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रंगीला लाला और ठरकी सेवक

बाइक से उतरते ही.., सलौनी ने अपना भी बॅग बाइक पर ही छोड़ा.., और घर के बाहर खाली जगह में बारिश का मज़ा लूटते हुए झूम-झूम कर, बाहें फैला कर, जंगल की मोरनी की तरह नाचने लगी…!

शंकर ने अपना और उसका बॅग उठाया.., जो एक पॉली बॅग के अंदर सेफ था.., घर के अंदर बैठी अपनी माँ को आवाज़ देकर बाहर बुलाया.., उसे बाहर से ही बॅग थमाकर खुद बाथ रूम की तरफ बढ़ गया…!

आज वो भी अपनी गुड़िया के साथ बने इस रिश्ते के एहसास में डूबा अपने अंदर ही अंदर एक अजीब सी खुशी को महसूस कर रहा था…!

शंकर के हाथ से बॅग लेते वक़्त रंगीली की नज़र जब बाहर खुले में भीगते हुए झूम-झूम कर नाचती अपनी लाडली पर पड़ी.., तो वो उसे प्यार से डपटते हुए बोली…!

अरी ओ..करम्जलि…, इतनी भी मस्ती ठीक नही है.., रास्ते भर भीगते हुए आई है.., अभी भी तेरा मन नही भरा…, चल जल्दी से कपड़े बदल ले वरना सर्दी लग जाएगी…!

सलौनी अपनी बाहें फैलाए.., आसमान की तरफ अपना सुन्दर सा खिला हुआ चेहरा उठाए आँखें बंद करके बूँदों का मज़ा लेते हुए हुए बोली

अरे माँ…, मज़ा लेने दे मुझे…, आज के जैसा सावन बार बार नही आएगा.., इसका भरपूर मज़ा लूटने दे मुझे…!

रंगीली – ऐसी क्या खास बात है आज के सावन में.., ये तो रोज़ ही बरसता है…!

सलौनी – बस कुछ खास बात है आज की इस बरसात में.., जिसे तू नही समझेगी.., फिकर मत कर मुझे कुछ नही होने वाला…!

रंगीली – ज़रा मे भी तो सुनू.., ऐसी क्या खास बात है आज.., जो तू इतनी खुश नज़र आ रही है.., रास्ते में कोई कुबेर का खजाना मिल गया क्या..?

सलौनी खिलखियालाती कुई बारिश का मज़ा लेते हुए बोली – यही समझ ले…,

रंगीली – तो बता ना.., ऐसा क्या मिल गया तुझे जो इतनी खुश हो रही है…?

सलौनी – वो मे तुझे नही बता सकती.., ये कहकर वो किसी चंचल हिरनी की तरह कुलाँचे भरती हुई बाथरूम में घुस गयी.., रंगीली उसके इस अल्हाड़पन को देख कर मन ही मन खुश हो उठी…!

कोई भी माँ जब अपने बच्चों को खुश होते हुए देखती है तो ऐसे ही सच्चे मन से खुश हो जाती है.., लेकिन रंगीली के मन में अपनी बेटी की खुशी देखकर और उसकी बात सुनकर कई सवाल घूमड़ने लगे…!

इस उमर में लड़के लड़कियों के पैर फिसलने के पूरे पूरे चान्स रहते हैं, कोमल भावनाओं के बीच कोई भी आ सकता है और वो तथाकथित प्यार की राह पर चल पड़ते हैं..,

तो क्या सलौनी किसी से दिल लगा बैठी है…? इस सोच ने रंगीली को बैचैन कर दिया.., अब वो इस बात की तस्दीक़ शंकर से करने की सोचने लगी..,

क्योंकि ज़्यादातर बच्चे अपने हमउम्र के साथ ही ऐसी बातें शेयर करते हैं.., हो सकता है अपने भाई को ये बात उसने न बताई हो….!

उधर जब सलौनी बाथरूम में घुसी उस समय शंकर अपने कपड़े उतारकर अपने बदन को तौलिए से पोंच्छ कर उसी तौलिए को लपेटे हुए बाथरूम से निकलने ही वाला था…!

गीले बदन अपनी छोटी बेहन को अचानक से बाथरूम में पाकर उसकी नज़र उसके उपर पड़ी…!

गीले कपड़ों में उसका साँचे में ढला बदन जो कपड़ों के बदन से चिपकने के कारण उसके अंग-प्रत्यंग को उजागर कर रहा था..,

उसके कच्चे अनार जिनके कड़क अनार के दाने कपड़े के बावजूद चोंच निकाले अपनी स्थिति बयान कर रहे थे.., कुर्ते के गले से उसकी कच्ची चुचियों का क्लीवेज देख कर शंकर अवाक सा खड़ा उसे देखता ही रह गया…!

दोनो मांसल होती जा रही जांघों के बीच उसकी कुरती का कपड़ा एकदम से जांघों से चिपक गया था.., जिससे उसका त्रिकोण साफ साफ अपना आकार दिखा रहा था…!

