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गुलाबी: “मैं उससे पुछि कि सच सच बता और क्या किया..तो बताया कि बस चुचि को फ्रॉक के उपर से ही मीस दिया और नीचे चढ्ढि मे हाथ घुसा कर जैसे ही बुर की फांकों को मसला और बुर की छेद मे उंगली घुसाने की कोशिस की तो जमुनिया चिल्ला उठी...और सुक्खु उसे छोड़ दिया और वो भाग गई...”
धन्नो: “उंगली घुसा दिया था कि नही....”
गुलाबी: “सुक्खु बताया कि उंगली बस घुसाने की कोशिस कर रहा था कि वो चिल्ला उठी...”
धन्नो: “फिर....”
गुलाबी: “सुक्खु ही बताया कि बुर मे उंगली घुस ही नही रही थी....मानो एक दम कुँवारी बुर थी...”
धन्नो: “हाँ तो जमुनिया कुँवारी है ...”
गुलाबी: “मैने ये बात ठाकुर साहेब को भी बताई कि सुक्खु उसकी बुर मे उंगली घुसाने की कोशिस किया था और उसकी बुर एकदम कसी है...और उसकी उंगली भी घुस नही पाई..एक दम कुँवारी बुर की तरह...”
धन्नो: “तभी ठाकुर साहेब कुँवारी बुर के सपने देख रहे हैं...”
गुलाबी: “ठाकुर साहेब रोज़ जमुनिया के बारे मे पुछ्ते हैं...”
धन्नो: “चोद्वा दे साली को ...ठाकुर के मोटे लंड से...”
गुलाबी: “हां री ...मैं भी सोचती हूँ कि कब हरजाई की बुर मे ठाकुर साहेब का लंड धन्सेगा”
धन्नो: “मुझे तो लगता है कि....अब चुद्वा लेगी..”
गुलाबी: “हां री....मैने भी ठाकुर साहेब से बोली हूँ कि सब्र करिए ...जमुनिया की सील आप ही तोड़ोगे..”
धन्नो: “ठाकुर साहेब ये सुनकर मस्त गये होंगे....”
गुलाबी: “मत पुच्छ....अपने लंड पे रोज़ तेल मालिश करवाते हैं....जमुनिया की सील बंद बुर को चोद्ने का ख्वाब देख देख कर....”
धन्नो: “बड़ा भारी है री....मोटा बूमपीलाट लंड ठाकुर साहेब का...”
गुलाबी: (रास्ते मे रुक कर सावित्री की ओर देखकर मुस्कुराते हुए ) “ये तो सावित्री ही बताएगी कि कैसा है”
धन्नो: “रोज़ तू लंड खाती है...और सावित्री क्या बताएगी....” धन्नो हंसते हुए बोली.
गुलाबी: “आज तो ये भी पूरी निगल गई थी अपनी बुर मे...तो क्या मालूम नही चला होगा इसे...”
धन्नो: “तो पुच्छ ले इससे....बता दे री कैसा लगा ठाकुर साहेब का ओंज़ार....”
इतनी बात सुनते ही सावित्री लज़ा गई और रास्ते पर खड़ी हो कर उसकी ओर देख रही धन्नो और गुलाबी से नज़रें छुपाते हुई दूसरी ओर देखने लगी. मानो कुच्छ जबाव देना नही चाह रही थी. तभी धन्नो सावित्री की एक चुचि को हाथ मे पकड़ते बोली “बोल रीए...बोलती क्यों नही...बोल कैसा रहा लंड का स्वाद...हे हे हे” दूसरे ही पल सावित्री धन्नो के हाथ को अपनी चुचि पर से हटाते कुच्छ गुस्से से नखड़ा करते बोली “धत्त....चाची...चलो..”
धन्नो: “बोल री...कैसा रहा लंड....”
सावित्री: (अपने मुँह को दूसरी ओर फेरते हुए ) “मैं कुच्छ नही जानती...”
गुलाबी: “बुर चीरवा कर लंड खा ली...और अब सब भूल गई...”
सावित्री: “छ्चीए ....मैं नही बोलूँगी...”
धन्नो: “बोल री....कौन दूसरे से बोल रही है...हामी दोनो तो हैं और कौन तीसरा है...”
गुलाबी: “हां और क्या..अब लाज़ कैसा हरजाई...देख कितना मज़ा आया तुझे...”
धन्नो: “अच्च्छा ....बस ये बता दे कि मज़ा आया कि नही”
सावित्री कुच्छ पल के लिए चुप रही फिर मुस्कुरा दी. जिसे देख कर धन्नो बोली “बस ये बता दे मज़ा मिला कि नही ठाकुर साहेब के साथ...”
