• Hello Friends You can Register on the Forum and by posting you can earn money too.

रेल यात्रा compleet



शीतल ने ऐसे ही पैंटी नीचे कर दी और अपने चुतड़ पीछे धकेल दिए। लंड अपनी

जगह पर जाकर सेट हो गया।

आशीष ने शीतल की एक टांग को घुटने से मोड़ कर आगे कर दिया। इससे एक तो

चूत थोड़ी बाहर को आ गयी दूसरे उसका मुंह भी खुल गया।

आशीष को रास्ता बताने की जरुरत ही न पड़ी। लंड खुद ही रास्ता बनाता अन्दर

सरकता चला गया।

इस प्यार में मज़बूरी न होने की वजह से शीतल को ज्यादा मजे आ रहा था। वो

अपनी गांड को आशीष के लंड के धक्कों की ताल से ताल मिला कर आगे पीछे करने

लगी। दोनों जैसे पागल से हो गए। धक्के लगते रहे। लगाते रहे। कभी आशीष

तेज़ तो कभी शीतल तेज़। धक्के लगते रहे। और जब धक्के रुके तो एक साथ।

दोनों पसीने में नहाए हुए थे। एक दुसरे से चिपके हुए से। आशीष ने भी यही

किया। उसकी चूत को एक बार फिर से भर दिया। दोनों काफी देर तक चिपके रहे।

फिर उठकर गुसलखाने की और चले गए। वहां राजपूत कविता को अपने तरीके सिखा

रहा था।

**********************************************************

अगले दिन ट्रेन मुंबई रेलवे स्टेशन पर रुकी। कविता ने नीचे उतरते ही आशीष

का हाथ थाम लिया और उसकी ओर मुस्कुराती हुयी बोली- "तुम कह रहे थे

तुम्हारा यहाँ कोई नहीं है। अगर तुम चाहो तो हमारे साथ चल सकते हो।"

आशीष की तो पाँचों उंगलियाँ अब घी में थी- "ठीक है, तुम कहती हो तो चल

पड़ता हूँ।" उसने कविता का हाथ दबाते हुए उसकी ओर आँख मारी।

"हाँ। हाँ। क्यूँ नहीं। तुम शहर में अजनबी हो बेटा। कुछ दिन हमारे साथ

रहोगे तो तुम्हे इधर-उधर का ज्ञान हो जायेगा। चलो हमारे साथ। कुछ दिन

आराम से रहना-खाना।" ताऊ न कहा और चारों साथ-साथ स्टेशन से बाहर निकल गए!

लगभग आधे घंटे बाद चारों एक मैली कुचैली सी बस्ती में पहुँच गए। हर जगह

गंदगी का आलम था। मकानों के नाम पर या तो छोटे-छोटे कच्चे घर थे। या फिर

झुग्गी झोपड़ियाँ।

"हम यहाँ रहेंगे?" आशीष ने मरी सी आवाज में पूछा।

"अरे चलो तो सही। अपना घर ऐसा नहीं है। अच्छा खासा है भगवान की दया से।

तुम्हें कोई समस्या नहीं होगी वहां" बूढ़े ने आशीष की ओर खिसियाते हुए

कहा।

"हम्म्म! !" आशीष ने हामी भरी और रानी की और देखा। वो भी इस जगह से अनजान

थी। इसीलिए उनके पीछे-पीछे चल रही थी।

"लो भाई, ये आ गया अपना घर, ठीक है न?" बूढ़ा मुस्कुराते हुए घर के बाहर खड़ा हो गया।

