सरजू काका से विदा लेकर मैं सीधा अपने खेतो की ओर चल दिया, मुझे पहले ही काफी लेट हो चुकी थी इसलिए मैं अब और ज्यादा देर नही करना चाहता था इसलिए मैं तेज़ी से चलता हुआ आगे बढ़ने लगा, कुछ ही देर में मैं हमारे खेत में पहुंच गया, माँ और दीदी गन्ने के आस पास उगी झाडिया काटने में मशगुल थी, तभी माँ ने मुझे वहां आता देखा तो मेरी तरफ देखकर बोली
सुधिया – बेटा, इतनी देर कहाँ लगा दी, कब से तेरी राह देख रहे है हम
मैं – माँ, वो बस ऐसे ही नहाते नहाते देर हो गयी, और मैं थोडा धीरे धीरे भी चलता हूँ ना इसलिए
सुधिया – चल अब ये बहाने बाज़ी छोड़ और आकर हमारी मदद कर,
मैं – क्या करना है माँ मुझे
सुधिया – ये जो गन्नो के आस पास घास फूस झाड़ियाँ सी उगी हैं, इन सब को आज ही साफ करना है, समझा
मैं – ठीक है माँ
और ये कहकर मैंने एक कुदाली उठाई और जिधर नीलू दीदी काम कर रही थी, उधर ही पास में घास काटने लगा, कुछ देर काम करते करते मैं और दीदी काफी अंदर तक आ चुके थे, माँ तो अब हमे दिखाई भी नही दे रही थी, मैं भी बस घास काटने में मशगुल था कि तभी नीलू दीदी मेरे पास ही आकर बैठ गयी,
नीलू दीदी – क्यों रे, क्या बोल रहा था माँ को, इतना वक्त कहाँ लगा दिया
मैं – दीदी वो बाथरूम में ही नहाने में ज्यादा टाइम लग गया
नीलू दीदी – “क्यों ऐसा क्या कर रहा था बाथरूम में” नीलू दीदी ने मेरी तरह आँखे मटकाते हुए कहा
मैं – कुछ नही दीदी, मैं तो वो बस नहा ही रहा था, और क्या करूंगा बाथरूम में
नीलू दीदी – मुझे क्या पता तू क्या करता होगा अंदर,
नीलू दीदी की बात सुनकर मैं थोडा सकपका गया, कि कहीं इन्होने मुझे अंदर मुठ मारते हुए तो नही देख लिया, वैसे भी बाथरूम का दरवाज़ा लकड़ी का है और उसमे काफी सारी दरारे भी हैं
मैं – न...न....नही...तो दीदी मैं तो बस नहा ही रहा था अंदर
नीलू दीदी – चल ठीक है... अब काम कर
नीलू दीदी ये कहकर मेरे से बस 3-4 फूट आगे बैठकर ही घास काटने लगी, पर इस बार तो वो बैठकर नही बल्कि खड़ी होकर झुकने के बाद घास काट रही थी, आज दीदी ने घाघरा चोली पहनी हुई थी, जो थोड़ी फटी पुरानी सी थी
नीलू दीदी झुक झुककर घास काट रही थी, तभी अचानक मेरी नज़र दीदी की मस्त उभरी हुई गांड पर जा टिकी, मुझ पर जैसे बिजली सी गिर पड़ी, एक तो इतनी मस्त फूली हुई गांड आँखों के सामने थी उपर से दीदी घास काटते काटते अपनी कमर और गांड को मस्ती से होले होले हिला भी रही थी, मेरे गले का पानी सुख सा गया ये नज़ारा देखकर, पर मन में थोडा डर था कि कहीं दीदी ने अचानक पीछे मुडकर देख लिया तो,
मैं बस अभी अपनी नज़रे फेरने ही वाला था कि तभी अचानक मुझ पर जैसे एक और गाज गिर पड़ी, नीलू दीदी का घाघरा पीछे एक घास के डंठल में फस गया पर दीदी का ध्यान इस ओर नही गया, और वो बिना जाने ही थोड़ी सी आगे हो गयी, पर पीछे से घाघरा डंठल में फंसे होने की वजह से थोडा सा उपर उठ गया, और उसी पल मुझे नीलू दीदी की गोरी गोरी मलाई जैसी जांघे नज़र आ गयी,
मैं तो अपने होश ही खो बैठा ये नज़ारा देखकर, नीलू दीदी की मांसल जांघे और उपर से उनकी काली पेंटी की हलकी सी झलक मेरी आँखों में कैद हो चुकी थी, उसकी मोटी सी मांसल गदरायी गांड पर उस छोटी सी पैंटी को देखकर मेरी सांसे ऊपर की ऊपर और नीचे की नीचे रह गयी, मेरा चेहरा गरम होने लगा, मुझे अपने लंड में तनाव महसूस होने लगा, और जल्द ही मेरे लंड विकराल रूप ले लिया जिससे मेरी पेंट में उभार बन गया था ,
पता नही क्यूँ पर नीलू दीदी अब वहीं खड़ी खड़ी घास काट रही थी, जबकि पीछे से उनका घाघरा आधे से ज्यादा उठा हुआ था, मैं तो दीदी की मस्त मांसल भरी हुई जांघो को ही घूरे जा रहा था, पर तभी अचानक दीदी पीछे मुड गयी,
मेरी तो जैसे साँस ही रुक गयी, मैंने तुरंत अपना सर दूसरी तरफ घुमा लिया,
“दीदी ने मुझे देख लिया, दीदी ने मुझे पक्का देख लिया, अब क्या होगा,,,,,, अगर उन्होंने माँ को बता दिया तो, कहीं बापूजी को ये बात पता चली तो मुझे घर से ही ना निकाल दे” मेरे मन में बहुत सारे विचार आ रहे थे और डर के मारे मेरी हालत खराब हो चुकी थी,
मैंने हिम्मत करके दोबारा दीदी की ओर देखा, और अचानक मेरी नज़रे दीदी की नजरो से टकरा गई, दीदी अजीब तरीके से मुझे देख रही थी, पर कुछ ही देर में उन्होंने अपना ध्यान हटाया और अपना घाघरा उस डंठल से निकाल कर आगे बढ़ गयी, मुझे समझ नही आ रहा था कि दीदी ने मुझे देख लिया या नही,
मैं बस अभी सोच ही रहा था कि तभी दीदी ने अचानक दोबारा पीछे मुडकर देखा और इस बार उनकी नजर मेरी पेंट में बने तम्बू पर चली गई, मैंने जब उनकी नजरो का पीछा किया तो मैं झट से अपने तम्बू को छुपाने की कोशिश करने लगा, मुझे ऐसा करता देख दीदी के चेहरे पर मुस्कान आ गयी
मैं – वो...वो...मुझे....माफ़ कर देना दीदी..... वो मैंने जान बुझकर नही किया, आप माँ को मत बताना
नीलू दीदी – चल ठीक है नही बताती पर अपने उस पर थोड़ी लगाम रखा कर...
