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सारिका कंवल की जवानी के किस्से

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वासना एक ऐसी आग है जिसमें इंसान जल कर भी नहीं जलता और जितना बुझाना चाहो, उतनी ही भड़कती जाती है।

हम सोचते हैं कि सम्भोग कर लेने से हमारे जिस्मों में लगी आग को शान्ति मिलती है, पर मेरे ख्याल से सम्भोग मात्र आग को समय देने के लिए है, जो बाद में और भयानक रूप ले लेती है।

मैंने अपने अनुभवों से जाना कि मैंने जितनी कोशिश की, मेरी प्यास उतनी ही बढ़ती गई।

कोई भी इंसान सिर्फ एक इंसान के साथ वफादार रहना चाहता है। मैं भी चाहती थी, पर वासना की आग ने मुझे अपने जिस्म को दूसरों के सामने परोसने पर मजबूर कर दिया।

हम वासना में जल कर सिर्फ गलतियाँ करते हैं, पर हमें वासना से ऐसे सुख की अनुभूति मिलती है कि ये गलतियाँ भी हमें प्यारी लगने लगती हैं।

हम सब कुछ भूल जाते हैं, हम भूल जाते हैं कि इससे हमारे परिवार को नुकसान पहुँच रहा है, या दूसरे के परिवार को भी क्षति पहुँच रही है और खुद पर बुरा असर हो रहा है।

अंत में होता यह है कि हम इतने मजबूर हो जाते हैं कि हमें जीना मुश्किल लगने लगता है।

मेरी यह कहानी इसी पर आधारित है।

खैर कुछ लोगों ने मुझसे पूछा था कि मेरा बदन कैसा है, तो मैं बता दूँ फिलहाल मेरा जिस्म 36-32-34 का है।

यह बात तब की है जब अमर और मैं सम्भोग के क्रियायों में डूब कर मस्ती के गोते लगा रहे थे।

उन दिनों मैं और भी मोटी हो गई थी, मेरे स्तन तो तब भी इतने ही थे और कमर भी, बस मेरे कूल्हे जरा बड़े हो गए थे।

बच्चे को दूध पिलाने के क्रम में मुझे कुछ ज्यादा ही खाना-पीना पड़ता था।

इससे बाकी शरीर पर तो असर नहीं हुआ, पर जांघें और कूल्हे थोड़े बड़े हो गए, करीब 36 को हो गए थे।

मेरी नाभि के नीचे के हिस्से से लेकर योनि तक चर्बी ज्यादा हो गई थी, जिसके कारण मेरी योनि पावरोटी की तरह फूली दिखती थी।

योनि के दोनों तरफ की पंखुड़ियाँ काफी मोटी हो गई थीं।

अमर के साथ सम्भोग करके 7-8 दिनों में मेरी योनि के अन्दर की चमड़ी भी बाहर निकल गई थी जो किसी उडूल के फूल की तरह दिखने लगी थी।

मेरे स्तनों में पहले से ज्यादा दूध आने लगा था, साथ ही चूचुकों के चारों तरफ बड़ा सा दाग हो गया था जो हलके भूरे रंग का था और चूचुक भी काफी लम्बे और मोटे हो गए थे।

मैं कभी नहाने जाती तो अपने जिस्म को देखती फिर आईने के सामने खड़ी हो कर अपने अंगों को निहारती और सोचती ऐसा क्या है मुझमें जो अमर को दिखता है, पर मेरे पति को नहीं समझ आता।

मेरा चेहरा पहले से कहीं ज्यादा खिल गया था, गजब की चमक आ गई थी।

शायद यह सम्भोग की वजह से थी या फिर मैं खुश रहने लगी थी, इसीलिए ऐसा परिवर्तन हुआ है।

मैं कभी यह भी सोचती कि मेरे अंगों का क्या हाल हो गया है।

हमें मस्ती करने के लिए लगातार 16 दिन मिल गए थे। इस बीच तो हमने हद पार कर दी थी, मैंने कभी सोचा ही नहीं था कि मैं इतनी इतनी बार सम्भोग करुँगी।

क्योंकि आज तक मैंने जहाँ तक पढ़ा और सुना 3-4 बार में लोग थक कर चूर हो जाते हैं।

मुझे नहीं पता लोग इससे ज्यादा भी करते हैं या नहीं, पर मैंने किया है.. इसलिए मुझे थोड़ी हैरानी थी।

एक दिन ऐसा भी आया कि मैंने अपने शरीर की पूरी उर्जा को सिर्फ सम्भोग में लगा दिया।

बात एक दिन की है, मैं और अमर रोज सम्भोग करते थे। हम लोग कम से कम एक बार सम्भोग के लिए कहीं न कहीं समय निकाल ही लेते थे।

एक दिन मेरे बेटे को स्कूल की तरफ से गाने के लिए एक प्रतियोगिता में भाग लेने के लिए पास के स्कूल ब्रह्मपुर जाना पड़ा।

उस दिन शनिवार था वो सोमवार को वापस आने वाला था।

मैंने उसकी सारी चीजें बाँध कर उसे छोड़ आई।

पति काम पर जाने को थे, सो खाना बना कर उन्हें भी विदा किया।

फिर दोपहर को अमर आए और उनके साथ मैंने सम्भोग किया।

रात को पति जब खाना खा रहे थे तो उन्होंने बताया के उनको सुबह बेलपहाड़ नाम की किसी जगह पर जाना है, कोई मीटिंग और ट्रेनिंग है, मैं उनका सामान बाँध दूँ।

सुबह 4 बजे उनकी ट्रेन थी, सो जल्दी उठ कर उनके लिए चाय बनाई और वो चले गए। मैं दुबारा आकर सो गई।

फिर 7 बजे उठ कर बच्चे को नहला-धुला कर खुद नहाई और एक नाइटी पहन कर तैयार हो गई।

आज मेरे पास अमर के साथ समय बिताने के लिए पूरा दिन था क्योंकि रविवार का दिन था और पति अगले दिन रात को आने वाले थे।

मैंने अमर को फोन किया और ये सब बता दिया।

सुनते ही वो आधे घंटे में मेरे घर आ गए। तब 9 बज रहे थे, मैंने उनको चाय-नाश्ता दिया।

उसने कहा- कहीं घूमने चलते हैं।

मैंने कहा- नहीं, किसी ने देख लिया तो दिक्कत हो जाएगी।

पर उसने कहा- यहाँ कौन हमें जानता है, और वैसे भी अमर और मेरे पति की दोस्ती है तो किसी ने देख भी लिया तो कह देंगे कुछ सामान खरीदना था तो मेरे साथ हो।

मैं मान गई और तैयार होने के लिए जाने लगी, पर अमर ने मुझे रोक लिया और अपनी बांहों में भर कर चूमने लगे।

मैंने कहा- अभी नहा कर निकली हूँ फिर से नहाना पड़ेगा.. सो जाने दो।

उसने कहा- तुम नहाओ या न नहाओ मुझे फर्क नहीं पड़ता, मुझे तुम हर हाल में अच्छी लगती हो।

फिर क्या था पल भर में मेरी नाइटी उतार मुझे नंगा कर दिया क्योंकि मैंने अन्दर कुछ नहीं पहना था।

मुझे बिस्तर पर लिटा मुझे प्यार करने लगे, खुद भी नंगे हो गए, एक-दूसरे को हम चूमने-चूसने लगे और फिर अमर ने अपना लिंग मेरी योनि में घुसा कर दिन के पहले सम्भोग की प्रक्रिया का शुभारम्भ कर दिया।

उसका साथ मुझे इतना प्यारा लग रहा था कि मैं बस दुनिया भूल कर उसका साथ दे रही थी।

कोई हमारे चेहरों को देख कर आसानी से बता देता कि हम कितने खुश और संतुष्ट थे।

आधे घंटे की मशक्कत के बाद हम दोनों ही झड़ गए और हमारी काम की अग्नि कुछ शांत हुई, पर मुझे यह मालूम नहीं था कि यह अग्नि आज एक ज्वालामुखी का रूप ले लेगी।

खैर मैं उठकर बाथरूम चली गई फिर खुद को साफ़ करके वापस आई तो देखा अमर अभी भी बिस्तर पर नंगे लेटे हैं।

मैंने उनसे कहा- उठो और भी तैयार हो जाओ।

फिर वो भी तैयार होकर वापस आए। आते ही मुझे ऊपर से नीचे तक देखा, मैंने हरे रंग की साड़ी पहनी थी।

अमर ने पूछा- अन्दर क्या पहना है?

मैंने जवाब दिया- पैंटी और ब्रा..

वो मेरे पास आए और मेरी साड़ी उठा दी।

मैंने कहा- क्या कर रहे हो?

