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रंगीला लाला और ठरकी सेवक

शंकर ने उसे अपने से अलग करने की कोशिश करते हुए कहा – अच्छा.. बाद में शर्म नही आएगी…?

अब बता भी दे वरना मे सच में ये बात सबको बता दूँगा..

लल्ली फँस चुकी थी, बचने का कोई रास्ता नही था उसके सामने, सो हिम्मत जुटाकर अटकती सी ज़बान में बोली… वो..हम..लोग..ना.. कुछ ऐसी वैसी बातें कर रहे थे आपस में…

तभी तुम वहाँ आ गये, मे बहुत उत्तेजित हो रही थी उन बातों की वजह से, सो मेरे मुँह से निकल गया कि सलौनी तेरा भाई का वो…वो... मुझे अगर मिल जाए तो..तो.., इतना कहकर उसका चेहरा शर्म से लाल हो गया…!

शंकर – वो क्या..? और क्या करने वाली थी.. साफ-साफ बोल ना…

लल्ली – भैया..प्लीज़ मान जा ना याररर.., मुझसे नही बताया जा रहा…!

शंकर – देख लल्ली शर्म छोड़ और सीधी तरह बता, वरना मे चला अपने घर !

लल्ली एक झटके में ही सारी बात बोलती चली गयी, जिसे सुनकर शंकर का मुँह खुला का खुला रह गया, फिर कुछ सोचकर मन ही मन मुस्कराते हुए बोला…

क्या तू सच में मुझे सारी रात अपनी टाँगों में दबाए रखेगी..!

लल्ली बुरी तरह से शरमाते हुए बोली – नही भैया… वो तो बात की बात में मज़ाक-मज़ाक में बोल दिया.., वरना मे कहीं ऐसा कर सकती हूँ भला…

शंकर ने उसके कंधे पर हाथ रख कर उसे सहलाते हुए कहा – अगर कभी मौका मिले तो आज़माइश करने में क्या जाता है.., हो सकता है जो तूने कहा वो कर दिखाए..!

शंकर के मुँह से ये सुनकर लल्ली ने झट से अपना सिर उठाकर उसकी तरफ देखा..,

शंकर के चेहरे पर एक प्यारी सी मुस्कान देख कर उसकी झिझक कुछ हद तक कम हुई.

थोड़ी हिम्मत जुटाकर उसने उसके सीने को चूम लिया और अपने हाथ से उसे सहलाते हुए बोली – मेरी मज़ाक को इतना सीरियस्ली मत लो भैया…, मे जानती हूँ तुम मुझे ऐसा मौका कभी नही देने वाले…!

शंकर का हाथ उसके कूल्हे पर चला गया और उसने उसे सहलाते हुए कहा – मेरे एग्ज़ॅम हो जाने दे, ये मौका मे तुझे एक बार ज़रूर दूँगा,

शंकर का इतना कहना था कि लल्ली झट से उसके गले में झूल गयी और उसके होंठों पर चुंबन जड़ दिया.., शंकर ने उसके गोल-गोल चुतड़ों को मसल्ते हुए कहा

अभी कुछ नही वो सब बाद में, अब चल घर चलते हैं.., ये कह कर उसने एक बार उसकी मुनिया को अपने खड़े लंड के उपर ज़ोर्से दबा दिया…!

अपनी चूत की फांकों पर शंकर के खूँटे जैसे लंड की ठोकर से ही लल्ली तो जैसे हवा में उड़ने लगी…, दोनो के अंगों ने एक दूसरे की खुश्बू को अच्छे से पहचान लिया…,

इससे पहले की उसका मन और डाँवा डोल होता, शंकर ने उसे अपने से अलग किया और तेज-तेज कदमों से अपने घर की ओर चल दिया…!

उसके पीछे पीछे लगभग दौड़ती हुई लल्ली खुशी के पंख लगाए उसका पीछा करने की कोशिश करती हुई आने लगी….!

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समय धीरे-धीरे लेकिन बड़े मज़े से आगे बढ़ रहा था, रंगीली को अब लाला जी के लंड की ज़रूरत भी महसूस नही होती थी, और वैसे भी उसपर तो आजकल उनकी छोटी बहू कब्जा जमाए हुए थी…!

लाजो के लिए भागते भूत की लंगोटी ही सही वाली बात थी, बच्चा हो या ना हो उसे अब इससे कोई ज़्यादा फरक नही पड़ना था…

कल्लू की लुल्ली मिले या ना मिले क्या फरक पड़ना था, ससुर के लंड में जब तक जान वाकी थी तबतक उसकी चूत की प्यास बुझती रहनी थी…

अब जब ससुर कब्ज़े में है तब तक उसे इस हवेली से कोई हिला भी नही सकता था, सो वो निश्चिंत होकर अपने ससुर के लंड के झूले में झूलती रहती थी…!

उधर रंगीली अपने पति रामू के प्रति अपना प्रेम बढ़ाती जा रही थी, अब वो अपने परिवार को भी समय देने लगी थी…!

पति रामू से अधूरी प्यास वो अपने शेर के लंड से बुझा लेती थी, और उसका शेर बेटा.

जबसे उसे चूत का चस्का लगा था, वो एक हल्के से इशारे पर ही चूत की खुसबु सूँघकर उसकी तरफ खिंचा चला जाता था…,

उसकी माँ के साथ-साथ सुषमा भी उसके प्यार के ऊडनखटोले में मन-मुतविक हवाई सफ़र पर निकल पड़ती थी…!

सुषमा दिनो-दिन शंकर के नित नये तरीक़ों से उसके बलिश्त लंड की धार से निखरती जा रही थी, हर समय उसके चेहरे पर खुशी व्याप्त रहती थी…!

उसकी इस खुशी को देखकर जहाँ सेठ-सेठानी ये सोचकर खुश थे कि शायद इलाज़ की वजह से उनका बेटा बहू को खुश रखने लगा है, वहीं लाजो इसके पीछे का राज जानने की फिराक़ में जल-भुन रही थी…!

इन सब घटनाक्रम के चलते, शंकर के एग्ज़ॅम का समय आ पहुँचा, उसने थोड़ा समय देकर अपने एग्ज़ॅम की तैयारी की, जिसमें सुषमा ने भी उसकी मदद की…!

एग्ज़ॅम होने तक उसने उसे ज़्यादा परेशान नही किया, लेकिन आख़िरी पेपर की रात उन दोनो में से ना कोई सोया और ना दूसरे को सोने दिया…!

एक राउंड अपनी माँ को चोदकर वो सीधा सुषमा के पास चला गया था जो उसके बचे-खुचे माल से ही सराबोर होती रही…!

एग्ज़ॅम का रिज़ल्ट आने में अभी समय था, उससे पहले वो दूसरी परीक्षा में अब्बल नंबरों से पास हो गया…, सुषमा गर्भवती हो गयी…!

पूरी हवेली में खुशी की लहर दौड़ गयी, बहू को उम्मीद से देखकर सेठ-सेठानी की खुशी का ठिकाना नही था…, सेठानी तो सुषमा पर अपना पूरा प्यार उडेलने लगी.. !

वहीं लाजो के अरमानो पर जैसे साँप ही लोट गया, वो अंदर ही अंदर सुलग उठी, उसे ये समझ नही आ रहा था, कि आख़िर ये चमत्कार हुआ कैसे…?

कल्लू की लुल्ली में अभी भी ज़्यादा फरक नही आया था, ये बात वो भली भाँति समझ रही थी, फिर ये हुआ तो हुआ कैसे…?

सुषमा जैसी अच्छे संस्कार वाली बहू किसी और से संबंध बना सकती है इस विषय में तो कोई सोच भी नही सकता था.., यहाँ तक कि छिनाल लाजो भी नही…

सेठ धरमदास को अपने लंड की औकात अब पता चल चुकी थी, सो उन्होने लाजो को समझाया कि अब वो उससे संबध ज़्यादा ना रखते हुए कल्लू के पास ज़्यादा जाए तो हो सकता है उसे भी ये खुशी नसीब हो जाए…!

