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ये क्या हो रहा है?

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StoryPublisher

Guest


कई दिनों से एक फ्रेश कहानी के बारे में सोच रहा था, हालाँकि १-२ कहानियाँ और भी चल रही है, पर इस कहानी को भी अभी से थोडा थोडा लिखना शुरू करने की सोच रहा हूँ, आशा है की आपको ये कहानी पसंद आये
 


सावधान........... ये कहानी समाज के नियमो के खिलाफ है क्योंकि हमारा समाज मा बेटे और भाई बहन के रिश्ते को सबसे पवित्र रिश्ता मानता है अतः जिन भाइयो को इन रिश्तो की कहानियाँ पढ़ने से अरुचि होती हो वह ये कहानी ना पढ़े
 


मेरा नाम क्या है ये मैं आपको बाद में बताऊंगा पर पहले थोडा बाकी लोगो के बारे में भी बता देता हूँ

60 का दशक, कहानी शुरू होती है, भारत के बीचो बिच बसे मध्य प्रदेश के एक छोटे से गाँव करमपुर से, लगभग एक हज़ार लोगो की आबादी वाला वो छोटा सा गाँव भारत के अन्य गाँवो की तरह ही उस समय जीवन जीने की जरूरी सुविधाओं से महरूम था, पुरे गाँव में कोई स्कूल नही था या ये कहें की आस पास के 4-5 गाँवो में भी कोई स्कूल नही था, और यही वजह थी कि पुरे गाँव में एक भी आदमी पढ़ा लिखा नही था, सिवाय लाला रोशन लाल को छोडकर, गाँव में कोई हॉस्पिटल नही था, सिर्फ एक वेदजी थे जो छोटी मोटी बिमारियों का इलाज अपनी जड़ी बूटियों से कर दिया करते थे, हालंकि पानी की समस्या नही थी क्यूंकि गाँव के बाहर ही एक नदी बहती थी, जहाँ से महिलाएं पानी भर लिया करती थी, बिजली तो उस समय कई शहरो में भी नही पहुंची थी तो गाँवो में तो लोगो को बिजली के बारे में कुछ पता ही नही था, गाँव के ज्यादातर लोगो का जीवन खेती करके ही चलता था, लगभग सभी लोगो के घर कच्चे और टूटे फूटे थे,

पुरे गाँव में सिर्फ और सिर्फ एक घर था जो पक्का था, क्यूंकि वो गाँव के साहूकार का था, उसकी एक पुस्तैनी हवेली थी जो इस पुरे गाँव में पक्के मकान के नाम पर एकमात्र इमारत थी, उसकी एक राशन की दुकान थी, जिस पर पुरे गाँव वालो को राशन का सामन लेने के लिए निर्भर रहना पड़ता था क्यूंकि इसके अलावा पुरे गाँव में कोई दुकान नही थी, वैसे तो उसका नाम रोशन लाल था पर गाँव के लोग उसे लालाजी के नाम से बुलाते थे,

लाला अक्सर गाँव के लोगो को कर्जा भी दिया करता था, पर ब्याज के नाम पर उनसे बड़ी ही मोटी रकम वसूलता था, लाला बड़ा ही हरामी किस्म का इन्सान था, क्यूंकि एक बार जिसने भी लाला से कर्ज लिया, वो जिंदगी भर के लिए उसका कर्जदार बना रहता था, वो गाँव वालो के अनपढ़ होने का फायदा उठाकर उनके कर्ज को कभी उतरने ही नही देता था, और बेचारे भोले भाले गाँव वाले जिन्दगी भर अपनी कमाई का एक बड़ा हिस्सा उस लाला को ब्याज के रूप में देते थे,

लाला के परिवार के बारे में भी थोडा सा जान लेते है....

लाला रोशन लाल...... उम्र 56 साल..... इसके बारे में तो लगभग उपर बता ही दिया है....

कमला ........लाला की दूसरी बीवी.......उमर 31 साल.... लाला की पहली बीवी से कोई संतान नही हुई थी ... इसलिए लाला ने दूसरी शादी अपने से काफी छोटी लडकी से कर ली थी और अपनी पहली बीवी को अपने घर से निकाल दिया......उसकी दूसरी बीवी कमला को ऐसे शाही हवेली में रहने का बड़ा शौक था... वो अपने नोकरो पर बड़ा हुक्म चलाया करती थी.... खुद को किसी महारानी से कम नही समझती थी....

पूनम ....... कमला की बेटी......उम्र 19 साल........ अपनी माँ की तरह ही काफी नकचढ़ी है..... हमेशा बन संवरकर रहती है.. हुक्म चलाने का इसका भी कम शौक नही है......,.,.,. किसी से सीधे मुंह बात भी नही करती थी... नखरे बड़े ऊँचे थे उसके



सडको के नाम पर सिर्फ कच्चे रस्ते थे, कहीं आने जाने के लिए बैलगाडियों का इस्तेमाल होता था, इस गाँव में एक मात्र गाड़ीवान हरिया था, हरिया 45 साल का गाँव का एक भोला भाला इन्सान था, लाला से कर्ज लेकर उसने अपने लिए दो बैल खरीदे थे, जिनका इस्तेमाल वो अपनी बैलगाड़ी के लिए करता था,



अब थोडा हम हरिया के परिवार के बारे में जान लेते है,

हरिया.........45 साल का एक अधेड़ उम्र का आदमी, चूँकि गाँव का एकमात्र गाड़ीवान है इसलिए अक्सर महीने में 20-25 दिन गाँव से बाहर ही रहना पड़ता था, क्यूंकि उस ज़माने में कोई गाड़ी मोटर तो थी नही इसलिए अगर कहीं दूर की सवारी आ जाये तो मजिल पर पहुंचने में कई कई दिन लग जाते थे, लाला के कर्ज के बोझ तले दबा जरुर था पर फिर भी गुज़ारा ठीक ठाक हो जाता था,

सुधिया ......... हरिया की बीवी.......उमर 32 साल..... अपने परिवार को चलाने के लिए अपने पति का हाथ बताती थी.... हरिया जहाँ एक और बैलगाड़ी चलाकर पैसे कमाता था... वही दूसरी और सुधिया अपनी बेटी के साथ मिलकर खेती बड़ी का काम सम्भालती थी.... हरिया का खेत गाँव के थोडा सा बाहर की तरफ था... सरला अपनी बेटी के साथ मिलकर सुबह सुबह वहाँ जाती और दोपहर का खाना सुबह सुबह ही बनाकर साथ ले जाती.... पुरे दिन भर दोनों माँ बेटी मिलकर काम करते, और शाम को खेत से लोटकर घर आते

नीलू ............. हरिया का बेटी .......उमर 16 साल ......बड़ी ही खुबसूरत लडकी...... पर गरीबी के चलते अपनि इच्छाओ को दबाकर रखती है.......अपनी माँ के साथ खेती बाड़ी का काम सम्भालती है...... जैसे जैसे कहानी आगे बढ़ेगी... इसके बारे में और जानने को मिलेगा.....



