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Guest
फिर पंडित जी ने धन्नो से बोले...........
" यदि इसकी मा तुम्हारी बदनामी करती है तो उसे मना कर दो एक दिन.."
धन्नो इस सलाह को ना मानते हुए बोली ...........
"मुझे किसी की परवाह नही है.....जिसको जो कहना है कहे ....बस कोई मुँह से कह ही सकता है....इससे ज़्यादे क्या कर सकता है....जब उसकी बुर मे लंड नही मिलता है तो दूसरे औरतों से तो जलेगी ही...."
इतना कह कर धन्नो हँसने लगी और सावित्री की ओर देखी . धन्नो की ऐसी बात को सुनकर पंडित जी भी हंस पड़े और बोले ..........."तुम ठीक कहती हो...अरे थोड़ा सावित्री को भी ये सब समझा दिया करो...ये भी बहुत डरपोक किस्म की है..." धन्नो सावित्री के तरफ देखते बोली ...........
"मेरे साथ रहेगी तो वैसे ही बहुत तेज़ हो जाएगी...उपर से भगवान ने इसका शरीर बहुत गजब का दिया है...मैं तो इसे गाओं की सबसे बड़ी चुदैल निकालूंगी..."
इतना कह कर धन्नो ने लगभग ज़ोर से हंसते हुए बगल मे बैठी हुई सावित्री के कंधे पर एक हाथ रख दी और फिर उसकी ओर देखते हुए पुच्छी...........
..........."क्यों ठीक कहा ना...?"
सावित्री एक बनावटी गुस्से से मुस्कुराइ और धन्नो के हाथ को अपने कंधे से झटकारेटे हुए बोली...........
"मुझसे ऐसी बात मत किया करो...गंदी कहीं की...!"
इतना सुन कर पंडित जी और धन्नो दोनो ही ज़ोर से हंस पड़े और दोनो के हँसने के कारण सावित्री अपने को रोक नही सकी और अपने मुँह को दोनो हाथों मे च्छूपा कर हँसने लगी.
तीनो का हँसना जैसे ही शांत हुआ धन्नो पंडित जी से बोली ...........
"अब मैं घर जाना चाहती हूँ लेकिन सावित्री को भी साथ ले जाउन्गी..."
सावित्री धन्नो की ऐसी बात सुनकर चौंक सी गयी और पंडित जी की ओर देखने लगी. फिर पंडित जी ने सावित्री से कहा
"....जाओ इसके साथ...लेकिन कल दुकान के समय आ जाना"
इतना सुन कर धन्नो ने पंडित जी से बोली...........
"कल ये दुकान पर कैसे आएगी .. कल तो इसे मैं अपने साथ ले जाउन्गि जहाँ अपनी लड़की को लड़के वालों को दीखानी है...अब परसों ही आएगी आपके दुकान पर.."
पंडित जी फिर बोले
"ठीक है...ले जाओ मैं कहाँ रोक रहा..."
फिर कुच्छ मज़ाक के मूड मे बोले
"....लेकिन कहीं इसकी मा दुकान पे आ गयी तो मैं उसे बता दूँगा की धन्नो अपने साथ ले गयी है.....चुदैल बनाने के लिए.."
फिर तीनो ज़ोर से हंस पड़े. लेकिन इस बार सावित्री दोनो की ओर देख कर हंस रही थी. सावित्री के इस बदले रूप को देखकर दोनो ही मस्त हो गये.
फिर धन्नो ने सावित्री से हंस कर बोली ...........
"देख तुझे कैसे डरा रहे हैं.."
सावित्री पंडित जी के नज़रों मे देखते हुए धीरे से बोली ...........
"मैं नही डरने वाली "
पंडित जी सावित्री के मुँह से इस तरह की बात सुन कर कुच्छ चिढ़ाने के अंदाज मे बोले...........
"तो कल जा धन्नो के साथ ...और मैं जा के तेरी मा से बोल दूँगा की आज दुकान पर नही आई है बल्कि धन्नो के साथ कहीं गयी है...मरवाने ...!"
फिर तीनो ज़ोर से हंस पड़े.