अपनी छोटी बेहन का इतना खूब सूरत बदन देखकर शंकर का मन डंवांडोल होने लगा.., उपर से कुछ ही पलों पहले वो दोनो ऐसी स्थिति में पहुँच चुके थे जिसके बाद से अब उन दोनो के नज़रिए एक दूसरे के प्रति बदल चुके थे…!

भाई की कामुक नज़रों का स्पर्श अपने बदन पर पा कर सलौनी के चेहरे पर एक नशीली सी मुस्कान तैर गयी.., वो उसके अत्यधिक नज़दीक जाकर लगभग उसके बदन से सटाते हुए शरारत भरे शोख लहजे में बोली…

ऐसे क्यों देख रहा है भाई तू मुझे…???

सलौनी की बात सुनकर शंकर एकदम सकपका गया.., उसके बगल से निकलते हुए बोला – क.क.कुछ नही.., चल अब तू भी कपड़े चेंज करके आजा बाहर..,

सलौनी उसका बाजू थामते हुए बोली – दो मिनिट रुक ना भाई.., साथ ही चलते हैं.., मे चाहती हूँ, तू एक बार अपनी बेहन को जी भरकर देख ले…!

शंकर ने उसे प्यार से डपटते हुए कहा – तू सच में पागल है.., छोड़ जाने दे मुझे.., माँ को शक़ हो जाएगा…!

सलौनी – यही तो मे चाहती हूँ.., जब हम दोनो के बीच एक नया रिश्ता बने तो माँ को इस बात का पता रहे.., वरना जब उसे किसी दूसरे तरीक़े से पता चलेगा तो ज़्यादा दुख होगा…!

शंकर ने अपने हाथ से उसका हाथ हटाते हुए कहा – तू चिंता मत कर, वक़्त आने दे सब संभाल लूँगा…!

इतना बोलकर वो जल्दी से बाथरूम से बाहर आ गया.., पीछे से बड़ी मोहक मुस्कान अपने चेहरे पर लाकर सलौनी मन ही मन बुद-बुदाई…!

कम से कम अब तो अपनी बाहों में ले लेता भाई.., पर चल कोई ना..अब मे तेरी झिझक ज़्यादा दिन नही रहने दूँगी.., तेरी एक हां ने मेरा आगे का रास्ता आसान बना दिया है…!

बारिश बंद होते ही शंकर और उसकी माँ हवेली चले गये.., बातों बातों में सेठानी ने रंगीली से भोला के बारे में जिकर छेड़ ही दी…!

अरी रंगीली आजकल तेरा वो आधा पागल जेठ क्या करता रहता है.., उसे भी लाला जी से कह कर हवेली में ही कुछ काम धाम पर लगा दे.., चार पैसे कमा कर ही देगा…!

सेठानी की बात सुनकर रंगीली ने अपने मन ही मन विचार किया.., आख़िर आज सेठानी ने जेठ जी के बारे में क्यों पूछा.., ज़रूर कोई बात है…?

वरना सेठानी ने जिस आदमी की वजह से अपनी बहू को घर से बाहर निकाल दिया वो भला उनके बारे में इतने दिनो बाद क्यों पूछ रही है और वो भी काम पर लगाने के लिए…!

उसे सोच में डूबा देख कर सेठानी बोली – अरी क्या सोचने लगी…?

मेने कुछ ग़लत बोला क्या..? यहाँ आकर कुछ टहोका करेगा तो कुछ ना कुछ तो तुम लोगों की मदद ही होगी…!

रंगीली – बात तो आपकी सही है मालकिन.., लेकिन वो अब यहाँ नही हैं..,

 
रंगीली के मूह से ये शब्द सुनते ही सेठानी को एक जोरदार झटका लगा.., बिना सोचे समझे उनके मूह से निकल पड़ा…क्या..??? ये क्या कह रही है तू…? परसों ही तो हम मिले थे…!

रंगीली ने चोन्क्ते हुए कहा – आप….उनसे मिली थी..? कहाँ…?

सेठानी को अपनी ग़लती का एहसास हुआ.., उन्होने बात संभालते हुए कहा – अरे..याद नही पड़ रहा मेने उसे कहाँ देखा था.., परसों ही की तो बात है..!

तभी मेरे दिमाग़ मे उसे काम पर रखने की बात आई थी.., बड़ा हॅटा कट्टा अच्छा ख़ासा मर्द है वो….!

रंगीली को ये बात हजम नही हुई.., शक़ का कीड़ा उसके दिमाग़ को कचॉटने लगा.., भला सेठानी इतनी भली कैसे हो गयी कि सामने से उन्हें काम देने की बात सोचने लगी…!

और फिर उनको हॅटा-कट्टा मर्द बोल रही हैं.., ऐसे तो और बहुत सारे मर्द होंगे गाओं में.., फिर उनके लिए ही क्यों पूछा…!

