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मेरी पत्नी, शालू। वो मेरी जान है। शादी के बाद से ही मैं उस पर जो फिदा हुआ, सो आज तक हूँ।
‘देखे तो देखता रह जाए !’ जैसी सुंदर और सेक्स में सदा ही नए उत्साही प्रयोग करना एंजॉय करती है। मेरी रंगीन फंतासियों को सच करने में मेरा साथ देती है। कभी मैंने उसे पार्क में पेड़ के पीछे उसके वक्ष अनावृत करके उसके स्तन चूसे, कभी उसके हाथ-पांव बांधकर उसके साथ सेक्स किया। एक बार तो झील में नहाते हुए मैंने पानी के अंदर ही उसके सारे कपड़े उतार कर ले लिए और उन्हें किनारे पर ही फैलाकर रख दिया था कि कोई देखे तो समझ ले कि पानी के भीतर वह नंगी है।
मैं सूखे कपड़े थोड़ी दूर पर पेड़ की एक डाल में टांगकर चला गया था। बड़ी मुश्किल से वह पानी से निकलकर उस पेड़ तक जा पाई थी। मैं छिपकर पानी से प्रकट होते उसके नग्न सौंदर्य का पान करता रहा।
उस वक्त मुझे जो उसने मुझे जो डांट पिलाई सो पिलाई, रात में भरपूर बदला लिया।
दिल्ली से चंडीगढ़ हाइवे पर कार में अपनी ड्राइविंग सीट के बगल में बिठाकर उसके ब्लाउज के पल्ले खोल दिए थे और उसकी तरफ की खिड़की खोल दी थी। उसके ब्लाउज के पल्ले उड़ उड़कर लहरा रहे थे और ठंडी हवा से उसके स्तन और चूचुक कड़क हो गए थे। उस दिन सड़क पर कितनी ही दुर्घटनाएँ होते होते बचीं।
पहला बच्चा होने के बाद भी बिस्तर पर हमारे जोशोखरोश में कोई कमी नहीं हुई, लगता था ‘वन इज फन’। हमारी दीवानगी देखकर दूसरे ईर्ष्या करते तो हम अपने को खुशनसीब समझते। लेकिन दूसरा बच्चा होने के बाद लगने लगा था कि अब पहलेवाला रस और रोमांच नहीं रहा। दस साल के वैवाहिक जीवन ने उसमें एकरसता घोलनी शुरू कर दी थी और यही हम दोनों को बेहद अखर रहा था।
पति मैं हूँ, इसलिए कुछ उपाय करने की जिम्मेदारी मेरी थी। किसी दूसरे दम्पति से अदला-बदली की इच्छा मन में थी, मगर किसी दूसरी औरत के सहारे अपनी पत्नी में उत्तेजना ढूंढना सही नहीं लग रहा था। मुझे अपनी पत्नी में ही वो खूबी चाहिए थी। मैं बराबर सोच रहा था कि ऐसा क्या करूँ कि शादी के समय वाला चटखारा फिर से वापस आ जाए, शालू में फिर से वही हसीन, नमकीन, मस्ती का रंग फिर से भर जाए।
उसका एक पुराना शौक था, गुदने यानि टैटू का ! वह शादी के बाद ही चाहती रही थी कि शादी की याद में उसकी काया के किसी अति व्यक्तिगत जगह में एक गुदना हो पर मैं उसके गोरे बेदाग शरीर पर फिदा था। उस पर कितना भी अच्छा गुदना क्यों न हो मुझे धब्बा-सा ही लगता।
वह फिगर को लेकर वह बहुत संवेदनशील थी। प्रसव के बाद उसने मेरी मां की पारंपरिक घी में लिपटी बत्तीस जड़ी-बूटियों की दवाइयाँ खाने से इनकार कर डॉक्टर की सलाह के मुताबिक खीरे सलाद और प्रोटीन-प्रचुर दालें खाकर पेट पर चरबी की परत चढ़ने नहीं दी थी। दो प्रसवों के बाद भी उसका शरीर कसा और सुंदर था।
