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फिर धन्नो बोली “..चल अब दूध की धोइ मत बन....जब तेरी सील टूट ही गई तो काहे को झूठी नाटक कर रही है....वो कैसे एक कहावत है कि ....
चार इंच के घूँघट, अन्छुइ दुलहानिया के....
छे इंच के घूँघट, तो जानो चुचि मीज़वाई है.......
आठ इंच के घुंघट काढ़े तो समझो सील तोड़वाई है.....
दस इंच के लटके घूँघट तो जानो जोड़ा लंड खाई है.....
एक फुट घूँघट दुल्हन के तो, मैके मे आधा गाँव से चोदवाइ है.....”
धन्नो आगे बोली “....समझी...जब कोई दुल्हन मैके से पहली बार विदा हो कर अपने ससुराल आती है तो मायके मे जितनी ही चुद्वाइ होती है उतनी ही दिखावा ऐसे करती है कि मानो एकदम कुँवारी है...वैसे ही तू कर रही है...” फिर आगे बोली “चल अब गुलाबी के घर चल...फिर वहाँ और बातें करेंगे..”
फिर धन्नो बगीचे से बाहर निकली और लहलहाते खेतों के मेध पर पैदल गुलाबी के गाँव की ओर चलने लगी, और उसके पीछे पीछे सावित्री भी चलने लगी.
खेतों के बीच से चलते चलते थोड़ी ही देर मे गुलाबी का गाँव नज़दीक आ गया. लेकिन धन्नो गाँव की ओर जाने के बजाय दूसरी ओर कुच्छ सुनसान और निर्जन जगह की ओर बढ़ने लगी. तब सावित्री पीछे पीछे चलते हुए पुछि “चाची...कहाँ जा रही हो....गुलाबी चाची का गाँव तो उधर है...!” तब धन्नो बोली “अरी...दोपहर के बारह बजने वाले है....और इस वक़्त गुलाबी अपने घर मे थोड़ी होगी...वो तो इधेर ही होगी...” तब सावित्री पुछि “इधेर...?...इधेर तो एकदम सन्नाटा है...और कोई दीख भी नही रहा...इधेर वो क्या कर रही होगी...” तभी धन्नो पत्लो की झुर्मुट के बीच एक पतले रास्ते पर चलते बोली “..इधेर गाँव के ठाकुर साहेब का खेत है....और देख भाल के लिए ठाकुर साहेब ने एक छ्होटी सी कोठरी बनवाई है....” “और गुलाबी के दोपहर का अड्डा भी यही है...ठाकुर साहेब की सेवा भी करती है...समझी..” फिर सावित्री झुर्मुटों के बीच वाले रास्ते पर धन्नो के पीछे पीछे चलते हुए कई तरह की बातें सोच रही थी. कुच्छ देर तक चुप चाप देख कर धन्नो आगे बोली “ठाकुर साहेब गुलाबी को बहुत पसंद करते हैं.....और बड़े लोगो का मन जिस चीज़ पर आ जाए तो ..समझ कि उसे भगवान भी दूर नही रख सकता...” सावित्री के कानो मे ये बात तो सॉफ सुनाई दी लेकिन झुर्मुटों के बीच वाले रास्ते पर इतना सजग हो कर चल रही थी कि समझ नही पाई कि धन्नो के कहने का क्या मतलब था. और दूसरे ही पल बोली “चाची ...क्या...? समझी नही...” तब धन्नो बोली “अरी..यही कह रही थी कि गुलाबी की भरी पूरी जवानी के पीछे ठाकुर साहेब भी लत्तु हो गये और....उसे मानो एक रखैल की तरह रख लिए..” “बड़े लोग को भला किस बात का डर...वो भी गाँव के ठाकुर साहेब..” इतनी बात सुनकर सावित्री आगे कुच्छ बोलना नही चाह रही थी. तभी वो झुर्मुट भी ख़त्म हो गया और एक छ्होटी सी कोठरी सामने थी. जिसके चारो ओर बस खेत ही खेत थे. एकदम निर्जन स्थान. कोई सोच भी नही सकता कि ऐसी जगह पर कोई कोठरी भी हो सकती है. तभी कोठरी के पास पहुँच कर धन्नो रुक गई और सावित्री से बोली “देख यहाँ से चारो ओर जितने भी खेत दीखाई दे रही है ...