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Guest
गुलाबी के मुँह से इतनी बात सुनकर धन्नो भी मुँह बनाती बोल ही पड़ी "....खैर तेरी बुर की आग तो बुझ जाती है ना.....मेरी चिंता मत कर....तू ही लंड चोद्वा..."
फिर आगे बोली "तुझे तो आज भी ठाकुर साहेब मन से चोद्ते हैं.....मैं तेरी जैसी जवान नही हूँ, तो भला कौन पुच्छे मुझे..." गुलाबी तपाक से बोली ".....अब झांट जलाने वाली बात मत बोल...मैं जवान हूँ और तू बूडिया हो गई है..." तब धन्नो जबाव मे बोली "...तो क्या मैं जवान हूँ क्या....चालीस के उपर की हो गई ..." फिर गुलाबी भी तुनक कर कही ".....आरीए तो मैं कौन सी सोलह साल की कुँवारी हूँ.....मेरी भी तो उमर चालीस के उपर की हो ही गई..." तब धन्नो गुलाबी पर वार करते आगे बोली ".....बस तेरी उमर चालीस के उपर की है..जवानी तो वैसी की वैसी ही है ...." ये सब बातें करने के साथ साथ ही दोनो चौकी के बगल मे खड़ी हो ठाकुर साहेब को भी देख रहीं थीं जो सावित्री के बुर मे अपनी बीच वाली बड़ी उंगली गच गच पेल रहे थे और दोनो चुचिओ को चूस चूस कर लाल कर रहे थे. ठाकुर साहेब के चुचि चूसने और बीच वाली मोटी उंगली की चुदाई पा कर सावित्री अपने दोनो केले के तने की तरह की चिकनी और मांसल जांघों को छितरा चुकी थी. मस्ती मे आ कर आँखे भी मूंद ली थी. फिर धन्नो की बात का जबाव देती गुलाबी बोली "...तू भी क्या झांट सुलगाने वाली बात फिर कर दी....कि वैसी की वैसी ही जवान हूँ...." तब धन्नो बोली "झांट क्यों सुलग गई.....सच मे तू क्या कम जवान है...हरजाई....तेरे मर्द को किनारे कर के दूसरे मर्द रोज तेरी सवारी करते हैं, ....और तो और ... ठाकुर साहेब भी पीछे नही रहते तुझ पर चढ़ाई करने से....क्या जवान नही है तू..." दोनो ये सब बातें करने के साथ ही ये भी देख रही थीं कि सावित्री की बुर एकदम से गरम हो चुकी थी और ठाकुर साहेब अपने मोटी उंगली से चोद कर बुर को एक दम से लिबलिबा दिए थे. फिर अगले ही पल ठाकुर साहेब सावित्री के उपर आ गये और दोनो पैरों को खूब चौड़ा कर के उसकी चिकनी और मांसल जांघों पर अपनी गथीलि और सख़्त जाँघ को चढ़ा दिए. उनका लंड एकदम विशाल रूप ले चुका था. किसी लोहे की तरह सख़्त और भारी हो चुका था. सूपड़ा देखने से एकदम खूनी लाल और किसी बड़े टमाटर की तरह चमक रहा था. उस मोटे तननाए हुए भारी लंड पर ठाकुर साहेब अपने हाथ मे थूक ले कर लपेट दिए. लंड से चुदाई के लिए कर रहे तैयारी को गौर से दोनो आँखे फाड़ फाड़ कर देख रहीं थी. तभी तननाया और मोटा लंड पर थूक लगा कर ठाकुर साहेब ने सुपादे को गीली और लिसलीस्सी झांतो से भरी हुई और गरम हो चुकी बुर के मुँह पर भिड़ा दिया. लंड का सूपड़ा बुर की छेद के ठीक बीचोबीच फिट हो गया. दहकते हुए लाल सुपादे की गर्मी बुर के मुँह पर जैसे ही सटी की सावित्री उच्छल सी गई. लाल सुपादे की गर्मी काली बुर के अंदर दौड़ गई और सावित्री एक पल के लिए फिर सिहर कर मुँह खोल दी. सुपादे की गर्मी से हुई सावित्री के पूरे शरीर मे हुए हरकत को ठाकुर साहेब के साथ साथ दोनो, गुलाबी और धन्नो भी देख कर सनसना गईं. अब दोनो आपस मे कौन सी बातें कर रही थीं मानो भूल गईं. जांघों पर अपनी जाँघ चढ़ा कर और थूक से पूरी तरह से लापेस चुके लंड के चौड़े सुपादे को बुर के छेद मे कुच्छ पल तक ऐसे ही भिड़ाए रहने के बाद ठाकुर साहेब ने सावित्री के कंधे को एक हाथ से और लंड की जड़ को दूसरे हाथ से कस के पकड़ कर अपनी कमर को हवा मे पूरा उठा कर जैसे ही बुर मे चांपे की लंड का सुपाड़ा "गुपप..!" के आवाज़ के साथ बुर मे घुस गया. सुपाड़ा के बुर मे समाते ही सावित्री