हो ना हो ज़रूर कोई तो बात है.., फिर उसके दिमाग़ को बड़ा तेज झटका लगा.., हे भगवान.., इन्होने लाजो को उनके साथ रंगे हाथों पकड़ा था…,

कहीं इनको उनका वो अजगर भा तो नही गया…? कहीं ये उसे ले तो नही रही अब तक..., ज़रूर यही बात है.., तभी उन्हें यहाँ हवेली में ही काम पर रखने को कहा है…!

सेठानी – अरी अब क्या सोचने लगी..? तूने बताया नही… कहाँ भेज दिया उसे…?

रंगीली को उसे सच्चाई बताना सही नही लगा सो फ़ौरन नया बहाना सोचकर बोली – जी वो इनके मामा के यहाँ खेती बाड़ी संभालने वाला कोई नही था.., सो सासू जी ने उन्हें वहीं भेज दिया है…!

सेठानी – वो आधा पागल क्या खेती बाड़ी संभालेगा..? बुला ले उसे यहीं.., कुछ कमाएगा धामाएगा…!

रंगीली – जी मे बोल दूँगी अम्मा जी को…इतना कहकर वो मुस्कुराते हुए अपने काम में लग गयी…!

उधर शंकर मौका देख कर सुषमा के पास चला गया.., अपने बच्चे के साथ साथ उसने उसकी माँ को भी जी भरकर खिलाया..!

सलौनी की छेड़-छाड़ से दिन में जितना उसके लंड ने उसे परेशान किया था उसकी सारी कसर उसने सुषमा को रगड़ कर निकाल ली…!

सुषमा भी अपने बच्चे के बाप के साथ जमकर खाट कबड्डी खेलने के बाद पूरी तरह से संतुष्ट हो गयी…!

दिन में ज़्यादा भीगते रहने और मस्ती करते रहने से शाम को सलौनी जल्दी खा-पीकर सो गयी.., इसका फ़ायदा उठाते हुए रामू के खाना खाकर खेतों की ओर निकलते ही रंगीली अपने बेटे के कमरे में चली गयी…!

शंकर लालटेन की रोशनी में अभी तक पढ़ रहा था.., माँ को आया देख कर उसने अपनी किताबें बंद करनी चाही.., तो वो बोली – पढ़ता रह, अभी समय ही कितना हुआ है…!

वो तो सलौनी आज जल्दी सो गयी, तेरे बापू खेतों की रखवाली को चले गये सो मे तेरे पास चली आई.., तू पढ़ तब तक मे तेरे बालों में तेल लगा देती हूँ..,

ये कहकर वो पलंग पर उसके पीछे दोनो तरफ को टाँगें चौड़ी करके, अपने लहंगे को घुटनों तक चढ़कर बैठ गयी.., फिर उसने तेल की कटोरी से अपनी उंगलियों को भिगोकर उसके घुघराले बालों में डाल दी…!

वो धीरे-धीरे अपनी उंगलियों को उसके बालों में घुमा रही थी जिसके कारण, शंकर को एक अजीब सी शांति मिल रही थी.., लेकिन माँ की गोरी मुलायम पिंडलियाँ उसके मन को ललचा रही थी…,

उसने रंगीली की गोरी-गोरी पिंडलाइयों पर अपना हाथ रख दिया.., रंगीली के बदन में सिहरन सी दौड़ गयी.., तेल लगाते उसके हाथ एक क्षण को ठहर गये..,

कितनी सुन्दर और चिकनी टाँगें हैं मेरी माँ की.., तुझे कोई एतराज ना हो तो इनपर हाथ फेर लूँ..?

रंगीली अपने लहंगे को और उपर चढ़ाते हुए बोली – तू सब कुछ तो कर चुका है.., तो फिर सहलाने के लिए क्यों पूछ रहा है…,

अपने हाथ को उपर नीचे करके उसकी टाँग सहलाते हुए वो बोला – हर काम के लिए पुच्छना ज़रूरी है.., आख़िर तू मेरी माँ है.. तेरी मर्ज़ी के बगैर आज तक मेने कुछ किया है..?

रंगीली उसके सिर की मालिश करते हुए बोली – तेरी पढ़ाई पर असर तो नही पड़ेगा..?

शंकर – नही, आँखें और दिमाग़ अपना काम करेगा.., हाथ अपना.., बस इनकी चिकनाहट देख कर मन करने लगा सो पूछ लिया…!

 
शंकर का भी पढ़ाई से मन बिल्कुल हट चुका था.., उसका हाथ अब उसकी मोटी-मोटी केले के तने जैसी चिकनी सुडौल जांघों तक पहुँच चुका था…!

उसकी हरकत ने रंगीली के मन के तार झन-झनाकर रख दिए.., उसके उपर वासना की खुमारी छाने लगी थी…!

रंगीली अपने आप पर काबू खोती जा रही थी, उसने अपने बेटे के चेहरे को अपनी तरफ घुमाया.., उसके होठों को चूमते हुए बोली – तेरे लिए तो मे सारी की सारी हमेशा तैयार रहती हूँ..,

बिना पूच्छे जो तेरे जी में आए मेरे साथ कर सकता है.., बस मौका सही होना चाहिए.., इतना ध्यान रखना हमारे इस रिश्ते की भनक किसी को लगने ना पाए…!