उहोने मेरी पैंटी निकाल दी और कहा- आज तुम बिना पैंटी के चलो।

मैंने कहा- नहीं।

पर वो जिद करने लगे और मुझे बिना पैंटी के ही बाहर जाना पड़ा।

रास्ते भर मुझे ऐसा लग रहा था कि जैसे मेरे कूल्हे हवा में झूल रहे हैं। हम पहले एक मार्किट में गए वह मैंने अपने श्रृंगार का सामान लिया फिर बच्चे के लिए खिलौने लिए, कुछ खाने का सामान भी लिया।

तभी अमर मेरे पास आए और एक काउंटर पर ले गए। वो लेडीज अंडरगारमेंट्स का स्टाल था, वहाँ एक 24-25 साल की लड़की ने आकर मुझसे पूछा- क्या चाहिए?

तभी अमर ने कहा- मेरी वाइफ को थोड़े मॉडर्न अंडरगारमेंट्स चाहिए।

तब उस लड़की ने मुझे तरह-तरह की ब्रा और पैंटी सेट्स दिखाने शुरू कर दिए जिनमें से 3 सेट्स अमर ने मेरे लिए खरीद लिए।

फिर हमने एक रेस्तरां में जाकर खाना खाया और वापस घर आ गए।

घर आते ही अमर ने मुझे बच्चे को दूध पिला कर सुलाने को कहा ताकि हम बेफिक्र हो कर प्यार करते रहें।

सो मैंने बच्चे को दूध पिला कर सुला दिया।

तब अमर ने मुझसे कहा- ब्रा और पैंटी पहन कर दिखाओ, तुम उनमें कैसी लगती हो?

मैंने बारी-बारी से पहन कर दिखाया, जिसमें से सफ़ेद रंग की ब्रा और पैंटी मुझे भी बहुत अच्छी लग रही थी।

अमर ने मुझे पास बुलाया और अपनी गोद में बिठा लिया फिर मुझे चूमने लगा। मैंने भी उसको चूमना शुरू कर दिया।

हमारे होंठ आपस में चिपक गए।
 
उस लड़की ने मुझे तरह-तरह की ब्रा और पैंटी सेट्स दिखाने शुरू कर दिए जिनमें से 3 सेट्स अमर ने मेरे लिए खरीद लिए।

फिर हमने एक रेस्तरां में जाकर खाना खाया और वापस घर आ गए।

घर आते ही अमर ने मुझे बच्चे को दूध पिला कर सुलाने को कहा ताकि हम बेफिक्र हो कर प्यार करते रहें।

सो मैंने बच्चे को दूध पिला कर सुला दिया।

तब अमर ने मुझसे कहा- ब्रा और पैंटी पहन कर दिखाओ, तुम उनमें कैसी लगती हो?

मैंने बारी-बारी से पहन कर दिखाया, जिसमें से सफ़ेद रंग की ब्रा और पैंटी मुझे भी बहुत अच्छी लग रही थी।

अमर ने मुझे पास बुलाया और अपनी गोद में बिठा लिया फिर मुझे चूमने लगा। मैंने भी उसको चूमना शुरू कर दिया।

हमारे होंठ आपस में चिपक गए, कभी होंठों को चूसते तो कभी जुबान को चूसते।

अमर मेरी जीभ को अपने मुँह के अन्दर भर कर ऐसे चूसने लगा जैसे उसमें से कोई मीठा रस रिस रहा हो।

फिर उसने मेरी ब्रा का हुक खोल दिया और ब्रा निकाल दी।

उसने मुझे बिस्तर पर दीवार से लगा कर बिठा दिया और मेरे स्तनों से खेलने लगा, वो मेरे स्तनों को जोर से मसलता, फिर उन्हें मुँह से लगा कर चूमता और फिर चूचुकों को मुँह में भर कर चूसने लगता।

वो मेरा दूध पीने में मगन हो गया, बीच-बीच में दांतों से काट भी लेता, मैं दर्द से अपने बदन को सिकोड़ लेती।

मैं उत्तेजित होने लगी.. मेरे चूचुक कड़े हो गए थे।

मेरी योनि में भी पानी रिसने लगा था, मैंने भी एक-एक करके अमर के कपड़े उतार दिए और उसको नंगा करके उसके लिंग को मुट्ठी में भर कर जोर-जोर से दबाने लगी और हिलाने लगी।

अमर ने कुछ देर मेरे स्तनों को जी भर चूसने के बाद मेरे पूरे जिस्म को चूमा फिर मेरी पैंटी निकाल दी और मेरी टांगों को फैला कर मेरी योनि के बालों को सहलाते हुए योनि पर हाथ फिराने लगा।

उसने मेरी योनि को दो ऊँगलियों से फैलाया और चूम लिया।

फिर एक ऊँगली अन्दर डाल कर अन्दर-बाहर करने लगा, उसके बाद मुँह लगा कर चूसने लगा।

उसकी इस तरह के हरकतों से मेरे पूरे जिस्म में एक अजीब सी लहर दौड़ने लगी, मैं गर्म होती चली गई।

उसने अब अपनी जीभ मेरी योनि के छेद में घुसाने का प्रयास शुरू कर दिया। मुझे इतना मजा आ रहा था कि मैंने अपने दोनों हाथों से योनि को फैला दिया और अमर उसमें जीभ डाल कर चूसने लगा।

वो कभी मेरी योनि के छेद में जीभ घुसाता तो कभी योनि की दोनों पंखुड़ियों को बारी-बारी चूसता, तो कभी योनि के ऊपर के दाने को दांतों से पकड़ कर खींचता।

इस तरह कभी-कभी मुझे लगता कि मैं झड़ जाऊँगी पर अमर को मेरी हर बात का मानो अहसास हो चुका था, उसने मुझे छोड़ दिया और अपना लिंग मेरे मुँह के पास कर दिया।

मैंने उसके लिंग को मुठ्ठी में भर कर पहले आगे-पीछे किया, फिर लिंग के चमड़े को पीछे की तरफ खींच कर सुपारे को खोल दिया।

पहले तो मैंने उसके सुपारे को चूमा फिर जुबान को पूरे सुपारे में फिराया और मुँह में भर कर चूसने लगी।

मैंने एक हाथ से उसके लिंग को पकड़ रखा था और आगे-पीछे कर रही थी और दूसरे हाथ से उसके दो गोल-गोल अन्डकोषों को प्यार से दबा-दबा कर चूस रही थी।

अमर का लिंग पूरी तरह सख्त हो गया था और इतना लाल था जैसे कि अभी फूट कर खून निकल जाएगा।

उसने मुझे कहा- मुझे और मत तड़पाओ जल्दी से अपने अन्दर ले लो।

मैंने भी कहा- मैं तो खुद तड़प रही हूँ.. अब जल्दी से मेरे अन्दर आ जाओ…

और मैंने अपनी टाँगें फैला कर उसके सामने लेट गई।

तब अमर ने कहा- ऐसे नहीं.. आज मुझे कुछ और तरीके से मजा लेने दो.. आज का दिन हमारा है।

यह कह कर उसने मेरा हाथ पकड़ कर मुझे आईने के सामने खड़ा कर दिया और मेरी एक टांग को ड्रेसिंग टेबल पर चढ़ा दिया।

फिर वो सामने से मेरे एक नितम्ब को पकड़ कर अपने लिंग को मेरी योनि में रगड़ने लगा।

मुझसे रहा नहीं जा रहा था सो मैंने कहा- अब देर मत करो, कितना तड़फाते हो तुम!!

यह सुनते ही उसने लिंग को छेद पर टिका कर एक धक्का दिया… लिंग मेरी योनि के भीतर समा गया।

मुझे ऐसा लगा जैसे मेरी मनोकामना पूरी हो गई, एक सुकून का अहसास हुआ, पर अभी पूरा सुकून मिलना बाकी था।

उसने मुझे धक्के लगाने शुरू कर दिए और मेरे अन्दर चिनगारियाँ आग का रूप लेने लगीं।

मैं बार-बार आइने में देख रही थी, कैसे उसका लिंग मेरी योनि के अंतिम छोर को छू कर वापस बाहर आ रहा है।

कुछ देर मैं इतनी ज्यादा गर्म हो गई कि मैं अमर को अपने हाथों और पैरों से दबोच लेना चाहती थी। मेरी योनि पहले से कही ज्यादा गीली हो गई थी जिसकी वजह से उसका लिंग ‘चिपचिप’ करने लगा था।

मैंने अमर से कहा- मुझसे अब ऐसे और नहीं खड़ा रहा जाता.. मुझे बिस्तर पर ले चलो।

उसने अपना लिंग बाहर निकाला और बिस्तर पर लेट गया और मुझे अपने ऊपर आने को कहा।

मैंने अपने दोनों टाँगें अमर के दोनों तरफ फैला कर अमर के लिंग के ऊपर योनि को रख दिया और अमर के ऊपर लेट गई।

अमर ने अपनी कमर को हिला कर लिंग से मेरी योनि को टटोलना शुरू किया। योनि की छेद को पाते ही अमर ने अपनी कमर उठाई,

तो लिंग योनि में घुस गया और मैंने भी अपनी कमर पर जोर दिया तो लिंग मेरी योनि के अंतिम छोर तक घुसता चला गया।

