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रंगीला लाला और ठरकी सेवक

शंकर मूह बाए एक तक बस मामी को ही देखे जा रहा था जो सीधे पल्लू में गुजराती स्टाइल में पिंक कलर की सिल्क साड़ी में थी.., पल्लू

उन्होने ऐसे ही अपने कंधे पर बस टाँग रखा था जो उनकी एक तरफ की चुची से होता हुआ कंधे पर पड़ा था…!

व शेप गले का स्लीव्लेस्स कसा हुआ ब्लाउस जिसमें से उनकी 34डी की मस्त सुडौल कसी हुई चुचियाँ बाहर उबलने को तैयार थी..,

वक्षों की सुडौलता इस बात से आँकी जा सकती थी कि इतने कसे हुए ब्लाउस के बावजूद भी उनके बीच की गहरी घाटी काफ़ी चौड़ी थी.., वरना तो अमूमन इस उमर की औरतों की चुचियों के बीच कसे हुए ब्लाउस में पिलपिले वक्ष आपस में जुड़कर मात्र एक दरार जैसी बनाते हैं…!

शंकर सोफे पर बैठते हुए बोला – अरे मामी जी आपने तो इतने सारे सवाल एक साथ पुच्छ लिए.., मे तो ये भी भूल गया कि आपका पहला सवाल क्या था..?

पर हां मे किसी ट्रेन व्रैन से नही आया, अपनी जीप से ही आया हूँ, और अच्छे से सही सलामत आपके सामने हूँ….!

ऊहह…मे समझी अकेले की वजह से ट्रेन से ही आए होगे…, खैर और सूनाओ वहाँ पर सब ठीक से हैं…? तुम्हारे आने से लोग दुखी तो हुए होंगे.. है ना…?

उनका इशारा सुषमा की तरफ था…, लेकिन शंकर इस बात से अंजान था सो बोला – हां थे तो सभी.., मेरी माँ, लाला जी.., क्योंकि उनके सारे काम मेरे ही ज़िम्मे थे ना.., पर दो साल के बाद फिर से सही कर लूँगा…!

मामी ने अपना पल्लू सही करते हुए एक नौकरानी को आवाज़ लगाई – अरी चंपा…ज़रा इधर आ तो…!

अगले ही पल उस महल जैसी कोठी के ना जाने कों से कोने से दौड़ती हुई चंपा नाम की नौकरानी उनके सामने हाज़िर हो गयी.., और सिर झुका कर बोली – जी मालकिन..

उसने सिर झुकाए हुए ही अपनी तिर्छि नज़र शंकर पर डाली जो उसे किसी हिन्दी फिल्मों के हीरो जैसा लगा.., शंकर को देखकर चंपा के मूह

में पानी आगया…!

शंकर ने भी चंपा का सरसरी नज़र से मुआयना कर डाला.., 25-26 साल की गठीले बदन की चंपा हल्के साँवले रंग की बड़ी बड़ी छाती.., मोटे

मोटे चूतड़.., और सबसे खास बात उसकी थोड़ी (चिन) पर 5 काले बिंदु गूदे हुए थे…!

वो कुच्छ कुच्छ सुनील शेट्टी की फिल्म गोपी किशन की चंदा (गोपी की वाइफ शीबा) जैसी थी.., सॉरी.., ये फिल्म उस जमाने की नही है सो ये शंकर का आंकलन नही मेरा है…हहहे…

कुल मिलकर अगर शंकर की जगह मेरे जैसा चोदु भुक्कड़ होता तो उस चंपा पर हाथ सॉफ…सॉरी लंड साफ करने की ज़रूर सोच लेता..,

लेकिन शंकर के लिए तो छप्पन भोग सजे हुए रहते थे हर जगह तो उसने बस उसे सरसरी तौर पर ही देखा…!

वर्षा देवी – अरी चंपा.., ये शंकर है, आज से हमारे साथ ही रहेंगे.., इनके खाने पीने और सभी तरह का ख्याल रखने की ज़िम्मेदारी तेरी है..,

अब ज़रा इनके लिए अच्छा सा नाश्ता बनाके ला…!

चंपा ने नज़र भर शंकर को देखा और उसकी तरफ मुस्कान बिखेरती हुई जी मालकिन कहकर रसोई घर की तरफ चली गयी….!

अभी वो रसोई तक पहुँची भी नही थी कि मामी बोली – रुक मे भी आती हूँ.., आज अपने हाथों से शंकर के लिए नाश्ता मे बनाती हूँ, बर्ना ये कहेगा की मामी को मेहमान नवाज़ी करना भी नही आता है…,

शंकर उन्हें रोकते हुए बोला – अरे मामी जी आप बैठिए.., मे कोई ऐसा वीआइपी नही हूँ, गाओं का गँवार आदमी हूँ, चंपा जो बनाएगी ख लूँगा, प्लीज़ आप मेरे लिए तकलीफ़ मत करिए…!

लेकिन मामी ने शंकर की एक नही सुनी…, उनका बस चलता तो वो उसके एक इशारे पर उसके नीचे बिच्छने को भी तैयार थी…, सो उठकर रसोई की तरफ चल दी…!

