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लौट आओ तुम
lekhak-पुष्पा सक्सेना
उनसे मिलने का सौभाग्य उसे दूरदर्शन की अपनी नौकरी की वजह से मिला था। मीता की उस केन्द्र में कम्पीयर के रूप में तभी नई-नई नियुक्ति हुई थी। बेहद मासूम चेहरे पर उज्ज्वल, गहरी काली आंखें उसकी विशेषता थी। आवाज की ताज़गी और मीठी खनक ने, उसकी सबसे अलग पहचान बना दी थी। कुछ ही दिनों में वह दर्शकों की फेवरिट कम्पीयर बन गई थी। फै़न-मेल से आए पत्रों को वह बड़े उत्साह से पढ़ती और आरती को लिख भेजती।
आलोक जी के इन्टरव्यू के लिए केंद्र निर्देशक ने कुछ देर सोचने के बाद उसका ही नाम सुझाया था। इस बात पर मीता को ताज्जुब ही हुआ था, उससे सीनियर कई अनुभवी कम्पीयर थी, उसके बावजूद केंद्र-निर्देशक द्वारा उसका नाम सुझाया जाना, उसे बहुतों की ईर्षा-पात्री बना गया।
इतने महत्वपूर्ण व्यक्ति से साक्षात्कार कैसे कर पाऊंगी बड़ी-बड़ी आंखों में आश्चर्य सिमंट आया था।
‘अब बनो मत, में तो लड्डू फूट रहे हैं। ऊपर से बाते बना रही है।’ कान्ता ने चिढ़े स्वर में कहा।
‘नही कान्ता दी, सच्ची डर लग रहा है। सुना है वो जिससे नाराज हो जाएं, उसकी छुट्टी हो गई समझो।’
तुझे क्यों डर लग रहा है? तेरे सुन्दर मुखड़े पर तो सौ खून भी माफ़ किए जा सकते हैं, वर्ना इतनी एक्सपीरिएंस्ड इन्टरव्यूअर के रहते डाइरेक्टर साहब तुझे चुनते? निशा के स्वर में हिकारत झलक रही थी।
‘इसके लिए मुझे क्यों दोष दे रही है, मैने थोड़ी जाकर उनसे कहा...।’ मीता रूआंसी हो आई।
‘क्यों बेचारी के पीछे पड़ी हो, सच तो यह है मीता जिस सहजता से इन्टव्यू लेती है, हम किसी को संभव नहीं है।’ अलका दी ने मीता का पक्ष लिया।
‘हमें क्या पड़ी है जो किसी के पीछे पड़ें। आप तो अलका दी कमाल ही करती हैं, इत्ते ही दिनों में यह नई लड़की आपकी अपनी हो गई और हम बेग़ाने हो गए।’ निशा ने शिकायत सी की थी।
मेरे लिए तो तुम सब समान हो, पर मेरे ख्याल में नई पीढ़ी को अच्छे चांस मिलने ही चाहिए। अपने टाइम में हमने मनचाहा कर लिया, अब इनका ज़माना है। चलो इसी बात पर आज सबको चाय मैं ही पिलाती हूँ।
‘थैंक्यू अलका दी, पर अभी तो पिछले प्रोग्राम की एडिटिंग नही कर पाई हूँ। आज उसे निबटाना है, मुझे तो माफ करें।’ निशा ने चाय पीने के साथ, न जाने का अच्छा सा बहाना खोज लिया।
‘मुझे भी ए.एस.डी. से मिलना है, तीन बजे का टाइम दे रखा है। आपकी चाय उधार रही अलका दी।’ कान्ता का बनावटी बहाना, स्पष्ट था।
