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समाज सेविका compleet

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समाज सेविका (भाग-1)


(लेखक – गुलफाम ख़ान)

मेरी पत्नी चूँकि पेशे से एक वकील है, इसलिए उसे

काफ़ी लोगों से मिलना जुलना है पड़ता है. खास तौर

से उन लोगों से जो समाज सेवी संस्थाओं से संबंध

रखते है. कयि लोग तो घर पर भी आ जाते है और

मेरी पत्नी धैर्य के साथ उनकी बाते, उनकी

समस्याए सुनती है. ऐसे ही लोगों मे एक है उर्मिला.

उर्मिला एक समाज सेविका है.

जब भी उर्मिला हमारे घर पर आती, मेरे मूह मे पानी

आ जाता. मैं अख़बार या कोई पत्रिका पढ़ने के

बहाने उसे चोर नज़रों से देखता. वो मेरी पत्नी से

काफ़ी बाते करती और कभी कभी नज़रे बचा कर मेरी

तरफ भी देख लेती. उसकी उमर लगभग 24 या 25 साल

होगी. उसकी आँखे मे अजीब सा नशा था. या यू कहिए

सेक्स की चाहत थी. ये मुझे क्यूँ महसूस हुआ, वो मैं

बता नही सकता, मगर मुझे हमेशा ऐसे ही लगता कि

वो मुझे देख कर नजरो ही नजरो मे सेक्स की दावत दे

रही है. मेरी उससे कम ही बातचीत होती थी. मगर

जब भी वो बात करती, उसके शब्दों मे दोहरा अर्थ

होता. मिसाल के तौर पर एक दिन जब वो आई तो मेरी

पत्नी बाथरूम मे थी. वो उसका इंतेजार करते सोफे मे

बैठ गयी. मैने निगाहों ही निगाहों मे उसे खा जाने

वाले भाव से देखा तो वो मुस्कुरा उठी. उसने बातों

का सिलसिला शुरू करने की गरज से पूछा... "मेडम

कहाँ है.. बेडरूम मे है क्या?"

मैने कहा...'नही बाथरूम मे'.

'अकेले ही!' उसने शरारती महजे मे कहा और हंस पड़ी.

मैं बोला, 'बाथरूम मे तो सभी अकेले होते है.'

वो फिर हंस पड़ी और बोली...'कमाल करते है आप,

बाथरूम और बेडरूम ही तो वो जगहे है, जहाँ किसी को

अकेला नही होना चाहिए.'

मैं कोई जवाब नही दे सका. वो भी चुप चुप हो गयी.

कुछ पल बाद मैने उससे पूछा...'आप करती क्या है?'

वो दो तीन सेकेंड तो मेरी तरफ देखती रही, फिर

बोली...'समाज सेवा.'

'कभी हमारी भी सेवा करदो...' मेरे मूह से निकल गया.

वो हल्के से मुस्कुराइ और बोली...'आपको क्या प्राब्लम

है?'

'बहुत ही खास प्राब्लम है...' मैने कहा

'तो बताइए'

'बताउन्गा...फिर कभी...'

'अकेले मे??' वो मेरी आँखे मे आँखे डालती हुई बोली.

मैं समझ गया कि इस औरत को पटाना कोई मुश्किल काम

नही. लगता है उसे भी मुझमे दिलचस्पी है. मगर

समाज सेवा के बहाने कयि लोगों के बिस्तर गर्म कर चुकी

होगी...ऐसी औरत से संबंध रखना ठीक भी होगा या

नही. मैं सोचने लगा. इतने मे मेरी पत्नी आ गयी और

वो दोनों घर से ही संग संग ऑफीस मे चले गये.
 


हमारा आपस मे एक अंजाना सा रिश्ता जुड़ गया था,

जिससे मेरी पत्नी नावाकिफ़ थी.

जब भी मेरा और उसका सामना होता, वो चोर नज़रों से

मुझे बार बार देखती. मेरा मन कभी हाँ करता और

कभी ना...देखने मे वो बहुत अच्छी थी. सेक्सी थी

कहना चाहिए. जिस्म बड़ा सी गुदाज सा था. पाँच फुट

पाँच इंच की होगी, लेकिन वजन 50 किलो से अधिक ना

होगा. अक्सर साड़ी पहनती थी और साड़ी से ब्लाउज का

फासला काफ़ी होता था. जिससे उसका नंगा गोरा पेट सॉफ

नज़र आता था. साड़ी वो नाभि के नीचे ही बाँधती

थी. उसकी नाभि का छेद बहुत सुहावना था. ऐसा

लगता था जैसे पेट पर कोई डिंपल हो. हमेशा सीना

ताने रखती थी. सीने का उभार गजब का था. मेरा

हमेशा दिल चाहता था कि अपना मूह दोनों उभारों के

बीच मे रख दूं और आँखे बंद करके गुम सूम हो

जाउ. कभी कभी वो जींस और टी-शर्ट भी पहनती थी.