ये बोलकर नीलू दीदी हंसने लगी पर मेरी तो जैसे सिट्टी पिट्टी गूम हो गयी ये सोचकर कि दीदी मुझे अपने लंड पर कण्ट्रोल करने को बोल रही है, पर दीदी को हँसता देख मैं भी झूठी हंसी हंस दिया
उसके बाद हम वापस काम में मशगुल हो गये, और शाम तक हम तीनो ने मिलकर सारी घास काट ली,
सुधिया – समीर बेटा,
मैं – हाँ माँ,
सुधिया – तू और तेरी बहन दोनों सीधे घर चले जाना, मैं जरा सरला के घर होकर आउंगी, तो आने में जरा देर हो जायेगी
मैं – ठीक है माँ,
सुधिया – और नीलू तू आज खाना बनाकर रख लेना,
नीलू दीदी – जैसा आप कहे माँ
माँ से विदा लेकर मैं और नीलू दीदी वापस घर की तरफ चल पड़े, रस्ते में नीलू दीदी मेरे मजे ले रही थी
नीलू – हाँ तो समीर, जरा बताना तो तू मुझसे माफ़ी क्यों मांग रहा था खेत में
मैं – “वो..वो.... दीदी... आपको पता है, आप मुझे तंग करने के लिए पूछ रही हो” मुझे समझ नही आ रहा था कि दीदी मुझसे ऐसे सवाल क्यों पूछ रही है, पर जो भी हो मुझे तो डर सता रहा था कि दीदी कहीं माँ को ये बात ना बता दे
नीलू – अरे नही, सच्ची मुझे नही पता, बता ना
मैं – नही दीदी, आप नाराज़ हो जाओगी मुझसे
नीलू – अरे मैं तुझसे कभी नाराज़ हुई क्या आज तक, जो आज हो जाउंगी,
मैं – ठीक है दीदी, अगर आप वादा करो कि आप मुझसे नाराज़ नही होगी, तो मैं बता देता हूँ
नीलू – हाँ बाबा मैं वादा करती हूँ कि तुझसे नाराज़ नही होउंगी, अब बता
मैं – वो दीदी, मैं वो ..आपकी.....वो आप आगे थी ना.... इसलिए अचानक.. पर मैंने जानबुझकर नही,,,,,,
नीलू – अरे क्या बोल रहा है साफ साफ बोल ना
मैं – वो दीदी आप मेरे आगे थी ना, और झुक कर घास काट रही थी तो मेरी नज़र अपने आप चली गयी, मैंने जानबुझकर नही देखा पक्का
नीलू – क्या देख लिया तूने
मैं – वो दीदी आपका घाघरा थोडा उपर को खिसक गया था ना, इसलिए मुझे आपकी जंघे दिख गयी थी, पर मैंने जानबुझकर नही देखा, आप माँ को मत बताना
नीलू दीदी – चल ठीक है नही बताउंगी, पर पहले तू मेरे सवाल का सही सही जवाब देगा
मैं – “ठीक है दीदी” मेरी तो वैसे ही डर के मारे हालत टाइट थी तो और मैं कर भी क्या सकता था
नीलू दीदी – अच्छा तो बता, तुझे मेरी जांघे कैसी लगी???
नीलू दीदी ने तो जैसे अपने सवाल से मेरे उपर बम फोड़ दिया, अब मैं भला कैसे उन्हें बताता कि मुझे तो लगा कि वही घोड़ी बना के अपना लंड दीदी की पनियाई चूत में पेल दूँ, पर उनके सामने मैं कैसे अपने मन की बात बोल देता
मैं – क....क्या...मतलब......” मैं बड़ी मुश्किल से बोल पाया
नीलू दीदी – अरे भोंदू, मेरा मतलब है कि तुझे कैसी लगी मेरी जांघे, अच्छी, ख़राब बहुत खराब???
मैं – अ...अच्छी,,,,,,,
नीलू – सिर्फ अच्छी...???
मैं – नही...ब...बहुत..अच्छी...
नीलू दीदी – अच्छा जी, तभी अपने उसको भरी दोपहर में खड़ा किये बैठे थे, हा हा हा.............
मैं तो नीलू दीदी की इस बात से पूरी तरह सकपका गया,,, अब बोलता भी तो क्या बोलता भला... पर मेरी समझ में ये नही आ रहा था कि आज नीलू दीदी को हुआ क्या है, पर जो भी हुआ हो आज नीलू दीदी की गरमा गर्म बातें सुनकर मेरा लोडा पेंट में हल्का हल्का सर उठाने लगा था,
इसी तरह दीदी मुझे रस्ते भर परेशान करती रही, जब भी मैं खेत जाता था वापस आकर नहाता जरुर था, और यहीं नियम दीदी का भी था, इसलिए मैंने दीदी से कहा
मैं – दीदी, वो मैं नहाने जा रहा हूँ” और ये बोलकर मैं खड़ा हुआ और बाथरूम की तरफ चल दिया...
नीलू दीदी – रुक.........आज तू नही मैं नहाऊगी पहले.... तू थोड़ी देर इंतज़ार कर
मुझे उनकी बात सुनकर बड़ी ही हैरानी हुई, क्यूंकि हमेशा सबसे पहले मैं ही नहाता था, और दीदी तो सबसे लास्ट में नहाती थी खेत से आने के बाद, पर आज अचानक दीदी ने नहाने का क्यूँ बोला.... मेरी समझ में बिलकुल नही आ रहा था, पर अब उनको मना भी कैसे करता
मैं – ठीक है दीदी, पहले आप नहा लो... मैं बाहर ही बैठ जाता हूँ...
नीलू दीदी – ठीक है..