हरिया का एक बड़ा भाई भी है.... रामू ......हरिया और रामू के घर एक दुसरे के ज्यादा दूर नही थे ...... रामू के परिवार की हालत हरिया से थोड़ी सी बेहतर थी..... क्यूंकि रामू लालाजी की दुकान पर नोकर का काम किया करता था..... इसलिए लाला की थोड़ी बहुत कृपा उस पर रहा करती थी..... रामू और हरिया की एक दुसरे से कम ही बना करती थी... एसा क्यूँ था ये तो आगे कहानी में आपको पता चल ही जायेगा......

पर पहले रामू के परिवार के बारे में भी हम अब थोडा सा जान लेते है....

सरला ...... रामू की बीवी..... उम्र 34 साल .... सुधिया की तरह ही ये भी खेती का काम सम्भालती है...... पर ये अपने बेटे के साथ खेती बड़ी का काम करती है... इनका खेत भी हरिया के खेत के पास था... क्यूंकि उसी खेत का बंटवारा करके दोनों भाइयों में बाँट दिया गया था.....

राजेश उर्फ़ राजू ....... रामू का बेटा....... उम्र 17 साल ...... अपनी माँ के साथ खेती का काम सम्भालता है... बाकि इसके बारे में आगे कहानी में पता चलेगा

चंदा ....... रामू की बेटी...... उमर 16 साल ....... कभी कभी अपनी माँ और भाई के साथ खेत में चली जाती है... या फिर कभी कभी अपने पिता के कहने पर लालाजी के घरवालो के कपड़े धोने का काम कर दिया करती थी....



बाकि किरदार जैसे जैसे कहानी आगे आगे बढ़ेगी वैसे आते जायेंगे, अपने बारे में भी मैं आप लोगो को जल्दी ही बताऊंगा

सुनसान सड़क थी, चारो तरफ अँधेरा फैला हुआ था, हरिया अपनी बैलगाड़ी में सवार होकर भोपाल से वापस अपने गाँव की तरफ जा रहा था, दरअसल वो किसी सवारी को भोपाल लेकर आया था और अब उसे वहां छोड़कर वो वापस अपने गाँव की तरफ जा रहा था, 4 दिन का रस्ता था, और वो पिछले 3 दिन से अपनी बैल गाड़ी में बैठकर वापस करमपुर की तरफ आ रहा था,

हरिया अपनी मस्ती में लालटेन की रौशनी में बैठा बैलगाड़ी को हांके जा रहा था, कि तभी अचानक उसे उस कच्ची सी सडक के बाजु में कुछ हलचल सी नजर आई.... पहले तो वो बहुत ही डर गया क्यूंकि उस समय भूतो चुडैलो में लोगो का काफी अन्धविश्वास हुआ करता था.. पर फिर उसने थोड़ी सी हिम्मत की और थोडा सा और पास गया.... जैसे ही वो थोडा करीब पहुंचा उसकी नज़र झाड़ियो के बिच उलटी पड़ी एक टूटी फूटी कार पर जा गिरी.... कार को देख कर लग रहा था कि शायद कोई हादसा हुआ है.... हरिया जल्दी से अपनी बैल गाड़ी से उतरा और कार के पास गया.... उसने कार के अंदर देखा पर उसे कोई भी नज़र नही आया..... हरिया कार के आस पास देखने लगा और तभी अचानक उसे एक आदमी कार से थोड़ी ही दुरी पर बेहोश नज़र आया... हरिया जल्दी से उसके पास गया और उसे पलटा...

“ये तो एक बच्चा है......” हरिया के मुंह से अकस्मात ही निकल पड़ा...

ये मैं था.... मेरी उमर 15 साल है.....

आप लोग सोच रहे होंगे कि मैं यहाँ इस सुनसान जंगल में कैसे पहुंचा.. मेरा एक्सीडेंट कैसे हुआ.... ये सब जानने के लिए आपको अगली अपडेट का इंतज़ार करना होगा
 


हरिया ने मुझे तुरंत अपनी गोद में उठाया और अपनी बैलगाड़ी में लेटा दिया.... मैं अभी भी बेहोशी की हालत में पड़ा था... हरिया ने अपनी बैलगाड़ी की रफ्तार जितनी हो सकती थी बढ़ा दी, जल्द ही हम पास के एक गाँव में पहुंच गये, हरिया ने सडक किनारे आग ताप रहे कुछ लोगो से उस गाँव के वेदजी का पता पूछा और फटा फट गाड़ी को उस तरफ मोड़ दिया, जल्दी ही बैलगाड़ी उस गाँव के वेदजी के यहाँ पहुंच चुकी थी....

हरिया अंदर जाकर वेदजी को बाहर बुला लाया, वेदजी ने जब मेरी हालत देखी तो वो भी एक बार को भोच्क्के रह गये, हरिया और वेद्जी मिलकर मुझे उठाते हुए अंदर ले गये, वेदजी और उनकी पत्नी ने जल्द ही मेरा उपचार शुरू कर दिया..... मेरे सर पर गंभीर चोट लगी थी, और जिस्म पर यहाँ वहाँ चोट के निशान थे,

लगभग 2 दिन बाद जाकर मुझे होश आया..... आँखे खोलते ही मेरे जिस्म में दर्द की एक तेज़ लहर दोड गयी... और मुंह से दर्दभरी आह निकल गयी.... मेरी आह इतनी तेज़ थी कि उसे सुनकर बाहर से हरिया और वेदजी भी भागकर अंदर आ गये.... उन्होंने मुझे होश में देखा तो उनके चेहरे पर भी थोड़ी मुस्कान आ गयी.... पर मेरी हालत यहाँ बहुत ख़राब थी... पुरे शरीर में दर्द की लहरे उठ रही थी... मैंने बड़ी मुश्किल से अपनी आँखे खोली.... तो सामने दो आदमी खड़े दिखाई दिए.... मैं उन्हें नही जानता था..... और जानता भी कैसे मैंने अपनी ज़िन्दगी में पहली बार उन्हें देखा था...........

अब मैंने थोड़ी हिम्मत करके बैठने की कोशिश की पर मेरे शरीर में शायद अभी इतनी ताकत नही थी कि मैं खुद से उठकर बैठ जाऊ.... तभी वेदजी आगे बढकर मुझे सहारा देने लगे....... हरिया ने भी उनकी मदद की... और किसी तरह मैं बैठ गया.... मैं उन दोनों की तरफ हैरानी से देखे जा रहा था....

वेदजी – बेटा, अब कैसी तबियत है तुम्हारी....

मैं – ठीक....है...पर आप लोग कौन है.... मैं यहाँ कैसे आया....ये कोंनसी जगह है.....

