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सबाना और ताजीन की चुदाई compleet

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शबाना तब तक ग्लास में बर्फ और पानी ले आई. प्रताप ने बता दिया था कि जगबीर 2-3 पेग ज़रूर मारेगा.

जब वो पीने लगा तो ताज़ीन उसके पास आकर बैठ गई और उसकी जांघों पर हाथ फिराने लगी, अंदर की तरफ. जगबीर का भी लंड उठने लगा था, और ताज़ीन बराबर उसके घुटनों से लेकर उसकी ज़िप तक अपने हाथ घुमा रही थी. जगबीर ने अपना दूसरा पेग बनाया "अकेले ही पियोगे क्या ?" शबाना ने अपना पैर जगबीर की जाँघ पर रखते हुए पूचछा. "यह क्या कह रही हो ताज़ीन तुम शराब पिओगी ?" शबाना ने जगबीर के कुच्छ बोलने से पहले ही पूच्छ लिया - वो किचन से बाहर आई. "शबाना यह तो चलता है, में कभी कभी पी लेती हूं, जब किसी मर्द का साथ होता है और वो हिजड़ा जावेद बाहर होता है" ऐसा कहकर उसने जगबीर का पेग उठाया और सीधे एक साँस में अपने मुँह में उडेल लिया. जहाँ शबाना थोड़ा संकोच करती थी - वहीं ताज़ीन काफ़ी खुली हुई और ज़िंदगी का मज़ा लेने वालों में थी. उसने काफ़ी लंड खाए थे.

अब जगबीर ने दूसरा पेग बनाया और दूसरे ग्लास में भी शराब उदेलने लगा तो ताज़ीन ने रोक दिया "एक से ही पी लेंगे, तुम अपने मुँह से पिलाओ मुझे". वो उठ कर जगबीर की गोद में बैठ गई उसकी स्कर्ट और ऊपर हो गई, उसने अपनी चूत जगबीर के लंड के उभार पर रगडी और उसके गले में बाहें डालकर उसके होंठों को चूम लिया "पहली बार कोई सरदार मिला है, मज़ा आ जाएगा" उसने ग्लास उठाया और जगबीर को पिलाया - फिर जगबीर के होंठो को चूमने लगी. जगबीर ने अपने मुँह की शराब उसके मुँह में डाल दी. इस तरह दोनों 3-4 पेग पेग पी गये. अब ताज़ीन नशे में धुत्त थी और उसके असली रंग बाहर आने वाले थे. जी हाँ, नशे में ही सही सोच बाहर आती है.

अब जगबीर की उंगलियाँ ताज़ीन की स्कर्ट में घुस कर उसकी चूत का जायज़ा ले रही थी. उसके होंठ ताज़ीन के होंठो से जैसे चिपक गये थे और उसकी जीभ ताज़ीन की जीभ को जैसे मसल कर रख देना चाहती थी. ताज़ीन भी बेकाबू हो रही थी और उसने जगबीर की शर्ट के सारे बटन खोल दिए थे. जगबीर ने उसकी टी-शर्ट में हाथ घुसा दिए, और उसके मम्मों को रौंदना शुरू कर दिया. उसके निपल्स को अपनी उंगलियों में दबाकर उनको कड़क कर रहा था. ताज़ीन ने ब्रा नहीं पहनी थी. फिर ताज़ीन ने अपने हाथ ऊपर उठा दिए, और जगबीर ने उसकी टी-शर्ट को निकाल फेंका.

प्रताप और शबाना उठ कर बेडरूम में चले गये. दोस्तो कहानी अपने पूरे शब्बाब पर आने वाली है अब दोनो हसीनाए मस्त हो चुकी है उनकी चूत लंड खाने को बेताब हो चुकी है आगे की कहानी अगले भाग मे पढ़ते रहे आपका दोस्त राज शर्मा क्रमशः................

 
Raj-Sharma-stories

सबाना और ताजीन की चुदाई -4

गतान्क से आगे............