उस वक्त उसके खूबसूरत कुल्हों और मेहनत से तराशे

हुए चुतडो (बम्स) का नज़ारा किसी जन्नत से कम नही

होता था. जब वो घूमती थी, तो क्या मज़ाल किसी की

नज़रे उसके मस्त चुतडो से हट जाए. और जब वो

सामने होती, तो कमर के नीचे, उसके ट्राउज़र की जिप

पर निगाहे रहती. जिप का भाग थोड़ा अंदर की तरफ

घुसा हुआ सा लगता था. इससे मालूम पड़ता कि उसके

पेट के नीचे का भाग कितना स्लिम है. मैं अपनी

कल्पना मे उसकी चूत का नज़ारा करता और ऐसा लगता

कि उसकी खूबसूरत चूत मेरे लंड तक पहुँचने के

मिए बेकरार है.

कुछ दिन वो नही दिखाई दी. मैं ऑफीस से शाम 6 बजे

घर आ जाता हू. रविवार को घर पर ही रहता हू.

मुझे पता चला कि वो अपने किसी ख़ास काम मे बहुत

व्यस्त है. मैने सोचा कि आख़िर मैं उसके बारे मे

इतना क्यों सोच रहा हू, या मेरे दिल ने कहा कि, बेटे,

तू उसकी चूत का दीदार करना चाहता है... तू उसे

घोड़ी बना कर उसे पीछे से चोदना चाहता है... तू

उसे इतना चोदना चाहता है कि फिर सारी उमर किसी

और को चोदने की चाहत बाकी ना रहे.

मैने अपने दिमाग़ को झटका और सोचने लगा कि क्या

वकाई मैं उसे चोदना चाहता हू... दिल ने कहा हां,

दिमाग़ ने कहा.. नही... क्यों नही?

इसलिए कि वो हर रोज पचासों लोगों से मिलती है...बड़े

बड़े लोगों से भी...पता नही कितनों के साथ सो चुकी

होगी.

तो क्या हुआ? सोई होगी तो सोई होगी...इसमे क्या? तू भी

सो जा एक बार...चूस लो उसकी जवानी. चढ़ जा उस पर.

घुसा दे अपना लंड उसकी चूत मे. मार

धक्के...लगातार...उस वक्त तक, जब तक कि वो ना

बोले...बस करो अभी.

क्या हर्ज है यार?

हां...हर्ज तो कुछ नही... चलो देखते है...अबकी

बार मिली तो...तो...तो...कैसे कहूँगा उससे अपने दिल

की बात?

और मेरी ये उलझन भी ख़तम हो गयी. बात अपने आप ही

बन गयी...

उस दिन रविवार था. मेरी पत्नी अपनी मा के यहाँ गयी

थी. उर्मिला को मालूम नही था शायद. वो कोई दो बजे

दोपहर को आ गयी. आते ही यहाँ वहाँ देखा और फिर

मुझे देख कर मुस्कुराइ और बोली... 'मेडम? बाथरूम

मे...???'

मैं भी मुस्कुराया और बोला... 'हाँ बाथरूम मे...और

अब भी अकेले ही.'

 


वो सोफे पर बैठ गयी और एक मॅगज़ीन उठा कर देखने

लगी. ये मेगज़ीने अँग्रेज़ी मे थी और उसमे पति और

पत्नी के संबंधों के बारे मे एक लेख था. विषय

था...पति-पत्नी के सेक्स जीवन के उलझाव.

वो उस लेख को पढ़ने लगी, फिर मेरी तरफ मुस्कुरा कर

देखने लगी और बोली...आपने पढ़ा ये आर्टिकल?

'नही...'

'क्यों नही?'

'हमारे सेक्स लाइफ मे कोई प्राब्लम नही है...इसलिए'

उसने फिर मेगज़िन मे अपनी नज़रे गाढ दी...फिर

अचानक पूछी...

'ये सेडक्षन का क्या मतलब होता है.'

मैं सोचने लगा. वो मेरी तरफ देख रही थी. उसने

फिर पूछा, 'बताइए ना...!'

'हूंम्म...सेडक्षन....सेडक्षन....' मेरी समझ मे नही

आया कि हिन्दी मे सेडक्षन को क्या कहते है. वो मेरी

तरफ लगातार देख रही थी...उसकी आँखे मे नशा सा

छाने लगा था...मैं उसे गौर से देखने लगा. उसके

होंठ खुश्क हो रहे थे. वो अपने होंठों होंठों पर

ज़बान फेरने लगी. मेरे मन मे आया कि यही मौका

है...चला दो तीर...निशाने पर लगने के 100% चान्स

है...

'बोलो ना...' वो इठला कर बोली...'क्या मतलब है

इसका?'

मैने कहा...'शायद चुदास!'