सावित्री : (मुस्कुराते हुए) “..हूँ..”
गुलाबी: “क्या...?”
सावित्री: “कुच्छ नहीं...”
धन्नो: “आरीए रंडी ....क्या लज़ा रही है मानो ससुर भसुर खड़ा है आगे...बोल दे..कैसा लगा”
सावित्री: “ठीक लगा”
गुलाबी: “क्या ठीक लगा?”
सावित्री: “वही..”
धन्नो: “क्या यही क्या वही....हरजाई बोल ना खोल के...मज़ा आया कि नही..?”
सावित्री: “बोली तो.”
धन्नो: “तो वही खोल के बोल..”
सावित्री: “कह तो रही हूँ...म मज़ा आया...” इतनी बात बोलते हुए सावित्री का बदन सिहर उठा
फिर गुलाबी और धन्नो दोनो रास्ते पर चलने लगीं और सबसे पीछे सावित्री भी चलने लगी. सुनसान खेतों के बीच पतले रास्ते पर चलते हुए आगे बातें करते हुए ...
गुलाबी: “मोटा लगा...”
सावित्री: “हूँ”
धन्नो: “धक्का तो ज़ोर ज़ोर से मार रहे थे.....कैसा लगा...”
सावित्री: (कुच्छ भी नही बोली और पीछे चुप चाप चल रही थी)
गुलाबी: “धक्का पसंद आया...ठाकुर साहेब का..”
सावित्री: “अब मैं कुच्छ नही बोलूँगी...”
धन्नो: “बस ये बता दे कि धक्का पसंद आया कि नही...”
सावित्री: “चलो पसंद आया लेकिन अब चाची कुच्छ मत पुछो....”
धन्नो: “अरी रंडी....इसी सब मे तो मज़ा आता है..”
सावित्री: “किस मे “
गुलाबी: “चोदा चोदि की बात मे...”
धन्नो: “पेला पेली की बात करेगी तो खूब मज़ा आएगा....”
गुलाबी: “इसी लिए तो पुच्छ रही हूँ...और तू लज़ा रही है..”
धन्नो: “देख हम दोनो का, मतलब मेरे और गुलाबी मे सब चलता है ....गरमा गरम बातें “
गुलाबी: “और क्या”
धन्नो: “देख गुलाबी अपने यार सुक्खु से कैसे कैसे चोद्वाती है...सब बताती है...”
गुलाबी: “और ये भी बता दे कि मेरे सामने ही तू भी सुक्खु से गांद उच्छाल उच्छाल के चोद्वाति है....”
धन्नो: “लाज़ कैसा रे...चोद्वाति हूँ तो चोद्वाति हूँ...मैं क्यों लजाउन्गि री.....”
गुलाबी: “अरी तो धन्नो ...ज़रा सुक्खु के लंड के बारे मे इसे बता दे...”
धन्नो: “लंड के बारे मे क्या करेगी सुनकर....अब कोई कुँवारी थोड़ी है ...जब चाहे सुक्खु का लंड मरवा ले अपनी बुर मे....”
सावित्री: “...छ्ची चाची....बस भी करो...”
धन्नो: “बस क्या रे ....यही जवानी की उमर है...खूब लूट ले मज़ा....ससुराल जाते ही बच्चे पैदा करने की मशीन बन जाओगी....”
गुलाबी: “और...चार छे बच्चे बियाने के बाद ......मौका नही मिलेगा चोद्वाने के लिए...”
धन्नो: “और बुर की लासम भी ख़त्म हो जाएगी...जो इस जवानी मे है..”
गुलाबी: “देख आज ठाकुर साहेब कितना चाव से तेरी चुदाई किए ....”
इस तरीके से बाते करती हुई तीनो सुनसान खेतों के बीच वाले रास्ते पर चलते एक छ्होटे से बगीचे के पास पहुँच गईं. जो गुलाबी के गाँव के बाहर कुच्छ ही दूरी पर था. तभी गाँव की ओर से एक 35-36 साल की औरत आ रही थी. लाल साड़ी मे, अच्छी कद काठी, माथे पर बिंदिया, माँग मे सिंदूर और पैर मे एक हवाई चप्पल था. हाथ मे एक खन्चोलि और उस खन्चोलि मे घास काटने वाला खुरपा था. गुलाबी उसे अपनी ओर आते देख धन्नो से धीमी आवाज़ मे बोली “वो देख ....मेरे गाँव के रामदास की औरत है..तीन बज गये ना...चल दी घास काटने...”