अपनी आँखे एकदम मूंद ली और मुँह पूरा खोल कर सिसकार उठी और उसकी जंघे भी मानो आपस मे सटा ने के लिए हरकत की लेकिन ठाकुर साहेब की जांघों के नीचे बुरी तरीके से दबे होने से बस हिल कर रह गईं. बुर मे घुस चुके चौड़े सुपाड़ा देखने से बहुत ही भयंकर लग रहा था. केवल सूपड़ा ही घुसने से बुर् की दोनो फांके पूरी तरह से फैल चुकी थीं और बुर की शक्ल भी एकदम से बदल गई थी. दोनो के साथ ठाकुर साहेब ने भी अपनी गर्दन को झुका कर एक नज़र अपने मोटे लंड के सुपादे को एक बार गौर से देखा जो बुर के दोनो फांकों को एकदम से फैला कर घुस कर मानो फँस गया था. उन्हे लगा कि अब सूपड़ा बाहर की ओर नही निकलेगा. तब अपने लंड पर वाले हाथ को भी सावित्री के दूसरे कंधे पर रख कर सावित्री के दोनो कंधों को कस के पकड़ लिए. फिर क्या था, एक जोरदार धक्का बुर मे मार ही दिया, लंड गीली हो चुकी बुर मे कच्छ के आवाज़ के साथ लगभग एक इंच तक घुस गया. फिर दूसरे पल ही दूसरा धक्का कुछ और ज़ोर से लगा कि एक इंच लंड और घुस कर फँस गया. दो ही धक्के मे सुपाड़ा और दो इंच लंड घुसते देख गुलाबी बोल पड़ी "...बाबू जी ....आप तो अपने मोटे बाँस को ऐसे पेल रहे हैं मानो किसी अधेड़ औरत की बुर हो....दो ही धक्कों मे आधा लंड गटक गई...." इतनी बात सुनकर धन्नो बोली "...ये नही देख रही है कि बाबू जी कितनी ज़ोर से धक्के मार रहे हैं. ...हरजाई... .तुझे तो कल की छोकरि आज अधेड़ लग रही है...." तब गुलाबी बोली "मैं अधेड़ थोड़ी कह रही हूँ री रंडी....जब तेरे साथ घूम फिर रही है तो कोई सील बंद कुँवारी थोड़ी बची है .....ना जाने कितनो से तुम उसे चुदवाइ होगी आज तक..." तब धन्नो भी जबाव मे पीच्चे नही रही और ठाकुर साहेब के आधे घुसे हुए लंड पर गौर से देखते बोली ".....हाँ री तू तो ऐसे बक रहीहै मानो मानो इससे रंडी का धंधा करवा रही हूँ.....अरे हरजाई विश्वास कर ....अभी इस खेल मे नई नई है ये..."
फिर आगे बोली "तुझे तो आज भी ठाकुर साहेब मन से चोद्ते हैं.....मैं तेरी जैसी जवान नही हूँ, तो भला कौन पुच्छे मुझे..." गुलाबी तपाक से बोली ".....अब झांट जलाने वाली बात मत बोल...मैं जवान हूँ और तू बूडिया हो गई है..." तब धन्नो जबाव मे बोली "...तो क्या मैं जवान हूँ क्या....चालीस के उपर की हो गई ..." फिर गुलाबी भी तुनक कर कही ".....आरीए तो मैं कौन सी सोलह साल की कुँवारी हूँ.....मेरी भी तो उमर चालीस के उपर की हो ही गई..." तब धन्नो गुलाबी पर वार करते आगे बोली ".....बस तेरी उमर चालीस के उपर की है..जवानी तो वैसी की वैसी ही है ...." ये सब बातें करने के साथ साथ ही दोनो चौकी के बगल मे खड़ी हो ठाकुर साहेब को भी देख रहीं थीं जो सावित्री के बुर मे अपनी बीच वाली बड़ी उंगली गच गच पेल रहे थे और दोनो चुचिओ को चूस चूस कर लाल कर रहे थे. ठाकुर साहेब के चुचि चूसने और बीच वाली मोटी उंगली की चुदाई पा कर सावित्री अपने दोनो केले के तने की तरह की चिकनी और मांसल जांघों को छितरा चुकी थी. मस्ती मे आ कर आँखे भी मूंद ली थी. फिर धन्नो की बात का जबाव देती गुलाबी बोली "...तू भी क्या झांट सुलगाने वाली बात फिर कर दी....कि वैसी की वैसी ही जवान हूँ...." तब धन्नो बोली "झांट क्यों सुलग गई.....सच मे तू क्या कम जवान है...हरजाई....तेरे मर्द को किनारे कर के दूसरे मर्द रोज तेरी सवारी करते हैं, ....और तो और ... ठाकुर साहेब भी पीछे नही रहते तुझ पर चढ़ाई करने से....