 


samaj sevika (bhag-1)

(Author – Gulfaam Khan)

meri patni chunki peshe se ek vakil hai, isliye use

kaafi logom se milana jhulana hai padata hai. khas taur

se un logom se jo samaj sevi samsthavom se sambandh

rakhate hai. kayi log to ghar par bhi aa jaate hai aur

meri patni dhairya ke saath unaki baate, unaki

samasyaaye sunati hai. ese hi logom me ek hai urmila.

urmila ek samaj sevika hai.

jab bhi urmila hamare ghar par aati, mere muh me paani

aa jaataa. mai akhbaar yaa koyi patrika padhane ke

bahane use chor najarom se dekhata. vo meri patni se

kaafi baate karati aur kabhi kabhi najare bacha kar meri

taraf bhi dekh meti. usaki umar magnag 24 ya 25 saal

hogi. usaki aankhe me ajeeb saa nasha tha. yaa yu kahiye

sex ki chaahat thi. ye mujhe kyum mehasus hua, vo mai

bata nahi sakta, magar mujhe hamesha aise hi lagata ki

vo mujhe dekh kar najare hi najare me sex ki daawat de

rahi hai. meri usase kam hi baatcheet hoti thi. magar

jab bhi vo baat karti, usake shabdom me dohara arth

hota. misaal ke taur par ek din jab vo aayi to meri

patni bathroom me thi. vo usaka intejaar karate sofe me

baith gayi. maine nigaahom hi nigaahom me use kha jaane

vaale bhaav se dekha to vo muskuraa uthi. usane baatom

ka silsilaa shuru karane ki garaj se pucha... "medam

kaha hai.. bedroom me hai kyaa?"

maine kaha...'nahi bathroom me'.

'akele hi!' usane shararati mahaje me kaha aur hans

padi.

mai bola, 'bathroom me to sabhi akele hote hai.'

vo phir hans padi aur boli...'kamal karate hai aap,

baathroom aur bedroom hi to vo jagahe hai, jaha kisi ko

akela nahi hona chahiye.'

mai koyi jawab nahi de saka. vo bhi chup chup ho gayi.

kuch pal baad maine usase pucha...'aap karati kya hai?'

vo do teen second to meri taraf dekhati rahi, phir

boli...'samaj sewa.'

'kabhi hamari bhi sewa kardo...' mere muh se nikal gaya.

vo halke se muskuraayi aur boli...'aapko kya problem

hai?'

'bahut hi khas problem hai...' maine kaha

'to batayiye'

'bataumga...phir kabi...'

'akele me??' vo meri aankhe me aankhe daalati hui boli.

mai samajh gaya ki is aurat ko patana koyi mushkil kaam

nahi. magta hai use bhi mujhme dilchaspi hai. magar

samaj sewa ke bahane kayi logom ke bistar garm kar chuki

hogi...aisi aurat se sambandh rakhan theek bhi hogaa yaa

nahi. mai sochane laga. itane me meri patni aa gayi aur

vo donom ghar se hi samlagn office me chale gaye.

hamare aapas me ek anjaana saa rishta jhud gaya tha,

jisase meri patni nawakif thi.

jab bhi mera aur usaka saamana hota, vo chor najarom se

mujhe baar baar dekhati. mera man kabhi ha karta aur

kabhi naa...dekhane me vo bahut achi thi. sexy thi

kahana chahiye. jism bada si gudaaj sa tha. paanch foot

paanch inch ki hogi, lekin vajan 50 kilo se adhik na

hoga. aksar sari pahanti thi aur sari se bouse ka

phasala kaafi hota tha. jisase usaka nanga gora pet saaf

najar aata tha. saadi vo naabhi ke neeche hi bandhati

thi. usaki naabhi ka ched bahut suhaavana tha. aisaa

lagata tha jaise pet par koyi dimple ho. hamesha seena

thane rakhti thi. seene ka ubhar gajab ka tha.

 
mera

hamesha dil chaahata tha ki apana muh donom ubharom ke

beech me rakh du aur aankhe bandh karake gum sum ho

jaaum. kabhi kabhi vo jeens aur T-shirt bhi pahanti thi.

us wakt usake khoobsurat kulhom aur mehanat se tarashe

hue chutadom (bums) ka najara kisi jannat se kam nahi

hota tha. jab vo ghumati thi, to kya majaal kisi ki

najare usake mast chutadom se hat jaaye. aur jab vo

saamane hoti, to kamar ke neeche, usake trouser ki jip

par nigaahe rahati. jip ka bhaag thoda andar ki taraf

ghusa hua sa lagata tha. isase maalum padata ki usake

pet ke neeche kaa bhag kitana slim hai. mai apani

kalpana me usaki choot ka najara karata aur aisa lagata

ki asaki khoobsurat choot mere lund tak pahunchane ke

miye bekaraar hai.

kuch din vo nahi dhikayi di. mai office se shaam 6 baje

ghar aa jaata hu. ravivaar ko ghar par hi rahata hu.

mujhe pata chala ki vo apane kisi khaas kaam me bahut

vyast hai. maine socha ki aakhir mai usake baare me

itana kyom soch raha hu, yo mere dil ne kaha ki, bete,

tu usaki choot ka deedar karana chahata hai... tu use

ghodi bana kar use peeche se chodana chahata hai... tu

use itana chodana chahata hai ki phir saari umar kisi

aur ko chodane ki chahat baaki na rahe.

maine apane dimaag ko jhataka aur sochane laga ki kya

vakaayi mai use chodana chaahata hu... dil ne kaha haa,

dimaag ne kaha.. nahi...

kyom nahi?

isliye ki vo har roj pachasom logom se milati hai...bade

bade logom se bhi...pata nahi kitanom ke saath so chuki

hogi.

to kya hua? soyi hogi to soyi hogi...isame kya? tu bhi

so jaa ek baar...choos lo usaki jawani. chad jaa us par.