धन्नो: “घास काटने...अकेली ही जाती है क्या...”
गुलाबी: “अरे....ये भी नई खिलाड़ी निकल रही है...इसे जाने दे तब कहानी बताती हूँ....”
धन्नो: “उंगली घुसा दिया था कि नही....”
गुलाबी: “सुक्खु बताया कि उंगली बस घुसाने की कोशिस कर रहा था कि वो चिल्ला उठी...”
धन्नो: “फिर....”
गुलाबी: “सुक्खु ही बताया कि बुर मे उंगली घुस ही नही रही थी....मानो एक दम कुँवारी बुर थी...”
धन्नो: “हाँ तो जमुनिया कुँवारी है ...”
गुलाबी: “मैने ये बात ठाकुर साहेब को भी बताई कि सुक्खु उसकी बुर मे उंगली घुसाने की कोशिस किया था और उसकी बुर एकदम कसी है...और उसकी उंगली भी घुस नही पाई..एक दम कुँवारी बुर की तरह...”
धन्नो: “तभी ठाकुर साहेब कुँवारी बुर के सपने देख रहे हैं...”
गुलाबी: “ठाकुर साहेब रोज़ जमुनिया के बारे मे पुछ्ते हैं...”
धन्नो: “चोद्वा दे साली को ...ठाकुर के मोटे लंड से...”
गुलाबी: “हां री ...मैं भी सोचती हूँ कि कब हरजाई की बुर मे ठाकुर साहेब का लंड धन्सेगा”
धन्नो: “मुझे तो लगता है कि....अब चुद्वा लेगी..”
गुलाबी: “हां री....मैने भी ठाकुर साहेब से बोली हूँ कि सब्र करिए ...जमुनिया की सील आप ही तोड़ोगे..”
धन्नो: “ठाकुर साहेब ये सुनकर मस्त गये होंगे....”
गुलाबी: “मत पुच्छ....अपने लंड पे रोज़ तेल मालिश करवाते हैं....जमुनिया की सील बंद बुर को चोद्ने का ख्वाब देख देख कर....”
धन्नो: “बड़ा भारी है री....मोटा बूमपीलाट लंड ठाकुर साहेब का...”
गुलाबी: (रास्ते मे रुक कर सावित्री की ओर देखकर मुस्कुराते हुए ) “ये तो सावित्री ही बताएगी कि कैसा है”
धन्नो: “रोज़ तू लंड खाती है...और सावित्री क्या बताएगी....” धन्नो हंसते हुए बोली.
गुलाबी: “आज तो ये भी पूरी निगल गई थी अपनी बुर मे...तो क्या मालूम नही चला होगा इसे...”
धन्नो: “तो पुच्छ ले इससे....बता दे री कैसा लगा ठाकुर साहेब का ओंज़ार....”
इतनी बात सुनते ही सावित्री लज़ा गई और रास्ते पर खड़ी हो कर उसकी ओर देख रही धन्नो और गुलाबी से नज़रें छुपाते हुई दूसरी ओर देखने लगी. मानो कुच्छ जबाव देना नही चाह रही थी. तभी धन्नो सावित्री की एक चुचि को हाथ मे पकड़ते बोली “बोल रीए...बोलती क्यों नही...बोल कैसा रहा लंड का स्वाद...हे हे हे” दूसरे ही पल सावित्री धन्नो के हाथ को अपनी चुचि पर से हटाते कुच्छ गुस्से से नखड़ा करते बोली “धत्त....चाची...चलो..”
धन्नो: “बोल री...कैसा रहा लंड....”
सावित्री: (अपने मुँह को दूसरी ओर फेरते हुए ) “मैं कुच्छ नही जानती...”
गुलाबी: “बुर चीरवा कर लंड खा ली...और अब सब भूल गई...”
सावित्री: “छ्चीए ....मैं नही बोलूँगी...”
धन्नो: “बोल री....कौन दूसरे से बोल रही है...हामी दोनो तो हैं और कौन तीसरा है...”
गुलाबी: “हां और क्या..अब लाज़ कैसा हरजाई...देख कितना मज़ा आया तुझे...”
धन्नो: “अच्च्छा ....बस ये बता दे कि मज़ा आया कि नही”
सावित्री कुच्छ पल के लिए चुप रही फिर मुस्कुरा दी. जिसे देख कर धन्नो बोली “बस ये बता दे मज़ा मिला कि नही ठाकुर साहेब के साथ...”
सावित्री : (मुस्कुराते हुए) “..हूँ..”
गुलाबी: “क्या...?”