अब जगबीर ने उसके गोरे मुलायम मम्मों को चूमना चाटना और काटना शुरू कर दिया. "और काटो जग्गू बहोत दिनों से आग लगी हुई है. मज़ा आ गया." जगबीर ने अपना हाथ उसकी स्कर्ट में घुसाकर पॅंटी को साइड में किया और चूत पर उंगली रगड़ने लगा. ताज़ीन मदहोश हो रही थी उसने जगबीर के होंठों को कस कर अपने होंठों में दबा लिया और अपनी जीभ घुसा दी. फिर जगबीर ने उसे वहीं सोफे पर लिटा दिया और उसकी स्कर्ट और चड्डी एक झटके से खींच कर नीचे फेंक दी. ताज़ीन के दोनों टाँगों के बीच जगबीर की उंगलियों में रेस लगी हुई थी, चूत में घुसने और बाहर निकालने की. सीधी चूत में घुसती और बाहर निकल जाती. जगबीर की उंगली एकदम भीतर तक जाकर ताज़ीन को पागल कर रही थी. "अब उंगली ही करोगे या चूसोगे भी, आग लगी है चूत में, जग्गू खा लो इसे. मेरी चूत को आज फाड़ कर रख दो जग्गू" तभी जगबीर ने उसकी चूत को फैलाया और उसके दाने को अपने मुँह में भर लिया, नीचे से अंगूठा घुसा दिया. ऊपर जीभ घुसा कर चूत को अपनी जीभ से मसलकर रख दिया. पागल हो गई ताज़ीन उसने अपनी टाँगें जगबीर की गर्दन से लपेट ली और अपनी गंद उठाकर चूत उसके मुँह में ठूंस दी. जगबीर भी पक्का सयाना था, उसने चूत चूसना जारी रखा और अब अंगूठा चूत से निकालकर उसके गंद में घुसा दिया, जिससे ताज़ीन की पकड़ थोड़ी ढीली हो गई. और जगबीर फिर चूत का रस पीने लगा - और ताज़ीन की गंद फिर उच्छलने लगी. उसकी गंद में जगबीर का अंगूठा आराम से जा रहा था. फिर जगबीर ने उसकी चूत को छ्चोड़ा और ताज़ीन को सोफे पर बैठा दिया और उसके सामने खड़ा हो गया. ताज़ीन ने जल्दी से उसकी पॅंट की ज़िप खोली और पॅंट निकाल दी, फिर अंडरवेर भी. अब जगबीर बिल्कुल नंगा खड़ा था ताज़ीन के सामने. "यार इस पूरे लंड का मज़ा ही कुच्छ और है." ताज़ीन ने जगबीर के लंड को आगेपीच्चे करते हुए कहा. जैसे जैसे वो उसे आगे पीछे करती उसके ऊपर की चमड़ी आगे आकर सूपदे को ढँक देती फिर उसे फिर से खोल देती, जैसे कोई साँप अंदर बाहर हो रहा हो. "मज़ा आ जाएगा लंड खाने में." तभी जगबीर ने उसके सर को पकड़ा और अपना लंड ज़ोर से उसके मुँह पर हर जगह रगड़ने लगा.

ताज़ीन की आँखे बंद हो गई और जगबीर अपना लंड उसके मुँह पर यहाँ वहाँ सब जगह रगडे जा रहा था, उसने अपना मुँह खोल दिया लंड मुँह में लेने की लिए. मगर जगबीर ने सीधे अपनी गोतिया उसके मुँह में डाल दी, और वो उन गोटियों को चूसने लगी, उन्हें अपने मुँह में भरकर दाँतों मे दबाकर खींचने लगी, फिर

गोलियों से होती हुई जगबीर के लंड की जड़ को मुँह मे लेने लगी, फिर जड़ से होती हुई टोपी पर पहुँच गई और लंड को मुँह में खींच लिया. अब वो बेतहाशा लंड चूसे जा रही थी. गजब के एक्सपीरियेन्स था उसे लंड चूसने का, जगबीर की सिसकारियाँ निकल रही थी. फिर ताज़ीन अचानक उठी और सोफे पर खड़ी हो गई और जगबीर के गले में बाहें डालकर झूल गई. उसने अपना हाथ नीचे किया और जगबीर का लंड अपनी चूत में घुसाकर अपने पैर उसकी कमर के चारों ओर लपेट ली. अब वो जगबीर की गोद में थी और जगबीर का लंड उसकी चूत में घुसा हुआ था. जगबीर उसी अंदाज़ में उसे धक्के लगाने लगा ताजीन की चूत पानी छ्चोड़ रही थी जो ज़मीन पर गिर रहा था, जगबीर का लंड पूरी तरह से भीग गया था. फिर जगबीर उसी हालत में उसे बेडरूम में ले गया और बिस्तर पर पटक दिया. "ओह जग्गू आज मेरी चूत तेरा लंड खा जाएगी, पीस डालेगी तेरे लंड को मेरी जान" ताज़ीन की गंद उच्छाल रही थी और ज़बान फिसल रही थी, कुच्छ शराब और कुच्छ सेक्स का असर था. अचानक जगबीर ने उसकी चूत से लंड को बाहर निकाला और उसकी टाँगें एकदम से उठा दी. और अपना लंड सीधे ताज़ीन की गंद में घुसा दिया. एक बार तो ताज़ीन की चीख निकल गई लेकिन उसने अपने आप को संभाल लिया. फिर जगबीर ने उसकी गंद मारनी शुरू कर दी. कुच्छ देर बाद ताज़ीन की सिसकारिया फिर कमरे में गूंजने लगी "ओह जग्गू मज़ा आ गया गंद मरवाने का, मेरे जिस्म में जितने भी छेद हैं, सब में अपना लंड घुसा दो जग्गू. मेरी चूत तेरे लंड की प्यासी है जग्गू और मेरी गंद तेरा लंड खाने ही बनी है. मेरी जान आज की चुदाई ज़िंदगी भर याद रहनी चाहिए." काफ़ी देर उसकी गंद मारने के बाद जगबीर ने अपना लंड निकाला और ताज़ीन की चूत पर मसल्ने लगा. "और कितना तड़पावगे मेरी जान" ऐसा कहकर ताज़ीन झटके से उठी और जगबीर को नीचे गिरा लिया और उसपर चढ़ बैठी, उसने जगबीर के लंड को अपनी चूत में घुसाया और ज़ोर ज़ोर से उच्छलने लगी. पागल जैसे हो गई थी वो "जग्गू देख मेरी चूत तेरे लंड का क्या हाल करेगी. पीस कर रख देगी वो तेरे लंड को. खा जाएगी तेरा लंड." ऐसा कहते कहते उसकी रफ़्तार तेज़ हो गई और वो एकदम से झुक गई जगबीर पर और अपनी गंद को और जोरों से हिलाने लगी, जगबीर समझ गया की यह जाने वाली है, उसने भी नीचे से धक्के लगाने शुरू कर दिए "हां जग्गू ऐसे ही, मेरी चूत के पानी में डूबने वाला है तेरा लंड. बस ऐसे ही और थोड़े झटके लगा, में तेरे लंड को नहला दूँगी अपनी चूत के रस से, मेरी चूत में भी अपने लंड का पानी पिला दे." तभी वो ज़ोर से उच्छली और फिर धीरे धीरे आखरी दो झटके दिए और जगबीर पर गिर पड़ी. उसकी चूत ने पानी छ्चोड़ दिया था. और जगबीर ने भी. वो ऐसे ही लेटे रहे कुच्छ देर.
 