इस तरह की सारी में पहली बार शंकर की नज़र मामी के पिच्छवाड़े पर पड़ी.., और बस उसका मूह फटा का फटा रह गया…!

सच में क्या जीयोमॅट्रिकल शेप थी मामी के बदन की.., जितना आगे से सीना निकला हुआ था उससे कहीं ज़्यादा मामी की गान्ड का उभार था..,

सामने से जो कर्ब नीचे से उपर को बनता था, पीछे से जस्ट उसका उल्टा.., चौड़ी सपाट पीठ उसके बाद कमर का ढलान, पीठ हल्की सी

अंदर, उसके ठीक नीचे एक कर्ब पीछे को उठता चला गया और एक परफेक्ट गोलाई लिए हुए जंगों के जोड़ पर जा मिला…!

सीधे पल्लू की जो की नाभि के नीचे कस्के बँधी हुई साड़ी में मामी का कर्ब एकदम से उजागर हो रहा था..,

जिसे देखकर शंकर का लॉडा भी तारीफ किए बिना नही रह सका और अपने पिटारे में ही उसने मामी की गान्ड को सलामी दे डाली….!!!!

 


वर्षा देवी चंपा की मदद से शंकर के लिए अत्यंत ही लज़ीज़ नाश्ता बनाकर लाई.., और उसे शंकर के सामने सर्व करने लगी…, फिर दोनो ने

मिलकर नाश्ता किया….!

नाश्ते के दौरान उन्होने खुलेदिल से शंकर को अपने रसीले यौबन का रस्पान कराया…, शंकर भी मामी के बहरे-पूरे यौबन का स्वाद लेते हुए

लज़ीज़ नाश्ते का आनंद लेता रहा…,

उसने और उसके बाबूराव दोनो ने वर्षा देवी के उस लावन्यमयी यौबन को मन ही मन खूब सराहा , उसका बाबूराव तो पॅंट के अंदर से ही लगाम तोड़कर मामी की मक्खमली घाटी में उतरने के लिए उच्छल कूद मचाने लगा…!

शंकाए अपनी माँ समेत उसने अबतक जितनी भी औरत या लड़कियों को चखा था उन सब में उसे मामी अब्बल नज़र आ रही थी, यही कारण था कि उसका बाबूराव भी टाइट कपड़ों के बाबजूद भी फड़फड़ाने लगा था…!

ख़ासकर उनके दूध जैसे, मक्खन से भी कोमल व शेप ब्लाउस से झलकते उनके.. उनके वो दो अमृत फल, जिन्हें देखकर वो पहले भी लार टपका चुका था…!

शंकर को ये पक्का विश्वास था कि मामी को हाथ लगाने भर की देर है.., वो किसी पके आम की तरह उसकी झोली में तपाक पड़ेंगी…,

लेकिन वो अपनी तरफ से कोई भी ऐसी पहल नही करना चाहता था जिससे उसके या लाला जी के नाम को ज़रा सा भी दाग लगे..!

नाश्ते के बाद कुच्छ देर वो दोनो आपस में इधर उधर की बातें करते रहे.., इस दौरान शंकर ने जमकर चक्षुचोदन का लुत्फ़ उठाया..,

रास्ते भर खुली जीप में सफ़र करने से पसीने और धूल मिट्टी से उसका पूरा शरीर चिप-चिपा रहा था सो उसने कुच्छ देर बाद नहाने की

इच्छा जताई…!

यौं तो वर्षा देवी के घर का हरेक कमरा किसी 5स्टार होटेल के सूयीट से कम नही था.., उनके अपने बेडरूम के ठीक बगल वाला ही रूम उन्होने शंकर के रहने के लिए तैयार कराया था..,

फिर भी काफ़ी दिनो से यूज़ ना होने की वजह से कमरे के बाथरूम के टॅप वग़ैरह शायद चोक हो गये थे.., किसी में पानी आता था किसी में नही.

उन्होने नौकर से कह कर प्लमबर को बुलवाया भी लेकिन वो बिज़ी होने की वजह से आज नही आ सका था, तो उन्होने ड्रॉयिंग रूम के बाजू

वाला कंबाइन बाथरूम शंकर के नहाने के लिए चंपा को नहाने का समान चेक करने का बोला…!

शंकर अपने बॅग से अपने ज़रूरत के कपड़े लेने अपने रूम में गया तबतक चंपा ने उस बाथरूम में सब समान चेक कर लिया, जो नही था वो रख कर वो बाथरूम में ही शंकर के आने का इंतेजार करने लगी…!

दिन छिपने लगा था सो मामी हॉल से उठकर शाम की दिया आरती करने किचन के बाजू में बने मंदिर में चली गयी…!

उधर जब शंकर अपने कपड़े लेकर बाथरूम में पहुँचा तो वहाँ उसे चंपा मिली जो बस यों ही उसे आता देख कर खटर-पटर करने लगी…!

शंकर को आया देखकर वो बोली – लाइए हमें अपने कपड़े उतारकर दे दीजिए मे मशीन में डाल देती हूँ धोने के लिए…!