ghusade apana lund asaki choot me. maar

dhakke...lagataar...us wakt tak, jab tak ki vo na

bole...bas karo abhi.

kya harj hai yaar?

haa...harj to kuch nahi... chalo dekhate hai...abaki

baar mili to...to...to...kaise kahungaa usase apane dil

ki baat?

aur meri ye uljhan bhi katm ho gayi. baat apane aap hi

ban gayi...

us din ravivaar tha. meri patni apani maa ke yaha gayi

thi. urmila ko maalum nahi tha shayad. vo koyi do baje

dopahar ko aa gayi. aate hi yaha vaha dekha aur phir

mujhe dekh kar muskuraayi aur boli... 'medam? bathroom

me...???'

mai bhi muskuraaya aur bhola... 'haa bathroom me...aur

ab bhi akele hi.'

vo sofe par baith gayi aur ek magazine utha kar dekhane

lagi. ye megazine angreji me thi aur usame pati aur

patni ke sambandhom ke baare me ek mekh tha. vishay

tha...pati-patni ke sex jeevan ke uljhaave.

vo us lekh ko padhane lagi, phir meri taraf muskuraa kar

dekhane lagi aur boli...aapne padha ye article?

'nahi...'

'kyom nahi?'

'hamare sex life me koyi problem nahi hai...isliye'

usane phir megazine me apani najare gaad di...phir

achanak puchi...

'ye seduction ka kya matalab hota hai.'

mai sochane laga. vo meri taraf dekh rahi thi. usane

phir pucha, 'bataayiye naa...!'

'hummm...seduction....seduction....' meri samajh me nehi

aaya ki hindi me seduction ko kyaa kehate hai. vo meri

taraf lagataar dekh rahi thi...usaki aankhe me nasha saa

chaane laga tha...mei use gaur se dekhane lagaa. usake

honth khushk ho rahe the. vo apane honthom honthom par

jabaan pherane lagi. mere man me aaya ki yehi maukaa

hai...chala do teer...nishaane par magane ke 100% chance

hai...

'bolo naa...' vo ithala kar boli...'kyaa matalab hai

isaka?'

maine kaha...'shaayad chudaas!'
 


'क्या...क्या कहा....? मतलब?' वो हैरानी से बोली.

'चुदास नही समझती हो?'

'कुछ कुछ..क्या यही मतलब है सेडक्षन का?'

'हा, शायद... यानी अगर....मेरा मतलब है...कि ...

अगर कोई... अब कैसे समझाऊ तुम्हे?' मैं उलझा कर

बोला.

वो हँसने लगी और बोली...'कही चुदास का

मतलब...सेक्स करने की चाह तो नही?'

मैं उसे एक टक देखने मगा. उसके होंठों पर चंचल

मुस्कान थी.

मैने कहा...'ठीक समझी तुम.'

वो मेरी आँखों मे आँखे डालती हुई बोली... 'किस शब्द

से बना है...ये चुदास?' मैं उसकी आवाज़ मे कंप-कंपी

सी महसूस की.

मेरे दिल ने कहा...'गधे, इतना चान्स दे रही है...

तू भी बन जा बेशरम... वारना पछताएगा.'

मैं बोला...'चुदास...चोदना, इस शब्द से बना है?'

वो खिलखिला कर हँसने लगी और फिर जल्दी से चुप हो

कर बाथरूम की ओर देखने लगी कि कही मेडम ना आ

जाए.

वो फिर मेगज़िन की पन्ने पलटने लगी. मैं सोचने

लगा कि अब क्या करूँ. अचानक उसने फिर पूछा...'ये

वेजाइना का क्या मतलब होता है?'

मैने दिल ही दिल मे कहा...साली तू जान बूझ कर ऐसे

सवाल पूछ रही है...

मैने बिंदास हो कर कहा...'वाजीना, या वेजाइना...योनि को

कहते है...'

'व्हाट? योनि? योनि क्या?'

'योनि नही जानती हो...?'

'नही'

'चूत समझती हो?'

उसने झट से अपने मूह पर हाथ रख लिया और फिर

बाथरूम की तरफ देखने लगी.

'चूत समझती हो कि नही?' मैने पूछा.

वो मेगज़िन के पन्ने पलटते हुए धीरे से बोली...

'हाँ!'

'और फक्किंग ?'

वो फिर बाथरूम के दरवाजे की तरफ देखने लगी.

मैने कहा... 'मेडम नही है... अपनी मा के यहाँ गयी

है.'

उसने एक गहरी साँस ली और मुस्कुराती हुई मेरी तरफ

देखने लगी. मेरे दिल ने कहा...मछली फँसी.

'तो मैं कल आती हू...' वो उठने लगी.

'ठहरो, आ जाएगी अभी... कहा था चार बजे शाम

तक आ जाएगी.'

'अभी तो दो ही बजे है.'

'तो क्या हुआ.. थोड़ा इंतेजार कर लो.'

'थोड़ा?.. पूरे दो घंटे बाकी है'

'हा तो क्या हुआ... मुझसे बाते करो....'

'क्या बात करूँ?'

'कुछ भी...ये बताओ तुम क्या करती हो?'

'कहा तो था, समाज सेवा करती हू.'