हँसी रुकते ही धन्नो उठी और सावित्री को भी उठने का इशारा की तब सावित्री भी खड़ी हो गई. अभी शाम होने मे कई घंटे थे फिर दोनो दुकान से निकले और घर की ओर चल दिए.
रश्ते मे धन्नो ने सावित्री को धीरे से फुसलाते हुए बोली ...........
"कल जब दुकान के लिए घर से निकलना तब मैं तुमसे रश्ते मे ही मिल जाउन्गि और फिर वहीं से तुम मेरे साथ सगुण चाचा के घर चला जाएगा...समझी..?"
इतना सुन कर सावित्री ने जबाव मे बोली...........
"ठीक है.
सावित्री की रज़ामंदी पा कर धन्नो काफ़ी खुश हो गयी. फिर जैसे ही सुनसान रास्ता सुरू हुआ की सावित्री का बदन मस्ताने लगा. धन्नो ने सुनसान रश्ते के किनारे पेशाब करने बैठ गयी. धन्नो की चुदी हुई बुर ठीक सावित्री के सामने ही थी. सावित्री की नज़रें धन्नो की चुदी हुई बुर पर टिक से गयी.
धन्नो ने सावित्री से बोली ...........
"तू भी मूत ले.."
सावित्री को भी कुच्छ पेशाब महसूस हो रही थी. इतना सुनते ही सावित्री ने अपने सलवार और चड्धि सरका कर धन्नो के सामने ही बैठ गयी और मुतने लगी. धन्नो ने सावित्री के नज़रों मे बेशर्मी की झलक पाते ही खुश हो गयी थी. दोनो पेशाब कर के उठी तो धन्नो ने सावित्री के बुर के मुँह पर कुच्छ गीलापन देख कर धीरे से बोली
"तेरी तो पनिया गयी है..अच्छा चल खंडहर के पास."
इतना सुनते ही सावित्री ने अपने चड्धि को पहन ली और सलवार का नाडा बाँधते हुए धन्नो के पीछे पीछे चलाने लगी. उसे समझ मे नही आया की खंडहर के पास धन्नो चाची क्या करेगी. उसका कलेजा धक धक कर रहा था. धोड़ी देर मे धन्डहर भी आ गया. धन्नो ने खंडहर के पास खड़ी हो कर चारो ओर नज़र दौड़ाई तो कोई नज़र नही आया.
फिर बोली ...........
"चल कही कोई दीखाई नही दे रहा है...मेरे पीछे पीछे आ ...तेरी भी पानी निकाल दूं..तू भी बहुत गरम हो गयी है..."
सावित्री भी धन्नो के पीछे पीछे चलने लगी और पुराने खंडहर को काफ़ी ध्यान से देखने लगी. धन्नो सावित्री को खंडहर के काफ़ी अंदर वाले हिस्से मे ले गयी जहाँ किसी की नज़र नही पड़ सकती थी. सावित्री को कुच्छ डर भी लग रहा था. तभी धन्नो ने अपने झोले को खंडहर के दीवार के किनारे रखती हुई धीरे से फुसफुसा ..........
"यहाँ कोई आ नही सकता..यह बहुत पुराना खंडहर है ..इसमे तो लोग आने से भी डरते हैं..."
इतना सुनकर सावित्री ने खंडहर के पुराने और छ्होटे छ्होटे कमरों की गिरी हुई दीवारों को ध्यान से देख रही थी की धन्नो ने सावित्री के सलवार के नाडे को खोल दिया. सावित्री की सलवार नीचे सरक गई. धन्नो ने जैसे ही अपनी हाथ सावित्री की चड्धि के उपर लगाई थी की खंडहर के अंदर से किसी औरत की हँसी सुनाई पड़ी. आवाज़ खंडहर के अंदर ही बगल वाले हिस्से से आ रही थी. सावित्री तुरंत अपने सलवार को उपर करके नाडे को बाँधने लगी तो धन्नो ने लगभग डाँटते हुए धीरे से फुसफुसा ...........
"तू दर मत..इस बड़े और पुरानी खंडहर के अंदर यही सब होता है...अयाश किस्म के लोग औरतों को ला कर यहाँ खूब चोदते हैं...अच्च्छा रुक देखती हूँ कौन क्या कर रहा है.."