चंपा इस समय अपनी चोली के उपर चुनरी भी नही डाले थी.., उसकी कसी हुई चोली में उसके बड़े बड़े मम्मे चोली को फाड़कर बाहर आने के लिए उताबले हो रहे थे…!

शंकर ने एक नज़र उसकी चुचियों के बीच की घाटी पर डाली जो दोनो तरफ के पर्वत शिखर चोली के दबाब से एक दूसरे के काफ़ी करीब

आ गये थे, इस कारण से उनके बीच की खाई काफ़ी संकरी हो गयी थी…,

उसका बाबूराव जो मामी के हुश्नो शबाब के दर्शन के बाद बुरी तरह आग बाबूला होने लगा था, वो अब थोड़ा बहुत लाइन पर आया ही था कि

अब चंपा की इस संकरी घाटी पर नज़र पड़ते ही वो फिरसे अपना सिर उठाने लगा…!

अब ऐसे में अगर वो अपना पॅंट इसके सामने उतारता है तो… बेचारी ज़रा सी फ्रेंची इसको कितनी देर झेल पाएगी…, सो उसने चंपा को वहाँ

से टरकाने की गरज से कहा – तुम जाओ मे अपने कपड़े यही रख दूँगा कल धोने के लिए ले लेना…!

चंपा – काहे…! अभी दीजिए ना, अभी धो देती हूँ, सुबह ज़्यादा कपड़े हो जाते हैं धोने को…!

चंपा की तर्कपूर्ण बातें सुनकर शंकर चुप रह गया…, अब वो उसके सामने कैसे अपने कपड़े उतारे.., साला उसका नाग अभी भी पूरी तरह शांत नही हुआ था..,

एक अंजान नौकरानी के सामने वो अपने छोटे से फ्रेंची में कैसे आ सकता था…, अब वो उसे क्या जबाब देकर यहाँ से टरकाए यही सोच रहा था.. की चंपा उसके कसरती बदन पर नज़र गढ़ाए हुए फिर बोली –

अरे इतना काहे सोच रहे हैं भैया.., हमार गाओं में तो कोई मरद इतना संकोच नाही करत.., ओउर आप हैं कि लौंडिया सरिखन शरमाई रहा..,

लाइए दीजिए हामका अपना कपड़ा…!

तभी उस कमरे जैसे विशाल बाथरूम के एक कोने में उसे मशीन जैसी दिखाई दी.., गाओं में तो सभी हाथ से ही कपड़े धोते थे.., सो उसे पता

ही नही था कि वॉशिंग मशीन कैसी होती है..,

 
शंकर ने अपना दिमाग़ दौड़ाया.., वॉशिंग मशीन होनी तो बाथरूम में ही चाहिए, और ये कामन बाथरूम ही है, तो फिर शायद यही होगी.., ये

सोचकर उसने चंपा से पूछा - ये क्या है चंपा..?

चंपा – यही तो है उऊ..मशीन जेमा कपड़ा धुलत हैं…!

शंकर समझ गया कि ये साली जान-बूझकर यहाँ खड़ी उसके लंड को देखना चाहती है सो वो उसे टरकाने की गरज से बोला – तुम जाओ, मे इसमें कपड़े डाल दूँगा, तुम बाद में आकर धो लेना..,

चंपा शंकर की बात सुनकर एक बार तो अच-कचा गयी.., लेकिन उसने तो ठान रखा था कि वो शंकर के इस आलीशान शरीर के दर्शन बिना

कपड़ों के करना चाहती है सो बड़ी ढीठता से बोली –

आप समझ काहे नही रहे हैं.., हमारे पास उतना समय नही है ना.., आप कपड़े दीजिए हम आइ मा डाल कर मशीन चलाई देव.., जब तक आप नहाएँगे तब तक कपड़ा भी धूल जाईब… लाइए अब दे भी दीजिए….

शंकर उसकी बात सुनकर निरुत्तर सा हो गया.., अब उसे कोई और बहाना नही सूझ पा रहा था.., यहाँ आए हुए उसे चन्द घंटे ही तो हुए थे..,

और पहले ही दिन उसे एक नौकरानी के सामने अपने कपड़े उतारने पड़ेंगे…!

चंपा किसी भूखी बिल्ली जैसे कि दूध के बर्तन पर नज़र गढ़ाए इस आशा में बैठी रहती है कि कैसे भी करके इसका दूध मुझे पीने को मिल

जाए.., कुच्छ ऐसी ही नज़रों से वो टक-टॅकी लगाए शंकर को देख रही थी…!

शंकर के पास अब और कोई चारा नही था.., सो उसने अपने दोनो हाथों से टीशर्ट को पकड़कर अपने शरीर से अलग करने लगा…!

जैसे जैसे टीशर्ट उसके शरीर से अलग हो रही थी, वैसे वैसे उसका एकदम सुर्ख, गोरा कसरती बदन चंपा की आँखों के सामने उजागर होता

जा रहा था..,

जिसे वो कपड़ों के अंदर से ही देख कर लार टपका रही थी.., वो अब चन्द पलों में उसके सामने बेपर्दा होने जा रहा था…!