हरिया – बेटा, मैं तुम्हे यहाँ लेकर आया हूँ... तुम्हारी गाड़ी का हादसा हो गया था... और तुम मुझे वहां बेहोश मिले... तुम्हे बहुत ज्यादा चोट लगी थी... इसलिए मैं तुम्हे यहाँ उठाकर अपनी बैलगाड़ी में ले आया.... वैसे बेटा तुम्हारा नाम क्या है... तुम कहाँ के रहने वाले हो.. तुम्हारी गाड़ी का हादसा कैसे हुआ......

मैं – जी....जी...मेरा नाम.....?????????? मेरा नाम......मेरा नाम क्या है..... मुझे कुछ याद क्यूँ नही आ रहा..... मेरा नाम ???????????

और अचानक मेरे सर में दर्द की एक तेज़ लहर दौड़ गयी और मैं फिर से बेहोश हो गया.......

हरिया और वेदजी ने मिलकर मुझे दोबारा लेटाया और खुद वहाँ से बाहर आ गये

हरिया – क्या लगता है वेदजी... क्या हुआ है इस बच्चे को.....

वेदजी – देखो हरिया.. मैं पक्के तोर पर तो नही कह सकता पर मुझे लगता है कि शायद सर पर चोट लगने की वजह से इस लडके की यादाश्त चली गयी है.. देखा नही कैसे अपने नाम को याद करने की कोशिश कर रहा था.....वैसे इसके कपड़ो और चेहरे को देखने से लगता है ये किसी रईस खानदान का लड़का है....

हरिया – लग तो मुझे भी यही रहा है वेदजी.. पर अब क्या किया जाये... मुझे लगा था कि जैसे ही इसे होश आएगा.. मैं उससे उसका पता पूछकर घर छोड़ आऊंगा... पर इसे तो अपना नाम तक याद नही है.... क्या आप इसे यहाँ रखकर इसका इलाज कर सकते है... मैं ठीक होते ही इसे यहाँ से ले जाऊंगा...

वेदजी – बात तो तुम्हारी नेक है .... पर मुझे माफ़ करना हरिया... मैं इसे अपने यहाँ नही रख सकता... घर की हालत तो तुम पहले से ही देख रहे हो... बड़ी मुश्किल से मेरा और मेरी पत्नी का गुज़ारा चल पता है... ऐसे में इसे यहाँ रखकर इलाज करना तो नामुमकिन है हमारे लिए

हरिया – ठीक है फिर वेदजी... मैं इसे अपने साथ ही ले जाता हूँ.... पर आप 6 -7 दिन और इसका इलाज कर दीजिये.... ताकि सफ़र के लायक होने पर मैं इसे यहाँ से ले जाऊ....

वेदजी – ठीक है हरिया... अगर बात 6-7 दिनों की है, तो मैं इसे यहाँ रख सकता हूँ...

हरिया – बहुत बहुत शुक्रिया वेदजी

......................................................

2-3 दिनों बाद ही वेदजी की जड़ी बूटियों ने अपना असर दिखाना शुरू कर दिया, लगभग तीसरे दिन मुझे होश आया.... पर इस बार मेरी हालत में थोडा सुधार था.. और दर्द में भी कमी थी... पर अब भी मुझे कुछ याद नही आ रहा था कि मैं कौन हूँ.. कहाँ रहता हूँ.. मेरे माँ बाप कौन है.... मैं यहाँ कैसे पहुंचा....

मेरी हालत हरिया से भी छिपी नही थी... इसलिए हरिया मेरे पास आकर बैठा और बोला

हरिया – देखो बेटा, तुम चिंता मत करो... सब ठीक हो जायेगा.... भगवन ने चाहा तो जल्द ही तुम्हारी यादाश्त वापस आ जाएगी....

मैं – आपने जो मेरे लिया किया उसके लिए मैं आपका एहसान मंद रहूँगा.... पर मुझे बिलकुल भी समझ नही आ रहा कि मैं अब क्या करूं.. कहाँ जाऊ...

हरिया – तुम इस बात की बिलकुल फ़िक्र नही करो.. जब तक तुम्हे तुम्हारी यादाश्त वापस नही आ जाती तब तक तुम मेरे साथ मेरे घर रहोगे.....

मैं – पर मैं कैसे... पहले ही मेरी वजह से आपको इतनी तकलीफ उठानी पडी गयी है.. मैं नही चाहता कि अब आपको और तकलीफ उठानी पड़े.....

हरिया – इसमें तकलीफ कैसे... तुम तो मेरे बेटे जैसे हो.... और वैसे भी एक इन्सान की मदद करना तो दुसरे इन्सान का फ़र्ज़ बनता ही है....

मैंने काफी कोशिश कि मना करने की पर हरिया की जिद के आगे मेरी ना चली.. आखिर में मुझे हारकर उसकी बात माननी ही पड़ी.... मेरी रजामंदी सुनकर हरिया काफी खुश हुआ......

हरिया भी दरअसल मुझमे अपना बेटा ढूंढ रहा था.. क्यूंकि उसके कोई बेटा नही था सिर्फ एक बेटी थी.... पर हरिया के इस मिलनसार व्यव्हार से मुझे बहुत अच्छा महसूस हुआ......

मैं – पर मैं आपको क्या बुलाऊ...... और आपका नाम क्या है...

हरिया – मेरा नाम हरिया है... मैं यहाँ से 1 दिन की दुरी पे बसे हुए छोटे से गाँव करमपुर में रहता हूँ... चूँकि तुम मेरे बेटे की उमर के ही हो इसलिए तुम चाहो तो मुझे चाचाजी बुला सकते हो.......

मैं – ठीक है चाचाजी..... पर आप मुझे क्या बुलायेगे???

हरिया – अगर मेरा कोई बेटा होता तो मैं उसका नाम समीर रखता..... इसलिए मैं आज से तुम्हे समीर ही बुलाऊंगा... क्यूँ ठीक है ना समीर बेटा ...

मैं – जी जैसा आप ठीक समझे......

लगभग 7 दिनों में मेरे शरीर के ज्यादातर घाव भर चुके थे..... और अब मैं हरिया चाचा के साथ उनके घर जाने के लिए बिलकुल तैयार था..... हमने वेदजी को उनकी सहायता के लिए बहुत बहुत धन्यवाद दिया और फिर हरिया चाचा की बैलगाड़ी में बैठकर करमपुर की ओर निकल गये.....

और यहीं से मेरे जीवन की एक नयी शुरुआत हुई.......................

 


पुरे रस्ते हरिया चाचा मुझे अपने परिवार के बारे में बताते रहे... मैं उन सबके बारे में सुनकर बड़ा ही नर्वस फील कर रहा था....

