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सगुण: "भाई उस दिन तो कमाल ही कर दिए..."
तुली बाबू: ".. मुझे उस दिन इतना गुस्सा आया ..मानो .. मेरी जिंदगी मे इतना गुस्सा कभी नही आया था..."
सगुण: "यह सुनकर वो ठाकुर की गान्ड फट गई होगी.."
तुली बाबू: ".. क्यो नही फटेगी..
ठाकुर मुझसे कहने लगा... अब शांत हो जाओ... मैं अपने लड़के से पूछूँगा.. और साले को मार मार कर जिंदा ही दफ़ना दूँगा.... साला दूसरों की इज़्ज़त से खिलवाड़ कर रहा है...
"सगुण: "... तब तुम शांत हो गये कि नही..?"
तुली बाबू: ".. नही ... मैं उसी खेत पर बैठ गया .. फिर एक खेत मे काम करने वाले आदमी ठाकुर के लड़के को बुला कर लाया .."
सगुण: ".. फिर क्या हुआ..?"
तुली बाबू: "... ठाकुर ने मेरे सामने ही अपने बेटे को सौ सौ गालियाँ दी.. और कहा कि यदि आज से इसके घर गये तो जिंदा गाढ दूँगा ज़मीन मे...."
सगुण: ".. वो कुच्छ बोला नही?"
तुली बाबू: ".. नही .. अपने बाप का खौलता हुआ खून देख कर साले की जवानी का रंग ही फीका पड़ गया.. "
सगुण: ".. ठीक ही किए... "
तुली बाबू: ".. उसी के बाद मैं वापस घर आया.."
सगुण: "... चलो अब तो गुस्सा शांत हो गया होगा..."
तुली बाबू: "... अरे नही... मेरा गुस्सा अभी तक शांत नही हुआ था..."
सगुण: ".. अब किसकी बारी थी..?"
तुली बाबू: ".... बेटे की..."
सगुण: ".. उसकी क्या ग़लती थी...?"
तुली बाबू: ".. उसी साले से तो दोस्ती करके ठाकुर का लड़का घर मे घुसने लगा था और सभी को चोद कर चला गया..."
सगुण: ".. हुउँ ... ये तो सही कहा."
तुली बाबू: ... " उस दिन मानो मेरे उपर कोई भूत सवार था... घर पर अकेली बहू ही थी.. और बेटा कही घूमने गया था.. और जैसे ही वो घर आया मैने उसकी मा चोद दी उस गुस्से मे .."
सगुण: ".. क्या किए बेटे के साथ...?"
तुली बाबू: "... सबसे पहले जैसे ही मैने उसे देखा .. उससे पुछा... ठाकुर का लड़का तुम्हारा क्या लगता है? .. और जैसे ही वो कहा कि वो उसका दोस्त है .. मैने बहू के सामने ही उसे कई थप्पड़ और लात मारी.. "
सगुण: "... बाप रे... इतने गुस्से मे थे.."
तुली बाबू: ".... मेरा गुस्सा और पिटाई देख कर बहू वहाँ से अपनी कोठरी मे भाग गई....."
सगुण: "... तुम तो एकदम से दानव हो गये थे उस दिन.."
तुली बाबू: "... हां... मेरा बेटे तो इतना डर गया की मेरा हाथ जोड़ने लगा... तब मैने उससे कहा कि अभी तुम घर छोड़ कर शहर जाओ नही तो मैं मारते मारते जान निकाल दूँगा..साला कमाई एक पैसे की नही है और दिन भर गाँव मे घूमना और घर मे आवारों को बुला कर घर गंदा करवा दिया है..."
सगुण: "... तो क्या वह शहर जाने के लिए तैयार हो गया..?"
तुली बाबू: ".. अरे.. उस दिन वो साला थर थर काँप रहा था मानो .. दया की भीख माँग रहा था...और तुरंत शहर जाने के लिए कपड़े और सामान झोले मे रख लिया.."
सगुण:".. शहर कहाँ जाता वो..?"
तुली बाबू:" अरे .. मेरे गाँव के कई लोग वहाँ काम करते हैं.. उन्ही मे से किसी के यहाँ चला जाता और दूसरे ही दिन काम मिल जाता.."