लेकिन वो ये बात मानने को राज़ी ही नही थी, तो उन्होने उसे समझाया, कि देखो भले ही कल्लू का हथियार छोटा ही सही, लेकिन इलाज़ के कारण उसका बीज़ कारगर हो गया है, इसलिए सुषमा बहू माँ बन सकी है…!

इसपर लाजो ने ज़्यादा बहस करना उचित नही समझा, क्योंकि जबतक वो इसके पीछे की असल वजह का पता नही लगा लेती, तब तक कुछ कहना ठीक नही होगा,

इसलिए उसने अपने ससुर की बात इस शर्त पर मान ली कि कभी-कभार वो उसे अपने लंड की सेवायें प्रदान करते रहेंगे…!

इस पर भला लाला जी को क्या आपत्ति हो सकती थी, भले ही उमर ढल रही थी लेकिन कभी कभार चूत तो उन्हें भी चाहिए थी सो वो उसकी ये शर्त खुशी-खुशी मान गये…!

उधर कल्लू भी हैरानी के साथ-साथ खुश था, कि चलो इलाज़ का कुछ तो फ़ायदा हुआ, ईश्वर ने चाहा तो सुषमा लड़का ही पैदा करेगी, और इस घर को उसका वारिस मिल जाएगा…!

और अब इसी खुशी में वो और ज़्यादा पीकर आने लगा….!

कुछ दिनो बाद शंकर का रिज़ल्ट भी आ गया, और वो अच्छे नंबरों से 12वी पास कर गया…, उसने साइन्स में आगे पढ़ने के लिए अपने परिवार में बात चलाई,

कस्बे के कॉलेज में केवल आर्ट्स सब्जेक्ट्स थे इसलिए साइन्स या कॉमर्स पढ़ने के लिए शहर ही जाना पढ़ता…!

अब शहर का रहना, अकेला लड़का कैसे रहेगा, उपर से इतना पैसा भी उनके पास नही था कि वो उसका अड्मिशन का भी खर्चा उठा सकें…, इसके लिए रामू ने लाला जी से मदद लेने की सोची…!

रंगीली नही चाहती थी कि शंकर शहर जाकर रहे, उसने उसके लिए कुछ अलग ही सोच रखा था, लेकिन वो चुप रही और उसने बेटे के भविष्य के लिए जो भी उचित हो उसका जिम्मा अपने परिवार के उपर छोड़ दिया…!

रामू ने लाला जी से बात चलाते हुए कहा – सेठ जी, हम चाहते हैं, कि शंकर और आगे पढ़े, उसके लिए उसे शहर जाकर बड़े कॉलेज में दाखिला करवाना है…, अगर आपकी मेहरबानी हो जाए तो काम आसान हो जाएगा…!

सेठ धरमदास तो कतयि ये नही चाहते थे कि शंकर उनकी नज़रों से डोर रहे, और वैसे भी कल्लू जैसे नकारा बेटे पर उन्हें बिल्कुल भी विश्वास नही था,

जबसे शंकर ने कल्लू को कॉलेज के लड़कों से बचाया था, तबसे तो उनका

भरोसा उसके उपर और ज़्यादा बढ़ गया था,

वो समझ चुके थे, कि वो जबतक उनके पास है उसके परिवार पर कभी आँच नही आ सकती इसलिए उन्होने रामू की बात को सिरे से खारिज करते हुए कहा…

देखो रामू, तुम शंकर के भविश्य की चिंता बिल्कुल मत करो, वो एक तरह से हमारे घर का ही सदस्य है, आगे चलकर हम उसे अपने कारोबार की बहुत बड़ी ज़िम्मेदारी सौंपने वाले हैं…!

और वैसे भी जैसे तैसे करके तुमने पुराना कर्ज़ चुकता किया है, अब और आगे कर्ज़ लेकर क्यों मुसीबत में पड़ना चाहते हो…!

 
लाला की बातों से रंगीली को छोड़ सभी के साथ साथ शंकर के भी अरमानो पर पानी फिर गया, वो चाहता था कि आगे पढ़ लिखकर कोई अच्छी सी नौकरी करके अपने परिवार को ग़रीबी की ज़ंजीरों से मुक्त करा सके…!

लेकिन लाला की ना ने उसके अरमानो पर पानी फेर दिया, वो ये भी जानता था, कि उसके परिवार की स्थिति ऐसी नही है कि वो शहर के शुरुआती खर्चों का भी बोझ उठा सकें…

लेकिन इस सबसे रंगीली बहुत खुश थी, जब रात को शंकर ने उससे इस विषय पर बात चलाई…!

शंकर – माँ, मे आगे पढ़ना चाहता था, लेकिन लाला जी की ना ने सब किए कराए पर पानी फेर दिया.., तू ही कुछ कर ना, वो तेरी बात कभी नही टालेंगे…!

रंगीली ने प्यार से उसके बालों को सहलाया, और उसकी ठोडी पकड़कर बोली – पढ़-लिखकर क्या बनना चाहता है तू..?

शंकर – मे अच्छे नंबरों से पास हुआ हूँ माँ, आगे और ज़्यादा मेहनत करके कोई सरकारी नौकरी मिल जाएगी, हमारी ग़रीबी दूर हो सकती है…!

रंगीली – नौकरी करके भी तो तू किसी की गुलामी ही करेगा ना, और कॉन कहता है कि हम ग़रीब हैं…! अरे हम दिल के तो अमीर हैं.., हमारे दिलों में एक दूसरे के लिए प्यार तो है…!

मे नही चाहती कि मेरा राजा बेटा किसी की भी गुलामी करे, अरे वो तो राजा है, राज करना उसकी नियती है…!

शंकर – ये तू कैसी बहकी-बहकी बातें कर रही है…? अभी भी तो हम लाला जी की गुलामी ही कर रहे हैं ना, उसके बदले में क्या मिलता है हमें..?

दो वक़्त की रोटी, ये मामूली से कपड़े, बस इसी में खुश रहना चाहती है तू, इतने से के लिए तू खुद और बापू दोनो मिलकर लाला जी के लिए जी तोड़ मेहनत करते हो..!

रंगीली – तो पहले हम कोन्से सुखी थे, तेरे बापू सरकारी बोझा ढोते-ढोते कमर झुकने लगी थी उनकी, मेने वहाँ से काम छुड़वा कर यहाँ काम पर रखवाया,

जाकर उनको पुच्छ, वो पहले खुश थे या अब हैं, खेतों पर एक मैयत (मुख्य नौकर) का काम करते हैं, दूसरे मजदूर उनके कहने पर चलते हैं…!

शंकर – तो तू क्या चाहती है, कि मे भी लाला जी के यहाँ मैयत बनकर उनके खेतों में काम करूँ, नही माँ मे ये काम कभी नही करना चाहता…!

रंगीली अपनी पुतलियों को उपर चढ़ाकर कमरे की छत को घूरते हुए बोली –

मे भी नही चाहती कि तू किसी की मेहनत मज़दूरी करे, मे चाहती हूँ कि मेरा बेटा इस हवेली पर ही नही बल्कि इस पूरे इलाक़े पर राज करे………!

अपनी माँ के मुँह से ये लफ़्ज सुनकर शंकर फटी फटी आँखों से उसे घूरता ही रह गया…, उसके दिमाग़ में आँधियाँ सी चलने लगी, उसे समझ नही आ रहा था कि आख़िर उसकी माँ चाहती क्या है…?

वहीं रंगीली के चेहरे पर एक रहस्यमयी, किंतु विश्वास से भरी हुई मुस्कान थी जिसे समझना शंकर जैसे अल्प विकसित दिमाग़ वाले युवक के बस के बाहर था….!

सुषमा की प्रेग्नेन्सी को 3 महीने हो चुके थे, शंकर ने अपनी आगे पढ़ने की इच्छा को अपने दिल की गहराइयों में दफ़न कर लिया..,

लाला ने सेठानी के कहने पर बहू सुषमा को शहर के हॉस्पिटल ले जाकर उसका गर्भ चेक कराया, जिसकी रिपोर्ट के मुतविक बेटा ही आया…!