घर वास्तव में ही काफी बड़ा था। पुराना जरूर था। पर उन झुग्गी-झौपड़ियों

के बीच खड़ा किसी महल से कम नहीं लग रहा था।

"ए बापू आ गए, चलो उठो!" अन्दर से किसी लड़की की आवाज आई। दरवाजा खुला और

चारों अन्दर चले गए।
 


अन्दर जाते ही आशीष की आँखें आश्चर्य से फ़ैल सी गयी। अब उसका विश्वास

पुख्ता हो चला था की 'बापू ' दल्ला है लड़कियों का। घर में घुसते ही उसकी

नजर 14 से 22-23 साल की बीसियों लड़कियों पर पड़ी। सभी ने अश्लील से आधे

अधूरे कपडे डाल रखे थे। लड़कियां पंक्तिबद्ध होकर आशीष को टुकुर-टुकुर

देखने लगी। मनो देख रही हों की किसकी लोटरी लगेगी। उनके पास ही कोई 20-22

साल की उम्र के 2 लड़के भी खड़े थे।

"चलो चलो। अपना अपना काम करो। ये हमारा मेहमान है। 'वो ' नहीं जो तुम समझ

रही हो। " बूढ़े के ऐसा कहते ही लड़कियां छिन्न-भिन्न हुई और एक-एक करके

वहां से गायब हो गयी।

"ये सब कौन हैं ताऊ?" आशीष ने अनजान सा बनकर पूछा।

"कविता तुम्हे सब समझा देगी बेटा। कविता बेटी। एक कमरा खाली करवा कर इसका

सामन उसमें रखवा दो। देखना इसको कोई परेशानी न हो। मैं थोड़ी देर में आता

हूँ। " कहकर बूढ़ा बाहर निकल गया।

"ए राजू। अपने वाला कमरा खाली करो जल्दी। पुष्प अकेली है न। तुम उसके

कमरे में चले जाओ और विष्णु को बापू के साथ भेज दो। जल्दी करो। और ये

रानी कहाँ रहेगी?" कविता अपने माथे पर हाथ रख कर सोचने लगी।

"ये सब कौन हैं? " आशीष ने पूछा।

"कुछ भी समझ लो ", कविता मुस्कुरायी! " जो भी पसंद हो। मुझे बता देना।

तुम्हारे कमरे में पहुँच जाएगी! " कविता ने आशीष की ओर आँख मारी और फिर

जा रहे राजू को वापस बुलाया- "ए सुन राजू। इसको कहाँ रखेंगे?"

"अब मुझे क्या पता। बाकी कमरों में तो पहले ही दो-दो हैं! !" राजू ने कहा

और रानी के पास खड़ा होकर उसके गालों का चुम्मा लेने लगा।

"ये...ये क्या कर रहे हो!? शर्म नहीं आती क्या?" रानी गुस्से से बोली।

"हा-हा-हा शरम! " राजू ने उससे दूर होकर हवा में एक और 'किस' उसकी और

उछाली और मुस्कुराकर पलट गया।

"तुम ऐसा करो। इसको पुष्प के पास भेज दो। तुम्हारा मैं देखती हूँ।" कविता

ने राजू से कहा।

"अगर कोई दिक्कत न हो तो रानी मेरे साथ रह लेगी।!" आशीष ने कहा!

"हाँ। हाँ। भाभी। मैं आशीष के साथ ही रहूंगी! " रानी तुरंत बोल पड़ी।

"दरअसल! चलो आओ। पहले कमरा देख लो। फिर जैसा तुम कहोगे कर लेंगे। " कविता

ने कहा और कोने वाले कमरे की और चल पड़ी।

आशीष की कमरे में जाते ही नाक भौं सिकुड़ गयी। कमरे के नाम पर एक छोटा सा

पलंग डालने की जगह ही थी। जिसको शायद लकड़ी की चारदीवारी से कमरे का रूप

दिया गया था। कमरे से थूके हुए पान के धब्बों और कंडाम्स की बदबू आ रही

थी!- "ओह्ह। तो ये कमरा है?"

 


आशीष के बोलने का अंदाज और उसके चेहरे के भाव पढ़ कर कविता गुस्से से बाहर

निकली- "ए राजू। ये क्या है रे। सारे कमरे को पान की पीकों से भर रखा है,

चल। मिनट से पहले इसको धो दे! " कह कर वापस कविता अन्दर आई और बोली-

"चिंता मत करो। अभी सब ठीक हो जायेगा। पर अब बोलो। रानी को साथ रख लोगे?"

आशीष ने घूम कर बाहर खड़ी रानी को देखा। रानी आँखों ही आँखों में खुद को

उससे दूर न करने की प्रार्थना करती हुयी लग रही थी- "हम्म...रख लूँगा।!"