क्या जवान नही है तू..." दोनो ये सब बातें करने के साथ ही ये भी देख रही थीं कि सावित्री की बुर एकदम से गरम हो चुकी थी और ठाकुर साहेब अपने मोटी उंगली से चोद कर बुर को एक दम से लिबलिबा दिए थे. फिर अगले ही पल ठाकुर साहेब सावित्री के उपर आ गये और दोनो पैरों को खूब चौड़ा कर के उसकी चिकनी और मांसल जांघों पर अपनी गथीलि और सख़्त जाँघ को चढ़ा दिए. उनका लंड एकदम विशाल रूप ले चुका था. किसी लोहे की तरह सख़्त और भारी हो चुका था. सूपड़ा देखने से एकदम खूनी लाल और किसी बड़े टमाटर की तरह चमक रहा था. उस मोटे तननाए हुए भारी लंड पर ठाकुर साहेब अपने हाथ मे थूक ले कर लपेट दिए. लंड से चुदाई के लिए कर रहे तैयारी को गौर से दोनो आँखे फाड़ फाड़ कर देख रहीं थी. तभी तननाया और मोटा लंड पर थूक लगा कर ठाकुर साहेब ने सुपादे को गीली और लिसलीस्सी झांतो से भरी हुई और गरम हो चुकी बुर के मुँह पर भिड़ा दिया. लंड का सूपड़ा बुर की छेद के ठीक बीचोबीच फिट हो गया. दहकते हुए लाल सुपादे की गर्मी बुर के मुँह पर जैसे ही सटी की सावित्री उच्छल सी गई. लाल सुपादे की गर्मी काली बुर के अंदर दौड़ गई और सावित्री एक पल के लिए फिर सिहर कर मुँह खोल दी. सुपादे की गर्मी से हुई सावित्री के पूरे शरीर मे हुए हरकत को ठाकुर साहेब के साथ साथ दोनो, गुलाबी और धन्नो भी देख कर सनसना गईं. अब दोनो आपस मे कौन सी बातें कर रही थीं मानो भूल गईं. जांघों पर अपनी जाँघ चढ़ा कर और थूक से पूरी तरह से लापेस चुके लंड के चौड़े सुपादे को बुर के छेद मे कुच्छ पल तक ऐसे ही भिड़ाए रहने के बाद ठाकुर साहेब ने सावित्री के कंधे को एक हाथ से और लंड की जड़ को दूसरे हाथ से कस के पकड़ कर अपनी कमर को हवा मे पूरा उठा कर जैसे ही बुर मे चांपे की लंड का सुपाड़ा "गुपप..!" के आवाज़ के साथ बुर मे घुस गया. सुपाड़ा के बुर मे समाते ही सावित्री अपनी आँखे एकदम मूंद ली और मुँह पूरा खोल कर सिसकार उठी और उसकी जंघे भी मानो आपस मे सटा ने के लिए हरकत की लेकिन ठाकुर साहेब की जांघों के नीचे बुरी तरीके से दबे होने से बस हिल कर रह गईं. बुर मे घुस चुके चौड़े सुपाड़ा देखने से बहुत ही भयंकर लग रहा था. केवल सूपड़ा ही घुसने से बुर् की दोनो फांके पूरी तरह से फैल चुकी थीं और बुर की शक्ल भी एकदम से बदल गई थी. दोनो के साथ ठाकुर साहेब ने भी अपनी गर्दन को झुका कर एक नज़र अपने मोटे लंड के सुपादे को एक बार गौर से देखा जो बुर के दोनो फांकों को एकदम से फैला कर घुस कर मानो फँस गया था. उन्हे लगा कि अब सूपड़ा बाहर की ओर नही निकलेगा. तब अपने लंड पर वाले हाथ को भी सावित्री के दूसरे कंधे पर रख कर सावित्री के दोनो कंधों को कस के पकड़ लिए. फिर क्या था, एक जोरदार धक्का बुर मे मार ही दिया, लंड गीली हो चुकी बुर मे कच्छ के आवाज़ के साथ लगभग एक इंच तक घुस गया. फिर दूसरे पल ही दूसरा धक्का कुछ और ज़ोर से लगा कि एक इंच लंड और घुस कर फँस गया. दो ही धक्के मे सुपाड़ा और दो इंच लंड घुसते देख गुलाबी बोल पड़ी "...बाबू जी ....आप तो अपने मोटे बाँस को ऐसे पेल रहे हैं मानो किसी अधेड़ औरत की बुर हो....दो ही धक्कों मे आधा लंड गटक गई...." इतनी बात सुनकर धन्नो बोली "...ये नही देख रही है कि बाबू जी कितनी ज़ोर से धक्के मार रहे हैं. ...हरजाई... .तुझे तो कल की छोकरि आज अधेड़ लग रही है...." तब गुलाबी बोली "मैं अधेड़ थोड़ी कह रही हूँ री रंडी....जब तेरे साथ घूम फिर रही है तो कोई सील बंद कुँवारी थोड़ी बची है .....ना जाने कितनो से तुम उसे चुदवाइ होगी आज तक..." तब धन्नो भी जबाव मे पीच्चे नही रही और ठाकुर साहेब के आधे घुसे हुए लंड पर गौर से देखते बोली ".....हाँ री तू तो ऐसे बक रहीहै मानो मानो इससे रंडी का धंधा करवा रही हूँ.....अरे हरजाई विश्वास कर ....अभी इस खेल मे नई नई है ये..."