ये बोलकर दीदी हमारे कमरे में अंदर गई, शायद कपड़े लेने गई थी, और जल्दी ही अपने हाथ मे कुछ कपड़े और तोलिया लिए बाहर आ गई, अभी वो बाथरूम की तरफ जा ही रही थी कि तभी अचानक मेरी नज़र उनके हाथो में रखे कपड़ो पर गयी और मुझे जैसे कोई 440 वोल्ट का झटका सा लग गया हो,
दीदी के कपड़ो के बिच एक छोटा सा लाल कपड़ा भी था, शायद उनकी पेंटी थी, पर जैसे ही मेरी नजर उस पर गिरी मुझे याद आ गया कि उस रात मैंने जिस लाल कपड़े से अपने लंड को साफ किया था, कहि ये वो ही तो लाल कपड़ा नही, तभी तो अगले दिन दीदी मेरी तरफ अजीब नजरो से देख रही थी, मेरी आँखों के सामने जैसे चक्कर से आने लगे, मुझे समझ नही आ रहा था कि मेरे साथ ही ऐसा क्यूँ हो रहा था,
“पर अगर दीदी मुझसे नाराज़ होती तो मुझसे ऐसी बाते नही करती, आखिर दीदी चाहती क्या है” मेरी समझ में कुछ नही आ रहा था,
तभी अचानक दीदी ने जोर से बाथरूम का दरवाज़ा बंद कर लिया, मैं भी आंगन में बैठा सोच रहा था कि थोड़ी देर बाद मुझे अंदर से पानी गिरने की आवाज़ सी आने लगी,
पानी की आवाज़ ने जैसे मेरे अंदर के शैतान को फिर से जिन्दा कर दिया,
“दीदी अंदर नहा रही है, शायद कपडे भी उतार दिए होंगे, चल चलकर देखते है” मेरे दिमाग में एक आवाज़ गूंजी
“नही नही, पागल हो गया है क्या, अगर दीदी ने देख लिया तो शामत आ जानी है, वैसे ही आज दोपहर को तू पकड़ा गया था” एक और आवाज़ मेरे दिमाग में गूंजी
“पर दीदी ने तुझ पर गुस्सा तो नही किया ना, तो डरता क्यूँ है, देखते है अंदर, शायद दीदी का गोरा बदन देखने को मिल जाये...” फिर से आवाज़ गूंजी
“पर....” अब शायद मेरी हवास मुझ पर हावी हो चुकी थी, मैं चुपके से खड़ा हुआ, और दबे पाँव जाकर बाथरूम के दरवाजे के पास छुप कर खड़ा हो गया और अंदर झाँकने की कोशिश करने लगा
मैं बहुत आराम से उठ कर लकड़ी के पट्टो पर कान लगा कर ध्यान से सुन ने लगा, केवल चुड़ियो के खन-खनाने और गुन-गुनाने की आवाज़ सुनाई दे रही थी, फिर पानी गिरने की आवाज़ सुनाई दी, मेरे अन्दर के शैतान ने मुझे एक आवाज़ दी, लकड़ी के पट्टो को ध्यान से देख, मैंने अपने अन्दर के शैतान की आवाज़ को अनसुना करने की कोशिश की, मगर शैतान हावी हो गया था, दीदी जैसी एक खूबसूरत लडकी लकड़ी के पट्टो के उस पार नहाने जा रही थी, मेरा गला सुख गया और मेरे पैर कांपने लगे, अचानक ही पजामा एकदम से आगे की ओर उभर गया, दिमाग का काम अब लण्ड कर रहा था, मेरी आँखें लकड़ी के पट्टो के बीच ऊपर से निचे की तरफ घुमने लगी और अचानक मेरी मन की मुराद जैसे पूरी हो गई, हमारे टूटे फूटे दरवाजे के बिच मुझे एक अच्छी खासी दरार मिल गयी जिससे मैं अंदर का नज़ारा बिलकुल साफ साफ देख सकता था, मैंने लकड़ी के पट्टो के बिच की उस दरार पर अपनी ऑंखें जमा दी,
दीदी की पीठ लकड़ी की दिवार की तरफ थी, वो घाघरा और चोली में दूसरी तरफ मुंह किये खड़ी थी, फिर दीदी ने अपने कंधो पर रखे तौलिये को अपना एक हाथ बढा कर बगल वाली खूंटी पर टांग दिया, फिर अपने हाथों को पीछे ले जा कर अपने खुले रेशमी बालो को समेट कर जुड़ा बना दिया, फिर दीदी ने बाथरूम के कोने में गड़े एक छोटे से पत्थर पर रखी कटोरी उठाई, उस कटोरी में हम लोग मुल्तानी मिटटी भिगो कर रखा करते थे, चूँकि उस समय साबुन वैगरह तो होती नही थी इसलिए अगर चेहरा या बदन साफ करना हो तो कभी कभी मुल्तानी मिटटी का ही इस्तेमाल कर लिया करते थे, और मुल्तानी मिटटी तो बालो के लिए भी अच्छी होती है,
दीदी ने वो कटोरी से थोड़ी सी मुल्तानी मिट्टी निकाली और अपने चेहरे पर उसे रगड़ने लगी, पीछे से मुझे उनका चेहरा दिखाई नहीं दे रहा था मगर ऐसा लग रहा था की वो मुल्तानी मिट्टी निकाल कर अपने चेहरे पर ही लगा रही है, लकड़ी के पट्टो के बिच की दरार से मुझे उनके सर से चुत्तरों के थोड़ा निचे तक का भाग दिखाई पड़ रहा था, मुल्तानी मिट्टी लगाने के बाद दीदी ने अपने घाघरे को घुटनों के पास से पकड कर थोड़ा सा ऊपर उठाया और फिर थोड़ा तिरछा हो कर निचे बैठ गई, इस समय मुझे केवल उनका पीठ और सर नज़र आ रहा थे, पर अचानक से सिटी जैसी आवाज़ सुनाई दी, दीदी इस समय शायद वही बाथरूम के कोने में पेशाब कर रही थी, मेरे बदन में सिहरन सी दौड गई, मैं कुछ देख तो सकता नहीं था मगर मेरे दिमाग ने बहुत सारी कल्पनाये कर डाली, पेशाब करने की आवाज़ सुन कर मेरे कुंवारे लण्ड ने झटका खाया, मगर अफ़सोस कुछ देख नहीं सकता था,