जैसे ही शंकर के 6 पॅक उसके सामने नुमाया हुए.., चंपा के मूह से एक आहह.. निकल गयी…, वो बस एक टक आँखें गढ़ाए शंकर को ही

देखे जा रही थी…!

शंकर ने अपनी टीशर्ट निकालकर एक तरफ रख दी.., उसे चंपा की नज़रों से शर्म सी महसूस हो रही थी….लेकिन और कोई चारा भी तो नही था..,

उसने एक नज़र चंपा की तरफ डाली जो सिर्फ़ एक टक उसी को निहार रही थी.., शंकर ने शर्म के मारे अपनी दोनो बाजुओं को अपने सीने

पर कसकर जोड़ लिया.., इस वजह से उसकी बाजुओं के कठोर मसल्स और ज़्यादा टाइट होकर उभर आए…!

उसकी बाजुओं की मछलियो को देख कर चंपा के मूह से स्वतः ही फुट पड़ा – आअहह…वाह कैसा मस्त कसा हुआ बदन है भैया आपका..,

मे ज़रा इससे छूकर देखूं…? ये कहते हुए वो एक कदम उसकी तरफ बढ़ी…

शंकर पीछे होते हुए बोला – नही.., और अपना मूह उधर करो.., मुझे पॅंट उतारनी है…!

चंपा वहीं ठिठक गयी और बोली – काहे.., चड्डी नही पहने हैं का…?

शंकर उसे कैसे कहता कि उसका बाबूराव किस हालत में है और बेचारी चड्डी किस हद तक उसे रोके रखने में नाकाम है फिर भी वो बोला– पहनी तो है लेकिन मे आज तक किसी औरत के सामने खाली चड्डी में नही आया.

चंपा ने हँसते हुए कहा – बहुत शरमाते हैं…, अच्छा ठीक है मे तब तक मशीन ऑन करती हूँ, आप पॅंट उतारकर मेरी तरफ फेंक दीजिएगा…!

शंकर ने खीजते हुए कहा – हां ठीक है, तुम अपना काम करो.., अब यहाँ मेरे सिर पर खड़ी मत रहो..,

चंपा ने उसकी टीशर्ट उठाई, कुच्छ और कपड़े लिए और मशीन में डालकर उसकी पवर ऑन करते हुए तिर्छि नज़र से शंकर की तरफ देखा

जो अपनी पॅंट की जीप नीचे खींच रहा था…!

चंपा कनखियों से उसी पर नज़र गढ़ाए हुए थी.., कि अब वो अपनी पॅंट नीचे करेगा.., कैसा होगा नीचे का उसका बदन.., लेकिन तभी शंकर ने ऐसा कुच्छ किया जिसकी चंपा को कतयि उम्मीद नही थी…….!!!
 
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चंपा कनखियों से उसी पर नज़र गढ़ाए हुए थी.., कि अब वो अपनी पॅंट नीचे करेगा.., कैसा होगा नीचे का उसका बदन.., लेकिन तभी शंकर ने ऐसा कुच्छ किया जिसकी चंपा को कतयि उम्मीद नही थी…….!!!

चंपा इस आस में थी कि शायद जैसा कसा हुआ सुंदर मर्द का शरीर उपर से ऐसा है तो नीचे इसकी कसरती जांघें और उनके पाट, कसी हुई पिंडलियाँ कैसी होंगी…!

हो सकता है इसके अंडरवेर के उभार से ये अंदाज़ा हो जाए कि इसका लंड कितना मजबूत होगा, यही सब सोच सोच कर वो चुपके से

तिर्छि नज़र उसपर गढ़ाए वॉशिंग मशीन के पास खड़ी थी…!

शंकर ने पॅंट की जिप खींचकर अपनी पॅंट की कमर में दोनो तरफ से हाथ के अंगूठों को फँसाकर उसे नीचे करते हुए एक बार उसने चंपा की तरफ देखा…!

शंकर इतना अनाड़ी भी नही था, वो फ़ौरन ताड़ गया कि ये साली चुपके से उसी पर नज़र गढ़ाए हुए है.., उसने फ़ौरन अपने हाथ पॅंट की

कमर से हटाए और हॅंगर से तौलिया उतारकर उसने पहले अपनी कमर पर लपेटी, उसके बाद पॅंट को नीचे से पकड़कर खींचा…!

वो नौकरों की मानसिकता से भली भाँति परिचित था, मूह पर कुच्छ भी कहलवा लो, लेकिन पीठ पीछे ये अपनी चुगलखोरी से बाज नही आते, एक बात की सौ बनाकर नमक-मिर्च मसाला लगाकर दूसरे के सामने पेश करने में इन्हें महारत हासिल होता है..,

इन्ही सब बातों को ध्यान में रखते हुए वो चंपा के सामने बेशर्म नही बन’ना चाहता था, वरना ये साली ना जाने किस-किसके सामने ढिंढोरा पीटेगी…,

और शंकर को यहाँ पूरे दो साल निकालने थे, वो नही चाहता था कि ऐसी छोटी-छोटी बातों से इस घर के लोगों के दिलों में उसके प्रति कोई नकारात्मक धारणा बने…!