"ठीक है। रानी! तुम राजू के साथ मिलकर इस कमरे की सफाई करवा दो। तुम मेरे

साथ आओ आशीष। तब तक मैं तुम्हे यहाँ लड़कियों से मिलवाती हूँ! " कहकर

कविता आशीष का हाथ पकड़ कर बाहर ले गयी।

आशीष उस घर की एक एक लड़की से मिला। सभी भूखी प्यासी सी नजरों से उसको देख

कर मुस्कुरा रही थी। भूख उनके पते की थी या शरीर की। ये आशीष समझ नहीं

पाया। कहने को सभी एक से एक सुन्दर और जवान थी। पर ये सुन्दरता और जवानी

उनके शरीर तक ही सीमित थी। किसी की आँखों में अपनी जवानी और सौंदर्य को

लेकर गर्व की भंगिमाएं नहीं थी। उनको देख कर आशीष को लगा जैसे यह चार दिन

की जवानी ही उनका सहारा है और यह जवानी ही उनकी दुश्मन!..

"इसमें कोई नहीं है क्या?" कविता चलते हुए जब एक कमरे को छोड़ कर आगे जाने

लगी तो आशीष ने यूँही पूछ लिया।

"है। पर तुम्हारे मतलब की नहीं। साली नखरैल है। " कहकर कविता वापस मुड़ी

और कमरे का लकड़ी के फत्ते का दरवाजा खोल दिया!- "वैसे क़यामत है। पता नहीं

किस दिन तैयार होगी। "

आशीष ने अन्दर झाँका तो अचरज से देखता ही रह गया। अन्दर अपनी आँखें बंद

किये लेटी लड़की का रंग थोडा सांवला था। पर नयन नक्स इतने कटीले और सुंदर

थे की आशीष का मुंह खुला का खुला रह गया। उस लड़की का चेहरा सोने की तरह

अजीब सी आभा लिए हुए था। गालों पर एक अन्छुयी सी कशिश थी। होंठ गुलाब की

पंखुड़ियों के माफिक थे। एक दम रसीले! ! आशीष को उसी पल में उसको बाहों

में समेट कर प्यार करने का ख्याल आया!- "इसको मैंने बाहर तो नहीं देखा।?"

"हम्म्म। बताया तो तुम्हे की बड़ी नखरैल है साली। ये बाहर नहीं निकलती।

देखते हैं कब तक भूख के आगे इसके नखरे टिकते हैं। आओ!" कविता ने दरवाजा

बंद कर दिया।

"क्या मतलब?" आशीष की आँखों के सामने अब भी वही प्यारा सा चेहरा घूम रहा था!

"कुछ नहीं। आओ। तुम्हारा कमरा तैयार हो गया होगा। "कविता ने कहा और वापस

चल पड़ी!- "थोडा आराम कर लो। थके हुए आये हो। मैं भी लेट लेती हूँ थोड़ी

देर।!"

आशीष वापस अपने कमरे में गया तो दंग रह गया। बिस्तर पर बैठी रानी उसका

इन्तजार कर रही थी। आशीष को देखते ही मुस्कुराने लगी- "ठीक हो गया न।

अपना कमरा?"

 


कमरे को रानी ने इस तरह सजा दिया था मानो वह कोई सुहाग की सेज हो। सारा

कमरा अच्छी तरह से धोकर, बिस्तरे की चादर बदली करके और दीवार पर टंगे

नंगे पोस्टर को हटा कर कोने में उसने अगरबत्ती जला रखी थी। कविता के वापस

जाते ही आशीष ने बिस्तर पर चढ़ कर रानी को अपनी गोद में बैठा लिया।

आशीष रानी को प्यार करने के बाद नंगी ही बाहों में लिए पड़ा हुआ था। तभी

अचानक बाहर से किसी ने दरवाजा खटखटाया। रानी डरकर तुरंत आशीष की और देखने

लगी।

"घबरा क्यूँ रही हो!? लो। ये चद्दर औढ़ लो! " आशीष ने उसके जिस्म पर चादर

लपेटी और बिस्तर से ही झुकते हुए चिटकनी खोल दी। बाहर राजू खड़ा था!

"खाना ले लो भैया!" कह कर उसने एक खाने का डिब्बा आशीष की और बढ़ा दिया।

"थैंक्स! " आशीष ने कहा और दरवाजा बंद कर लिया।- "लो। खाओगी न?"