“कहीं उन लोगो ने मुझे वहाँ रहने से मना कर दिया तो..कहीं मैं उन्हें पसंद नही आया तो.... मैं ऐसे में कहाँ जाऊंगा...क्या करूँगा” ये सब सोच सोच कर मैं परेशान हुए जा रहा था... शायद हरिया चाचा ने भी मेरी परेशानी महसूस कर ली....

हरिया – चिंता मत करो समीर बेटा .... सुधिया और नीलू को तुम जरुर पसंद आओगे....

हरिया चाचा की बात सुनकर मैं थोडा सा अच्छा महसूस करने लगा....

पुरे रस्ते चाचा ने मुझे अपने परिवार और गाँव के बारे में काफी कुछ बता दिया......

और आखिर कार वो वक्त भी आ गया जब हम करमपुर की सरहद में दाखिल हो चुके थे...शाम का वक्त हो चला था... पल पल मेरे दिलो की धडकन और भी तेज़ होती जा रही थी...... गाँव बहुत ही छोटा सा था...सभी घर टूटे फूटे नज़र आ रहे थे.... मुझे थोडा सा अजीब महसूस हो रहा था... शायद नयी जगह की वजह से

और फिर वो वक्त आया जब हरिया चाचा के मुंह से निकला “समीर बेटा, उतरो.. अपना घर आ गया है”

मैं बैलगाड़ी से निचे उतरा.... सामने एक कच्चे ढांचे का टुटा फूटा सा मकान दिखाई दे रहा था... घर के पास ही एक छोटा सा बाड़ा था.. जिसमे हरिया चाचा अपनी बैल बांध रहे थे... वहा घास फूस और पथरों की मदद से एक छोटा सा कमरा भी बना था... शायद घर का फालतू सामान रखने के लिए...

मैं अभी घर को निहार ही रहा था कि हरिया चाचा बैल को बांधकर मेरे पास आ गये

हरिया – क्या हुआ समीर बेटा, घर पसंद नही आया क्या......

समीर – नही ऐसी कोई बात नही.... वो तो बस नयी जगह है न इसलिए

हरिया – चलो अंदर चलो... तुम्हारी चाची को तुम जरुर पसंद आओगे...

हरिया चाचा मुझे अंदर ले आये.......... जैसे ही हम अंदर पहुंचे मुझे घर के एक कोने में एक कच्चे टूटे फूटे चूल्हे पर रोटी बनाती एक लडकी दिखी, मुझे समझते देर ना लगी कि शायद ये नीलू है.. हरिया चाचा की बेटी...

नीलू ने जैसे ही अपने पिता को देखा.... वो उठकर खड़ी हो गयी.. और भागकर हरिया चाचा के गले लग गयी....

नीलू – इस बार आने में बहुत दिन लगा दिए बापूजी ...... माँ और मैं बहुत परेशान हो गये थे

हरिया – हाँ बेटा , काम ही कुछ ऐसा आ गया था....

मैंने आज पहली बार नीलू को देखा.... उसका बदन बिलकुल गोरा और दुधिया था, और दिखने में वो बहुत ही ज्यादा खूबसूरत थी, तीखे नैन नक्श, दमकता गोरा चिट्टा चेहरा और गुलाबी रसीले होंठ, छोटे छोटे अमरूद जैसी सुंदर सुंदर चुचियाँ, पतली गोरी कमर, उभरी हुई गांड, भरी मांसल जाँघे और उसके कच्चे यौवन की मादक खुशबू जो किसी भी मर्द का मन बहका सके , मैंने जब उसे इतने करीब से देखा तो देखता ही रह गया..... वो दिखने में किसी अप्सरा से कम नही लग रही थी....

तभी मैंने महसूस किया कि नीलू भी मुझे घूरकर देख रही है........ मैंने तुरंत अपनी नज़रे निचे कर ली और थोडा सकपका गया

नीलू – बापूजी... ये लड़का कौन है.....

हरिया – बेटा.... इसके बारे में मैं तुझे बाद में बताऊंगा पर पहले ये बता कि तेरी माँ कहाँ है... मुझे तुम दोनों से कुछ जरूरी बात करनी है...

नीलू – माँ तो अभी अपनी पड़ोसन है ना रजनी मोसी, उनके पास गयी है... कुछ देर में आती ही होंगी

हरिया – अच्छा तो तू एक काम कर .... हमारे खाने का भी इन्तेजाम कर ...तब तक हम दोनों हाथ मुंह धोकर थोडा आराम करते है..

नीलू – जी ठीक है बापूजी...

ये कहकर नीलू ने दोबारा एक बार भरपूर नज़र से मुझे देखा और जाकर खाने की तैयारियो में लग गयी... हरिया चाचा ने मुझे उनका एक छोटा सा जो टुटा फुटा बाथरूम था, उसका रास्ता दिखा दिया.. मैंने भी जल्दी ही अपने हाथ मुंह धो लिया, हरिया चाचा मुझे एक कमरे में ले आये... कुल मिलाकर दो ही तो कमरे थे.... शायद एक में हरिया चाचा और उनकी बीवी रहती होंगी और दुसरे में उनकी बेटी.... मैं हरिया चाचा के साथ उनके रूम में आ गया... हरिया चाचा ने मुझे कुछ देर आराम करने को कहा ... मैंने भी सफ़र की थकान की वजह से थोडा आराम करना ही बेहतर समझा...

करीब 1 घंटे आराम के बाद अचानक मेरी आँख खुल गयी.... मुझे बाहर कुछ आवाज़े सुनाइ दे रही थी.. शायद हरिया चाचा की बीवी वापस आ चुकी थी.. और चाचा उन्हें मेरे बारे में बता रहे थे.. मुझे जो सुन रहा था मैं आप लोगो को भी बता देता हूँ

हरिया चाचा – देखो सुधिया.... वैसे भी भगवान ने हमें बेटा नही दिया.. कल को जब नीलू शादी करके दूजे घर चली जाएगी तब ये ही हमारे काम आएगा

सुधिया – पर इसका मतलब ये तो नही कि आप किसी भी ऐरे गैरे को यहाँ लाकर रख लेंगे... भले ही ये अपनी यादाश्त खो चूका है पर क्या पता ये पहले क्या था. हो सकता है कि कोई चोर रहा हो...

हरिया – कैसी बाते करती हो ... इसकी गाड़ी का हादसा हुआ था.. जब इसके पास गाड़ी है तो ये चोर कैसे हो सकता है

सुधिया – पर फिर भी ना जाने मेरा मन क्यूँ नही मान रहा...

हरिया – अच्छा एक काम करते है... कुछ दिन इसे यहाँ रहने देते है.. उसके बाद आगे देखा जायेगा.. पर जब तक ये यहाँ है इसके साथ थोडा अच्छे से पेश आना

सुधिय – ठीक है... कुछ दिनों की बात है तो मैं आप जैसा कहेंगे वैसे ही करूंगी... वैसे पहले मैं उसे देख तो लूँ

हरिया – हाँ ठीक है ... वैसे भी अब खाना खाने का वक्त हो गया तो तुम अंदर जाकर उसे खाना दे आओ और मिल भी आओ...

