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संघर्ष

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धन्नो के मुह से इतनी लम्बी बात ख़त्म होते ही गुलाबी बोली :-" सच ही तो समझाया था ठाकुर साहब ने !"

तब धन्नो बोली :-" फिर ठाकुर साहब बोले चलो अब में तुम्हे गैर मर्द का मतलब भी समझा दूँ … देखो गैर मर्द का मतलब हे

कि असली मर्द … असली मर्द उसे कहते हे जो किसी दूसरे कि बीबी को चोरी से चोद उसे रगड़ दे … अब सवाल ये हे कि क्यों किसी कि बीबी

दूसरे मर्द से चुदेगी … तो जबाब ये हे कि जब कोई ओरत किसी दूसरे मर्द से चुदवाने के लिए उसे तलाशती हे या चुनती हे तो ये देखती हे कि

वो उसके पति से ज्यादा ताकतवर हो जयादा पैसे वाला हो खूब चोदने में माहिर हो और उसके पति को काबू कर सकता हे या उसके पति को दबा

सकता हो … और इसी लिए कभी गैर मर्द को चुनो तो ये बात जर्रोर सोच कर चुनो कि वो उसके पति से ज्यादा ताकतवर हो

और उसकी धोंस से उसके पति कि गांड फट जाये … या तो पति तलाक दे कर भाग जायेगा … या पत्नी बिना तलाक दिए ही उस मर्द के साथ रहने

लगे या पति भीगी बिल्ली बन जायेगा और पत्नी जो चाहेगी वो करेगी .... और पति चुपचाप अपनी पत्नी को अपने सामने टाँगे उठा उठा कर

गैर मर्द से चुद्ता देखे और अपना लंड सहला सहला खड़ा करे और उसे हिला हिला पानी निकाले और पूरा भडुआ बन जाये …

और फिर राजी राजी अपनी बीबी को दूसरों से चुदवाये और खुद तमाशा देखे … फिर ठाकुर साहब मुझ से पूछे कि समझ में सारी बात आई कि

नहीं आई … जब तू समझ जायेगी तो दूसरे मर्द के सामने टांग उठाने में तू पाप नहीं मानेगी और तुझे उस बात का पश्चाताप नहीं होगा …

फिर ठाकुर साहब मुज से पूछे समझ गई कि … कोई शक़ हे … बोलो … इतना पूछे तब में लजा गई पर जब दुबारा पूछी तब मेने

अपनी गर्दन हाँ में हिला दी !" सुक्खू और सावत्री पूरा गौर से सुन रहे थे !

फिर सुक्खू बोला :-" अब आगे भी बताओ धन्नो भौजी बड़ा मजा आ रहा हे .... ठाकुर साहब बड़ी समझदारी वाली बात

बताये थे .... !"

यह सुनकर गुलाबी बोली :-" और क्या … ठाकुर साहब के दिमाग के सामने सब गांव कि चालाकी फ़ैल हो जाती हे .... "

फिर गुलाबी सावत्री कि तरफ इशारा करते हुए बोली :-" … ये छोकरी .... तू भी ध्यान से सुन ठाकुर साहब ने केसे केसे समझाई थी …

दुनिया और समाज कि सच्चाई तू भी जान ले …बड़ा काम आएगी जिंदगी में … और तेरी भी जिंदगी बड़े मजे में हो जायेगी … "

तब सुक्खू बोला :-" तो भौजी आगे कि बात तो करो …!"

तब धन्नो बोली :-" देखो अब मुझे गांव जाना हे …… देर हो जायेगी …फिर दूसरे दिन बातें कर दूंगी …। "

तब सुक्खू बोला :-"अरे भौजी अभी तो शाम होने में काफी समय हे ……… तब तक तुम कहानी भी पूरा कर लोगी …

और आराम से अपने गांव भी चली जाओगी …आज इसे पूरा कर दो बड़ा मजा आ रहा हे !"

कहते कहते सुक्खू लुंगी के ऊपर से अपना लौड़ा मसलने लगा !

सुक्खू के हाथ कि हरकत को देख कर धन्नो बोली :-" चलो तो बता ही देती हु .... ठाकुर साहब मुझे पूरी तरह से समझाने के बाद

गुलाबी से बोले ;-"इसे तेल कि कटोरी देदो …और तुम जाओ अपना खेत में काम करो .... और ये मेरे भूखे शेर को तेल

से तर करके मालिश करेगी …ये भी साला चार पांच दिन से बूर नहीं पाया हे …बड़ी हरकत भी कर रहा हे …… बिल में घुसने को …

तेल से मालिश करवा कर में इसकी टांग उठा दू आज …साला इसका पति निकम्मा हे आज उसे भी सबक मिल जाये ....

इतना सुनते ही मेरा कलेजा धक् धक् करने लगा .... गुलाबी उठी और उस कोठरी के कोने में छुपा कर राखी एक कटोरी उठा लाई …

जिसमे तेल भरा था .... में उस कटोरी और उसमे भरे तेल को देख कर ही सहम गई … और तभी घूँघट कि ओट से चौकी पर

लेट चुके ठाकुर साहब को देखा तो डर कि सीमा भी नहीं रही .... ठाकुर साहब अपनी धोती को अपनी कमर पर चढ़ा चुके थे …

और उनका सोया हुआ मोटा काला लंड और इर्द गिर्द उगे घनी झांटो में चमक रहा था … जैसे कोई मोटा मरा हुआ चूहा पड़ा हो ....

और जैसे ही मुस्कुराती गुलाबी मेरे सामने तेल कि कटोरी रख कर कोठरी से बाहर जाने लगी … तो में भी उसके पीछे पीछे चल दी …

तब ठाकुर साहब हम दोनों को रोक लिए और बोले :-"देख गुलाबी ये डर रही हे .... आज इसका पहला दिन हे .... इसलिए तू भी

कोठरी में रह .... और इसे बता दे कि केसे मजा लेना हे .... वेसे तो ये खुद दो बच्चे पैदा कर चुकी हे … लेकिन लंड

पर तेल मालिश करने का हूनर तो शायद ही आता होगा इसे .... क्यूंकि पता नहीं किसी के लंड पर तेल मालिश कि हे या नहीं …

फिर गुलाबी मुझे धकेल कर चौकी पर चढ़ा दी !" फिर धन्नो चुप हो गई !

तब सुक्खू मानो व्याकुल हो कर बोला :-" अरे धन्नो भौजी चुप क्यों हो गई … "

तब धन्नो बोली :-" अब में कुछ नहीं बताउंगी मुझे बड़ी लाज लग रही हे !"

तब गुलाबी बोली :-" चल … तो में ही बता देती हु आगे का किस्सा … !"

फिर सुक्खू और सावत्री दोनों ही गुलाबी के मुह कि तरफ देखने लगे !

फिर गुलाबी एक गहरी सांस लेते हुए कहानी को आगे बढ़ाते हुए बोली :-"जब में ये हरजाई को धकेल कर चौकी पर चढ़ाई तो

ये पूरी तरह से घूंघट में थी … और इसकी एक कलाई पकड़ कर ठाकुर साहब इसे चौकी पर बैठाने लगे .... और ये चौकी पर

पूरा घूँघट किये साडी में लिपटी हुई सिमट कर बेठ गई … फिर ठाकुर साहब बोले …गुलाबी इसे कटोरी का तेल थमा दे …

चल धन्नो अब इस पर तेल लगा .... और इसे खड़ा कर … फिर तो ये घूंघट में ही चौकी पर सिमटी बेठी रही … और ठाकुर साहब इसकी

एक हाथ कि कलाई को पकडे रहे … और ठाकुर साहब चौकी पर लेटे रहे !"

गुलाबी के मुह से ऐसी पुराणी कहानी को सुनकर मानो धन्नो को अपना अतीत याद आने लगा , लगा जैसे उसके सामने सब

सपने में दिख रहा हो मानो सब कुछ पिछले दिन कि ही घटना हो !
 


फिर लाज से धन्नो अपने मुह को धक् लिया और गुलाबी के मुह से अपनी गैर मर्द से हुई पहली चुदाई कि कहानी को सुनते सुनते अतीत

में खो गई … ! अपने अत्तीत में जाते ही धन्नो के सामने सारी घटनाये मानो किसी चलचित्र कि तरह चलने लगी !

जब गुलाबी उस दिन कि घटनाये सावत्री और सुक्खू को सुनाने लगी तो धन्नो भी जैसे बेसुध हो कर अपने अतीत में खो गई !

जो इस प्रकार हे …… ठाकुर साहब चौकी पर लेटे धन्नो कि कलाई पकड़ उसे बैठाये रहे और दूसरे हाथ से अपने लंड को

सहलाने लगे और बोले :-" तेरे घर में कौन कौन हे … !"

तब धन्नो अपने घूंघट में कुछ देर बाद बोली :-" .... ब … बाबूजी …वो मेरी सास हे … और मेरे दो बच्चे हे …!"

फिर ठाकुर साहब अपने ढीले और लुजलुजे लंड कि सुपाड़े कि चमड़ी को हल्का सा पीछे किये और

उनका सुपाड़ा बाहर आ गया .... फिर उस चमड़ी को फिर से सुपाड़े पर उसी तरह चढ़ा दिए और बोले :-" तो तेरी सास

अपने बेटे कि तरफ रहती हे … उसी कि शाह लेती हे .... या तेरी तरफ रहती हे … तेरी शह लेती हे … "

एक पल बाद धन्नो बोली :-" .... न .... नहीं बाबूजी … वो अपने बेटे कि ही शह लेती हे … उसको गलती नहीं देती … बाबू जी

मुझे ही दोषी मानती हे .... !"

तब ठाकुर साहब बोले :-" चल इसे अपने हाथ में थाम … इस पर तेल लगा … इसकी मालिश कर और बातें भी कर … "

इतना कह कर धन्नो के हाथ को अपने लुजलुजे लंड पर रख दिया !

धन्नो का हाथ जैसे ही ठाकुर साहब के मरे हुए मोटे चूहे जैसे लुजलुजे लंड पर पड़ा कि धन्नो चौकी से खड़ी हो गई मानो

वो वह से भाग जाना चाहती हो !

ऐसा देख कर ठाकुर साहब उसकी कलाई को कस कर दबोचे रखे और खुद चौकी पर उठ कर बेठ गए और बोले :-" अरे …

क्या हुआ री … काहे को चौकी पर से उतर गई .... आ चल बेठ जा … डर मत …तेल लगा … और आगे कि बातें बता …

तू तो ऐसे डर रही हे मानो लंड नहीं कोई काला नाग को छु लिया हो …तू केसे दो दो बच्चे पैदा कर ली … जो लंड से इतना डर रही हे …

{ अब ठाकुर साहब को कोण बताये कि उसके पति का तो उनके लंड से आधा ही था } लंड से इतना क्या दरी हे … चल आ बेठ … !"

इतना कहते हुए ठाकुर साहब उसकी एक कलाई को दबोचे और हुए और एक हाथ से उसकी पतली कमर को पकड़ कर चौकी कि

तरफ जबर्दस्ती खींचेते हुए मानो उसे वह बैठने को मजबूर कर दिए !

धन्नो अपने दोनों पैरो को चौकी के किनारे से नीचे कर ली और उन्हें लटका कर चौकी पर बेठ गई !

और दूसरे ही पल ठाकुर साहब उसके हाथ को दुबारा खींच कर अपने लंड पर रखे और खुद चौकी पर फिर से लेट गए !

धन्नो इस बार तो बस कसमसा कर रह गई !

ठाकुर साहब धन्नो के हाथ कि हथेली को अपने लंड पर हौले हौले रगड़ते हुए पूछने लगे :-" तो तेरी सास अपने बेटे को बेकसूर

मानती हे … क्यूँ … !"ये सुनकर धन्नो धीमे से बोली :-"जी "

ठाकुर साहब फिर अपने लंड को धन्नो कि हथेली से रगड़ते हुए बोले :-" तो तेरी सास भी कमीनी हे … मादरचोद .... गली में किसी चुदवा

कर उसने ऐसी ओलाद पैदा कि हे … तभी तो उसे अपने बेटे का निकम्मापन दिख नहीं रहा हे … उसकी चूत में लंड के धक्के मारु …

उसकी गांड में लौड़ा डाल कर साली कि फाड़ डालूं … " ठाकुर साहब धन्नो के हाथ को अपने लंड से रगड़ते रगड़ते उसके पति और सास को

ऐसी ही गन्दी गन्दी गलियां देते रहे और इधर उनके लंड में फुलाव आना शुरू हो गया !

लंड अपनी मोटाई में आना शुरू हुआ तो धन्नो को महसूस हुआ कि लंड काफी भारी हो गया हे !

तब ठाकुर साहब बोले :-" चल … अब ये भी तैयार होने लगा हे … तेरी हाथ कि हथेली तो बड़ी नरम और गुदाज हे री … चल

अब अपने नरम नरम हाथों से इसे तेल लगाना शुरू कर दे … !" फिर बगल में खडी गुलाबी उसे कटोरी का तेल देने लगी !

धन्नो ने उस तेल कि कटोरी को नहीं थामी तो गुलाबी ने चुपचाप वो कटोरी चौकी पर रख दी !

तब तक ठाकुर साहब बोल पड़े :-" चल … तेल लगाना शुरू कर … तेरा ससुर क्या करता हे !"

तब धन्नो ने अपनी दो अंगुलिया तेल कि कटोरी में डुबो दी और घूंघट कि ओट से धीमे से वो तेल से भरी अंगुलिया ठाकुर साहब के लंड

से लगाती हुई बोली :-' जी … बाबूजी … ससुर कभी के गुजर गए हे … "और लंड पर तेल लगते ही लंड एकदम से चमकने लगा !

फिर ठाकुर साहब बोले :-" ओह तो तेरी सास रांड हे … विधवा हे … !"

लंड पर और कटोरी से तेल लगते हुए धन्नो धीमे से बोली :-" हाँ बाबूजी "

फिर ठाकुर साहब एक पल के लिए सोच में पद गए और फिर बोले :-" चरित्र केसा हे तेरी सास का … कुछ तो बता !"

फिर धन्नो लंड को घूंघट कि ओट से देखते और उस पर तेल लगाते हुए कुछ चिढ कर बोली :-"जी बाबूजी केसे कहु … वो तो मुझे ही चरित्रहीन

और छिनाल कहती हे … जब कि वो खुद ही ऐसी हे … !"