शंकर का सही समय पर ये सही निर्णय था, लेकिन चंपा के लिए ये खड़े लंड पर धोखा देने जैसा हो गया.., वो तो आस लगाए बैठी थी कि नीचे का भी कुच्छ नज़ारा देखने को मिलेगा.., लेकिन शंकर ने उसके सारे अरमानों पर पानी फेर दिया…!

मन ही मन भुन-भुनाते हुए उसने शंकर के कपड़े मशीन में डाले और फ़ौरन बाथरूम से बाहर निकल गयी.., उसकी ये मनोदशा देख कर शंकर मुस्कराए बिना नही रह पाया..,

उसके जाते ही उसने बाथरूम का दरवाजा बंद किया और नहाने में जुट गया….!!!

वो कम से कम आधे घंटे तक नहाता रहा, साबुन से अपना सारा पसीने से भरा बदन सॉफ किया और शावर लेते हुए अपने बदन के साथ

साथ अपने मुसलचंद को भी ठंडा करता रहा जो यहाँ आने के बाद से ही दो-तीन घंटे से पॅंट के अंदर ही अंदर गरम होता रहा था…!

 
वो भी बेचारा क्या करता.., आते ही एक के बाद एक ऐसे सर्कम्टॅनसस पैदा होते रहे कि वो एक पल के लिए भी चैन से बात ही नही पाया था…!

नयी नयी जगह के टेन्षन में वो अपनी टीशर्ट और लोवर तो ले आया लेकिन बॅग से अंडरवेर लाना भूल गया.., अब अकेले लोवर के सॉफ्ट लूस कपड़े में बिना अंडरवेर के 8” जे 3” के अपने नाग को संभालना ज़रा मुश्किल ही था..!

भले वो पानी की ठंडक से शांत पड़ गया था.., लेकिन एक कहावत हमारे यहाँ खूब मश-हूर है… मारा हाथी भी बिठौरे (गोबर के उपलो का ढेर) के समान होता है…

तो ढीले ढाले लोवर में बिना अंडरवेर के चलने में वो किसी मंदिर के घटे की तरह हिलता हुआ सामने से दिखेगा.., और चंपा रानी तो ऐसे ही किसी मौके की तलाश में है…,

हो सकता है मामी भी पूजा ख़तम करके हॉल में ही मौजूद हों, ये सब सोच विचार करके उसने अपने लोवर के उपर तौलिया भी लपेट लिया.., जिससे अब कुच्छ कम हिलता नज़र आ रहा था…!

शंकर जैसे ही अपने आधे अधूरे कपड़े पहन कर बाथरूम से निकला, सामने ही सोफे पर मामी बैठी दिखाई दी, उनका ध्यान टीवी पर था लेकिन बाथरूम का दरवाजा खुलने की आवाज़ सुनकर उन्होने शंकर की तरफ देखा जो एक सुर्ख लाल रंग की टीशर्ट और नीचे तैलिया लपेटे था…!

ये अजीब सा कॉंबिनेशन देख कर वर्षा देवी के चेहरे पर मुस्कान आगयि.., शंकर एक नज़र उनपर डालकर तेज़ी से अपने रूम की तरफ बढ़ गया…!

तभी वर्षा देवी ने चंपा को आवाज़ लगाई.., अरी चंपा ज़रा देख तो शंकर के कमरे में और किसी चीज़ की ज़रूरत तो नही है…!

अपनी मालकिन का हुकुम सुनकर तो चंपा की बान्छे ही खिल उठी.., वो अबतक जो नही देख पाई थी, शायद अब देखने को मिल जाए.., उसे पता था की शंकर तौलिए में नहा कर गया है.., इतना जल्दी कपड़े पहनने वाला नही है..,

सो जल्दी से जी मालकिन बोलकर वो शंकर के कमरे की तरफ लपक ली…!

शंकर को सपने में भी ये गुमान नही था कि जिस आफ़त से वो मुश्किल से पीछा छुड़ा कर आया था वो इतनी जल्दी फिर उसके कमरे में आ

धम्केगि..,

वो तो शवर के पानी की ठंडक से अभी अभी तरो ताज़ा होकर आया था, सीलिंग फॅन के नीचे आकर उसने अपनी टीशर्ट और तौलिया भी

निकाल दी जिससे उसके बदन की नमी अच्छे से सूख जाए साथ ही नहाने के बाद फन की हवा उसे कुच्छ ज़्यादा हो सुकून दे रही थी…!

 
अभी वो तौलिए से अपने बालों को सूखने में व्यस्त था जब चंपा ने उसके कमरे में कदम रखा.., दरवाजे की तरफ उसकी एक साइड थी..,

शंकर को मात्र एक चार अंगुल की फ्रेंची में देख कर चंपा वहीं ठिठक गयी.., शंकर उसे देखकर कहीं अपने आप को फिरसे ना छुपा ले इसलिए उसने अपने आप को दरवाजे की ओट में कर लिया…!