फिर मुझे बर्तनों की थोड़ी आवाज़ सुनाइ दी.. और जल्द ही सुधिया एक थाली में मेरे लिए खाना लेकर आ गयी, लालटेन की रौशनी में मुझे सुधिया साफ साफ दिखाई दे रही थी....

सुधिया - कैसे हो बेटा ……अब दर्द तो नही हो रहा…..

मैं - नही ….अब ठीक हूँ….

मैंने अपने मासूम से चेहरे से सुधिया की ओर देखते हुए कहा….और फिर अपनी नज़रे नीचे कर ली………सुधिया मुझे एक टक देखे जा रही थी…जिसकी वजह से मैं थोड़ा नर्वस फील कर रहा था…और अपनी हाथों की उंगलयों को आपस मे दबा रहा था..

सुधिया – अच्छा ये लो खाना खा लो... वैसे भी सुबह से भूखे होगे तुम

मैंने थाली लेने के लिए जैसे ही हाथ थोडा सा आगे बढाया मेरे हाथ में अचानक तेज़ दर्द हो उठा......... सुधिया ने जल्दी से थाली को साइड में रखा और मेरे पास आकर बैठ गयी.........

सुधिया – क्या हुआ बेटा, अभी भी दर्द हो रहा है क्या.......

मैं – जी थोडा थोडा... मैंने बड़ी ही मासूम सी शक्ल बनाते हुए कहा

सुधिया – लाओ मैं तुम्हे अपने हाथों से खाना खिला दूँ...

फिर सुधिया मुझे अपने हाथों से खाना खिलाने लगी.... इस बिच सुधिया लगातार मुझे ही देखे जा रही थी... शायद मेरे मासूम गोरे और सुंदर चेहरे को देखकर सुधिया के मन में ममता जाग उठी....

इधर हरिया और नीलू भी कमरे में आ गये और सुधिया को मुझे खाना खिलते हुए देखने लगे

सुधिया को इतने प्यार से खाना खिलाते देख मेरी आँखों में आंसू आ गये

सुधिया –क्या हुआ बेटा, तुम्हारी आँखों में आंसू क्यों???

मैं – जी, मुझे अपनी माँ की याद आ गयी... शायद मेरी भी कोई माँ होंगी.. या नही .. मुझे तो ये भी याद नही....

मेरी बात सुनकर सुधिया का दिल पसीज गया.... उसने झट से मुझे अपने गले लगा लिया...... और बोली

सुधिया – तुम चिंता मत करो बेटा, आज से मैं तुम्हारी माँ हूँ, और यही तुम्हारा परिवार है

ये सुनकर मेरे साथ साथ हरिया और नीलू भी बड़े खुश हुए

उस दिन मैं बड़ा खुश था..... मुझे एक नया परिवार मिल गया था.... अगले ही दिन सुधिया ने पुरे गाँव में ये खबर फैला दी कि उन्होंने मुझे गोद ले लिया है....

धीरे धीरे समय गुजरता गया... मेरे जख्म पूरी तरीके से भर चुके थे.... मैं भी अपनी पिछली जिन्दगी को पूरी तरह से भूल चूका था या यूँ कहे कि भूली हुई जिन्दगी के बारे में अब सोचना ही बंद कर दिया था.. धीरे धीरे मैं गाँव के लोगो से भी घुलने मिलने लगा... मेरे कुछ दोस्त भी बन चुके थे... अब मैं सुधिया को माँ और हरिया को बापूजी कहकर बुलाता था.... वो दोनों भी मुझे बहुत प्यार करते थे.......

 


मुझे उस गाँव में रहते हुए करीब 1 साल का वक्त बीत चूका था, मैं अपनी पुरानी जिंदगी लगभग भूल ही चूका था, और अपनी इस नयी जिंदगी को ही पूरी तरह अपना चूका था, मैं यहाँ बहुत ही ज्यादा खुश था, बापूजी और माँ मुझे बहुत प्यार करते थे, नीलू दीदी भी मुझे पसंद करती थी, पर कभी कभी मुझे लगता कि शायद वो मुझे थोड़ी अजीब नजरो से देखती है, मैं अपनी इस नई ज़िन्दगी में पूरी तरह रम गया था,

मुझे रामू ताउजी के परिवार के बारे में भी सब पता चल गया था, सरला ताई, राजू भैया और चंदा दीदी भी मुझसे बहुत प्यार से बाते करते थे, पर रामू ताउजी मुझसे थोड़े खफा खफा से रहते थे, मैंने महसूस किया कि वो बापूजी से भी सीधे मुंह बात नही करते, ऐसा क्यूँ था, ये तो मैं नही जानता, पर हाँ ताउजी के अलावा सभी लोग मुझसे प्यार करते थे, और इसीलिए मैं अक्सर उनके घर जाया करता था, राजू भैया से मेरी बहुत जमती थी,

कभी कभी मैं माँ और नीलू दीदी के साथ खेत में भी जाया करता, मुझे खेती बाड़ी के बारे में कुछ भी नही पता था, माँ और दीदी ने मुझे कुछ ही महीने में पूरा किसान बना दिया, मुझे खेती का पूरा ज्ञान हो चूका था, पर फिर भी ना जाने क्यूँ मेरा मन खेती बाड़ी में कम ही लगता था, और ये बात माँ बापूजी भी जानते थे, इसलिए वो मुझे खेत जाने के लिए कभी भी मजबूर नही करते थे, जब मेरी इच्छा होती तभी मैं खेत जाता, वरना अपने दोस्तों के साथ गुली डंडा खेलने निकल जाता,

वैसे तो मेरे 1 साल में काफी दोस्त बन चुके थे, पर उनमे से मेरा सबसे खास दोस्त चमकू था, वैसे तो उसका नाम मोहन था, पर सारे गाँव में वो चमकू के नाम से ही मशहुर था, उमर में मुझे कोई एक आध साल बड़ा होगा, वैसे तो गाँव के बाकि लडको की तरह वो भी गाली गलोच वाली भाषा का ही इस्तेमाल करता था, पर फिर भी दिल का बड़ा अच्छा था, अक्सर हम शाम को गुली डंडा खेलने जाते थे.......

ऐसे ही एक दिन मैं चमकू और बाकि दोस्तों के साथ गुली डंडा खेल रहा था, की तभी गुली उछलकर मेरी तरफ आई, मुझे गुल्ली का कैच पकड़ना था, पर मेरे हाथो से गुल्ली छुट गयी, चमकू जो मेरी टीम में था, उसने जोर से चिल्लाकर मुझे गाली दी

चमकू – ओ तेरी बहन दी साले, गुल्ली नही पकड़ी जाती तो खेलता क्यूँ है, तेरी वजह से मैं दो आने हार गया

मैं - यार क्या करूँ…..छुट गया अपने आप….