फिर वो उठी और जगबीर के लंड को चूम चाटकार सॉफ कर दिया.

"चलो में भी बाथरूम में जाकर सॉफ हो जाती हूँ. तब तक शायद शबाना और प्रताप का भी काम हो जाएगा." यह सुनकर जगबीर को ध्यान आया कि वो दोनों भी दूसरे कमरे में मज़े ले रहे हैं.

जगबीर उठकर सीधे दूसरे कमरे में गया, दरवाज़ा बंद था. उसने दरवाज़े को धक्का दिया, वो खुल गया. अंदर से बंद करना भूल गयी थी शबाना.

शबाना की दोनों टाँगें हवा में तार रही थी और प्रताप उसके ऊपर चढ़कर धक्के लगा रहा था शबाना की सिसकारियाँ कमरे में गूँज रही थी और प्रताप के धक्के रफ़्तार पकड़ रहे थे, अचानक शबाना ने अपने पैर बेड पर रखे और ज़ोर से अपनी गंद हवा में उठा दी, उसकी मस्ती चरम पर पहुँच रही थी और वो झड़ने वाली थी. उसने नीचे से प्रताप के लंड पर ज़ोरों से झटके देने शुरू कर दिए, जैसे उस लंड को अपनी चूत में दबाकर खा जाएगी. उधर प्रताप के भी धक्के तेज़ होने लगे.

तभी प्रताप ने धक्के रोके और शबाना को उठाकर अपने ऊपर बिठा लिया, शबाना की चूत में लंड घुसा हुआ था और वो प्रताप के ऊपर बैठी थी, प्रताप ने उसकी गंद के नीचे अपने हाथ रखे और उसे उठाकर उसकी चूत में लंड के धक्के लगाने लगा, शबाना का पूरा वज़न उसके लंड पर था और जैसे उसकी चूत में हथौड़े चल रहे थे, उसकी सिसकारिया और तेज़ हो गयी और अब वो आवाज़ों में बदल गई थी. प्रताप ने उसे ऐसे वक़्त में पलट दिया था जब उसकी चूत में बरसात होने वाली थी, इसलिए उत्तेजना बिल्कुल चरम पर थी उसकी, ऐसा लग रहा था जैसे रेगिस्तान में बारिश वाले बादल आए और अचानक छेंट गये.

जगबीर का लंड फिर खड़ा हो गया यह सब देख कर और वो सीधे अंदर घुस गया. प्रताप ने उसे देख लिया पर वो रुका नहीं. शबाना को पता नहीं था कि जगबीर अंदर आ चुका है. जगबीर सीधे शबाना के पीछे जाकर खड़ा हो गया, और शबाना के गले को चूमने लगा. शबाना बिल्कुल चौंक गई, मगर उसकी हालत ऐसी नहीं थी कि वो कुच्छ कर पाती, तभी जगबीर ने पीछे से हाथ डालकर उसके मम्मे पकड़ लिए और पीछे से उसकी पीठ को बेतहाशा चूमते हुए उसके मम्मों को दबाने लगा. फिर शबाना को उसने धक्का दिया और वो सीधे प्रताप की छाती से चिपक गई, उसकी चूत में प्रताप का लंड घुसा हुआ था और अब भी प्रताप उसे उच्छाल रहा था, तभी जगबीर नीचे झुका और शबाना की गंद चाटने लगा. शबाना को जैसे करेंट सा लगा, लेकिन एक अजीब सी चमक आ गई उसकी आंघों में. जगबीर उसकी गंद को चाते जा रहा था, शबाना की चूत का पानी गंद तक आ चुका था और जगबीर ने उसकी गंद में उंगली डालना शुरू कर दिया. शबाना तो जैसे एकदम पागल हो गई, अब वो डबल मज़ा लेने के पूरे मूड में आ गयी थी.
 
यूँ तो प्रताप भी उसकी गंद मार चुका था, लेकिन गंद और चूत दोनों में एक साथ लंड की बात सोचकर ही उसकी उत्तेजना और बढ़ गई. अब जगबीर ने अपना मुँह हटाया और अपना लंड शबाना की गंद पर रख दिया और धीरे धीरे दबाव बढ़ने लगा. शबाना ने प्रताप को रुकने का इशारा किया, वो महसूस करना चाहती थी, जगबीर के लंड को अपनी गंद में घुसते हुए, हर चीज़ का पूरा मज़ा लेती थी वो. आराम से, कोई जल्दी नहीं थी उसे. हर चीज़ का पूरे इतमीनान से इस्तेमाल करती थी. आहा, मज़ा आ रहा था, चूत में लंड घुसा हुआ था, और गंद में भी लंड का प्रवेश होने वाला था. शबाना ने प्रताप को इशारा किया - "जगबीर आराम से धीरे धीरे डालना, पूरा मज़ा लेकर - पूरे इतमीनान से" प्रताप ने कहा. शबाना को चुदाई करवाते वक़्त बोलना पसंद नहीं था, वो सिर्फ़ आँखें बंद करके मज़े लेना चाहती थी. वो भी आराम से, यही वजह थी कि वो काफ़ी देर तक चुदाई करती थी.

