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सुबह का आगाज होते ही, शक्तिसिंह अपने खेमे के साथ सूरजगढ़ की तरफ चल पड़ा। अपने तंबू में बड़े ही आराम से, संभोग की थकान उतारते हुए राजमाता, अपने पलंग पर लैटी हुई थी। एक अद्वितीय सी संतृप्ति उनके सोये हुए चेहरे से झलक रही थी। संभोग के पश्चात आती निंद्रा सब से उत्कृष्ट होती है। उन्होंने ओढ़ी हुई मखमली चद्दर के नीचे वह नग्नावस्था में सोई हुई थी। जबरदस्त चुदाई के कारण उनका शरीर इतना संवेदनशील हो चला था की वह अपने शाही जिस्म पर वस्त्र भी बर्दाश्त नही कर पा रही थी। उनके गुप्तांग में अभी भी मीठे दर्द की झुरझुरी सी चल रही थी।
तंबू के करीब से गुजरते हुए घोड़ों के कदमों की आवाज से उनकी नींद खुल गई। अपनी दोनों जांघों को आपस में घिसकर वह अपनी योनि में लिप्त आद्रता को महसूस करते ही मुस्कुरा उठी। उन्होंने करवट ली और तकिये पर अपनी कोहनी रखकर जिस्म को उसके ऊपर टीकाकर वह गहरी सोच में डूब गई। उन्हे यकीन था की शक्तिसिंह के साथ उन्होंने जो कारनामा किया था उसका समाचार महारानी पद्मिनी के कानों तक जरूर पहुँच चुकी होगी। स्त्री-सहज ईर्षा और मालिकी-भाव से पीड़ित होकर महारानी जरूर कुछ ना कुछ करना चाहेगी, पर कर नही पाएगी। ज्यादा से ज्यादा वह इसके बारे में राजा कमलसिंह को बता देगी... फिर भी राजमाता आश्वस्त थी की कोई उनका कुछ भी बिगाड़ न पाएगा। उनका पुत्र, राज्य के सारे कारभार के लिए उन पर निर्भर था और वह उनके विरुद्ध जाने की हिम्मत नही कर पाएगा।
शक्तिसिंह रूपी खिलौना प्राप्त कर राजमाता इतनी आनंदित थी की वह किसी भी सूरत में उसे अपने पास से किसी को छीनने नही देने वाली थी। उनका शातिर दिमाग, उत्पन्न होने वाली सारी समस्याओं की कल्पना कर चुका था और उसके हल भी ढूंढ चुका था। फिलहाल वह कुछ दिनों के लिए इस जगह पर आराम कर, वापिस लौटना चाहती थी। जिस काम के लिए यहाँ तक आए थे, वह काम तो बीच रास्ते ही मुकम्मल हो चुका था। इसलिए यहाँ ज्यादा समय व्यतीत करने का कोई कारण नही था। वह बस इतना ही वक्त बिताना चाहती थी जो महाराज को यकीन दिलाने के लिए काफी हो। वैसे महारानी के गर्भवती होने की संभावना का पता चलते ही, महाराज ज्यादा कुछ पृच्छा करे ऐसी गुंजाइश कम ही थी।
वहाँ अपने तंबू में लैटे हुए, दासी से पैर दबवा रही थी और उनके मुंह से चुगलियाँ सुन रही थी। दासी ने बड़े ही चाव से, चटकारे लेते हुए, सारा किस्सा सुनाया। हालांकि जिस वक्त शक्तिसिंह और राजमाता उस कुटिया में चुदाई कर रहे थे, तब वहाँ कोई मौजूद नही था, पर उनकी कराहने की आवाज, राजमाता की बाहर तक सुनाई देती सीसीकियाँ, और जब वह दोनों बाहर निकले तब जिस तरह उन दोनों के वस्त्र अस्त-व्यस्त थे, वह देखकर कोई अबुद्ध व्यक्ति भी समझ सकता था की अंदर क्या गुल खिलाए जा रहे थे। राजमाता का खौफ इतना था की कोई खुले मुंह ऐसी बातों को जिक्र करने से बचता।
"हाय... जरा घुटनों के ऊपर तक दबा.. बहुत दर्द हो रहा है!!" महरानी ने आह भरते हुए कहा
"जी रानी साहिबा... आप कहो तो गुनगुने तेल से थोड़ी मालिश भी कर दूँ?"
"थोड़ी देर बाद... तू यह बता की जब राजमाता और शक्तिसिंह बाहर निकले तब उनका हाल कैसा था?"
