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घुटनो के मुड़ते ही धन्नो और गुलाबी को सावित्री के दोनो बाँहो को उपर की ओर उठाने मे काफ़ी ज़ोर लगाना पड़ रहा था. और दूसरे ही पल सावित्री वहीं ज़मीन पर बैठ गई. तब धन्नो उसकी बाँह को ज़ोर से उपर की ओर उठाते हुए बोली "चल ......चल ....नही तो घसीट के ले चलूंगी....और यदि नही चली उस कोठरी मे तो इसी आँगन मे ही नंगी कर दूँगी...बोल ...क्या मंजूर है तुझे..." धन्नो यह बोल कर खूब हँसने लगी और गुलाबी भी हंस पड़ी. खाट पर बैठा सुक्खु भी यह सब अपनी आँखों के सामने देख कर हंस रहा. तभी दोनो ने सावित्री को दोनो बाँहो को छ्चोड़ दिया. तब बैठी हुई सावित्री तुरंत दोनो बड़ी बड़ी मांसल चुचिओ को अपनी घुटनो के बीच दबा कर घुटनो को बाहों से घेर ली. हँसी के धीमी ठहाकों के बीच बेबस होकर ज़मीन पर बैठी हुई सावित्री अपनी दोनो बड़ी बड़ी गोल गोल मांसल चुचिओ को घुटनो के बीच दबाए हुए खुद की हँसी रोक नही पा रही थी, और वह भी दबी ज़ुबान हंस रही थी. जिसे देख कर तीनो उसे और चिडाना चाह रहे थे. फिर धन्नो अपनी हँसी रोकते बोली "आज देख कि तेरे साथ क्या क्या होता है....आज तू या तो लज़ाएगी या ....मज़े लेगी ....हरजाई...आज देखु कि तेरी लाज़ कैसे नही जाती है..." तब गुलाबी हंसते बोली "देखो...तुम्हारे और हम सभी के बीच का जो झगड़ा है वो यही कि तू बहुत लज़ाति है....क्यों.." गुलाबी के इस स्वाल से धन्नो तुरंत सहमत होते बोली "हां और क्या....ये ऐसे लज़ाति है कि मानो ये इज़्ज़त वाली है और हम सब इज़्ज़त वाले नही हैं...मानो कोई छिनार हरजाई हैं..." तब गुलाबी आगे बोली "देख जैसे तुझे अपनी इज़्ज़त की चिंता और फिकर है वैसे हर औरत को अपनी इज़्ज़त और अस्मत की चिंता होती है...और वैसे मुझे और इस धन्नो को भी तो चिंता होती है....क्यों सही कहा कि नही." तब धन्नो बोली "हां और क्या ...हम सभी को भी तो इस गाँव और समाज मे और परिवार रिश्तेदार के बीच रहना है...तो इज़्ज़त का ख्याल तो रखना ही पड़ेगा ..." फिर गुलाबी बोली "...हम सभी आपस मे जो हँसी मज़ाक और शरारत करते हैं ....वो कोई बेइज़्ज़त या ऐसा ग़लत थोड़ी है जो तू समझती है...हरजाई...आरीए इतना तो कम ज़्यादा सभी करते हैं..." फिर धन्नो बोली "वही तो इस हरजाई को समझा रही हूँ ....ना जाने कितने दिनो से...इस आपस मे ये सब चलता है...इसमे इतना लज़ाने शरमाने वाली बात नही है...लेकिन इस हरजाई के अंदर की लाज़ सारा मज़ा किरकिरा कर देती है..." तब गुलाबी बोली "हां तो आज फ़ैसला तो ही जाय कि ....ये आपस मे लज़ाएगी...या अपनी बुर बुर खोल के दिखाएगी..." गुलाबी के इस बात को धन्नो एक शर्त मे बदलते बोली "हां तू सही कह रही है...या तो ये खुद अपनी बुर को खोल के हम तीनो को दीखाएगी ...या लज़ाएगी और बुर नही दीखाएगी तो इसकी बुर की लंड से पिटाई की जायागी...