राजीव की अर्थी तैयार हो गई l
श्मशानगढ़ के कुछ निवासी उसकी अर्थी मेँ शामिल होने आए थे लेकिन फिर भी भीड़ कम थी ।
अधिकतर तो भय के कारण नहीं आए थे ।
क्योकिं अधिकतर लोगों का यह विश्वास था कि राजीव का खून किसी भूत ने किया है ।
श्मशानगढ़ में चारों तरफ भय और आतंक छाया हुआ था ।
विजय और रहमान चुपचाप थे लेकिन वहां उपस्थित प्रत्येक व्यक्ति की हरकतो से अनुमान लगाने का प्रयास कर रहे थे ।
लेकिन अभी तक कोई भी किसी भी निर्णय पर पहुचने में असफल था ।
सुबह के लगभग पांच बजे ।
वेसे भी अभी माहौल मेँ अंधकार ही छाया हुआ था ।
राजीव की अर्थी उठा ली गई, और पूर्ण कार्यक्रमों के साथ उसे फूंकने के लिए श्मशान की ओर चले ।
बिजय और रहमान भी उसके साथ ही थे ।
सहसा बिजय और रहमान की दिलचस्पी बढी क्योकि अर्थी को, उसी रास्ते पर ले जाया जा रहा था जिस पर वह उल्टी लाश वाला पीपल का विशाल वृक्ष था ।
रहमान सोच रहा था कि अगर राजीव के खून का सम्बंध किसी भी प्रकार पीपल पर रहने वाली आत्मा से है तो इस समय वह चुप न बैठेगी, अवश्य कुछ होगा…लेकिन क्या?
वैसे न जाने क्यों उसे स्वयं बिश्वास होता जा रहा था कि पेड़ वाली 'चुड़ेल' अवश्य कुछ करेगी ।
उसके दिमाग मेँ इस केस की प्रत्येक घटना सिर्फ एक प्रश्न के रूप में चकरा रही थी । किसी भी प्रश्न का उत्तर अभी तक सामने नहीं आया था ।
और फिर वह उस समय सतर्क हो गया जब सामने लगभग बीस गज की दूरी पर वही पीपल का विशाल वृक्ष किसी दानव की भांति हवा के झोंकों मेँ हिल रहा था ।
न जाने क्यों इस समय तो इस विशाल पेड़ को देखकर रहमान और विजय को भी विचित्र-सा भय हुआ ।
रात और सुबह के धीमे प्रकाश मेँ वास्तव मेँ यह वृक्ष बहुत ही डरावना प्रतीत हो रहा था ।
न जाने क्यों यह पेड़ सबसे अलग-सा लगता था ।
तभी विजय ने चलते-चलते ही एक बात और भी महसूस की, वह यह थी कि उस पेड़ को देखकर जनाजे में उपस्थित प्रत्येक व्यक्ति का चेहरा पीला पड़ता चला गया ।
धीमी…धीमी-सी खुसर-फुसर होने लगी ।
न जाने क्यों चलते हुए आदमियों के कदम कुछ धीमे पड़ गए, राम नाम की आवाज भी धीमी हो गई । एक अजीब-सा, एक विचित्र-सा आतंक फैलता चला गया ।
प्रत्येक चेहरा पीला पड़ता चला गया ।
कुछ लोग तों उस वृक्ष को देखकर वापिस हो लिए । वापिस जाते एक व्यक्ति को रहमान ने पकड़ लिया तथा बड़े आराम से उसके कंधे पर हाथ रखकर बोला…“क्यों भाई, कैसे वापिस जा रहे हो?"
“नहीं. . .नहीं. . . ।" वह व्यक्ति एकदम कांपने लगा चेहरा हल्दी की भांति पीला हो गया, आंखों से भय झांकने लगा । सूखे पत्ते की भांति कांपता हुआ वह बोला-“नहीं . .म., मैं. . .म. . .मरना. . .च. . .चाहता I"
"क्यों. . .मरने की क्या बात है?" रहमान ने उसका कंधा पकड़कर झंझोड़ा ।
“व . .व. .वह. . .पेड़ I" उसने कांपते हुए पीपल के विशाल वृक्ष की ओर संकेत किया ।
“क्यों. . .क्या है. . .उस पेड़ पर?”