अब जगबीर का लंड पूरा शबाना की गंद में घुस चुका था और उसने धीरे धीरे धक्के लगाने शुरू कर दिए, उसके धक्कों के साथ ही शबाना भी आगे पीछे होने लगी और उसकी चूत में घुसा लंड भी अपने आप अंदर बाहर होने लगा. शबाना जैसे जन्नत में पहुँच गई. उसने कभी नहीं सोचा था वो एक साथ दो लंड खाएगी और उसमें इतना शानदार मज़ा आएगा. प्रताप ने भी धीरे धीरे धक्के लगाने शुरू कर दिए. अब शबाना की गंद और लंड दोनों में लंड घुसे हुए थे और वो चुदाई के आसमान पर थी, उसकी आँखें बंद हो गई और उसकी सिसकारियाँ फिर शुरू हो गई, वो अपनी कोहनी का सहारा लेकर झुक गई और अपनी गंद धीरे धीरे हिलने लगी, फिर रुक गई. प्रताप ने उसे रोक लिया "आज बस लेटी रहो, हम तुम्हें ऐसे ही पूरा हिला देंगे जानेमन" - अब प्रताप और जगबीर ने अपने धक्के तेज़ कर दिए और शबाना जैसे दो लंडो पर बैठी उच्छल रही थी. सी-सॉ के गेम की तरह, कभी पलड़ा यहाँ भरी तो कभी वहाँ भरी. प्रताप ने ठीक कहा था, उसे हिलने की भी ज़रूरत नहीं थी. अब उसकी आवाज़ें तेज़ होने लगी और उसकी चूत और गंद में फिर हथोदे चलने लगे. तभी उसकी चीख सी निकली और उसकी चूत से झरने फुट पड़े, और उसकी गंद में जैसे किसी बे गरम गरम चाशनी भर दी हो. जगबीर भी चूत गया था - और प्रताप भी. जगबीर भी शबाना के ऊपर ही सो गया, उसका लंड अब भी शबाना की गंद में था.
 


कुच्छ देर ऐसे ही लेटे रहने के बाद शबाना ने अपने कंधे उचकाय. जगबीर ने अपना लंड उसकी गंद से निकाला और बाथरूम में घुस गया. शबाना ने प्रताप का लंड चाट कर साफ किया और उसके पास ही लेट गई.

रात के दो बज रहे थे. "कैसा लगा शाब्बो" "एक पर एक तुम्हें नहीं, मुझे मिला है", फिर दोनों हँसने लगे. "लेकिन, जगबीर भरोसे का आदमी तो है ना ?" "जानू, एकदम पक्का भरोसे का है, और वो सरदार है. तुम बिल्कुल बेफ़िक्र रहो, वो उनमें से नहीं है जो तुम्हें परेशान या बदनाम करेगा." "बस में यही चाहती हूँ."

तभी जगबीर बाहर आ गया. शबाना उठी और बाथरूम में घुस गई.

"यार यह तो उम्मीद से दुगना हो गया !!" "हां लेकिन ध्यान रहे किसी को पता ना चले, अच्छे घर की हैं यह." "जानता हूँ यार, किसी को बताकर क्या मुझे अपना ही खाना बिगाड़ना है ? और मेरी बीवी को पता चलेगा तो मेरी खुद शामत आ जाएगी. वाहे गुरु की दया है हम क्यों किसी को तकलीफ़ में डालेगे यार ! सबकुच्छ तो है अपने पास". बाथरूम में नहाती हुई शबाना यह सुनकर आश्वस्त भी हुई और खुश भी.

"क्या कर रहे हो दोनों ? शबाना कहाँ है ? और जगबीर तुमने कपड़े नहीं पहने ? क्या यहाँ भी मज़े किए हैं ?" ताज़ीन की आवाज़ थी यह.

"दो दो जगह मज़े करें ऐसी किस्मत प्रताप की ही है, हमारी नहीं. जल्दी क्या है डार्लिंग पहन लेंगे, वहाँ तुम बाथरूम में हो, और यहाँ पर शबानाजी - जाएँ तो जाएँ कहाँ ?"

"अब तो बाथरूम खाली है, जाओ." जगबीर निकल गया.

शबाना समझ गई, सरदार बात का पक्का है, उसने ताज़ीन को भनक भी नहीं लगने दी कि शबाना ने प्रताप का लंड अपनी चूत में तो जगबीर का लंड अपनी गंद में घुस्वाया था.

शबाना की गंद और चूत दोनों की खुजली एक साथ शांत हो गयी थी. वो अब भी मस्तिया रही थी और उसे लग रहा था जैसे अब भी उसकी चूत में प्रताप का और गंद में जगबीर का लंड घुसा हुआ है और वो चुदाई करवा रही है.

