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संघर्ष--36
गतान्क से आगे..........
-सावित्री अपनी मा के अंदर समाहित हो रही थी ऑर खुले पन को देख कर हैरान सी हो रही थी. अब उसे महसूस हो रहा था कि कुच्छ ही दिन पहले तक इज़्ज़त की बात करने वाली उसकी मा के स्वाभाव मे इतना बड़ा परिवर्तन कैसे हो गया. कहीं किसी से फँस जाने के वजह से तो नही. लेकिन सावित्री के मन मे एक बात तो एक दम से सॉफ हो चुकी थी और वह यह कि, उसकी मा किसी से फँस गयी है और शायद इसी वजह से किसी छिनार की तरह बातें कर रही थी.
दूसरे दिन वादे के मुताबिक सावित्री धन्नो के साथ जाने के लिए तैयार हो कर गाँव के बाहर आई. धन्नो उसका इंतज़ार कर रही थी. फिर धन्नो सावित्री को देख कर बोली "अरी सावित्री.....आज तो मैं जा नही पाउन्गि री....वो लड़के के बाप ने संदेशा भिज वाया था कि वो मेरी लड़की देखने दो-तीन हफ्ते बाद आएगा..." इतना सुनकर सावित्री बोली "हूँ ...तो ..मैं क्या करूँ चाची..दुकान पर जाउ...?" तब धन्नो बोली "ठीक है तू दुकान पर जा लेकिन जब लड़के का बाप मेरी बेटी को देखने के लिए सगुण चाचा के घर आएगा तो तू मेरे साथ चोरी से चलना...तेरी मा को खबर ना हो.." इतना कहते ही धन्नो गाँव के बाहर सुनसान जगह पर साड़ी उठा कर बैठ गयी और मूतने लगी. सावित्री कुच्छ सोच कर हामी भरते बोली "ठीक है चाची....मैं चलूंगी...." फिर धन्नो बैठे ही बैठे बोली "अरी हरज़ाई....जब तेरे को मौका लगा करे तो मेरे से भी मिल लिए करना...अपनी मा से चोरी चोरी.." फिर कुच्छ मुस्कुराते बोली "वो अपने गाँव का लड़का ...मन्नू.. ...तेरे को बहुत पूच्छ रहा था...." इतना कह कर धन्नो मूत कर खड़ी हुई और उसकी साड़ी कमर से नीचे नंगे चुतड और पैरों को ढक लीया. सावित्री ऐसा सुन कर कुच्छ नखड़े वाले अंदाज़ मे बोली "धत्त...अरे मुझसे ऐसी बात मत बोल...छी.." तब धन्नो धीरे से सावित्री की एक बाँह पकड़ कर हँसते हुए बोली "रीए रंडी...मन्नू का लॉडा एक दम से मूसल है रे पूरा का पूरा 22 साल का नया चोदु निकला है वो मन्नू...कितनी गाँव की बुद्धियाँ तक चुद गई ...और तू धत्त बोलती है..." इतना सुन कर सावित्री एक बार तो सनसना गई फिर बोली "चाची मेरे को दुकान पे जाना है .." तब धन्नो बोली "मैं जो पुच्छ रही हूँ वो तो भला बता " तब सावित्री बोली "क्या..?" "अरे मन्नू को लाइन मार ना.....री...सच मे बड़ा औज़ार वाला है.." इतना बोल कर धन्नो सावित्री का मुँह देखने लगी. एक दम खुले आम तरीके से बेबाक हो कर धन्नो के बात करने के अंदाज़ ने सावित्री को मानो झकझोर दिया था. वह अवाक रह गयी थी. फिर किसी अनाड़ी खिलाड़ी की तरह धीरे से बोली "मेरे को कुच्छ नही पता चाची ...मैं दुकान जा रही हूँ.."