"वह.. .प्रेत है... l”
"क्या बकत्ते हो?”
“व . .वह "चुडैल वृक्ष' है ।" उसने इतना कहा और सिर पर पैर रखकर भागता चला गया ।
रहमान के होंठों पर एक मुस्कान-सी आईं और वह कुछ तेजी से चलकर विजय के निकट पहुंचा तथा बोला-“गुरू !”
“हू I"
"यह मैं भी महसूस कर रहा हू प्यारे I” विजय ने कहा तथा फिर चुपचाप चलने लगा ।
जब वे दोनों राजीव की अर्थी के काफी निकट तथा साथ…साथ चल रहे थे दोनों की निगाहें 'चुडैल वृक्ष' पर ज़मी हुई थी जो क्षण…प्रतिक्षण निकट आता जा रहा था ।
ज्यों-ज्यों वे उस चुड़ेल वृक्ष के निकट पहुचते जा रहे थे त्यों…त्यों लोगों के चेहरे हल्दी की तरह पीले पड़ते जा रहे थे l कदमों का कपन बढता जा रहा था ।
और ठीक तब ।
“नहीं. . .नहीं. . . ।" वह व्यक्ति एकदम कांपने लगा चेहरा हल्दी की भांति पीला हो गया, आंखों से भय झांकने लगा । सूखे पत्ते की भांति कांपता हुआ वह बोला-“नहीं . .म., मैं. . .म. . .मरना. . .च. . .चाहता I"
"क्यों. . .मरने की क्या बात है?" रहमान ने उसका कंधा पकड़कर झंझोड़ा ।
“व . .व. .वह. . .पेड़ I" उसने कांपते हुए पीपल के विशाल वृक्ष की ओर संकेत किया ।
“क्यों. . .क्या है. . .उस पेड़ पर?”
"वह.. .प्रेत है... l”
"क्या बकत्ते हो?”
“व . .वह "चुडैल वृक्ष' है ।" उसने इतना कहा और सिर पर पैर रखकर भागता चला गया ।
रहमान के होंठों पर एक मुस्कान-सी आईं और वह कुछ तेजी से चलकर विजय के निकट पहुंचा तथा बोला-“गुरू !”
“हू I"
"यह मैं भी महसूस कर रहा हू प्यारे I” विजय ने कहा तथा फिर चुपचाप चलने लगा ।
जब वे दोनों राजीव की अर्थी के काफी निकट तथा साथ…साथ चल रहे थे दोनों की निगाहें 'चुडैल वृक्ष' पर ज़मी हुई थी जो क्षण…प्रतिक्षण निकट आता जा रहा था ।
ज्यों-ज्यों वे उस चुड़ेल वृक्ष के निकट पहुचते जा रहे थे त्यों…त्यों लोगों के चेहरे हल्दी की तरह पीले पड़ते जा रहे थे l कदमों का कपन बढता जा रहा था ।
और ठीक तब ।
जबकि राजीव की अर्थी ठीक "चुडैल वृक्ष" के नीचे से गुजर रही थी ।
सहसा सब चौंके ।
अर्थी वालों ने अर्थी को कंथों से उतारकर वही पर रख दिया तथा सिर पर पैर रखकर भागे ।
सभी बदहवास हो गए ।
कुछ तो वहीं बेहोश हो गए और कुछ को जिधर जगह मिली उधर भागते चले गए ।
क्षण मात्र में वह स्थान रिक्त हो गया ।
सिर्फ विजय और रहमान वहां थे जो उस भयानक दृश्य और खौफनाक खेल को देख रहे थे ।
हुआ ये था कि जैसे ही लाश पेड़ के ठीक नीचे पहुची, तभी चमगादड़ चिल्लाया, उल्लू अपनी कर्कश ध्वनि मेँ चीखा तथा मनहूस कुत्ता रोने लगा । उसी समय बिल्कुल उसी रूप में जिसमेँ रहमान ने उस चुड़ेल को देखा था नजर आई ।
उसी प्रकार उल्टी लटकी हुई वह अत्यंत खौफ़नाक लग रही थी ।
विजय को अपनी खोपडी घूमती हुई प्रतीत हुई ।