तब ठाकुर साहब लेटे लेटे ही धन्नो के घूंघट कि तरफ देखते हुए बोले :-" क्या हुआ कुछ तो बता तेरी सास का नाम लेते ही तुझे गुस्सा आ गया

ठीक से बता !"

तब धन्नो कटोरी से तेल अपनी हथेली में भर कर ठाकुर साहब के पुरे लंड पर तेल कि मालिश करती हुई धीमे से बोली :-" क्या बताऊ बाबू जी ....

वो बहुत हरामजादी हे … वो मेरी सास नहीं मेरी दुश्मन हे … उसकी करतूते सुनेंगे तो आप कहोगे कि में केसे उसके साथ

उसके घर में रह रही हु … मेरा जी करता हे कभी कभी कि कुए में कूद कर जान देदु !"

धन्नो के गुस्से को देख कर ठाकुर साहब समझ गए कि इसका अपनी सास से बहुत खटपट हे !

और जब से उसकी सास का जिक्र आया हे तब से उसे बहुत गुस्सा आ गया हे और अब वो उनके लंड को बहुत काश कर पकड़ रही हे

और पुरे लंड को अपनी दोनों हथेलियों कि सम्लित मुट्ठियों में पकड़ कर जोर जोर से तेल लगा कर मालिश कर रही हे … !

कोठरी में धन्नो कि कलाइयों कि लाल सुर्ख चुडिया अब खन खन कि आवाज़ कर रही थी !

और लंड भी अब पूरी तरह से खड़ा हो गया था उसका लाल टमाटर जैसा सुपाड़ा चमक रहा था और पूरी तरह से तना हुआ

वो कोठरी कि छत कि और देख रहा था !

लंड अपनी पूरी मोटाई में आ गया था ! वो पूरा ठोस लग रहा था ! किसी मोटे लोहे कि राड जैसा हो गया था और अब धन्नो कि

हथेली में नहीं समां रहा था उसकी हथेलियो से फिसल कर उछाल मार रहा था !

धन्नो जबर्दस्ती तेल से भरे हुए अपने नरम हाथो से उस पर ऊपर नीचे फेर रही थी और ठाकुर साहब को उसकी नरम हथेली

किसी कसी हुई बूर जैसी लग रही थी !उन्हें लग रहा था उनका लंड किसी कसी हुई बूर में ऊपर नीचे हो रहा हो !

तब ठाकुर साहब बोले :-" तेरी सास तुझे क्या कहती हे … जो तू उस पर इतना गुस्सा कर रही हे … !"

इतना कहना था कि धन्नो ठाकुर साहब के लंड पर तेज तेज हाथ चलते हुए बोली :-" क्या नहीं कहती हे बाबूजी … छिनाल … वेश्या …

हरजाई कहती हे … मेरा नाम मेरे पति के कुछ दोस्तों के साथ जोड़ कर मुझे झूठा बदनाम करती हे … कहती हे में उन सब से फंसी हूँ !"

ठाकुर साहब को पता था कि जब एक ओरत किसी दूसरी ओरत पर गुस्सा करती हे तो उसका मिजाज कुछ ऐसा ही होता हे !

फिर ठाकुर साहब उसकी सास को गाली देते हुए बोले :-" उसकी बूर को चोदुं … उसका भोसड़ा फाडू उसकी गांड मारूं … वो साली खुद गांव में

अपनी चूत में लंड पेलवाती होगी .... साली लण्डखोर नहीं होती तो अपनी बहु पतोहू को बदनाम नहीं करती !"

 


ठाकुर साहब का इतना कहना था कि धन्नो दोनों हाथों से लंड को मजबूती से थाम कर उसकी कस कस कर मालिश करती हुई बोली :-" हा

बाबूजी … वो खुद हरजाई हे … बुड्ढी हो गई पर उसकी जवानी नहीं गई … बस सफ़ेद साडी पहनती हे …दिखाने के लिए …

नहीं तो उसकी करतूते किसी रंडी से कम नहीं बाबूजी … !"

घूंघट में धन्नो बोली तो ठाकुर साहब उसके घूंघट कि तरफ देखते हुए बोले :-" तो तुम केसे जानती हो … कभी उसे देखि हो क्या …

तब धन्नो बोली :-" हा बाबूजी "

तब ठाकुर साहब बोले :-" तब जब तेरी सास तुझे बदनाम करती हे तो तू उसे उसके करतूत क्यों नहीं बता देती …

फिर धन्नो तिलमिला कर लंड को कस के मसलते हुए बोली :-" में क्यों चुप रहूंगी बाबूजी … में तो उसे उसी वक़्त सुना देती हु रंडी कामिनी को

तू अपनी सोच फिर मुझे कह .... !"

तब ठाकुर साहब बोले :-" सही किया पर उसे खुल कर बोला कर तू चुदक्कड़ हे …रंडी हे … लण्डखोर हे …बुरचोदी हे … गांव कि ओरत हे

जब तक उसे तू खुल कर ऐसी बातें नहीं कहेगी उस पर असर नहीं होगा !"

तब धन्नो बोली :-" हाँ बाबूजी … गुस्से में तो ऐसे बोल ही जाती हु क्या करू … वो हे ही ऐसी भला कोई बहु अपनी सास को

ऐसे बोलती हे पर में क्या करू । "

तब ठाकुर साहब धन्नो कि जांघ को साड़ी के ऊपर से दबाते और सहलाते हुए बोले :-" जब सास ऐसी चुदक्कड़ हो तो बहु क्या कर सकती हे …

तू उस रंडी को खूब गालीया दिया कर … तब उस घर में तेरी भी धौंस रहेगी … नहीं तो किसी दिन तेरी जान भी ले लेगी तेरी सास …

या तेरा पति .... इसलिए घर में धौंस बनाया रख कर !"

धन्नो साडी के ऊपर से अपनी जांघ पर ठाकुर साहब का हाथ पा कर सनसना गई !

उसके हाथ में ठाकुर साहब का गरम लंड था !

धन्नो कि बूर में चीटियां रेंगने लगी !

धन्नो ने उस तेल कि कटोरी को नहीं थामी तो गुलाबी ने चुपचाप वो कटोरी चौकी पर रख दी !

तब तक ठाकुर साहब बोल पड़े :-" चल … तेल लगाना शुरू कर … तेरा ससुर क्या करता हे !"

तब धन्नो ने अपनी दो अंगुलिया तेल कि कटोरी में डुबो दी और घूंघट कि ओट से धीमे से वो तेल से भरी अंगुलिया ठाकुर साहब के लंड

से लगाती हुई बोली :-' जी … बाबूजी … ससुर कभी के गुजर गए हे … "और लंड पर तेल लगते ही लंड एकदम से चमकने लगा !

फिर ठाकुर साहब बोले :-" ओह तो तेरी सास रांड हे … विधवा हे … !"

लंड पर और कटोरी से तेल लगते हुए धन्नो धीमे से बोली :-" हाँ बाबूजी "

फिर ठाकुर साहब एक पल के लिए सोच में पद गए और फिर बोले :-" चरित्र केसा हे तेरी सास का … कुछ तो बता !"

फिर धन्नो लंड को घूंघट कि ओट से देखते और उस पर तेल लगाते हुए कुछ चिढ कर बोली :-"जी बाबूजी केसे कहु … वो तो मुझे ही चरित्रहीन

और छिनाल कहती हे … जब कि वो खुद ही ऐसी हे … !"

तब ठाकुर साहब लेटे लेटे ही धन्नो के घूंघट कि तरफ देखते हुए बोले :-" क्या हुआ कुछ तो बता तेरी सास का नाम लेते ही तुझे गुस्सा आ गया

ठीक से बता !"

तब धन्नो कटोरी से तेल अपनी हथेली में भर कर ठाकुर साहब के पुरे लंड पर तेल कि मालिश करती हुई धीमे से बोली :-" क्या बताऊ बाबू जी ....

वो बहुत हरामजादी हे … वो मेरी सास नहीं मेरी दुश्मन हे … उसकी करतूते सुनेंगे तो आप कहोगे कि में केसे उसके साथ

उसके घर में रह रही हु … मेरा जी करता हे कभी कभी कि कुए में कूद कर जान देदु !"

धन्नो के गुस्से को देख कर ठाकुर साहब समझ गए कि इसका अपनी सास से बहुत खटपट हे !

और जब से उसकी सास का जिक्र आया हे तब से उसे बहुत गुस्सा आ गया हे और अब वो उनके लंड को बहुत काश कर पकड़ रही हे

और पुरे लंड को अपनी दोनों हथेलियों कि सम्लित मुट्ठियों में पकड़ कर जोर जोर से तेल लगा कर मालिश कर रही हे … !

कोठरी में धन्नो कि कलाइयों कि लाल सुर्ख चुडिया अब खन खन कि आवाज़ कर रही थी !

और लंड भी अब पूरी तरह से खड़ा हो गया था उसका लाल टमाटर जैसा सुपाड़ा चमक रहा था और पूरी तरह से तना हुआ

वो कोठरी कि छत कि और देख रहा था !

लंड अपनी पूरी मोटाई में आ गया था ! वो पूरा ठोस लग रहा था ! किसी मोटे लोहे कि राड जैसा हो गया था और अब धन्नो कि

हथेली में नहीं समां रहा था उसकी हथेलियो से फिसल कर उछाल मार रहा था !

धन्नो जबर्दस्ती तेल से भरे हुए अपने नरम हाथो से उस पर ऊपर नीचे फेर रही थी और ठाकुर साहब को उसकी नरम हथेली

किसी कसी हुई बूर जैसी लग रही थी !उन्हें लग रहा था उनका लंड किसी कसी हुई बूर में ऊपर नीचे हो रहा हो !

तब ठाकुर साहब बोले :-" तेरी सास तुझे क्या कहती हे … जो तू उस पर इतना गुस्सा कर रही हे … !"

इतना कहना था कि धन्नो ठाकुर साहब के लंड पर तेज तेज हाथ चलते हुए बोली :-" क्या नहीं कहती हे बाबूजी … छिनाल … वेश्या …

हरजाई कहती हे … मेरा नाम मेरे पति के कुछ दोस्तों के साथ जोड़ कर मुझे झूठा बदनाम करती हे … कहती हे में उन सब से फंसी हूँ !"

ठाकुर साहब को पता था कि जब एक ओरत किसी दूसरी ओरत पर गुस्सा करती हे तो उसका मिजाज कुछ ऐसा ही होता हे !

फिर ठाकुर साहब उसकी सास को गाली देते हुए बोले :-" उसकी बूर को चोदुं … उसका भोसड़ा फाडू उसकी गांड मारूं … वो साली खुद गांव में

अपनी चूत में लंड पेलवाती होगी .... साली लण्डखोर नहीं होती तो अपनी बहु पतोहू को बदनाम नहीं करती !"

ठाकुर साहब का इतना कहना था कि धन्नो दोनों हाथों से लंड को मजबूती से थाम कर उसकी कस कस कर मालिश करती हुई बोली :-" हा

बाबूजी … वो खुद हरजाई हे … बुड्ढी हो गई पर उसकी जवानी नहीं गई … बस सफ़ेद साडी पहनती हे …दिखाने के लिए …

नहीं तो उसकी करतूते किसी रंडी से कम नहीं बाबूजी … !"

घूंघट में धन्नो बोली तो ठाकुर साहब उसके घूंघट कि तरफ देखते हुए बोले :-" तो तुम केसे जानती हो … कभी उसे देखि हो क्या …

तब धन्नो बोली :-" हा बाबूजी "

तब ठाकुर साहब बोले :-" तब जब तेरी सास तुझे बदनाम करती हे तो तू उसे उसके करतूत क्यों नहीं बता देती …

फिर धन्नो तिलमिला कर लंड को कस के मसलते हुए बोली :-" में क्यों चुप रहूंगी बाबूजी … में तो उसे उसी वक़्त सुना देती हु रंडी कामिनी को

तू अपनी सोच फिर मुझे कह .... !"

तब ठाकुर साहब बोले :-" सही किया पर उसे खुल कर बोला कर तू चुदक्कड़ हे …रंडी हे … लण्डखोर हे …बुरचोदी हे … गांव कि ओरत हे

जब तक उसे तू खुल कर ऐसी बातें नहीं कहेगी उस पर असर नहीं होगा !"

तब धन्नो बोली :-" हाँ बाबूजी … गुस्से में तो ऐसे बोल ही जाती हु क्या करू … वो हे ही ऐसी भला कोई बहु अपनी सास को

ऐसे बोलती हे पर में क्या करू । "

तब ठाकुर साहब धन्नो कि जांघ को साड़ी के ऊपर से दबाते और सहलाते हुए बोले :-" जब सास ऐसी चुदक्कड़ हो तो बहु क्या कर सकती हे …

तू उस रंडी को खूब गालीया दिया कर … तब उस घर में तेरी भी धौंस रहेगी … नहीं तो किसी दिन तेरी जान भी ले लेगी तेरी सास …

या तेरा पति .... इसलिए घर में धौंस बनाया रख कर !"

धन्नो साडी के ऊपर से अपनी जांघ पर ठाकुर साहब का हाथ पा कर सनसना गई !

उसके हाथ में ठाकुर साहब का गरम लंड था !

धन्नो कि बूर में चीटियां रेंगने लगी !

वो लंड पर तेल भी लगा रही थी उसे अब गौर से देख भी रही थी !

इतना बड़ा उसने लंड कभी नहीं देखा था !

अब उसका मन कर रहा था कि ठाकुर साहब उसकी बूर में लंड फंसा कर उसे चोद दे .... पिछले आठ दस महीनो से वो नहीं चुदी थी !

अब धन्नो कि बूर अंदर ही अंदर पानी छोड़ रही थी और उसकी बूर बूरी तरह से चिपचिपा उठी थी !

गुलाबी बगल में कड़ी सब देख रही थी उसकी बूर भी चिपचिपा उठी थी वो भी हलके हलके सिसक रही थी !