'किस किसाम की सेवा?'

'ज़रूरतमंद लोगों की ज़रूरते पूरी करना, उनकी

समस्याए सुलझाना...वग़ैराह.'

'मैं भी ज़रूरतमंद हू....मेरी ज़रूरत पूरी कर

सकती हो?'

'क्या ज़रूरत है आपकी?'

मैने उसके चेहरे पर नजरे गाढ दी और धीरे से

बोला...'तुम हो मेरी ज़रूरत.'

वो बिना कुछ कहे मेरी तरफ देखने लगी. फिर

बोली...'क्या करेंगे मेरे साथ?'

'वही जो एक आदमी एक औरत के साथ करता है....'

वो खामोश हो गयी....मैने हिम्मत करके बात आगे

बढ़ाई.... 'बड़ी चुदास महसूस हो रही है...'

उसके होंठों पर हल्की सी मुस्कान आ गयी और वो

बोली...'चुदास की प्यास?'

 
'वाह...बहुत अचाहा कहा तुमने...वाकई चुदास की

प्यास लग रही है.'

'सच कहु तो ये प्यास मुझे उस दिन से लगी है...जिस

दिन आपको पहली बार देखा था...'

वो मेरी तरफ प्यार भरी नज़रों से देखती हुई बोली.

मैने अपना शक दूर करने के लिए कहा...'तुम तो

इतने लोगों से मिलती हो...तुम्हारी प्यास तो कोई भी

मिटा सकता है... और शायद...'

'नही नही...अब इतनी भी गयी गुज़री नही हू

मैं...आपमे कुछ ख़ास बात है...'

'तो क्या तुमने कभी किसी के साथ....?'

'जब तक मेरा पति मेरे साथ था...तब तक... फिर

हमारा डाइवोर्स हो गया...और मैं दो साल से प्यासी हू.'

'ओह्ह... आइ सी...' मैने कहा... 'इसका मतलब है कि दो

साल से तुम्हारी चूत ने किसी लंड का मज़ा नही

चखा.'

'नही...' वो सर झुका कर बोली...'आप जैसा कोई

हॅंडसम आदमी नही मिला...'

'अगर मिल जाता तो...?'

'तो मैं अपनी चूत उसके लंड पर कुर्बान कर देती.'

'तो आओ... मेरा लंड तुम्हारी चूत पर न्योछावर होने

के लिए बेकरार है.' मैने उसके करीब जा कर उसका

हाथ पकड़ते हुए कहा.

वो फॉरेन मेरे सीने से लग गयी और मुझे ऐसा लगा

जैसे सीने मे ठंडक सी पड़ गयी हो. उसके गदराए

बदन से भीनी भीनी खुसबू आ रही थी. उसके मुलायम

बाल मेरे गालों को सहलाने लगे. मैने कस के उसे

अपनी बाहों मे जाकड़ लिया और उसके बाल पकड़ कर

उसके चेहरे को उपर उठाया. उसके होंठ खुल गये.

जैसे गुलाब की दो पंखुड़िया भवरे के पंजे मे फँस

जाने के बेताब हो. मैने उसके अधखुले गुलाबी होंठों

को हलके से अपने दाँतों मे पकड़ लिया. उसकी सिसकारी

निकल गयी. फिर धीरे से मैने उसके नरम नरम

होंठों को अपने मूह मे ले लिया. ऐसा लगा जैसे शहद

का घूँट पी लिया हो.

उसके कोमल होंठ अमृत कलश की तरह मेरी ज़बान को

तृप्त करने लगे. मैं धीरे धीरे उसके मस्त

होंठों को अपने होंठों मे दबा कर चूसने लगा.

मेरी आँखे बंद थी और उसकी भी. नशा सा छाने

लगा.

मैने महसूस किया कि उसके हाथ मेरे लंड की ओर बढ़

रहे है. मैने अपने टांगे फैला दी. उसने बड़ी

कोमलता से मेरे लंड को थाम लिया. फिर धीरे धीरे

उसे सहलाने लगी. मेरा लंड किसी लोहे की छड की तरह

सख़्त हो गया. वो पॅंट के ऊपर से ही मेरे लंड को

सहला रही थी, जैसे कोई औरत अपने बच्चे के

बालों को सहलाती है.

 


'kyaa...kyaa kaha....? matalab?' vo hairaani se boli.

'chudaas nahi samajhti ho?'

'kuch kuch..kyaa yehi matalab hai seduction kaa?'

'haa, shaayad... yaani agar....mera matalab hai...ki ...

agar koyi... ab kaise samajhavu tumhe?' mai uljha kar

bola.

vo hansane magi aur boli...'kahi chudaas ka

matalab...sex karane ki chaah to nahi?'

mai use ek tak dekhane magaa. usake honthom par chanchal

muskaan thi.

maine kaha...'theek samjhi tum.'

vo meri aankhom me aankhe daalati hui boli... 'kis shabd

se bana hai...ye chudaas?' mai usaki aawaj me kamp-kampi

si mehasoos ki.

mere dil ne kaha...'gadhe, itana chance de rahi hai...

tu bhi ban jaa besharam... varana pachatayegaa.'

mai bola...'chudaas...chodana, is shabd se bana hai?'

vo khilkhila kar hansane magi aur phir jaldi se chup ho

kar bathroom ki oar dekhane magi ki kahi medam na aa

jaaye.

vo phir megazine ki panne palatane lagi. mai sochane

laga ki ab kya karum. achanak usane phir pucha...'ye

vagina ka kya matalab hota hai?'

maine dil hi dil me kaha...saali tu jaan booj kar aise

sawaal pooch rahi hai...

maine bindaas ho kar kaha...'vajina, ya vagina...yoni ko

kahate hai...'