शंका का निवारण होते ही, हवेली में मानो खुशियों की बाहर आ गयी, उधर लाजो और ज़्यादा जल-भुन उठी…,

एक दिन लाला ने गोद भराई की रस्म के तौर पर हवेली में बड़े से झलसे का आयोजन किया, अपनी दोनो बेटियों को भी बुलाया…!

बड़ी बेटी प्रिया एक बेटी की माँ बन चुकी थी, लेकिन छोटी बेटी सुप्रिया को अभी कोई बच्चा नही था…, दोनो बेटियाँ भी अपने भतीजे होने की खुशी सुनकर दौड़ी चली आई…!

बड़ी बेटी प्रिया थोड़ी घमंडी टाइप की थी, बिल्कुल अपनी माँ पार्वती देवी की तरह, वहीं सुप्रिया शांत और मिलनसार स्वभाव की थी, वो मालिक और नौकर में कोई भेद नही करती थी..

वहीं प्रिया, नौकरों को हर संभव मौका तलाश कर अपने रुतवे और पैसों के घमंड में अपने पैर की जूती समझती थी…

जहाँ सुप्रिया बचपन से ही शंकर और उसकी माँ रंगीली से काफ़ी घुली मिली थी वहीं प्रिया उन दोनो को भी दूसरे नौकरों की तरह ही हर समय झाड़ती रहती थी, अपने पैरों की जूती समझती थी…

शंकर की जवानी देख कर सुप्रिया उसके कामदेव जैसे ऊप पर आशक्त हो गयी, उसकी शादी के वक़्त वो जवान हो रहा था,

पर वो तब भी उसे बहुत पसंद करती थी, लेकिन अब तो उसकी दाढ़ी मूँछे भी आना शुरू हो रही थी, और क्या सजीला रूप निखरा था पट्ठे का.

उस जमाने के फिल्मी हीरो भी कहीं नही ठहर पाते, सो सुप्रिया की पुरानी चाहत उसके दिल के रास्ते आँखों तक आ गई…!

वो उसके मर्दाने रूप जाल में खिचती चली गयी, लेकिन सामाजिक प्रतिष्ठा को मद्देनज़र रखते हुए वो अपने मन की बात ज़ुबान तक नही ला पा रही थी…!

वो दोनो ही पहले से ज़्यादा सुंदर दिखने लगी थी, प्रिया तो माँ भी बन चुकी थी, सो उसका बदन थोड़ा ज़्यादा हो गया था यही कोई 34-30-36 का फिगर होगा…

लेकिन सुप्रिया अभी भी 32-28-34 की स्लिम लड़की ही थी, शायद पति के लंड के स्वाद ने उसके निखार में ज़्यादा बढ़ोत्तरी नही की थी…!

पुरुष और नारी के फ़र्क और आकर्षण से अब शंकर भी अंजान नही था, सो तिर्छि नज़र से उसने भी सुप्रिया को चाहत भरी नज़रों से देखा..,

किसी तरह दोनो की नज़रें एक हुई, दोनो ने एक दूसरे को समझा, जहाँ उन्हें एक दूसरे के प्रति प्रेम और आदर दिखाई दिया…!

शंकर ने दोनो को हाथ जोड़कर नमस्ते किया, सुप्रिया ने मुस्कुरा कर उसके अभिवादन का जबाब हाथ जोड़कर ही दिया,

वहीं प्रिया, अपना टेडा मुँह करके बोली – हां.. ठीक है, ठीक है, जाओ अपना काम करो, यहाँ तुम्हारी नमस्ते का कोई भूखा नही बैठा…!

सुषमा को उसकी ये बात कुछ ज़्यादा ही नागवार गुज़री, वहीं सेठानी का तो स्वभाव ही अपनी बेटी से मेल ख़ाता था…!

रंगीली सुषमा के अधिक नज़दीक रहती थी, प्रिया को उसकी ये आदत अच्छी नही लगी और उसने उसे खरी खोटी सुनाते हुए कहा –

हम सब समझते हैं कि तुम जैसी नौकर ऐसे मौकों पर अपने नेग लेने के चक्कर में तीमारदारी दिखाने का ढोंग करती है, जाओ, जाकर अपना काम करो, यहाँ हम सब हैं भाभी का ख्याल रखने के लिए…

उसकी बात सुनकर रंगीली लहू का सा घूँट पीकर रह गयी, वहीं शंकर एक पल भी वहाँ नही ठहरा…!

अपनी ननद के इस तरह के व्यवहार पर सुषमा ने तीखी प्रतिक्रिया देने की कोशिश की, लेकिन रंगीली ने उसका हाथ दबाकर उसे शांत रहने का इशारा किया…!

 
दूसरे दिन बड़े हर्सोउल्लास के साथ गोद भराई की रसम अदा हुई.., सुषमा के माता-पिता भी आए अपनी बेटी को आशीर्वाद देने.

सबने कुछ ना कुछ बहू को तोहफे भेंट किए, बड़े बुजुर्गों ने आशीर्वाद दिए…, अंत में जब सेठ और सेठानी ने अपनी बहू को आशीर्वाद दिया, तब सुषमा ने अपने ससुर से कहा -

पिताजी आज मे आपसे आशीर्वाद के अलावा भी कुछ और माँगना चाहती हूँ,

लाला जी – हां बहू, माँगो जो भी माँगना चाहती हो, हमारे बस में हुआ तो हम आज किसी भी चीज़ के लिए मना नही करेंगे तुम्हें…!

सुषमा – मे जानती हूँ, आज आप सब लोग मुझसे नही मेरी कोख में पल रहे इस घर के चिराग की वजह से खुश हैं..,

लाला जी – ऐसी बात नही है बेटा, तुम हमारी बड़ी बहू हो हम तुमसे हमेशा से ही खुश हैं…

सुषमा - अगर ऐसा ही था तो आप मेरे होते हुए अपने बेटे का दूसरा विवाह नही करते…!

अब मे उसी चिराग के भविष्य के लिए इस घर की सारी मिल्कियत की मालिकी चाहती हूँ, क्या आप दे पाएँगे ये मुझे…?

लाला समेत सभी उसकी ये बात सुनकर सन्नाटे में आ गये, वहीं रंगीली के होंठों पर मुस्कान तैर गयी…!

लाला चोन्कते हुए बोले – ये तुम क्या कह रही हो बहू..? ये सब कुछ तुम्हारा ही तो है…!

सुषमा – ऐसा आप आज कह रहे हैं, क्योंकि आज मे आपको इस घर का चिराग देने जा रही हूँ इसलिए, वरना आप इनकी दूसरी शादी कभी नही करते…!

सुषमा के शब्द लाला के दिल में किसी नुकीले तीर की तरह चुभे, वो कसमसाते हुए बोले – ये संभव नही है बहू, ये सब कुछ हमारे बाद कल्लू का होने वाला है, और उसके बाद उसकी औलाद का..,

कल को अगर तुमने ही या छोटी बहू से और बच्चे पैदा हुए तो वो भी इसमें बराबर के हक़दार होंगे…!

सुषमा – इसके लिए मे कभी इनकार नही करती, बेशक वो इस मिल्कियत के हक़दार होंगे, लेकिन तब तक सब कुछ मेरे अधिकार में रहेगा…!

लाला – आख़िर ये सब तुम क्यों चाहती हो, क्या तुम्हें हमारे उपर भरोसा नही है ?

सुषमा – भरोसा !.... ये एक ऐसा शब्द है, जो एक-दूसरे पर समान रूप से लागू होता है पिताजी,

जब आपने मुझ पर भरोसा नही किया, कि मे बेटा पैदा करने योग्य हूँ या नही.. तो अब इस शब्द का कोई अर्थ नही रहा…!

लाला उसके तर्क के आगे निरुत्तर हो गये, आज उन्हें अपनी पत्नी के कहने पर बरसों पहले की गयी अपनी ग़लती का एहसास हो रहा था,

लेकिन वो उसकी इस शर्त को भी मंजूर नही कर सकते थे, सो बोले –ये संभव नही है बहू…!