मैंने अब अपनी कमर को ऊपर-नीचे करना शुरू कर दिया और अमर मेरे कूल्हों को पकड़ कर मुझे मदद करने लगा।

मैंने अपने होंठ अमर के होंठों से लगा दिए और अमर ने चूमना और चूसना शुरू कर दिया। थोड़ी देर बाद मैंने अपने स्तनों को बारी-बारी से उसके मुँह से लगा कर अपने दूध चुसवाने लगी।

मैं अपनी पूरी ताकत से धक्के लगा रही थी और अमर भी नीचे से अपनी कमर को नचाने लगा था।

अमर को बहुत मजा आ रहा था और यह सोच कर मैं भी खुश थी कि अमर को मैं पूरी तरह से खुश कर रही हूँ।

मैं बुरी तरह से पसीने में भीग गई थी और मैं हाँफने लगी थी।

तब उसने मुझे पेट के बल लिटा दिया और मेरे पीछे आ गया और मेरे कूल्हों को ऊपर करने को कहा।

उसने लिंग मेरी योनि में घुसा कर धक्के देना शुरू कर दिया, साथ ही मेरे स्तनों से खेलने लगा।

कुछ देर बाद मुझे उसने सीधा लिटा दिया और कमर के नीचे तकिया रख मेरी टाँगें फैला कर लिंग अन्दर घुसा कर.. मेरे ऊपर लेट गया और धक्के देने लगा।

हमें सम्भोग करते हुए करीब आधा घंटा हो चुका था और अब हम चरम सीमा से दूर नहीं थे।

मैं भी अब चाहती थी कि मैं अमर के साथ ही झड़ू, क्योंकि उस वक़्त जो मजा आता है वो सबसे अलग और सबसे ज्यादा होता है।

मैंने अमर के गले में हाथ डाल कर उसको पकड़ लिया और टांगों को ज्यादा से ज्यादा उठा कर उसके कूल्हों पर चढ़ा दिया ताकि उसे अपना लिंग मेरी योनि में घुसाने को ज्यादा से ज्यादा जगह मिल सके।

उसने भी मुझे कन्धों से पकड़ा और एक जोर का धक्का देकर सुपारे को मेरी बच्चेदानी में रगड़ने लगा।

मैं मस्ती में सिसकने लगी और मैंने अपनी पकड़ और कड़ा कर दिया।

अमर मेरी हालत देख समझ गया कि मैं झड़ने वाली हूँ, उसने पूरी ताकत के साथ मुझे पकड़ा और मेरी आँखों में देखा।

मैंने भी उससे अपनी नजरें मिलाईं।

अब वो पूरी ताकत लगा कर तेज़ी से धक्के लगाने लगा।

उसके चेहरे से लग रहा था जैसे वो मुझे संतुष्ट करने के लिए कोई जंग लड़ रहा है।

मैंने भी उसे पूरा मजा देने के लिए अपनी योनि को सिकोड़ लिया और उसके लिंग को योनि से कस लिया।

हम दोनों तेज़ी से सांस लेने लगे, तेज धक्कों के साथ मेरी ‘आहें’ तेज़ होती चली गईं।

मेरा पूरा बदन अकड़ने लगा और मैं झड़ गई…

मैं पूरी मस्ती में कमर उछालने लगी और अमर भी इसी बीच जोर-जोर के धक्कों के साथ झड़ गया।

हम दोनों ने एक-दूसरे को कस कर पकड़ लिया और हाँफने लगे।

अमर का सुपारा मेरी बच्चेदानी से चिपक गया और उसका वीर्य मेरी बच्चेदानी को नहलाने लगा।

कुछ देर तक हम ऐसे ही एक-दूसरे से चिपक कर सुस्ताते रहे।

जैसे-जैसे अमर का लिंग का आकार कम होता गया, मेरी योनि से अमर का रस रिस-रिस कर बहने लगा और बिस्तर के चादर पर फ़ैल गया।

कुछ देर में अमर मेरे ऊपर से हट कर मेरे बगल में लेट गया और कहा- तुम्हें मजा आया?

मैंने जवाब दिया- क्या कभी ऐसा हुआ कि मुझे मजा नहीं आया हो… तुम्हारे साथ?

उसने मेरे गालों पर हाथ फेरते हुआ कहा- तुम में अजीब सी कशिश है.. जितना तुम्हें प्यार करना चाहता6 हूँ उतना ही कम लगता है।

यह कहते हुए उसने मुझे अपनी बांहों में भर कर दुबारा चूमना शुरू कर दिया।

अभी हमारे बदन का पसीना सूखा भी नहीं था और मेरी योनि अमर के वीर्य से गीली होकर चिपचिपी हो गई थी।

उसके चूमने और बदन को सहलाने से मेरे अन्दर वासना की आग फिर से भड़क उठी और मैं गर्म हो कर जोश में आने लगी।

मैंने उसके लिंग को हाथों में भर कर जोर से मसलना शुरू कर दिया।

कुछ ही देर में वो दुबारा सख्त होने लगा।

वो मेरे स्तनों से खेलने में मगन हो गया और मैं उसके लिंग को दुबारा सम्भोग के लिए तैयार करने लगी।

 
मैंने उसके लिंग को हाथों में भर कर जोर से मसलना शुरू कर दिया। कुछ ही देर में वो दुबारा सख्त होने लगा।

वो मेरे स्तनों से खेलने में मगन हो गया और मैं उसके लिंग को दुबारा सम्भोग के लिए तैयार करने लगी।

मैंने उसके लिंग को मुँह में भर कर चूसना शुरू कर दिया। कुछ ही पलों में वो एकदम कड़क हो गया।

अमर ने मेरी योनि में ऊँगली डाल कर अन्दर-बाहर करना शुरू कर दिया और कुछ ही पलों में मैं सम्भोग के लिए फिर से तड़पने लगी।

उसने मुझे खींच कर अपने ऊपर चढ़ा लिया, मैंने भी अपनी टाँगें फैला कर उसके लिंग के ऊपर अपनी योनि को सामने कर दिया और उसके ऊपर लेट गई।

अमर ने हाथ से अपने लिंग को पकड़ कर मेरी योनि में रगड़ना शुरू कर दिया। मैं तड़प उठी क्योंकि मैं जल्द से जल्द उसे अपने अन्दर चाहती थी।

मैंने अब उसे इशारा किया तो उसने अपने लिंग के सुपाड़े को योनि की छेद में टिका दिया और अपनी कमर उठा दी, उसका लिंग मेरी योनि में सुपाड़े तक घुस गया, फिर मैंने भी जोर लगाया तो लिंग पूरी गहराई में उतर गया।

मैंने मजबूती से अमर को पकड़ा और अमर ने मुझे और मैंने धक्कों की प्रक्रिया को बढ़ाने लगी। कुछ पलों में अमर भी मेरे साथ नीचे से धक्के लगाने लगे।

करीब 10 मिनट में मैं झड़ गई, पर खुद पर जल्दी से काबू करते हुए मैंने अमर का साथ फिर से देना शुरू कर दिया।

हम पूरे जोश में एक-दूसरे को प्यार करते चूमते-चूसते हुए सम्भोग का मजा लेने लगे।

हम दोनों इस कदर सम्भोग में खो गए जैसे हम दोनों के बीच एक-दूसरे को तृप्त करने की होड़ लगी हो।

मैं अब झड़ रही थी मैंने अपनी पूरी ताकत से अमर को अपने पैरों और टांगों से कस लिया और कमर उठा दी।

मेरी मांसपेसियाँ अकड़ने लगीं और मेरी योनि सिकुड़ने लगी, जैसे अमर के लिंग को निचोड़ देगी और मैं झटके लेते हुए शांत हो गई।

उधर अमर भी मेरी योनि में लिंग को ऐसे घुसा रहा था, जैसे मेरी बच्चेदानी को फाड़ देना चाहता हो।

उसका हर धक्का मेरी बच्चेदानी में जोर से लगता और मैं सहम सी जाती।

उसने झड़ने के दौरान जो धक्के मेरी योनि में लगाए उसे बर्दास्त करना मुश्किल हो रहा था।

करीब 10-12 धक्कों में वो अपनी पिचकारी सी तेज़ धार का रस मेरी योनि में छोड़ते हुए शांत हो गया और तब जा कर मुझे थोड़ी राहत मिली।

अमर झड़ने के बाद भी अपने लिंग को पूरी ताकत से मेरी योनि में कुछ देर तक दबाता रहा। फिर धीरे-धीरे सुस्त हो गया और मेरे ऊपर लेट गया।

कुछ पलों के बाद मैंने उसे अपने ऊपर से हटाया और वो मेरे बगल में सो गया। मैं बाथरूम चली गई और जब वापस आई तो उसने मुझे फिर दबोच लिया और हम फिर से शुरू हो गए।

हमने फिर से सम्भोग किया और मैं बुरी तरह से थक कर चूर हो चुकी थी।

मैं झड़ने के बाद कब सो गई, पता ही नहीं चला।

मुझे जब बच्चे की रोने की आवाज आई तो मेरी आँख खुली, मैंने देखा कि शाम के 5 बज रहे थे।