फिर थोड़ी देर में वो उठ कर खड़ी हो गई और अपने हाथो को कुहनी के पास से मोड कर अपनी छाती के पास कुछ करने लगी, मुझे लगा जैसे वो अपनि चोली खोल रही है, मैं दम साधे ये सब देख रहा था, मेरा लण्ड इतने में ही एक दम खड़ा हो चूका था, दीदी ने अपना चोली खोल कर अपने कंधो से धीरे से निचे की तरफ सरकाते हुए उतार दिया, उनकी गोरी चिकनी पीठ मेरी आँखों के सामने थी, पीठ पर कंधो से ठीक थोड़ा सा निचे एक काले रंग का तिल था और उससे थोड़ा निचे उनकी काली ब्रा का फीता बंधा हुआ था, इतनी सुन्दर पीठ मैंने आज तक नही देखी थी, वैसे तो मैंने दीदी की पीठ कई बार देखि थी मगर ये आज पहली बार था जब उनकी पूरी पीठ नंगी मेरी सामने थी,
केवल एक ब्रा का स्ट्रैप बंधा हुआ था, गोरी पीठ पर काली ब्रा का स्ट्रैप पीठ को और भी ज्यादा सुन्दर बना रहा था, मैंने सोचा की शायद दीदी अब अपनी ब्रा खोलेंगी मगर उन्होंने ऐसा नहीं किया, अपने दोनों हाथो को बारी-बारी से उठा कर वो अपनी कांख को देखने लगी, एक हाथ को उठा कर दुसरे हाथ से अपनी कांख को छू कर शायद अपने कांख के बालो की लम्बाई का अंदाज लगा रही थी, दीदी अब साइड पोज़ में खड़ी थी,
मैं सोच रहा था काश वो पूरा मेरी तरफ घूम जाती मगर ऐसा नहीं हुआ, उनकी दाहिनी साइड मुझे पूरी तरह से नज़र आ रही थी, उनका दाहिना हाथ और पैर, पेट और ब्रा में कैद एक चूची, उनका चेहरा भी अब साइड से नज़र आ रहा था, उन्होंने अपने पुरे चेहरे पर मुल्तानी मिटटी लगा ली थी,
अब दीदी ने दोबारा कटोरी में से मुल्तानी मिटटी अपने बाये हाथ में ली और अपने दाहिने हाथ को ऊपर उठा लिया , दीदी की नंगी गोरी मांसल बांह अपने आप में उत्तेजना का शबब थी और अब तो हाथ ऊपर उठ जाने के कारण दीदी की कांख भी दिखाई दे रही थी, कांख के साथ दीदी की ब्रा में कैद दाहिनी चूची भी दिख रही थी, ब्रा ने पूरी चूची को अपने अन्दर कैद किया हुआ था इसलिए मुझे कुछ खास नहीं दिखा, मगर उनकी कांख कर पूरा नज़ारा मुझे मिल रहा था,
दीदी की कांख में काले-काले बालों का गुच्छा सा उगा हुआ था, शायद दीदी ने काफी दिनों से अपने कांख के बाल नहीं बनाये थे, वैसे तो मुझे औरतो के चिकने कांख ही अच्छे लगते है पर आज पाता नहीं क्या बात थी मुझे दीदी के बालों वाले कांख भी बहुत सेक्सी लग रहे थे, मैं सोच रहा था इतने सारे बाल होने के कारण दीदी की कांख में बहुत सारा पसीना आता होगा और उसकी गंध भी उन्ही बालों में कैद हो कर रह जाती होगी, दीदी के पसीने से भीगे बदन को कई बार मैंने रसोई में देखा था, उस समय उनके बदन से आती गंध बहुत कामोउत्तेजक होती थी और मुझे उनके बदन की गंध को सूंघना बहुत अच्छा लगता था,
ये सब सोचते सोचते मेरा मन किया की काश मैं उसकी कांख में एक बार अपने मुंह को ले जा पाता और अपनी जीभ से एक बार उसको चाटता, यही सोचते सोचते ना जाने कब मेरा हाथ मेरे पजामे (पेंट) के अंदर चला गया ,मैंने अपने लण्ड पर हाथ फेरा तो देखा की सुपाड़े पर हल्का सा गीलापन आ गया है, तभी दीदी ने अपने बाएं हाथ की मुल्तानी मिट्टी को अपनी दाहिने हाथ की कांख में लगा दिया और फिर अपने वैसे ही अपनी बाई कांख में भी दाहिने हाथ से मुल्तानी मिट्टी लगा दिया, शायद दीदी को अपने कान्खो में बाल पसंद नहीं थे,
कान्खो में मुल्तानी मिट्टी लगा लेने के बाद दीदी फिर से मेरी तरफ पीठ करके घूम गई और अपने हाथ को पीछे ले जाकर अपनी ब्रा का स्ट्रैप खोल दिया और अपने कंधो से सरका कर बहार निकाल फर्श पर डाल दिया और जल्दी से निचे बैठ गई, अब मुझे केवल उनका सर और थोड़ा सा गर्दन के निचे का भाग नज़र आ रहा था, मुझे अपनी किस्मत पर बहुत गुस्सा आया, काश दीदी सामने घूम कर ब्रा खोलती या फिर जब वो साइड से घूमी हुई थी तभी अपनी ब्रा खोल देती मगर ऐसा नहीं हुआ था और अब वो निचे बैठ कर शायद अपनी चोली और ब्रा और दुसरे कपड़े साफ़ कर रही थी,
पहले तो मैंने पहले सोचा कि अब खड़े रहने से कोई फायदा नही, मगर फिर सोचा की नहाएगी तो खड़ी तो होगी ही, ऐसे कैसे नहा लेगी, इसलिए चुप-चाप यही खड़े रहने में ही रहने में भलाई है, मेरा धैर्य रंग लाया, थोड़ी देर बाद दीदी उठ कर खड़ी हो गई और उसने घाघरे को घुटनों के पास से पकड़ कर जांघो तक ऊपर उठा दिया, मेरा कलेजा एक दम धक् से रह गया, दीदी ने अपना घाघरा पीछे से पूरा ऊपर उठा दिया था, और घाघरे को उठाकर अपनी चुचियो पर अटका लिया था, इस समय उनकी जांघे पीछे से पूरी तरह से नंगी हो गई थी, मुझे औरतो और लड़कियों की जांघे सबसे ज्यादा पसंद आती है, मोटी और गदराई जांघे जो की शारीरिक अनुपात में हो, घाघरे के उठते ही मेरे सामने ठीक वैसी ही जांघे थी जिनकी कल्पना कर मैं मुठ मारा करता था, एकदम चिकनी और मांसल, जिन पर हलके हलके दांत गडा कर काटते हुए जीभ से चाटा जाये तो ऐसा अनोखा मजा आएगा की बयान नहीं किया जा सकता,