चमकू – क्यों साले, गुल्ली पकड़ते टेम हाथ कांप रहे थे क्या, जरुर साला कल मुठ मारा होगा, तभी हाथ कांप रहे है तेरे, या कोई फुद्दी में हाथ घुसा रखा था साले

मैं ये शब्द पहली बार सुन रहा था इसलिए मुझे बड़ा ही अजीब सा लगा, मैंने उस टाइम तो कुछ नही कहा पर जब मैं और चमकू वापस घर की तरफ आ रहे थे तब मैंने उससे पूछा

मैं – चमकू, यार ये फुद्दी और मुठ क्या होता है

चमकू - (हंसते हुए) अरे क्या नवाब साहिब, आप को फुद्दी और मुठ मारने का भी नही पता

मैं – नही यार मुझे सच में नही पता

चमकू – अब फुद्दी तो मैं तुझे नही दिखा सकता, पर हाँ मुठ मारना जरुर सिखा सकता हूँ, बोल सीखेगा

मैं – हाँ क्यों नही सिखा ना

चमकू ने एक बार मेरी तरह मुस्कुरा कर देखा और एक कोने में ले जाकर चारो तरफ देखते हुए अपनी निक्कर की ज़िप खोल दी, और उसमे से अपना 3 इंच का सुस्ताया सा लंड बाहर निकाल लिया,

और अपने हाथ से अपने लंड को पकड़ कर मुझे दिखाते हुए बोला – देख समीर, इसे लंड कहते है,

चमकू – पर ये तो नुन्नी है ना,

चमकू – अरे नुन्नी तो बच्चो की होती है बहनचोद, मर्दों का लंड होता है,

मैं हैरत भरी नजरो से कभी उसे और कभी उसके लंड को देखता

चमकू – अब देख ध्यान से, अब मैं तुझे मुठ मारना सिखाता हूँ

चमकू ने अपने हाथ में थोडा सा थूक लगाया और अपने लंड पर मलने लगा, धीरे धीरे उसका लंड खड़ा होने लगा और देखते ही देखते वो ३ इंच से बढकर 5 इंच के करीब हो गया, चमकू अपने हाथ को अपने लंड पर कसकर लंड की चमड़ी को आगे पीछे कर रहा था, मैं बड़े ही ध्यान से उसे देख रहा था, कुछ ही पल में चमकू के लंड से सफेद से पानी धार निकलने लगी, ये देखकर मुझे बड़ा ही अजीब सा लगा, क्यूंकि मुझे तो लगा था कि नुन्नी से सिर्फ और सिर्फ मूत ही निकलता है, पर आज पहली बार नुन्नी से कुछ सफेद सफेद सा निकलते देखा,

चमकू के चेहरे पर अजीब सी ख़ुशी के भाव छलक रहे थे,

मैं – चमकू, ये तेरी नुन्नी... मेरा मतलब तेरे लंड से अभी अभी क्या निकला, वो सफेद सफेद

चमकू – इसे वीर्य कहते है, और जब ये वीर्य किसी लडकी की फुद्दी में जाता है ना तो उससे बच्चा पैदा होता है, समझा

मैं चमकू की बाते ऐसे सुन रहा था मानो वो कोई अमृत ज्ञान बाँट रहा हो,

उस दिन और कुछ खास नही हुआ और मैं अपने घर आ गया, थोड़ी देर बाद माँ दीदी भी घर आ गये, बापूजी किसी सवारी को लेकर भोपाल गये हुए थे, इसलिए उन्हें आने में कम से कम 4-5 दिन और लगने थे,

सुधिया – आज क्या किया पूरे दिन मेरे लल्ला ने

मैं - कुछ खास नही किया माँ, बस दोस्तों के साथ ही घूम रहा था

सुधिया – आजकल तू अपने दोस्तों के साथ बहुत घुमने लगा है, खेत में आ जाया कर कभी कभी

मैं – ठीक है माँ, मैं कल चलूँगा आप दोनों के साथ

सुधिया – चल ठीक है, अब मैं खाना बना लेती हूँ, फिर आराम से सो जाना, कल खेत में भी चलना है तुझे

मैं – ठीक है माँ

कुछ ही देर में माँ और नीलू दीदी ने मिलकर खाना बना लिया, जल्दी ही हम तीनो ने मिलकर खाना खाया और फिर सोने के लिए चले गये

मैं और नीलू दीदी एक ही कमरे में सोते थे, चूँकि घर में एक ही चारपाई थी जो माँ बापू के कमरे में थी, इसलिए मैं और नीलू दीदी जमीन पर ही गद्दा बिछाकर सोया करते थे,

उस रात भी मैं खाना खाकर कमरे में आ गया और निक्कर बनियान पहनकर सो गया, चूँकि गर्मियों के दिन थे इसलिए अक्सर मैं निक्कर बनियान में ही सो जाया करता था,

कुछ देर बाद नीलू दीदी भी आकर मेरे बाजु में लेट गयी,

रात के तकरीबन 12 बज रहे थे, मेरी आँखों से नींद कोषों दूर थी, क्यूंकि आज दिन में चमकू ने जो कुछ मुझे बताया उसके बाद से वो बाते मेरे दिमाग में ही घूम रही थी,

मैंने साइड में देखा तो नीलू दीदी मेरी तरफ पीठ करके लेटी हुई थी, इधर मुझसे अब बर्दास्त करना मुश्किल हुआ जा रहा था,

मैंने धीरे से उठकर नीलू दीदी की आँखों को देखा, ये निश्चित करने के लिए की वो सो रही है, नीलू दीदी की आँखे बंद दी, मैंने हलके से आवाज़ लगाई, पर नीलू दीदी का कोई जवाब नही आया, अब मैं बिलकुल निश्चित हो चूका था कि नीलू दीदी सो रही है

मैंने धीरे से अपनी निक्कर के बटन खोले और बड़ी ही सावधानी से अपनी निक्कर को निचे करने लगा, जल्द ही मेरी निक्कर मेरे घुटनों तक उतर चुकी थी, गर्मी की वजह से मैं अंदर कच्छा नही पहनता था, इसलिए निक्कर उतरते ही मेरा लंड पूरी तरह से नंगा हो चूका था,

मैंने अपने लंड की तरफ देखा, वो अभी मुरझाया हुआ सा था, या यूँ कहूँ कि इस एक साल में मैंने अपने लंड को हमेशा मुरझाया हुआ ही देखा है, मैंने अपने हाथ की अंगुलियों पर थोडा सा थूक लगाया और फिर कांपते हुए अपने हाथ को अपने लंड पर लगा दिया, थूक को लंड के सुपाडे पर अच्छी तरह मलने के बाद अचानक मुझे मेरे लंड में तनाव सा महसूस होने लगा, मैंने अपने लंड के चारो और मुट्ठी को कस लिया और फिर धीरे धीरे अपने लंड की चमड़ी को उपर निचे करने लगा