फिर ठाकुर साहब बोले :-" तेल पी कर अब लंड तो पूरा तैयार हो गया हे .... इसका सुपाड़ा अब किस लाल टमाटर कि

तरह चमक रहा हे … अब देर मत कर … खड़ी हो कर अपनी साडी और पेटीकोट को अपनी कमर तक उठा ले

और इस खड़े लंड पर अपनी बूर को धीरे से टिका कर आराम से इस पर बेठ जा … तू तो दो बच्चों कि माँ हे री ....

सब कुछ जानती हे मर्द के साथ केसे सोया जाता हे … केसे चुदाया जाता हे …!"

इतना सुनते ही धन्नो एक दम सहम गई पर उसकी बूर बुरी तरह खुजलाने लगी

ऐसा लगा एक साथ सेंकडों चीटियां उसकी बूर में काट रही हो और उसके मुह से एक मादक सिसकी निकल गई !
 


Sangharsh--50

gataank se aage..........

tab dhanno ek pal chup rahi fir boli “...jab thakur saaheb jaan gaye ki main apne pati ke saath nahi soti hun tab bahut hi gandaa sawaal kiye aur..main ekdam se lazaa gai...wo behichak puchhe ki .... to kisi aur se fansi ho ki nahi....sach me aisa sawaal sunkar mujhe bahut sharam aai...aur main chup rahi...fir thakur saaheb mujhe samjhate huye bole ....ki dekh dhanno jo marad apni patni ki izzat nahi karta use bhi apne pati se izzat paane ka haq khatm ho jaata hai..aur jab tera pati nikamma aur sharaabi hai aur roz tujhse jhagdaa karta hai...gali deta hai to wah tujhe izzat nahi karta hai..yani apna pati hone ka dharam nahi nibhata ..to tera bhi dharam banata hai ki apne pati ko izzat mat kar...aur yani apne pati ke izzat ko mitti me milaa de...lekin ek bibi apne pati ko izzat me milaane ke liye dusre gair mard ke saamne tang uthani padti hai..ye to jaanti ho na....itna sunkar to mera dimaag chakaraa gayaa mano main khet me hi behosh ho jaati. ....fir unhone ne puchha ki ..main kya bola hun tujhe samajh me ayaa ki nahi...tab main dar ke maare nahi me jabaav di...” fir dhanno apni purani kahaani ko aage batate huye boli “....fir thakur saaheb bole .... samajh me nahi aaya ..to tu aa mere saath kothri me tujhe theek se samjha dun....tab main dar gai aur thakur saaheb khet ke medh par se uthe aur kheton ke beech bane us kothri ki or jaate huye mujhe peechhe peechhe aane ke liye kahe ..lekin unke saath meri us kothri me jaane ki himmat nahi hui..tab wo ruk gaye aur is gulabi ko bole ki mujhe apne saath kothri me le kar aaye...tab ye mujhe apne saath kothri me le gai..” itna sunkar gulabi boli “....iski to gaand phatne lagi thi jab thakur saaheb ise apne kothri me bulaane lage...aur ye mujhse bar bar yahi puchhti ki thakur saaheb kya karenge kothri me...he he..main bhi bol di gusse me ....ab nahi kaam karogi thakur saaheb ke khet me...ye to hona hai tha..tab to mano ise rulai si aa gai...lekin main isase boli ..dar mat chal mere saath...” fir dhanno boli “....jab ye mere saath chalne ke liye taiyaar hui tab meri bhi himmat hui ..kuchh pal baad ham dono thakur saaheb ke kheton ke beech us sunsaan jagah par bane kothri me gaye...wahaan thakur saaheb apni chauki par baithe mano ham dono ka intjaar kar rahe the..fir ham dono ko dekhkar bole...niche baith jaao..to main bhi apne ghunghat me chupchap niche jameen par baith gai...fir thakur saaheb bole ...main tujhe yahaan samjhaane ke liye bulaya hun...tu abhi jawaan aur naasamajh hai...bhale hi do bachche paida kar li hai lekin tu samaaj ki sachchaion ko samajh paane me naakam hai..main tujhe jo kuchh bhi bataaun aur samjhaaun ..tu use theek se samajh le ...ye tere faayde ke liye hi hain..fir thakur saaheb aage bole ki....teri shaadi jab tere pati se hui to yahi sochkar ki tera pati tera khayal rakhega aur izzt karega aur mehnat kar ke roji roti chalaayega...lekin wo madherchod nikamma nikla ....nikamma mard apni patni ka khayaal kaise kar sakta hai jab wo do jun ki roti nahi kamaa sakta aur bhalaa izzat kaise kar sakta hai jab khud hi sharaabi hai......to tu to suni hogi naa ...jaise ko taisaa....to tu bhi apni kamar kas le apne pati ke nikammepan ka jabaav dene ke liye...meri maan ..tu ab dusron ke saamne ab tang uthana suru kar de....jaise ek bhikhari apne hath failata hai to log ise bheekh dete hain...vaise koi aurat gairon ke saamne apni tang uthane lage to mano sab dukh dur samjho....aur nikamme nithalle pati ke izzat ki chinta chhod de....wo ssala jaisa karega vaisa hi to bhogegaa...aurat ka khayaal nahi rakhega to aurat kab tak dar dar thokren khayegi...aur ek na ek din kisi dusre ke saamne to tang utha hi degi...fir thakur saaheb mujhe samjhaate huye bole ..... tang udhaane me pahle to kai buraai dikhti hai ...jaise....pati ke saath dhokha...lekin yah galat hai...jab pati apni patni ka bhar nahi utha sakta aur upar se izzat aur khayaal nahi rakh sakta to aise pati ko apni patni se wafaadari ki ummeed nahi rakhni chahiye...kyonki taali hamesha dono hathon se bajti hai ....aur dusri burai ye dikhti hai ki ..badnami...samaj me badnaami...jab pati patni ki khud izzat nahi karta to bhalaa pati kaise soch sakta hai ki dunia uske patni ki izzat karegi...aur yadi pati ko uske izzat ki parwaah naa ho to patni kaise apne pati ke izzat ki parwaah kar sakti hai...samajh lo theek se... aur tab patni ko bhi chahiye ki aise pati ko sabak sikhaane ke liye kamar kas le aur saari jindagi apne pati ke sine par baith jaay....pati ke chhati par baithne ka matlab ...gair mardon ke saamne apni tang utha dena... aur yadi ek bar kisi ki bibi ki tang gair mard ke saamne uth gai to samjho ki uska pati kya....badi badi hastian bhi aisi aurat par kaabu nahi paa sakati ...aur aisi aurten kabhi bhi apne pati ki mohtaaj nahi rahti....inka manobal bhi bahut unchaa ho jaata hai...aur tang ke uthne ke baad aisi bibi ko talaq se bhi dar nahi lagtaa....fir thakur saaheb itni baat samjhaane ke baad bole .... tisri burai log samajhte hain talaq ya pariwar ka tutna ya vaivahik jeevan ka barbaat hona..grihasti ka tutna...lekin aisa bhi sochna galat hai.....kyonki yadi pati khud nikamma aur piyakkad sharabi juaadi ho to wo ghar basaane ke bajaay base ghar ko ujaad dega apni naa mitne wali aadton se...aise me yadi bibi kisi gair mard ke saamne apni tang uthati hai aur talaq ya grihat jeevan tutataa hai to hone denaa chahiye...kyonki iske liye bibi nahi balki pati jimmedaar hai aur jis bibi ko pati prataadit karta hai maarta hai gaali deta hai..us aurat ko uska nayaa chodu yaar uski bur ki laalavh me jaroor bachaane ki koshis karega,..is tarah ek surakchha bhi mil jaati hai...aise me bhale hi pati patni alag ho jaayen ..talaq ho jaaye..ise grihast jeevan ko barbaad nahi kahenge balki bibi ya aisi pidit aurat ki chaturai kahenge ..jo kahin se bhi galat nahi hai....aisi aurton ya patnion se dare huye marad ise kutia charitra kahte hain ya aisi aurat ko charitraheen kahte hain..kyonki unke man ka dar aisa kahne ke liye majboor kar deta hai...aur gair marad ke saamne tang uthane wali aurat ke saamne ek na ek din aise nikamme pati ko hathiyar daalna hi padta hai...lekin jabtak nikamma nalayak pati apni patni ke saamne jhukta hai tabtak kafi der ho chuki hoti hai ... tabtak kai gair mardon ke dhakke kha kha kar aisi aurat ya bibi ka man aur soch kafi mazboot aur sthir bhi ho jaata hai..fir shes saari jindagi ghar me keval aurat hi raaj karti hai aur pati ko gair mardon ke dabaav me bhandua hi bananaa padta hai ..bhandua ka matlab ..aisa pati jo apni bibi ko dusron se chudta jaan kar ya chori chhipe dekh kar apna lund sahlaata ho aur mutth martaa ho ...aur sach me thakur saaheb ki is baat ko sunkar main bhi ekdam se sann rah gai...... ” dhanno ke munh se itni lambi baat khatm hote hi gulabi boli “....sach hi to samjhaye the thakur saaheb ne...” tab dhanno boli “....fir thakur saaheb aage bole ...chalo main ab tumhe gair marad ka matalab bhi samjha dun....dekho gair marad ka matlab isase hai ki asali marad ...asali marad use kahte hain jo kisi dusre bibi ko chori se chod de...ab sawal yah ki kyon kisi ki bibi dusre se chudegi..to jabaav yah hai ki jab bhi koi aurat apne pati ke alawan kisi dusre marad ko chodwane ke liye talashti hai ya chunati hai to...wo wah yah jaroor dekhti hai ki dusra marad uske pati se taakatwar hai aur raj khul jaane par uske pati ko kaabu me kar saktaa hai aur uske pati ko dabaa saktaa hai...isliye jab bhi gair marad se apne ko chudwaane ke liye chuno to is baat ka khyal rakho ki vah tumhare pati par dhauns jamaa sake aur itna taakatwar jaroor ho ki uski taakat ke saamne pati ki gaand phat jaaye....taaki yaa to pati talaaq de kar bhaag jaayega ...yaa patni khud talaaq de kar ya bina diye gair ke saath rahne lagegi...yaa pati talaaq naa de sake to patni ka dusre ke saath ki chudaai ki baat soch soch kar lund khadaa kare aur hilaate hilaate ek din bhandua ban jaaye...aur fir rajaamandi se apni bibi ko dusron se chudwaaye...fir thakur saaheb mujhse puchhe ki .....samajh me saari baat aayi ki nahi....jab samajh jaayegi tab dusre mard ke saamne tang uthaane me paap aur pashchataap nahi hogi...fir thakur saaheb mujhse puchhe ...samajh gai ...ki koi shaq hai..bolo ...jab thakur saaheb itna puchhe tab main lazaa gai lekin jab dubara puchhe tab main haan me hir hilaa thi...” sukkhu bhi gaur se sun rahaa tha.

fir sukkhu puchha “ ...to bhauji ab aage bataon badaa mazaa aa rahaa hai...thakur saaheb kafi samajhdari wali baat bataaye the...” yah sunkar gulabi boli “...aur kya thakur saaheb ke dimag ke aage gaanv ke sabki chalanki fel ho jaati hai...” fir gulabi savitri ki or hath se ishara karte boli “...ye chhokari...tu bhi dhyaan se sun ki thakur saaheb kaise kaise samjhaaye the...dunia aur pariwar samaaj ki sachchai tu bhi jaan le...badaa kaam aayegi jindagi me...aur teri bhi jindagi maze se hari bhari ho jaayegi...” fir sukkhu bola “to bhauji aage ki baat to suru karo..” tab dhanno boli “....dekho ab mujhe gaanv jaana hai...der ho jaayegi....fir dusre din baaten puri kar dungi..” tab sukkhu bola “..aree bhauji abhi to shaam hone me kafi samay hai...tab tak tum kahaani bhi pura kar logi aur...aaram se apne gaanv bhi chali jaaogi...aaj ise puraa kar do badi mazaa aa rahaa hai..” sukkhu ke hath ko dekhkar dhanno kuch soch kar boli “chalo to bataa hi deti hun.... thakur saaheb mujhe puri tarah se samjhaane ke baad gulabi se bole ...ise katori ka tel de do aur tum jaao khet me apna kaam karo...aur ye mere bhukhe sher ko tel se tar karegi...ye bhi ssaala char paanch din se bur nahi paaya hai...badi harkat bhi kar rahaa hai...tel lagwaa kar iski tang utha dun...ssala iska pati nikamma hai use bhi sabak mil jaaye...itna sunate hi mera kaleja dhak dhak karne lagaa...fir gulabi uthi aur us kothri ke kone me chhupa kar rakhe ek katori ko nikaal kar le aai jisme tel rakha tha..main us katori ko dekhte hi saham gai...tabhi ghunghat me se jaise hi chauki par let chuke thakur saaheb ko dekhi to dar ki seema hi naa rahi ...thakur saaheb apne dhoti ko upar kamar tak chadhaa chuke the aur unka soya hua lund aur uske ird gird uge ghane kaale jhaant ekdam saaf saaf dikh rahaa tha...aur jaise hi gulabi mere saamne katori ka tel rakh kar kothri se baahar jaane lagi to dar ke maare main bhi uske peechhe peechhe chal di...tab dhakur saaheb ham dono ko rok liye aur bole ...dekh gulabi ye dar rahi hai...aaj pahlaa din hai ...is liye tu bhi kothri me rah...aur ise bataa de ki kaise mazaa lena hai..vaise to ye khud do bachche paida kar chuki hai...lekin lund me tel malish karne ka hunar to shaayad hi ho...kyonki pataa nahi kisi ke lund me tel malish ki hai ki nahi...fir gulabi mujhe dhakel kar chauki par chadaa di.... ” itna kah kar dhanno chup ho gai. tab sukkhu mano vyakul ho kar bola “...aree chachi chup kyon ho gai....” tab dhanno boli “...ab main kuchh nahi bataaungi ....mujhe laaz lag rahi hai...” tab gulabi boli “...chal to main hi bataa deti hun aage ka kissa....” fir sukkhu aur savitri dono hi gulabi ke munh ki or dekhne lage. fir gulabi ek gahari saans lete huye kahaani ko aage badhati boli “...jab main is harjaai ko dhakel kar chauki par chadhai to ye puri tarah se ghunghat me thi...aur iski ek kalaai pakad kar thakur saaheb apni chauki par baithane lage....aur ye chauki par pure ghunghat me baith gayi ... fir thakur saaheb bole ... gulabi ise katori ka tel thamaa de...chal dhanno ab ispar tel lagaa...aur ise khadaa kar...fir to ye ghunghat me hi chauki par kinaare baithi rahi aur thakur saaheb iski ek hath ki kalai ko pakade rahe..aur khud us chauki par lete the...” gulabi ke munh se apni puraani kahaani sunkar dhanno ko mano apnaa ateet yaad aane lagaa jaise ki use sab kuchh sapane me dikh rahaa ho, mano sab kuchh pichhle din ki hi ghatna ho. fir laaz se apna munh dhanno saadi se dhank li aur chupchap gulabi ke munh kahaani ko sunte huye apne ateet me kho gai. apne ateet me jaate hi dhanno ko mano us din ki saari ghatnaayen kisi chalchitra ki tarah chalne lagi. jab gulabi us din ki ghatnaaye sukkhu aur savitri ko sunaane lagi tab dhanno bhi ekdam besudh ho kar apne ateet me khoti chali gai. jo is prakaar hai --- thakur saaheb dhanno ki kalaai ko thaame huye apni chauki par baithaye rahe aur dusre hath se apne apne lund ko sahlaate huye bole “tere ghar me aur kaun kaun hai...” tab dhanno apne ghunghat ke andar se kuchh pal baad boli “..b babu ji..wo meri saas hain ...aur mere do bachche hain...” fir thakur saaheb apne luzluze dheele lund ke supaade ki chamadi ko halka sa peechhe ki or kiye aur lund ka supaada baahar aa gayaa fir us chamadi ko supaade par usi tarah se chadhaa diye aur bole “....to teri saas apne bete ki or se rahati hain...ki teri or se...” tab dhanno ek pal baad boli “...n nahi...wo apne bete ki galati nahi deti babu ji ..... mujhe hi doshi maanti hai...” tab thakur saaheb bole “...chal ....ise thaam ...ispar tel lagaa aur baaten bhi kar....” itna kah kar dhanno ki kalai ko kheench kar uske hath ko apne luzluze lund par rakh diye.