सावित्री: “कुच्छ नहीं...”
धन्नो: “आरीए रंडी ....क्या लज़ा रही है मानो ससुर भसुर खड़ा है आगे...बोल दे..कैसा लगा”
सावित्री: “ठीक लगा”
गुलाबी: “क्या ठीक लगा?”
सावित्री: “वही..”
धन्नो: “क्या यही क्या वही....हरजाई बोल ना खोल के...मज़ा आया कि नही..?”
सावित्री: “बोली तो.”
धन्नो: “तो वही खोल के बोल..”
सावित्री: “कह तो रही हूँ...म मज़ा आया...” इतनी बात बोलते हुए सावित्री का बदन सिहर उठा
फिर गुलाबी और धन्नो दोनो रास्ते पर चलने लगीं और सबसे पीछे सावित्री भी चलने लगी. सुनसान खेतों के बीच पतले रास्ते पर चलते हुए आगे बातें करते हुए ...
गुलाबी: “मोटा लगा...”
सावित्री: “हूँ”
धन्नो: “धक्का तो ज़ोर ज़ोर से मार रहे थे.....कैसा लगा...”
सावित्री: (कुच्छ भी नही बोली और पीछे चुप चाप चल रही थी)
गुलाबी: “धक्का पसंद आया...ठाकुर साहेब का..”
सावित्री: “अब मैं कुच्छ नही बोलूँगी...”
धन्नो: “बस ये बता दे कि धक्का पसंद आया कि नही...”
सावित्री: “चलो पसंद आया लेकिन अब चाची कुच्छ मत पुछो....”
धन्नो: “अरी रंडी....इसी सब मे तो मज़ा आता है..”
सावित्री: “किस मे “
गुलाबी: “चोदा चोदि की बात मे...”
धन्नो: “पेला पेली की बात करेगी तो खूब मज़ा आएगा....”
गुलाबी: “इसी लिए तो पुच्छ रही हूँ...और तू लज़ा रही है..”
धन्नो: “देख हम दोनो का, मतलब मेरे और गुलाबी मे सब चलता है ....गरमा गरम बातें “
गुलाबी: “और क्या”
धन्नो: “देख गुलाबी अपने यार सुक्खु से कैसे कैसे चोद्वाती है...सब बताती है...”
गुलाबी: “और ये भी बता दे कि मेरे सामने ही तू भी सुक्खु से गांद उच्छाल उच्छाल के चोद्वाति है....”
धन्नो: “लाज़ कैसा रे...चोद्वाति हूँ तो चोद्वाति हूँ...मैं क्यों लजाउन्गि री.....”
गुलाबी: “अरी तो धन्नो ...ज़रा सुक्खु के लंड के बारे मे इसे बता दे...”
धन्नो: “लंड के बारे मे क्या करेगी सुनकर....अब कोई कुँवारी थोड़ी है ...जब चाहे सुक्खु का लंड मरवा ले अपनी बुर मे....”
सावित्री: “...छ्ची चाची....बस भी करो...”
धन्नो: “बस क्या रे ....यही जवानी की उमर है...खूब लूट ले मज़ा....ससुराल जाते ही बच्चे पैदा करने की मशीन बन जाओगी....”
गुलाबी: “और...चार छे बच्चे बियाने के बाद ......मौका नही मिलेगा चोद्वाने के लिए...”
धन्नो: “और बुर की लासम भी ख़त्म हो जाएगी...जो इस जवानी मे है..”
गुलाबी: “देख आज ठाकुर साहेब कितना चाव से तेरी चुदाई किए ....”
इस तरीके से बाते करती हुई तीनो सुनसान खेतों के बीच वाले रास्ते पर चलते एक छ्होटे से बगीचे के पास पहुँच गईं. जो गुलाबी के गाँव के बाहर कुच्छ ही दूरी पर था. तभी गाँव की ओर से एक 35-36 साल की औरत आ रही थी. लाल साड़ी मे, अच्छी कद काठी, माथे पर बिंदिया, माँग मे सिंदूर और पैर मे एक हवाई चप्पल था. हाथ मे एक खन्चोलि और उस खन्चोलि मे घास काटने वाला खुरपा था. गुलाबी उसे अपनी ओर आते देख धन्नो से धीमी आवाज़ मे बोली “वो देख ....मेरे गाँव के रामदास की औरत है..तीन बज गये ना...चल दी घास काटने...”
धन्नो: “घास काटने...अकेली ही जाती है क्या...”
गुलाबी: “अरे....ये भी नई खिलाड़ी निकल रही है...इसे जाने दे तब कहानी बताती हूँ....”