मेरा मन बिस्तर से उठने को नहीं कर रहा था, पर बच्चे को रोता देख उठी और बच्चे को दूध पिलाते हुए फिर से लेट गई।

बच्चे का पेट भरने के बाद मैंने उसे दुबारा झूले में लिटा कर बाथरूम गई, खुद को साफ़ किया और वापस आकर चाय बनाई।

मैंने अमर को उठाया और उसे चाय दी। अमर चाय पीने के बाद बाथरूम जाकर खुद को साफ़ करने के बाद मेरे साथ बैठ कर बातें करने लगे।

उसने कहा- आज का दिन कितना बढ़िया है.. हमारे बीच कोई नहीं.. हम खुल कर प्यार कर रहे हैं और किसी का डर भी नहीं है।

मैंने कहा- पर आज कुछ ज्यादा ही हो रहा है… मेरी हालत ख़राब होने को है।

अमर ने कहा- अभी कहाँ.. अभी तो पूरी रात बाकी है और ऐसा मौका कब मिले कौन जानता है।

यह कहते हुए उसने मुझे फिर से अपनी बांहों में भर लिया और चूमने लगा।

पास में ही बच्चा झूले में बैठा खेल रहा था, मुझे यह ठीक नहीं लग रहा था तो मैंने अमर से कहा- यहाँ बच्चे के सामने ठीक नहीं है.. रात में उसके सोने के बाद जो मर्ज़ी सो करना।

पर अमर मेरी कहाँ सुनने वाला था, उसने कहा- ये तो सिर्फ 5 महीने का है.. इसे क्या पता हम क्या कर रहे हैं… फिर भी अगर तुम्हें परेशानी है तो इसे सुला दो।

मैंने उसे बताया- यह दिन भर सोया है और अभी कुछ देर पहले ही उठा है.. अभी नहीं सोएगा.. हम बाद में प्यार करेंगे.. रात भर.. मैं तो साथ में ही रहूँगी।

अमर मेरी बात को कहाँ मानने वाले थे, वो तो बस मेरे जिस्म से खेलने के लिए तड़प रहे थे।

उसने मेरे ही बच्चे के सामने मुझे तुरंत नंगा कर दिया और मेरे पूरे जिस्म को चूमने लगे।

मैं बैठी थी और अमर मेरे स्तनों को चूसने लगा। वो बारी-बारी से दोनों स्तनों से दूध पीने लगे और सामने मेरा बच्चा खेलते हुए कभी हमें देखता तो कभी खुद खिलौने से खेलने लगता।

कभी वो बड़े प्यार से मेरी तरफ देखा और मुस्कुराता, पर अमर पर इन सब चीजों का कोई असर नहीं हो रहा था… वो बस मेरे स्तनों को चूसने में लगा हुआ था।

मैंने अमर से विनती की कि मुझे छोड़ दे.. पर वो नहीं सुन रहा था। उसने थोड़ी देर में मेरी योनि को चूसना शुरू कर दिया और मैं भी गर्म होकर सब भूल गई।

मैंने भी उसका लिंग हाथ से सहलाना और हिलाना शुरू कर दिया। फिर अमर ने मुझे लिंग को चूसने को कहा, मैंने उसे चूस कर और सख्त कर दिया।

उसने मुझे आगे की तरफ झुका दिया और मैं अपने घुटनों तथा हाथों के बल पर कुतिया की तरह झुक गई, अमर मेरे पीछे आकर मेरी योनि में लिंग घुसाने लगा।

अमर ने लिंग को अच्छी तरह मेरी योनि में घुसा कर मेरे स्तनों को हाथों से पकड़ा और फिर धक्के लगाने लगा।

मैंने भी उसका साथ देना शुरू कर दिया और आधे घंटे तक सम्भोग करने के बाद हम झड़ गए।

अमर को अभी भी शान्ति नहीं मिली थी, उसने दुबारा सम्भोग किया।

मेरी हालत बहुत ख़राब हो चुकी थी और मेरे बदन में दर्द होने लगा था।

मैंने अमर से कहा- रात का खाना कहीं बाहर से ले आओ.. क्योंकि मैं अब खाना नहीं बना सकती… बहुत थक चुकी हूँ।

अमर बाहर चले गए और मैं फिर से सो गई, मैं बहुत थक चुकी थी।

हमने अब तक 6 बार सम्भोग किया था, पर अभी तो पूरी रात बाकी थी।

कहते हैं कि हर आने वाला तूफ़ान आने से पहले कुछ इशारा करता है। शायद यह भी एक इशारा ही था कि हम दिन दुनिया भूल कर बस एक-दूसरे के जिस्मों को बेरहमी से कुचलने में लगे थे।

लगभग 9 बजे के आस-पास अमर वापस आए फिर हमने बिस्तर पर ही खाना खाया और टीवी देखने लगे।

मैंने अपने बच्चे को दूध पिलाया और सुला दिया।

रात के करीब 11 बजे मैंने अमर से कहा- मैं सोने जा रही हूँ।

अमर ने कहा- ठीक है.. मैं थोड़ी देर टीवी देख कर सोऊँगा।

मैं अभी हल्की नींद में ही थी, तब मेरे बदन पर कुछ रेंगने सा मैंने महसूस किया।

मैंने आँख खोल कर देखा तो अमर का हाथ मेरे बदन पर रेंग रहा था।

मैंने कहा- अब बस करो.. कितना करोगे.. मार डालोगे क्या?

अमर ने कहा- अगर प्यार करने से कोई मर जाता, तो पता नहीं कितने लोग अब तक मर गए होते, एक अकेले हम दोनों ही नहीं हैं इस दुनिया में.. जो प्यार करते हैं।

फिर उसने मेरे बदन से खेलना शुरू कर दिया, हम वापस एक-दूसरे से लिपट गए।

हम दोनों ऐसे एक-दूसरे को चूमने-चूसने लगे जैसे कि एक-दूसरे में कोई खजाना ढूँढ रहे हों।

काफी देर एक-दूसरे को चूमने-चूसने और अंगों से खेलने के बाद अमर ने मेरी योनि में लिंग घुसा दिया।

अमर जब लिंग घुसा रहे थे तो मुझे दर्द हो रहा था, पर मैं बर्दास्त करने के अलावा कुछ नहीं कर सकती थी।

काफी देर सम्भोग के बाद अमर शांत हुए, पर तब मैंने दो बार पानी छोड़ दिया था। बिस्तर जहाँ-तहाँ गीला हो चुका था और अजीब सी गंध आनी शुरू हो गई थी।

 
हम दोनों ऐसे एक-दूसरे को चूमने-चूसने लगे जैसे कि एक-दूसरे में कोई खजाना ढूँढ रहे हों।

काफी देर एक-दूसरे को चूमने-चूसने और अंगों से खेलने के बाद अमर ने मेरी योनि में लिंग घुसा दिया।

अमर जब लिंग घुसा रहे थे तो मुझे दर्द हो रहा था, पर मैं बर्दास्त करने के अलावा कुछ नहीं कर सकती थी।

काफी देर सम्भोग के बाद अमर शांत हुए, पर तब मैंने दो बार पानी छोड़ दिया था। बिस्तर जहाँ-तहाँ गीला हो चुका था और अजीब सी गंध आनी शुरू हो गई थी।

इसी तरह सुबह होने को थी, करीब 4 बजने को थे। हम 10 वीं बार सम्भोग कर रहे थे। मेरे बदन में इतनी ताकत नहीं बची थी कि मैं अमर का साथ दे सकूँ, पर ऐसा लग रहा था जैसे मेरे अन्दर की प्यास अब तक नहीं बुझी थी।

जब अमर मुझे अलग होता, तो मुझे लगता अब बस और नहीं हो सकता.. पर जैसे ही अमर मेरे साथ अटखेलियाँ करते.. मैं फिर से गर्म हो जाती।

जब हम सम्भोग कर रहे थे.. मैं बस झड़ने ही वाली थी कि मेरा बच्चा जग गया और रोने लगा।

मैंने सोचा कि अगर मैं उठ गई तो दुबारा बहुत समय लग सकता है इसलिए अमर को उकसाने के लिए कहा- तेज़ी से करते रहो.. मुझे बहुत मजा आ रहा है.. रुको मत।

यह सुनते ही अमर जोर-जोर से धक्के मारने लगे।

मैंने फिर सोचा ये क्या कह दिया मैंने, पर अमर को इस बात से कोई लेना-देना नहीं था.. वो बस अपनी मस्ती में मेरी योनि के अन्दर अपने लिंग को बेरहमी से घुसाए जा रहे थे।

मैंने अमर को पूरी ताकत से पकड़ लिया, पर मेरा दिमाग दो तरफ बंट गया।

एक तरफ मैं झड़ने को थी और अमर थे दूसरी तरफ मेरे बच्चे की रोने की आवाज थी।

मैंने हार मान कर अमर से कहा- मुझे छोड़ दो, मेरा बच्चा रो रहा है।

पर अमर ने मुझे और ताकत से पकड़ लिया और धक्के मारते हुए कहा- बस 2 मिनट रुको.. मैं झड़ने को हूँ।

अब मैं झड़ चुकी थी और अमर अभी भी झड़ने के लिए प्रयास कर रहा था।

उधर मेरे बच्चे के रोना और तेज़ हो रहा था। अब मुझसे बर्दाश्त नहीं हो रहा था, मैंने जोर लगा कर अमर को खुद से अलग करने की कोशिश करने लगी, साथ ही उससे विनती करने लगी कि मुझे छोड़ दे।

मैं बार-बार विनती करने लगी- प्लीज अमर… छोड़ दो बच्चा रो रहा है.. उसे सुला कर दोबारा आ जाऊँगी।

पर अमर लगातार धक्के लगाते हुए कह रहा था- बस हो गया.. थोड़ा सा और..