dhanno ka haath jaise hi thakur saaheb ke theele aur luzluze lund par padaa ki dhanno chauki par se utar kar khadaa ho gai mano bhaag jaana chahti ho. aisa dekhkar thakur saaheb uski kalai ko kas ke daboche huye khud chauki par uthkar baith gaye aur bole “...aree..kya hua reee....kahe ko chauki par se utar gai....aa chal baith jaa....dar mat ...tel lagaa aur aage ki baaten bataa...tu to aise dar rahi hai mano lund nahi koi kala naag ko chhu liyaa ho....tu kaise do do bachche paida kar li...jab lund se itna darti hai...chal aa baith ..” itna kah kar thakur saaheb apne ek hath se dhanno ke ek kalaai aur apne dusre hath se uski patli kamar ko pakad kar mano jor lagaa kar chauki ki or kheenchte huye use chauki par baithaane ke liye mazboor kar diye. dhanno apne dono pairon ko chauki ke kinaare se niche ki or latkaa kar baith gai aur dusre hi pal thakur saaheb dhanno ke ek hath ko kheench kar dubaara lund par rakhte huye khud chauki par let gaye. dhanno is baar to bas kasmasaa kar rah gai. thakur saaheb apne us haath se dhanno ki hatheli ko apne lund par haule haule ragate huye puchha “to teri saas apne bete ko bekasur maanati hai....kyon...” yah sunkar dhanno dheeme se boli “jee...” fir apne lund ko dhanno ke hatheli se ragadate huye bole “....to teri saas bhi kamini hi hai....madher chod ...gali me chudwaa kar apni aulaad paida ki hogi ...tabhi to use apne bete ka nikammapan dikh nahi rahaa hai...uski bur me lund ke dhakke marun...” thakur saaheb fir vaise hi lund ko dhanno ke hath se ragadate huye uske saas aur pati ko gandi gandi galian dete rahe tab tak lund me bhi phulaav aane lagaa. lund apni motaai me aate hi mano dhanno ko mahsus hua ki lund kuchh bhaari hone lagaa hai. tab thakur saaheb bole “...chal ab ye bhi taiyaar ho rahaa hai...teri hath ki kalaai aur hatheli to badi naram aur gudaaz hai reee....chal is naram naram hathon se tel lagaana suru kar de....” fir bagal me khadi gulabi ne dhanno ko katori ka tel dene lagi. dhanno apne hath me katori ka tel nahi thami tab gulabi chupchap us katori ke tel ko chauki par dhanno ke paas rakh di. tab tak thakur saaheb bole pade “....chal tel lagaana suru kar....aur tera sasur kya karta hai...” dhanno apne ghunghat ke andar se us katori me rakhe tel ko dekhi fir apni unglion ko tel me dubaa di fir tel se dubi unglion ko lund par lagaati boli “...jee..babu ji...sasur kabhi ke gujar gaye hain...” aur lund par tel lagte hi lund ekdam se chamakne lagaa. fir thakur saaheb bole “...oh....to teri saas rand hai ...vidhwa hai....” lund par tel lagaati dhanno dheeme se boli “jee babu ji...” tab thakur saaheb ek pal soch me pad gaye fir puchhe “... charitra kaisa hai...teri saas ka...” yah sunkar lund par tel lagaa rahi dhanno chup rahi. tab thakur saaheb bole “...kaisi hai teri saas...kuchh to bataa....” tab dhanno apne ghunghat me se lund ko dekhte huye uspar tel lagaate kuchh chid kar boli “...jee babu ji...kaise kahun....wo to mujhe hi charitraheen aur chhinaar kahti hai aur khud ko nahi dekhti...” tab thakur saaheb lete lete hi dhanno ke ghunghat ki or dekhe aur bole “...kya matlab....saaf saaf to bataa.... saas ka naam lete hi tujhe gussa aa gayaa....” tab dhanno katori ka tel lund par theek se lagaane lagi aur boli “...babu ji....wo bahut haraamjadi hai...meri saas nahi wo meri dushman hai babu ji...uski kartoot aap sunenge to yahi kahenge ki kaise main us ghar me uske saath rah rahi hun...mera ji karta hai kabhi kabhi ki kuwen me kud ke jaan de dun...” dhanno ke man ke gusse ko dekh kar thakur saaheb samajh gaye ki dhanno ka uske saas se kafi khatpat hai. thakur saaheb yah bhi mahsus kiye ki jabse uske saas ka naam liye tabse dhanno ke andar ek gusse ki chingari dhadhak uthi aur tab se uske hatheli ka pakad bhi lund par mazboot hone lagaa tha aur ab lund ko apne puri mutthi me le kar tel lagaa rahi thi. kothri me dhanno ki kalaion ki laal chudian khan khan ki aawaj karne lagi thin. lund bhi puri tarah se khadaa ho kar kothri ke chhat ki or dekh rahaa tha. lund apni puri motai me aa chuka tha. lund kafi thos lag rahaa tha. lund par dhanno ki naram hatheli ki kasi hui ragdaahat mano kisi bur ki tarah mahsus ho rahi thi mano thakur saaheb ko lag rahaa tha ki unka lund kisi bur me andar baahar ho rahaa hai. fir thakur saaheb puchhe “...teri saas tujhe kya kahti hai ki tu itna gussa kar rahi hai uspar...” itna kahna hi tha ki dhanno boli “...babu ji..wo kya nahi kahati hai..mujhe chhinaar ...harjaai..sab kahti hai...mera naam mere pati ke kuchh doston ke sath jod kar mujhe badnaam karti hai...kahti hai ki main un sab se fansi hun..” thakur saaheb ko maalum tha ki ek aurat kisi dusre aurat par jab gussa karti hai to uska mizaar kuchh aisa hi hota hai. fir thakur saaheb dhanno ke saas ko gaali dete huye bole “uski bur ko chodu ..uski gaand marun...wo saali khud gaanv me pelwaati hogi....lund khor nahi hoti to apni bahu patohu ko badnaam karti...” thakur saaheb ka itna kahna tha ki dhanno lund ko apne mutthi me tham kar kas kas ke malish karte boli “...haan babu ji ....wo khud hi harjaai hai... budhia ho gai lekin jawaani nahi gai...bas safed saadi pahati hai ..dikhaane ke liye ...nahi to kartut kisi randi se kam nahi babu ji.....” ghunghat me se jab dhanno boli to thakur saaheb dhanno ki or dekh kar bole “...to tum kaise jaanti ho...dekhi ho kya...” tab dhanno boli “...haan babu ji...” tab thakur saaheb bole “to jab teri saas tujhe badnaam karti hai ..to tu kyaon nahi uski kartut use hi sunaa deti hai...” tab dhanno mano tilmilaa kar lund ko kas ke masalte boli “babu ji ...main ek pad nahi chhodati us randi kamini ki....jab mujhe kuchh kahti hai ..to main bhi bol deti hun...ki pahle apna dekh ki khud kya karti hai tab mujhe bol...” tab thakur saaheb bole “bahut badhiya...bol diya kar...khol ke bolaa kar ... chudakkad hai...randi hai....burchodi hai...lundkhor hai ....wo gaanv ki aurat hai...jab tak khul ke nahi bolegi use koi asar nahi padegaa...” tab dhanno boli “haan babu ji ...gusse me to munh se nikal hi jaata hai...sab kuchh bol deti hun...bhalaa apni saas ko koi patohu aise bolati hai...lekin kya krun...” tab thakur saaheb dhanno ke ek jangh ko saadi ke upar se hi dabaate huye bole “...jab saas chudakkad ho... to patohu bhalaa kya kar sakati hai...tu us randi ko khoob gali diya kar... tab us ghar me teri bhi dhauns rahegi ..nahi to kisi din teri jaan bhi le legi teri saas ..ya tera pati...is liye dhauns banaya kar....” dhanno saadi ke upar se hi apni jangh par thakur saaheb ka hath paa kar ekdam se sansanaa gai. uske haath me khud hi thakur saaheb ka garam lund tha. dhanno ki bur me chintian rengne lagi. jis lund par tel lagaa rahi thi use gaur se dekh bhi rahi thi. uska man kar rahaa tha ki thakur saaheb uski bur me lund ko ghused kar chod den. yah soch kar dhanno ki bur andar hi andar chipchipa uthi thi. gulabi bagal me khadi ho kar sab kuchh dekh rahi thi. gulabi ki bhi bur ekdam se garam ho chuki thi. use bhi yah sab dekh kar khoob mazaa aa rahaa tha. fir thakur saaheb bole “...tel pee kar lund to ab puraa taiyaar hai...iska supaada kisi laal tamaatar ki tarah chamak rahaa hai...ab der mat kar ....khadi ho kar apni saadi aur petikot ko kamar tak upar utha le aur is khade lund par apni bur ko tikaa kar dheere se baith jaa....tu to do bachche ki maa hai ree...sab kuchh jaanti hai ..kaise marad ke saath sote hain...” itna sunte hi dhanno ekdam se saham gai aur uski bur kafi tezi se khujulaane lagi mano bur me hajaaron chintian ek saath rengane lagi hon.

Kramashah………………………………………..

 
संघर्ष--51

गतान्क से आगे..........

धन्नो ने अगले ही पल तेल से चुपड़ कर फौलाद कि तरह तन कर खड़े हो चुके लंड को छोड़ कर अपने हाथ से आजाद कर दी !और अपने हाथ में लगे तेल को मानो गौर से देखने लगी !

तभी ठाकुर साहब धन्नो से बोले :-"हाथ में लगे तेल को अपनी चूत के सुराख़ पर लगा ले …चल साड़ी पेटीकोट अपनी कमर तक उठा कर तेल को चूत पर चोपड़ ले …लौड़ा घुसने में आसानी रहेगी !"

धन्नो का छोटा सा दिल धाड़ धाड़ कर धड़क रहा था !

फिर धन्नो चौकी पर खड़ी हो गई और हिम्मत करके धीरे धीरे अपनी साडी और पेटीकोट को अपनी कमर तक उठाना शुरू किया …फिर लाज के मारे ठाकुर साहब कि तरफ पीठ करके अपने हाथ पर लगे तेल को अपनी चूत उसके सुराख़ और पास में खड़ी झांटों कि खेती पर भी लगा लिया सारा नीचे का हिस्सा तेल से तर हो गया !

ठाकुर साहब को धन्नो के गोरे चूतड़ कि झलक मिली और उनका लंड ठुनकी मारने लगा और धन्नो को चोदने में और बेकरार हो गया !धन्नो के भी चूत में मानो हजारों चीटियां रेंग रही थी वो भी पहली बार ऐसे विशाल लौड़े से चुदने के लिए बेकरार थी !उसके सामने अपने निकम्मे पति और चुड़ेल सास के चेहरे नाच रहे थे वो उनसे बदला लेने के लिए किसी भी हद तक जा सकती थी और वो आज गैर मर्द से चुद कर उनकी इज्जत को उड़ाने में तैयार थी और इसी काम से मानो वो उनसे बदला लेना चाहती थी !

फिर ठाकुर साहब बोले :-" चल जल्दी से लंड पर बेठ जा .... इस खूंटे को अपनी चूत के सुराख़ पर टिका कर इसकी सवारी कर .... !कर धन्नो अपनी साडी और पेटीकोट को उठाये ही ठाकुर साहब कि तरफ मुड़ी हां उसका घूंघट नहीं हटा था और अपने एक पैर को लेटे हुए ठाकुर साहब कि कमर के दूसरी और कर ली !

धन्नो अपने हाथो से साडी ओर पेटीकोट अपनी कमर तक उठा चुकी थी तो उसकी तो उसका पैर और झांघ एकदम से नंगी हो चुकी थी वे एक दम चमक रहे थे और चमक रहे झांघों के जोड़ पर काली काली झांटो का बेहिसाब जंगल चमक रहा था उन झांटो से लदी बूर कि हलकी झलक में ठाकुर साहब को किसी खरबूजे कि फांक कि तरह चूत के मोटे मोटे होट अपने लंड कि सीध में ही लग रहे थे !

फिर अगले ही पल धन्नो अपने घुटने मोड़ कर ठाकुर साहब कि झांघो के ऊपर हवा में बेठ गई और उनके लंड के सुपाड़े को अपनी चूत के सुराख़ पर टिका दिया !