लाश के निकट से सब लोग भाग चुके थे ।
विजय ने घूमकर रहमान की तरफ देखा तो हैरान रह गया । उसकी आंखें आश्चर्य से फैल गईं । वह रहमान की इस विचित्र हरकत को देखता ही रह गया ।
रहमान ने अपनी आंखे मूंद ली थी और वही सडक पर लेट गया था तथा अगले ही पल वह सड़क पर इस प्रकार मचल रहा था मानो बहुत पीड़ा हो रही हो ।
विजय ने यह भी महसूस किया कि होंठों-ही-होंठों में कुछ बड़बड़ा रहा है ।
बिजय को विचित्र-सा लगा यह सब । लेकिन फिर भी उसने न जाने क्या सोचा कि रहमान के कार्य में कोई हस्तक्षेप नहीं किया । आश्चर्य के साथ वह उसकी क्रियाओं को देखता रहा ।
तभी वह चौंका ।
चुडैल यूं ही हवा में उल्टी लटकी उनकी तरफ बढी ।
रहमान उसी तरह बड़बड़ा रहा था l
सहसा वह चुडैल उनके अत्यंत निकट आ गई । तभी विजय गजब की फुर्ती के साथ उछला तथा उसने चुडैल के हवा मेँ उल्टे लटके जिस्म पर जम्प लगा दी लेकिन आश्चर्य यह था कि वह चुडैल के शरीर के बीच से गुजर गया तथा दूसरी तरफ़ जाकर मुंह के बल धरती पर आ गिरा ।
उसके मुंह से खून बहने लगा । वह फिर फुर्ती के साथ खडा हुआ तथा चुडैल को देखा । वह उसी प्रकार वायु मेँ लहरा रही थी । विजय के साथ यह पहली अजीबो गरीब घटना थी जिससे उसकी आंखें आश्चर्य से फैल गईं ।
उसने चाहा कि वह इस पर दुबारा जम्प लगा दे लेकिन फिर वह स्क गया I वह अब पहले वाली मूर्खता नहीं करना चाहता था ।
लेकिन फिर भी वह कुछ करना चाहता था, परंतु उसे कुछ सूझ ही न रहा था । वह जड़वत-सा खडा चुडैल तथा रहमान का होने वाला अजीबोगरीब युद्ध देख रहा था ।
उसकी समझ मेँ नहीँ आ रहा था कि ये सब क्या चक्कर है ।
उसने देखा ।
चुडैल रहमान पर झपटी l
रहमान तेजी के साथ कुछ बड़बड़ाया और धरती पर एक तरफ़ को लुढ़ककर स्वयं को बचा गया ।
वह फिर बड़बड़ाया, चुड़ेल फिर झपटी, वह फिर बच गया ।
आश्चर्य के सागर में गोते लगाता हुआ विजय रहमान को देख रहा था…वह सोच रहा था कि वास्तव में बीस वर्ष का यह नवयुवक कितना खतरनाक है, क्या-क्या काम जानता है ।
बिजय को लगा कि वह लडका उसका चेला नहीं गुरु है ।
अनेकों बिचार उसके दिमाग में आ रहे थे तथा वह प्रशंसनीय निगाहो से रहमान को देख रहा था ।
लगभग पांच मिनट तक यही क्रम चलता रहा ।
न तो चुडैल ही उसका कुछ बिगाढ़ सकी और न रहमान ही उसे कोई हानि पहुंचा सका ।
लेकिन एकाएक विजय चौंका l
यह रहमान का एक और होलनाक कारनामा था ।
जब कुछ भी बस न चला तो रहमान उछलकर एक झटके के साथ कुछ पीछे हटा तथा अगले ही पल उसने अपने नाखून जांघ के उसी घाव मेँ ठूंस दिए जो उसने स्वयं चाकू मारकर बनाया था ।
उसने अपने नाखून उस घाव में घुसेड़कर जोर से दबा दिया ।
अथाह पीड़ा की लहर से वह स्वयं कांप गया । उसके कंठ से चीख निकल गई लेकिन फिर भी वह एक पल के लिए भी शिथिल नहीं हुआ l