मुझे पता नही था पर ना जाने मुझे क्यूँ बहुत अच्छा महसूस हो रहा था, देखते ही देखते मेरे लंड का आकार बढ़ने लगा, और कुछ ही मिनटों में मेरा लंड पूरी तरह तनकर खड़ा था, मुझे ये तो पता नही था कि ये कितने इंच का था, पर देखने में चमकू के लंड से दोगुना लम्बा और लगभग ढाई गुना लग रहा था, एक बार तो मैं भी दर गया कि मेरा लंड इतना बड़ा कैसे है, कहीं मुझे कहीं कोई बीमारी तो नही,

पर फिर मैंने अपना ध्यान उस और से हटाया और दोबारा अपने लंड पर मुठ मारने लगा, मुझे सच में इतना अच्छा फील कभी नही हुआ था, मैं अब तेज़ी से अपने लंड की मुठ मारने लगा, अचानक मुझे ऐसा महसूस हुआ जैसे मेरे लंड में से कुछ निकलने वाला है, मेरे हाथ की गति और भी तेज़ हो गयी, और तभी मेरे लंड से वीर्य की मोटी मोटी पिचकारियाँ निकलने लगी, एक आध पिचकारी तो हवा में बहुत दूर तक गयी, बाकि पिचकारियाँ वहीं बिस्तर पर गिरने लगी, मुझे इतना ज्यादा मजा अपनी पूरी जिंदगी में नही आया था, मेरे लंड से करीब आधे मिनट तक वीर्य निकलता रहा, मुझे बहुत ही ज्यादा मजा आ रहा था, मैंने अपने जीवन की पहली मुठ मारी थी, मेरी आँखों के सामने थोडा अँधेरा सा छा गया

जब पूरी तरह से मेरा वीर्य निकल चूका था, तो मेरे चेहरे पर पूर्ण संतुष्टि के भाव आ चुके थे, मैंने धीरे से अपने निक्कर को उपर किया, पर अभी काम बाकी था, क्यूंकि मेरे लंड से निकला पानी बिस्तर और जमीन पर गिरा था, मैंने धीरे से उठकर कोई कपडा ढूँढने लगा, तभी मेरे हाथ में कोई छोटा सा पतला लाल कपड़ा आ गया, मैंने वो कपड़ा उठाया और बड़ी ही सावधानी से सारा वीर्य साफ करने लगा,

जब सारा वीर्य साफ हो गया तो मैंने वो कपडा वापस वहीं रख दिया और आराम से सो गया

 
ye rhi aaj ki dusri update...

main bdi siddat se is story ki update de rha hu....

plz aap log bhi thoda support krte rhe....

m bahut jaldi jaldi is khani ki updates dunga

agar aap logo ne acche se support kiya to din me 3-4 updates bhi de skta hun
 


अगली सुबह 6 बजे जब मेरी आँख खुली तो देखा...नीलू दीदी मुझे उठा रही थी.....

“उठ जा समीर, देख सुबह हो गयी है, आज तुझे हमारे साथ खेत में भी जाना है”

मैं भी आंख मलता हुआ खड़ा हो गया, रात की खुमारी अब तक शायद उतरी नही थी, इसलिए अभी भी हल्की हल्की नींद आ रही थी मुझे,

“चल जल्दी से जंगल पानी हो आ, और फिर आकर नहा ले” नीलू दीदी बोली

“जी दीदी जा रहा हूँ” ये कहकर मैं भी आखिर कर उठ खड़ा हुआ

थोड़ी देर में ही मैं जंगल पानी करके वापस आ गया, जब मैं वापस आया तो मैंने देखा कि नीलू दीदी बड़ी ही अजीब नजरो से मुझे घुर रही थी जैसे मैंने कोई गलत काम कर दिया हो, पर मैंने इस ओर ज्यादा ध्यान नही दिया और बाथरूम में जाकर नहाने लगा, बाथरूम में जाकर दोबारा मैंने एक बार मुठ मारी और फिर नहाने के बाद मैं दीदी और माँ के साथ खेत में चला गया

जब हम खेत में पहुंचे तो आज वहां बाजु वाले खेत में सिर्फ राजू भैया और चंदा दीदी ही थी, मैं जब भी खेत आता था तो मुझे सरला ताई वहां जरुर नज़र आती थी, पर आज वो वहां नही थी, माँ ने भी ये बात नोट की, इसीलिए हम लोग राजू भैया और चंदा दीदी के पास गये

माँ – अरे राजू बेटा, तुम्हारी माँ कहाँ है आज, खेत में नही आई क्या

राजू – नही चाची, वो आज हमारे मामाजी आये हुए है, इसलिए वो आज घर पर ही है, दोपहर को उनका खाना भी बनाना पड़ेगा ना इसलिए

माँ – अरे, सुमेर आया है, और तेरी माँ ने हमे बताया भी नही

राजू – वो मामाजी आज सुबह ही आये है चाची

माँ – चलो कोई बात नही, आज शाम को जाकर मिल लेंगे उनसे,

राजू – जैसा आप ठीक समझे चाची

फिर हम लोग वापस अपने खेत में आ गये, हमारे खेत में इस बार फसल काफी अच्छी हुई थी, गन्ने का खेत था हमारा, वैसे भी गाँव में ज्यादातर लोग गन्ने की ही खेती करते थे, जब हम लोग वापस आ गये तो माँ अचानक बोली

माँ – हाय राम, मैं तो कुदाली (मिटटी खोदने का ओजार) आज घर पर ही भूल गयी, और आज तो बाड बनाने का काम भी करना है, ऐसे में तो दो कुदाली चाहिए ही चाहिए

नीलू दीदी – राजू से मांग लो ना माँ

माँ – ये तुमने ठीक कहा, समीर बेटा, जा जाकर राजू से दो कुदाली ले आ

मै माँ की बात सुनकर दुबारा राजू भैया के खेत की तरफ चल पड़ा, राजू भैया वहां अपनी कुदाली से कुछ मिटटी खोद रहे थे, मैं उनके पास गया और बोला

मैं – राजू भैया, आपके पास दो कुदाली है क्या, वो आज माँ कुदाली घर ही भूल आई,

राजू – मेरे पास तो एक ही कुदाली है यहाँ, दूसरी तो घर पर पड़ी है, और इस कुदाली से भी मुझे अभी बहुत सा काम करना है......