‘ठीक है, चल मीता’ अपन दोनों ही चाय पीने चलते हैं, ‘या तुझे भी कोई काम है?’ हल्की मुस्कान के साथ अलका दी ने पूछा था।
‘आपके साथ चाय पीने से ज्यादा महत्वपूर्ण काम और कौन सा होगा, अलका दी।’
‘चमची कहीं की।’ कान्ता हल्के से बुदबुदाई थी।
‘देखना है, कितने दिन इसकी चमचागीरी करेगी।’ निशा झुंझलाई थी।
कैंटीन-स्वामी ने आदर से अभिवादन किया था।
‘आज बहुत दिन बाद आने का टाइम मिला है दीदी को।’
‘हां बनवारी, कुछ न कुछ लगा ही रहता है। चैनल बढ़ने से काम तो बढ़ेगा ही।’
‘सो तो ठीक कहा दीदी, क्या भेजू’
‘आज का क्या स्पेशल है बनवारी, वही भेज दो।’
‘आज तो गरमागरम आलू-चाप हैं। अरे ओ सुरेशवा, इधर दो स्पेशल चाय और टिक्की तो देना।’ बनवारी ने अपने साहयक को वहीं से आवाज लगाई।
‘और कहो मीता यह शहर कैसा लग रहा है?’ अलका ने टिक्की की टुकड़ा मुंह में रखते हुए पूछा।
‘बहुत अच्छा। अपने छोटे से शहर के मुकाबले ये बड़ा शहर है। आप यहां कब से हैं अलका दी’
‘अब तो लगता है युगों से यहीं रहती आई हूँ। वैसे मेरा घर सुल्तानपुर में है। शायद नाम नहीं सुना होगा’
‘सुल्तानपुर, हमारी तो ननसाल ही सुल्तानपुर में है। नानाजी वहां तहसीलदार थे। बचपन में कई बार उधर जाना हुआ है।’
‘वाह तब तो हम मौसेरी बहनें हैं, ठीक कहा न’
‘मुझे तो हमेशा आपसे बड़ी बहिन जैसा-स्नेह मिला है, अलका दी। शुरू से आपने हर जगह, हर पल मेरी सहायता की है, आप न होती तो...।’
‘कोई और होता। तुममें गुण हैं, उन्हें पहिचानों मीता। अपने को अंडर एस्टिमेट कभी नहीं करना चाहिए, वर्ना दूसरे लोग फायदा उठा लेते हैं।’
‘आप शुरू से ही इतनी बोल्ड थीं, अलका दी’
‘शुरू से... मैं बोल्ड...क्या मैं बोल्ड दीखती हूँ, मीता?’
‘आपके साहस की तो सभी दाद देते हैं अलका दी। सुनते हैं स्टेशन डाइरेक्टर तक आपसे डरते हैं।’
‘बड़ी कड़वी बात कह गई मीता।’
मुझे माफ़ करें, अलका दी।
‘किस-किस को माफ़ करूं, मीता। सभी ने ऐसा ही समझा है मुझे।’ अलका उदास हो आई थी।
उस उम्र में भी अलका में एक अजीब आकर्षण था। छरहरी-लम्बी देह के साथ मुख की बनावट भी सुन्दर थी। निश्चय ही युवावस्था में वह बहुत सुन्दर रही होगी। नियुक्ति के बाद से मीता, अलका का इधर-उधर नाम वह सुनती आ रही है।
‘अरे बाप रे, वह तो बड़ी जबरदस्त चीज़ है, सबकी ऐसी की तैसी कर देती है, जरा सम्हल के रहना उससे।’ पहले ही दिन निर्मला ने मीता को समझाया था।