शंकर ने अपनी माँ की सुडौल गुदाज चुचि को दबाते हुए कहा – लेकिन शायद भनक तो लग चुकी है माँ…,

शंकर के मूह से ये शब्द सुनकर अपने हाथ को उसके हाथ के उपर रखते हुए चोंक कर उसने पुछा – क्या…? किसे..?

शंकर – शायद सलौनी ने हमें देख लिया है वो सब करते हुए…!

रंगीली विश्मय से अपने मूह पर हाथ रखते हुए बोली – हाए राम…ये क्या कह रहा है तू.., क्या उसने ऐसा कहा है…?

शंकर अब तक उसकी चोली को बदन से अलग कर चुका था.., इस एहसास ने कि माँ-बेटे की काम क्रीड़ा की गवाह उसकी खुद की बेटी भी है उसके अंदर की उत्तेजना को और बढ़ा दिया…!

उसके गोल-गोल कांचे जैसे निपल कड़क हो गये.., जिन्हें हल्के हाथ से मसल्ते हुए शंकर ने कहा – हां.., आज स्कूल से आते वक़्त उसने ऐसा कहा…!

फिर उसने दोनो भाई-बेहन के बीच जो भी रास्ते में हुआ वो सब ज्यों का त्यों बयान कर दिया…!

रंगीली मन ही मन सोचने लगी….उसकी बेटी भी अब जवान हो गयी है.., और वो भी अपने भाई से अपना कौमार्य भंग करवाना चाहती है.., शायद इसलिए वो आज इतनी खुश दिखाई दे रही थी…!

मे खम्खा उसपर शक़ कर रही थी कि कहीं वो किसी के प्यार में तो नही पड़ गयी.., लेकिन अपने ही भाई से…, क्या ये ठीक रहेगा…?

फिर उसी के मन के एक कोने ने जबाब भी दे दिया.., क्यों नही.. सलौनी सही तो कह रही थी.., जब मे माँ होकर अपने बेटे से चुद सकती हूँ तो वो क्यों नही…!

रंगीली को सोच में डूबा देख कर एक पल को तो शंकर के मन में डर पैदा होने लगा.., कहीं माँ ये सुनकर नाराज़ तो नही हो गयी.., ऐसा है तो वो कहीं गुड़िया के उपर हाथ ना छोड़ दे..!

उसने डर कर अपना हाथ उसकी मुलायम चुचि से हटा लिया और बोला – क्या हुआ माँ..?

शंकर की आवाज़ ने उसकी सोच को विराम लगा दिया.., वो उसकी आँखों में झाँकते हुए बोली – तूने क्या जबाब दिया उसे…?

शंकर – मेरे सामने और कोई रास्ता नही था.., उसकी ज़िद के आगे मुझे झुकना ही पड़ा और इस वादे के साथ मेने उसे हां कर दी कि फिर वो वही करेगी जो हम कहेंगे…!

अगर तुझे ये ठीक नही लगता तो मे उसे साफ-साफ मना कर दूँगा.., लेकिन प्लीज़ माँ वादा कर तू उसे कुछ नही कहेगी…!

रंगीली ने उसका हटाया हुआ हाथ पकड़कर फिरसे अपनी चुचियों पर रख दिया और उसके पाजामे में बन रहे तंबू को मसल्ते हुए बोली – शायद तूने ठीक ही किया…,

लड़की की जात..इस उमर में भटकने का ख़तरा बना रहता है.., ये अच्छा है कि उसने बाहर कहीं ना जाकर तुझे अपनी इच्छा जताई है..,

मुझे तुम दोनो के इस रिश्ते से कोई एतराज नही है.., कम से कम कुछ अनहोनी तो नही होगी.., घर की बात घर में ही रहेगी…!

रंगीली की बात सुनकर शंकर के चेहरे पर खुशी की लहर दौड़ गयी..,

वो अभी कुछ बोलने ही वाला था कि तभी वहाँ सलौनी की खुशी से भरी किल्कारी सुनाई दी…,

जो ना जाने कब से छुपकर उन दोनो की कामुक क्रीड़ा युक्त बातें सुन रही थी..,

 
आते ही वो अपनी माँ से लिपट गयी.., और खुशी से चहकते हुए बोली – सच माँ.., तुझे मेरे और भाई के रिश्ते से कोई एतराज नही है..?

रंगीली ने प्यार से उसके सिर पर एक चपत लगाई, और उसकी चोटी खींचते हुए बोली – शैतान की नानी.., कब से हम दोनो को देखती आ रही है…?

सलौनी – आई…माँ…चोटी छोड़ ना.., मे तुम दोनो के बारे में सालों से जानती हूँ.., लेकिन अपनी मर्यादा और उम्र का भान था मुझे.., आज सही मौका देख कर मेने भाई को बोल दिया…!

और रही बात बाहर किसी लड़के के प्रेम जाल में फँसने की तो मे तो अपना कोमल दिल कब का अपने भाई को सौंप चुकी हूँ, फिर भला इसमें किसी और के लिए जगह कहाँ से होगी…!