दीदी की जांघे मांसल होने के साथ सख्त और गठी हुई थी उनमे कही से भी थुलथुलापन नहीं था, इस समय दीदी की जांघे केले के पेड़ के चिकने तने की समान दिख रही थी, मेरे मुंह में पानी आ गया था, लण्ड के सुपाड़े पर भी पानी आ गया था, सुपाड़े को लकड़ी के पट्टे पर हल्का सा सटा कर मैंने उससे पानी को पोछ दिया और पैंटी में कसे हुई दीदी के चुत्तरों को ध्यान से देखने लगा, दीदी का हाथ इस समय अपनी कमर के पास था और उन्होंने अपने अंगूठे को पैंटी के इलास्टिक में फसा रखा था, मैं दम साधे इस बात का इन्तेज़ार कर रहा था की कब दीदी अपनी पैंटी को निचे की तरफ सरकाती है, दीदी ने अपनी पैंटी को निचे सरकाना शुरू किया पर उसी के साथ ही घाघरा भी निचे की तरफ सरकता चला गया, ये सब इतनी तेजी से हुआ की दीदी के चुत्तर देखने की हसरत दिल में ही रह गई, दीदी ने अपनी पैंटी निचे सरकाई और उसी साथ घाघरा भी निचे आ कर उनके चुत्तरों और जांघो को ढकता चला गया,
दीदी अपनी पैंटी उतार उसको ध्यान से देखने लगी, पता नहीं क्या देख रही थी, छोटी सी पैंटी थी, पता नहीं कैसे उसमे दीदी के इतने बड़े चुत्तर समाते है, मगर शायद यह प्रश्न करने का हक मुझे नहीं था क्योंकी अभी एक क्षण पहले मेरी आँखों के सामने ये छोटी सी पैंटी दीदी के विशाल और मांसल चुत्तरों पर अटकी हुई थी, कुछ देर तक उसको देखने के बाद वो फिर से निचे बैठ गई और अपनी पैंटी साफ़ करने लगी, फिर थोड़ी देर बाद ऊपर उठी और अपने घाघरा के नाड़े को खोल दिया, मैंने दिल थाम कर इस नज़ारे का इन्तेज़ार कर रहा था, कब दीदी अपने घाघरा को खोलेंगी और अब वो क्षण आ गया था, लौड़े को एक झटका लगा और दीदी के घाघरा खोलने का स्वागत एक बार ऊपर-निचे होकर किया, मैंने लण्ड को अपने हाथ से पकड दिलासा दिया, नाड़ा खोल दीदी ने आराम से अपने घाघरा को निचे की तरफ धकेला, घाघरा सरकता हुआ धीरे-धीरे पहले उसके तरबूजे जैसे चुत्तरो से निचे उतरा फिर जांघो और पैर से सरक निचे गिर गया,
दीदी वैसे ही खड़ी रही, इस क्षण मुझे लग रहा था जैसे मेरा लण्ड पानी फेंक देगा, मुझे समझ में नहीं आ रहा था मैं क्या करू, मैंने आज तक ऐसा नज़ारा कभी नहीं देखा, मेरा 9 इंच लम्बा लोडा अब बुरी तरह फुंकार रहा था, लंड की नसे फटने को तैयार पड़ी थी,क्या खतरनाक जानलेवा था, उफ़ अब दीदी पूरी तरह से नंगी हो गई थी, हालाँकि मुझे केवल उनके पिछले भाग का नज़ारा मिल रहा था, फिर भी मेरी हालत ख़राब करने के लिए इतना ही काफी था, गोरी चिकनी पीठ जिस पर हाथ डालो तो सीधा फिसल का चुत्तर पर ही रुकेंगी, पीठ के ऊपर काला तिल, दिल कर रहा था आगे बढ़ कर उसे चूम लू, रीढ़ की हड्डियों की लाइन पर अपने तपते होंठ रख कर चूमता चला जाऊ, पीठ पीठ इतनी चिकनी और दूध की धुली लग रही थी की नज़र टिकाना भी मुश्किल लग रहा था, तभी तो मेरी नज़र फिसलती हुई दीदी के चुत्तरो पर आ कर टिक गई, ओह, मैंने आज तक ऐसा नहीं देखा था, गोरी चिकनी चुत्तर, गुदाज और मांसल, मांसल चुत्तरों के मांस को हाथ में पकड दबाने के लिए मेरे हाथ मचलने लगे,
दीदी के चुत्तर एकदम गोरे और काफी विशाल थे, , पतली कमर के ठीक निचे मोटे मांसल चुत्तर थे, उन दो मोटे मोटे चुत्तरों के बीच ऊपर से निचे तक एक मोटी लकीर सी बनी हुई थी, ये लकीर बता रही थी की जब दीदी के दोनों चुत्तरों को अलग किया जायेगा तब उनकी गांड देखने को मिल सकती है या फिर यदि दीदी कमर के पास से निचे की तरफ झुकती है तो चुत्तरों के फैलने के कारण गांड के सौंदर्य का अनुभव किया जा सकता है,
तभी मैंने देखा की दीदी अपने दोनों हाथो को अपनी जांघो के पास ले गई फिर अपनी जांघो को थोड़ा सा फैलाया और अपनी गर्दन निचे झुका कर अपनी जांघो के बीच देखने लगी शायद वो अपनी चूत देख रही थी, मुझे लगा की शायद दीदी की चूत के ऊपर भी उसकी कान्खो की तरह से बालों का घना जंगल होगा और जरुर वो उसे ही देख रही होंगी, मेरा अनुमान सही था और दीदी ने अपने हाथ को बढा कर रैक पर से फिर वही मुल्तानी मिट्टी वाली कटोरी उतार ली और अपने हाथो से अपने जांघो के बीच मुल्तानी मिट्टी लगाने लगी,
पीछे से दीदी को मुल्तानी मिट्टी लगाते हुए देख कर ऐसा लग रहा था जैसे वो मुठ मार रही है, मुल्तानी मिट्टी लगाने के बाद वो फिर से निचे बैठ गई और अपने घाघरा और पैंटी को साफ़ करने लगी, मैंने अपने लौड़े को आश्वासन दिया कि घबराओ नहीं कपडे साफ़ होने के बाद और भी कुछ देखने को मिल सकता है, ज्यादा नहीं तो फिर से दीदी के नंगे चुत्तर, पीठ और जांघो को देख कर पानी गिरा लेंगे,