क्रमशः...........
" यदि इसकी मा तुम्हारी बदनामी करती है तो उसे मना कर दो एक दिन.."
धन्नो इस सलाह को ना मानते हुए बोली ...........
"मुझे किसी की परवाह नही है.....जिसको जो कहना है कहे ....बस कोई मुँह से कह ही सकता है....इससे ज़्यादे क्या कर सकता है....जब उसकी बुर मे लंड नही मिलता है तो दूसरे औरतों से तो जलेगी ही...."
इतना कह कर धन्नो हँसने लगी और सावित्री की ओर देखी . धन्नो की ऐसी बात को सुनकर पंडित जी भी हंस पड़े और बोले ..........."तुम ठीक कहती हो...अरे थोड़ा सावित्री को भी ये सब समझा दिया करो...ये भी बहुत डरपोक किस्म की है..." धन्नो सावित्री के तरफ देखते बोली ...........
"मेरे साथ रहेगी तो वैसे ही बहुत तेज़ हो जाएगी...उपर से भगवान ने इसका शरीर बहुत गजब का दिया है...मैं तो इसे गाओं की सबसे बड़ी चुदैल निकालूंगी..."
इतना कह कर धन्नो ने लगभग ज़ोर से हंसते हुए बगल मे बैठी हुई सावित्री के कंधे पर एक हाथ रख दी और फिर उसकी ओर देखते हुए पुच्छी...........
..........."क्यों ठीक कहा ना...?"
सावित्री एक बनावटी गुस्से से मुस्कुराइ और धन्नो के हाथ को अपने कंधे से झटकारेटे हुए बोली...........
"मुझसे ऐसी बात मत किया करो...गंदी कहीं की...!"
इतना सुन कर पंडित जी और धन्नो दोनो ही ज़ोर से हंस पड़े और दोनो के हँसने के कारण सावित्री अपने को रोक नही सकी और अपने मुँह को दोनो हाथों मे च्छूपा कर हँसने लगी.
तीनो का हँसना जैसे ही शांत हुआ धन्नो पंडित जी से बोली ...........
"अब मैं घर जाना चाहती हूँ लेकिन सावित्री को भी साथ ले जाउन्गी..."
सावित्री धन्नो की ऐसी बात सुनकर चौंक सी गयी और पंडित जी की ओर देखने लगी. फिर पंडित जी ने सावित्री से कहा
"....जाओ इसके साथ...लेकिन कल दुकान के समय आ जाना"
इतना सुन कर धन्नो ने पंडित जी से बोली...........
"कल ये दुकान पर कैसे आएगी .. कल तो इसे मैं अपने साथ ले जाउन्गि जहाँ अपनी लड़की को लड़के वालों को दीखानी है...अब परसों ही आएगी आपके दुकान पर.."
पंडित जी फिर बोले
"ठीक है...ले जाओ मैं कहाँ रोक रहा..."
फिर कुच्छ मज़ाक के मूड मे बोले
"....लेकिन कहीं इसकी मा दुकान पे आ गयी तो मैं उसे बता दूँगा की धन्नो अपने साथ ले गयी है.....चुदैल बनाने के लिए.."
फिर तीनो ज़ोर से हंस पड़े. लेकिन इस बार सावित्री दोनो की ओर देख कर हंस रही थी. सावित्री के इस बदले रूप को देखकर दोनो ही मस्त हो गये.
फिर धन्नो ने सावित्री से हंस कर बोली ...........
"देख तुझे कैसे डरा रहे हैं.."
सावित्री पंडित जी के नज़रों मे देखते हुए धीरे से बोली ...........
"मैं नही डरने वाली "
पंडित जी सावित्री के मुँह से इस तरह की बात सुन कर कुच्छ चिढ़ाने के अंदाज मे बोले...........
"तो कल जा धन्नो के साथ ...और मैं जा के तेरी मा से बोल दूँगा की आज दुकान पर नही आई है बल्कि धन्नो के साथ कहीं गयी है...मरवाने ...!"
फिर तीनो ज़ोर से हंस पड़े.
