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विनय और मारियानो दोनो ही उस चर्च के फादर के पास थे और सारी बात बता चुके थे।
"फादर आप समझ रहे हैं न ये कितना गंभीर मसला है? वो लड़की कई जानें ले चुकी है"
,
फादर, विनय की बातों से सहमत हो गए और उसे उसी के शहर के एक फादर की जानकारी दी जो वक्त आने पर उनकी मदद करते। वो और उनके सहयोगी दोनों ही हाफ डीमन्स के बारे में अच्छी तरह जानते थे।
विनय अब वापस लौट रहा था। उसे तसल्ली थी कि उसे कोई रास्ता तो मिला। अब बस ग्रहण का इंतज़ार करना था। उसने अपना ये आइडीया दिया को बताया...
"क..क्या? अच्छा..." वो फंसे कंठ से बोली। विनय को थोड़ा अजीब लगा।
"दिया! तुम खुश नहीं हो? अब उससे हमारा पीछा छूट जाएगा" वो दिया को एक टक देख रहा था।
"हां..हां..पर वो तो..गायब है न..पता नहीं कहां गई.." दिया जल्दी से बोली। विनय परेशान हो गया। वो सही बोल रही थी। जेनिफ़र के फ्यूनरल वाले दिन के बाद से लिलियाना गायब थी। ऐसा तो नहीं कि उसे, उन लोगों के इरादे की भनक लग गई थी! और वो बस ग्रहण तक का इंतज़ार कर रही थी!
"ग्रहण तक उसे विनय से दूर रखना होगा...उसके बाद ही बात करूंगी विनय से.." दिया मन ही मन सोच रही थी।
डेढ़ महीने कब बीत गए पता ही न चला। लिलियाना शांत थी। शायद दिया का प्रयास काम आया था।
"क्या??? ये क्या बोल रहीं हैं आप?" विनय हैरानी से बोला। वो अपने आफिस में था और उसके सामने दिया की मम्मी बैठीं थीं।
"सही बोल रही हूं विनय" वो हैरानी से बोली "पिछले बीस दिनों में कल आठवीं बार मैंने घर के बाहर से खाने के खाली बर्तन उठाए..और एक बार तो मैंने देखा दिया चुपके से खाली बर्तन अंदर ला रही थी..मतलब बाहर रखती भी वही थी। पर क्यूं? तुम तो ,
उसका नेचर जानते हो न..सामने से मुसीबत मोल लेती है.."
विनय का दिमाग अब सांय सायं कर रहा था। उसे याद आया कि जब ग्रहण वाली बात उसने दिया को बताई थी तो उसके चेहरे पर कैसा भाव था! एक पुलिसीया होने के नाते उसे इन सब बातों का अच्छा तजुर्बा था।
तो क्या दिया ही लिलियाना को बचा रही थी! इन दिनों वो उससे मिलने से भी कतरा रही थी!
क्या लिलियाना के अब तक सामने न आने की वजह दिया थी! विनय खुद भी बहुत परेशान था। क्योंकि परसों सुबह ही सूर्य ग्रहण था। अगर तब तक भी वो सामने नहीं आई तो?? ये मौका तो हाथ से गया। उसने अपने आदमी लगा रखे थे। पर किसी से अब तक लिलियाना की कोई खबर नहीं मिली थी।
रात के नौ बज रहे थे। दिया एक शाल ओढ़े अपनी बाल्कनी में बैठी थी। अचानक थोड़ी देर बाद उसे सोसाईटी के एक लैंप पोस्ट के पीछे कुछ हिलता हुआ महसूस हुआ। वो गौर से देखने लगी।
वो लिलियाना ही थी!!
वो उसी का इंतज़ार कर रही थी। बस एक दिन और फिर वो धीरे से विनय को सब समझा देगी। ये ग्रहण का खतरा तो टले। उसने सामने पड़ी एक टेबल के नीचे से एक टिफ़िन उठाया जो उसने लिलियाना के लिये पहले ही तैयार कर रखा था। वो बाहर जाने के लिये पलटी और चिहुंक कर खड़ी रह गई।
सामने विनय खड़ा था। उसने पहले दिया को फिर उसके टिफिन वाले हाथ को देखा। वो शांत दिख रहा था पर दिया को उसका गुस्सा साफ महसूस हो रहा था।
"कहां है वो?" वो थरथराती आवाज़ में पूछ।
"क..क्या..कौन?" दिया हड़बड़ा गई
विनय ने आगे बढ़कर मजबूती से उसका टिफिन वाला हाथ पकड़ लिया।
,
"ये!!" वो उसका हिलाते हुए बोला। दिया कसमसाने लगी
"छोड़ो मेरा हाथ..विनय! क्या कर...