रंगीली ने अपनी बेटी को खींचकर अपने सीने से लगा लिया.., शरारत की पुतली सलौनी ने माँ की नग्न चुचि को अपने मूह में भर लिया और उसे किसी छोटी बच्ची की तरह छू छूकर चूसने लगी…!

रंगीली के चहरे पर ममतामयी मुस्कान तैर गयी.., उसने शंकर को भी इशारा किया और दूसरी चुचि उसके मूह में दे दी…!

उसके दोनो हाथ ममता और उत्तेजना बस दोनो के सिरों पर पहुँच गये और बड़े स्नेह के साथ अपनी दोनो चुचियों को चूस रहे अपने बच्चों के सिरों को सहलाने लगी…!

चुचि चूसना छोड़कर सलौनी ने अपनी माँ से कहा – तो आज ही मे भाई के साथ…

रंगीली – आज नही...एक हफ्ते बाद तेरा जन्म दिन है...उस रात को मे खुद अपने हाथों से तेरी सील तेरे प्यारे भाई के इस शानदार हथियार से खुलवाउंगी…!

ये कहकर उसने सलौनी के सामने ही शंकर के नाग का फन दबा दिया.., और बोली – अब तू जा जाकर चैन की नींद ले…!

सलौनी – नही माँ, आज मे यहीं बैठकर आप दोनो की वो …. देखना चाहती हूँ.., प्लीज़ मना मत करना…!

सलौनी ने ये बात इतनी मासूमियत से कही कि रंगीली चाहकर भी मना नही कर पाई…उसने मुस्कुरा कर उसकी कोमल अनछुई चुचियों को सहला दिया..,

पहली बार किसी दूसरे का हाथ अपनी चुचियों पर लगते ही सलौनी के मूह से एक मादक सिसकी निकल गयी…!

रंगीली ने उसे अपनी ओर खींच लिया, अपनी सुडौल छाती से दबाते हुए बोली – चल ठीक है देख लेना..,

अच्छा है तू भी कुछ सीख लेगी कि एक असली मर्द एक औरत को बिस्तर पर किस तरह से रोन्द्ता है…..!

अपनी माँ के मूह से रज़ामंदी भरे शब्द सुनकर सलौनी का कोमल सरल मन आनंदित हो उठा.., एक अंजानी सी उत्तेजना उसके पूरे बदन में दौड़ने लगी..,

अपने कोमल मनोभावों पर काबू करते हुए वो पालती लगाकर बिस्तेर के एक कोने में बैठ गयी और आनेवाले कुछ पलों में अपने सामने होने वाले माँ-बेटे के बीच के कामोत्तेजित घमासान को देखने के लिए अपने आप को तैयार करने लगी..!

जो चुदाई आज तक वो छुप छुपकर देखती आ रही थी, उसे वो आज अपने बिल्कुल नज़दीक से, अपनी माँ की रज़ामंदी से देखने को मिलने वाली थी…!

यही सब सोच सोचकर उसका बदन उत्तेजना से भर उठा.., उसके अनछुए बदन के स्पेशल पार्ट्स में एक अजीब सी सुरसूराहट सी होने लगी.., जिसकी वजह से उसका नाज़ुक बदन हल्के हल्के से काँपने लगा…!

शंकर और रंगीली ने एक बार मुस्कुरा कर उसकी तरफ देखा.., फिर माँ का इशारा पाकर उसने अपना काम शुरू कर दिया…!

एक हाथ रंगीली की चुचि को सहलाते हुए उसने दूसरे हाथ से उसके लहंगे का नाडा खींच दिया..,

उधर रंगीली ने उसको उपर से नंगा कर दिया.., फिर उसके पाजामे को निकाल कर अंडरवेर में उफान ले रहे उसके 8” के लंड को ज़ोर्से मसल दिया…!

आआईयईई…माआ…क्या करती है…लंड मसल्ने से शंकर के मूह से एक मादक कराह निकल पड़ी.., और उसने उसके लहंगे को भी निकाल फेंका…!

बिना कच्छि के अब दोनो भाई बेहन के सामने उनकी माँ की भरपूर जवान यौनी चमक रही थी.., जो बिना बालों के उसकी दोनो माल पुए सी फूली हुई फांकों को देख कर सलौनी उत्तेजना से भर उठी..,

वो मन ही मन अपनी मुनिया की तुलना उसकी फूली हुई भरपूर जवान चूत से करने लगी.., उसकी आँखों में वासना भरने लगी.., उसका सुंदर सा चेहरा और लाल होने लगा…!

 
अपनी बेटी को टक-टॅकी लगाकर अपनी चूत देखते हुए रंगीली ने मुस्करा कर कहा- क्या देख रही है सलौनी..? कैसी लगी तेरी माँ की चूत तुझे..? देख ले, तू भी इसी में होकर निकली थी…!