तेल से सने और गरम लाल सुपाड़े कि गर्मी को चूत के सुराख़ पर महसूस करते ही धन्नो कि आँखे मस्ती से मुंदती चली गई और मस्ती के ताव में आकर धन्नो उस खूंटे पर बेठ गई और रिसती चूत और तेल कि मिली झूली चिकनाई के कारन तेल में चिपड़ा हुआ लंड धन्नो कि चूत में आधा धंस गया और धन्नो कि कसी हुई और कई महीनो से अनचुदी चूत में कस कर फंस गया ! मजे और हलके दर्द के मारे धन्नो का मुह खुल गया और उसके मुह से एक मादक आआअह्हह्हह्ह कोठरी में गूंज गई !

धन्नो कि बूर में ठाकुर साहब का लंड आधा घुस चूका था और धन्नो अभी कुछ हवा में ठाकुर साहब कि झांघो पर बेठ चुकी थी पेटीकोट और साडी अभी दोनों हाथों से पकड़ी हुई थी !

ठाकुर साहब ने धन्नो के नंगे कूल्हे और कमर को अपने दोनों हाथों से दबोचा और चौकी पर लेते ही अपनी कमर ऊपर कि तरफ उचकाई और उनका लंड एक इंच और अंदर सरक गया उनके देखा देखि धन्नो ने भी अपनी कमर कुछ ऊपर कि और जोर से वो लंड पर बेठ गई

जिससे अजगर उसके बिल में और सरक गया पर अभी काफी बहार था !इन दो धक्को में लंड आधे से ज्यादा अंदर धंस चूका था !लेकिन ठाकुर साहब के लंड कि सवारी कर रही धन्नो का चेहरा अभी भी घूंघट में ही था !

और धन्नो घूंघट में ही सिसकारती हुई धीमे से बोली :-" स्स्स्स्स्स्स्स्स्स्स्स .... हाआआआ … ब .... ब बाबूजी .... बड़ा मोटा हे … आअह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह … पूरा कस गया हे बाबूजी !"

इतना सुनकर ठाकुर साहब ने फिर अपने दोनों हाथों से उसकी कमर और कूल्हों को पकड़ कर ऊपर कि और उचक कर एक जोर से धक्का मारा तो उनका लंड एक इंच और धन्नो कि चिकनी चूत में सरक गया !पर धन्नो एक दम से कांप कर लार्ज गई और सिहरती हुई घुघट में ही हलकी से चीखती हुई सी बोली :-" अरररररेई बब्ब … ब बाबूजी … अरीईईईईईए … मालिक … हमारी बुरिया फट जाई … धीरे से बाबूजी … इ पूरा नहीं घुसेगा बाबूजी !"

घूँघट के अंदर से आई ऐसी मीठी चीख भरी आवाज़ सुन कर ठाकुर साहब बोले :-" अरे … धन्नो … बूर नहीं फटेगी … तू तो दो बच्चे पैदा कर चुकी हे जितना फटना था तेरी फट गई … !"

फिर ठाकुर साहब ने अपने हाथ उठा कर धन्नो के चेहरे से साडी का पल्लू एक जटके से उठाया और उसकी पीठे पीछे नीचे गिरा दिया ! धन्नो का घूंघट में छिपा सुन्दर चेहरा पूरी तरह से ठाकुर साहब के सामने आ गया था !

धन्नो के मांग में लाल सुर्ख सिन्दूर चमक रहा था !माथे पर सस्ता सा मंगल टीका ऐसे लटक रहा था मानो कोई नै नवेली दुल्हन सजी हो !धन्नो कि नाक में नथुनी और कान में सस्ती मगर बड़ी बड़ी बालियां लटक रही थी !

धन्नो के गले में मंगलसूत्र कि जगह एक माला लटक रही थी जिसमे एक पीला पीतल का ताबीज लटक रहा था !धन्नो के माथे पर एक सस्ती किस्म कि लाल रंग कि बिंदिया लगी थी जिसमे शीशा लगा होने के कारन वो भी चमक रही थी !धन्नो के होटों पर लिपस्टिक ऐसे चमक रही थी मानो उसने पान खा कर अपने होंट लाल कर दिए हो !ठाकुर साहब उसे चमचमाते देख कर आवाक रह गए उनका धन्नो कि चूत में फंसा लौड़ा एक ठुनकी खा गया जिसे धन्नो ने भी अपनी चूत में कंपकपाते महसूस किया ! धन्नो देखने में एक नई नवेली दुल्हन कि तरह लग रही थी !

फिर ठाकुर साहब धीरे से बोले :-"अरे .... मादरचोद …… तू तो एक दम दुल्हन कि तरह लगती हे .... जो सुहागरात मनाने आई हो … साली … दिनभर सज कर रहती हो … चल मुझे एक चुम्मा दे तो … !"

इतना बोल कर ठाकुर साहब ने धन्नो के कंधे पकड़ कर अपनी और खींचा और शर्माती धन्नो के गाल पर चुम्मा लिया तो सस्ते सेंट कि खूसबू ठाकुर साहब के नाक से टकरा गई जो धन्नो ने अपने बलाउज के गले से चुपड़ा हुआ था !सस्ते सेंट कि खुसबू अपने नाक से खींचते हुए और धन्नो के गालों को चुम्मे दे देकर अपने थूक से भिगोते हुए पास खड़ी उनकी चोदा बाटी देखती हुई गुलाबी से बोले :-"देख री .... तू भी इत्र सेंट पोत के रखा कर … देख तेरी सहेली कितनी मस्त हे … सेंट लिपस्टिक … लाल चूड़ियाँ जो चुदते हुए संगीत सुनाये … सब कुछ पोत के एकदम फिट हे … तभी तो लंड में ताव भी खूब आएगा … !"

इतना बोल कर ठाकुर साहब ने फिर से धन्नो कि कमर पकड़ कर ऊपर कि और उचक कर जो कस के धन्नो कि बूर में धक्का मारा तो उनका लंड धन्नो कि चूत में एक इंच और सरक गया धन्नो मानो चीख पड़ी उसकी कजरारी आँखों के कोने में आंसू कि बूँद झिलमिला उठी जो बह कर उसके गाल को काला करने लगी वो लार्ज सी गई सख्त तकलीफ में लग रही थी और गिड़गिड़ा कर बोली :-" ब .... बाबूजी .... आआआआआह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह …… अरे .... मर गई … मोरी मैय्या … मोरी बुरिया … चिर गई … फट गई … अब बस … बाबूजी … इ पूरा गुस गइल … आह … बाबूजी अब मत हिलो … आआआह्हह्हह्ह इइइइइइइइइइइइइइइइइइइइइ …… इइइइइइइइइइइइइइइइइइइ ह्ह्ह्हह उउउउउउउउउउउउह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह

आउच !"
 


इतना सुनकर ठाकुर साहब ने अपना एक हाथ उसकी कमर से हटा कर अपने लंड को टटोला तो देखा कि अभी भी उनका लंड धन्नो कि चूत से एक डेढ़ इंच बाहर ही था ! पुरे दस इंच का लंड था उनका जो धन्नो कि चूत में वहाँ वहाँ घुस गया था जहा आज तक उसके पति का ५ इंच का लंड नहीं पहुँच पाया था ! और अभी तक ये पूरा नहीं घुसा था ! ठाकुर साहब हुलस के बोले :-" अरे नहीं री … अभी पूरा कहाँ घुसा हे … लगता हे तू कभी इतने मोटे लंड पर नहीं बेठी हे … तुझ से नहीं चोदा जायेगा … तू नीचे लेट में फिर इसे पूरा घुसता हु तुझ से तो नहीं घुसेगा में तुझे ऊपर चढ़ के चोदता हु तब ये पूरा घुसेगा … चल … अब तू इस चोकी पर नीचे लेट … में तेरे ऊपर चढ़ता हु … !

इतना कह कर ठाकुर साहब ने धन्नो को अपने लंड से उठने का इशारा किया तो धन्नो बड़ी मुश्किल से लंड से उठ पाई लंड मानो उसकी चूत में फंसा हुआ था !उनके लंड का मोटा सुपाड़ा पक कि आवाज के साथ उसकी गीली चूत से बाहर आया ऐसी आवाज आई जेसे किसी बोतल के मुह से कोई टाइट कार्क निकला हो !

धन्नो में अपना मुह छत कि तरफ करके ताक़त से लंड को चूत से बाहर निकाला था इसलिए उसकी नजर तो ठाकुर साहब के लंड पर नहीं पड़ी थी पर इतनी दूर धन्नो कि चूत का पानी पी पी कर उनका काला नाग मानो अजगर कि तरह भयंकर हो गया था जिसे देख कर चौकी के पास खड़ी गुलाबी सहम सी गई उसे आज ठाकुर साहब का लौड़ा ज्यादा मोटा और लम्बा और भयंकर लग रहा था !

दूसरे ही पल ठाकुर साहब चौकी के नीचे खड़े हो गए उनका लंड खूब तन्ना रहा था किसी बड़े गन्ने के मोटे टुकड़े जैसा जो एक दम ९० डिग्री के कोण में खड़ा उनके पेट के हुंडी के ऊपर उनके सीने तक लग रहा था !

धन्नो कि अधमुंदी आँखों ने अब ठाकुर साहब का लौड़ा नहीं देखा वो फटाफट अपनी साडी और पेटीकोट को अपनी कमर में चढ़ा कर शर्म के मारे आँखे मूँद कर और अपनी दोनों झांघे पूरी तरह से फेला कर के चौकी पर लेट गई और अपनी चूत पर आने वाले प्रहार का इन्तजार करने लगी !

घनी झांटों से लदी और काली मोटी फांकों वाली चूत अब ठाकुर साहब के सामने थी !झांघे फैलाने कि वजह से योनि होंट अलग हो गए थे और बूर में हलकी हलकी अंदर ललाई झांक रही थी !बूर के अंदर से कुछ बाहर कि तरफ बहा धन्नो कि चूत का गीला रस उसे और भी सुन्दर बना रहा था ! धन्नो के चेहरे कि तरफ ठाकुर साहब ने देखा तो पाया उसकी आँखे बंद हे पर वो अपने होटों को हलके हलके काट रही थी कुछ मुह खुला हुआ था और सांसे तेज तेज चल रही थी उसका ब्लाउज में कसा सीना ऊपर नीचे हो रहा था उसके शरीर को बड़ी लंड कि प्यास लग रही थी !

फिर ठाकुर साहब धन्नो के झाँगों के बीच अपने घुटने मोड़ते हुए उकड़ूँ हो कर बेठ गए !और अपने मोटे लंड को जो उनके पेट और सीने से लगा हुआ था नीचे खींच कर उसके सुपाड़े को धन्नो कि चूत के सुराख़ पर टिका दिया और थोडा जोर लगाया तो सुपाड़े का मुह हल्का सा धन्नो कि चूत के छेद में फंस गया !फिर ठाकुर साहब चौकी पर दोनों हाथ जमा कर धन्नो के ऊपर अधर हो गए और उनके मजबूत नितम्बो ने एक जोर दार नीचे कि तरफ धक्का मारा तो उनका लंड चूत को किसी ककड़ी कि तरह फाड़ते हुए धन्नो कि चूत में एक झटखे में आधे से ज्यादा घुस कर कस गया !धन्नो मानो किसी जिबह होते बकरे कि तरह चीख उठी :-"आआआ … आअह्ह्ह्ह …रॆऎऎऎ … अरे बाप रे … अरे माई री … मोरी बुरिया फट गई रे … माई … !"

ठाकुर साहब ने धन्नो कि चीखों पर कोई ध्यान नहीं दिया और उसके कंधे पकड़ कर धक्के पर धक्के मारते रहे … धन्नो बिलबिलाती रही वो जितना बाहर खींचते फिर उस से ज्यादा घुसा देते और धन्नो ज्यादा बिलबिलाती कराहती रोती पर ठाकुर साहब अपने नितम्ब उठा उठा कर घनघोर धक्के मारते रहे और इस प्रकार १२ - १५ धक्कों के बाद अब ठाकुर साहब का मोटा काला नाग पूरी तरह से धन्नो के छोटे से बिल में समां गया था और उनके बड़े बड़े आंडे धन्नो के चूतड़ से टकराने लगे मानो वे उसकी गांड में गुसना चाहते हो !

तब ठाकुर साहब अब अपने धक्के रोक कर धन्नो से बोले :-" ले देख री … अब पूरा लंड धंस गया हे री … दो बच्चे पैदा करने के बाद भी तेरी बूर में काफी कसाव हे … बड़ा मजा आ रहा हे !"

ये कहते कहते ठाकुर साहब ने धन्नो के बलाउज को खोल दिया और और उसकी ब्रा को भी उसकी चुचियों के ऊपर कर दिए और उन पर टूट पड़े !

दोनों कसी हुई चुचियों को अपने हाथ में ले कर ऐसे मसलने लगे मानो कोई ओरत थाली में आता गूँथ रही ही !

चुचियों कि मसलाहट धन्नो को चुदासी बना दिया था ठाकुर साहब का लंड फंसा होने के बाद भी उसकी चूत कि दीवारे ढेरों

पानी छोड़ रही थी !

उसकी छोटी सी बूर में लंड वहाँ सैर कर रहा था जहाँ आज तक कोई लौड़ा नहीं पहुँच सका था और साथ में ठाकुर साहब

अनुभवी हाथों से उसकी चुचियों कि मिजाई ने धन्नो को आनंद के सातवें आसमान पर पहुंचा दिया था !

धन्नो को दर्द के साथ असीम आनंद भी मिल रहा था और पास में खड़ी गुलाबी भी ठाकुर साहब का लंड धन्नो कि चूत में फंसा

देख रही थी और उसकी चूत भी बूरी तरह से पनिया गई थी !

गुलाबी भी सिसकी मारते मारते अपनी साडी के ऊपर से ही अपनी चूत सहलाती जा रही थी !

इधर ठाकुर साहब आँखे बंद कर के लेटी धन्नो के लिपस्टिक से रंगों होटों को अपने होटों में कैद करके बुरी तरह से चूसने लगे थे !

धन्नो के पूरे बदन और बूर में मानो आग सी लग गई ! उसे आज मालूम पड़ रहा था कि सम्भोग का आनंद क्या होता हे

उसका पति उसकी चूत में बस दो मिनिट ही टिकता था और होंटों कि चुसाई और चुचियों कि मिजाई तो वो कभी करता ही

नहीं था !