करीब पांच-सात मिनट के बाद वो फिर से खड़ी हो गई, लौड़े में फिर से जान आ गई, दीदी इस समय अपनी कमर पर हाथ रख कर खड़ी थी, फिर उसने अपने चुत्तर को खुजाया और सहलाया, फिर अपने दोनों हाथों को बारी बारी से उठा कर अपनी कान्खो को देखा और फिर अपने जांघो के बीच झाँकने के बाद फर्श पर परे हुए कपड़ो को उठाया, यही वो क्षण था जिसका मैं काफी देर से इन्तेज़ार कर रहा था कि फर्श पर पड़े हुए कपड़ो को उठाने के लिए दीदी निचे झुके और उनके चुत्तर लकड़ी के पट्टो के बीच बने दरार के सामने आ गए,
निचे झुकने के कारण उनके दोनों चुत्तर अपने आप अलग हो गए और उनके बीच की मोटी लकीर अब दीदी की गहरी गांड में बदल गई, दोनों चुत्तर बहुत ज्यादा अलग नहीं हुए थे मगर फिर भी इतने अलग तो हो चुके थे की उनके बीच की गहरी खाई नज़र आने लगी थी, देखने से ऐसा लग रहा था जैसे किसी बड़े खरबूजे को बीच से काट कर थोड़ा सा अलग करके दो खम्भों के ऊपर टिका कर रख दिया गया है, दीदी वैसे ही झुके हुए बाल्टी में कपड़ो को डाल कर खंगाल रही थी और बाहर निकाल कर उनका पानी निचोड़ रही थी, ताकत लगाने के कारण दीदी के चुत्तर और फ़ैल गए और गोरी चुत्तरों के बीच की गहरी भूरे रंग की गांड की खाई पूरी तरह से नज़र आने लगी, दीदी की गांड की खाई एक दम चिकनी थी, गांड के छेद के आस-पास भी बाल उग जाते है मगर दीदी के मामले में ऐसा नहीं था उसकी गांड मलाई के जैसी चिकनी लग रही थी, झुकने के कारण चुत्तरों के सबसे निचले भाग से जांघो के बीच से दीदी की चूत के बाल भी नजर आ रहे थे, उनके ऊपर लगा हुआ सफ़ेद मुल्तानी मिट्टी भी नज़र आ रहा था, चुत्तरो की खाई में काफी निचे जाकर जहाँ चूत के बाल थे उनसे थोड़ा सा ऊपर दीदी की गांड का सिकुडा हुआ भूरे रंग का छेद था, जो किसी फूल की तरह नज़र आ रहा था,
दीदी के एक दो बार हिलने पर वो छेद हल्का सा हिला और एक दो बार थोड़ा सा फुला-पिचका, ऐसा क्यों हुआ मेरी समझ में नहीं आया मगर इस समय मेरा दिल कर रहा था कि मैं अपनी ऊँगली को दीदी की गांड की खाई में रख कर धीरे-धीरे चलाऊ और उसके भूरे रंग के फूलते पिचकते छेद पर अपनी ऊँगली रख हल्के-हल्के दबाब दाल कर गांड के छेद की मालिश करू, उफ़ कितना मजा आएगा अगर एक हाथ से चुत्तर को मसलते हुए दुसरे हाथ की ऊँगली को गांड के छेद पर डाल कर हल्के-हल्के कभी थोड़ा सा अन्दर कभी थोड़ा सा बाहर कर चलाया जाये ,
पूरी ऊँगली दीदी की गांड में डालने से उन्हें दर्द हो सकता था इसलिए पूरी ऊँगली की जगह आधी ऊँगली या फिर उस से भी कम डाल कर धीरे धीरे गोल-गोल घुमाते हुए अन्दर-बाहर करते हुए गांड के छेद की ऊँगली से हल्के-हल्के मालिश करने में बहुत मजा आएगा, इस कल्पना से ही मेरा पूरा बदन सिहर गया,
दीदी की गांड इस समय इतनी खूबसूरत लग रही थी कि दिल कर रहा थी अपने मुंह को उसके चुत्तरों के बीच घुसा दूँ और उसके इस भूरे रंग के सिकुडे हुए गांड के छेद को अपने मुंह में भर कर उसके ऊपर अपनी जीभ चलाते हुए उसके अन्दर अपनी जीभ डाल दूँ, उसके चुत्तरो को दांत से हल्के हल्के काट कर खाऊ और पूरी गांड की खाई में जीभ चलाते हुए उसकी गांड चाटू, पर शायद ऐसा संभव नहीं था,
मैं इतना उत्तेजित हो चूका था कि लण्ड किसी भी समय पानी फेंक सकता था, लौड़ा अपनी पूरी औकात पर आ चूका था और अब दर्द करने लगा था, मैंने अपने टटो को अपने हाथो से सहलाते हुए सुपाड़े को दो उँगलियों के बीच दबा कर अपने आप को नार्मल करने की कोशिश की,
अंदर अब सारे कपड़े पानी में खंगाले जा चुके थे, दीदी सीधी खड़ी हो गई और अपने दोनों हाथो को उठा कर उसने एक अंगडाई ली और अपनी कमर को सीधा किया फिर दाहिनी तरफ घूम गई, मेरी किस्मत शायद आज बहुत अच्छी थी, दाहिनी तरफ घूमते ही उसकी दाहिनी चूची जो कि अब नंगी थी मेरी लालची आँखों के सामने आ गई, उफ़ अभी अगर मैं अपने लण्ड को केवल अपने हाथ से छू भर देता तो भी मेरा पानी निकल जाता, चूची का एक ही साइड दिख रहा था, दीदी की चूची एक दम सीना तान के खड़ी थी, चोली के ऊपर से देखने पर मुझे लगता तो था की उनकी चूचियां सख्त होंगी मगर इतनी कड़ी होंगी इसका अंदाज़ा नही था, दीदी को शायद ब्रा की कोई जरुरत ही नहीं थी, उनकी चुचियों की कठोरता इतनी मस्त जो थी,
चूची एकदम दूध के जैसी गोरे रंग की थी, चूची का आकार ऐसा था जैसे किसी मध्यम आकार के कटोरे को उलट कर दीदी की छाती से चिपका दिया गया हो और फिर उसके ऊपर किशमिश के एक बड़े से दाने को डाल दिया गया हो, मध्यम आकार के कटोरे से मेरा मतलब है की अगर दीदी की चूची को मुट्ठी में पकड़ा जाये तो उसका आधा भाग मुट्ठी से बाहर ही रहेगा, चूची का रंग चूँकि हद से ज्यादा गोरा था इसलिए हरी हरी नसे उस पर साफ़ दिखाई दे रही थी, जो की चूची की सुन्दरता को और बढा रही थी, निप्पलों का रंग गुलाबी था, पर हल्का भूरापन लिए हुए था, बहुत ज्यादा बड़ा तो नहीं था मगर एक दम छोटा भी नहीं था, किशमिश से बड़ा और अंगूर से थोड़ा सा छोटा, मतलब मुंह में जाने के बाद अंगूर और किशमिश दोनों का मजा देने वाला, दोनों होंठो के बीच दबा कर हल्के-हल्के दबा-दबा कर दांत से काटते हुए अगर चूसा जाये तो बिना चोदे झड जाने की पूरी सम्भावना थी