बोलो क्या मंजूर है..."ज़मीन पर बैठी हुई सावित्री ऐसी बात सुनकर अपनी नज़रें धन्नो और गुलाबी की ओर बारी बारी की और फिर मुस्कुराते हुए अपनी नज़रें वापस ज़मीन मे गढ़ा ली. ऐसा देख कर धन्नो बोली "अब बोल ...चुप क्यों है...यदि नही मंजूर है तो हम दोनो तुझे इस कोठरी मे ले जा कर इनसे जबर्दाश्ती चुद्वा देंगे....नही तो खुद अपने हाथों से सलवार खोल के हम तीनो को अपनी बुर दिखा दो. तब गुलाबी बोली "हम दोनो तो औरतें हैं....सो औरत को औरत की बुर देखने से क्या होगा....हां तुम इन्हे दीखा दो..." सुक्खु इस बात से काफ़ी खुश हुआ और हंस कर बोला "हां ....ये तो ठीक है...चलो दीखा दो...आपस मे कैसा लाज़...हम सब आपस मे कोई लाज़ शरम नही करते....चलो दीखा दो.." इतनी बात ख़त्म होते ही सुक्खु अपने लंड को दुबारा लूँगी के उपर से मसल दिया. तब धन्नो बोली "देख हरजाई ...तू यदि मानेगी नही तो आज तुझे मोटे लंड से पिटवा दूँगी...नही तो आराम से अपनी बुर दीखा दे..." फिर धन्नो हँसने लगी. धन्नो की इस बात को सुनकर सावित्री भी लज़ा गई और उसी मुद्रा मे बैठी हुई अपनी नज़रें वैसे ही ज़मीन मे धँसाए हुए मुस्कुरा रही थी. फिर गुलाबी बोली "...अरी लंड से पीटने की कोई ज़रूरत नही है...ये खुद दिखा देगी.." तब धन्नो बोली "तुम नही जानती हो इस हरजाई को...ये बहुत हराम्जादि है...इतनी आसानी से ये मानने वाली नही है...इसे लंड से पीटना ही पड़ेगा.." तब गुलाबी हंसते हुए बोली "....क्यों सावित्री ....लंड से पिटेगी ....और नही पिटना है तो बस सलवार खोल और बुर दिखा दे...यहाँ कोई और थोड़ी है...हम तीनो के सिवाय और आँगन का दरवाजा भी बंद है, किसी के आने का भी डर नही है...चल दिखा दे.." लेकिन सावित्री वैसे ही बैठी रही और कुच्छ भी बोली नही बल्कि मंद मंद मुस्कुरा रही थी. उसका कलेज़ा धक धक कर रहा था. लाज़ से मानो उसकी बुर मे से मूत निकल जाए. तभी गुलाबी बोली "तू यदि आँगन मे नही दिखा पाएगी तो चल उस कोठरी मे दिखा दे...एक पल का तो काम है बुर दिखाना..." तब धन्नो हंस कर बोली "और क्या...एक पल का काम और इतने देर से मिन्नत करवा रही है..." तब गुलाबी बोली "अच्छा चलो ..आँगन मे नही तो उस कोठरी मे तो दिखा देगी ना....तो चलो उस कोठरी मे..." इतना कह कर गुलाबी सावित्री की एक बाँह कस के पकड़ी और उपर की ओर उठाई. लेकिन सावित्री मानो उठना नही चाह रही थी. वह वैसे ही बैठी रही. तब धन्नो ने दूसरी बाँह पकड़ कर ज़ोर लगा कर उठाई तो सावित्री खड़ी हो गयी और उसकी दोनो गोल गोल मांसल भारी भरकम चुचियाँ सुक्खु के सामने समीज़ के अंदर उभर कर खड़ी हो गईं. सुक्खु उसे देख कर एक बार फिर अपने लंड को लूँगी के उपर से मसल दिया. लंड मे हल्की सी मस्ती की लहर दौड़ गई. फिर धन्नो बोली "चल कोठरी मे ही ....भला वहीं तो दिखा....कैसे भी दिखा .....