माँ के मूह से इतने खुले शब्द सुनकर सलौनी पर वासना का खुमार तारी होने लगा.., उसका मन कर रहा था कि वो अपनी माँ की बिना बालों वाली चिकनी चमचमाती हुई सुदर कचौड़ी जैसी फूली हुई चूत को छूकर देखे..,

सो अपनी इच्छा जताते हुए बोली – बहुत सुंदर है माँ.., मन कर रहा है मे इसे छूकर देखूं…!

रंगीली – तो देख ना.., मना किसने किया है.., आजा मेरी लाडो.., करले अपने मन की.

बस फिर क्या था, सुनते ही वो उछल्कर अपनी माँ की टाँगों के पास जा बैठी और अपनी कोमल पतली पतली उंगलियों से उसकी चिकनी चमेली को छूकर देखते हुए बोली…

कितनी मुलायम और फूली हुई है ये तो.., मेरी तो…कहते कहते वो लाज्बस चुप रह गयी.., उसकी अधूरी बात का मातब समझते हुए रंगीली उसका टॉप उतारते हुए बोली…

तेरी तो क्या..? खुलकर बोल ना लाडो…, तेरी अभी ऐसी नही है यही ना….

उसने शर्म से अपने होठ चबाते हुए अपनी मुन्डी हां में हिला दी.., उसकी छोटी सी ब्रा में क़ैद उसके कच्चे अमरुदो को अपने हाथों में लेकर रंगीली बोली…

अरे वाह देखो तो कैसी शर्मा रही है मेरी गुड़िया.., अपने भाई का मूसल जैसा लंड लेने को तैयार है.., और शर्म के मारे ज़ुबान तालू से चिपक रही है…

चल दिखा तो अपनी मुनिया.., हम भी तो देखें.., हमारी गुड़िया रानी कितनी जवान हो गयी है..?

सलौनी अपनी गर्दन ना में हिलाते हुए बोली – मुझे शर्म आ रही है आप दोनो के सामने..,

उसकी बात सुनकर रंगीली ने शंकर की तरफ इशारा किया.., जिसे समझते हुए उसने सलौनी की बगलों में गुदगुदी कर दी.., वो खिल-खिलाकर वहीं बिस्तर पर लेट गयी..,

इसी का लाभ लेते हुए शंकर ने उसका लोवर खींच कर निकाल दिया.., हँसते हुए उसने अपने घुटने मोड़ कर अपने पेट से लगा दिए.., और अपनी नन्ही सी कच्छी को टाँगों से छुपाने का प्रयास करने लगी…!

शंकर ने उसकी पतली-पतली चिकनी मुलायम जांघों को सहलाते हुए फिरसे गुद-गुदि की जिसे सहन ना कर पाने की सूरत में उसकी टाँगें लंबी हो गयी.., इतने में ही रंगीली ने उसकी कच्छी भी निकाल दी…!

अब सलौनी भी मात्र अपनी छोटी सी ब्रा में बिस्तर पर गुड-मूड पड़ी अपनी छोटी सी अनछुई मुनिया को छिपाने का असफल प्रयास कर रही थी…!

रंगीली अपनी बेटी के कोमल बदन से अपनी सुडौल चुचियों की मसाज देती हुई उसे उठने का बोलते हुए बोली- उठना लाडो.. अब इतना भी क्या शरमाना.., तू तो मेरी चूत देखने वाली थी ना.., फिर क्या हुआ…?

देख ज़्यादा नखरे करेगी ना, तो फिर अपने भाई से चुदना तो तू भूल ही जा….!

माँ की इस धमकी का जबरदस्त असर हुआ और सलौनी अपनी लाज शर्म भूलकर फ़ौरन उठकर बैठ गयी…!

रंगीली ने उसकी टाँगें चौड़ा कर उसकी अनछुई मुनियाँ के पतले-पतले होठों को जो आपस में चिपके हुए थे.., बस दोनो के बीच एक पतली सी बारीक लकीर थी..,

उनपर उसने अपना हाथ रखकर सहला दिया.., सलौनी के मूह से एक मादक सिसकी निकल गयी.., सस्स्सिईइ…हाईए…रहने दे ना माँ…बहुत गुद-गुदि होती है.. ये कहकर वो फिरसे अपनी जांघों को आपस में जोड़ने लगी…!

उधर शंकर ने उसकी ब्रा भी निकाल दी.., अपनी छोटी बेहन के कच्चे-कच्चे अनारों को देख कर जिनके शिखर पर दो छोटे-छोटे किस्मीस के दाने जैसे निपल चिपके हुए थे…

जो अब इतनी छेड़-छाड़ से कड़क होकर बाहर को निकल आए थे, उन्हें अपनी चौड़ी हथेली से दबाकर उसने उसके अनारों को थामकर सहला दिया…!

हाईए…भाईईइ…ज़ोर्से नही.., दर्द करते हैं…,

रंगीली ने उसका एक हाथ अपनी पकौड़े जैसी चूत पर रख कर दबा लिया.., और दूसरे हाथ से उसकी चूत सहलाते हुए बोली – दर्द सहना सीख लाडो.., तभी तो तू अपने भाई का ये घोड़ा पछाड़ अपने अंदर ले पाएगी…!

