैरी सॉरी। प्रिया डार्लिंग, मेरी बात तो सुनो। तुम गुस्से में इतनी सुन्दर लग रही थी की मैं अपने आप पर नियत्रण नहीं रख पाया। सच बोलता हूँ डार्लिंग तुम इतनी सेक्सी लग रही थी की उस वक्त मेरा मन किया की मैं तुम्हें वहीँ पर...... डालूं।" योगराज ने वह शब्द नहीं बोले जो शायद वह बोलना चाह रहे थे। फिर चारों और नजर घुमाके उन्होंने देखा की कोई नजदीक सुन नहीं सकता था तो वह अपने मुंह को मेरे कान के पास लाकर बड़ी ही धीमी और मीठी आवाज़ में बोले, "प्रिया डार्लिंग, तुम इस अंदाज में इतनी सेक्सी और चुदक्कड़ लग रही हो की वाकई मैं मेरा मन तुम्हें चोदने के लिए बाँवला हो रहा है। डार्लिंग मैं तुम्हें सचमुच चोदना चाहता हूँ।" यह तो योग के असभ्यता की हद ही हो गयी! हालांकि यह सही था की वह मुझे चोदने की बात मेरे कानों में बोले, पर जिन्होंने भी उसे देखा होगा उन्हें साफ़ अंदाज लग ही गया होगा की योग मेरे कानों में क्या कह रहे थे। मुझे समझ नहीं आया की इस आदमी के माफ़ी मांगने की विचित्र तरीके से मैं कैसे निपटूं? वह मुझसे माफ़ी मांग रहे थे या मेरा मजाक उड़ा रहे थे? क्या वह मुझे चुदवाने के लिए निमत्रण दे रहे थे? अगर योग ने मुझे अलग ही माहौल में और अलग ही संजोग में यही चीज़ कही होती तो मैं शायद उसके निमत्रण का सकारात्मक जवाब देती। योग से चुदवाने के बारे में सोचने भर से मेरा गला सूखने लगा और मेरी टाँगे कमजोर पड़ने लगी। मैंने महसूस किया की मेरी टाँगों के बिच में से मेरा स्त्री रस रिसना शुरू हो गया। मेरी निप्पलं फूलने लगीं। पर उसके शब्द याद आते ही मरे मन में गुस्से की ज्वाला भड़क उठी। योग ने मेरा हाल देखा। वह मेरे करीब आये और उन्होंने मुझे अपनी बाँहों में जकड़ा। मैं थोड़ी लड़खड़ा गयी तो उन्होंने मुझे कमर से पकड़ा और मैं उनकी बाँहों में झूलती रह गयी। मेरा चेहरा उनके चेहरे के बराबर सामने था। उनकी आँखें मेरी आँखों में झांक रही थीं। हमारे होँठ लगभग चुम्बन की स्थिति में ही थे। शायद मेरी भाव भंगिमा से वह समझ गए थे की जब उन्हों ने मुझे चोदने की बात कही तो मैं नर्वस हो गयी थी। हम दोनों उसी पोज़ में कुछ देर तक खड़े रहे। मैं योग के कार्य कलाप से कुछ अचंभित थी।