तब धन्नो धीरे से कुच्छ फुसलाते अंदाज़ मे बोली "क्या दुकान पे जाओगी...चल आज का दिन मेरे साथ ही घूम कर बिता ले..." तब सावित्री कुच्छ सहम कर बोली "लेकिन वो मा जान गयी तो...नही मुझे जाने दो .." तब कुच्छ झिझक कर धन्नो बोली "अरी...वो रंडी क्या जानेगी....कोई अपने गाँव मे थोड़े ही घुमाने ले जाउन्गि ...अरे तेरे को ये गाँव के बगल वाले गाँव ले चलूंगी...वहाँ मेरी एक सहेली रहती है..गुलाबी...मेरी पुरानी सहेली.." आगे बोली "चल मिला दूं तेरे को उससे...बहुत ही अच्छी है रे.." अपनी सहेली की तारीफ करती हुई धन्नो ने मानो उसे अपने साथ घुमाने का इरादा बना ही लिया हो.
पूरे दिन धन्नो सावित्री को इधेर उधेर घुमाती रही और गाँव मे चोदा चोदि की कहानियाँ सुनाती रही. सावित्री को भी चोदा चोदि की बातें पसंद आने लगी थी. खूब चाव से सुनती रही. लेकिन जब सावित्री गुलाबी से मिली जो 44 साल के आस पास थी तो उसे भरोसा नही हुआ कि धन्नो की सहेली भी उसी की तरह खुली हुई थी. गुलाबी अपने घर अकेले ही थी और धन्नो से खूब गंदी गंदी बाते की. उसने सावित्री से भी अश्लील ढंग से मज़ाक किया तो सावित्री एकदम लज़ा गयी तब गुलाबी बोली "अरे मेरी रानी...शादी से पहले खूब लूट लो मर्दो का मज़ा ,,शादी के बाद तो भगवान ही मालिक है..पता नही कैसा ससुराल मिले...समझी..खूब चुदवा ..ये चुदवाने की उमर है...जी भर के चुद्वाओ.." और फिर सभी हंस पड़े.
………………………………
सावित्री अपनी मा की नज़र बचा कर धन्नो चाची से मिल लेती और कभी चोरी छिपे घूम भी लेती, और धन्नो चाची के मुँह से गाँव के लोगो की गंदी गंदी चोदा चोदि की कहानियाँ भी सुन लेती, जिसमे उसे बहुत मज़ा आता था.
गतान्क से आगे..........
-सावित्री अपनी मा के अंदर समाहित हो रही थी ऑर खुले पन को देख कर हैरान सी हो रही थी. अब उसे महसूस हो रहा था कि कुच्छ ही दिन पहले तक इज़्ज़त की बात करने वाली उसकी मा के स्वाभाव मे इतना बड़ा परिवर्तन कैसे हो गया. कहीं किसी से फँस जाने के वजह से तो नही. लेकिन सावित्री के मन मे एक बात तो एक दम से सॉफ हो चुकी थी और वह यह कि, उसकी मा किसी से फँस गयी है और शायद इसी वजह से किसी छिनार की तरह बातें कर रही थी.
दूसरे दिन वादे के मुताबिक सावित्री धन्नो के साथ जाने के लिए तैयार हो कर गाँव के बाहर आई. धन्नो उसका इंतज़ार कर रही थी. फिर धन्नो सावित्री को देख कर बोली "अरी सावित्री.....आज तो मैं जा नही पाउन्गि री....वो लड़के के बाप ने संदेशा भिज वाया था कि वो मेरी लड़की देखने दो-तीन हफ्ते बाद आएगा..." इतना सुनकर सावित्री बोली "हूँ ...तो ..मैं क्या करूँ चाची..दुकान पर जाउ...?" तब धन्नो बोली "ठीक है तू दुकान पर जा लेकिन जब लड़के का बाप मेरी बेटी को देखने के लिए सगुण चाचा के घर आएगा तो तू मेरे साथ चोरी से चलना...तेरी मा को खबर ना हो.." इतना कहते ही धन्नो गाँव के बाहर सुनसान जगह पर साड़ी उठा कर बैठ गयी और मूतने लगी. सावित्री कुच्छ सोच कर हामी भरते बोली "ठीक है चाची....मैं चलूंगी...." फिर धन्नो बैठे ही बैठे बोली "अरी हरज़ाई....