राजू भैया की बात सुनकर मैं वापस अपने खेत की तरफ मुड गया और जाकर माँ को सारी बात बता दी

माँ – चलो फिर समीर बेटा, एक काम करो, तुम अपने घर से एक कुदाली ले आओ और दूसरी कुदाली अपनी ताई के यहाँ से ले आना, बोल देना मैंने मंगाइ है........

मैं माँ की बात सुनकर वापस घर की ओर चल पड़ा, करीब आधे घंटे पैदल चलने के बाद मैं घर पहुंच गया, मैंने अपनी कुदाली उठाई और दूसरी कुदाली लेने के लिए ताईजी के घर की तरफ चल पड़ा,

ताईजी के घर पहुंचकर जैसे ही मैंने दरवाज़ा खटखटाने के लिए हाथ बढाया तभी मेरे कानो में एक आह की अजीब सी आवाज़ पड़ी, और मेरा हाथ वहीं रुक गया,

“ये कैसी आवाज़ है” मैंने मन ही मन सोचा

मैं अभी सोच ही रहा था कि दोबारा एक और आह की जोरदार आवाज़ मेरे कानो में पड़ी, मुझे बड़ा अजीब लगा, मैंने सोचा कि कही कोई चोर तो नही घुस आया घर में, ये सोचते ही मेरे हाथ पांव काँप गये, मैंने सोचा कि मुझे पहले देखना होगा कि ये कोई चोर ही है या कोई और,

इसलिए मैं छुपकर घर के अंदर जाने की जगह ढूँढने लगा, ताईजी के घर के बिलकुल पास एक बड़ा सा नीम का पेड़ था, मैं तुरंत उस नीम के पेड़ पर चढ़ गया और वहां से ताईजी के घर की छत पर आ गया,

तभी मुझे ख़याल आया कि, सीढ़ियों पर एक रोशनदान है…जो सरला ताई के कमरे का है….मैं बिना कुछ सोचे समझे सीढ़ियों की तरफ गया….और जब दो तीन सीढ़ियों को उतर कर उस घुमाव पर पहुचा…यहाँ से सीढ़ियाँ मुड़ती थी…वहाँ रोशनदान था.. और फिर जैसे ही मैने अंदर झाँका तो, मुझे दुनिया का सबसे अजीब नज़ारा दिखाई दिया….क्योंकि मैं रोशनदान से देख रहा था…इसलिए मुझे नीचे बेड पर किसी आदमी की नंगी पीठ दिखाई दे रही थी…और उस आदमी के कंधे के थोड़ा सा ऊपेर सरला ताई का चेहरा दिखाई दे रहा था….

सरला ताई ने अपनी टाँगो को उठा कर उस सख्स की कमर पर लपेट रखा था…और वो सख्श पूरी रफ़्तार से अपनी कमर को हिलाए जा रहा था… उस समय जो मेरे सामने हो रहा था मैं ये नही जानता था कि, उसे चोदना कहते है..वो सख्स और सरला ताई दोनो पसीने से तरबतर थे….सरला ताई ने अपनी बाजुओं को उस सख्स की पीठ पर कस रखा था…

”ओह्ह्ह्ह सुमेर आज पूरी कसर निकाल दे….बड़े दिनो बाद मौका मिला है…..” सुमेर नाम सुनते ही मुझे जैसे करंट सा लगा,

“ताईजी अपने भाई के साथ ये क्या कर रही है” मेरे दिमाग में विचार कोंधा

“आह बहना ज़ोर तो पूरा लगा रहा हूँ…लेकिन जैसे -2 तेरी उमर बढ़ रही है…साली तेरी फुददी और टाइट और गरम होती जा रही है….जीजा तुझे अच्छे से नही चोदते क्या....ओह्ह देख मेरा लंड कैसे फस- 2 के अंदर जा रहा है….” सुमेर ने और रफतार से झटके लगाने शुरू कर दिए….

मैं उस वक़्त तक एक दम भोला पंछी था….पर ये बात मुझे भी समझ आ चुकी थी कि, वो दोनो जो भी कर रहे है,….दोनो को मज़ा बहुत आ रहा है….

“कहाँ सुमेर, तेरे जीजा तो अब मेरी तरफ देखते भी नही, एक तू ही तो है जो अपनी इस प्यासी बहना की चूत की प्यास बुझा जाता है” ताई ने कहा

इधर सुमेर झटके मारे जा रहा था, चूँकि सुमेर की पीठ मेरी तरह थी और वो खुद ताई के उपर था इसलिए मुझे कुछ भी साफ़ दिखाई नही दे रहा था, पर मेरे लंड में जरुर तनाव आना शुरू हो चूका था,

उधर सुमेर के धक्को की रफ़्तार बढ़ गयी और देखते ही देखते वो ताई पर पूरी तरह से ढह गया, दोनों जने अब लम्बी लम्बी साँसे ले रहे थे, मैं अब बस हटने ही वाला था कि तभी अचानक वो हुआ जिससे मेरे होश फाख्ता हो गये,

सुमेर, ताई के उपर से हट गया और अब ताई मेरी आँखों के सामने पूरी तरह से नंगी होकर लेती थी, मेरे तो दिमाग ने ही काम करना बंद कर दिया था, सरला ताई की चूत से सफेद सफेद कुछ निकल रहा था, मुझे समझते देर ना लगी कि ये जरुर सुमेर के लंड से निकला वीर्य है, तभी सरला ताई थोड़ी पलटी और अपनी चूत को साफ करने लगी

मैंने अपनी जिन्दगी में पहली बार किसी ओरत को नंगा देखा था, और वो भी अपनी सरला ताई को, सरला ताई की रंगत ऐसी थी जैसे किसी ने दूध मे केसर मिला दिया हो…..बिल्कुल गोरा रंग, लाल सुर्ख गाल, मम्मे तो ऐसे कि मानो रब्बर की बॉल्स हो…बिलकुल कसे हुए लग रहे थे….पर सरला ताई की जो चीज़ सबसे ज़्यादा कातिलाना लग रही थी….वो थी उनकी बाहर को निकली हुई गोल मटोल गांड …उनकी गांड और चूत देखकर मेरा लंड तो पेंट फाडकर बाहर आने को तैयार था,

पर ज्यादा देर वहां रहना खतरे से खाली नही था, इसलिए अब मैने वहाँ खड़े रहना मुनासिब नही समझा….और उपर जाने की सोचा, पर जैसे ही मैं उपर जाने को हुआ मुझे ऐसा लगा मानो सुमेर ने मुझे देख लिया हो, मेरी तो गांड फटकर हाथ में आ चुकी थी कसम से, मैं बड़ी तेज़ी से वहाँ से भगा और वापस नीम के सहारे घर से बाहर आ गया .

चाहता तो मैं ये था कि वहां से भाग जाऊ पर बिना कुदाली लिए जाना भी सम्भव नही था, मैं बड़ी ही अजीब उलझन में फँस चूका था..............

 
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