चंपा शंकर की कसी हुई मजबूत बालों से लबालब भरी हुई जांघों को देखकर मन ही मन उसकी तारीफ किए बिना नही रह पाई…,

सुर्ख गोरे रंग पर उसका काले काले बालों से भरा बदन कामदेव का स्वरूप जैसे उसके सामने हो..,

नॉर्मल पोज़िशन में भी शंकर का लंड अक्च्छा ख़ासा था उसने फ्रेंची को आगे से उठाके रखा हुआ था.., इस वजह से उसकी जाँघो के साइड से अच्छा ख़ासा गॅप बना हुआ था..,

उसे उसका मूसल तो नही दिखा लेकिन उसकी जड़ ज़रूर दिखाई पड़ रही थी.., अनुभवी चंपा ने उसकी एक झलक से ही पता लगा लिया कि उसकी मजबूती कैसी होगी.., उपर से नॉर्मल सोए हुए शेर का आकार भी गवाही दे रहा था कि वो जागने के बाद कैसी दहाड़ मारता होगा…!

इतनी देर में ही शंकर के शरीर के इन अनौखे/ अनूठे दर्शन मात्र से ही चंपा की जांघों के जोड़ में सुर-सुराहट सी होने लगी.., उसने अपने

एक हाथ से अपनी चूत को लहँगे के उपर से ही मसल कर एक ठंडी सी आहह.. भरी…!

वो मन ही मन बुद बुदाने लगी.. काश.. इस कामदेव जैसे मर्द का लंड मे अपनी चूत में ले पाउ, अपने दोनो हाथ जोड़कर आँखें बंद करके बोली – हे पीपल वाले बाबा.., कोई चमत्कार दिखाओ ना…!

उसने फिरसे कमरे में नज़र दौड़ाई, अब शंकर किसी खास तेल की बॉटल से अपने बदन की मालिश कर रहा था.., ना जाने वो कॉन्सा तेल था जिसकी बहुत ही तेज महक दरवाजे को पार कर चंपा के नथुनो में समाने लगी…!

वो उसकी खुसबु सूंघ कर और ज़्यादा मस्त होने लगी…!

शंकर इश्स समय अपने सीने पर खूब रगड़ रगड़ कर मालिश कर रहा था.., चंपा इमेजिन करने लगी, शंकर उसकी चुचियों को मसल रहा

है.., ये सोच कर उसका खुद कर हाथ अपनी मांसल बड़ी बड़ी चोली में क़ैद चुचियों पर पहुँच गया…!

उपर से मालिश करते हुए जब शंकर अपनी जांघों पर कसकर तेल मलने लगा.., साथ ही उसके हाथ फ्रेंची की साइड से अपने बाबूराव को चिकना करने के लिए अंदर गये….,,,

चंपा का धैर्य जबाब दे गया.., उसके मूह से एक मादक सिसक निकल पड़ी और आहह भरते हुए उसके मूह से निकल गया….

आअहह…हाई...शंकर भैया…, मे मालिश करूँ आपकी…???

उसकी आवाज़ सुनते ही शंकर ने लपक कर तौलिया उठाया और उसने अपना शरीर छुपा लिया.., चंपा को अपनी ग़लती का एहसास हुआ.., लेकिन अब हो भी क्या सकता था..,

 
इससे पहले की शंकर उससे कुच्छ कहता उसने वहाँ से चुप-चाप सरकने में ही अपनी भलाई समझी….!!!!!

कपड़े पहन कर कुच्छ देर शंकर कमरे में पड़े आलीशान बेड पर लेट गया.., आँखें बंद करके अबतक के पूरे घटना क्रम पर विचार करने लगा.., मामी का यौवन उसकी आँखों में रह रह कर घूम रहा था…,

फिर चंपा की कसी हुई जवानी.., उसने सोचा ये इतनी बुरी भी नही है.., भोगने में मज़ा देगी साली बड़ी हॉट है.., क्या कसी कसी गान्ड है इसकी.., लेकिन सोचा नही उसपर अपना समय बर्बाद करना ठीक नही रहेगा..!

अगर किसी तरह मामी या किसी और घरवाले को भनक भी लग गयी तो मेरी इज़्ज़त का भाजी पाडा हो जाएगा.., ख़ासकर उससे चारू की

चिंता थी जो पहले से ही ना जाने क्यों उससे खिचि खिचि सी थी….!

अगर मेरी किसी उल्टी सीधी हरकत का उसे पता चला.., तो उसे मौका मिल जाएगा मुझे यहाँ से चलता करने का…!

अब उसकी सोचों का दायरा और पीछे खिसकता चला गया, उसे वो वाक़या याद आगया जब पहली बार उसकी माँ ने उसके साथ संभोग किया था..,

पहली बार माँ के उस मादक नग्न शरीर के दीदार करते ही कैसे उसका लंड बेकाबू हो गया था…,

जिसे माँ ने अपने मुलायम हाथ में लेकर सहलाते हुए अपने मूह में लेकर उसे प्यार किया था.., फिर खुद ही मुझे अपने उपर लेकर अपने हाथ से अपनी रसीली चूत में रख कर मेरी कमर में अपनी बाहें डालकर एक झटका देकर मेरे लंड को अपने अंदर किया था…!