जब तेरे को मौका लगा करे तो मेरे से भी मिल लिए करना...अपनी मा से चोरी चोरी.." फिर कुच्छ मुस्कुराते बोली "वो अपने गाँव का लड़का ...मन्नू.. ...तेरे को बहुत पूच्छ रहा था...." इतना कह कर धन्नो मूत कर खड़ी हुई और उसकी साड़ी कमर से नीचे नंगे चुतड और पैरों को ढक लीया. सावित्री ऐसा सुन कर कुच्छ नखड़े वाले अंदाज़ मे बोली "धत्त...अरे मुझसे ऐसी बात मत बोल...छी.." तब धन्नो धीरे से सावित्री की एक बाँह पकड़ कर हँसते हुए बोली "रीए रंडी...मन्नू का लॉडा एक दम से मूसल है रे पूरा का पूरा 22 साल का नया चोदु निकला है वो मन्नू...कितनी गाँव की बुद्धियाँ तक चुद गई ...और तू धत्त बोलती है..." इतना सुन कर सावित्री एक बार तो सनसना गई फिर बोली "चाची मेरे को दुकान पे जाना है .." तब धन्नो बोली "मैं जो पुच्छ रही हूँ वो तो भला बता " तब सावित्री बोली "क्या..?" "अरे मन्नू को लाइन मार ना.....री...सच मे बड़ा औज़ार वाला है.." इतना बोल कर धन्नो सावित्री का मुँह देखने लगी. एक दम खुले आम तरीके से बेबाक हो कर धन्नो के बात करने के अंदाज़ ने सावित्री को मानो झकझोर दिया था. वह अवाक रह गयी थी. फिर किसी अनाड़ी खिलाड़ी की तरह धीरे से बोली "मेरे को कुच्छ नही पता चाची ...मैं दुकान जा रही हूँ.."
तब धन्नो धीरे से कुच्छ फुसलाते अंदाज़ मे बोली "क्या दुकान पे जाओगी...चल आज का दिन मेरे साथ ही घूम कर बिता ले..." तब सावित्री कुच्छ सहम कर बोली "लेकिन वो मा जान गयी तो...नही मुझे जाने दो .." तब कुच्छ झिझक कर धन्नो बोली "अरी...वो रंडी क्या जानेगी....कोई अपने गाँव मे थोड़े ही घुमाने ले जाउन्गि ...अरे तेरे को ये गाँव के बगल वाले गाँव ले चलूंगी...वहाँ मेरी एक सहेली रहती है..गुलाबी...मेरी पुरानी सहेली.." आगे बोली "चल मिला दूं तेरे को उससे...बहुत ही अच्छी है रे.." अपनी सहेली की तारीफ करती हुई धन्नो ने मानो उसे अपने साथ घुमाने का इरादा बना ही लिया हो.
पूरे दिन धन्नो सावित्री को इधेर उधेर घुमाती रही और गाँव मे चोदा चोदि की कहानियाँ सुनाती रही. सावित्री को भी चोदा चोदि की बातें पसंद आने लगी थी. खूब चाव से सुनती रही. लेकिन जब सावित्री गुलाबी से मिली जो 44 साल के आस पास थी तो उसे भरोसा नही हुआ कि धन्नो की सहेली भी उसी की तरह खुली हुई थी. गुलाबी अपने घर अकेले ही थी और धन्नो से खूब गंदी गंदी बाते की. उसने सावित्री से भी अश्लील ढंग से मज़ाक किया तो सावित्री एकदम लज़ा गयी तब गुलाबी बोली "अरे मेरी रानी...शादी से पहले खूब लूट लो मर्दो का मज़ा ,,शादी के बाद तो भगवान ही मालिक है..पता नही कैसा ससुराल मिले...समझी..खूब चुदवा ..ये चुदवाने की उमर है...जी भर के चुद्वाओ.." और फिर सभी हंस पड़े.
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सावित्री अपनी मा की नज़र बचा कर धन्नो चाची से मिल लेती और कभी चोरी छिपे घूम भी लेती, और धन्नो चाची के मुँह से गाँव के लोगो की गंदी गंदी चोदा चोदि की कहानियाँ भी सुन लेती, जिसमे उसे बहुत मज़ा आता था.