"शटअप!!!" विनय इतनी जोर से चिल्लाया कि दिया उसका मुंह देखने लगी। उसे पहली बार शिद्दत से अहसास हो रहा था कि उसका मंगेतर एक पुलीसिया था।
"मैं पागलों की तरह उसे हर जगह ढूंढ रहा हूं और तुम मेरे साथ चूहे बिल्ली का खेल खेल रही थी!! तुम जानती थी न कि वो कहां है? तुम्हें अंदाजा भी है कि हमारा सामना किस चीज से है...वो कितनी खतरनाक है..?"
"मैं तुमसे बात करने ही वाली थी..
उसकी बात पूरी होने से पहले ही विनय ने उसके हाथ से टिफिन छीन कर फर्श पर पटक दिया..
"कब??? मेरी मौत के बाद!!!" वो चिल्लाया। "शक तो मुझे उसी दिन हो गया था..चौकिदार तो एक बहाना था। तुमने मुझे उसे शूट करने से रोका था! क्यों??"
विनय दिया पर चिल्ला रहा था और लिलियाना दूर से ये सब देख रही थी!!!!
"विनय मेरी बात सुनो..हम गलत समझ रहे थे..वो..
"कुछ नहीं सुनना मुझे" विनय जहरबुझी आवाज में बोला "अब मैं खुद ढूंढ लूंगा उसे..पाताल से भी खोद निकालूंगा..
वो फर्श को रौंदता सा चला गया।
वो उसे पिछले तीन सालों से जानती थी। दोनो रिलेशनशिप में भी थे..सगाई हो चुकी थी पर कभी उनके बीच मामूली सी भी बहस नहीं हुई थी। पर आज दिया को महसूस हो रहा था कि उनके बीच..कहीं कुछ तड़क सा गया था...
,
दिया अपनी आंखें पोंछ रही थी। एन वक्त पर सब गड़बड़ हो गई। फिर जैसे उसे कुछ याद आया...लिलियाना!!
वो पलटी..
लिलियाना भयावह रूप से किसी जानवर की तरह एक लैंपपोस्ट के उपर बैठी थी। शायद और करीब से सुनने के लिये पास आ गई थी। उसके बाल हवा में लहरा रहे थे और आंखे काली हो चुकीं थीं जिनमें एक बार फिर से मौत नाच रही थी..
दिया समझ गई थी.. ये गुस्सा उसके लिये नहीं बल्कि विनय के लिये था..
"फादर आप समझ रहे हैं न ये कितना गंभीर मसला है? वो लड़की कई जानें ले चुकी है"
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फादर, विनय की बातों से सहमत हो गए और उसे उसी के शहर के एक फादर की जानकारी दी जो वक्त आने पर उनकी मदद करते। वो और उनके सहयोगी दोनों ही हाफ डीमन्स के बारे में अच्छी तरह जानते थे।
विनय अब वापस लौट रहा था। उसे तसल्ली थी कि उसे कोई रास्ता तो मिला। अब बस ग्रहण का इंतज़ार करना था। उसने अपना ये आइडीया दिया को बताया...
"क..क्या? अच्छा..." वो फंसे कंठ से बोली। विनय को थोड़ा अजीब लगा।
"दिया! तुम खुश नहीं हो? अब उससे हमारा पीछा छूट जाएगा" वो दिया को एक टक देख रहा था।
"हां..हां..पर वो तो..गायब है न..पता नहीं कहां गई.." दिया जल्दी से बोली। विनय परेशान हो गया। वो सही बोल रही थी। जेनिफ़र के फ्यूनरल वाले दिन के बाद से लिलियाना गायब थी। ऐसा तो नहीं कि उसे, उन लोगों के इरादे की भनक लग गई थी! और वो बस ग्रहण तक का इंतज़ार कर रही थी!
"ग्रहण तक उसे विनय से दूर रखना होगा...उसके बाद ही बात करूंगी विनय से.." दिया मन ही मन सोच रही थी।
डेढ़ महीने कब बीत गए पता ही न चला। लिलियाना शांत थी। शायद दिया का प्रयास काम आया था।
"क्या??? ये क्या बोल रहीं हैं आप?" विनय हैरानी से बोला। वो अपने आफिस में था और उसके सामने दिया की मम्मी बैठीं थीं।
"सही बोल रही हूं विनय" वो हैरानी से बोली "पिछले बीस दिनों में कल आठवीं बार मैंने घर के बाहर से खाने के खाली बर्तन उठाए..और एक बार तो मैंने देखा दिया चुपके से खाली बर्तन अंदर ला रही थी..मतलब बाहर रखती भी वही थी। पर क्यूं? तुम तो ,
उसका नेचर जानते हो न..सामने से मुसीबत मोल लेती है.."