सुषमा – तो फिर इस बच्चे का भी इस हवेली में पैदा होना संभव नही है…!

सुषमा के ये शब्द किसी तीर की तरह उनके सीने को बेधते चले गये, वो दर्दभरे स्वर में बोले – ये कैसी हट है तुम्हारी बहू..,

फिर वो उसके पिता को संबोधित करके बोले –समधी जी आप ही कुच्छ कहिए ना इसे, ये जो चाहती है वो हमारे जीते जी संभव नही है…

सुषमा के पिता – वो ग़लत भी तो नही कह रही समधी जी, क्या पता कल को कुछ और ही बात बने और हमारी बेटी दर-दर की ठोकरें खाने पर मजबूर हो जाए…,

लाला – आप भी..! समझदार होकर, आप भी ऐसी बातें कर रहे हैं…?

सुषमा के पिता – आप ने भी तो समझदार होकर एक ग़लत फ़ैसला किया ही था, मे अपनी बेटी की बात से पूरी तरह सहमत हूँ,

अगर आप उसकी इस जायज़ माँग को नही मान सकते तो वो भी अपना फ़ैसला लेने के लिए स्वतन्त्र है, और इसमें मे हमेशा उसके साथ हूँ…

वो चाहे तो अपने बच्चे को लेकर यहाँ से जा सकती है, मे उसका जिंदगी भर हर संभव साथ दूँगा, आख़िर वो भी मेरी औलाद है.., एक फॅक्टरी उसके नाम से ही सही…!

अब लाला के पास हथियार डालने के अलावा और कोई चारा नही था, क्या पता आगे कोई और बच्चा उसकी दूसरी बहू से ना हुआ तो…? इसके लिए वो खुद भी कोशिश कर ही चुके हैं..

ये सब सोच विचार करने के बाद उन्होने फ़ैसला ले ही लिया और बोले – ठीक है बहू, हम अपनी सारी मिल्कियत तुम्हरे हाथों में सौंपते हैं, लेकिन तुम्हें भी एक वचन देना होगा,

अगर भविश्य में कल्लू की कोई और औलाद होती है तो वो इसमें बराबर की हक़दार होगी…!

सुषमा – मुझे मंजूर है, चाहें तो आप वसीयत में ये बात लिखवा सकते हैं.

लाला के इस फ़ैसले से जहाँ एक ओर लगभग सभी लोग सहमत दिखे, वहीं लाजो पर तो मानो गाज ही गिर पड़ी, वो अंदर ही अंदर घायल नागिन की तरह फुफ्कार उठी,

लेकिन फिलहाल इतने सारे लोगों की मौजूदगी में वो कर भी क्या सकती थी, हवेली में उसे अपनी औकात पता थी…

जहाँ सुषमा का मायका लाला से भी कई गुना ज़्यादा समृद्ध था, वहीं लाजो के ग़रीब माँ-बाप उसे अपने घर में अब पनाह भी नही दे सकते थे…,

इसलिए वो इस समय जल-भुन’ने के अलावा कुछ नही कर सकती थी, उसे बस इंतजार था तो अपने ससुर से अकेले में बात करने का जब वो उसके लंड पर झूला झूल रही होगी…!

शंकर की आगे की पढ़ाई का सपना खटाई में डालने के बाद लाला जी ने उसे अपनी जयदाद की देखभाल का काम सौंप दिया…!

उसकी ज़िम्मेदारी थी सारी ज़मीनों की देखभाल रखना, लाला की ज़मीनों पर काम करने वाले सभी मजदूरों का लेखा-जोखा रखना, जिसमें उसका अपना धर्म पिता भी शामिल था…!

यही नही अब लाला ने शंकर और रंगीली को रहने के लिए हवेली के बाहरी हिस्से में ही एक बड़ा सा घर जिसमें दो कमरे रसोई के साथ साथ वाकी अन्य ज़रूरत के साधन भी उपलब्ध थे दे दिया था…

घर हवेली से अल्हेदा और बड़ा होने की वजह से उसने अपनी बेटी और पति को भी अपने साथ रहने के लिए बुला लिया था…!

गोद भराई का सारा काम थोड़े बाद-विवादों के बीच ठीक तरह से संपन्न हो चुका था, लाला ने दूसरे ही दिन सारे दस्तावेज़ बनवाने के लिए अपने वकील को सौंप दिए…

उनकी दोनो बेटियों को छोड़ सारे नाते रिश्तेदार, सगे संबंद्धि जा चुके थे, जो कुछ बचे थे वो भी एक-एक करके विदा हो रहे थे…!

दूसरे दिन प्रिया और सुप्रिया ने अपने बाग-बगीचों की सैर करने का प्लान बनाया.., वो अपनी एक दो पुरानी सखी सहेलियों जो इस वक़्त गाओं में मौजूद थी उनको लेकर अपने खेतों की तरफ चल पड़ी…

थोड़े बहुत शहरी परिधानो में वो सारे गाओं की निगाहों का केंद्र बनी हुई अपने खेतों पर पहुँची..,

यौं तो लाला की ज़मीन बहुत सारी जगहों पर थी, यहाँ तक कि दूसरे गाओं में भी, लेकिन मुख्य रूप से वो अपने गाओं से थोड़ी ही दूरी पर थी, जहाँ उनका एक बहुत बड़ा बगीचा भी था..!

उस बगीचे के लिए एक चकरोड़ (कच्चा चौड़ा रास्ता जिसमें कोई भी वहाँ आसानी से जा सके) से होते हुए जाया जाता था,

चाक्रॉड के दोनो तरफ लाह-लाहते खेत, जिसमें सरसों, गेंहू इत्यादि की फसल खड़ी थी, जिसमें कुछ मजदूर काम कर रहे थे…!

वो दोनो अपनी सखी सहेलियों के साथ बगीचे में पहुँची, वहीं पास के एक खेत में गन्ने (शुगरकेन) की फसल खड़ी थी, और दूसरी तरफ गेंहू खड़े थे…

दोनो बहनें अपने अपने ग्रूप बनाकर इधर उधर घूमने लगी, सुप्रिया भी अपनी दो सखियों के साथ गेंहू के खेतों की तरफ बढ़ गयी, जहाँ उसकी नज़र शंकर पर पड़ी…

वो अपनी सहेलियों को वही खड़ा करके उसकी तरफ बढ़ गयी, उस समय शंकर कुछ मजदूरों को गेंहू के खेतों से खरपतवार निकालने का काम करवा रहा था…

सुप्रिया ने चुप-चाप पीछे से जाकर एक साथ भों..भों की आवाज़ करके उसे डराना चाहा…

शंकर ने उसकी आवाज़ पहचान ली और मुस्करा कर पलटते हुए बोला – अरे सुप्रिया दीदी आप और यहाँ.., खेतों में क्या कर रही है..?

 
वो रूठा सा मुँह बनाकर बोली – क्या यार, मेने तुम्हें डराने के लिए ऐसी आवाज़ निकाली और तुम डरे भी नही,

शंकर ने उसकी आँखों में देखते हुए मुस्कुरा कर कहा – ये शहर नही है दीदी, यहाँ ऐसे खेल खेलते हुए ही हम बड़े हुए हैं.., आप सुनाए, यहाँ कैसे..?

वो – क्यों हम अपने खेतों को देखने नही आ सकते क्या..?

शंकर – अरे क्यों नही, सब आप ही का तो है, और बताइए, आपकी ससुराल में सब कुशल मंगल है, वैसे आप पहले से भी ज़्यादा सुंदर लग रही हैं…!

वो मुस्कराते हुए बोली – तुम भी कुछ कम हॅंडसम नही हो, अब तो पूरे धर्मेन्द्र लगते हो…!

शंकर – वो कॉन है ? अब बेचारे ने अभी तक कोई फिल्म देखी ही नही थी..

वो – अरे अपनी फिल्मों के बहुत बड़े हीरो हैं वो, अच्छी-अच्छी हेरोयिन उनपर मरती हैं..!