‘पर हमें तो वह बहुत अच्छी लगती हैं। ठीक बात के पक्ष में ही तो वह आवाज़ उठाती हैं। मीता ने हर मिटिंग में अलका दी को न्याय के लिए आवाज़ उठाते देखा था।
‘जो खुद ठीक न हो वह न्याय की गुहार लगाए। सौ-सौ चूहे खाकर बिल्ली हज को चली।’ निशा खिलखिल हंस पड़ी।
निशा की वो हंसी मीता को बिल्कुल अच्छी नहीं लगी थी। बाबूजी कहा करते थे पीठ पीछे बुराई उन्हीं की की जाती है, जिनमें कुछ ईर्षा लायक होता हो।
उस दिन के बाद से मीता अन्य लड़कियों से कटकर, अलका दी के निकट होती गई थी। कभी जी में आता उनसे पूछे-इस सुन्दर रूप के साथ, उम्र की इतनी सीढ़ियां बिना विवाह कैसे चढ़ गई, अलका दी? मधुमास की एक भी छींट आप पर क्यों नहीं पड़ीं, पर कभी पूँछ पाने का वह साहस न कर सकी।
मीता कभी यह भी नही सोच पाई कि अलका दी के बारे में इधर-उधर होती खुसपुस अकारण ही तो नहीं होगी, आज उन्हीं का वह स्वयं दिल दुखा बैठी।
चाय पीकर अलका के साथ लौटती मीता की स्टेशन डाइरेक्टर साहब के यहां से बुलाहट आई थी।
‘मिस वर्मा’ कल शाम पांच बजे आलोक जी का इन्टरव्यू, उन्हीं के बंगले पर लेने जाना होगा। प्रश्न बहुत अच्छे होने चाहिए। ऐसा कीजिए प्रश्नावली तैयार कर, एक बार मुझे, जरूर दिखा दें। आप उनके बारे में कुछ जानती हैंµ
‘जी सर, उनका बायोडाटा मेरे पास है। आप कुछ और बताना चाहेंगे?’
‘अरे उनके बारे में रोज ही कोई न कोई समाचार छपता रहता है। पुराने अखबार देख लो, बहुत मैटीरियल मिल जाएगा। चाहो तो शम्भूनाथ की हेल्प ले लो, उसने काफ़ी दिन उनके साथ काम किया है। मैं उससे कह दूंगा।’
आलोक जी के विषय में चारो ओर से इंस्ट्रकशन्स मिल रहे थे। इन सब निर्देशों ने मीता को डरा सा दिया। कालेज, विश्वविद्यालय की डिबेटों में उसे फ़स्र्ट प्राइज मिलती रही है। उसकी प्रेजेन्स आॅफ माइंड के कारण बाबूजी हमेशा चाहते रहे, वह वकील बने, पर उनके असामयिक निधन ने सब गड़बड़ा दिया। घर की सबसे बड़ी बेटी मीता को यह जाॅब लेना पड़ा। छोटा भाई उस समय इंजीनियरिंग के द्वितीय वर्ष में था। शायद दो-तीन वर्षों में स्थिति सुधर जाए। सबसे छोटी बहिन अभी बारहवीं कक्षा में है। बाबूजी ने वकालत में जितना कमाया, उससे ज्यादा खुले हाथ खर्च किया। दुनिया भर के दीन-दुखी बाबूजी से ही सहायता मांगने इकट्ठे रहते। रिश्तेदारों ने भी उनकी उदारता का हमेशा बेजा फा़यदा उठाया। अम्मा लाख मना करतीं पर बाबूजी हंस कर टाल देते।
‘अरे शांति इनकी दुआ ही काम आएगी। धन-सम्पत्ति साथ बांधकर ले जाना है क्या?’