मैंने सोचा कि उसकी इसी इच्छा से जिंदगी में हरियाली लाई जाए। विवाह की अगली वर्षगांठ पर, जो जल्दी ही आने वाली थी…
‘देखे तो देखता रह जाए !’ जैसी सुंदर और सेक्स में सदा ही नए उत्साही प्रयोग करना एंजॉय करती है। मेरी रंगीन फंतासियों को सच करने में मेरा साथ देती है। कभी मैंने उसे पार्क में पेड़ के पीछे उसके वक्ष अनावृत करके उसके स्तन चूसे, कभी उसके हाथ-पांव बांधकर उसके साथ सेक्स किया। एक बार तो झील में नहाते हुए मैंने पानी के अंदर ही उसके सारे कपड़े उतार कर ले लिए और उन्हें किनारे पर ही फैलाकर रख दिया था कि कोई देखे तो समझ ले कि पानी के भीतर वह नंगी है।
मैं सूखे कपड़े थोड़ी दूर पर पेड़ की एक डाल में टांगकर चला गया था। बड़ी मुश्किल से वह पानी से निकलकर उस पेड़ तक जा पाई थी। मैं छिपकर पानी से प्रकट होते उसके नग्न सौंदर्य का पान करता रहा।
उस वक्त मुझे जो उसने मुझे जो डांट पिलाई सो पिलाई, रात में भरपूर बदला लिया।
दिल्ली से चंडीगढ़ हाइवे पर कार में अपनी ड्राइविंग सीट के बगल में बिठाकर उसके ब्लाउज के पल्ले खोल दिए थे और उसकी तरफ की खिड़की खोल दी थी। उसके ब्लाउज के पल्ले उड़ उड़कर लहरा रहे थे और ठंडी हवा से उसके स्तन और चूचुक कड़क हो गए थे। उस दिन सड़क पर कितनी ही दुर्घटनाएँ होते होते बचीं।
पहला बच्चा होने के बाद भी बिस्तर पर हमारे जोशोखरोश में कोई कमी नहीं हुई, लगता था ‘वन इज फन’। हमारी दीवानगी देखकर दूसरे ईर्ष्या करते तो हम अपने को खुशनसीब समझते। लेकिन दूसरा बच्चा होने के बाद लगने लगा था कि अब पहलेवाला रस और रोमांच नहीं रहा। दस साल के वैवाहिक जीवन ने उसमें एकरसता घोलनी शुरू कर दी थी और यही हम दोनों को बेहद अखर रहा था।
पति मैं हूँ, इसलिए कुछ उपाय करने की जिम्मेदारी मेरी थी। किसी दूसरे दम्पति से अदला-बदली की इच्छा मन में थी, मगर किसी दूसरी औरत के सहारे अपनी पत्नी में उत्तेजना ढूंढना सही नहीं लग रहा था। मुझे अपनी पत्नी में ही वो खूबी चाहिए थी। मैं बराबर सोच रहा था कि ऐसा क्या करूँ कि शादी के समय वाला चटखारा फिर से वापस आ जाए, शालू में फिर से वही हसीन, नमकीन, मस्ती का रंग फिर से भर जाए।
उसका एक पुराना शौक था, गुदने यानि टैटू का ! वह शादी के बाद ही चाहती रही थी कि शादी की याद में उसकी काया के किसी अति व्यक्तिगत जगह में एक गुदना हो पर मैं उसके गोरे बेदाग शरीर पर फिदा था। उस पर कितना भी अच्छा गुदना क्यों न हो मुझे धब्बा-सा ही लगता।
वह फिगर को लेकर वह बहुत संवेदनशील थी। प्रसव के बाद उसने मेरी मां की पारंपरिक घी में लिपटी बत्तीस जड़ी-बूटियों की दवाइयाँ खाने से इनकार कर डॉक्टर की सलाह के मुताबिक खीरे सलाद और प्रोटीन-प्रचुर दालें खाकर पेट पर चरबी की परत चढ़ने नहीं दी थी। दो प्रसवों के बाद भी उसका शरीर कसा और सुंदर था।
मैंने सोचा कि उसकी इसी इच्छा से जिंदगी में हरियाली लाई जाए। विवाह की अगली वर्षगांठ पर, जो जल्दी ही आने वाली थी…