"क्या बताऊ? शर्म आती है मुझे" खिलखिलाकर हँसते हुए दासी बोली
"ज्यादा होशियार मत बन... मुझे सब पता है तू रात को जंगल में उस घुड़सवार के साथ जाकर क्या क्या करती है.. चुदवा चुदवा कर तेरे कूल्हे कितने बड़े हो गए है.. और अब बात करने में शर्म आ रही है तुझे!!"
"क्या महारानी जी, आप भी!! अरे वो दोनों जब बाहर निकले तब में उस घने पेड़ के पीछे से देख रही थी... शक्तिसिंह तो ठीकठाक दिख रहा था पर राजमाता का घाघरा सिलवटों से भरा हुआ था.. चोली भी ठीक से नही बांधी थी.. और बाल बिखरे हुए थे। चलते चलते वह लड़खड़ा रही थी। ही..ही.. ही.. लग रहा था की बड़ी ही दमदार चुदाई हुई होगी राजमाता की" हँसते हँसते दासी ने विवरण दिया
"और उसके बाद क्या हुआ?"
"उसके बाद तो शक्तिसिंह अपने तंबू में चला गया और राजमाता अपने तंबू में... कब से खर्राटे मारकर सो रही है.. सभी दासियों को आदेश दिया गया है की जब तक वह सामने से न बुलाए, कोई उनके तंबू में नही जाएगा..."
"हम्ममम... " रानी ने अपनी टांगों को मोडकर अपने घाघरे को थोड़ा सा ऊपर तक उठा दिया..
"तू ठीक से मालिश कर.. तेरे हाथों में अब पहले वाला जोश नही रहा"
"क्या बात कर रही हो रानी जी... मेरा जोर तो पहले जैसा ही है... शायद आज भारी परिश्रम के कारण दर्द कुछ ज्यादा ही हो रहा है आपको.. ही..ही..ही.."
"बड़ी हंसी आ रही है तुझे... लगता है राजमहल पहुँच कर तेरा तबादला रसोईघर में करना पड़ेगा..."
"क्षमा कीजिए महारानी जी, अगर कोई गुस्ताखी हो गई हो तो... पर कृपया मुझे रसोईघर में ना भेजे... वह खानसामा पूरा दिन इतना काम करवाता है और रात को भी चैन नही लेने देता..."
"क्या बात कर रही है!! वो बूढ़ा बावर्ची भी चढ़ता है क्या तुझ पर?"
"अरे बात ही जाने दीजिए.. कमीना सिर्फ चेहरे से ही बूढ़ा है... पर उसका हथियार एकदम सख्त और हिंसक है... एक बार चढ़ाई करता है तो दो दिन तक में ठीक से चल नही पाती... "
"ठीक है, ठीक है... अब बातें कम कर और हाथ तेजी से चला... ऊपर जांघों तक मालिश कर.. और फिर कमर पर जरा तेल लगा दे... पूरा जिस्म दर्द कर रहा है आज तो.. "
महारानी पद्मिनी अब करवट लेकर उल्टा लेट गई। दासी उनके ऊपर सवार होकर दोनों हाथों से कमर पर तेल मलने लगी।
"जरा घाघरा नीचे सरका दीजिए ताकि में आपके पिछवाड़े पर ठीक से मालिश कर सकूँ"
महारानी ने अपना नाड़ा खोला और घाघरे को नीचे की तरफ सरका दिया
"हाय... कैसे गोरे गोरे चूतड़ है आपके महारानी जी... ऐसा लग रहा है जैसे मक्खन के दो पिंड हो.. "
"तू ज़बान कम चला अपनी... "महारानी थोड़ी शर्मा गई
दोनों कूल्हों पर गुनगुना तेल घिसते हुए दासी ने दोनों चूतड़ों को हल्का सा फैलाया... महारानी का बादामी रंग का छेद नजर आते ही वह मुस्कुरा दी... तेल की कुछ धाराएँ उस छेद तक जाने दी... और उंगली से उसके इर्दगिर्द मलने लगी...
"हाय... क्या कर रही है रे तू?" गांड के छेद पर स्पर्श होते ही महारानी सिहर उठी...
"अरे मालिश कर रही हूँ... कोई भी कोना छूटना नही चाहिए.. नही तो फिर आप ही वापिस रसोईघर में भेजने की बात कहेगी"
"पर देख तो सही तू कहाँ उंगली कर रही है!!"