‘साथ बांधकर ले जाने को कहीं कुछ छोड़ते भी हो, पर इतना तो सोचो दो-दो लड़कियों की शादी करनी है। सब दूसरों पर खर्च कर डालते हो, अपनी भी सोची है’
‘दूसरों की मदद करो, अपनी मदद भगवान करेगा।’
‘इसीलिए दूसरों की लड़कियों की शादी की इतनी चिन्ता है कि अपनी बेटियों को भुला ही बैठे हैं। कौन विश्वास करेगा चचेरे भाई की लड़की की शादी का पूरा खर्च तुमने उठाया है? देख लेना, हमारे वक्त पर कोई काम नहीं आएगा।’
‘जो सबकी रक्षा करता है, वह विधाता तो अपने हिसाब में सब रखेगा शांति। अपने नाम को सार्थक करो और शांति रखो, देवि।’
lekhak-पुष्पा सक्सेना
उनसे मिलने का सौभाग्य उसे दूरदर्शन की अपनी नौकरी की वजह से मिला था। मीता की उस केन्द्र में कम्पीयर के रूप में तभी नई-नई नियुक्ति हुई थी। बेहद मासूम चेहरे पर उज्ज्वल, गहरी काली आंखें उसकी विशेषता थी। आवाज की ताज़गी और मीठी खनक ने, उसकी सबसे अलग पहचान बना दी थी। कुछ ही दिनों में वह दर्शकों की फेवरिट कम्पीयर बन गई थी। फै़न-मेल से आए पत्रों को वह बड़े उत्साह से पढ़ती और आरती को लिख भेजती।
आलोक जी के इन्टरव्यू के लिए केंद्र निर्देशक ने कुछ देर सोचने के बाद उसका ही नाम सुझाया था। इस बात पर मीता को ताज्जुब ही हुआ था, उससे सीनियर कई अनुभवी कम्पीयर थी, उसके बावजूद केंद्र-निर्देशक द्वारा उसका नाम सुझाया जाना, उसे बहुतों की ईर्षा-पात्री बना गया।
इतने महत्वपूर्ण व्यक्ति से साक्षात्कार कैसे कर पाऊंगी बड़ी-बड़ी आंखों में आश्चर्य सिमंट आया था।
‘अब बनो मत, में तो लड्डू फूट रहे हैं। ऊपर से बाते बना रही है।’ कान्ता ने चिढ़े स्वर में कहा।
‘नही कान्ता दी, सच्ची डर लग रहा है। सुना है वो जिससे नाराज हो जाएं, उसकी छुट्टी हो गई समझो।’
तुझे क्यों डर लग रहा है? तेरे सुन्दर मुखड़े पर तो सौ खून भी माफ़ किए जा सकते हैं, वर्ना इतनी एक्सपीरिएंस्ड इन्टरव्यूअर के रहते डाइरेक्टर साहब तुझे चुनते? निशा के स्वर में हिकारत झलक रही थी।
‘इसके लिए मुझे क्यों दोष दे रही है, मैने थोड़ी जाकर उनसे कहा...।’ मीता रूआंसी हो आई।
‘क्यों बेचारी के पीछे पड़ी हो, सच तो यह है मीता जिस सहजता से इन्टव्यू लेती है, हम किसी को संभव नहीं है।’ अलका दी ने मीता का पक्ष लिया।
‘हमें क्या पड़ी है जो किसी के पीछे पड़ें। आप तो अलका दी कमाल ही करती हैं, इत्ते ही दिनों में यह नई लड़की आपकी अपनी हो गई और हम बेग़ाने हो गए।’ निशा ने शिकायत सी की थी।
मेरे लिए तो तुम सब समान हो, पर मेरे ख्याल में नई पीढ़ी को अच्छे चांस मिलने ही चाहिए। अपने टाइम में हमने मनचाहा कर लिया, अब इनका ज़माना है। चलो इसी बात पर आज सबको चाय मैं ही पिलाती हूँ।
‘थैंक्यू अलका दी, पर अभी तो पिछले प्रोग्राम की एडिटिंग नही कर पाई हूँ। आज उसे निबटाना है, मुझे तो माफ करें।’ निशा ने चाय पीने के साथ, न जाने का अच्छा सा बहाना खोज लिया।