काफी हाथ-पाँव जोड़ने के बाद अमर ने मुझे छोड़ दिया और जल्दी वापस आने को कहा।

मैंने अपने बच्चे को गोद में उठाया और उसे दूध पिलाने लगी। मैं बिस्तर पर एक तरफ होकर दूध पिला रही थी और अमर मेरे पीछे मुझसे चिपक कर मेरे कूल्हों को तो कभी जाँघों को सहला रहा था।

मैंने अमर से कहा- थोड़ा सब्र करो.. बच्चे को सुला लूँ।

अमर ने कहा- ये अच्छे समय पर उठ गया.. अब जल्दी करो।

मैं भी यही अब चाहती थी कि बच्चा सो जाए ताकि अमर भी अपनी आग शांत कर सो जाए और मुझे राहत मिले।

अमर अपने लिंग को मेरे कूल्हों के बीच रख रगड़ने में लगा था, साथ ही मेरी जाँघों को सहला रहा था।

कुछ देर बाद मेरा बच्चा सो गया और मैंने उसे झूले में सुला कर वापस अमर के पास आ गई।

अमर ने मुझे अपने ऊपर सुला लिया और फिर धीरे-धीरे लिंग को योनि में रगड़ने लगा।

मैंने उससे कहा- अब सो जाओ.. कितना करोगे.. मेरी योनि में दर्द होने लगा है।

उसने कहा- हां बस.. एक बार मैं झड़ जाऊँ.. फिर हम सो जायेंगे।

मैंने उससे कहा- आराम से घुसाओ और धीरे-धीरे करना।

उसने मुझे कहा- तुम धक्के लगाओ।

पर मैंने कहा- मेरी जाँघों में दम नहीं रहा।

तो उसने मुझे सीधा लिटा दिया और टाँगें चौड़ी कर लिंग मेरी योनि में घुसा दिया.. मैं कराहने लगी।

उसने जैसे ही धक्के लगाने शुरू किए… मेरा कराहना और तेज़ हो गया।

तब उसने पूछा- क्या हुआ?

मैंने कहा- बस अब छोड़ दो.. दर्द बर्दाश्त नहीं हो रहा है।

तब उसने लिंग को बाहर निकाल लिया मुझे लगा शायद वो मान गया, पर अगले ही क्षण उसने ढेर सारा थूक लिंग के ऊपर मला और दुबारा मेरी योनि में घुसा दिया।

मैं अब बस उससे विनती ही कर रही थी, पर उसने मुझे पूरी ताकत से पकड़ा और प्यार से मेरे होंठों को चूमते हुए कहा- बस कुछ देर और मेरे लिए बर्दाश्त नहीं कर सकती?

मैं भी अब समझ चुकी थी कि कुछ भी हो अमर बिना झड़े शांत नहीं होने वाला.. सो मैंने भी मन बना लिया और दर्द सहती रही।

अमर का हर धक्का मुझे कराहने पर मजबूर कर देता और अमर भी थक कर हाँफ रहा था।

ऐसा लग रहा था जैसे अमर में अब और धक्के लगाने को दम नहीं बचा, पर अमर हार मानने को तैयार नहीं था।

उसका लिंग जब अन्दर जाता, मुझे ऐसा लगता जैसे मेरी योनि की दीवारें छिल जायेंगी।

करीब 10 मिनट जैसे-तैसे जोर लगाने के बाद मुझे अहसास हुआ कि अमर अब झड़ने को है.. सो मैंने भी अपने जिस्म को सख्त कर लिया.. योनि को सिकोड़ लिया.. ताकि अमर का लिंग कस जाए और उसे अधिक से अधिक मजा आए।

मेरे दिमाग में यह भी चल रहा था कि झड़ने के दौरान जो धक्के अमर लगायेंगे वो मेरे लिए असहनीय होंगे.. फिर भी अपने आपको खुद ही हिम्मत देती हुई अमर का साथ देने लगी।

अमर ने मेरे होंठों से होंठ लगाए और जीभ को चूसने लगा साथ ही मुझे पूरी ताकत से पकड़ा और धक्कों की रफ़्तार तेज़ कर दी।

उसका लिंग मेरी योनि की तह तक जाने लगा, 7-8 धक्कों में उसने वीर्य की पिचकारी सी मेरे बच्चेदानी पर छोड़ दी और हाँफता हुआ मेरे ऊपर ढेर हो गया।

उसके शांत होते ही मुझे बहुत राहत मिली, मैंने उसे अपने ऊपर से हटाया और हम दोनों सो गए।

एक बात मैंने ये जाना कि मर्द जोश में सब कुछ भूल जाते हैं और उनके झड़ने के क्रम में जो धक्के होते हैं वो बर्दाश्त के बाहर होते हैं।

मेरे अंग-अंग में ऐसा दर्द हो रहा था जैसे मैंने न जाने कितना काम किया हो

अमर ने मुझे 7 बजे फिर उठाया और मुझे प्यार करने लगा।

मैंने उससे कहा- तुम्हें काम पर जाना है तो अब तुम जाओ.. तुम्हें इधर कोई देख लेगा तो मुसीबत हो जाएगी।

अमर ने कहा- तुमसे दूर जाने को जी नहीं कर रहा।

उसने मुझे उठाते हुए अपनी गोद में बिठा लिया और बांहों में भर कर मुझे चूमने लगा।

मैंने कहा- अभी भी मन नहीं भरा क्या?

उसने जवाब दिया- पता नहीं.. मेरे पूरे जिस्म में दर्द है, मैं ठीक से सोया नहीं, पर फिर भी ऐसा लग रहा है.. जैसे अभी भी बहुत कुछ करने को बाकी है।

मैंने उसे जाने के लिए जोर दिया और कहा- अब बस भी करो.. वरना तुम्हें देर हो जाएगी।

पर उस पर मेरी बातों का कोई असर नहीं हो रहा था, वो मुझे बस चूमता जा रहा था और मेरे स्तनों को दबाता और उनसे खेलता ही जा रहा था।

मेरे पूरे शरीर में पहले से ही काफी दर्द था और स्तनों को तो उसने जैसा मसला था, पूरे दिन उसकी बेदर्दी की गवाही दे रहे थे.. हर जगह दांतों के लाल निशान हो गए थे।

यही हाल मेरी जाँघों का था, उनमें भी अकड़न थी और कूल्हों में भी जबरदस्त दर्द था। मेरी योनि बुरी तरह से फूल गई थी और मुँह पूरा खुल गया था जैसे कोई खिला हुआ फूल हो।

अमर ने मुझे चूमते हुए मेरी योनि को हाथ लगा सहलाने की कोशिश की.. तो मैं दर्द से कसमसा गई और कराहते हुए कहा- प्लीज मत करो.. अब बहुत दर्द हो रहा है।

तब उसने भी कहा- हां.. मेरे लिंग में भी दर्द हो रहा है, क्या करें दिल मानता ही नहीं।

मैं उससे अलग हो कर बिस्तर पर लेट गई, तब अमर भी मेरे बगल में लेट गया और मेरे बदन पे हाथ फिराते हुए मुझसे बातें करने लगा।

उसने मुझसे कहा- मैंने अपने जीवन में इतना सम्भोग कभी नहीं किया और जितना मजा आज आया, पहले कभी नहीं आया।

फिर उसने मुझसे पूछा तो मैंने कहा- मजा तो बहुत आया.. पर मेरे जिस्म की हालत ऐसी है कि मैं ठीक से खड़ी भी नहीं हो सकती।

तभी मेरी योनि और नाभि के बीच के हिस्से में उसका लिंग चुभता हुआ महसूस हुआ.. मैंने देखा तो उसका लिंग फिर से कड़ा हो रहा था।

उसके लिंग के ऊपर की चमड़ी पूरी तरह से ऊपर चढ़ गई थी और सुपाड़ा खुल कर किसी सेब की तरह दिख रहा था। ऐसा लग रहा था जैसे सूज गया हो।

अमर ने मुझे अपनी बांहों में कसते हुए फिर से चूमना शुरू कर दिया, पर मैंने कहा- प्लीज अब और नहीं हो पाएगा मुझसे.. तुम जाओ।