धन्नो ने अपनी मुंदी आँखों को कस लिया और वो पूरी तरह से गनगना गई वो भी हलके हलके अपने होटों से ठाकुर साहब

के होटों को पकड़ रही थी !

ठाकुर साहब ने उसके दोनों होटों को बारी बारी से चूसा और फिर उन्हें आजाद कर के धन्नो से बोले :-"धन्नो तेरी चूचियां भी किसी

कुंवारी छोकरी कि तरह टाइट हे री … किस चक्की कि का आटा खाती हे साली … और ऊपर से तेरे बनाव श्रृंगार ने तो मेरे लंड

में तूफ़ान मचा दिया हे री … !"

फिर ठाकुर साहब अपने चूतड़ उठा उठा कर धन्नो कि टाइट बूर में ताबड़तोड़ धक्के मारने लगे !

खप -खप … खच -खच … पक पक .... चट -चट .... खपाक खप्प .... खपाक खप्प ....

फक्क - फक्क … साथ में ठाकुर साहब के मुह से लकड़ी काटते लकड़हारे जैसी आवाजे ऐ .... हुँहह .... ऐ हहहह

और धन्नो के मुह से कभी मादक और कभी दर्द भरी सीत्कारें अरीई .... उईईईईईई … आअह्हह्हह ....

उउउउउंम .... हाँ … ऐसे ही बाबूजी …… जरा धीरे बाबूजी स्स्स्स्स्स्स्स्स्स हुउउउउउउउउउउउउ ऐसी

मिली जुली आवाजों से पूरी कोठरी गूंज रही थी !

ज्यूँ ज्यूँ धन्नो कि बूर पानी छोड़ने लगी अब पच्च -पच्च कि आवाजे आने लगी और बूर का पानी ठाकुर साहब

के लौड़े को भिगोने लगा !लंड किसी पिस्टन कि सट सट करते उसकी बूर में आ जा रहा था !

धन्नो अपनी आँखे मूंदे अपनी रगड़ाई का आनंद ले रही थी उसकी दोनों टांगे खुदबखुद उठ कर ठाकुर साहब कि कमर को

झकड़ रही थी इस कारन उसकी चूत ऊपर हो गई थी और लंड और गहराई में जा रहा था !

धन्नो का मुंह खुल गया था और वो आनंद के मारे मुह से ही सांस ले रही थी ऐसा लग रहा था मानो वो हांफ रही थी !

कभी गहराई में जोरदार धक्का लगता तो धन्नो के मुह से आह निकल जाती !

बगल में खड़ी गुलाबी के चूत में भी आग लग गई थी और अब वो पहली बार उन दोनों के सामने अपनी साडी कमर तक कर

अपनी तीन अँगुलियों को अपनी चूत में अंदर बाहर कर रही थी हालाँकि धन्नो और ठाकुर साहब का ध्यान गुलाबी कि तरफ

नहीं था वे अपनी ही मस्ती में खोये अपनी मंजिल तलाश रहे थे !

अंगुलियां डालते गुलाबी का मन कर रहा था कि वो धन्नो को हटा कर खुद ठाकुर साहब के मूसल लंड के नीचे लेट

जाये पर वो ऐसा सिर्फ सोच ही सकती थी कर नहीं सकती थी !

ठाकुर साहब अब तूफानी गति से धन्नो कि चुदाई कर रहे थे अब वो काफी ऊपर हो कर तेजी से नीचे आ रहे थे

आधे से ज्यादा लंड बाहर खींच कर एक झटखे में वापिस ठांस रहे थे मोटे लंड से चुदाई के कारन धन्नो कि बूर कि

हालत देखने लायक थी !

उसकी ठोस और टाइट बूर बिलकुल पिलपिली हो रही थी चूत के मोटे होंट सूज कर और मोटे हो रहे थे और उसकी हालत

देख कर लग रहा था उसने जिंदगी में कभी इतनी जोरदार चुदाई कभी नहीं करवाई थी !
 


धन्नो कि चूत अब तक तीन बार पानी छोड़ चुकी थी और उसे अब मजे कि जगह चूत में दर्द भरी टीस महसूस

कर रही थी अब सीओ सोच रही थी कब ठाकुर साहब का वजनी लंड उसकी चूत से बाहर निकले !

अब ठाकुर साहब धन्नो के कंधे पकड़ कर उसे कस कस कर चांप रहे थे उनके बदन में किसी भूकम्प कि तरह थरथराहट शुरू

हो गई थी !

अब वे धन्नो कि बूर में अपने लौड़े को ठाँसने के साथ साथ धन्नो के बदन को अपनी बाँहों में कसने भी लगे !

अब धन्नो भी समझ गई कि ठाकुर साहब का लंड अब वीर्य कि बौछार करने वाला ही हे !

इसलिए इस बदनतोड़ चुदाई को समाप्त करने के लिए वो भी अपने चूतड़ उचकाने लगी उसे मालूम था कि

उसके इस सहयोग से ठाकुर साहब जल्दी छूटेंगे !

धन्नो के चूतड़ उचकाने से खुद धन्नो कि चूत में भी एक नया तूफान पैदा होने लगा था और वो चौथी बार छूटने कि तैय्यारी में

थी !

तभी ठाकुर साहब के भरी गले से एक आह भरी कराह निकली क्यूंकि ठाकुर साहब के बड़े बड़े आलू जैसे आंडूओ से

गरम गाढ़ा वीर्य चल पड़ा था !

गुलाबी भी अपने चरम पर पहुँच गई थी और साडी पेटीकोट नीचे कर के लम्बी लम्बी साँसे ले रही थी !

दूसरे ही पल ठाकुर साहब के लंड के मुह ने पानी ऐसे छोड़ना शुरू किया जैसे किसी बन्दूक से गोली छूटती हे !

वीर्य के फव्वारे ने धन्नो के बच्चेदानी के मुह को मानो पूरी तरह से डुबो दिया !

वीर्य कि गर्मी पा कर धन्नो भी सीत्कार मार कर झड़ने लगी !

इस बार वो बहुत तेज झड़ी थी और और उसके मुह से चीखें निकल रही थी वो चिल्ला रही थी :-" स्स्स्स्स्स्स्स्स्स्स्स्स अरी मरी में …

बाबूजी … ओह्ह्ह आईईईई … अरी …माईईईइ … बाबूजी … अरे बाबूजी .... मोर निकसल … मोरी बुरिया से पानी … निकसल

बाबूजी … में तो खाली हो गई .... में बिलकुल हलकी हो गई बाबूजी .... मोरी बुरिया से पूरा पानी निकस गया !"

इसके साथ ही वो अपनी कमर उठान करके उचका दिया और झड़ने लगी !

ठाकुर साहब का लंड ८-१० झटके मार कर अपना पानी धन्नो कि बूर में काफी गहराई में फेंकता रहा !

उस के साथ धन्नो का पानी भी मिलता रहा !

वीर्य के आखरी बूँद छोड़ने तक लंड धन्नो कि बूर में जठखे लेता रहा !

और दोनों आँडूओ का पानी पूरी तरह से धन्नो कि बूर में खाली कर दिया था किसी घोड़े जितना पानी छोड़ा था

ठाकुर साहब ने !

ठाकुर साहब के दोनों आंडे पूरी तरह से खाली हो चुके थे ठाकुर साहब का लंड भी धन्नो कि बूर में मानो

बूरी तरह से पस्त हो चूका था !

बूर में वीर्य पसर कर भर गया था और ऐसा लग रहा था अब धन्नो कि बूर में वीर्य के अलावा कुछ भी नहीं हे अब ठाकुर साहब के

ढीले पद चुके लंड के किनारो से वीर्य बाहर उबल रहा था और धन्नो के झांघों और गांड से बह कर नीचे चौकी पर इकट्ठा हो रहा था !

कुछ देर तक ठाकुर साहब धन्नो के ऊपर ही पड़े रहे मानो उनकी सारी ताकत धन्नो के बूर में ही निकल गई हो !

फिर एक गहरी साँस लेकर ठाकुर साहब धन्नो के ऊपर से हटे और अपने लंड को धन्नो कि बूर से बाहर खींच लिए !

लंड बाहर आया तो उस पर वीर्य और धन्नो कि चूत का पानी लगा हुआ था और अभी भी लंड काफी विशाल लग रहा था !

धन्नो को अपनी चूत ख़ाली ख़ाली लगी उसमे से बचा पानी बाढ़ कि तरह बह चला इतनी देर चुदाई के बाद धन्नो कि

चूत के होंट आपस में नहीं जुड़ सके और धन्नो को अपनी खुली चूत में ठंडी हवा लगनी महसूस हुई !

ठाकुर साहब का झड़ा हुआ लंड भी लहरा रहा था मानो वो फिर चूत में घुस जाना चाहता हो !

ठाकुर साहब के उठते ही धन्नो तुरंत उठी और अपने चूत के पानी को अपने पेटीकोट के निचले हिस्से से पोंछ कर साफ करने लगी !

उधर गुलाबी अपने पेटीकोट से ठाकुर साहब का लंड साफ़ कर रही थी !

थोड़ी देर में ही लंड पर का सारा माल गुलाबी ने अपने पेटीकोट पर ले लिया और लंड साफ़ हो गया !

धन्नो चौकी से तुरंत नीचे उतरी और अपने कपड़ों को ठीक करने लगी अपनी चूचियां वापस

ब्रा और ब्लाउज में कर ली अपना पेटीकोट साडी ठीक कर ली और अपना लम्बा घूंघट फिर से निकाल लिया !

ठाकुर साहब से हुई चुदाई कि पुरानी कहानी में धन्नो इस तरह खो गई मानो गहरा सपना देख रही हो !

तभी पुरानी कहानी में खो चुकी धन्नो के पास खड़ी गुलाबी ने उसे धकेल दी और बोली :-"कहाँ खो गई हे तू ....

किस दुनिया में .... लगता हे तू ठाकुर साहब से हुई पहली चुदाई के सपने में खो गई हे .... चल सावत्री को सब

कहानी बता दी !"

तभी सावत्री भी धन्नो के गम्भीर और खोये खोये चेहरे कि और देखते हुए बोली :-" … चलो चाची … जल्दी चलो … कितनी देर

हो रही हे .... मुझे देर हो जायेगी तो मेरी माँ मुझे डांटेगी !"

इतना सुनकर धन्नो मानो अपने को उन पुराने ख्यालों से बाहर खींच लाइ और बोली :-" अच्छा चलती हु … चल … !"

ये बोल कर धन्नो भी खाट से खड़ी हो गई और अपने साडी के पल्लू को ठीक करने लगी !

सावत्री भी खाट से खड़े होते हुए बोली :-" जल्दी चलो चाची … देखो कितनी देर हो रही हे .... !"

गुलाबी भी सावत्री से बोली :-" तू यहाँ आती जाती रहना … धन्नो चाची के साथ … आज तो कितना मजा आया तुझे !"

ये सुनकर सुक्खू भी बोला ;-"हाँ आना तब मुझे तेरी बूर देना और तू मेरा लंड लेना .... " ये बोल कर वो राक्षशों कि तरह

हो हो कर हंसने लगा !

सावत्री सुक्खू के मुह से ये सुनकर लजा गई और पहले कि बात याद कर सिहर गई !

फिर धन्नो गुलाबी से बोली :-" आज तूने भी मेरी कहानी बता कर मेरी पुराणी यादें ताजा कर दी … कितनी पुरानी बात हे

तब मेरे दोनों बच्चे कितने छोटे छोटे से थे … !"

तब गुलाबी बोली :-" तेरी कहानी पूरी कहाँ हुई हे … जब तू दूसरे दिन आएगी तो आगे कि तेरी कहानी इस छोकरी

को सुनाऊँगी … !"

इतना बोल कर गुलाबी ने पास खड़ी सावत्री कि एक चूची को दुपट्टे से नीचे और समीज के ऊपर से मसल दी !

सावत्री एक दम सन्न रह गई और गुलाबी के हाथ को एक दम झटकते हुए और सिसकी ले कर बोली :-" क्या कर रही हे

चाची छी चाची धत्त !"

ऐसा बोलते हुए गुस्से वाला मुह बना कर कोठरी से बाहर आ गई पीछे पीछे वे तीनो भी बाहर आ गए !

फिर सावत्री और धन्नो गुलाबी के घर से अपने गांव कि और चल दी !

सावत्री दो दो बार मूसल जैसे लंडों से बुरी तरह से चुद कर कुछ थकावट महसूस कर रही थी !

कुछ तेज क़दमों से चलते चलते वे कुछ ही देर में अपने गांव के पास आ गई थी !

अपना गांव आते ही धन्नो सावत्री से अलग हो कर कुछ घूम कर अपने घर में चली गई !

अब शाम का अँधेरा छाने लगा था !

सावत्री ने देखा उसकी माँ अब शाम का खाना बनाने कि तैय्यारी में लगी थी !

फिर सावत्री भी अपनी माँ के साथ खाना बनाने में लग गई !

पर सावत्री के पुरे बदन और बूर में मीठा मीठा दर्द हो रहा था अभी भी उसकी बूर हलकी हलकी चूं रही थी

उसकी बूर से ठाकुर साहब और सुक्खू का रस हल्का हल्का टपक रहा था !

पर आज का दिन उसकी लिए नया और मस्ती भरा था !

एक ही दिन में दो नए मर्दों से उसकी जान पहचान हो गई थी और

उनके बड़े बड़े लंडों से चुदने से सावत्री बहुत खुश थी उसे बदन बिलकुल हल्का लग रहा था !
 