"और नहीं तो क्या? मुझे तो बहुत भूख लगी है। मैं कपडे पहन लूं एक बार! "

रानी उठी और अपने गले में समीज डालते हुए बोली।

अचानक आशीष के मन में कविता की बात कौंध गयी। 'देखते हैं कब तक भूख के

आगे इसके नखरे टिकते हैं '

"एक मिनट। तुम खाना शुरू करो। मैं अभी आता हूँ "- आशीष ने कहा और दरवाजा

खोल कर उस 'खोखे ' से बाहर निकल गया।

आशीष ने देखा। सभी दरवाजे खुले थे और सभी लड़कियां खाना खाने में व्यस्त

थी। सिर्फ 'उस ' लड़की का कमरा छोड़ कर। आशीष ने धीरे से दरवाजा अन्दर की

और धकेला। वो खुल गया। अन्दर बैठी वो लड़की सुबक रही थी। उसने धीरे से

अपना चेहरा दरवाजे की और घुमाया। अपने सामने अजनबी इंसान को देख कर 'वो

सहम सी गयी और अपनी छातियों पर चुन्नी डाल ली।

"क्या नाम है तुम्हारा?" आशीष ने कमरे के अन्दर घुस कर दरवाजा थोडा सा बंद किया।

"देखो! मुझसे जबरदस्ती करने की कोशिश की तो तुम्हारा सर फोड़ दूँगी। यकीन

नहीं आता हो तो बाहर पूछ लो। 2 दिन पहले भी आया था एक। तुम्हारी तरह! "

लड़की ने आशीष की तरफ घूरते हुए कहा। पर सच तो ये था की वो खुद आशीष को

'ग्राहक ' जान कर डर के मारे कांपने लगी थी।

"मैं.....मैंने तो सिर्फ नाम पूछा है। मैं 'गलत ' लड़का नहीं हूँ। " आशीष

ने प्यार से दूर खड़े-खड़े ही कहा।

लड़की ने एक बार फिर आशीष की नजरों में देखा। इस बार वह थोड़ी आश्वस्त सी

हो गयी थी- "मुझे किसी से कोई बात नहीं करनी। किसी को कुछ नहीं बताना। "

कहकर उसने फिर से रोना शुरू कर दिया।

"ऐसा मत करो। रो क्यूँ रही हो? आओ। मेरे पास आकर खाना खा लो। मैं दो चार

दिन यहीं रहूँगा। तब तक मुझसे दोस्ती करोगी?" कहकर आशीष ने अपना हाथ उसकी

और बाढ़ा दिया।

पर लड़की ने आशीष का हाथ नहीं थमा। हालाँकि वह अब उस पर विश्वास करने की

कोशिश कर रही थी!- "नहीं। खाना खाऊँगी तो 'वो ' लोग मुझे भी मारेंगे। और

आपको भी! !" सहमी सी नजरों से उसने आशीष को देखा।

"क्या मतलब? खाना खाने पर मारेंगे क्यूँ?" आशीष ने अचरज से पूछा।

"कल साइड वाली दीदी ने थोडा सा दे दिया था मुझे। आंटी ने मुझे भी बहुत

मारा और दीदी को भी शाम को खाना नहीं दिया।"

"क्या? पर क्यूँ?" आशीष का दिल कराह उठा।

"क्यूंकि...क्यूंकि मैं। तुम्हारे जैसे आने वाले लोगों के साथ सोती नहीं

हूँ। इसीलिए। कहते हैं की जब तक मैं नंगी होकर किसी के साथ सौउंगी नहीं।

मुझे खाना नहीं मिलेगा। " लड़की की आँखें द्रवित हो उठी।!

"ओह्ह। तुम आओ मेरे पास। मैं देखता हूँ। कौन तुम्हे खाना खाने से रोकता

है, उठो!" आशीष ने जबड़ा भींच कर कहते हुए उसका हाथ पकड़ लिया!

लड़की ने अपना हाथ छुड़ाने की कोशिश की- "नहीं। वो मारेंगे!"

"तुम उठो तो सही! " कहकर आशीष ने लगभग जबरदस्ती उसको बिस्तर से खींच लिया।

जैसे ही वो बाहर आये। बाहर बैठा राजू दूर से ही चिल्लाया!- "ए भैया। इसको

कहाँ लिए जा रहे हो। पागल है ये!"

"आशीष ने घूर कर उसकी तरफ देखा और सीधा अपने कमरे में घुस गया। रानी खाना

शुरू कर चुकी थी। आशीष की ओर देख कर पहले हंसी। और फिर उस लड़की का हाथ

उसके हाथ में देख कर बेचैन हो गयी- "ये कौन है?"