फिर दीदी ने दाहिनी तरफ घूम कर अपने दाहिने हाथ को उठा कर देखा फिर बाएं हाथ को उठा कर देखा, फिर अपनी गर्दन को झुका कर अपनी जांघो के बीच देखा, फिर वापस मेरी तरफ पीठ करके घूम गई और खंगाले हुए कपडो को वही पास बनी एक खूंटी पर टांग दिया और फिर दूसरी बाल्टी में पानी भरने लगी, मैं समझ गया कि दीदी अब शायद नहाना शुरू करेंगी, मैंने पूरी सावधानी के साथ अपनी आँखों को लकड़ी के पट्टो के दरार में लगा दिया, मग में पानी भर कर दीदी थोड़ा सा झुक गई और पानी से पहले अपने बाएं हाथ फिर दाहिनी हाथ के कान्खो को धोया, पीछे से मुझे कुछ दिखाई नहीं पर रहा था मगर, दीदी ने पानी से अच्छी तरह से धोने के बाद कान्खो को अपने हाथो से छू कर देखा,
अब उन्होंने अपना ध्यान अपनी जांघो के बीच लगा दिया, दाहिने हाथ से पानी डालते हुए अपने बाएं हाथ को अपनी जांघो बीच ले जाकर धोने लगी, हाथों को धीरे धीरे चलाते हुए जांघो के बीच के बालों को धो रही थी, मैं सोच रहा था की काश इस समय वो मेरी तरफ घूम कर ये सब कर रही होती तो कितना मजा आता, झांटों के साफ़ होने के बाद कितनी चिकनी लग रही होगी दीदी की चुत, ये सोच कर ही मेरे बदन में झन-झनाहट होने लगी, पानी से अपने जन्घो के बीच साफ़ कर लेने के बाद दीदी ने अब नहाना शुरू कर दिया,
मुझे लगा था शायद दीदी अपने बालो को कतरनी(कैंची) से काटेगी तभी उन्हें मुल्तानी मिटटी लगाकर साफ किया होगा, पर मेरा सोचना गलत था, क्यूंकि अब तो दीदी ने नहाना शुरू कर दिया था, शायद वो सिर्फ अपने बालो को साफ करना ही चाहती थी,
इधर दीदी ने अपने कंधो के ऊपर पानी डालते हुए पुरे बदन को भीगा दिया, बालों के जुड़े को खोल कर उनको गीला करने लगी, दीदी का बदन भीग जाने के बाद और भी खूबसूरत और मदमस्त लगने लगा था, बदन पर पानी पड़ते ही एक चमक सी आ गई थी दीदी के बदन में, दीदी खूब अच्छे से अपने बालों को साफ़ कर रही थी, बालो और गर्दन के पास से मुल्तानी मिटटी से मिला हुआ मटमैला पानी उनकी गर्दन से बहता हुआ उनकी पीठ पर छुकर निचे की तरफ गिरता हुआ कमर के बाद सीधा दोनों चुत्तरों के बीच यानी की उनके गांड की मस्त दरार में घुस रहा था, पर एक बार गांड की दरार में घुसने के बाद वो कहाँ गायब हो जा रहा था ये मुझे नहीं दिख रहा था,
बालों को अच्छे से धोने के बाद दीदी ने बालों को लपेट कर एक गोला सा बना कर गर्दन के पास छोड़ दिया और फिर अपने कंधो पर पानी डाल कर अपने बदन को फिर से गीला कर लिया, गर्दन और पीठ पर लगा हुआ मटमैला पानी भी अब धुल गया था, फिर उन्होंने एक छोटा सा कपड़ा लिया, और उस से अपने पुरे बदन को हल्के-हल्के रगडने लगी, पहले अपने हाथो को रगडा, फिर अपनी छाती को फिर अपनी पीठ को, और फिर वो निचे बैठ गई, निचे बैठने पर मुझे केवल गर्दन और उसके निचे का कुछ हिस्सा दिख रहा था, पर ऐसा लग रहा था जैसे वो निचे बैठ कर अपने पैरों को फैला कर पूरी तरह से रगड कर साफ़ कर रही थी क्योंकि उनका शरीर हिल रहा था, शायद वो अपनी चूत साफ कर रही थी,
थोडी देर बाद वो खड़ी हो गई, अब वो अपनी जांघो को रगड रगड कर साफ़ कर रही थी और फिर अपने आप को थोड़ा झुका कर अपनी दोनों जांघो को फैलाया और फिर उस कपड़े को दोनों जांघो के बीच ले जाकर जांघो के अंदरूनी भाग और रान को रगडने लगी, पीछे से देखने पर लग रहा था जैसे वो अपनी चूत को रगड कर साफ़ कर रही थी
थोड़ी देर बाद थोड़ा वो अपने चुत्तरों को रगडने लगी, मेरी हालत तो अब तक बहुत ही बुरी हो चुकी थी, मेरे माथे पर पसीने की बुँदे भी उभर आई थी, मैं बहुत ज्यादा गरम हो चूका था, मन तो कर रहा था कि बस अंदर जाऊ और दीदी को वहीं घोड़ी बनाकर अपना लोडा उनकी चूत में घुसा दूँ.... मेरे हाथों में खुजली होने लगी थी और दिल कर रहा था की थल-थलाते हुए चुत्तरों को पकड़ कर मसलते हुए खूब हिलाउ... .पर ये सम्भव नही था, इसलिए मैं बस चुप चाप खड़ा अंदर का नजारा देखे जा रहा था,