Sangharsh--51

gataank se aage..........

dhanno agle hi pal thakur saaheb ke tel se sane huye faulaad ki tarah tan kar khade lund ko apne hath se aazad kar di. aur apne hath me lage tel ko mano gaur se dekhne lagi. tabhi thakur saaheb dhanno se bole "....hath me lage tel ko apni jhant me pot le....chal saadi utha aur tel ko pot le jhant me...." dhanno ka kaleja dhak dhak kar rahaa tha. fir dhanno chauki par chupchap khadi ho gai aur himmat karke apni saadi aur petikot ko dheere dheere upar uthai fir laaz ke maare apne peeth ko thakur saaheb ki or karke apne hathon me lage tel ko jhanto me lagaane lagi. tabhi thakur saaheb ko dhanno ka chutad dekhaai diya aur unka lund dhanno ko chodne ke liye aur bekraar ho gayaa. dhanno bhi ekdam se chudne ke liye betaab thi. fir thakur saaheb bole "...chal jaldi le lund pe baith..." itna sunkar dhanno apni saadi aur peticot ko ko kamar tak uthaye hi thakur saaheb ki or mudi aur apne ek pair ko lete huye thakur saaheb ke kamar ko dusri or kar lee. dhanno apne hathon se jab apni saadi aur 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puri tarah se thakur saaheb ke saamne ho gayaa. dhanno ke mang me laal sindur ekdam se chamak rahaa tha. mathe par sasta mangtika aise latak rahaa tha mano koi dulhan saji ho. dhanno ke naak me ek sasti nathuni aur kaan me sasti lekin badi badi kaan ki baali latak rahi thi. dhanno ke gale me mangal sutra ke naam par ek mala latak rahi thi jisme ek peetal ki tabeez latak rahi thi. dhanno ke maathe par ek laal rang ki sasti kism ki bindia lagi thi jisme sisa lage hone se chamak rahi thi. dhanno ke oth par laal laal lipistic lagi thi jo dekhne me aisa lag rahaa tha mano dhanno paan khaa kar apne oth ko laal kar li ho. dhanno dekhne me mano ek suhagini dulhan ki tarah lag rahi thi. thakur saaheb dheeme se bole "aree...madherchod tu to ekdam se dulhan lag rahi hai...dinbhar saj kar rahti hai...chal ek chumma de to ..." itna bolkar chauki par lete huye apne lund par dhanno ko baithaye huye thakur saaheb jaise hi dhanno ke kandhon ko pakad kar apne munh ki or kheenche aur apni ankhen band kar sharmaa rahi dhanno ke ek gaal par chumma liya to saste sent ki bhini khushboo thakur saaheb ke naak me ghus gayee jo dhanno apne gale ke paas chhidaki hui thi. saste kism ke itra ki khushboo apni naak me kheenchte huye thakur saaheb apne bagal me khadi gulabi ki or dekhte bole "...dekh ree....tu bhi sent itra pot ke rahaa kar....dekh teri saheli kitni mast hai....sent lipistic ...sab kuchh pot ke fit hai....tabhi to lund me taav bhi khoob aayega...." itna bolte hi apne lund ko ek baar fir kas ke upar ki or uchkaa kar bur me dhakkaa maare to lund ek inch aur ghusaa aur dhanno ke munh se nikal padaa "...aaaah ree....ba babu ji....pura ghus gael ...aah " itna sunkar thakur saaheb apne ek haath se apne lund ko tatola to dekha ki kareeb ek inch lund abhi bhi baahar tha. tab thakur saaheb bole "....aree... nahi ree...abhi puraa kahaan ghusaa hai...chal ab tu let mai tere upar chad kar chodu tab puraa lund ghusegaa...chal tu let is chauki me ..." itna kah kar thakur saaheb dhanno ko apne lund ke upar se uthne ka ishara kiya to dhanno turant lund par se uth gai aur geela lund bur se baahar aa gayaa. us geele mote khade lund ko gulabi dekh kar mano saham gai kyonki wah lund bur se baahar aane ke baad ekdam se bhayankar lag rahaa tha. dusre hi pal thakur saaheb chauki par khade ho gaye aur ab unka lund ekdam se tannaya huaa lag rahaa tha. tabhi ishara paa kar dhanno turant us chauki par chit let gai aur dusre hi pal apne saadi aur peticot ko kamar tak utha kar apni janghe faila di. ghani kaali jhanto se ladi hui kali fanko wali dhanno ki bur ab thakur saaheb ke aankho ke saamne thi. bur ke daraar se geela ras ke kuchh bund baahar choo kar bur ko aur sundar banaa rahe the. thakur saaheb ki nazre jab dhanno ke ankhon par padi to dhanno thakur saaheb ki or hi dekh rahi thi aur uske ankhon me lund ki pyaas edkam saaf jhalak rahi thi. fir thakur saaheb dhanno ke dono janghon ke beech apne dono ghutno ko mod kar ukadu ho kar baith gaye aur apne mote lund ko bur ke munh par tika diye. dusre hi pal jaise hi lund ka laal supada bur me fit ho gayaa, thakur saaheb ek jordaar kararaa dhakka maare aur lund adhaa se adhik bur ko kisi kakari ki taraf faadate huye ghus kar kas gayaa. dhannno mano cheekh uthi "...aaa aaah reee....baaap maai....b buria phaat gaile re maai..." fir thakur saaheb dhanno ke upar sawaar ho kar dhakke par dhakka lagaane lage. aur kareeb aath das dhakke pelne ke baad thakur saaheb ka mota lund dhanno ke bur me puraa samaa chuka tha. tab thakur saaheb bole "...le dekh ab pura lund dhans gayaa hai ree...do bachche paida karne ke baad bhi teri bur me kafi kasaav hai....badaa mazaa aa rahaa hai..." fir agle hi pal thakur saaheb apne dono hathon se dhanno ke blauz ko khol diya aur fir bra ko bhi nikaal kar chuchion pat toot pade. dono gol gol kasi hui chuchion ko apne dono hathon se aise masalane lage jaise koi aurat thali me atha guthati ho. chuchion ki maslaahat ne dhanno ko aur chudasi banaa di. bur me lund puri tarah se samaa chuki thi. aur upar se chuchion ki misaai se dhanno anand ke saatwen aasmaan par udane lagi. bagal me dhadi gulabi ki bhi bur ekdam se paniane lagi thi. fir dusre hi pal thakur saaheb apne munh ko lipstic se lage dhanno ke othon par apne oth rakh kar jor jor se chusne lage. dhanno ke pure badan aur bur me mano aag si lag gai. dhanno apni ankhon ko kas ke mund li aur puri tarah se ganganaa gai. fir thakur saaheb dhanno ke dono othon ko baari baari se chusne ke baad aazad kar diya aur bole "dhanno .... teri chuchi bhi ekdam se kisi jawaan laundia ki tarah hai re....kis chakki ki aata khati hai tu.... aur upar se itra pot kar to mere lund me toofan machaa de rahi thi..." fir thakur saaheb apne kamar ko aage peechhe karke taabadtod dhakke maarne lage. bur phach phach karne lagi. bur se raseela pani lund ko bhigone lagaa. lund kisi piston ki tarah bur me aa jaa rahaa tha. dhanno apni ankhe munde chudaai ka mazaa le rahi thi. dhanno ka munh khulaa huaa tha aur anand ke maare dhanno apne munh se hi saanse aise le rahi thi mano hanf rahi ho. har jordaar dhakke ke baad aah ki siskaari kothri me gunj rahi thi. bagal me khadi gulabi ki bur me to ab aag lag chuki thi. uska dil kar rahaa tha ki dhanno ko dhakel kar khud thakur saaheb ke lund ke niche let jaaye. lekin wo aisa bas soch sakati thi, kar nahi sakti thi. thakur saaheb kisi jordaar toofan ki tarah chodne lage. mote lund ki jordaar chudaai se bur ki haalat dekhne laayak thi. dhanno ko aisa lagaa mano apne jindagi me itni jordaar chudaai kabhi nahi karwaai ho. thodi hi der me thakur saaheb dhanno ko kas kas ke champne lage aur unke shareer me mano kisi bhukamp ki tarah thartharaahat shuru ho gai. dhanno ki bur me lund ko champne ke saath dhanno ko apne bahon me kasne bhi lage. ab dhanno bhi samajh gai ki thakur saaheb lund se veerya giraane wale hain. isliye dhanno apne chutad ko aur uchkaane lagi. tabhi thakur saaheb ke munh se ek aah bhai karaah nikali kyonki ab thakur saaheb ke aloo jaise bade bade anduon se garam gadha veerya chal padaa tha. aur dusre hi pal lund ke munh se aise chhootna suru hua mano ki jaise kisi bandook se goli chhootati ho. veerya ka fabbara dhanno ki bachhedaani ke munh ko puri tarah se dubo diya. veerya ki garami paa kar dhanno bhi sitkaar maar kar jhadane lagi. jhadate samay dhanno cheekh uthi ".sss aaaaah ...oooh aaahi.....reee....maai...babu ji...b babu ji...mor niksal....buria me se nikasal paniya ...ye babu ji....buria ke paniya nikas gaele ...aah ...." aur isi ke saath dhanno apni kamar ko utaan karke jhadne lagi. thakur saaheb ka lund kafi jhatke le le kar veerya ko bur ki gahraai me fenkna suru kar diya tha. veerya ke akhiri bund tak lund jhatke leta rahaa. aur dono anduon ko puri tarah se bur me khaali kar diya. thakur saaheb ke dono anduye ab ekdam se khaali ho chuke the. lund bur ke andar veerya ko nikal kar mano ekdam se past ho chuka tha. bur me veerya puri tarah se pasar kar bhar gayaa tha aur aisa lag rahaa tha ki bur me veerya ke alawaa ab kuchh bhi nahi hai. kuchh pal tak thakur saaheb vaise hi past ho kar dhanno ke upar pade rahe mano shareer ka sara taakat bur me hi nikal gyaa ho.

fir ek gahari saans lete huye thakur saaheb dhanno ke upar se uthe aur apne lund ko bur ke andar se baahar kheench liye. bur me se jab lund baahar aaya to lund par pura veerya aur bur ka paani lagaa huaa tha. lund bahut hi vishaal lag rahaa tha. laund bhale jhad chukaa tha lekin khadaa viase hi tha mano bur me ghusne ki taiyaari kar rahaa ho. jaise hi thakur saaheb dhanno ke upar se uthe dhanno turant apni janghon ke beech apni peticot ke nichle hisse se apni bur ko ponchhne lagi. udher thakur saaheb ke lund ko gulabi apne peticot se ponchhne lagi. thodi hi der me lund par ka saara maal gulabi apni peticot se saaf kar li. dhanno chauki par se uthkar turant niche utar hai aur apne kapdon ko theek karne lagi. ---------thakur saaheb se pahli baar ki chudai ki is puraani kahaani me dhanno aise kho gai mano kisi gahre sapne me dhum rahi ho. tabhi is puraani kahaani me kho chuki dhanno ko bagal me baithi gulabi ne dhakel di aur boli "....kahaan kho gai hai tu....kis dunia me...lagta hai ki thakur saaheb ki pahli chudaai ke sapne me kho gai kya....chal savitri ko sab bataa di...." tabhi savitri bhi dhanno ke gambheer chehra ki or dekhte boli "...aree chachi ....ghar kab chalogi....mujhe der ho jaayegi to meri maa mujhe bahut daantegi...ghar chalo jaldi...." dhanno vastav me apne ko us puraani khayaalon se khud ko waapas kheench kar le aayi aur ek gahari saans le kar gulabi ki kothri me charo or dekhi, sukkhu , savitri aur gulabi ko dekh kar halki se muskuraa padi. use aisa lag rahaa tha ki kafi puraani ho chuki baate mano kal ki hi hon. tabhi savitri khaat par se khadi ho gai aur boli "...chachi chalo ...jaldi chalo....kitni der ho rahi hai...." itna sunkar dhanno boli "achchha ...chalti hun....chal..." yah bolkar dhanno bhi khaat par se khadi ho gai aur apne pallu aur saadi ko theek karne lagi. gulabi bhi savitri se boli "....chal...tu aati jaati rahnaa... dhanno chachi ke saath.... aaj to kitna mazaa ayaa tujhe..." yah sunkar sukkhu bhi bola "...haan ...aana to mujhe bhi jaroor dena ..." yah bolkar hansne lagaa. savitri sukkhu ke munh aisi baat sunkar mano fir se lazaa gai. fir dhanno gulabi se boli "...chalo aaj to tu puraani kahaani bataa kar meri saari yaden nayaa kar di.....sach me ....kitne saalon pahle ki baat hai...tab mere dono bachche ekdam se chhote chhote the...." tab gulabi boli "lekin teri kahaani puri kahaan hui...jab dusre din aayegi to aage ki kahaani is chhokari ko sunaaungi..." yah kah kar gulabi bagal me khadi savitri ki ek chuchi ko dupatte ke neeche se aur sameez ke upar se masal di. savitri ekdam se sann rah gai aur gulabi ki hath ko turant jhatkaarte huye boli "....chhe...chachi.....dhatt.." aur turant gusse wali munh banaa kar aage badhi aur kothri ke baahar aa gai aur fir peechhe peechhe tino baahar aa gaye. fir dhanno aur savitri, dono gulabi ke ghar se apne gaanv ki or chal di.

savitri do do baar chud jaane ke kaaran kuchh thaki mahsus kar rahi thi. kuchh tez kadmo se chalate huye kuchh der me apne gaanv aa gai. apna gaanv aate hi dhanno savitri se alag ho kar kuchh ghoom kar apne ghar ki chal di. dusari or savitri bhi apne ghar pahunch gai. ab sham ka andhera chhane lagaa tha. savitri dekhi uski maa shaam ka khana banaane ki taiyaari me lagi thi. fir savitri bhi maa ke saath khana banaane me lag gai. lekin saavitri ka pure badan aur bur me meethi meethi dard ho rahi thi. aaj ka din savitri ke liye kaafi nayaa aur masti bharaa tha. ek hi din do lundo se chud jaane se savitri andar hi andar kafi khush thi.

Kramashah………………………………………..

 
संघर्ष--52

गतान्क से आगे..........

कुछ दिन के बाद धन्नो सावत्री से गांव के बाहर मिली और बोली :-"अरे … सुन … तू तो एकदम से गायब सी हो गई .... कितने दिन हो गए दिखी ही नहीं … !"

तब सावत्री बोली :-" क्या करू चाची में सोच रही थी कि तेरे साथ माँ ने देख लिया तो बूरा हो जाएगा … !"

तब धन्नो बोली :-" कहाँ जा रही हो … ? पंडित जी कि दूकान पर क्या … !"

तब सावत्री बोली :-" हाँ चाची … और कहाँ जाउंगी … !"