'what? yoni? ypni kyaa?'

'yoni nahi jaanti ho...?'

'nahi'

'choot samajhti ho?'

usane jhat se apane muh par haath rakh liyaa aur phir

baathroom ki taraf dekhane lagi.

'choot samajhti ho ki nahi?' maine poocha.

vo megazine ke panne palatate hue dheere se boli...

'haa!'

'aur fucking ?'

vo phir bathroom ke darawaje ki taraf dekhane lagi.

maine kaha... 'medam nahi hai... apani maa ke yeha gayi

hai.'

usane ek gehari saans li aur muskuraati hui meri taraf

dekhane lagi. mere dil ne kaha...machali phansi.

'to mai kal aati hu...' vo uthane lagi.

'theharo, aa jaayegi abhi... kaha tha chaar baje shaam

tak aa jaayegi.'

'abhi to do hi baje hai.'

'to kya hua.. thoda intejaar kar lo.'

'thoda?.. pure do ghante baaki hai'

'haa to kyaa hua... mujhase baate karo....'

'kyaa baat karun?'

'kuch bhi...ye bataavo tum kyaa karati ho?'

'kaha to tha, samaaj sewa karati hu.'

'kis kisam ki sewa?'

'jarooratmand logom ki jaroorate poori karana, unaki

samasyaaye suljhaana...vagairaah.'

'mai bhi jarooratmand hu....meri jaroorat poori kar

sakati ho?'

'kyaa jaroorat hai aapki?'

maine usake chehare par najare gaad di aur dheere se

bola...'tum ho meri jaroorat.'

vo bina kuch kahe meri taraf dekhane lagi. phir

boli...'kyaa karenge mere saath?'

'vahi jo ek aadami ek aurat ke saath karata hai....'

vo khamosh ho gayi....maine himmat karke baat aage

badhyi.... 'badi chudaas mehasoos ho rahi hai...'

usake honthom par halki si muskaan aa gayi aur vo

boli...'chudaas ki pyaas?'

'vaah...bahut achaa kahaa tumne...vakaayi chudaas ki

pyaas lag rahi hai.'

'sach kahu to ye pyaas mujhe us din se lagi hai...jis

din aapako pahali baar dekha tha...'

vo meri taraf pyaar bhari najarom se dekhati hui boli.

maine apana shak door karane ke liye kaha...'tum to

itane logom se milati ho...tumhaari pyaas to koyi bhi

mitaa saktaa hai... aur shaayad...'

'nahi nahi...ab itani bhi gayi gujari nahi hu

mai...aapme kuch khaas baat hai...'

'to kyaa tumne kabhi kisi ke saath....?'

'jab tak mera pati mere saath tha...tab tak... phir

hamara divorce ho gaya...aur mai do saal se pyaasi hu.'

'ohh... i see...' maine kaha... 'isaka matalab hai ki do

saal se tumhaari choot ne kisi lund ka mazaa nahi

chakha.'

'nahi...' vo sar jhuka kar boli...'aap jaisa koyi

handsome aadmi nahi mila...'

'agar mil jaata to...?'

'to mai apani choot usake lund par kurbaan kar deti.'

'to aavo... mera lund tumhaari choot par nichaavar hone

ke liye bekaraar hai.' maine usake kareeb jaa kar usaka

haath pakadate hue kaha.

vo phoren mere seene se lag gayi aur mujhe aisa laga

jaise seene me thandak sii padh gayi ho. usake gadaraaye

badan se bhini bhini khusboo aa rahi thi. usake mulaayam

baal mere gaalom ko sahalaane lage. maine kas ke use

apani baahom me jhakad liya aur usake baal pakad kar

usake chehare ko upar uthaya. usake honth khul gaye.

jaise gulaab ki do pankhudiyaa bhavare ke panje me phans

jaane ke betaab ho. maine usake adhkhule gulaabi honthom

ko halake se apane daantom me pakad liya. usaki siskaari

nikal gayi. phir dheere se maine usake naram naram

honthom ko apane muh me le liya. aisaa laga jaise shahad

ka ghoont pee liyaa ho.

usake komal honth amrut kalash ki tarah meri jabaan ko

jalthal karane lage. mai dheere dheere usake mast

honthom ko apane honthom me dabaa kar choosane laga.

meri aankhe band thi aur usaki bhi. nasha saa chaane

lagaa.

maine mehasoos kiya ki usake haath mere lund ki aur badh

rahe hai. maine apane taange phailaa di. usane badi

komalata se mere lund ko thaam liya. phir dheere dheere

use sahalaane lagi. mera lund kisi lohe ki chad ki tarah

sakt ho gayaa. vo pant ke oopar se hi mere lund ko

sahalaa rahi thi, jaise koyi aurat apane bacche ke

baalom ko sahalaati hai.