उसने झटपट अपनी चूत और गंद की खबर ली, गाउन पहना और बाहर आ गई. ब्रा पॅंटी पहन कर उसे अपना मूड नहीं खराब करना था. और चूत और गंद को भी तो खुला रखना था, आख़िर इतनी मेहनत हो की थी दोनों ने.

चारों फ्रेश होकर कॉफी पीने बैठे.

तभी एक तस्वीर देख कर जगबीर ने कहा "तो इन महाशय की बीवी हैं आप" "जी हां. यही परवेज़ हैं. क्या आप जानते हैं इनहें ?". "नहीं बस ऐसे ही पूच्छ लिया, क्या वो शहर से बाहर गये हैं ?" "हां, कल शाम को आ जाएँगे"

कॉफी का कप रखते हुए जगबीर ने कहा "ठीक है तो हम चलते हैं, फिर मिलेंगे. अगर आपने याद किया तो."

"अरे इतनी जल्दी क्या है, सुबह के चार बज रहे हैं." ताज़ीन ने कहा "भाईजान तो शाम को आएँगे. सुबह यहीं से नहा धोकर चले जाना"

"अर्रे भाई जिनकी बीवी इतनी खूबसूरत हो, वो जितनी जल्दी हो घर पहुँचना चाहेगा" कहकर हंस दिया जगबीर.

"अच्च्छा तो वो क्या काम छ्चोड़ कर आ जाएगा, शहर से बाहर ही नहीं जाएगा ?" शबाना ने बीच में चुटकी ली

"अर्रे भाई, वो शहर से बाहर जाएगा तो भी यही कहेगा शहर में ही है, हो सकता है परवेज़ सुबह 6 बजे आ जाए, रिस्क क्यों लेना ? "

"चलो ठीक है, वैसे भी सुबह जल्दी ऑफीस जाना है." प्रताप ने सोफे पर से उठते हुए कहा.

शबाना और ताज़ीन ने भी ज़्यादा विरोध नहीं किया.

प्रताप और जगबीर दोनों निकल गये. भाई लोगो कैसी लगी ये मस्ती आपको मुझे ज़रूर बताना आपका दोस्त राज शर्मा

क्रमशः................

 
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सबाना और ताजीन की चुदाई -5

गतान्क से आगे............

शबाना और ताज़ीन ने अपने बिस्तर ठीक किए और दोनों एकदम संतुष्ट और खुश होकर सो गयी.

सुबह 6 बजे घंटी बजने पर शबाना ने दरवाज़ा खोला दूध लेने के लिए.

"परवेज़ तुम !! ? इतनी जल्दी ? तुम तो शाम को आनेवाले थे ना ?" एकदम चौंक गई थी शबाना. "क्यों मेरा जल्दी आना अच्च्छा नहीं लगा तुम्हें ?" "नहीं ऐसी कोई बात नहीं, यूँही पूच्छ लिया."

शबाना ने चैन की साँस ली. वो आज मारते मारते बची थी, अगर जगबीर ने फोर्स नहीं किया होता तो प्रताप भी वहीं होता और आज उसकी शामत ही आने वाली थी. यह सोचकर उसका दिमाग़ एकदम घूम गया, उसके कानों में जगबीर के शब्द गूंजने लगे "हो सकता है सुबह 6 बजे ही आ जाएँ" ... उसका दिमाग़ चक्कर घिन्नी की तरह घूम गया. उसे शक होने लगा की जगबीर को पहले ही पता था की परवेज़ सुबह आने वाला है.

सुबह 6 बजे आने के बावजूद परवेज़ 9 बजे घर से निकल गया.

"ताज़ीन, तुम्हें जगबीर की बात याद है ?"

"कौनसी ?" बेफ़िक्र ताज़ीन ने जवाब दिया.

"वोही जो उसने जाने से पहले कही थी" शबाना ने ताज़ीन की आँखों में झाँकते हुए पूचछा.

"जिसकी बीवी इतनी सुंदर हो वो वाली ? वो तो उसने सच ही कहा था"

"वो नहीं. सुबह 6 बजे वाली. तुम्हारे भैया सुबह 6 बजे ही आए थे. ठीक उसी समय जो जगबीर ने बताया था." शबान की आवाज़ में डर और चिंता दोनों सॉफ झलक रही थी.

"ऐसे ही तुक्का लगा दिया होगा" ताज़ीन अब भी बेफ़िक्र थी.

"तो इन महाशय की बीवी हैं आप" "जी हां. यही परवेज़ हैं. क्या आप जानते हैं इन्हे ?". "नहीं बस ऐसे ही पूछ लिया, क्या वो शहर से बाहर गये हैं ?" "हां, कल शाम को आ जाएँगे"

फिर उसने यह क्यों कहा "वो शहर से बाहर जाएगा तो भी यही कहेगा शहर में ही है " तो क्या जगबीर सच्चाई से उल्टा बोल रहा था ? याने की परवेज़ शहर में ही था लेकिन उसे कहकर गया कि वो बाहर जा रहा है ? लेकिन परवेज़ झूठ क्यों बोलेगा ? और जगबीर ने उल्टा क्यों कहा अगर वो जानता था कि परवेज़ शहर में ही है.