 
मैंने कहा- मजा तो बहुत आया.. पर मेरे जिस्म की हालत ऐसी है कि मैं ठीक से खड़ी भी नहीं हो सकती।

तभी मेरी योनि और नाभि के बीच के हिस्से में उसका लिंग चुभता हुआ महसूस हुआ.. मैंने देखा तो उसका लिंग फिर से कड़ा हो रहा था।

उसके लिंग के ऊपर की चमड़ी पूरी तरह से ऊपर चढ़ गई थी और सुपाड़ा खुल कर किसी सेब की तरह दिख रहा था। ऐसा लग रहा था जैसे सूज गया हो।

अमर ने मुझे अपनी बांहों में कसते हुए फिर से चूमना शुरू कर दिया, पर मैंने कहा- प्लीज अब और नहीं हो पाएगा मुझसे.. तुम जाओ।

तब उसने कहा- थोड़ी देर मुझे खुद से अलग मत करो.. मुझे अच्छा लग रहा है।

इस तरह वो मुझे अपनी बांहों में और कसता गया और चूमता गया।

फिर उसने मेरी एक टांग जाँघों से पकड़ कर अपने ऊपर चढ़ा दिया और अपने लिंग को मेरी योनि में रगड़ने की कोशिश करने लगा।

मैं अपनी कमर को उससे दूर करने की कोशिश करने लगी, पर उसने मेरे गले में एक हाथ डाल कर मुझे अपनी और खींच कर होंठों को चूसना शुरू कर दिया और दूसरे हाथ से मेरे कूल्हों को पकड़ अपनी और खींचा।

इससे मेरी योनि उसके लिंग से रगड़ खाने लगी और अमर अपने कमर को नचा कर लिंग को मेरी योनि में रगड़ने लगा।

मेरी योनि में जैसे ही उसका मोटा सुपाड़ा लगा, मैं कराह उठी और झट से उसके लिंग को पकड़ कर दूर करने की कोशिश की, तब अमर ने कहा- आराम से… दुखता है।

मैंने कहा- जब इतना दर्द है.. तो बस भी करो और जाओ काम पर।

तब उसने कहा- बस एक बार और.. अभी तक मेरा दिल नहीं भरा।

मैंने कहा- नहीं.. मुझसे अब और नहीं होगा, मैं मर जाऊँगी।

देखते ही देखते अमर का लिंग और कड़ा हो गया और वो मेरे ऊपर चढ़ गया और मुझे पागलों की तरह चूमने लगा।

मुझमे इतनी ताकत नहीं थी कि मैं उसका साथ दे सकूँ और न ही मेरे जिस्म में हिम्मत थी कि उसका विरोध कर सकूँ।

मेरे साथ न देने को देखते हुए वो मुझसे अलग हो मेरे पैरों की तरफ घुटनों के बल खड़ा हो कर खुद ही अपने हाथ से अपने लिंग को हिलाने लगा और उसे तैयार करने लगा।

मैं बस उसे देखते हुए उससे बार-बार यही कह रही थी- अब बस भी करो..

मैंने अपनी जांघें आपस में सटा लीं पर मेरा ऐसा करना उसके मन को बदल न सका।

उसने मुझसे कहा- बस ये अंतिम बार है और अब मैं चला जाऊँगा।

वो मेरी टांगों को अलग करने की कोशिश करने लगा।

मैं अपनी बची-खुची सारी ताकत को उसे रोकने में लगा रही थी और विनती कर रही थी ‘छोड़ दे..’ पर ये सब व्यर्थ गया।

मैं उसके सामने कमजोर पड़ गई और उसने मेरी टांगों को फैलाया और फिर बीच में आकर मेरे ऊपर झुक गया।

मुझे ऐसा लगने लगा कि आज मेरी जान निकल जाएगी, मुझे खुद पर गुस्सा भी आने लगा कि आखिर मैंने इसे क्यों पहले नहीं रोका।

पहले दिन ही रोक लिया होता तो आज यह नौबत नहीं आती।

मेरी हालत रोने जैसी हो गई थी क्योंकि मुझे अंदाजा था कि क्या होने वाला है, सो अपनी ताकत से उसे धकेल रही थी, पर वो मुझसे ज्यादा ताकतवर था।

उसने एक हाथ में थूक लिया और मेरी योनि की छेद पर मल दिया और उसी हाथ से लिंग को पकड़ कर योनि की छेद पर रगड़ने लगा।

उसके छुअन से ही मुझे एहसास होने लगा कि मेरी अब क्या हालत होने वाली है।

तभी उसने लिंग को छेद में दबाया और सुपाड़ा मेरी योनि में चला गया।

मैं दर्द से कसमसाते हुए कराहने लगी और उसे धकेलने का प्रयास करने लगी, पर अमर ने मुझे कन्धों से पकड़ लिया और धीरे-धीरे अपनी कमर को मेरी योनि में दबाता चला गया।

इस तरह उसका लिंग मेरी योनि में घुसता चला गया.. मैं बस कराहती और तड़पती रही।

मैं विनती करने लगी- प्लीज मुझे छोड़ दो.. मैं मर जाऊँगी.. बहुत दर्द हो रहा है।

पर अमर ने मुझे चूमते हुए कहा- बस थोड़ी देर.. क्या मेरे लिए तुम इतना सा दर्द बर्दास्त नहीं कर सकती?

उसने धीरे-धीरे लिंग को अन्दर-बाहर करना शुरू कर दिया।

मेरे लिए यह पल बहुत ही असहनीय था, पर मेरे किसी भी तरह के शब्द काम नहीं आ रहे थे।

मैं समझ चुकी थी कि अमर अब नहीं रुकेगा पर फिर भी मैं बार-बार उससे कह रही थी- मुझे छोड़ दो.. मैं मर जाऊँगी।

अमर मेरी बातों से जैसे अनजान सा हो गया था और वो धक्के लगाते जा रहे थे और कुछ देर में उनके धक्के तेज़ होने लगे.. जो मेरे लिए किसी श्राप की तरह लगने लगे।

मेरा कराहना और तेज़ हो गया और अब मेरे मुँह से निकलने लगा- धीरे करो.. आराम से करो।

करीब 30 मिनट हो गए, पर अमर अभी तक धक्के लगा रहा था। मुझे लगा कि जल्दी से झड़ जाए तो मुझे राहत मिले।

मैंने कहा- क्या हुआ… जल्दी करो।

उसने कहा- कर रहा हूँ.. पर निकल नहीं रहा।

मैंने उससे कहा- जब नहीं हो रहा.. तो मैं हाथ से निकाल देती हूँ।

उसने कहा- नहीं, बस थोड़ी देर और..

मैंने कहा- तुम मेरी जान ले लोगे क्या.. मैं दर्द से मरी जा रही हूँ, प्लीज छोड़ दो…. मेरी फट जाएगी ऐसा लग रहा है।

मैंने उसे फिर से धकेलना शुरू कर दिया। यह देखते हुए उसे मेरे हाथों को अपने हाथों से पकड़ कर बिस्तर पर दोनों तरफ फैला कर दबा दिया और धक्के लगाने लगा।

उसके धक्के इतने तेज़ हो चुके थे कि मुझे लगा अब मैं नहीं बचूंगी और मेरे आँखों से आंसू आने लगे, पर अमर पर कोई असर नहीं हो रहा था।

उसके दिमाग में सिर्फ चरम-सुख था।

मुझे सच में लगने लगा कि मेरी योनि फट जाएगी, योनि की दीवारों से लिंग ज्यों-ज्यों रगड़ता मुझे ऐसा लगता जैसे छिल जाएगी और बच्चेदानी को तो ऐसा लग रहा था.. वो फट ही चुकी है।

मैं अपने पैरों को बिस्तर पर पटकने लगी, कभी घुटनों से मोड़ लेती तो कभी सीधे कर लेती।

इतनी बार अमर सम्भोग कर चुका था कि मैं जानती थी कि वो इतनी जल्दी वो नहीं झड़ सकता इसलिए मैं कोशिश कर रही थी कि वो मुझे छोड़ दे।

अमर भी धक्के लगाते हुए थक चुका था.. वो हाँफ रहा था, उसके माथे और सीने से पसीना टपक रहा था.. पर वो धक्के लगाने से पीछे नहीं हट रहा था क्योंकि वो भी जानता था कि मैं सहयोग नहीं करुँगी।

करीब 20 मिनट के बाद मुझे महसूस हुआ कि अब वो झड़ने को है.. मैंने खुद को तैयार कर लिया।

क्योंकि अब तक जो दर्द मैं सह रही थी वो कुछ भी नहीं था.. दर्द तो अब होने वाला था।

क्योंकि मर्द झड़ने के समय जो धक्के लगाते हैं वो पूरी ताकत से लगाते हैं।

तो मैंने एक टांग को मोड़ कर अमर की जाँघों के बीच घुसा दिया ताकि उसके झटके मुझे थोड़े कम लगें।

अमर पूरी तरह से मेरे ऊपर लेट गया और मेरे हाथों को छोड़ दिया मैंने अमर की कमर को पकड़ लिया ताकि उसके झटकों को रोक सकूं।