सब इसी ठाकुर साहेब के खेत हैं....और जब कभी अपने खेत देखने आते हैं तो इसी कोठरी मे आराम करते हैं....” और फिर कुच्छ धीमी आवाज़ मे बोली “..और ..सच कहो तो इस कोठरी का इस्तेमाल रखवाली मे कम और बुर चोद्ने मे ज़यादा होता है...” इतनी बात सुनकर सावित्री एकदम से सन्न रह गई. फिर धन्नो चाची की ओर देखते हुए धीमी आवाज़ मे बोली “लेकिन चाची...फिर वो गुलाबी चाची यहाँ क्या करती है...” इतना सुनकर धन्नो कुच्छ झिझकते बोली “तू तो एकदम से मूर्ख की तरह बात करती है......!...अरे हरजाई...वो भी तो एक औरत है...और ठाकुर साहेब के लंड की दीवानी भी है....और मैं तो बता ही दी कि ठाकुर साहेब के खेत की देखभाल के बहाने यहाँ आती है रोज जी भर के चोद्वाति है...” “तू जाने कब समझेगी सब बातें....” इतना बोलकर धन्नो उस छ्होटी से कोठरी की ओर बढ़ी. सावित्री एकदम निर्जन स्थान पर बनी उस कोठरी की ओर गौर से देखी. उस कोठरी मे एक दरवाज़ा लगा था लेकिन कहीं से खिड़की नही लगी थी. बस उँचाई पर एक रोशनदान था. दरवाजा भी पुराना था. नीचे का हिस्सा टूट भी रहा था. देखने से ऐसा लगता था मानो ये दरवाजा रोज बंद नही होता हो. दरवाजा के दोनो पल्ले या कपाट खुले हुए थे. उस कोठरी के इधेर उधेर कहीं कोई दीखाई नही दे रहा था. धन्नो उस कोठरी के दरवाजे से कुच्छ दूरी पर खड़ी हो कर मानो चुप चाप कुच्छ सुनने की कोशिश कर रही थी. सावित्री ऐसा देखकर मानो सहम सी गई. तभी अंदर कोठरी मे से किसी के फुसफुसाने की आवाज़ आई. ये किसी औरत की आवाज़ थी. जिसे सुनकर धन्नो समझ गई कि गुलाबी की ही आवाज़ है. लेकिन इस दोपहर मे भला कौन हो सकता है. धन्नो को शक़ नही बल्कि यकीन था कि ठाकुर साहेब ही होंगे. तभी कोठरी के अंदर से किसी मर्द की धीमी आवाज़ आई “.स सस्स आह बस करो...रहने दे...” तब धन्नो समझ गई कि ये मोटी आवाज़ ठाकुर साहेब की थी. सावित्री को कुच्छ समझ मे नही आ रहा था. तभी धन्नो सावित्री की ओर मूड कर धीरे से बोली “लगता है ठाकुर साहेब अंदर हैं....” इतनी बात सुनकर सावित्री सहमी आवाज़ मे धीमे से डरी हुई बोली “..तो चाची चलो यहाँ से...” और इन शब्दो के ख़त्म होते होते सावित्री के चेहरे पर एक ख़ौफ़ पसर गया था.
चार इंच के घूँघट, अन्छुइ दुलहानिया के....
छे इंच के घूँघट, तो जानो चुचि मीज़वाई है.......
आठ इंच के घुंघट काढ़े तो समझो सील तोड़वाई है.....
दस इंच के लटके घूँघट तो जानो जोड़ा लंड खाई है.....
एक फुट घूँघट दुल्हन के तो, मैके मे आधा गाँव से चोदवाइ है.....”
धन्नो आगे बोली “....समझी...जब कोई दुल्हन मैके से पहली बार विदा हो कर अपने ससुराल आती है तो मायके मे जितनी ही चुद्वाइ होती है उतनी ही दिखावा ऐसे करती है कि मानो एकदम कुँवारी है...वैसे ही तू कर रही है...” फिर आगे बोली “चल अब गुलाबी के घर चल...फिर वहाँ और बातें करेंगे..”
फिर धन्नो बगीचे से बाहर निकली और लहलहाते खेतों के मेध पर पैदल गुलाबी के गाँव की ओर चलने लगी, और उसके पीछे पीछे सावित्री भी चलने लगी.