शंकर खुश होते हुए बोला – अच्छा, तो क्या मेरी शकल पर भी कोई मर सकती है..?

सुप्रिया ने मन ही मन कहा – तुम पर तो मैं ही मर मिटी हूँ शंकर, अपनी मन की आँखों से तो देखो, लेकिन प्रत्यक्ष में बोली - चलो ये सब छोड़ो, तुम मुझे गन्ना नही खिलाओगे..?

शंकर – अरे क्यों नही अभी तोड़कर लाता हूँ, ऐसा मीठा वाला गन्ना चुस्वाउंगा आपको कि बस अपने होंठ चाटते रह जाएँगी…!

ये कहकर वो गन्ने के खेत की तरफ बढ़ गया, तभी सुप्रिया ने पीछे से उसका हाथ थाम लिया और बोली – चलो मे भी तुम्हारे साथ चलती हूँ..

वो दोनो गन्ने के खेत तक आ गये, शंकर उसे किनारे पर खड़ा करके बोला – रुकिये मे थोड़ा अंदर से अच्छा वाला गन्ना लाता हूँ..

वो अंदर की तरफ बढ़ गया, और थोड़ा अंदर जाकर उसने एक मोटा और मीठा वाला गन्ना तोड़ लिया, उसे लेकर वो जैसे ही पलटा पीछे खड़ी सुप्रिया से टकरा गया…!

वो पीछे को गिरने को हुई की तभी शंकर ने एक हाथ का सहारा उसकी पीठ पर देकर उसे गिरने से बचा लिया…!

सुप्रिया उसकी मजबूत बाजू के सहारे तिरछी खड़ी थी, उसके टॉप में क़ैद गोल-गोल उभार, उभरकर सामने आ गये और शंकर को मुँह चिढ़ाने लगे…

दोनो की नज़रें एक हुई, और वो एक दूसरे में खोने लगे, दिल का पैगाम नज़रों के द्वारा एक दूसरे तक पहुँचने का प्रयास करते हुए ना जाने कितनी ही देर वो उसी अवस्था में एक दूसरे को निहारते रहे…!

फिर एका-एक शंकर को होश आया, और उसने सुप्रिया को सीधे खड़े करते हुए कहा – आप ठीक तो हैं, मे तो गन्ना ला ही रहा था, फिर आप यहाँ क्यों आई…!

सुप्रिया अभी भी उसी को घूरे जा रही थी, वो तो बस किसी संगेमरमर की मूरत बनी शंकर के कामदेव जैसे रूप में खो चुकी थी…,

उसके मर्दाने बदन की खुश्बू ने उसे बहाल कर दिया…!

शंकर ने उसकी बाजू पकड़ कर हिलाते हुए कहा – दीदी क्या हुआ, आप ठीक तो हैं..

वो मानो नींद से जागी हो, हड़बड़ा कर बोली – हाँ मे ठीक हूँ, थॅंक यू शंकर, तुमने मुझे गिरने से बचा लिया…!

शंकर ने मन ही मन मुस्कराते हुए पुछा – तो आप ऐसे क्या देख रही थी मेरी ओर…?

वो – तुम कितने सुंदर और सजीले नौजवान हो किसी कामदेव का स्वरूप, बस मे अपने आप को तुम्हें देखने से रोक ही नही पाई.., बचपन की चाहत फिर से उमड़ पड़ी…!

शंकर – ये आप क्या कह रही हैं, बचपन की चाहत मतलब..?

वो – तुम नही समझोगे शंकर, तुम तो नादान थे उस वक़्त, मासूम थे, तुम्हें कैसे पता होगा, कि मे तुम्हें कितना पसंद करती थी, लेकिन आज जब तुम्हें जवानी की दहलीज़ पर खड़े देखा तो अपने आपको रोक नही पाई…

आइ लव यू शंकर, मे तुम्हें बहुत प्यार करती हूँ, ये कहकर वो उससे लिपट गयी…

शंकर भौचक्का सा खड़ा रह गया, फिर उसने उसके कंधे पकड़कर अपने से अलग करते हुए कहा – अब आप किसी और की अमानत हो,

बचपन की चाहत का अब कोई अर्थ नही रहा…, हम दोनो के रास्ते जुदा हो चुके हैं.!

सुप्रिया उसके चौड़े चिकने लेकिन पत्थर जैसे शख्त सीने पर अपने मुलायम हाथ से सहलाते हुए बोली – कुछ कदम तो अपने साथ लेकर चल सकते हो मुझे…?

शंकर – जमाने का डर है, कहीं किसी ने साथ चलते हुए देख लिया तो मेरा तो जो होना होगा सो होगा ही, आप बेकार में रुसबा हो जाएँगी…!

मुझे जमाने से छुपाकर कुछ कदम साथ ले लो शंकर, वो उसके चौड़े सीने पर अपना सिर रख कर बोली – तुम्हारा एक पल का प्यार ही मेरे लिए काफ़ी होगा..,

शंकर ने ना चाहते हुए अपना हाथ उसकी कमर पर रख दिया, फिर उसके रूई जैसे मुलायम कूल्हे को सहलाते हुए बोला – अभी आप यहाँ से चलिए, यहाँ कोई भी आ सकता है…!

वो उसके सीने पर किस करते हुए बोली – थोड़ा सा नीचे तो झुको, पूरे ताड़ हो गये हो, ये कहकर उसने उसके चेहरे को अपने दोनो हाथों के बीच लेकर अपने सुर्ख गीले होंठ शंकर के खुश्क होंठों पर रख दिए…!

शंकर ने अपने दोनो हाथों को उसकी गोल-गोल मुलायम गान्ड के नीचे लगाकर उसे अपनी गोद में उठा लिया, और चुंबन में उसका साथ देने लगा…!

वो दोनो एक दूसरे को चूमने में मसगूल हो गये, सुप्रिया किसी गुड़िया की तरह उसके कसरती सीने पर अपने सुडौल अनारों को रगड़ते हुए उसके होंठों को चूसे जा रही थी..

दोनो पर वासना का भूत सवार होने लगा था, आँखों में खुमारी उतरने लगी, सुप्रिया तो इतनी सी देर में ही कहीं दूर आसमानों में उड़ने लगी…,

अब वो एक दूसरे से अलग नही होना चाह रहे थे, लेकिन तभी उन्हें प्रिया की चीख सुनाई दी….बचाऊओ….!

चीख इतनी तेज थी, कि वो दोनो बुरी तरह चोंक गये, अपने किस को तोड़कर शंकर ने सुप्रिया को नीचे उतारा और बिना कुछ कहे आवाज़ की दिशा में दौड़ पड़ा…!

गन्ने के खेत से बाहर निकल कर कूदते फान्दते उसने गेंहू के खेत को कुछ ही सेकेंड्स में पार कर लिया,

फिर जैसे ही उसकी नज़र चकरोड़ में गयी, सामने के मंज़र को देखकर उसके बदन के सारे रोंगटे खड़े हो गये………..….!

हुआ यूँ कि जहाँ प्रिया & पार्टी घूम रहे थे उसी के पास वाले गेंहू के खेत में एक सांड़ घुस आया, और फसल को चरने लगा…!

होशियार की नानी प्रिया ने किसी मजदूर को बुलाने की वजाय, खुद ही उसे खदेड़ने चल दी, उसकी सहेलियों ने मना भी किया…!

लेकिन जिद्दी स्वाभाव, नही मानी और उसे हुर्र्रर..हुर्र्रर..करके पहले भागने की कोशिश की लेकिन वो ठहरा मस्त मलन्द सांड़, लगा रहा अपनी मन पसंद हरियाली चरने में…

प्रिया ने आव-ना देखा टॉ, एक पत्थर का टुकड़ा उठाया, और फेंक कर सांड़ को दे मारा, खुदा ना ख़स्ता अगर वो पत्थर कहीं उसकी पीठ वग़ैरह पर पड़ता तो कोई फरक उसे नही पड़ता, लेकिन वो नुकीला सा पत्थर उसकी नाक पर पड़ा…!