"आप कहे तो ना करू"
"अमम करती जा.. पर जरा संभाल कर"
"जी महारानी"
दासी ने कुछ देर तक गांड के छिद्र पर गोल गोल उंगली घुमाई... महारानी को इतना मज़ा आने लगा... कभी सोचा नही थी उन्होंने की इस जगह से भी मज़ा लिया जा सकता था... हालांकि उन्होंने काम-शास्त्र के पठन के वक्त, गुदा-मैथुन के बारे में सुना जरूर था... पर दासियों के मुंह से भी यह बातें भी सुनी थी की यह कितना दर्दनाक होता है॥
दासी ने छिद्र को तेल से लसलसित कर अपनी उंगली को धीरे से अंदर घुसा दिया।
"ऊईई माँ... क्या कर रही है तू... " रानी थरथरा गई
"थोड़ा सा तेल अंदर डाल रही हूँ... इससे आपको अच्छा भी लगेगा और सुबह मलत्याग में भी सरलता रहेगी"
महारानी कुछ भी बोले बगैर उस अनोखे एहसास को महसूस करते हुए लैटी रही... इतना आनंद आ रहा था की वह चाहती थी यह मालिश चलती ही रहे। कुछ देर अंदर बाहर करने के बाद दासी ने उंगली बाहर निकाल ली और चूतड़ों पर मालिश करने लगी।
"तूने उंगली डालना बंद क्यों कर दिया?"
"मुझे लगा की आपको तकलीफ हो रही होगी... इसलिए... " दासी ने सकपकाकर कहा
"थोड़ी देर और कर... ठीक से तेल जाने दे अंदर"
"ठीक है महारानी साहिबा" दासी ने आश्चर्यसह वापिस अपनी उंगली अंदर डाल दी।
दासी ने देखा की जब भी वह उंगली गांड के अंदर डालती तब महारानी के चुत के होंठ भी सिकुड़ जाते... उंगली बाहर निकालते ही वह पूर्ववत हो जाते। कुछ देर ऐसा करने पर उनकी चुत के होंठ और झांटों पर गीलापन नजर आने लगा। दासी समझ गई की क्यों महारानी ने वापिस उंगली करने को कहा। वह मन ही मन मुस्कुराने लगी।
"जरा तेजी से आगे पीछे कर" भारी आवाज में महारानी ने कहा।
दासी ने आदेश का पालन किया। उसने देखा की महारानी ने अपने एक हाथ से स्तन को धर दबोचा था और वह चोली के ऊपर से ही अपनी निप्पल को मरोड़ रही थी। पता चल गया की क्यों दोबारा उन्होंने गांड में उंगली करने को कहा!! महरानी को इसमे बेहद मज़ा आ रहा था। दासी भी इस नई खोज पर खुश हो गई... महारानी को खुश रखने पर... आए दिन वह तोहफे दिया करती थी। किस्मत अच्छी रहे तो कभी कभार एकाद सुवर्ण मुद्रा भी मिल जाती थी।
तंबू के करीब से गुजरते हुए घोड़ों के कदमों की आवाज से उनकी नींद खुल गई। अपनी दोनों जांघों को आपस में घिसकर वह अपनी योनि में लिप्त आद्रता को महसूस करते ही मुस्कुरा उठी। उन्होंने करवट ली और तकिये पर अपनी कोहनी रखकर जिस्म को उसके ऊपर टीकाकर वह गहरी सोच में डूब गई। उन्हे यकीन था की शक्तिसिंह के साथ उन्होंने जो कारनामा किया था उसका समाचार महारानी पद्मिनी के कानों तक जरूर पहुँच चुकी होगी। स्त्री-सहज ईर्षा और मालिकी-भाव से पीड़ित होकर महारानी जरूर कुछ ना कुछ करना चाहेगी, पर कर नही पाएगी। ज्यादा से ज्यादा वह इसके बारे में राजा कमलसिंह को बता देगी... फिर भी राजमाता आश्वस्त थी की कोई उनका कुछ भी बिगाड़ न पाएगा। उनका पुत्र, राज्य के सारे कारभार के लिए उन पर निर्भर था और वह उनके विरुद्ध जाने की हिम्मत नही कर पाएगा।
