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मुसम्मि: "... टार्च .. बंद कीजिए .. तभी तो पेटिकोट पहनूँगी..."
सगुण: "... ऊ .. ले बुझा दिया .. जल्दी से पहन ले.."
फिर सगुण टार्च को बुझा दिया और कमरे मे फिर घुप्प अंधेरा च्छा गया. मुसम्मि उस अंधेरे मे तेज़ी से अपने सलवार को निकाल ली और नीचे चड्धि भी नही पहनी थी. फिर तुरंत पेटिकोट को कमर तक ला कर जारवाँ बाँध ली.
मुसम्मि: ".. पहन ली.. अब क्या करना है..?"
सगुण: ".. चल अब मेरे सिरहाने की ओर आ जा और यहाँ अपने पैर मोड़ कर बैठ जा.."
फिर सगुण टार्च जला दिया और जैसे बताया वैसे ही मुसम्मि अपना पैर मोड़ कर बैठ गई.
सगुण: ".. देख तू अपने पैर के उपर हिस्से पर मेरा सर रख लेगी ... उपरी हिस्सा मतलब ..अपनी जाँघ पर.."
मुसम्मि: " . ऊह .. ये तो तेल लग जाएगी पेटिकोट पर..."
सगुण: ".. हां ... ये तो सही कह रही है .. तो चल मैं टार्च बुझा देता हूँ .. तू जाँघ पर से पेटिकोट उपर की ओर सरका ले ..."
मुसम्मि: ".. ऊह .. ऐसा करना ज़रूरी है क्या..?"
सगुण: ".. इसीलिए तो कह रहा था ... तू मान ही नही रही है .. ये काम तेरी चाची से हो जाता है .. तू नही कर पाएगी.. चल जाने दे ... तेल रख आ..."
मुसम्मि: ".. आप नाराज़ हो जाते हैं... चलिए टार्च बुझा दीजिए मैं ऐसे कर लेती हूँ.."
फिर सगुण टार्च बुझा दिया और मुसम्मि अपने जाँघ पर से पेटिकोट उपर की ओर सरका दी. फिर सगुण अपना सर पैर मोड़ कर बैठी हुई मुसम्मि के जाँघ पर रख दिया.
सगुण: "... अब देख तो .. कितना सही है .. अब तू तेल मेरे सर मे रख कर मालिश कर..."
मुसम्मि: ".. ठीक है ... "
फिर मुसम्मि कटोरी मे से तेल ले कर सगुण के सर मे रख कर सर की मालिश करने लगी.
सगुण: "... तू ऐसे किसी का मालिश नही की है क्या...?"
मुसम्मि: "नही..."
सगुण: ".. तेरा मरद ऐसे नही करवाता था..?"
मुसम्मि: ". नही .."
सगुण: ".. तब क्या करवाता था... साला .. बीबी से तेल मालिश नही करवाए .. .. वो मरद कैसा."
मुसम्मि: ".. तेल लगाती थी ... लेकिन ऐसे नही..."
सगुण: "... कैसे लगाती थी..?"
मुसम्मि: "... सीधा सीधा लगा देती थी....."