फिर उसने दोनों हाथ को नीचे ले जाकर मेरे चूतड़ों को कस कर पकड़ा और अपनी और खींचते हुए जोरों से धक्के देने लगा।

करीब 8-10 धक्कों में वो शांत हो गया।

मैं उसके धक्कों पर कराहती रही और मेरे आँसू निकल आए।

वो मेरे ऊपर कुछ देर यूँ ही पड़ा रहा फिर मेरे बगल में लेट सुस्ताने लगा।

उसके झड़ने से मुझे बहुत राहत मिली, पर मेरी हालत ऐसी हो गई थी कि मैं वैसे ही मुर्दों की तरह पड़ी रही।

मेरे हाथ-पाँव जहाँ के तहाँ ही थे और मैं दोबारा सो गई।

जब आँख खुली तो खुद को उसी अवस्था में पाया जैसे अमर ने मुझे छोड़ा था, मेरा एक हाथ मेरे पेट पर था दूसरा हाथ सर के बगल में, एक टांग सीधी और दूसरी वैसे ही मुड़ी थी जैसे मैंने उसके झटकों को रोकने के लिए रखा था।

मुझे ऐसा महसूस हो रहा था, जैसे मेरे बदन में जान ही नहीं बची.. मैं दर्द से कराहती हुई उठी तो अपनी योनि को हाथ लगा कर देखा, उसमें से वीर्य में सना खून मुझे दिखाई दिया।

मैं डर गई और एक तरफ हो कर देखा तो बिस्तर पर भी खून का दाग लगा था, वैसे तो पूरा बिस्तर गन्दा हो गया था, जहाँ-तहाँ वीर्य.. मेरी योनि का पानी और पसीने के दाग दिखाई दे रहे थे।

मैं झट से उसे धोने के लिए डाल देना चाहती थी, पर जैसे ही बिस्तर से उठी तो लड़खड़ाते हुए जमीन पर गिर गई। मेरी टांगों में इतनी ताकत नहीं बची थी कि मैं खड़ी हो सकूं।

मैंने अमर को फोन कर सब कुछ बताया तो वो छुट्टी ले कर आया और मुझे मदद की खुद को साफ़ करने में.. फिर मैंने चादर को धोने के लिए डाल दिया।

उस दिन मैं दिन भर सोई रही.. शाम को मेरा बेटा घर आया तब तक मेरी स्थिति कुछ सामान्य हुई।

फिर शाम को मैं अमर से फोन पर बात की।

मैंने उसे साफ़-साफ़ कड़े शब्दों में कह दिया- तुमने मेरी क्या हालत कर दी.. मेरी योनि फाड़ दी.. अब हम कभी दुबारा सम्भोग नहीं करेंगे।

उसने कहा- नहीं.. ऐसा नहीं है.. मुझे नहीं पता था कि खून निकल रहा है, मुझे भी दर्द हो रहा है और मैं चड्डी तक नहीं पहन पा रहा हूँ।

मैं उससे शाम को सिर्फ झगड़ती ही रही।

अगले कुछ दिनों तक मेरी योनि में दर्द रहा, साथ ही योनि के ऊपर और नाभि के नीचे का हिस्सा भी सूजा हुआ रहा, योनि 2 दिन तक खुली हुई दिखाई देती रही।

मैं अगले 2 हफ्ते तक सम्भोग के नाम से ही डरती रही।
 
मेरी पिछली कहानियों से तो आप पता ही चल गया कैसे मैंने सेक्स के नए नए अनुभवों को पाया।

पर पिछले सात महीनों में मैंने जो कुछ जाना और किया वो मेरी बाकी के अनुभवों से कहीं ज्यादा रोचक है क्योंकि यह मैंने स्वयं ही महसूस किया।

मैंने कभी सपने में भी नहीं सोचा था कि मैं ऐसा करूँगी या इतनी बदल भी जाऊँगी।

एक औरत जिसके आगे पीछे इतने पहरे होते हैं, वो इतना कुछ कैसे कर लेगी… यह भी शायद आप लोग यकीं न करो पर जो मैंने किया वो सच में रोचक था।

अब असल मुद्दे पे आती हूँ और आपको बताती हूँ ऐसा क्या किया मैंने जो इतनी उत्सुक हूँ खुद मैं आप सबको बताने के लिए!

दरअसल यहाँ झारखण्ड में बच्चों और परिवार के बीच फंसी सी थी, कभी वासना पर कहानियाँ पढ़ती तो कभी सेक्स वीडियो देखती समय बिताती, पर सही मायने में जीवन और सेक्स का मजा धीरे धीरे खत्म सा हो गया था।

दिल में कुछ अलग सी चाहत थी पर समझ नहीं आरहा था कि क्या है वो! कभी सम्भोग करने की तीव्र इच्छा भी होती तो अकेली थी और पति का होना, न होना बराबर ही है।

बस इसी बीच कभी कभार बंगलौर वाली सहेली तारा से बात करती थी और बड़े शहरों में क्या क्या हो रहा है, सुनती थी।

वो हमेशा मुझे बताती थी कि हर शनिवार और रविवार वो किस तरह की पार्टी और लोगों से मिलती जुलती और मजे करती थी।

पिछले साल होली से पहले की बात है, तारा और मैं एक दोपहर बातें कर रहें थे तभी उसने मुझे बताया कि वो आने वाले शनिवार को एक नए दोस्त से मिलने वाली है।

उसने बताया कि कैसे वो इन्टरनेट पे चाटिंग के जरिये उससे मिली और इस कदर दोनों खुल गए कि वो जर्मनी से मिलने भारत चला आया।

एक पल तो मुझे लगा कि वो बस लम्बी लम्बी डींग हाक रही है, पर जैसे ही शनिवार आया उसने मुझे उसके साथ एक फोटो भेजी।

अब तो शक करने का कोई सवाल ही नहीं था।

उस दिन की तस्वीर ने मुझे दिन भर बैचैन कर दिया। रात भर मैं बस सोचते हुए सोई कि मेरी सहेली तारा कैसे उस विदेशी के साथ होगी, क्या क्या कर रही होगी।

वैसे तो मैं उससे सुनती रहती थी कि वो हर शनिवार और रविवार कुछ अलग करती है। उसके बहुत सारे दोस्त हैं पर यह पहली बार हुआ कि लोग ऐसे भी मिलते हैं और उनकी बस एक इच्छा होती है सम्भोग और मजे करना अलग अलग तरीकों से।

मैं 3-4 दिन तक बस यही सोचती जब भी अकेली होती।

फिर एक दिन दोपहर को उसका फ़ोन आया, मैंने उत्सुकता भरे स्वर में उससे पूछना शुरू कर दिया- कैसा रहा, क्या हुआ, सारी बातें।

फिर उसने जो बताया वो सुन कर तो मैं चौंक गई पर दिल को थोड़ा धैर्य देते हुए उसकी बातें सुनने लगी।

वो शनिवार रात उस विदेशी के साथ तो थी ही थी पर अगले रविवार दो जोड़े ऑस्ट्रेलिया से आये और उनके साथ एक ही कमरे में सामूहिक सम्भोग किया।

मैं यह सुन कर अचंभित हुई पर जब उसने कहा कि उन सभी ने बारी बारी से एक दूसरे के साथ सम्भोग किया तो मैं और भी अचंभित हो गई। इसका मतलब था कि हर किसी ने तीन बार सम्भोग किया तीन अलग अलग मर्द और औरत के साथ।

उस दिन तो मैं बस बैचैन हो कर सोचती रही कि कैसे किसी अनजान के साथ इतना खुल कर सम्भोग कर सकता है कोई।

पर मेरे अन्दर अलग सी वासना जागने लगी थी।

बात सम्भोग की नहीं थी, जीवन में कुछ अलग करने की थी। तारा की बातों ने मुझे और भी उत्सुक कर दिया था।

अब मैं सेक्स वीडियो देखती तो थी पर हर वक़्त ‘कुछ अलग दिखे’ वो सोचती थी। मेरे अन्दर वासना की एक अलग भूख सी उमड़ने लगी थी कुछ अलग करने की, सम्भोग के अलावा कुछ और करने की।

मैं जब कभी अकेली होती तो अलग तरह के सेक्स वीडियो ढूंढने लगती। यहाँ तक कि जानवरों का सेक्स, गन्दी हरकतों वाली सेक्स जैसे गाली देना या पेशाब कर देना इत्यादि।

मैं ज्यादातर अपना समय या तो ब्लू फिल्में देख कर बिताती या कहानियाँ पढ़ कर्… जब अकेली होती।

पर सामूहिक, अदला बदली, लेस्बियन सेक्स, पेशाब करना, सौतेले माँ बेटे का सेक्स, चूत के अन्दर वीर्यपात… ये सब अच्छे लगने लगे थे और मेरे मन में भी ऐसा करने की कभी कभी इच्छा जगती।

पर धीरे धीरे इनसे मेरा मन उबने लगा था।

तभी एक दिन तारा से बात करते हुए एक एडल्ट साईट के बारे में पता चला मुझे जिसका नाम राजशर्मास्टॉरीज.कॉम है।

उसने मुझे बताया कि लोग वहाँ अपनी तरह के साथ चुनते हैं उनसे चाटिंग करते है, अपनी बातें एक दूसरे से कहते हैं और भी बहुत कुछ होता है।

उसने बताया कि जिस विदेशी से वो मिली और उसके बाकी के दोस्त भी सभी इसी साईट से मिले थे।

पहले तो मुझे बड़ी खुशी हुई कि चलो कुछ नया होगा जीवन में और मैंने रात को अपनी एक आईडी बना ली।

उस साईट पे जाते ही मैंने देखा कि करोड़ों लड़के लड़कियाँ, औरत मर्द हैं।

कुछ के तो ढेरो फोटो और वीडियो भी हैं।

फिर मेरे मन में ख्याल आया कि इतने लोगों में पता नहीं कौन अपनी जान पहचान का होगा और क्या पता मेरा भेद खुल जाए!