जहाँ तक जगबीर का सवाल है सरदार ना सिर्फ़ चालाक और होशियार था बल्कि काफ़ी सुलझा हुआ और इंटेलिजेंट भी था. जो भी थोड़ा बहोत वो उसे समझी थी, उससे यही ज़ाहिर होता था. वो बिना मतलब के इतनी बातें करने वालों में से नहीं था. कई सवाल शबाना के ज़हन में गूँज रहे थे लेकिन उसके पास कोई जवाब नहीं था.

 


"हेलो, प्रताप कहाँ हो"

"ऑफीस में. कहो कैसे याद किया ?" प्रताप ने पूचछा.

"प्रताप, यह जगबीर क्या करता है ?" शबाना ने सीधे सीधे सवाल किया.

"क्यों जान अब पीछे से वार करने वाले पसंद आ गये, भाई हम तो लूट जाएँगे" प्रताप ने रोमॅंटिक होते हुए कहा

"धुत्त, ऐसी कोई बात नहीं है, ऐसे ही पूच्छ रही हूँ" शबाना ने शरमाते हुए कहा.

"वो असिस्टेंट कमिशनर ऑफ पोलीस है. काफ़ी ऊँची चीज़ है वो. काम है क्या कुच्छ ? अर्रे हम ही आ जाते हैं"

"चुपचाप काम करो अपना, हर वक़्त यही नहीं सोचा करते." शबाना ने बात ख़त्म की. वो नहीं चाहती थी कि इतनी जल्दी दोबारा बुलाया जाए, ख़ासकर ताज़ीन के सामने.

फोन रखने पर शबाना की परेशानी अब बढ़ गई थी. यानी की जगबीर सचमुच काफ़ी पहुँचा हुआ आदमी था. और उसने जो भी कहा था, वो बात जितनी सीधी दिख रही थी उतनी थी नहीं. ज़रूर कुच्छ कारण रहा होगा.

"शबाना क्या सोच रही हो ?" ताज़ीन के प्रश्न ने उसकी तंद्रा भंग की थी.

"कुच्छ नहीं, तुम्हारे भैया आज जल्दी आ गये."

"हां अच्च्छा हुआ, आज तो हम बाल बाल बच गये. अगर मेरे कहने पर जग्गू और प्रताप रुक जाते तो आज तो गये ही थे काम से."

"हाई जगबीर"

"हाई. कौन ?"

"अच्च्छा, तो अब आवाज़ भी नहीं पहचानते हैं जनाब."

"ओह्हो, शबानाजी, बड़े दिनों बाद याद किया." बड़े अदब से चुटकी ली जगबीर ने.

"क्या करें आप तो याद करते नहीं, सो हमने ही फोन कर लिया.एक महीने आपके फोन की राह देखी है." शिकायती लहज़े में कहा शबाना ने.

"आप बुला लेते हम हाज़िर हो जाते" जगबीर के पास जवाब तैयार था.

"अभी आ सकते हैं ?

"अभी नहीं. कल आ जाता हूँ अगर आपको आपत्ति ना हो तो."

"ठीक है. तो कल 11 बजे ?"

"ओके डियर" बिना शबाना के जवाब का इंतेज़ार किए फोन काट दिया जगबीर ने.

"सरदार बहोत तेज़ है. लेकिन साला है बहोत ही इंट्रेस्टिंग." शबाना, जैसे अपनेआप से कह रही हो.

उसने दोबारा फोन लगाया "हां ज़रीना, में घर पर ही हूँ, तुम ज़ीनत को भेज सकती हो"

दरवाज़े की दस्तक से शबाना का ध्यान भंग हुआ. कोई था शायद बाहर.

ज़रीना थी, अपनी बेटी को छ्चोड़ने आई थी. ज़रीना शबाना से उम्र में 15 साल बड़ी थी लेकिन सबसे अच्छि सहेली थी और थोड़ी ही दूरी पर रहती थी, इसलिए कभी कभी आ जाती थी. उसकी बेटी ज़ीनत के 10थ के एग्ज़ॅम्स थे और उसने शबाना से रिक्वेस्ट की थी थोड़ी मदद कर देने के लिए. क्योंकि उस इलाक़े में सबसे ज़्यादा पढ़ी लिखी महिला शबाना ही थी. एमएससी इन केमिस्ट्री.
 


ज़रीना के जाने के बाद शबाना ने दरवाज़ा बंद कर लिया.

ज़ीनत काफ़ी खूसूरत थी और उसके मम्मे उसकी उम्र को काफ़ी पीछे छ्चोड़ चुके थे. उसका जिस्म देखकर कोई भी यही सोचेगा की 18-19 की है. पहनावा भी काफ़ी मॉडर्न किस्म का था. कॉनवेंट में पढ़ने वाली ज़ीनत रोज़ घुटनों के ऊपर तक की फ्रॉक पहन कर स्कूल जाती थी. और ज़रीना ने काफ़ी छ्छूट दे रखी थी उसे. आख़िर एकलौती संतान थी वो.

"दीदी, कल केमिस्ट्री की एग्ज़ॅम है. और मुझे तो कुछ समझ नहीं आता है. यह टेबल्स और केमिकल फॉर्मुलास तो मेरी जान ले लेंगे" काफ़ी झुंझलाई हुई थी ज़ीनत.

"कोई बात नहीं, में समझा दूँगी" शबाना ने प्यार से कहा.