खेतों के बीच से चलते चलते थोड़ी ही देर मे गुलाबी का गाँव नज़दीक आ गया. लेकिन धन्नो गाँव की ओर जाने के बजाय दूसरी ओर कुच्छ सुनसान और निर्जन जगह की ओर बढ़ने लगी. तब सावित्री पीछे पीछे चलते हुए पुछि “चाची...कहाँ जा रही हो....गुलाबी चाची का गाँव तो उधर है...!” तब धन्नो बोली “अरी...दोपहर के बारह बजने वाले है....और इस वक़्त गुलाबी अपने घर मे थोड़ी होगी...वो तो इधेर ही होगी...” तब सावित्री पुछि “इधेर...?...इधेर तो एकदम सन्नाटा है...और कोई दीख भी नही रहा...इधेर वो क्या कर रही होगी...” तभी धन्नो पत्लो की झुर्मुट के बीच एक पतले रास्ते पर चलते बोली “..इधेर गाँव के ठाकुर साहेब का खेत है....और देख भाल के लिए ठाकुर साहेब ने एक छ्होटी सी कोठरी बनवाई है....” “और गुलाबी के दोपहर का अड्डा भी यही है...ठाकुर साहेब की सेवा भी करती है...समझी..” फिर सावित्री झुर्मुटों के बीच वाले रास्ते पर धन्नो के पीछे पीछे चलते हुए कई तरह की बातें सोच रही थी. कुच्छ देर तक चुप चाप देख कर धन्नो आगे बोली “ठाकुर साहेब गुलाबी को बहुत पसंद करते हैं.....और बड़े लोगो का मन जिस चीज़ पर आ जाए तो ..समझ कि उसे भगवान भी दूर नही रख सकता...” सावित्री के कानो मे ये बात तो सॉफ सुनाई दी लेकिन झुर्मुटों के बीच वाले रास्ते पर इतना सजग हो कर चल रही थी कि समझ नही पाई कि धन्नो के कहने का क्या मतलब था. और दूसरे ही पल बोली “चाची ...क्या...? समझी नही...” तब धन्नो बोली “अरी..यही कह रही थी कि गुलाबी की भरी पूरी जवानी के पीछे ठाकुर साहेब भी लत्तु हो गये और....उसे मानो एक रखैल की तरह रख लिए..” “बड़े लोग को भला किस बात का डर...वो भी गाँव के ठाकुर साहेब..” इतनी बात सुनकर सावित्री आगे कुच्छ बोलना नही चाह रही थी. तभी वो झुर्मुट भी ख़त्म हो गया और एक छ्होटी सी कोठरी सामने थी. जिसके चारो ओर बस खेत ही खेत थे. एकदम निर्जन स्थान. कोई सोच भी नही सकता कि ऐसी जगह पर कोई कोठरी भी हो सकती है. तभी कोठरी के पास पहुँच कर धन्नो रुक गई और सावित्री से बोली “देख यहाँ से चारो ओर जितने भी खेत दीखाई दे रही है ...सब इसी ठाकुर साहेब के खेत हैं....और जब कभी अपने खेत देखने आते हैं तो इसी कोठरी मे आराम करते हैं....” और फिर कुच्छ धीमी आवाज़ मे बोली “..और ..सच कहो तो इस कोठरी का इस्तेमाल रखवाली मे कम और बुर चोद्ने मे ज़यादा होता है...” इतनी बात सुनकर सावित्री एकदम से सन्न रह गई. फिर धन्नो चाची की ओर देखते हुए धीमी आवाज़ मे बोली “लेकिन चाची...फिर वो गुलाबी चाची यहाँ क्या करती है...” इतना सुनकर धन्नो कुच्छ झिझकते बोली “तू तो एकदम से मूर्ख की तरह बात करती है......!...अरे हरजाई...वो भी तो एक औरत है...और ठाकुर साहेब के लंड की दीवानी भी है....और मैं तो बता ही दी कि ठाकुर साहेब के खेत की देखभाल के बहाने यहाँ आती है रोज जी भर के चोद्वाति है...” “तू जाने कब समझेगी सब बातें....” इतना बोलकर धन्नो उस छ्होटी से कोठरी की ओर बढ़ी. सावित्री एकदम निर्जन स्थान पर बनी उस कोठरी की ओर गौर से देखी. उस कोठरी मे एक दरवाज़ा लगा था लेकिन कहीं से खिड़की नही लगी थी. बस उँचाई पर एक रोशनदान था. दरवाजा भी पुराना था. नीचे का हिस्सा टूट भी रहा था. देखने से ऐसा लगता था मानो ये दरवाजा रोज बंद नही होता हो. दरवाजा के दोनो पल्ले या कपाट खुले हुए थे. उस कोठरी के इधेर उधेर कहीं कोई दीखाई नही दे रहा था. धन्नो उस कोठरी के दरवाजे से कुच्छ दूरी पर खड़ी हो कर मानो चुप चाप कुच्छ सुनने की कोशिश कर रही थी. सावित्री ऐसा देखकर मानो सहम सी गई. तभी अंदर कोठरी मे से किसी के फुसफुसाने की आवाज़ आई. ये किसी औरत की आवाज़ थी. जिसे सुनकर धन्नो समझ गई कि गुलाबी की ही आवाज़ है. लेकिन इस दोपहर मे भला कौन हो सकता है. धन्नो को शक़ नही बल्कि यकीन था कि ठाकुर साहेब ही होंगे. तभी कोठरी के अंदर से किसी मर्द की धीमी आवाज़ आई “.स सस्स आह बस करो...रहने दे...” तब धन्नो समझ गई कि ये मोटी आवाज़ ठाकुर साहेब की थी. सावित्री को कुच्छ समझ मे नही आ रहा था. तभी धन्नो सावित्री की ओर मूड कर धीरे से बोली “लगता है ठाकुर साहेब अंदर हैं....” इतनी बात सुनकर सावित्री सहमी आवाज़ मे धीमे से डरी हुई बोली “..तो चाची चलो यहाँ से...” और इन शब्दो के ख़त्म होते होते सावित्री के चेहरे पर एक ख़ौफ़ पसर गया था.