शंकर को लगा जैसे सच में उसका लंड माँ की चूत में जा रहा हो.., धीरे-धीरे.., वो मस्त होने लगा.., स्वतः ही उसका हाथ अपने पाजामे में

क़ैद लंड पर चला गया.., जो सचमुच किसी बिगड़ैल घोड़े की तरह अंदर ही अंदर हिन-हिना रहा था…!

उसने उसे ज़ोर्से मसल डाला और अपनी सोच पर खुद ही मुस्करा उठा.., वो इतना ज़्यादा एक्शिटेड हो गया की अपने लंड को मुट्ठी में लेकर एकबार उसे ज़ोर्से मरोड़ दिया…!

मरोड़ने से उसका लंड बजाए कमजोर पड़ने के और ज़्यादा भड़क उठा, मानो कह रहा हो… मादरचोद भोसड़ी के मरोड़ता क्यों है.., गान्ड में दम है तो जल्दी से मेरे लिए सुराख का कुच्छ जुगाड़ कर..

देख वो चंपा कैसी मुझे देख कर अपनी चूत मसालने लगती है.., डाल दे उसकी चूत में मुझे.., कसम से बहुत मज़ा देगी साली.., बहुत गरम माल है रे…!

 
लंड और शंकर के बीच द्वंद छिड़ गया था.., उसे वो कैसे भी करके शांत करना चाहता था.., कहीं ऐसा ना हो मामी ही यहाँ देखने चली आयें

कि मे इतनी देर से क्या कर रहा हूँ, सो वो उठकर अपने कमरे के अटॅच्ड बाथरूम में घुस गया..,

उसने नल खोलकर देखा.. जिसमें थोड़ा थोड़ा करके पानी आ रहा था..,

शंकर ने आज तक कभी मूठ नही मारी थी.., ज़रूरत ही नही पड़ी उसे.., उपर से माँ की शिक्षा.., उसे आज भी याद है जब उसकी माँ ने

कहा था.., बेटा मूठ मारने से लंड की नसें कमजोर पड़ने लगती हैं…,

सो उसने मग्गे में पानी लेकर अपना पाजामा और अंडरवेर उतारकर पानी की धार अपने लंड के सुपाडे पर डालने लगा…!

काफ़ी मसक्कत के बाद वो भेन्चोद कुच्छ शांत हुआ…!!!

कपड़े ठीक करके कमरे में आया.., दो-चार लंबी लंबी साँस लेकर अपने मन की वासना को शांत किया और फिर ड्रॉयिंग रूम की तरफ चल दिया…!

लेकिन कहते हैं ना..” जहाँ जाएगा भूखा वहीं पड़ेगी सूखा” शंकर जैसे तैसे करके अपने लंड को समझा बुझाकर कमरे से निकला था कि सामने के सेकने ने उसके सोए हुए शेर पर पत्थर ही दे मारा…!

सामने ड्रॉयिंग रूम के लंबे चौड़े सोफे पर मामी घुटनों तक सारी चढ़ाए हुए अपनी टाँगें पसारे बैठी थी.., सारी का पल्लू एकदम अलग थलग पड़ा था.., ब्लाउस के उपर के दो बटन खुले हुए…!

उनके पीछे खड़ी हुई चंपा उनके कंधे की मालिश कर रही थी.., मामी की आँखें बंद थी.., और चंपा का ध्यान पूरी तरह उनकी गर्दन और कंधों की मालिश पर…!

शंकर के होश गुम.., साँस लेना ही जैसे भूल गया वो.., वहीं एक जगह जड़ होकर रह गया, उसकी नज़र सामने चल रहे सीन पर उपर से

नीचे और फिर नीचे से उपर भ्रमण करने लगी…,

मामी के उपर झुकी हुई चंपा की चोली में कसी हुई चुचियाँ जो दो बड़ी बड़ी गेंदों जैसी चोली से बाहर निकली पड़ रही थी..,

थोड़ा नीचे नज़र पड़ते ही मानो जन्नत सामने हो.., मामी के दो बड़े बड़े दूध जैसे गोरे दशहरी आम जैसे स्तन.., ब्लाउस से लगभग आधे बाहर

निकले हुए, उनकी सफेद ब्रा में क़ैद कबूतरों की तरह बाहर आने को फड-फडा रहे थे…!

और नज़र नीचे करते ही.., मामी की घुटनों तक की गोरी गोरी चिकनी पिंडलियाँ.., एकदम मक्खन के माफिक…!

देखते ही उसका लंड पाजामा में तुनकि मारने लगा.., अंडरवेर के बावजूद उसने..बड़ा सा तंबू बना दिया…!

शंकर वहीं खड़ा असंजस की स्थिति में था.., आगे बढ़ुँ या ना बढ़ुँ.., चंचल मन जिसका द्वार हैं दोनो आँखें जो कह रही थी.., कि देख बेटा..,

इस जन्नत के दर्शन बार बार नही होते…,

लेकिन लंड की दशा देखकर उसे बड़ी शर्म सी महसूस होने लगी.., साला ऐसी हालत में अगर तू वहाँ गया.., ये दोनो घोड़ियाँ वैसे भी इसे लेने की जुगत में हैं.., इन्हें झट से मौका मिल जाएगा…!