ये कहकर उसने उसका एक हाथ पकड़कर शंकर के लंड पर रख दिया.., जो कड़क होकर अंडरवेर को फाडे दे रहा था…!

 
सलौनी का हाथ लगते ही वो और ज़्यादा बुरी तरह से फन-फ़ना उठा.., दोनो के जवान बदन बिजली के करेंट की तरह झन-झना उठे…!

सलौनी ने शंकर के लंड को अपनी मुट्ठी में लेकर दबा दिया.., अपनी बेहन का हाथ लगने से शंकर के बदन में एक नयी उत्तेजना भर उठी.., वो सिसकते हुए बोला –

आअहह…गुड़िया…, और ज़ोर्से दबा इसे…,

धीरे – धीरे सलौनी की झिझक कम होती जा रही थी.., उसने उसका अंडरवेर भी निकाल दिया और नंगी आँखों से पहली बार इतने नज़दीक से अपने भाई के लंड को निहारने लगी…!

उसको बड़ी प्यारी नज़रों से निहारते हुए अपने कोमल हाथों से उसे सहलाने लगी…, उसका मन हुआ कि उसे चूम ले.., सो धीरे-धीरे वो उसके उपर झुकने लगी…!

शंकर ये जानकर कि उसकी प्यारी बेहन उसके लंड को चूमने वाली है.., इस एहसास ने उसके लंड को और बुरी तरह से सख़्त कर दिया.., वासना की आग में वो दहकने लगा…!

अब सलौनी की गरम सासें उसके लंड पर पड़ने लगी थी.., शंकर को ये लम्हा असहनीय होने लगा.., वो चाहता था कि जल्दी से सलौनी इसे अपने होठों के बीच लेकर चूसे…!

अंततः सलौनी के तपते होठ उसके गरम दहक्ते लोहे जैसे सख़्त लौडे पर रख गये…, शंकर ने उत्तेजना बस अपने होठ कस लिए..,

उधर लंड की गर्मी उसके मुलायम होठ सहन नही कर सके और उसने फ़ौरन अपना मूह अलग कर लिया…!

रंगीली ने अपनी बेटी के सिर को स्नेह से सहलाते हुए कहा – क्या हुआ लाडो.., अपना मूह क्यों उठा लिया तूने.., चूस ले अपने भाई का लंड.., अच्छा लगेगा तुम दोनो को, देख तो कैसा बुला रहा है तुझे…, शंकर के लौडे की ठुनकी देख कर रंगीली बोली…!

सलौनी ने सिर उठाकर अपनी माँ को देखते हुए कहा – ये तो बहुत गरम है माँ..,

रंगीली ने मुस्कुराते हुए कहा – असली मर्द का लंड है गुड़िया.., चल पहले तू इसे चख ले.., फिर भाई तेरी मुनिया को चखेगा…!

इतना कहकर उसने सलौनी के सिर को उसके लंड पर दबा दिया.., सलौनी ने उसे अपने होठों के बीच ले लिया और कुछ लंबाई तक वो अपने मूह में लेकर उसे चूसने लगी…!

कुछ देर लंड चूसने के बाद रंगीली ने अपनी बेटी को अपने उपर खींच लिया.., इस झटके से शंकर का लंड उसके मूह से निकल गया..,

रंगीली ने उत्तेजना के बशिभूत सलौनी की छोटी सी कच्ची मुनिया को अपनी पकौड़े जैसी फूली हुई चूत पर दबा लिया और उसकी कमर को पकड़ कर उपर नीचे करते हुए एक दूसरे की चूत को आपस में रगड़ने लगी…!

ये गरमा-गरम दृश्य देख कर शंकर का लॉडा खुशी से झूमते हुए उसके पेट तक ठोकरें मारने लगा…!

दोनो माँ -बेटी की वासना भी पल प्रतिपल बढ़ती जा रही थी, दोनो के मूह से कामोत्तेजना में लिपटी हुई गरम गरम साँसें एक दूसरे के चेहरे से टकरा रही थी…!

बेत-हाशा सिसकते हुए उन दोनो के होठ आपस में जुड़ गये…, और बुरी तरह से एक दूसरे की चुतो को आपस में रगड़ती हुई वो एक दूसरे के होठों को चूसने लगी…!

सलौनी किसी बच्ची की तरह अपनी माँ के गुदाज बदन पर पड़ी मचल रही थी.., रंगीली की तनी हुई सुडौल चुचियाँ.., सलौनी के कच्चे अनारों से रगड़ खा रही थी..,

माँ की पाव रोटी जैसी चिकनी चूत से सलौनी की हल्के रोँये वाली कच्ची कली जैसी चूत के होठ आपस में रगड़ा खाते तो वो अपने मूह से निकलती सिसकी को रोक नही पाती….!

बड़ा ही कामुक नज़ारा था, जिसे शंकर उनके पैरों में बैठा देख रहा था और बुरी तरह से अकडे हुए अपने लंड को मसल मसल कर शांत करने की कोशिश कर रहा था…!