"दोस्त है। तुम इसको खाना खिलाओ। मुझे भूख नहीं है। " आशीष ने मुस्कुराते हुए कहा।
 
"तो क्या! अब मैं आपके पास नहीं रहूंगी। मुझे यहाँ डर लगता है। आपके जाते

ही!" रानी मायूस होकर बोली।

"तुम कहीं नहीं जा रही मेरे पास से। खाना खाओ। फिर बात करेंगे!" आशीष ने

मुस्कुराकर रानी से कहा और बिस्तर पर एक कोने में बैठ गया।

कृतज्ञ सी होकर वो लड़की काफी देर तक आशीष को देखती रही। रानी की बातों से

उसको लगने लगा था की आशीष बुरा आदमी नहीं है। उसका दिल कह रहा था की 'वो'

उससे एक बार और नाम पूछ ले।

"खाना खाओ आराम से। किसी से डरने की जरुरत नहीं। इनकी तो मैं! " आशीष के

दिमाग में कुछ चल रहा था।

लड़की रानी के साथ बैठ कर खाना खाने लगी।!।

"हेल्लो, मुंबई पुलिस!" आशीष के फ़ोन पर आवाज आई।

"जी। मैं आशीष बोल रहा हूँ। धरावी से!" आशीष ने संभल कर उन दोनों को चुप

रहने का इशारा किया।

"जी, बताईये हम आपकी क्या सेवा कर सकते हैं!?" उधर से इस बार भी थकी थकी

सी आवाज आई।

"जी। जहाँ अभी मैं गलती से आ गया हूँ। वहां नाबालिग लडकियों को जबरजस्ती

लाकर उनसे वैश्यावृति करायी जा रही है। यहाँ.." आशीष की बात को उधर से

बीच में ही काट दिया गया।

"जी। पता लिखवाईये। "

"जी एक मिनट! " आशीष ने एक मिनट पहले ही मकान के बाहर से नोट करके लाया

पता ज्यों का त्यों लिखवा दिया।

"आप का नाम? "

"जी। आशीष!"

"मोबाइल नम्बर।?"

"जी 9215..........!"

"ठीक है। मैं अभी रिपोर्ट करता हूँ। " उधर से फोन कट गया।

"कहाँ फोन किया है आपने?" लड़की ने पूछा।

"पुलिस को। यहाँ किसी से बात मत करना!" आशीष ने कहा।

लड़की का चेहरा उतर गया!- "पुलिस तो यहाँ रोज ही आती रहती है। एक बार तो

पुलिस वाला मुझे गाली भी देकर गया था। इनकी बात न मानने के लिए! "

"अच्छा? आशीष ने कुछ सोचा और एक बार फिर 100 नम्बर ड़ायल कर दिया।

"हेल्लो, मुंबई पुलिस!" इस बार आवाज किसी महिला पुलिसकर्मी की थी!

"जी, मैं आशीष बोल रहा हूँ।!"

"जी, कहिये। पुलिस आपकी क्या मदद कर सकती है। "

आशीष ने पूरी बात कहने के बाद उसको बताया की लोकल पुलिस पर उसका भरोसा

कतई नहीं है। वो यहाँ से 'महीना ' लेकर जाते हैं। इसीलिए खानापूर्ति करके

चले जायेंगे। "

"OK! मैं आपकी कॉल फॉरवर्ड कर रही हूँ। कृपया लाइन पर बने रहिये।" महिला

पुलिसकर्मी ने कहा!

"जी धन्यवाद!" कहकर आशीष कॉल के कोनेक्ट होने का इंतज़ार करने लगा।

"हेल्लो! मुंबई मुख्यालय!"

आशीष ने पूरी बात विस्तार से कही और उनको अपना नाम, मोबाइल नम्बर। और

यहाँ का पता दे दिया। पर आवाज यहाँ भी ढीली इतनी थी की कोई उम्मीद आशीष

के मनन में न जगी!

तभी दरवाजा खुला और बूढ़ा दरवाजे पर चमका- "क्यूँ भाई? क्यूँ हमारी रोज़ी

पर लात मार रहे हो? इसको ऐसे ही खाना खिलाते रहे तो हम तो भिखारी बन

जायेंगे न!" बूढ़े के बात ख़तम करते ही दरवाजे पर उनके पीछे मोटे तगड़े

तीन मुस्टंडों के सर दिखाई दिए।

"खाना ही तो खिला रहा हूँ ताऊ। इसमें क्या है?" आशीष पीछे खड़े लोगों के

तेवर देख कर सहम सा गया।

"वो तो मैं देख ही रहा हूँ। तेरा खाना हमें 50,000 में पड़ेगा। पता है

क्या? ये साली किसी को हाथ तक नहीं लगाने देती अपने बदन पर। चल फुट यहाँ

से! " ताऊ ने उसके बाल पकड़ कर बिस्टर से उठा दिया! " वह कराह उठी!
 