फिर क्या था सांड़ भड़क गया, पहले तो उसने वहीं से धाँभार दी, उसी से प्रिया की फूँक सरक गयी, और वो ज़ोर से चिल्लाई, उसका चिल्लाना सुनकर वो और ज़्यादा बिदक गया और उसकी तरफ दौड़ पड़ा…!

वो बचाओ..बचाओ… चिल्लाति हुई चकरोड़ में दौड़ पड़ी, लेकिन ज़्यादा दूर तक नही जा पाई, की उसकी सॅंडल की हील टूट गयी, और वो वहीं गान्ड के बल जा गिरी..

पल-प्रतिपल सांड़ उसके करीब आता जा रहा था, वो उससे कुछ कदम ही दूर था कि तभी उसने अपने हाथ जोड़ दिए और अपनी आँखें मूंदकर इस आशा में अढ़लेटी सी अपनी एक कोहनी के बल पड़ी रह गयी, की शायद वो सांड़ उसकी गुहार सुनकर पीछे हट जाए…!

लेकिन तभी उसने अपनी अधखुली आँखों से एक अद्भुत नज़ारा देखा…,

एक इंसानी जिस्म हवा में तैरते हुए आया और सांड़ के उपर आ गिरा, उस इंसान के दोनो पैर भड़क से सांड़ की टाट (गर्दन के उपर का उठा हुआ भाग-हंबल) पर पड़ी…!

सांड़ लहराकार अपनी जगह से हिल गया, उसके आगे बढ़ते कदम ठिठक गये.., अपने को गिरने से बचाता हुआ वो पीछे को हटा.., तब तक वो इंसान भी खड़ा हो चुका था…,

वो कोई और नही शंकर था, जो अब उसके और सांड़ के बीच अपनी कमर पर हाथ जमाए किसी चट्टान की तरह खड़ा था…!

शंकर ने सांड़ पर नज़र जमाए हुए ही उससे कहा – आप यहाँ से भाग जाइए प्रिया दीदी, मे रोकता हूँ इसे…!

लेकिन वो हतप्रभ सी ऐसे ही पड़ी रही…, वो वहाँ से उठकर भागने की हिम्मत भी नही जुटा पाई…

उसकी चीखो-पुकार सुनकर आनन फानन में आस-पास खेतों में काम कर रहे मजदूर भी जमा हो गये, सुप्रिया समेत वाकी लड़कियाँ भी ये तमाशा देखने आ पहुँची..

हाफ बाजू की कमीज़ और पाजामे में खड़ा शंकर किसी देव-दूत सा उस मस्त मलन्द सांड़ से दो-दो हाथ करने को खड़ा था, उसके बाजुओं के मसल्स फडक उठे..

उसने अपने हाथों को अपनी जांघों के पाटों पर मारा, फिर बाजुओं की मछलियो पर मारते हुए सांड़ को इशारा किया, कि अब आजा बेटा, हो जायें दो-दो हाथ…

सुप्रिया अपनी जगह पर खड़ी थर-थर काँपने लगी, वो चीखते हुए बोली – उसके सामने से हट जाओ शंकर, वो तुम्हें मार डालेगा…!

लेकिन शंकर ने तो जैसे उसकी आवाज़ सुनी ही नही, सारे लोग दम साधे इस घटना को देख रहे थे, वो चाहते तो उस सांड़ को मिलकर खदेड़ सकते थे,

लेकिन ना जाने कैसा सम्मोहन था लड़के की अदाओं में कि वो वहीं खड़े ये तमाशा देखने पर मजबूर थे…

 
उधर सांड़ अपने आपको संभालते हुए अपने आगे के पैरों से ज़मीन की मिट्टी को पीछे की तरफ फेंकता हुआ शंकर पर हमला करने को तैयार हो रहा था,

दोनो की नज़रें एक दूसरे पर जमी मानो एक दूसरे की ताक़त को तौल रही थी, फिर सांड़ एकदम से धाँभर देता हुआ शंकर के उपर झपटा…!

देखने वालों की साँसें जैसे अटक गयी थी…, वो सब दम साधे इस मंज़र को देख रहे थे…!

देखते ही देखते सांड़ शंकर तक पहुँच गया, लेकिन इससे पहले कि वो अपने सिर की टक्कर उसके सीने पर मारता, शंकर के दोनो हाथ उसके सींगों (हॉर्न) पर जम गये, उसने सांड़ को अपनी जगह पर रुकने पर बिवश कर दिया…!

हाफ बाजू कमीज़ से उसके मसल्स मानो फट पड़ने को तैयार थे, लेकिन मज़ाल क्या, लड़का एक इंच भी अपनी जगह से हिला हो…!

सांड़ रह-रहकर ज़ोर देकर उसे पीछे खदेड़ने की कोशिश करता, लेकिन शंकर पीछे को पैर जमाए उसे आगे बढ़ने ही नही दे रहा था…!

सांड़ की लाल-लाल आँखें देखकर किसी की भी घिग्गी बँध जाती, लेकिन शंकर दम साधे उसे हिलने भी नही दे रहा था…

उसका चेहरा लाल भभूका हो चुका था …

इसी ज़ोर आज़माइश में कोई 10-15 मिनिट निकल गये, कभी सांड़ ज़ोर लगाकर शंकर को कुछ कदम पीछे धकेल देता…

फिर शंकर अपनी दम साधकर सांड़ को कुछ कदम पीछे धकेल देता…

कोई किसी से कम पड़ने को तैयार नही था…, सांड़ की साँसें फूलने लगी थी, वो अपने नथुनो से फुसकार मारता हुआ लार फेंकने लगा...

तभी शंकर ने दाँत पर दाँत जमाकर एक तेज झटका सांड़ को मारा, जिससे वो झटके से कुछ कदम पीछे हटने पर मजबूर हो गया,

फिर वो फ़ौरन उसके आगे से एक तरफ को हट गया, ताक़त के ज़ोर्से प्रतिरोध करता सांड़ इतनी गति से आगे बढ़ा, तभी शंकर आगे से हट गया…

नतीजा…. झोंक-झोंक में सांड़ का सिर ज़मीन से जा टकराया, मौके का फ़ायदा उठाकर शंकर ने अपने दोनो हाथों को एक साथ जोड़कर कर मुक्का सा बनाया, और भड़ाक से उसके नथुनो पर दे मारा…!

सांड़ ना चाहते हुए भी डकार मार कर अपने आगे के घुटनों पर बैठने पर विवश हो गया,

इससे पहले कि वो सम्भल कर खड़ा होता, शंकर के दोनो पैरों की किक उसकी टाट (हंबल) पर पड़ी…,

सांड़ वहीं ज़मीन पर लेट कर हान्फ्ते हुए फुसकार सी मारने लगा, उसकी प्रितिरोधक क्षमता जबाब दे गयी…, चारों तरफ से तालियों की गड़गड़ाहट सुन कर प्रिया की तंद्रा टूटी…

वो अभी तक उसी पोज़िशन में पड़ी, दम साधे इस द्वंद युद्ध को देख रही थी.., आज शंकर उसे किसी देवता से कम नज़र नही आ रहा था…!

वो अपनी जगह से खड़ी होकर उसकी तरफ दौड़ पड़ी, और उसके बदन से लिपट कर फफक-फफक कर रोने लगी…!

सांड़ इतने सारे लोगों को अपनी तरफ आते देख वहाँ से उठ खड़ा हुआ, और एक दिशा में भाग गया…!

शंकर ने प्रिया को चुप करते हुए कहा – चुप हो जाइए प्रिया दीदी, वो चला गया, अब आपको घबराने की ज़रूरत नही है…!

सारे लोग वहाँ आकर जमा हो गये, आगे बढ़कर सुप्रिया ने प्रिया के कंधे पकड़ कर शंकर से अलग किया, और बोली – सब लोग देख रहे हैं दीदी, अब चलो घर चलते हैं…!