 
मुझसे बर्दाश्त नही हो रहा था. मैने उसे एक तरफ

हटाया और फिर अपने अंडरवेर के साथ अपनी पॅंट

उतार दी. उसने मेरे लंड को तना हुआ देखा तो झट से

उसे पकड़ लिया. मैं काँप गया. उसने अपनी नाज़ुक

उंगलियों से मेरे लंड को थामा और दो उंगलियों से

उसकी मालिश करने लगी.. धीरे धीरे, कोमलता

से...सौम्यता से.

मेरे तन बदन मे आग सी लगी हुई थी.

वो ख़ास तौर से मेरे लंड के निचले तरफ की नस को

मसल रही थी, जिससे मेरा बुरा हाल था. कभी वो

लंड लंड के हेड को मसल्ति, तो कभी लंड के झाड़ को

अपनी उंगलियों से दबाती. फिर उसने अपनी मुट्ठी मे

मेरे लंड को पूरी तरह थाम लिया और हेड से जड तक

मसाज करने लगी. उसकी कोमल हथेली किसी स्वर्ग से

कम नही थी. लंड से निकलने वाली तरंगे मेरी आत्मा

तक को सराबोर कर रही थी.

मेरे आँखे बंद थी. अचानक मुझे अपने लंड पर कुछ

गीला गीला सा महसूस हुआ. देखा तो पता चला कि

उसने मेरे को अपने मूह मे ले लिया है. उसके रसीले

होंठ मेरे लंड के एक एक भाग को सहला रहे थे. मेरे

लंड का हेड उसके मूह मे था. फिर उसने धीरे धीरे

पूरे लंड को अपने मूह मे भर लिया. मैं अपना सर

इधर उधर करने लगा. ये पहला इत्तेफ़ाक था कि किसी

औरत ने मेरे लंड को अपने मूह मे लिया हो. मेरे सारे

शरीर मे सनसनी सी दौड़ने लगी. अजीब अजीब सी

तरंगे सरसराने लगी.

वो मेरे लंड को अपने मूह मे आगे पीछे करने लगी.

और मेरा बदन काँपने लगा. धीरे धीरे बड़ी

नज़ाकत से वो मेरे लंड को अपने मूह मे मसल रही थी

और मुझे दुनिया मे ही जन्नत का मज़ा आने लगा

था.

कभी वो मेरे लंड के हेड को चूसति तो कभी ज़बान

से सारे लंड को चाटते हुए उसकी जड तक पहुँच

जाती. ऐसा अनुभव मुझे पहले कभी नही हुआ था.

मैं तो इस औरत का गुलाम बन गया.

वो उसी तरह प्यार से मेरे सारे लंड को निहाल कर रही

थी. और मेरे रोम रोम मे करेंट दौड़ रहा था. उसके

मूह मे मेरा पूरा लंड आ गया था. वो किसी कुलफी की

तरह उसे चूसे जा रही थी. धीरे धीरे, धीमे

धीमे. आख़िर मेरे बदन मे एक लंबा सा तनाव आया

और फिर मैने अपने दाँतों को एक दूसरे मे गढ़ा कर

अपना सारा वीर्य उसके मूह मे खारिज कर दिया. वो

लंड को दबा दबा कर सारा वीर्य चूसने लगी. और

मैं तड़प तड़प कर एक एक बूँद उसके होंठों मे

टपकाने लगा.

फिर जब सारा वीरया निकल गया तो उसने मेरा लंड

छोड़ा और हट कर बैठ गयी. मई भी रिलॅक्स हो कर सोफे

पर आधा लेट गया. मेरा लंड धीरे धीरे सामान्या

होने लगा.

वो लंड को देखने लगी और मेरी तरफ देखते हुए

बोली... 'चार बजने वाले है...मेडम का आने का वक्त

हो गया.' मैं बोला...'नही वो आज नही आएगी...मैने

तुम से झूट बोला था.'

उसकी आँख चमकने लगी और वो मेरे खरीब आ गयी.

उस वक्त वो साड़ी पहनी हुई थी. मैने उसकी साड़ी के

अंदर हाथ डाला और उसकी जाँघो को सहलाता हुआ

उसकी चूत तक पहुँचा. उसने एक सिसकारी ली.

उसकी पैंटी गीली हो चुकी थी...इतनी गीली, जैसे किसी

ने पानी मे भिगो दी हो. मैं पैंटी के उपर से ही उसकी

चूत को मसल्ने लगा. वो बिन पानी की मछली की तरह

तड़पने लगी. फिर मैने उसकी पैंटी के अंदर हाथ

डाला. अंदर का भाग किसी भट्टी की तरह गर्म था. मैं

उसकी चूत की दरार ढूँढने लगा. मेरी उंगलिया

उसकी क्लाइटॉरिस से टकराई और वो हल्के से काँप गयी.