‘मुझे भी ए.एस.डी. से मिलना है, तीन बजे का टाइम दे रखा है। आपकी चाय उधार रही अलका दी।’ कान्ता का बनावटी बहाना, स्पष्ट था।
‘ठीक है, चल मीता’ अपन दोनों ही चाय पीने चलते हैं, ‘या तुझे भी कोई काम है?’ हल्की मुस्कान के साथ अलका दी ने पूछा था।
‘आपके साथ चाय पीने से ज्यादा महत्वपूर्ण काम और कौन सा होगा, अलका दी।’
‘चमची कहीं की।’ कान्ता हल्के से बुदबुदाई थी।
‘देखना है, कितने दिन इसकी चमचागीरी करेगी।’ निशा झुंझलाई थी।
कैंटीन-स्वामी ने आदर से अभिवादन किया था।
‘आज बहुत दिन बाद आने का टाइम मिला है दीदी को।’
‘हां बनवारी, कुछ न कुछ लगा ही रहता है। चैनल बढ़ने से काम तो बढ़ेगा ही।’
‘सो तो ठीक कहा दीदी, क्या भेजू’
‘आज का क्या स्पेशल है बनवारी, वही भेज दो।’
‘आज तो गरमागरम आलू-चाप हैं। अरे ओ सुरेशवा, इधर दो स्पेशल चाय और टिक्की तो देना।’ बनवारी ने अपने साहयक को वहीं से आवाज लगाई।
‘और कहो मीता यह शहर कैसा लग रहा है?’ अलका ने टिक्की की टुकड़ा मुंह में रखते हुए पूछा।
‘बहुत अच्छा। अपने छोटे से शहर के मुकाबले ये बड़ा शहर है। आप यहां कब से हैं अलका दी’
‘अब तो लगता है युगों से यहीं रहती आई हूँ। वैसे मेरा घर सुल्तानपुर में है। शायद नाम नहीं सुना होगा’
‘सुल्तानपुर, हमारी तो ननसाल ही सुल्तानपुर में है। नानाजी वहां तहसीलदार थे। बचपन में कई बार उधर जाना हुआ है।’
‘वाह तब तो हम मौसेरी बहनें हैं, ठीक कहा न’
‘मुझे तो हमेशा आपसे बड़ी बहिन जैसा-स्नेह मिला है, अलका दी। शुरू से आपने हर जगह, हर पल मेरी सहायता की है, आप न होती तो...।’
‘कोई और होता। तुममें गुण हैं, उन्हें पहिचानों मीता। अपने को अंडर एस्टिमेट कभी नहीं करना चाहिए, वर्ना दूसरे लोग फायदा उठा लेते हैं।’
‘आप शुरू से ही इतनी बोल्ड थीं, अलका दी’
‘शुरू से... मैं बोल्ड...क्या मैं बोल्ड दीखती हूँ, मीता?’
‘आपके साहस की तो सभी दाद देते हैं अलका दी। सुनते हैं स्टेशन डाइरेक्टर तक आपसे डरते हैं।’
‘बड़ी कड़वी बात कह गई मीता।’
मुझे माफ़ करें, अलका दी।
‘किस-किस को माफ़ करूं, मीता। सभी ने ऐसा ही समझा है मुझे।’ अलका उदास हो आई थी।
उस उम्र में भी अलका में एक अजीब आकर्षण था। छरहरी-लम्बी देह के साथ मुख की बनावट भी सुन्दर थी। निश्चय ही युवावस्था में वह बहुत सुन्दर रही होगी। नियुक्ति के बाद से मीता, अलका का इधर-उधर नाम वह सुनती आ रही है।
‘अरे बाप रे, वह तो बड़ी जबरदस्त चीज़ है, सबकी ऐसी की तैसी कर देती है, जरा सम्हल के रहना उससे।’ पहले ही दिन निर्मला ने मीता को समझाया था।
‘पर हमें तो वह बहुत अच्छी लगती हैं। ठीक बात के पक्ष में ही तो वह आवाज़ उठाती हैं। मीता ने हर मिटिंग में अलका दी को न्याय के लिए आवाज़ उठाते देखा था।
‘जो खुद ठीक न हो वह न्याय की गुहार लगाए। सौ-सौ चूहे खाकर बिल्ली हज को चली।’ निशा खिलखिल हंस पड़ी।