"ये क्या कर रहे हो। छोड़ दो इसको! !" आशीष ने दबी सहमी सी आवाज में कहा।

"हाँ हाँ। छोड़ देंगे। एक लड़की का 2 लाख लगेगा। ला निकाल और ले जा जिसको

लेकर जाना है। " बूढ़े ने गुर्राकर कहा।

"तुम ऐसा कैसे कर सकते हो? " आशीष ने हडबडा कर कहा।

"अभी पता चल जायेगा हम कैसे करते हैं। अपना ATM इधर दो। वरना ये पहलवान

मार मार कर तुम्हारा भुरता बना देंगे।" ताऊ ने धमकी दी।

"पर...पर! " आशीष ने सहम कर उन गुंडों की और देखा। वो सभी बाहों में

बाहें डाले उसकी और देख कर मुस्कुरा रहे थे। आशीष ने जैसे ही ATM निकलने

के लिए अपना पर्स निकाला। बूढ़े ने पर्स ही हड़प लिया- "ला। छुट्टे भी

चलेंगे थोड़े बहुत। अब ATM का नम्बर बता और जिसकी मारनी है, मार कर चुप

चाप पतली गली से निकल ले!" पुर्से में 4-5 हज़ार रुपैये देख कर बूढ़ा खुश

हो गया।

आशीष बेबस था। पर उसको पुलिस के आने की उम्मीद थी। उसने बूढ़े को गलत

नम्बर बता दिया।

"शाबाश बेटा, जुग जुग जियो। हे हे हे ले ये रख ले। वापस जाते हुए काम

आयेंगे! " बूढ़े ने एक 500 का नोट उसकी जेब में डाल दिया!

"क्या है रे बूढ़े। तू अपने ग्राहक को चेक करके इधर क्यूँ नहीं बुलाता है।

खाली पीली किसी ने 100 नम्बर घुमा दिया। अपुन की वाट लग जाती है फ़ोकट

में! " बहार से आये एक पुलिस वाले ने पान का पीक दीवार पर थूकते हुए कहा।

"अरे पाटिल साहब। आईये आईये। " उसके स्वागत में सर झुका कर ताऊ चौंक कर

बोला- "क्या? 100 नम्बर।? जरूर इस हरामी ने ही मिलाया होगा! " बूढ़े ने

गुर्राकर कहते हुए आशीष की और देखा।

"ये काहे को मिलाएगा 100 नम्बर।। दो दो को बगल में दबाये बैठा है। अरे ये

भी!" पाटिल ने आश्चर्य से उस लड़की की और देखा!- "बधाई हो, ये लड़की भी

चालू हो गयी। अब तो तेरी फैक्ट्री में पैसे ही पैसे बरसेंगे। ला! थोड़े

इधर दे। " पाटिल ने पर्स से दो हज़ार के नोट झटक लिए।

"कहे की फैक्ट्री साहब। साली एक नम्बर की बिगडैल है। सुनती ही नहीं। ये

तो इसको खाना खिला रहा है भूतनी का। " बूढ़े ने पाटिल की जेब में जा टंगे

दोनों नोटों को मायूसी से देखते हुए कहा।

"अरे मान कहे नहीं जाती साली। अपने जवानी को इस तरह छुपा कर बैठी है जैसे

इसका कोई यार आकर इसको यहाँ से निकाल कर ले जायेगा। कोई नहीं आने वाला

इधर। तू निश्चिंत होकर अपनी चूत का रिब्बों कटवा ले। साली। छा जाएगी

अक्खी मुंबई में। मेरे से लिखवा ले तू तो। साली तू तो हेरोइन बनने के

लायक है। मुझसे कहे तो मैं बात करूं। फिलम इन्डस्ट्री में एक यार है अपुन

का भी। बस एक बार! " कहकर पाटिल ने अपनी बत्तीसी निकाल ली!- "बोल क्या

कहती है?"