शक्तिसिंह रूपी खिलौना प्राप्त कर राजमाता इतनी आनंदित थी की वह किसी भी सूरत में उसे अपने पास से किसी को छीनने नही देने वाली थी। उनका शातिर दिमाग, उत्पन्न होने वाली सारी समस्याओं की कल्पना कर चुका था और उसके हल भी ढूंढ चुका था। फिलहाल वह कुछ दिनों के लिए इस जगह पर आराम कर, वापिस लौटना चाहती थी। जिस काम के लिए यहाँ तक आए थे, वह काम तो बीच रास्ते ही मुकम्मल हो चुका था। इसलिए यहाँ ज्यादा समय व्यतीत करने का कोई कारण नही था। वह बस इतना ही वक्त बिताना चाहती थी जो महाराज को यकीन दिलाने के लिए काफी हो। वैसे महारानी के गर्भवती होने की संभावना का पता चलते ही, महाराज ज्यादा कुछ पृच्छा करे ऐसी गुंजाइश कम ही थी।
वहाँ अपने तंबू में लैटे हुए, दासी से पैर दबवा रही थी और उनके मुंह से चुगलियाँ सुन रही थी। दासी ने बड़े ही चाव से, चटकारे लेते हुए, सारा किस्सा सुनाया। हालांकि जिस वक्त शक्तिसिंह और राजमाता उस कुटिया में चुदाई कर रहे थे, तब वहाँ कोई मौजूद नही था, पर उनकी कराहने की आवाज, राजमाता की बाहर तक सुनाई देती सीसीकियाँ, और जब वह दोनों बाहर निकले तब जिस तरह उन दोनों के वस्त्र अस्त-व्यस्त थे, वह देखकर कोई अबुद्ध व्यक्ति भी समझ सकता था की अंदर क्या गुल खिलाए जा रहे थे। राजमाता का खौफ इतना था की कोई खुले मुंह ऐसी बातों को जिक्र करने से बचता।
"हाय... जरा घुटनों के ऊपर तक दबा.. बहुत दर्द हो रहा है!!" महरानी ने आह भरते हुए कहा
"जी रानी साहिबा... आप कहो तो गुनगुने तेल से थोड़ी मालिश भी कर दूँ?"
"थोड़ी देर बाद... तू यह बता की जब राजमाता और शक्तिसिंह बाहर निकले तब उनका हाल कैसा था?"
"क्या बताऊ? शर्म आती है मुझे" खिलखिलाकर हँसते हुए दासी बोली
"ज्यादा होशियार मत बन... मुझे सब पता है तू रात को जंगल में उस घुड़सवार के साथ जाकर क्या क्या करती है.. चुदवा चुदवा कर तेरे कूल्हे कितने बड़े हो गए है.. और अब बात करने में शर्म आ रही है तुझे!!"
"क्या महारानी जी, आप भी!! अरे वो दोनों जब बाहर निकले तब में उस घने पेड़ के पीछे से देख रही थी... शक्तिसिंह तो ठीकठाक दिख रहा था पर राजमाता का घाघरा सिलवटों से भरा हुआ था.. चोली भी ठीक से नही बांधी थी.. और बाल बिखरे हुए थे। चलते चलते वह लड़खड़ा रही थी। ही..ही.. ही.. लग रहा था की बड़ी ही दमदार चुदाई हुई होगी राजमाता की" हँसते हँसते दासी ने विवरण दिया
"और उसके बाद क्या हुआ?"
"उसके बाद तो शक्तिसिंह अपने तंबू में चला गया और राजमाता अपने तंबू में... कब से खर्राटे मारकर सो रही है.. सभी दासियों को आदेश दिया गया है की जब तक वह सामने से न बुलाए, कोई उनके तंबू में नही जाएगा..."
"हम्ममम... " रानी ने अपनी टांगों को मोडकर अपने घाघरे को थोड़ा सा ऊपर तक उठा दिया..
"तू ठीक से मालिश कर.. तेरे हाथों में अब पहले वाला जोश नही रहा"
"क्या बात कर रही हो रानी जी... मेरा जोर तो पहले जैसा ही है... शायद आज भारी परिश्रम के कारण दर्द कुछ ज्यादा ही हो रहा है आपको.. ही..ही..ही.."
"बड़ी हंसी आ रही है तुझे... लगता है राजमहल पहुँच कर तेरा तबादला रसोईघर में करना पड़ेगा..."
"क्षमा कीजिए महारानी जी, अगर कोई गुस्ताखी हो गई हो तो... पर कृपया मुझे रसोईघर में ना भेजे... वह खानसामा पूरा दिन इतना काम करवाता है और रात को भी चैन नही लेने देता..."
"क्या बात कर रही है!! वो बूढ़ा बावर्ची भी चढ़ता है क्या तुझ पर?"