निशा की वो हंसी मीता को बिल्कुल अच्छी नहीं लगी थी। बाबूजी कहा करते थे पीठ पीछे बुराई उन्हीं की की जाती है, जिनमें कुछ ईर्षा लायक होता हो।
उस दिन के बाद से मीता अन्य लड़कियों से कटकर, अलका दी के निकट होती गई थी। कभी जी में आता उनसे पूछे-इस सुन्दर रूप के साथ, उम्र की इतनी सीढ़ियां बिना विवाह कैसे चढ़ गई, अलका दी? मधुमास की एक भी छींट आप पर क्यों नहीं पड़ीं, पर कभी पूँछ पाने का वह साहस न कर सकी।
मीता कभी यह भी नही सोच पाई कि अलका दी के बारे में इधर-उधर होती खुसपुस अकारण ही तो नहीं होगी, आज उन्हीं का वह स्वयं दिल दुखा बैठी।
चाय पीकर अलका के साथ लौटती मीता की स्टेशन डाइरेक्टर साहब के यहां से बुलाहट आई थी।
‘मिस वर्मा’ कल शाम पांच बजे आलोक जी का इन्टरव्यू, उन्हीं के बंगले पर लेने जाना होगा। प्रश्न बहुत अच्छे होने चाहिए। ऐसा कीजिए प्रश्नावली तैयार कर, एक बार मुझे, जरूर दिखा दें। आप उनके बारे में कुछ जानती हैंµ
‘जी सर, उनका बायोडाटा मेरे पास है। आप कुछ और बताना चाहेंगे?’
‘अरे उनके बारे में रोज ही कोई न कोई समाचार छपता रहता है। पुराने अखबार देख लो, बहुत मैटीरियल मिल जाएगा। चाहो तो शम्भूनाथ की हेल्प ले लो, उसने काफ़ी दिन उनके साथ काम किया है। मैं उससे कह दूंगा।’
आलोक जी के विषय में चारो ओर से इंस्ट्रकशन्स मिल रहे थे। इन सब निर्देशों ने मीता को डरा सा दिया। कालेज, विश्वविद्यालय की डिबेटों में उसे फ़स्र्ट प्राइज मिलती रही है। उसकी प्रेजेन्स आॅफ माइंड के कारण बाबूजी हमेशा चाहते रहे, वह वकील बने, पर उनके असामयिक निधन ने सब गड़बड़ा दिया। घर की सबसे बड़ी बेटी मीता को यह जाॅब लेना पड़ा। छोटा भाई उस समय इंजीनियरिंग के द्वितीय वर्ष में था। शायद दो-तीन वर्षों में स्थिति सुधर जाए। सबसे छोटी बहिन अभी बारहवीं कक्षा में है। बाबूजी ने वकालत में जितना कमाया, उससे ज्यादा खुले हाथ खर्च किया। दुनिया भर के दीन-दुखी बाबूजी से ही सहायता मांगने इकट्ठे रहते। रिश्तेदारों ने भी उनकी उदारता का हमेशा बेजा फा़यदा उठाया। अम्मा लाख मना करतीं पर बाबूजी हंस कर टाल देते।
‘अरे शांति इनकी दुआ ही काम आएगी। धन-सम्पत्ति साथ बांधकर ले जाना है क्या?’
‘साथ बांधकर ले जाने को कहीं कुछ छोड़ते भी हो, पर इतना तो सोचो दो-दो लड़कियों की शादी करनी है। सब दूसरों पर खर्च कर डालते हो, अपनी भी सोची है’
‘दूसरों की मदद करो, अपनी मदद भगवान करेगा।’
‘इसीलिए दूसरों की लड़कियों की शादी की इतनी चिन्ता है कि अपनी बेटियों को भुला ही बैठे हैं। कौन विश्वास करेगा चचेरे भाई की लड़की की शादी का पूरा खर्च तुमने उठाया है? देख लेना, हमारे वक्त पर कोई काम नहीं आएगा।’
‘जो सबकी रक्षा करता है, वह विधाता तो अपने हिसाब में सब रखेगा शांति। अपने नाम को सार्थक करो और शांति रखो, देवि।’