प्रिया शर्मिंदा होती हुई उससे अलग हुई, वो अभी भी सूबक रही थी,

शंकर ने सुप्रिया से कहा – अब आप लोग घर जाइए, और देखिए इन्हें कहीं चोट तो नही आई…!

प्रिया की एल्बो में थोड़ी सी खरोंच थी जिससे हल्का-हल्का खून रिस रहा था, उनमें से एक मजदूर ने एक घास जैसी उखाडकर उसका रस अपनी हथेलियों से मसल कर उसकी खरोंच पर टपका दिया…

फिर वो सब गाओं की तरफ चल दी, जाते-जाते दोनो बहनें पलटकर शंकर को चाहत भरी नज़रों से देखती जा रही थी..!

घटना इतनी रोमांचकारी थी, की उनके हवेली पहुँचने से पहले ही ये खबर वहाँ पहुँच गयी…!

शंकर की बहादुरी की बात सुनकर एक ओर सभी आश्चर्य चकित थे, वहीं उसकी माँ का सीना फूलकर गजभर का हो गया, उसने मन ही मन उसे शाबाशी देते हुए कहा – बस बेटे ऐसे ही अपनी बहादुरी दिखाता जा…!

दोनो बहनों के हवेली पहुँचने के बाद जब उन्होने इस बात की पुष्टि की, तो लाला जी अपने अंश की बहादुरी पर फूले नही समा रहे थे,

मन ही मन फिर से उनके दिल में ये टीस उठी, कि काश वो उसे अपने बेटे का दर्जा दे पाते…, खैर बिगड़ैल घोड़ी प्रिया रंगीली को देखते ही उससे लिपटकर रोने लगी…

मुझे माफ़ करना काकी, मेने ना जाने कितनी बार आप दोनो माँ-बेटों के साथ कितना ग़लत व्यवहार किया, और भगवान का इंसाफ़ तो देखो, उसी बेटे ने मेरी रक्षा करके मुझे बिनमोल खरीद लिया…

आज ये जिंदगी उसी की दी हुई है, वरना वो सांड़ मुझे मार चुका था…!

रंगीली उसे सांत्वना देते हुए बोली – ये तो उसका फ़र्ज़ था बीबीजी…, अपने मालिक की बेटी की जान बचाकर उसने अपना फ़र्ज़ पूरा किया है…!

और हां ! आप अपने मन में कोई मेल मत रखो, की हमें आपके व्यवहार से कोई ठेस लगी हो, ये तो हम नौकरों का नसीब होता है…!

रंगीली की ऐसी दरियादिली की बातें सुनकर प्रिया फिर एक बार उससे लिपट गयी- आप सच में नेक दिल हो काकी…,

सुप्रिया को आपके करीब देखकर मैं उसे चिढ़ाया करती थी.., लेकिन आज मुझे पता चला कि वो मुझसे कहीं ज़्यादा इंसानी समझ रखती है…!

अभी वो ये बातें कर ही रहे थे, कि हवेली के बाहर शोर सुनकर सब दरवाजे की तरफ लपके....

देखा तो लोगों का हुजूम, शंकर को अपने कंधे पर उठाए उसकी जय-जय कार करता हुआ हवेली की तरफ ही आ रहा था…!

लाला ने आगे बढ़कर उसे अपने कलेजे से लगा लिया, और आशीर्वाद देते हुए बोले – जीता रह बेटे, आज दूसरी बार तूने इस घर की बेटी की रक्षा करके जता दिया, कि तू कितना महान है…

यहाँ शंकर की जय-जैकार और उसकी बहादुरी की चर्चा चल रही थी, कि तभी कल्लू शराब के नशे में धुत्त हवेली पहुँचा…,

लाला जी उसे इस हालत में देखकर अंदर तक तिलमिला उठे, उन्हें फिर से इस बात का मलाल हुआ कि काश वो शंकर को अपना बेटा कह पाते………..!

उसके एक घंटे बाद शंकर अपने हवेली के बगल में मिले घर में था, उसे एक चौकी पर बिठाकर रंगीली उसकी नज़र उतार रही थी…!

उसके शरीर का उपरी हिस्सा नग्न था, पहले रंगीली ने एक फटी हुई चमड़े की जूती को उसके सिर के उपर से 7 बार उतारा, फिर उसके तले पर 7 बार थूका और उसे ज़मीन पर दे मारा.

फिर उसने एक रूई की मोटी सी बत्ती बनाकर उसे शंकर के सिर से लेकर पैरों तक 7 बार उतारा, और उसे तेल में सराबोर करके उसे जलाकर लटका दिया,

उसमें से जलती हुई मोटी-मोटी बूँदें नीचे रखे पानी के बर्तन में टपक-टपक कर छन्न..छन्न की आवाज़ें करने लगी…

सलौनी और शंकर इसे कौतूहलता से देख रहे थे, रंगीली ने अपने बच्चों को संबोधित करते हुए कहा –

देखो बच्चो, किसी की इतनी बुरी नज़र है, जो मेरे बेटे को बुरी नज़र से देख कर कोस्ती है.., देखो वो नज़र कैसी झड रही है…!

मे जानती हूँ वो डायन कुतिया कॉन-कॉन हैं जो मेरे बेटे का बुरा चाहती हैं..,

जलो नाश्पीतियो, ऐसे ही जलती रहो, जब तक मे हूँ, कोई भी बुरी नज़र मेरे बच्चों का कुछ नही बिगाड़ पाएगी…!

उधर खिड़की से बाहर खड़ी सुप्रिया ये सब नज़ारा अपनी आँखों से देख रही थी, उसे रंगीली की बातों से कोई सरोकार नही था, वो तो बस शंकर के नंगे बदन को ही निहारे जा रही थी,

हल्की लालमी लिए उसका पत्थर जैसा कठोर गोरा कसरती बदन उसके दिल की गहराइयों तक उतरता चला गया, इस समय शंकर उसे किसी देव-पुरुष जैसा लग रहा था…!

इसी बीच सलौनी की नज़र खिड़की पर खड़ी सुप्रिया पर पड़ गयी, और वो चहकते हुए बोली – अरे सुप्रिया दीदी, आप बाहर क्यों खड़ी हैं, अंदर आइए ना…!

सलौनी की बात सुनकर वो अंदर आने लगी, रंगीली उसे दौड़कर गेट से उसका हाथ पकड़कर अंदर लाई…!

शंकर ने हड़बड़ा कर उसकी तरफ देखा और अपनी उतरी हुई कमीज़ से ही अपने बदन को ढकने की नाकाम कोशिश करने लगा…!

सुप्रिया ने मुस्करा कर कहा – चिंता मत करो शंकर मेरी नज़र इतनी खराब नही है कि तुम्हें कोई हानि पहुँचाए, क्यों काकी सही कह रही हूँ ना…!

रंगीली – हां छोटी बीबी, आपकी नज़र तो सिवाए खुशी चाहने के और कुछ दे ही नही सकती, आप तो दिल की इतनी अच्छी हैं, कि हम ही क्या हवेली के सारे नौकर इस बात को मानते हैं, कि सुप्रिया बीबी जैसी इस घर में और कोई नही है…!

 
शंकर ने कमीज़ अपनी पीठ पर डाल ज़रूर ली थी, लेकिन उससे उसका आगे का पूरा हिस्सा ढक नही पाया था, सुप्रिया उसके कसरती बदन को निहारते हुए बोली –

मे ये जानने के लिए आई थी कि तुम्हें कहीं कोई चोट तो नही आई, और काकी मेने इसे रोकने की कोशिश भी की, लेकिन इसने मेरी आवाज़ जैसे सुनी ही नही थी, कहीं वो सांड़ तुम्हें दबोच लेता तो…?

रंगीली उसकी आँखों की भाषा को पहचानते हुए बोली – ये आपकी नेक नीयती है बेटी जो आपको मेरे बेटे की फिकर थी, लेकिन आप ये तो सोचो, अगर ये उसके सामने नही आता तो क्या होता…?

सुप्रिया – हां सो तो है, वो सांड़ प्रिया दीदी को मार ही डालता, वैसे शंकर तुम्हें उस सांड़ से डर नही लगा…?