लड़की ने शर्म से अपनी नजरें झुका ली।

"मान जा बहन चोद। यूँ ही सड़ जाएगी यहाँ। भूखी मार देंगे तुझे ये। एक

बार। बस एक बार नंगी होकर नाच के दिखा दे यहाँ। मैं खुद खाना लाऊंगा तेरे

लिए। " पाटिल अपनी जाँघों के बीच हाथ से मसलते हुए बोला।

"छोडो न साहब। ये देखो। आज ही नया माल लाया हूँ। दिल्ली से। एक दम करारी

है। एक दम सील पैक। उसे करके देखो!" बूढ़े ने रानी की और इशारा किया।

पाटिल ने दरवाजे से अन्दर हाथ करके रानी के गालों पर हाथ मारा!- "हम्म।

आइटम तो ये भी झकास है। चल। ड्यूटी ऑफ करके आता हूँ शाम को। फिर इसका

श्री गणेश करेंगे। अभी तो मेरे को जल्दी है। साला कैसी कैसी तन्सिओं देते

हैं ये लोग। मुझे तो पटवारी का काम लग रहा है। मुकाबले की वजह से जरूर

उसने ही फ़ोन करवाया होगा। वैसे तेरे माल का कोई मुकाबला नहीं भाऊ...एक

एक जाने कहाँ से बना कर लाता है। "

"हे हे हे सब ऊपर वाले की और आपकी दया है पाटिल साहब! !" बूढ़े ने मक्खन लगाया।

"ठीक है। ठीक है। अभी मेरे को दो चार पड़ोसियों के बयां लिखवा दे। 100

नम्बर की कॉल पर साला ऊपर तक रिपोर्ट बनाकर देनी होती है। जाने किस

मादरचोद...."

पाटिल ने अपनी बात पूरी भी नहीं की थी की बाहर पुलिस सायरन बज उठा।

 


"ए अब यहाँ मुनादी करनी जरूरी है क्या? ड्राईवर को बोल होर्न बंद कर देने

का। साला इस सायरन से इतनी चिढ़ है की! " एक बार फिर पाटिल की आवाज उसके

हलक में ही रह गयी। अगले ही पल पुलिस के आदमी पूरे मकान में फ़ैल गए।

घबराकर पाटिल ने बूढ़े का कालर पकड़ लिया- "साले। बूढ़े। यहाँ धंधा करता है।

मेरे इलाके में। चल ठाणे तेरी अकड़ निकालता हूँ। " पाटिल ने कहा और अन्दर

आ चुके इंस्पेक्टर को देखते ही गला छोड़ कर सलाम ठोका- "सलाम साहब! आपने

क्यूँ तकलीफ की। मैं पहले ही आ गया था इसको पकड़ने। खैर। अब आप आ गए हो तो

संभालो। मैं चलता हूँ। "

"तुम कहीं नहीं जाओगे पाटिल? इंस्पेक्टर ने अपनी टोपी उतारते हुए कहा-

"तुम्हारे ही खिलाफ शिकायत हुई है। यहीं खड़े रहो! " इंस्पेक्टर ने कहा और

पूछा- "आशीष कौन है!?"

"जी मैं। मैंने ही फ़ोन किया था।!" आशीष ने रहत की सांस ली!

"हम्म। वैरी गुड! पर तुम ये कैसे कह रहे हो की लोकल पुलिस कार्यवाही नहीं

कर रही। क्या पहले भी तुमने शिकायत की है?" इंस्पेक्टर ने पूछा।

"जी नहीं। इस लड़की ने बताया है। " आशीष ने अन्दर इशारा किया।

"हम्म....बाहर बुलाओ जरा इसको!" इंस्पेक्टर ने अन्दर देखते हुए कहा।

आशीष के इशारा करने पर डरी सहमी सी वो लड़की बाहर आ गयी। बाहर आते ही उसने

आशीष का हाथ पकड़ लिया।

"घबराओ नहीं बेटी। खुल कर बताओ। क्या पुलिस तुम्हे बचाने के लिए नहीं आ

रही।?" इंस्पेक्टर ने प्यार से पूछा।

आशीष के साथ खड़े होने और इंस्पेक्टर के प्यार से बोलने के कारण लड़की में

हिम्मत बंधी। उसने कडवी निगाह से पाटिल की और देखा- "ये ये पुलिस वाला तो

यहाँ रोज आता है। ये ये कुत्ता मुझे गन्दी गन्दी गालियाँ देता है और

उल्टा इन लोगों की बात मानने को कहता है। इसी ने इन लोगों को बोला है की

मैं जब तक इनकी बात मानने के लिए तैयार नहीं होती मेरा खाना बंद कर दो।

मैंने इसको हाथ जोड़ कर कहा था की मैं यहाँ नहीं रह सकती। ये कहने लगा की

मेरे साथ कर लो। फिर मैं तुझे छुडवा दूंगा......थू है इस पर "