धाव मे पीडा हुई लेकिन फिर भी उसने नाखूनों से अपने घाव को उथेड़ दिया…परिणामस्वरूप गर्म रक्त धारा तेजी के साथ बह निकली ।
रहमान ने फुर्ती के साथ अपनी पीड़ा को भुलाकर अपना खून हाथो में भरा तथा चुडेल पर उछाल दिया ।
खून अपनी तरफ़ उछलता देखकर ही चुडेल चीख पडी…“खून..खून...खून...नही...नहीं... l” और फिर पहले की भांति अदृश्य हो गई l
“बो मारा साले पकडी वाले को I” विजय चुडैल के विलुप्त होते ही चीखा ।
रहमान के होंठों पर एक मुस्कान दौड गई ।
"अरे वाह चेले मियां…तुम तो साले हमारे भी गुरु निकले l" विजय ने कहा तथा रहमान को सीने से लगा लिया ।
रहमान की जांघ से निरंतर खून बह रहा था।
घाव में अथाह पीड़ा हो रही थी लेकिन इस समय प्रसन्नता के वशीभूत होकर वह पीडा क्रो भूल गया था ।
“गुरु, यह चुड़ेल खून से डरती है I"
" क्यों?"
"लगता है इसके पीछे कोई बहुत ही बडा रहस्य है I”
"खैर प्यारे.. . l" विजय कहता-कहता रूपक गया ।
वास्तव मे इस बार का दृश्य और भी अघिक हीलनाक और’ भयावह था । इस बार तो वे दोनों ही कांप गए । उनके चेहरे हल्दी की भांति पीले पड़ गए, उनकी आखों से भी भय झांकने लगा । आज तक उन्होंने कभी ऐसा न देखा था l
कितना आश्चर्यपूर्ण दुश्य था?
कितना भयानक?
उन्हें लगा जैसे वे स्वयं बेहोश होने वाले हों लेकिन फिर मी उन्होंने स्वयं को सम्भाला तथा सामने के भयंकर दृश्य को देखा ।
“नहीं यह नहीं हो सकता, यह सब अविश्वसनीय है ।" दोनों के दिल की आवाज ने कहा ।
लेकिन जो आंखों के सामने हो रहा था उसे झुठलाया कैसे जा सकता था?
यह भयानक और अविश्वसनीय दृश्य साक्षात आंखों के सामने था ।
फिर भी उन्हें विश्वास न हुआ, इसलिए एक-दूसरे की ओर इस प्रकार देखा जैसे पूछ रहे हों I
"जो मैं देख रहा हू. . .क्या तुम भी. . .वही देख रहे हो?
बडा ही भयानक बड़ा ही खौफ़नाक दृश्य था वह ।
हुआ ये कि अचानक ही राजीव वाली अर्थी हिली और अगले ही पल सफेद कफ़न ओढे राजीव का मुर्दा अर्थी से सीधा उठता चला गया और फिर देखते…ही देखते मुर्दा उठ खडा हुआ ।
उफ़! क्तिना खतरनाक लग रहा था इस समय राजीव का मुर्दा!।।
आंखें उसी प्रकार आश्चर्य से फैली हुईं थी जैसे मरते समय थी । चेहरे पर वही भयानकपन, वही क्रूरता l सहसा वह आगे बढा ।
उसके शरीर में चाकू उसी प्रकार धंसा हुआ था । राजीव की वह लाश उन दोनों की तरफ ही बढ रही थी ।
“ये क्या नई मुसीबत हे!" रहमान हक्का-बक्का बोला ।
"अरे ओ...राजीव.. .भाई. . .यार तुम तो मरकर भी जीवित हो गए I" लेकिन लाश पर विजय के शब्दों का कोई प्रभाव न पडा, वह उसी प्रकार बेघड़क उनकी तरफ़ बढती रही ।
तभी बिजय बोला'…"अबे ओ मिस्टर राजीव । क्या हमें पहचानते न ?”