तब धन्नो बोली :-" क्यूँ … गुलाबी चाची के गांव नहीं चलोगी … वह ठाकुर साहब और तेरा सुक्खू चाचा तुझे याद कर रहे हे .... और तेरे बदले में मुझे अपनी बजवानी पड़ती हे ही ही ही !" करती धन्नो चाची हंस पड़ी !

ये सुनकर सावत्री भी मुस्कुरा दी पर बोली कुछ नहीं !

तब धन्नो बोली :-" क्यूँ मन भर गया तेरा … अब मन नहीं करता क्या मजे लेने का … !"

तब भी सावत्री मुस्कुरा कर रह गई !

तब धन्नो फिर बोली :-" अब आज चलेगी कि नहीं गुलाबी चाची के गांव ?"

ये सुनकर सावत्री मुस्कराई ना में हलके से गर्दन हिलाई पर चुप ही रही !

तब धन्नो फिर बोली :-"क्यों नहीं चलेगी ?"

तब सावत्री बोली :-" ये बात नहीं चाची पर रोज रोज वो काम नहीं !"

तब धन्नो बोली :-" क्या वो काम री … क्या तुझे लंड अच्छा नहीं लगा उस दिन … !"

तब सावत्री बोली :-" छी चाची ऐसे मत बोलो !"

तब धन्नो बोली :-" अरे … चल कोई बात नहीं … फिर किसी दिन तुझे चुपके से वहाँ ले चलूंगी …

बोल … मेरे साथ चलेगी कि नहीं !"

तब सावत्री धीमे से लजा कर बोली :-" हाँ … चलूंगी … !

तब धन्नो धीमे से बोले :-" पंडित जी तो तेरी बूर रोज ले रहे होंगे न … वे तो तेरी चुदाई करते होंगे न .... उनका लौड़ा तो तेरी चूत बजाता होगा ना !"

ये सुनकर सावत्री बोली :-" छी चाची … केसी गन्दी गन्दी बातें करती हो … !"

तब धन्नो बोली ;-' अरे हरजाई इतना कुछ होने के बाद भी तू लजा रही हे .... बोल ना खुल कर ....

रोज रोज मजा लेते हे ना पंडित जी तेरा !"

इतना सुनकर सावत्री धीमे से बोली :-" हाँ चाची रोज लेते कभी मेरा महीना आ जाता हे तो चार दिन बाद एक ही दिन में दो बार .... " इतना कहते कहते वो लजा कर चुप हो गई !

फिर धन्नो बोली :-" चल ठीक हे खूब मजा ले तू … तुझे बड़ा अच्छा मौका मिला हे रोज मजा लेने का … खूब जवानी के मजे लूट !"

फिर कुछ धन्नो गम्भीर हो कर बोली ;-" सुन तुझे एक काम कि बात कहनी हे मुझे …

इसलिए इस रास्ते में तुझ से मिलने के लिए काफी देर से इन्तजार कर रही हु !"

इतना सुनकर सावत्री धन्नो कि तरफ देखती हुई बोली :-" क्या काम हे चाची !"

तब धन्नो बोली :-" वो कुछ दिन पहले शगुन चाचा आये थे … मेरी बेटी के लिए रिश्ता बता रहे थे … !"

इतना सुनकर सावत्री बोली :-" तब चाची !"

तब धन्नो बोली :-" अरे तब क्या … उसकी पहली शादी तो टूट गई … बड़ी मुस्किल से ये रिश्ता मिला हे … में भी भगवान से मांगती हु कि किसी तरह से बेटी का घर फिर से बस जाए !"

इतना सुनकर सावत्री पूछी :-" तो ठीक ही तो हे पर मेरे से काम क्या हे … !"

तब धन्नो बोली :-" अरे वो क्या हे कि लड़के वाले मेरी बेटी को देखना चाहते हे आज कल कोई भी बिना देखे रिस्ता करता नहीं हे !"

तब सावत्री बोली :-" तो देखने दो ना चाची मुसम्मी दीदी कौन सी दिखने में ख़राब हे वो सुन्दर तो हे … !"

तब धन्नो बोली :-" तू ठीक कहती हे पर मुसम्मी सूरत से ठीक दिखती हे पर करतूत में नहीं !"
 
यह बात सावित्री को समझ मे नही आई तो बोली "क्या चाची...कैसी करतूत मे ठीक से समझी नही है...?" तब धन्नो बोली "...देख पहली शादी जब हुई थी तो इस गाँव के हरामी अफवाह उड़ाए थे कि मुसम्मि छिनार है तो ऐसी है...और नतीज़ा शादी टूट गई...ये जान ले कि गाँव मे किसी को मालूम चल गया कि मुसम्मि की शादी होने वाली है तो ...फिर गाँव के हराम्जादे मुसम्मि के बारे मे अफवाह उड़ा उड़ा कर शादी तोड़ देंगे...इसलिए मैं सोची हूँ कि मुसम्मि को दिखाउन्गि ...लेकिन गाँव से दूर..." सावित्री बोली "कहाँ..?" तब धन्नो बोली "...मैं सगुण चाचा से बोली हूँ कि उन्ही के घर..जो कुच्छ दूर ...कोई चार पाँच कोस की दूरी पर है...वहीं दिखाउंगी..." सावित्री यह सुनकर बोली "ठीक तो है चाची...लड़के वालों को दिखा दो वहीं पर..गाँव मे पता भी नही चलेगा किसी को..." तब धन्नो बोली " ....हाँ री....लेकिन कल का दिन ही तय हुआ है लड़की दिखाने के लिए...और मैं सोचती हूँ कि किसी को नही ले जाउन्गि साथ मे ....बस तू ही रहेगी और मैं..." यह सुनकर सावित्री एकदम से सोच मे पड़ गई. फिर बोली "अरी...चाची ...लेकिन मुझे तो दुकान पे रोज़ जाना होता है..." तब धन्नो बोली "..अरी दुकान पे एक दिन नही जाओगी तो क्या पहाड़ टूट जाएगा...मत जाना कल के दिन...और परसों जब पंडित जी पुन्छेगे तो बोल देना की पेट मे दरद हो रहा था...." यह सुनकर सावित्री मानो चिंता मे पड़ गई. धन्नो सावित्री के चेहरे को देख कर बोली "...तू बेकार की चिंता कर रही है...यदि तुझे बहुत डर लग रहा है तो ..चल मैं खुद ही पंडित जी से बोल देती हूँ कि तू कल नही आएगी..." यह सुनकर सावित्री को कुच्छ समझ मे नही आ रहा था कि अब क्या जबाव दे. फिर धन्नो बोली "...तू कैसी लड़की औरत है री कि तुझे झूठ बोलना नही आता...अरी तू बोल देना कि पेट दरद कर रहा था, सर दरद कर रहा था...चाह तो तेरे पास हज़ार बहाने मिल जाएँगे..." यह सुनकर सावित्री कुच्छ नही बोली. तब धन्नो फिर बोली "...तू कल सगुण चाचा के घर चल ...और परसों जा कर पंडित जी से बोल देना कि पेट दरद कर रहा था..इसलिए दुकान पर नही आई..." यह सुनकर सावित्री धीमे से बोली "ठीक है...लेकिन वो सगुण चाचा का घर कहाँ पड़ता है...?" यह सुन कर धन्नो बोली "...यही कोई चार पाँच कोस की दूरी पर है....मैं बता रही हूँ कि कैसे जाना है..." सावित्री गौर से धन्नो की बात सुनने लगी. धन्नो बोली "...कल सुबह जब दुकान पर जाने की लिए निकलना तो गाँव के बाहर रास्ते मे पड़ने वाले बगीचे मे मुसम्मि तुझे मिल जाएगी...और तू मुसम्मि के साथ उस सड़क पे आ जाना और वहीं से कोई सवारी गाड़ी या जीप पकड़ लेना और मुसम्मि सगुण चाचा का घर देखी है..." यह सुनकर सावित्री तुरंत पुछि "...और तू चाची...तू नही जाएगी क्या...?" तब धन्नो बोली "...अरी तू समझती नही ....देख...तू दुकान पे जाने के लिए अपने घर से करीब दस बजे निकलेगी...और मैं साहूकार से कुच्छ पैसे उधार ले कर दोपहर बारह बजे से चलूंगी तो एक बजे तक पहुँच जाउन्गि...फिर वहाँ साड़ी और मिठाई खरीदुन्गि...तो यही ठीक होगा कि तू मुसम्मि के साथ पहले ही सगुण चाचा के घर चली जाना..." इतना सुनकर सावित्री बोली "...साड़ी क्या होगी चाची...?" यह सुनकर धन्नो बोली "...मुसम्मि वही साड़ी पहन कर लड़के के बाप के सामने जाएगी ना..." यह सुनकर सावित्री पुछि "..कौन कौन देखने आ रहा है लड़के की ओर से...?" इतना सुनकर धन्नो बोली "...बस लड़के का बाप ही आ रहा है...और कोई नही..." यह सुनकर सावित्री बोली "तो क्या घर मे कोई दूसरी साड़ी नही है चाची...?" यह सुनकर धन्नो बोली "...अरी...एक साड़ी थी वैसी तो पुरानी हो गई...और दूसरी है ही नही उस तरह की...एक नया ले लूँगी...इसी लिए तो साहूकार से पैसे उधार लेने पड़ रहे हैं...क्या बताउ मौके पे पैसे भी नही रहते.." फिर सावित्री बोली "...वो कैसी साड़ी है चाची...कोई दूसरे तरह की है क्या..?" यह सुनकर धन्नो बोली "...चल कल खुद ही देख लेना...तो कल ठीक दस बजे तुम गाँव के बाहर वाले बगीचे मे आ जाना वहीं मुसम्मि मिलेगी तुझे...ठीक.." यह सुनकर सावित्री कुच्छ सोचकर एक गहरी साँस ली. तब धन्नो बोली "तू फिकर मत कर ...तू बहाने नही बना पाएगी तो मैं पंडित जी से बोल दूँगी...चल कल टाइम से आ जाना...बगीचे मे ...चल अब जा दुकान पर.." इतना सुनकर सावित्री बोली "ठीक है चाची..." और फिर दुकान की ओर चल पड़ी.

दूसरे दिन ठीक दस बजे दुकान जाने के बहाने सावित्री उस बगीचे मे आ गई जहाँ पहले से ही मुसम्मि उसका इंतज़ार कर रही थी. सावित्री को देखते ही मुसम्मि बोली "...मैं आधा घंटे से यही सोच रही थी कि कब आओगी...चलो जल्दी से सड़क पे चला जाय..." फिर सावित्री ची मुस्कुरा कर आगे बोली "...चाची दस बजे का टाइम बताई थी...इसीलिए दस बजे आ गई..." मुसम्मि बोली "...मा तो बारह एक बजे आएगी.. वहाँ...चलो देखो कोई गाड़ी मिलती है तो चला जाय..." यह कह कर दोनो सड़क पर आ गयी और सगुण चाचा के घर की ओर जाने वाली किसी सवारी गाड़ी का इंतजार करने लगे. कुच्छ देर बाद दूर से एक जीप आती दिखाई दी. मुसम्मि उस जीप को देख कर बोली "...चलो एक सवारी वाली जीप आ रही है...इसी से चला जाय.." अगले ही पल जीप नज़दीक आते ही मुसम्मि ने उसे रुकने के लिए हाथ से इशारा किया. जीप चू के साथ ब्रेक मारते हुए ठीक दोनो के सामने ही रुक गई. जीप सवारिओं से पूरी तरह से ठसाठस भरी हुई थी और कुच्छ लोग तो जीप के पीछे लटके भी हुए थे. जिसे देखकर सावित्री मुसम्मि से बोली "..इसमे तो जगह नही है ...कहाँ बैठोगी दीदी..." इतना सुनकर जीप का खलासी तुरंत बोल पड़ा "..मैं बैठा रहा हूँ...काहे को इतना चिंता कर रही हो...आओ जहाँ चाहो वहाँ बैठो ...जगह ही जगह है..." इतना बोलकर खलासी जीप के पीछे वाले हिस्से को खोला और अंदर बैठे सवारिओं को तेज़ आवाज़ मे बोला "...अरी..दब जाओ थोड़ा...लेडीज़ सवारी है...थोड़ा दब जाओ..बैठने दो....." जीप के अंदर बैठे लोगो मे कोई हरकत नही हुई, कोई टस से मस नही हुआ, और होता भी कैसे मानो तिल रखने की जगह नही थी जीप के अंदर. यह देख कर जीप का खलासी जीप के अंदर अपने सर घुसा कर गुस्से मे बोला "...अरी दब क्यों नही रहे हो सब लोग....ये लेडीज़ सवारी है..बैठने दो ...लगता है पूरी गाड़ी बुक करा लिए हो...चलो खिस्को...दबो..." यह सुनकर अंदर एक 45-50 साल का आदमी गुस्से मे बोला "...जगह कहाँ है जो कोई दबे...सर पे बिठाओगे...इसी मे ठूंस रहा है मानो कोई आदमी नही ...भूसा है..." यह सुनकर खलासी बोला "...अरी चाचा...इस लेडीज़ को बैठने तो दो...दूसरी लेडीज़ को मैं आगे वाली सीट पर आर्गेस्ट कर दूँगा..." इतना सुनकर कर वह अधेड़ आदमी एक नज़र जीप के पीछे खड़ी सावित्री के जवान बदन को देखा फिर खलासी से बोला "कहाँ बैठाओगे...ले आओ बैठाओ..." यह सुनकर खलासी तुरंत सावित्री की एक हाथ को पकड़ कर जीप मे घुसने के लिए धकेलने लगा. सावित्री बैठी हुए सवारिओं के बीच अपने पैर को संभाल कर रखती हुई जीप के अंदर आख़िर किसी तरह घुसने लगी और अपना सर जीप के अंदर की ओर कर ली और झुके होने के नाते बस चूतड़ ही जीप के बाहर लटक रहा था तभी खलासी अपना एक हाथ सावित्री के गोल भारी भरकम चूतड़ पर रख कर जीप के अंदर की ओर ठेलते हुए बोला "...अंदर चली जाओ जगह है चाचा के बगल मे ...." सावित्री उस खलासी का हाथ अपने चूतड़ पर पा कर एकदम से गन्गना गई. बैठाने के बहाने उस खलासी ने काफ़ी चलांकि से सावित्री के चूतड़ पर हाथ लगाए रखा.
 
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