सगुण:" तो वो शहर चला गया?"
तुली बाबू: "... हाँ .. अरे वो एक घंटे मे ही ... दिन के दो बजे ही वो शहर के लिए घर छोड़ दिया...."
सगुण: "... तो घर पे कौन रह गया था..?"
तुली बाबू: ".. बस बहू और मैं रह गये थे.."
सगुण: ".... और रमिया की मा कहाँ थी..?"
तुली बाबू: ".. बताया तो .. कि वो अपने मायके गई थी .... दो दिन पहले की ... करीब एक महीने के लिए.."
सगुण: ".. ऊ.... तो बस बहू थी...वो अकेली हो गई....."
तुली बाबू: "... वो साली अकेली रहे या जैसे... थी तो एकदम से रंडी ..."
सगुण: ".. फिर कुच्छ कहने लगी क्या?"
तुली बाबू: "... जैसे ही मेरा बेटा शहर के लिए दरवाजे से बाहर गया.... बहू तुरंत मेरे पास आ कर कहने लगी बाबू जी ..सरसो का तेल लेते आइए..."
सगुण: "किस लिए सरसो का तेल माँग रही थी...? "
तुली बाबू: ".. मैने जब पुछा.. क्या करेगी सरसो का तेल...? .. तो वो बोली ... बाबू जी.. तेल से खूब मज़ा आता है.. उसके मुँह से ऐसी बात सुनकर मेरा लंड धोती मे तन कर खड़ा हो गया.
सगुण: ".. साली बड़ी रंगीन थी..."
तुली बाबू" .. मैं तुरंत दुकान से सरसो के तेल की सीसी लेकर आ गया और बहू को देकर उसकी दोनो चुचिओ को माल दिया.."
सगुण: " .. कुच्छ बोली नहीं...?"
तुली बाबू: ".. मलवा कर बोली ..बाबू जी .. आज रात होने दीजिए तब आप पूरा खोल कर इसे लूटीएगा.. यह सुनकर मेरा लंड एकदम से बेकाबू हो गया और मैं किसी तरह अपने मन को काबू मे करके रात होने का इंतजार करने लगा"
सगुण: ".... इतनी गरम छिनाल को कहाँ से ढूँढ कर ले आए थे..?"
तुली बाबू: ".....साला मुझे पता ही नही था कि ... ये इतनी रंडी और लंडखोर है .. नही तो अपने बेटे की शादी इससे कभी ना किया होता"
सगुण: "... तो क्या उस रात उसकी धुनाई किए कि नही...?"
तुली बाबू: ".... तेल लगा लगा कर पूरी रात चोदा था उस दिन.. साली सुबह चल नही पा रही थी..."
सगुण: "..ठीक किए.... ऐसी लंडखोर बहू को ऐसे ही चोदना चाहिए..., उसका मशीन कैसी थी... रात मे तो ठीक से देखे ही होगे..?"
तुली बाबू: "...जब रात मे उसके कमरे मे गया तो ... पहले लालटेन के उजाले मे उसे एकदम से नंगी कर दिया... तब देखा की उसकी बुर एक दम पकौड़ी जैसी थी ...."
सगुण: "... झांट थी कि नही?"
तुली बाबू: ". खूब ..."
सगुण: ".. लालटेन के उजाले मे चोदे की .. अंधेरा कर के.."
तुली बाबू: ".. पहले तो लालटेन के उजाले मे उसे खूब चोदा और करीब बारह बजे रात मे मैं झाड़ गया.. फिर सुबह तीन बजे से उसे...अंधेरे मे ही चोदा.."
सगुण: "... बुर उठा उठा कर ठोकर लेती थी कि नही..?"
तुली बाबू: "... अरे.. वो साली बहुत गरम और रसदार थी.... बहुत बुर उठाती थी... "
सगुण: "... बुर का कसाव कैसा था...?"
तुली बाबू: ".. कसाव ठीक था... क्योंकि बुर छोटी थी... समझो एक रुपये के सिक्के के बराबर थी.. बड़ा कसा लंड जाता था..."