शंकर – डर से बड़ा मेरे सामने मेरा फ़र्ज़ था जिसके लिए मेने अपनी जान को दाँव पर लगा दिया, और देखो मे जीत भी गया…!

सुप्रिया उसकी बाजू की मछलियो को दबा-दबाकर देखते हुए बोली – वैसे काफ़ी अच्छी बॉडी सौदी बना ली है तुमने, आइ लाइक इट…!

उसके बाद के शब्द रंगीली की समझ में तो नही आए, लेकिन उसकी आँखों की भाषा उसकी खूब समझ में आ रही थी, सो अपनी बेटी से बोली – चल सलौनी दादी के पास चलते हैं, उनसे थोड़ा काम है मुझे…!

सलौनी – तू जा माँ, मुझे भैया से मत के कुछ सवाल पुच्छने हैं..

रंगीली – अरी करम्जलि, देख नही रही वो कितना थक गया है, रात को पुच्छ लेना, चल अभी आते हैं ज़्यादा देर नही लगेगी…!

ये कहकर उसने सलौनी का बाजू पकड़ा और लगभग उसे खींचती हुई कमरे से बाहर ले जाने लगी, उन्हें वहाँ से जाते हुए देख सुप्रिया बोली – अच्छा काकी मे भी चलती हूँ, यू टेक केर शंकर…!

रंगीली उसका हाथ पकड़कर बोली – अरे आप बैठो बेटी, बातें करो, हम बस अभी आते हैं, इतने दिनो बाद आई है, फिर ना जाने कब-कब आना होगा..!

इतना बोलकर वो सलौनी को लेकर अपने घर की तरफ निकल गयी यहाँ शंकर और सुप्रिया दोनो को अकेला छोड़कर…!

सुप्रिया उसके बाजू में अपने घुटने मॉड्कर बैठ गयी, और उसके बाजू को सहलाते हुए बोली – रंगीली काकी कितनी अच्छी हैं, जान बूझकर हमें अकेला कर दिया है ना !

शंकर – हां ! मेरी माँ आँखों की भाषा बड़े अच्छे से समझ जाती है..,

उसने आपकी आँखों की भाषा को पढ़ लिया था, इसलिए वो सलौनी को लेकर चली गयी…!

सुप्रिया साइड से ही उसके बदन से लिपटे हुए बोली – ओह शंकर.. फिर हमें भी इस मौके का फ़ायदा उठा लेना चाहिए..,

शंकर ने उसके बाजुओं के बंधन को अपने शरीर से अलग किया, और खड़े होते हुए बोला – दरवाजा खुला है दीदी, यहाँ आजकल लोग ताका-झाँकी बहुत करते हैं,

इतना बोलकर वो गेट बंद करने चला गया, जब लौटा तो सुप्रिया उससे लिपटाते हुए बोली – तुम हो ही ऐसे, हर कोई तुम्हें पाने के लिए उतावली होने लगे…!

सुप्रिया की लंबाई थोड़ी कम थी, वो शंकर के सीने तक ही आती थी, इसलिए उसने उसे किसी बच्ची की तरह अपनी गोद में उठा लिया और उसके होंठों को चूमते हुए बोला- ऐसा क्या है मुझमें…?

वो उसके गले में अपनी बाहों को लपेटते हुए बोली – तुम साक्षात कामदेव का रूप हो शंकर, तुम मुझसे उम्र में बहुत छोटे हो फिर भी मे तुम्हारे ही सपने देखा करती थी…,

लेकिन तुम्हारी उमरा को देखते हुए कुच्छ कर ना सकी, अब जब तुम जवान हो गये हो, तो तुम्हें देखते ही मुझसे रहा नही गया, तुम्हें पाने की मेरी अधूरी प्यास फिर से जाग उठी,

शंकर ने उसकी आँखों में झाँकते हुए उसके कुल्हों को अपने हाथों में लेकर मसल्ते हुए कहा – आपके पति आपको प्यार नही करते..?

सुप्रिया – तुम मेरी पहली चाहत हो शंकर जिसे पति का प्यार तो क्या, दुनिया का कोई भी रिस्ता नही भुला सकता, मुझे अपनी मजबूत बाहों में समेट लो शंकर, मुझे प्यार करो मेरे सपनों के राजकुमार…!

शंकर ने वहीं उसे बिच्छावन पर लिटा दिया, और उसके ब्लाउस को उसके बदन से अलग करके, छोटी सी ब्रा में क़ैद उसके 32 के गोल-गोल उरोजो को अपनी मुत्ठियों में भरकर मसल डाला…!

उसके लोहे जैसे शख्त हाथों ने उसकी चुचियों को बुरी तरह मसल डाला, वो एक दर्द भरी कराह अपने मुँह से निकालकर बोली – आअहह…इतनी बेदर्दी से मत करो, दर्द होता है..!

शंकर प्यार से उसके निपल वाली जगह को सहलकर बोला – इसलिए तो ये अभी तक इतने छोटे हैं, लगता है जीजा जी इन्हें प्यार नही करते…!

हां राजा…उन्हें बस पैसा कमाना आता है, प्यार करना नही, इसलिए तो मे प्यासी हूँ, मुझे अपने प्यार से नहला दो… सस्सिईई…आअहह… वो मज़े से कराहती हुई बोली..

शंकर ने उसकी सारी और पेटिकोट भी उसके बदन से अलग कर दिए, छोटे-छोटे ब्रा और पैंटी में वो किसी गुड़िया की तरह बिच्छावन पर मचल रही थी,

शंकर उसके मखमली बदन को अपने कठोर हाथों से सहला रहा था, अब वो चुदाई का मास्टर बनता जा रहा था, दो-दो प्रोढ औरतों को भरपूर सुख देते-देते वो अब इस खेल का महेंद्र सिंग धोनी (कॅप्टन) बन चुका था…

सो सुप्रिया जैसी कमसिन प्यासी औरत उसके हथकंडों के आगे किसी बंदरिया की तरह नाचने लगी…!

उसने अपनी टाँगों को फैलाकर उसे अपनी गोद में उठा लिया, और उसके रसीले मद के प्यालों को चूस्ते हुए उसकी ब्रा के हुक भी खोल दिए,

छोटी-छोटी, रब्बर की गेंद जैसी उसकी चुचियों को अपने मुँह में लेकर चूस्ते ही सुप्रिया मज़े के सागर में उतर गयी, अपनी आँखें बंद करके उसमें गोते लगाते हुए सिसक पड़ी,

अपनी छातीयों को और आगे करके उसे चुसवाने में बहुत मज़ा आरहा था उसे, शंकर दूसरे हाथ से उसकी दूसरी चुचि को मसल रहा था,

उसके किस-मिस के दाने जैसे निपल काँच के कंचे के माफिक कड़क हो गये थे.

शंकर ने चूसना बंद करके अपने दोनो हाथों से उसके निप्प्लो को हल्के से मरोड़ दिया…!

सुप्रिया बुरी तरह सिसक पड़ी – सस्स्सिईईई…..आआहह…मेरे राज्जाअ…आआईय… करते हुए वो अपनी चूत को उसके पाजामा में उभरे हुए लंड पर घिसने लगी…!

उसकी चूत ने पैंटी को तर कर दिया, शंकर ने उसे बिस्तर पर लिटा कर उसकी पैंटी भी उतार दी,

छोटे-छोटे बालों से घिरी उसकी छोटी सी चूत, जिसकी माल पुए जैसी फूली हुई दोनो फांकों के बीच की दो इंच लंबी दरार को देख कर उसका लंड किसी विषधर नाग की तरह फनफनाने लगा……!!

उसकी चूत से निकले सोमरस ने पैंटी को तर कर दिया था, शंकर ने उसे बिस्तर पर लिटा कर उसकी पनटी भी उतार दी, उसे हाथ में लेकर अपनी नाक पर लगाया और एक गहरी साँस लेकर उसके कामरस को सूँघा…!

आअहह…क्या मस्त कस्तूरी जैसी सुगंध है.., क्या खाती हो…?

 
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