और ऐसा नही भी हुआ तो मामी क्या सोचेंगी.., कि देखो कैसा दिल फेंक लौंडा है.., ज़रा ज़रा सी बात पर इसका खड़ा हो जाता है…!

लिहाजा उसने वहाँ से सटकने में ही अपनी भलाई समझी, वो पलते पलते भी उसकी आँखें उस हसीन नज़ारे को देखने का लालच नही छोड़ पाई…,

ध्यान उसका अभी भी उन दोनो की मदमस्त जवानी में ही उलझा था और वो कमरे में लौटने के लिए पलटा…!

नतीजा ! गॅलरी की साइड में रखे एक गमले से टकरा गया.., पैर की ठोकर बड़ी जोरदार लगी.., गमला ज़मीन पर उलट गया और उसके पैर के अंगूठे में दर्द की एक तेज लहर सी दौड़ गयी…!

गमले के गिरने की आवाज़ से उन दोनो का ध्यान भंग हुआ.., देखा तो शंकर एक पैर को हवा में उठाकर दर्द से बिल-बीलाता हुआ एक पैर पर नाच रहा था…,

मामी ने अपना पल्लू सही किया और लपक कर एक सेकेंड में ही दोनो उसके पास जा पहुँची.., दोनो ने आजू बाजू से उसके दोनो बाजू थाम लिए और मामी बोली –

क्या हुआ शंकर ..? पैर में चोट लग गयी क्या..? कैसे लगी..? और ये गमला कैसे गिर गया…?

एक साथ इतने सवाल.., जिनका शंकर के पास एक का भी कोई माकूल जबाब नही था…, उपर से पैर में भयकर दर्द…, वो अपने दर्द पर काबू करते हुए बोला – कुच्छ नही मामी जी हल्की सी ठोकर लग गयी गमले में.., मे देख नही पाया.., नयी नयी जगह है ना इसलिए…!

हाए राअम.. तुम इससे हल्की सी चोट कहते हो.., इतना भारी गमला तुम्हारी ठोकर से उलट गया.., और तुम इससे मामूली सी चोट समझ रहे

हो.., चल चंपा.., इससे सोफे तक ले चलो.., वहीं बिठाकर देखते हैं क्या हुआ है इसके पैर को…???

शंकर के लाख मना करने पर भी वो नही मानी.., दोनो ने दोनो तरफ से उसके बाजुओं को अपनी अपनी गर्दन से होते हुए कंधों पर रखा और उसे सहारा देते हुए सोफे की तरफ चल दी…,

चंपा शंकर से थोड़ी ज़्यादा छोटी थी लेकिन मामी की हाइट अच्छी ख़ासी थी, वो उसके कनपटी तक आ रही थी, वहीं चंपा उसके सीने तक ही थी.. इस वजह से शकर का भार चंपा के उपर ज़्यादा पड़ रहा था…!

उसे सहारा देकर लेजाते हुए अचानक चंपा की नज़र उसके पाजामा में बने हुए तंबू पर पड़ी.., जो पैर के दर्द की वजह से थोड़ा कम तो हुआ लेकिन इतना नही कि उसे नॉर्मल पोज़िशन में कहा जा सके…!

वो एक मिनिट में ही सारा माजरा समझ गयी.., कुच्छ देर पहले तक वो भी तो अपनी मालकिन के गोरे-गोरे सुडौल स्तनों को देख देख कर उत्तेजित हो रही थी फिर शंकर तो फिर भी भरा पूरा मर्द है…,

ज़रूर वो हम दोनो को देखकर मज़े ले रहा होगा इसलिए बेखयाली में उसे ये ठोकर लगी है…,

ये विचार आते ही चंपा के चेहरे पर एक शरारत भरी मुस्कान आ गयी और शंकर को सोफे पर बिठाते हुए बोली – लागत है शंकर भैया का ध्यान कहीं और था मालकिन वरना इतना बड़ा गमला कैसे नही दिखा……?

मामी – तू चुपकर, क्या निरि बाबरियों जैसी बात करती है.., ये वक़्त ऐसी बातों का है ज़रा देख इसका पैर, चोट ज़्यादा तो नही है.., डॉक्टर को बुलाउ क्या…?

अरे नही मामी जी क्यों आप इतना परेशान होती हैं, मामूली सी चोट है.., कुच्छ देर गीला कपड़ा बाँध के रखूँगा सही हो जाएगी.., आप चिंता ना करो…शंकर ने सहज भाव से कहा…,

मामी – चिंता कैसे ना करूँ बेटा.., आज पहले दिन आते ही तुम्हें चोट लग गयी.., चंपा ज़रा गरम तेल की मालिश ही कर्दे…!

चंपा – अरे मालकिन हम तो बहुत कुच्छ कर सकत हैं…, पर ये शंकर भैया करने दें तब ना.., वैसे ऐसी चोटन के लिए गीला कपड़ा ही ठीक

रहेगा.., हम अभी गीला कपड़ा लाबत हैं..,

ये कह कर उसने एक शरारत पूर्ण मुस्कान शंकर पर डाली और उठकर गीला कपड़ा लेने चली गयी….!!!

 
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