कपडे से अपने बदन को रगड़ने के बाद, वापस कपडा रख दिया और मग से पानी लेकर कंधो पर डालते हुए नहाने लगी, मात्र कपडे से सफाई करने के बाद ही दीदी का पूरा बदन चम-चमाने लगा था, पानी से अपने पुरे बदन को धोने के बाद दीदी ने अपने बालों का गोला खोला और एक बार फिर से कमर के पास से निचे झुक गई और उनके चुत्तर फिर से लकड़ी के पट्टो के बीच बने दरार के सामने आ गए, इस बार उनके गोरे चम-चमाते चुत्तरों के बीच की चमचमाती खाई के आलावा मुझे एक और चीज़ के दिखने को मिल रही थी, गांड के सिकुडे हुई छेद से करीब चार अंगुल भर की दूरी पर निचे की तरफ एक लम्बी लकीर सी नज़र आ रही थी, पहले ये लकीर इसलिए नहीं नज़र आ रही थी क्योंकि यहाँ पर झान्ट के बाल थे, मुल्तानी मिट्टी ने जब झांटो की सफाई कर दी तो चूत की लकीर स्पष्ट दिखने लगी, इस बात का अहसास होते ही कि मैं अपनी दीदी की चूत देख रहा हूँ, मुझे लगा जैसे मेरा कलेजा मुंह को आ जायेगा और फिर से मेरा गला सुख गया और पैर कांपने लगे, इस बार शायद मेरे लण्ड से दो बूँद टपक कर निचे गिर भी गई पर मैंने इस तरफ कोई ध्यान नहीं दिया, लण्ड भी मारे उत्तेजना के काँप रहा था,
दीदी की दोनों मोटी जांघो के बीच ऊपर की तरफ चुत्तरों की खाई के ठीक निचे एक गुलाबी लकीर सी दिख रही थी, पट्टो के बीच से देखने से ऐसा लग रहा था जैसे सेब या पके हुए पपीते के आधे भाग को काट कर फिर से आपस में चिपका कर दोनों जांघो के बीच फिट कर दिया गया है, कमर या चुत्तरों के इधर-उधर होने पर दोनों फांकों में भी हरकत होती थी और ऐसा लगता जैसे कभी लकीर टेढी हो गई है कभी लकीर सीधी हो गई है, जैसे चूत के दोनों होंठ कभी मुस्कुरा रहे है कभी नाराज़ हो रहे है, दोनों होंठ आपस में एक दुसरे से एक दम सटे हुए दिख रहे थे,
दोनों फांक एक दम गुलाबी और पावरोटी के जैसे फूले हुए थे, मेरे मन में आया कि काश मैं चूत की लकीर पर ऊपर से निचे तक अपनी ऊँगली चला और हलके से दोनों फांकों को अलग कर के देख पाता कि दोनों गुलाबी होंठो के बीच का अंदरूनी भाग कैसा है
तभी अचानक दीदी दोबारा खड़ी हो गयी,मुझे लगा कि शायद उनका नहाना हो चूका है, पर तभी मैंने वो नज़ारा देखा जिसे देखकर मैं उत्तेजना के मारे बेहोश सा होने लगा,
दीदी ने अपने कपड़ो के बिच से एक छोटी सी कैंची निकाल ली थी, इसका मतलब था कि दीदी अपनी कांख और चुत के बाल साफ करने वाली है, पर दीदी ने पहले क्यूँ नही किया, हो सकता है कि शायद मुल्तानी मिटटी लगाने की वजह से बाल थोड़े मुलायम हो गये हों जिससे अब उन्हें काटने में आसानी हो,
इधर दीदी अब धीरे धीरे अपने कान्खो के बाल काटने लगी थी, करीब 5 मिनट के अंदर ही उनकी कांख के बाल जैसे पूरी तरह से गायब हो चुके थे, और अब उनकी कांखे गोरी मस्त चिकनी नज़र आ रही थी,
फिर दीदी दोबारा निचे बैठ गयी और शायद वो झुककर अपनी झांट के बाल काट रही थी, जब वो दोबारा खड़ी हुई तो उन्होंने कैंची को साइड में रख दिया, मुझे पता चल चूका था कि शायद दीदी ने अपने झांट के बाल भी काट लिए है, इधर अब दीदी दोबारा अपने बदन पर पानी गिराने लगी, और अब जल्दी जल्दी नहाने लगी,
मुझे लगा कि अब और रुकना खतरे से खाली नही है इसलिए मैं झट से वहां से हट गया और आकर आंगन में बैठ गया, पर मेरा लंड बैठने को तैयार नही था, क्यूंकि वो तो अब भी पूरी तरह तनकर खड़ा था, मैंने आज पुरे दिन में दो दो जवान बदन देख लिए थे वो भी बिलकुल नंगे, एक तो सरजू काका की बेटी रानी और दूसरी मेरी अपनी नीलू दीदी को, मुझे बहुत ही ज्यादा उत्तेजना महसूस हो रही थी, पर जो नज़ारा मैं अभी अभी देख कर आया था, उसे देखकर मेरा मन गदगद हो चूका था, मैं अपनी किस्मत पर गर्व सा महसूस कर रहा था जो इतना शानदार बदन मुझे इतनी करीब से नंगा देखने को मिल चूका था,
मैं अभी विचारो में खोया ही था कि दीदी बाथरूम से बाहर आ गयी, कपडे उन्होंने अंदर ही चेंज कर लिए थे, और गिले कपडे साथ में ले आई थी,
नीलू दीदी – समीर, जा अब तू नहा ले
मैं – ठीक है दीदी,
नीलू दीदी –अच्छा सुन, सब्जी किसकी बनाऊ आज??
मैं – जो भी आपको अच्छी लगे, वो ही बना दो....
नीलू दीदी – चल ठीक है फिर तू जल्दी से नहा ले, मैं आज मस्त सी आलू की सब्जी बना देती हूँ...
मैं – ठीक है दीदी
दीदी के अंदर जाने के बाद मैं खड़ा हुआ, क्यूंकि अगर पहले खड़ा हो जाता तो मेरा लंड का उभार उन्हें साफ नज़र आ जाता,
फिर मैं जल्दी से बाथरूम के अंदर चला गया और कुछ ही देर में मैं नहाने के बाद बाहर आ गया
................................
मैं तैयार होकर बस आंगन में बैठा ही था कि मुझे घर के बाहर थोड़ी हलचल सुनाई दी, नीलू दीदी जो कोने में बैठकर खाना बना रही थी, उन्होंने भी ये हलचल सुनी
नीलू दीदी – समीर ,जरा जाकर देख तो कौन है बाहर
मैं – जी दीदी
मैं बाहर आ गया और बाहर आते ही मेरे चेहरे पर एक बड़ी सी मुस्कान आ गयी, क्यूंकि बाहर बाड़े में बापूजी अपने बैलो को बाँध रहे थे,