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तभी तुली बाबू की नज़र कमरे के कोने मे रखी कहानिओ की किताबों पे पड़ी तो हाथ बढ़ा कर एक किताब को उठा लिया और और उस किताब पर मोटे अच्च्छरों मे लिखा था : 'हरामी ससुर जी'. मुसम्मि के सामने ही किताबों के पन्नो को अलेट पलट कर देखने लगे. इतना देखकर मुसम्मि अपनी नज़रें दूसरी ओर फेर ली और बोली "बाबू जी... मैं इतना झगड़ा नही करने वाली थी .... मा बार बार मुझे ही कोसती है और गाली देती है....."
इतना सुनकर तुली बाबू बिना कुच्छ बोले सामने रखे मिठाई को खाते हुए गिलास के पानी को गटक गटक कर पी गये. दूसरे ही पल अपने कुर्ते की जेब से एक पुराने मॉडल का चश्मा निकाला और अपनी आँखों पर लगाते हुए उस किताब के अंदर की कहानिओ को देखते हुए बोले " अब तुम इतना टेन्षन मत ले.... जो हुआ उसे भूल जाओ... " इतना बोलकर तुली बाबू एक कहानी के पेज को खोल कर देख रहे थे जिस पर एक रेखा चित्रा बना था जिसमे एक दुल्हन की बुर मे एक अधेड़ आदमी का मोटा लंड फँसा हुआ था. बगल मे खड़ी मुसम्मि भी ये सब देखते हुए आगे बोली "बाबू जी... आख़िर उसे इतनी गंदी गाली देनी चाहिए.... कह रही थी कि बेलन कर देगी..."
तुली बाबू अपनी नज़रें किताब के पन्नो पर चिपकाए हुए बोले "... जाने दे .. गुस्से मे बोल दी होगी .... "
मुसम्मि: "बाबू जी... गुस्से मे कोई अपनी बेटी को ऐसे नही जॅलील करता है... मेरे गाँव मे कई ऐसी लड़कियाँ हैं जिनके मा बाप उन लड़कियो को रंगे हाथ पकड़ लेते हैं ... लेकिन कुच्छ नही बोलते.. बस थोड़ा सा डाँट समझा कर छोड़ देते हैं..."
तुली बाबू एक पल के लिए अपनी नज़रें किताब से हटा लिए और मुसम्मि के चेहरे को देखते हुए पुच्छे : "कैसे पकड़ लिए.... क्या करते हुए.... "
मुसम्मि एक पल चुप रही फिर बोली "... व वो.... वो सब करते हुए...."
तुली बाबू: ".. क्या सब.... बताओगि तभी तो.. क्या सब.."
मुसम्मि: "मर्दों के साथ काम करते हुए..."
तुली बाबू मुसम्मि को घूरते हुए " कौन सा काम... ?"
मुसम्मि: " गंदा काम... मज़ा लेते हुए नंगे पकड़ जाती हैं सब .. और उनके मा बाप कुच्छ नही बोलते.... "
तुली बाबू: "तुम भी मज़ा लेती हो क्या... "
मुसम्मि : "नही बाबू जी..." इतना बोलकर मुसम्मि जैसे ही कमरे से बाहर जाने लगी तुली बाबू ने आवाज़ दी : "... अरी. सुनो..."
मुसम्मि एक पल के लिए ठिठक गई. तब तुली बाबू बोले "... अपना नाम तो बताओ... क्या नाम है...?"
मुसम्मि: "मुसम्मि .... बाबू जी... "
तुली बाबू: "तो मुसम्मि सुनो... यहाँ आओ... "
मुसम्मि जैसे ही करीब पहुँची तुली बाबू पुच्छे: ".... तुम बताई नही... "
तुली बाबू: "यही कि (अपने हाथ की उंगलिओ को बुर की तरह बनाते हुए ) .... इसका मज़ा लेती हो कि नही...."
इतना सुनकर तुली बाबू बिना कुच्छ बोले सामने रखे मिठाई को खाते हुए गिलास के पानी को गटक गटक कर पी गये. दूसरे ही पल अपने कुर्ते की जेब से एक पुराने मॉडल का चश्मा निकाला और अपनी आँखों पर लगाते हुए उस किताब के अंदर की कहानिओ को देखते हुए बोले " अब तुम इतना टेन्षन मत ले.... जो हुआ उसे भूल जाओ... " इतना बोलकर तुली बाबू एक कहानी के पेज को खोल कर देख रहे थे जिस पर एक रेखा चित्रा बना था जिसमे एक दुल्हन की बुर मे एक अधेड़ आदमी का मोटा लंड फँसा हुआ था. बगल मे खड़ी मुसम्मि भी ये सब देखते हुए आगे बोली "बाबू जी... आख़िर उसे इतनी गंदी गाली देनी चाहिए.... कह रही थी कि बेलन कर देगी..."
तुली बाबू अपनी नज़रें किताब के पन्नो पर चिपकाए हुए बोले "... जाने दे .. गुस्से मे बोल दी होगी .... "
मुसम्मि: "बाबू जी... गुस्से मे कोई अपनी बेटी को ऐसे नही जॅलील करता है... मेरे गाँव मे कई ऐसी लड़कियाँ हैं जिनके मा बाप उन लड़कियो को रंगे हाथ पकड़ लेते हैं ... लेकिन कुच्छ नही बोलते.. बस थोड़ा सा डाँट समझा कर छोड़ देते हैं..."
तुली बाबू एक पल के लिए अपनी नज़रें किताब से हटा लिए और मुसम्मि के चेहरे को देखते हुए पुच्छे : "कैसे पकड़ लिए.... क्या करते हुए.... "
मुसम्मि एक पल चुप रही फिर बोली "... व वो.... वो सब करते हुए...."
तुली बाबू: ".. क्या सब.... बताओगि तभी तो.. क्या सब.."
मुसम्मि: "मर्दों के साथ काम करते हुए..."
तुली बाबू मुसम्मि को घूरते हुए " कौन सा काम... ?"
मुसम्मि: " गंदा काम... मज़ा लेते हुए नंगे पकड़ जाती हैं सब .. और उनके मा बाप कुच्छ नही बोलते.... "
तुली बाबू: "तुम भी मज़ा लेती हो क्या... "
मुसम्मि : "नही बाबू जी..." इतना बोलकर मुसम्मि जैसे ही कमरे से बाहर जाने लगी तुली बाबू ने आवाज़ दी : "... अरी. सुनो..."
मुसम्मि एक पल के लिए ठिठक गई. तब तुली बाबू बोले "... अपना नाम तो बताओ... क्या नाम है...?"
मुसम्मि: "मुसम्मि .... बाबू जी... "
तुली बाबू: "तो मुसम्मि सुनो... यहाँ आओ... "
मुसम्मि जैसे ही करीब पहुँची तुली बाबू पुच्छे: ".... तुम बताई नही... "
तुली बाबू: "यही कि (अपने हाथ की उंगलिओ को बुर की तरह बनाते हुए ) .... इसका मज़ा लेती हो कि नही...."