"अरे बात ही जाने दीजिए.. कमीना सिर्फ चेहरे से ही बूढ़ा है... पर उसका हथियार एकदम सख्त और हिंसक है... एक बार चढ़ाई करता है तो दो दिन तक में ठीक से चल नही पाती... "
"ठीक है, ठीक है... अब बातें कम कर और हाथ तेजी से चला... ऊपर जांघों तक मालिश कर.. और फिर कमर पर जरा तेल लगा दे... पूरा जिस्म दर्द कर रहा है आज तो.. "
महारानी पद्मिनी अब करवट लेकर उल्टा लेट गई। दासी उनके ऊपर सवार होकर दोनों हाथों से कमर पर तेल मलने लगी।
"जरा घाघरा नीचे सरका दीजिए ताकि में आपके पिछवाड़े पर ठीक से मालिश कर सकूँ"
महारानी ने अपना नाड़ा खोला और घाघरे को नीचे की तरफ सरका दिया
"हाय... कैसे गोरे गोरे चूतड़ है आपके महारानी जी... ऐसा लग रहा है जैसे मक्खन के दो पिंड हो.. "
"तू ज़बान कम चला अपनी... "महारानी थोड़ी शर्मा गई
दोनों कूल्हों पर गुनगुना तेल घिसते हुए दासी ने दोनों चूतड़ों को हल्का सा फैलाया... महारानी का बादामी रंग का छेद नजर आते ही वह मुस्कुरा दी... तेल की कुछ धाराएँ उस छेद तक जाने दी... और उंगली से उसके इर्दगिर्द मलने लगी...
"हाय... क्या कर रही है रे तू?" गांड के छेद पर स्पर्श होते ही महारानी सिहर उठी...
"अरे मालिश कर रही हूँ... कोई भी कोना छूटना नही चाहिए.. नही तो फिर आप ही वापिस रसोईघर में भेजने की बात कहेगी"
"पर देख तो सही तू कहाँ उंगली कर रही है!!"
"आप कहे तो ना करू"
"अमम करती जा.. पर जरा संभाल कर"
"जी महारानी"
दासी ने कुछ देर तक गांड के छिद्र पर गोल गोल उंगली घुमाई... महारानी को इतना मज़ा आने लगा... कभी सोचा नही थी उन्होंने की इस जगह से भी मज़ा लिया जा सकता था... हालांकि उन्होंने काम-शास्त्र के पठन के वक्त, गुदा-मैथुन के बारे में सुना जरूर था... पर दासियों के मुंह से भी यह बातें भी सुनी थी की यह कितना दर्दनाक होता है॥
दासी ने छिद्र को तेल से लसलसित कर अपनी उंगली को धीरे से अंदर घुसा दिया।
"ऊईई माँ... क्या कर रही है तू... " रानी थरथरा गई
"थोड़ा सा तेल अंदर डाल रही हूँ... इससे आपको अच्छा भी लगेगा और सुबह मलत्याग में भी सरलता रहेगी"
महारानी कुछ भी बोले बगैर उस अनोखे एहसास को महसूस करते हुए लैटी रही... इतना आनंद आ रहा था की वह चाहती थी यह मालिश चलती ही रहे। कुछ देर अंदर बाहर करने के बाद दासी ने उंगली बाहर निकाल ली और चूतड़ों पर मालिश करने लगी।
"तूने उंगली डालना बंद क्यों कर दिया?"
"मुझे लगा की आपको तकलीफ हो रही होगी... इसलिए... " दासी ने सकपकाकर कहा
"थोड़ी देर और कर... ठीक से तेल जाने दे अंदर"
"ठीक है महारानी साहिबा" दासी ने आश्चर्यसह वापिस अपनी उंगली अंदर डाल दी।
दासी ने देखा की जब भी वह उंगली गांड के अंदर डालती तब महारानी के चुत के होंठ भी सिकुड़ जाते... उंगली बाहर निकालते ही वह पूर्ववत हो जाते। कुछ देर ऐसा करने पर उनकी चुत के होंठ और झांटों पर गीलापन नजर आने लगा। दासी समझ गई की क्यों महारानी ने वापिस उंगली करने को कहा। वह मन ही मन मुस्कुराने लगी।
"जरा तेजी से आगे पीछे कर" भारी आवाज में महारानी ने कहा।
दासी ने आदेश का पालन किया। उसने देखा की महारानी ने अपने एक हाथ से स्तन को धर दबोचा था और वह चोली के ऊपर से ही अपनी निप्पल को मरोड़ रही थी। पता चल गया की क्यों दोबारा उन्होंने गांड में उंगली करने को कहा!! महरानी को इसमे बेहद मज़ा आ रहा था। दासी भी इस नई खोज पर खुश हो गई... महारानी को खुश रखने पर... आए दिन वह तोहफे दिया करती थी। किस्मत अच्छी रहे तो कभी कभार एकाद सुवर्ण मुद्रा भी मिल जाती थी।