मैं अपनी उंगली से उसकी क्लाइटॉरिस को मसलने लगा और

वो बेकरार होने लगी. मैने उसे सोफे पर लिटा दिया और

वो मूह दूसरी तरफ करके लेट गयी. मैने उसकी साड़ी

और पेटिकोट उठाई. उसकी गुलाबी पैंटी चूत के अमृत

से तर बतर थी. मैने पैंटी को पकड़ा और उसे

घसीटता हुआ उसकी जाँघो तक ले आया. फिर उसने

उठ कर खुद ही अपनी पैंटी उतार दी और दोबारा लेट

गयी. उसके घुटने उपर थे और टांगे फैली हुई. उसकी

बेहद खूबसूरत चूत अब बिल्कुल नंगी मेरे सामने थी.

 
mujhase bardaasht nahi ho rahaa tha. maine use ek taraf

hataaya aur phir apane underwear ke saath apani pant

utaar di. usane mere lund ko tanaa hua dekha to jhat se

use pakad liyaa. mai kaamp gayaa. usane apane naajuk

ungaliyom se mere land ko thaama aur do ungaliyom se

usaki maalish karane lagi.. dheere dheere, komalataa

se...saumyataa se.

mere tan badan me aag si lagi huyi thi.

vo khaas taur se mere lund ke nichale taraf ki nas ko

masal rahi thi, jisase mera buraa haal tha. kabhi vo

lund lund ke head ko masalti, to kabhi lund ke jhad ko

apani ungaliyom se dabaati. phir usane apani muthee me

mere lund ko poori tarah thaam liya aur head se jhad tak

masaaj karane lagi. usaki komal hatheli kisi swarg se

kam nahi thi. lund se nikalane vaali tarange mere aatma

tak ko saraabor kar rahi thi.

mere aankhe band thi. achanak mujhe apane lund par kuch

geeli geeli saa mehasoos hua. dekha to pataa chala ki

usane mere ko apane muh me le liyaa hai. usake raseele

honth mere lund ke ek ek bhaag ko sahalaa rahe the. mere

lund kaa head usake muh me tha. phir usane dheere dheere

poore lund ko apane muh me bhar liya. mai apana sar

idhar udhar karane laga. ye pehala ithephaak tha ki kisi

aurat ne mere lund ko apane muh me liyaa ho. mere saare

shareer me sansani si daudane lagi. ajeeb ajeeb see

tarange sarsaraane lagee.

vo mere lund ko apane muh me aage peeche karane lagi.

aur mere badan kaampane lagaa. dheere dheere badi

najaakat se vo mere lund ko apane muh me masal rahi thi

aur mujhe duniyaa me hi jannat kaa mazaa aane lagaa

thaa.

kabhi vo mere lund ke head ko choosati to kabhi jabaan

se saare lund ko chaatate hue usaki jhad tak pahunch

jaati. aisaa anubhav mujhe pahale kabhi nahi hua thaa.

mai to is aurat kaa gulaam ban gayaa.

vo usi tarah pyaar se mere saare lund ko nihaal kar rahi

thi. aur mere rom rom me current daud raha tha. usake

muh me mera poora lund aa gayaa tha. vo kisi kulphi ki

tarah use choose jaa rahi thi. dheere dheere, dheeme

dheeme. aakhir mere badan me ek lambaa saa tanaav aaya

aur phir maine apane daantom ko ek doosare me gadhaa kar

apana saara veerya usake muh me khaarij kar diyaa. vo

lund ko dabaa dabaa kar saara veerya choosane lagi. aur

mai tadap tadap kar ek ek boondh usake honthom me

tapakaane lagaa.

phir jab saara veerya nikal gayaa to usane mera lund

choda aur hat kar baith gayi. mai bhi relax ho kar sofe

par aadhaa let gaya. mera lund dheere dheere saamanya

hone lagaa.

vo lund ko dekhane lagi aur meri taraf dekhate hue

boli... 'chaar bajane waale hai...medam kaa aane ka wakt

ho gaya.' mai bola...'nahi vo aaj nahi aayegi...maine

tum se jhoot bola tha.'

usaki aankh chamakne lagi aur vo mere khareeb aa gayi.

us wakt vo sari pehani hui thi. maine usaki sari ke

andar haath daala aur usaki jhaanghom ko sahalaata hua

usaki choot tak pahuncha. usane ek siskaari lee.

usaki panty geeli ho chuki thi...itani geeli, jaise kisi

ne paani me bhigo di ho. mai panty ke upar se hi usaki

choot ko masalne laga. vo bin paani ki machali ki tarah

tadapane lagi. phir maine usaki panty ke andar haath

daala. andar ka bhag kisi bhatti ki tarah garm tha. mai

usaki choot ki daraar dhoondhane laga. meri ungaliyaa

usaki clitoris se takaraayi aur vo halke se kaamp gayi.

mai apani ungali se usaki clitoris ko masalane laga aur

vo bekaraar hone lagi. maine use sofe par litaa diya aur

vo muh doosari taraf karke let gayi. maine usaki sari

aur petikot uthayi. usaki gulaabi panty choot ke amrut

se tar batar thi. maine panty ko pakada aur use

ghaseetata hua usaki jhanghom tak le aaya. phir usane

uth kar khud hi apani panty utaar dee aur dobaara let

gayi. usake ghutane upar the aur taange paili hui. usaki

behad khubsoorat choot ab bilkul nangi mere saamane thi.

 
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