"तुम सब मेरे दुश्मन हो...हा...हा...हा... I" सहसा राजीव की लाश का जबड़ा खुला तथा उसके मुख से इतनी भयानक आवाज निक्ली कि आसपास का माहौल भी कांपता हुआ-सा प्रतीत हुआ । लेकिन उसके भावों में कोई परिवर्तन नही आया । वहां उसी प्रकार पत्थर जैसी कठोरता थी l
विजय और रहमान पीछे हटे ।
“वेटे...मेरे...बेटे... I” सहसा वहां राजीव की मां की आवाज गूंजी, जो अपने बेटे को जीवित देखकर प्रसन्नता में डूबी राजीव की लाश की तरफ आ रही थी ।
राजीव की मां ममता की वशीभूत होकर दौडती हुई लाश के पास आई तथा फिर वह लाश के सीने से लग गई ।
""हा..हा...हा... I” तभी राजीव की लाश ने भयानक तरीके से अट्टहास लगाया l
अट्टहास इतना सर्द और भयानक था कि जर्रा-जर्रा कांप गया । उसने अपनी मां को बांहों में कस लिया तथा फिर जोर से कहकहा लगाया ।
विजय और रहमान को तो कुछ सूझ ही नहीं रहा था ।
"तुमने मेरा खून करवाया था कमीनी. . . ।” सहसा राजीव की लाश का जबड़ा खुला तथा सारे माहौल में ये आवाज गूंजी-“तुम लोगों से प्रतिशोध लेना आवश्यक है. ..तुम सबका खून होगा? कमीनी, कुतिया, कुतिया तूने ही मेरा खून करवाया था. . .तुम्हें मौत मिलेगी. . .मौत! "
"नहीँ . . .नही I” राजीव की मां ने चीखना चाहा l
विजय और रहमान ने एक-दूसरे को आश्चर्य के साथ देखा ।
यह सब क्या है?
उनको समझ में नहीं आ पा रहा था ।
आंखे फाडे बे सामने के दृश्य को देख रहे थे ।
उनके सामने ये सब हो रहा था लेकिन वे कुछ करने का साहस नहीं कर पा रहे थे । उन्होंने देखा । राजीव की मां चीखी-चिल्लाई…स्वयं को राजीव की लाश से मुक्त करना चाहा लेकिन कसमसाकर रह गई ।
सहसा राजीव की लाश की पतली-पतली बिना खून की उंगलियां अपनी मां की गर्दन पर रुक गई तथा फिर हल पल सख्त होती चली गई । वह छटपटाई, दया की भीख मांगी, करुणापूर्ण ढंग से चोखी लेकिन राजीव की लाश पर कोई प्रभाव न पड़ा ।
उसने सम्पूर्ण शक्ति से गला दबा दिया ।
अगले हो पल वह मर गई । उसकी आंखे फटी की फटी रह गई । विजय और रहमान के देखते-देखते ही ये सब हो गया था ।
"गुरू भागो, बिना बैग के मुकाबला नहीं हो सकता ।" सहसा रहमान चीखा तथा तेजी के साथ भागा ।
विजय को मी न जाने क्या सूझा कि वह भी दुम दबाकर वहां से भाग लिया । उनके दिमार्गों में उपस्थित प्रश्नवाचक चिन्हों में वृद्धि हो गई थी ।
लगता था ये रहस्य की परते कभी नहीं सुलझेगी ।
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