लेकिन ऐसे हालत में वो भला कैसे शांत हो पाता, जितना वो उसे नीचे को दबाता, छोड़ते ही उससे कई गुना वेग से वो जाकर उसके पेट से टकराता, जिससे चटक जैसी आवाज़ आती, मानो किसी ने थप्पड़ मारा हो..,

 
बड़ा ही कामुक नज़ारा था, जिसे शंकर उनके पैरों में बैठा देख रहा था और बुरी तरह से अकडे हुए अपने लंड को मसल मसल कर शांत करने की कोशिश कर रहा था…!

लेकिन ऐसे हालत में वो भला कैसे शांत हो पाता, जितना वो उसे नीचे को दबाता, छोड़ते ही उससे कई गुना वेग से वो जाकर उसके पेट से टकराता, जिससे चटक जैसी आवाज़ आती, मानो किसी ने थप्पड़ मारा हो..,

दोनो की चुते रस से सराबोर होने लगी थी…, सिल्परी होने से उन दोनो को और ज़्यादा मज़ा आरहा था.., लेकिन शंकर को सहन करना भारी पड़ता जा रहा था…!

जब कभी ज़्यादा दबाब डालकर सलौनी अपनी चूत अपनी माँ की चूत के उपर दबाती तो उसकी पतली-पतली फांकों वाली मुनिया, रंगीली की भरपूर जवान फूली हुई चूत में कहीं खो सी जाती..

देखते देखते शंकर का धीरज जबाब दे गया.., उसने सलौनी की पतली सी कमर में अपना एक हाथ डालकर उसे फूल की तरह उठा लिया.., और माँ की साइड में पटक कर उसकी गीली मुनिया के होठों पर अपने प्यासे होठ रख दिए…!

हमला इतना अप्रत्याशित था की दोनो में से कोई भी समझ नही पाई.., रंगीली की चूत किसी भट्टी की मानिंद दहक रही थी..,

बेटे को बेटी की चूत पर हमला करते देख उसकी वासना फट पड़ी और उसने अपनी चूत में एक साथ दो-दो उंगलियाँ डालकर बहुत तेज़ी से अंदर बाहर करने लगी…!

उधर सलौनी की पतली पतली फांकों को जब शंकर की लिज-लीजी जीभ ने चाटा.., मानो डूबते को तिनके का सहारा मिल गया हो.., सलौनी ने अपनी कमर उचका कर उसकी जीभ का स्वागत किया…!

एक मादक सिसकी लेकर वो तड़प कर बोली – आअहह….सस्स्सिईइ…भाई…मेरे… अच्छे भीइ…हाई…रीए…चाट ले…खजाअ…मेरी चूत को…,

उउम्म्मनन्ग्घह…..चूस ले भाई..अपनी प्यारी गुड़िया की चूत को…,

बहुत परेशान करती है…,,, उउऊययईीी…म्म्माआ…मुझे क्या हो रहा है….उउउहह…. उउउहहुउऊ…माइय्य्ाआ…मोररीइ…..मे उड़ रही हूँ.., पकदूओ.. मुझीए…

बुरी तरह सिसकते हुए उसकी कमर हवा में लहराने लगी…,

इधर रंगीली…अपनी बेटी की ऐसी कामुक सिसकियों को सुनकर और ज़्यादा उत्तेजना में भरकर तेज़ी से अपनी उंगलियों को चूत में अंदर बाहर करने लगी…,

और कुछ ही क्षणों में वो भल भला कर झड़ने लगी…!

इधर जब शंकर को लगा कि सलौनी अपनी चूत का पानी छोड़ने वाली है.., उसने अपने होठों को उसकी फांकों पर कस लिया और एक जोरदार चुस्का मारा…!

सलौनी को लगा मानो उसके बदन से प्राण निकल कर उसकी मुनिया के रास्ते शंकर के मूह में समाते जा रहे हों…,

किल-कारी मारते हुए उसने अपनी कमर को धनुषकार मोडते हुए वो भी शंकर के मूह में झड़ने लगी….!

कुछ पलों बाद माँ बेटी की उत्तेजना थम गयी.., शंकर चटकारे ले लेकर अपनी गुड़िया की चूत का सारा रस गटक चुका था.., फिर उसके प्यारे से होठों को चूमकर बोला…

बहुत स्वीटी है गुड़िया तू…, मज़ा आ गया…!

शंकर की बात सुनकर जहाँ सलौनी ने शर्म से अपना मूह उसकी छाती में छुपा लिया वहीं रंगीली एक लंबी साँस लेकर मुस्कुराते हुए बोली – आख़िर बेहन किसकी है..?

स्वीट तो होगी ही.., वैसे भी कोरी गागर का पानी तो हमेशा मीठा ही होता है.., लेकिन अब लगता है तेरे शेर के हाल चाल कुछ ठीक नज़र नही आ रहे मुझे…!

देख तो बेचारा कैसा फड़ फडा रहा है.., किसी बिगड़ैल घोड़े की तरह बिदक रहा है…!

 
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