इंस्पेक्टर की नजरें पुलिस वाले की तरफ लड़की को इस तरह थूकता देख शर्म से

झुक गयी।- "क्या नाम है बेटी तुम्हारा?"

"रजनी!" कहते हुए लड़की ने सर उठा कर आशीष के चेहरे की और देखा। मनो कह

रही हो। मैं तुम्हे बताने ही वाली थी। पहले ही।

"हम्म....बेटा, ऐसे गंदे लोग भी पुलिस में हैं जो वर्दी की इज्जत को यूँ

तार तार करते हैं। ये जान कर मैं शर्मिंदा हूँ। पर अब फिकर मत करो!" फिर

आशीष की और देखते हुए बोला- "और कुछ मिस्टर आशीष!"

"जी। इस बूढ़े ने मेरा पर्स छीन लिया है। और उसमें से 2000 रुपैये आपके इस

पाटिल ने निकाल लिए हैं। "

पाटिल ने तुरंत अपनी जेब में ऊपर से ही चमक रहे नोटों को छिपाने की कोशिश

की। इंस्पेक्टर ने रुपैये निकाल लिए।

"नहीं! जनाब ये रुपैये तो मेरी पगार में से बचे हुए हैं। वो आज मैडम ने

कुछ समान मंगाया था। माँ कसम। " पाटिल ने आखिर आते आते धीमा होकर अपना सर

झुका लिया।

इंस्पेक्टर ने बूढ़े के हाथ से पर्स लिया। उसमें कुछ और भी हज़ार के नोट

थे। इंस्पेक्टर ने कुछ देर सोचा और फिर बोले- "शिंदे।!"

"जी जनाब!" शिंदे पीछे से आगे आ गया!

रजनी बिटिया का बयान लो और पाटिल को अन्दर डालो। बूढ़े को और जो लोग इसके

साथ हैं। उनको भी ले लो। सारी लड़कियों का घर पता करके उन्हें घर भिजवाओ

और जिनका घर नहीं है। उनको महिला आश्रम भेजने का प्रबंध करो!" इंस्पेक्टर

ने लम्बी सांस ली।

इंस्पेक्टर की बात सुनते ही रानी अन्दर से बाहर आई और रजनी से आशीष का

हाथ छुडवा कर खुद पकड़ने की कोशिश करने लगी। पर रजनी ने हाथ और भी सख्ती

से पकड़ लिया। इस पर रानी आशीष के दूसरी तरफ पहुँच गयी और उसका दूसरा हाथ

पकड़ लिया।

आशीष ने हडबडा कर अपने दोनों हाथ पकडे खड़ी लड़कियों को देखा और फिर

शर्मिंदा सा होकर इंस्पेक्टर की और देखने लगा।

"वेल डन माय बॉय! यू आर हीरो!" इंस्पेक्टर ने पास आकार आशीष का कन्धा

थपथपाया और मुड़ गया।

रेलवे स्टेशन पर पहुँच कर आशीष ने रहत की सांस ली। हीरो बनने का ख्वाब

अधूरा छोड़ वह वापस अपने घर जा रहा था। बेशक वह हीरो नहीं बन पाया। पर

इंस्पेक्टर के 'वो' शब्द उसकी छाती चौड़ी करने के लिए काफी थे!

"वेल डन माय बॉय! यू आर हीरो!"

इन्ही रोमांचक ख्यालों में खोये हुए तत्काल की लाइन में आशीष का नम्बर कब

खिड़की पर आ गया। उसको पता ही नहीं चला!

"अरे भाई बोलो तो सही!" खिड़की के अन्दर से आवाज आई।

"थ्री टिकट टू दिल्ली!" आशीष ने आरक्षण फाम अन्दर सरकते हुए जवाब दिया!

--

Raj Sharma
 
Back
Top