तीन घंटे की पढ़ाई के बाद ज़ीनत काफ़ी खुश थी. उसका लगभग सारा पोर्षन ख़त्म हो चुका था. उसने शबाना और खुद के लिए चाइ बनाई. "थॅंक यू दीदी, मुझे तो लगा था में गई इस बार. आपने बचा लिया." कहते हस उसने शबाना को गले लगा लिया.

अगले दिन परवेज़ के जाने के बाद, वो जगबीर का इंतेज़ार करने लगी थी.

ठीक 11 बजे जगबीर आ गया.

"क्यों डार्लिंग बड़े दिनों बाद याद किया. वो भी जब प्रताप बाहर गया है. जब तक वो था, आपने तो हमें याद ही नहीं किया" जगबीर ने सवाल में ही जवाब दाग दिया था.

"लगता है, आप उसके बिना आप कुच्छ कर नहीं सकते. हर बार उसकी मदद चाहिए क्या ?" शबाना ने भी उसी अंदाज़ में जवाब दिया.

"पता चल जाएगा जानेमन" कहते हुए जगबीर ने उसे बाहों में उठा लिया.

"क्यों आज शराब नहीं लाए ?" शबाना ने पूचछा.

"में दिन में नहीं पीता, तुम्हें पीनी है तो ले आता हूँ" अब जगबीर उसके जिस्म को हर जगह से दबा रहा था.

"मुझे जो चाहिए तुम्हारे पास है, शराब फिर कभी ट्राइ करूँगी" शबाना ने कहा.

उसने शबाना की सारी का पल्लू हटाया और उसके ब्लाउस के ऊपर से ही उसके मम्मों को दबाने लगा. उसके होंठों को अपने होंठों में दबाते हुए उसने एक हाथ उसके मम्मों पर रख दिया और दूसरे हाथ से उसकी सारी को ऊँचा उठाकर उसकी गंद को ज़ोर ज़ोर से दबाने लगा. उसने शबाना को एकदम जाकड़ लिया. शबाना उसके लंड को अपनी चूत पर महसूस कर सकती थी और उसकी जैसे साँस अटक रही थी.

जगबीर ने फिर उसे अलग किया और उसकी सारी को खींच कर निकाल दिया. उसके पेटिकोट का नारा खींचते ही निकल गया. जगबीर उसके पैरों के बीच बैठ गया और उसकी चड्डी उतार दी. अब उसका मुँह शबाना की नाभि को चूस रहा था और उसका एक हाथ शबाना के दोनों पैरों के बीच उसकी जांघों पर सैर कर रहा था. उसने शबाना की जाँघ पर दबाव बनाया और शबाना ने अपने पैर फैला दिए. अब वो जगबीर को अपनी चूत खिलाने के लिए तैयार थी.उसने अपनी चूत आगे की तरफ धकेली. जगबीर ने अपने दोनों हाथों को उसकी टाँगों के बीच से लेकर उसकी गंद पर रख दिए. शबाना के पैर और फैल गये और उसकी आयेज की तरफ निकली हुई चूत जगबीर के मुँह के ठीक सामने थी. "सस्सीए" सिसकारी छ्छूट गई शबाना की जब जगबीर की जीभ ने उसकी चूत को चॅटा और उसके किनारों पर ज़ोर से रगड़ दी. जगबीर की जीभ उसकी चूत में घुसती जा रही थी और शबाना के पैर जैसे उखाड़ने को थे. जगबीर के हाथ जो शबाना के पैरों के बीच से पीछे की तरह थे, उनसे शबाना के हाथों की कलाईयों को पकड़ लिया, अब शबाना की चूत और आगे की तरफ निकल आई और जगबीर की जीभ उसकी चूत में और अंदर धँस गई. जगबीर ने इसी स्थिति में उसे उठा लिया और एक धक्का देकर बेड के बिल्कुल किनारे पर पटक दिया और खुद बेड के नीचे घुटनों के बल बैठ गया.
 
शबाना की गंद के नीचे से निकली हुई जगबीर के हाथों की वजह से उसकी चूत एकदम उठ गई थी और पैर हवा में लहरा रहे थे, एकदम फैले हुए. उसकी चूत में जगबीर की जीभ धँसती जा रही थी. जगबीर ने उसकी चूत में च्छूपे गुलाबी दाने को अपने होंठों में जाकड़ लिया और उसपर बेतहाशा अपनी जीभ रगड़ कर चूसने लगा. शबाना की सिसकारियाँ फूट गई और उसकी चूत में खलबली मच गई. उसका आनंद चरम पर था और वो हिल भी नहीं सकती थी. उसकी कलाईयों को जगबीर ने पूरी ताक़त से पकड़ रखा था और उसकी गंद हवा में पूरी उठी हुई थी. उसकी गंद ने एक ज़ोर का झटका दिया और उसकी चूत ने पानी छ्चोड़ दिया. अब जगबीर ने उसकी कलाईयों को छ्चोड़ा और अपने हाथ उसके पैरों के बीच से निकाल लिए. अब वो बिल्कुल धराशाई हो गई बिस्तर पर. "ओह गॉड...मज़ा आ गया जगबीर"