आज तू अपनी बुर खुद ही खोल कर दिखा....." और इसी के साथ दोनो की ओर सावित्री रुनवँसे आवाज़ मे हँसती बोली "च चाची ....हाथ जोड़ती हूँ...मुझे मत परेशान करो..." तब गुलाबी बोली "....इसमे कौन सी परेशानी है रीए...बस सलवार खोल कर बुर ही दिखाने की शर्त तो है...चल कोठरी मे और बुर दिखा दो....हम सब तुझे कुच्छ नही बोलेंगे..." और दोनो सावित्री को धकेलते हुए कोठरी मे ले कर चली आईं. कोठरी का दरवाजा आँगन मे खुला हुया था. इस वजह से उस छ्होटी कोठरी मे दरवाजे से पूरी रोशनी आ रही थी. कोठरी मे एक चारपाई बिछि थी और उसपर एक पुराना बिस्तर लगा था. उस चारपाई के बगल मे कोठरी के दीवाल मे एक छ्होटा सा ताखा बना था जिसमे एक छ्होटी सी कटोरी मे तेल रखा था. उस कटोरी के बगल मे एक शराब की खाली पाऔच रखी थी. कुच्छ बिंदी और एक दियासलाई भी उस तखे पर रखी थी. गुलाबी के घर मे इस कोठरी के अंदर भी एक और दरवाजा लगा था और ये दरवाजा अंदर वाली कोठरी का था जिसमे दिन के वक्त भी काफ़ी अंधेरा था. फिर उस चारपाई के पास सावित्री को खड़ा करके दोनो ने बाँहें छ्चोड़ दी और फिर धन्नो हंसते हुए बोली "चल अब बता कि बुर दिखाएगी ....या तुझे चुद्वा दूं...." गुलाबी बोली "अब तो तू कोठरी मे आ गई है..अब क्यों डर रही है....बुर दिखाने मे..." सावित्री कुच्छ भी नही बोली तब धन्नो बोली "ये ऐसे नही राज़ी होगी .....बुलाओ और इस कटोरी का तेल इसकी बुर मे उडेल कर चोद्वा दो....तब इसकी लाज़ निकल जाएगी..हरजाई...की..." तब गुलाबी बोली "...आरीए तू ग़लत सोचती है...ये प्यारी बिटिया ज़िद नही करेगी और ...अपनी बुर खोल के दिखा देगी...बोलो..." तब सावित्री हंस कर मुँह लटकाए बोली "चाची....ऊवू क्या बताउ..." तब गुलाबी बोली "अरी इसमे बताने वाली क्या बात है....अपनी सलवार खोलो और बुर दिखा दो.." तब सावित्री बोली " ल लेकिन.." तब धन्नो बोली "अरी...मैं तो कहती हूँ इसे चोद्वा दो...इस हरजाई को.." तब गुलाबी बोली "नही...ये बुर दिखाएगी....खुद दिखाएगी....क्यों...सावित्री ...." तब सावित्री चुप कुच्छ पल के लिए चुप रही. तब गुलाबी बोली "देख..तू समझने की कोशिस कर....आपस मे ये कोई ग़लत नही होता है री...ये आपस की रज़ामंदी वाली बात होती है..." गुलाबी सावित्री के बगल मे खड़ी हो कर उसके कंधे पर एक हाथ रख कर समझाते हुए आगे बोली "यदि रज़ामंदी हो तो कोई बात ग़लत नही होती...और पर्दे के आड़ मे दुनिया ना जाने क्या क्या करती है....तू अभी पूरी अनाड़ी है जो इतना लज़ाति और शरमाती है..." अपनी बात आगे बढ़ाते हुए सावित्री के कान के पास धीमी आवाज़ मे बोली "जैसी दुनिया तू देखती है वैसी दुनिया सच्चाई मे नही है...दुनिया की सच्चाई जानेगी तो तुझे यकीन नही होगा.." सावित्री अपने चेहरे को लटकाए चुपचाप सुन रही थी.
क्रमशः………………………………………..
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