हँसी रुकते ही धन्नो उठी और सावित्री को भी उठने का इशारा की तब सावित्री भी खड़ी हो गई. अभी शाम होने मे कई घंटे थे फिर दोनो दुकान से निकले और घर की ओर चल दिए.
रश्ते मे धन्नो ने सावित्री को धीरे से फुसलाते हुए बोली ...........
"कल जब दुकान के लिए घर से निकलना तब मैं तुमसे रश्ते मे ही मिल जाउन्गि और फिर वहीं से तुम मेरे साथ सगुण चाचा के घर चला जाएगा...समझी..?"
इतना सुन कर सावित्री ने जबाव मे बोली...........
"ठीक है.
सावित्री की रज़ामंदी पा कर धन्नो काफ़ी खुश हो गयी. फिर जैसे ही सुनसान रास्ता सुरू हुआ की सावित्री का बदन मस्ताने लगा. धन्नो ने सुनसान रश्ते के किनारे पेशाब करने बैठ गयी. धन्नो की चुदी हुई बुर ठीक सावित्री के सामने ही थी. सावित्री की नज़रें धन्नो की चुदी हुई बुर पर टिक से गयी.
धन्नो ने सावित्री से बोली ...........
"तू भी मूत ले.."
सावित्री को भी कुच्छ पेशाब महसूस हो रही थी. इतना सुनते ही सावित्री ने अपने सलवार और चड्धि सरका कर धन्नो के सामने ही बैठ गयी और मुतने लगी. धन्नो ने सावित्री के नज़रों मे बेशर्मी की झलक पाते ही खुश हो गयी थी. दोनो पेशाब कर के उठी तो धन्नो ने सावित्री के बुर के मुँह पर कुच्छ गीलापन देख कर धीरे से बोली
"तेरी तो पनिया गयी है..अच्छा चल खंडहर के पास."
इतना सुनते ही सावित्री ने अपने चड्धि को पहन ली और सलवार का नाडा बाँधते हुए धन्नो के पीछे पीछे चलाने लगी. उसे समझ मे नही आया की खंडहर के पास धन्नो चाची क्या करेगी. उसका कलेजा धक धक कर रहा था. धोड़ी देर मे धन्डहर भी आ गया. धन्नो ने खंडहर के पास खड़ी हो कर चारो ओर नज़र दौड़ाई तो कोई नज़र नही आया.
फिर बोली ...........
"चल कही कोई दीखाई नही दे रहा है...मेरे पीछे पीछे आ ...तेरी भी पानी निकाल दूं..तू भी बहुत गरम हो गयी है..."
सावित्री भी धन्नो के पीछे पीछे चलने लगी और पुराने खंडहर को काफ़ी ध्यान से देखने लगी. धन्नो सावित्री को खंडहर के काफ़ी अंदर वाले हिस्से मे ले गयी जहाँ किसी की नज़र नही पड़ सकती थी. सावित्री को कुच्छ डर भी लग रहा था. तभी धन्नो ने अपने झोले को खंडहर के दीवार के किनारे रखती हुई धीरे से फुसफुसा ..........
"यहाँ कोई आ नही सकता..यह बहुत पुराना खंडहर है ..इसमे तो लोग आने से भी डरते हैं..."
इतना सुनकर सावित्री ने खंडहर के पुराने और छ्होटे छ्होटे कमरों की गिरी हुई दीवारों को ध्यान से देख रही थी की धन्नो ने सावित्री के सलवार के नाडे को खोल दिया. सावित्री की सलवार नीचे सरक गई. धन्नो ने जैसे ही अपनी हाथ सावित्री की चड्धि के उपर लगाई थी की खंडहर के अंदर से किसी औरत की हँसी सुनाई पड़ी. आवाज़ खंडहर के अंदर ही बगल वाले हिस्से से आ रही थी. सावित्री तुरंत अपने सलवार को उपर करके नाडे को बाँधने लगी तो धन्नो ने लगभग डाँटते हुए धीरे से फुसफुसा ...........
"तू दर मत..इस बड़े और पुरानी खंडहर के अंदर यही सब होता है...अयाश किस्म के लोग औरतों को ला कर यहाँ खूब चोदते हैं...अच्च्छा रुक देखती हूँ कौन क्या कर रहा है.."
क्रमशः...........