विनय का दिमाग अब सांय सायं कर रहा था। उसे याद आया कि जब ग्रहण वाली बात उसने दिया को बताई थी तो उसके चेहरे पर कैसा भाव था! एक पुलिसीया होने के नाते उसे इन सब बातों का अच्छा तजुर्बा था।
तो क्या दिया ही लिलियाना को बचा रही थी! इन दिनों वो उससे मिलने से भी कतरा रही थी!
क्या लिलियाना के अब तक सामने न आने की वजह दिया थी! विनय खुद भी बहुत परेशान था। क्योंकि परसों सुबह ही सूर्य ग्रहण था। अगर तब तक भी वो सामने नहीं आई तो?? ये मौका तो हाथ से गया। उसने अपने आदमी लगा रखे थे। पर किसी से अब तक लिलियाना की कोई खबर नहीं मिली थी।
रात के नौ बज रहे थे। दिया एक शाल ओढ़े अपनी बाल्कनी में बैठी थी। अचानक थोड़ी देर बाद उसे सोसाईटी के एक लैंप पोस्ट के पीछे कुछ हिलता हुआ महसूस हुआ। वो गौर से देखने लगी।
वो लिलियाना ही थी!!
वो उसी का इंतज़ार कर रही थी। बस एक दिन और फिर वो धीरे से विनय को सब समझा देगी। ये ग्रहण का खतरा तो टले। उसने सामने पड़ी एक टेबल के नीचे से एक टिफ़िन उठाया जो उसने लिलियाना के लिये पहले ही तैयार कर रखा था। वो बाहर जाने के लिये पलटी और चिहुंक कर खड़ी रह गई।
सामने विनय खड़ा था। उसने पहले दिया को फिर उसके टिफिन वाले हाथ को देखा। वो शांत दिख रहा था पर दिया को उसका गुस्सा साफ महसूस हो रहा था।
"कहां है वो?" वो थरथराती आवाज़ में पूछ।
"क..क्या..कौन?" दिया हड़बड़ा गई
विनय ने आगे बढ़कर मजबूती से उसका टिफिन वाला हाथ पकड़ लिया।
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"ये!!" वो उसका हिलाते हुए बोला। दिया कसमसाने लगी
"छोड़ो मेरा हाथ..विनय! क्या कर...
"शटअप!!!" विनय इतनी जोर से चिल्लाया कि दिया उसका मुंह देखने लगी। उसे पहली बार शिद्दत से अहसास हो रहा था कि उसका मंगेतर एक पुलीसिया था।
"मैं पागलों की तरह उसे हर जगह ढूंढ रहा हूं और तुम मेरे साथ चूहे बिल्ली का खेल खेल रही थी!! तुम जानती थी न कि वो कहां है? तुम्हें अंदाजा भी है कि हमारा सामना किस चीज से है...वो कितनी खतरनाक है..?"
"मैं तुमसे बात करने ही वाली थी..
उसकी बात पूरी होने से पहले ही विनय ने उसके हाथ से टिफिन छीन कर फर्श पर पटक दिया..
"कब??? मेरी मौत के बाद!!!" वो चिल्लाया। "शक तो मुझे उसी दिन हो गया था..चौकिदार तो एक बहाना था। तुमने मुझे उसे शूट करने से रोका था! क्यों??"
विनय दिया पर चिल्ला रहा था और लिलियाना दूर से ये सब देख रही थी!!!!
"विनय मेरी बात सुनो..हम गलत समझ रहे थे..वो..
"कुछ नहीं सुनना मुझे" विनय जहरबुझी आवाज में बोला "अब मैं खुद ढूंढ लूंगा उसे..पाताल से भी खोद निकालूंगा..
वो फर्श को रौंदता सा चला गया।
वो उसे पिछले तीन सालों से जानती थी। दोनो रिलेशनशिप में भी थे..सगाई हो चुकी थी पर कभी उनके बीच मामूली सी भी बहस नहीं हुई थी। पर आज दिया को महसूस हो रहा था कि उनके बीच..कहीं कुछ तड़क सा गया था...
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दिया अपनी आंखें पोंछ रही थी। एन वक्त पर सब गड़बड़ हो गई। फिर जैसे उसे कुछ याद आया...लिलियाना!!
वो पलटी..
लिलियाना भयावह रूप से किसी जानवर की तरह एक लैंपपोस्ट के उपर बैठी थी। शायद और करीब से सुनने के लिये पास आ गई थी। उसके बाल हवा में लहरा रहे थे और आंखे काली हो चुकीं थीं जिनमें एक बार फिर से मौत नाच रही थी..
दिया समझ गई थी.. ये गुस्सा उसके लिये नहीं बल्कि विनय के लिये था..