जगबीर ऊपर चढ़ गया और उसके होंठों को चूसने लगा. शबाना ने जगबीर की बालों से भरी छाती पर हाथ फिराने शुरू कर दिए. अच्च्छा लगता था जब जगबीर की बालों से भरी छाती उसके चिकने भरे हुए मम्मों को रगड़ती थी. अज़ीन तरह की गुदगुदी सी होती थी. अब शबाना बैठ गई और जगबीर की पॅंट के बटन खोले, और उसकी पॅंट और अंडरवेर निकाल कर फेंक दिए. उसने जगबीर के लंड को अपने हाथों में लिया और उसकी जड़ से टोपी तक ऊपर नीचे करने लगी. उसके लंड का सुपरा चमड़ी के पीछे होते ही उसका लाल, गोल सुपरा जैसे हमले की तैयारी में नज़र आता था. शबाना झुकी और जगबीर के लंड कोचूसना शुरू कर दिया. उसने जगबीर के लंड के सुपरे को मुँह में लिया और उसका स्वाद अपनी जीभ पर महसूस करने लगी. उसकी जीभ जगबीर के लंड पर बने छेद में घुसने की कोशिश कर रही थी. उसके सुपरे को अपनी जीभ में लपेट कर शबाना उसके हर हिस्से का मज़ा ले रही थी. जगबीर उसके सर पर हाथ रख कर उसे दबाने लगा. अब शबाना जगबीर के पूरे लंड को अपने मुँह में ले रही थी. जगबीर का लंड उसके गले तक जा रहा था और उसकी आँखें जैसे बाहर आने को थी. उसने लंड को थोड़ा बाहर निकाला और फिर थोड़ी कोशिश के बाद वो अब उसके लंड को अपने मुँह में अड्जस्ट कर चुकी थी. अब जगबीर को पूरा मज़ा मिल रहा था, शबाना बिल्कुल रंडी की तरह अच्छि तरह उसका लंड चूस रही थी, नीचे से ऊपर, ऊपर से नीचे. अब जगबीर ने उसे नीचे उतरने को कहा.

 


शबाना नीचे खड़ी होकर झुक गई और अपने हाथ बेड पर रख दिए. अब वो बेड का सहारा लेकर गंद उठाए खड़ी थी. जगबीर उसके पीछे आकर खड़ा हो गया. शबाना ने अपनी गंद उठा दी और आराम से जगबीर के लंड का अपनी चूत में घुस जाने का इंतेज़ार करने लगी. जगबीर ने शबाना के पैरों को फैलाया और अपने लंड को पकड़कर और शबाना की उठी गंद पर रगड़ने लगा. वो उसके पीछे खड़ा होकर उसकी उठी हुई गंद से लेकर उसकी चूत तक अपने लंड को रगड़ रहा था. शबाना की सिसकारियों से कमरा गूँज रहा था. शबाना की चूत के मुँह पर उसने अपने लंड को अड्जस्ट किया और धीरे धीरे बड़े प्यार से लंड के सुपरे को उसकी चूत में पहुँचा दिया. शबाना ने मदहोश होकर अपनी गंद और उठा दी, और जगबीर ने अपना लंड एक झटके से पूरा का पूरा शाना की चूत में धकेल दिया. शबाना को एक झटका सा लगा और उसकी सिसकारियाँ फूट पड़ी. जगबीर ने दोनों हाथों से उसकी कमर को पकड़ा और नीचे से ज़ोर ज़ोर से झटके मारने शुरू कर दिए, और शबाना की कमर को पकड़ कर एक लय में उसके जिस्म को हिलाने लगा. शबाना का पूरा जिस्म हिल रहा था उसे ऐसा महसूस हो रहा था जैसे उसकी चूत को कोई उठा उठा कर जगबीर के लंड पर पटक रहा था, और जगबीर का लंड उसकी चूत को चीरते हुए उसके पेट में घुस रहा था.

शबाना की सिसकारियाँ अब मदहोशी की चीखों में बदल चुकी थी, उसकी चूत के थपेड़े जगबीर के लंड पर बेतहाशा पड़ रहे थे. जगबीर ने उसकी कमर को कस कर पकड़ रखा था और शबाना की गंद से लेकर उसके कंधों तक के जिस्म को झकझोर कर रख दिया था. जगबीर भी उसे बुरी तरह चोदे जा रहा था, शबाना के पैर उठने लगे थे, जगबीर ने उसकी कमर को छ्चोड़ दिया और उसकी जांघों को अंदर की तरफ से पकड़ कर उसे उठा लिया. अब शबाना अपने हाथों को बेड पर टिकाए हवा में लहरा रही थी, और जगबीर उसकी चूत में बेतहाशा धक्के लगाए जा रहा था. जगबीर के धक्के एकदम तेज़ हो गये और शबाना की चूत में जैसे ज्वालामुखी फॅट गया. पता नहीं किसका पानी कब गिरा, दोनों के शरीर अब रुकने लगे. जगबीर ने शबाना के पैरो को ज़मीन पर रख दिया, शबाना घूमी और धदाम से बेड पर गिर गयी. "जगबीर मज़ा आ गया..लव यू डार्लिंग" . जगबीर उसकी बगल में लेट गया. शबाना ने उसके होंठों को चूम लिया. दोस्तो इस तरह जब जावेद घर पर नही होता था तब शबाना अपने यार प्रताप या जगबीर को बुला कर अपनी गर्मी शांत करती थी आपको कहानी कैसी लगी ज़रूर बताना आपका दोस्त राज शर्मा

समाप्त............

 
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