तो मैंने उसे बंद कर दिया।

पर फिर तारा ने मुझे बताया के अपना नाम, पता और फोटो मत डालो बस ऐसे ही चैट करो जो अच्छा लगे, कुछ मस्ती ऑनलाइन कर सकती हो।

मैंने वही किया जैसे ही मैंने अपनी आईडी खोली, देखा तो बहुत से मर्दों औरतों के मेसेजs थे।

कुछ अपनी उम्र के तो कुछ बड़े और ज्यादातर छोटे।

मैं उन्हें पढ़ने लगी, कुछ के मैंने उत्तर भी दिए जो मुझे मेरी तरह के लगे।

अब मैं हर रोज जब मौका मिलता, ऑनलाइन आती और ढेरों लोगों से बातें करती, कुछ अच्छे मिलते कुछ बुरे!

जो मुझे अच्छे लगते, उनसे मैं रोज बातें करने लगी। इनमें से कुछ ने अपनी फोटो मुझे भेजी। जिनमें से एक आर्मी रिटायर्ड देहरादून के एक आदमी से दोस्ती हो गई मेरी अच्छी, हम रोज बातें करने लगे, एक दूसरे के जीवन के बारे में, एक दूसरे की इच्छाओं के बारे में।

मुझे उनमें यह बात अच्छी लगी कि बाकी लोगो की तरह वो हमेशा सेक्स की बातें नहीं करते थे।

फिर उन्होंने तीन महीने के बाद मुझसे मेरी फोटो मांगी।

पता नहीं शुरू में तो मैंने मना किया पर रात होते होते खुद ही भेज दी।

मेरी फोटो देखते ही उन्होंने मुझे मेसेज किया- क्या यह सच में तुम हो?

मैंने जवाब दिया- हाँ।

उन्होंने कहा- तुम बहुत सुन्दर हो, लगती नहीं कि तुम 46 साल की हो?

मैंने कहा- तारीफ करने के लिए धन्यवाद पर मैं इतनी भी खूबसूरत नहीं हूँ।

उन्होंने कहा- चेहरे से लगता नहीं कि तुम्हारे तीन बच्चे हैं पर जिस्म से लगता है।

मैंने कहा- आप जिस्म देख कर पता लगा लेते हो कि किस औरत के कितने बच्चे हैं?

उन्होंने कहा- नहीं, तुमने बताया था कि तुम्हारे तीन बच्चे हैं तो ये फोटो देख कर यकीं हो ही जाता है कि तुम्हारे तीन बच्चे हैं।

बस इसी तरह बातें करते हुए पता नहीं चला कि कब चार बज गए रात के।

 
कुछ दिनों तक हम ऐसे ही बाते करते रहे। हम दोनों सेक्स के मामले में तो पहले ही खुल चुके थे और रात को ज्यादातर सेक्स की ही बातें करते थे।

फिर एक रात बातें करते हुए वो कुछ ही गर्म हो गए और कहने लगे- मैं तुमसे मिलना चाहता हूँ।

मैंने शुरू में सोचा कि हो सकता है जोश में भावुक होकर वो ऐसा कह रहे हों।

पर उन्होंने मुझे कहा- क्या तुम मुझे कैमरे पर देखना चाहोगी अभी?

मैंने पूछा- यह कैसे संभव है?

उन्होंने मुझे एक आईडी भेजी और कहा कि इसे अपने कंप्यूटर पे खोलो।

मैं शुरू में तो हिचकिचाई कि इतनी रात को कंप्यूटर की लाइट जली देख किसी को भी शक हो सकता है तो मैंने मना किया।

फिर थोड़ी देर बाद मैंने खुद ही कंप्यूटर खोल आईडी खोली और उनको बता दिया।

तुरंत बाद मेरे कंप्यूटर पर एक संदेश आया कि इसे खोलो!

मैंने खोला तो देख कर दंग रह गई।

एक 59 साल का आदमी कच्छे और बनियान में बैठा था।

मैंने उनको पहचान तो लिया था पर फोटो में वो जवान दिख रहे थे और यहाँ बूढ़े।

पहले तो मेरी शंका दूर की उन्होंने कि फोटो भी असली थी और ये भी…

और मैंने भी बात मान ली क्योंकि मुझे कौन सी उनसे शादी करनी थी।

हम फिर वही सेक्स की बातें करने लगे और फिर उन्होंने अपना बनियान और कच्चा निकल दिया।

मैं एकदम से चौंक गई कि ‘हे भगवान्… यह आदमी नंगा हो गया।

वो थोड़ा घुटनों के बल बेड पे उठे तो सामने उनका तनतनाया हुआ लंड था करीब सात इंच लम्बा और तीन इन्च मोटा।

लंड की स्थिति देख समझ में आ गया था कि वो बहुत उत्तेजित है, तभी उन्होंने अपने लंड को पकड़ा और ऊपर की चमड़ी को सरका के पीछे कर दी और उनका सुपाड़ा खुल के सामने आ गया।

इस स्तिथि में वो लंड बहुत ही आकर्षक लग रहा था।

यह नजारा देख पता नहीं मेरी चूत में नमी सी होने लगी थी।

तभी उन्होंने कहा- ‘जब से तुम्हारी फोटो देखी है, तब मैं तुम्हें चोदने के सपने देखता हूँ।

उनका जिस्म और उम्र देख कर तो लगता नहीं था कि वो सम्भोग ज्यादा देर कर सकते हैं पर फिर मुझे अपने फूफाजी की बात याद आई।

उस रात उन्होंने हाथ से हिला के मुझे अपना वीर्य भी दिखाया कितना गाढ़ा और सफ़ेद था।

उसे देख मैं भी उत्तेजित सी हो गई थी।

पर मैं सोने चली गई बस उस लंड को सोचते हुए क्योंकि रात काफी हो गई थी।

इसके बाद तो बाते होती रही और लगभग हर बार मुझे मिलने की बात कहते।

उनकी इन बातों से कभी कभी मेरे मन में भी ऐसे ख्याल आते पर यह सब संभव नहीं था, जानती थी सो ज्यादा धयान भी नहीं देती थी।

हम धीरे धीरे इतने घुलमिल गए कि हर 3-4 दिन में मैं उन्हें हस्तमैथुन करने में मदद करती और देखती उनको कंप्यूटर पे अपना रस निकलते हुए।

वो हमेशा तरह तरह की बातें करते मुझसे मुझे बताते कि किस तरह से वो कल्पना करते हैं मुझे चोदने और मैं भी कभी कभी उनकी कल्पनाओं में खो जाती।

फिर एक दिन वो कहने लगे कि हमें मिलना चाहिए और उनकी यह बात अब जिद सी बन गई।

पर मैं न तो अकेली कहीं जा सकती थी और न किसी से अकेली मिल सकती थी तो मेरे लिए मुमकिन नहीं था।

पर मुझे भी अपने अन्दर की वासना कमजोर बना देती पर किसी तरह मैं खुद को काबू करती थी।

तारा मुझसे हमेशा पूछती थी कि कोई मिला या नहीं? पर मैं उसे हमेशा कहती- हाँ, रोज कोई न कोई मिलता है, बातें कर के समय काट लेती हूँ।

पर उधर मेरा वो दोस्त मुझसे मिलने और सम्भोग के लिए इतना उत्सुक हो चुका था कि वो किसी भी हद तक जाने को तैयार था। मुझे वो रोज परेशान करने लगा तब मैंने यह बात तारा को बताई।

तारा ने मुझे पहले तो पूछा कि वो मुझे पसंद है या नहीं?

तो मैंने उसे हाँ कह दिया तब उसने कहा- अगर पसंद है तो मिल लो।

उसने कहा- अगर मिलना चाहती हो तो तय कर लो, बाकी तेरे घर से निकलने और मिलने का इन्तजाम मैं कर दूँगी।

अब ये सब बातें सुन कर तो मैं हैरान हो गई और दोनों से लगभग दो हफ़्ते बात नहीं की।

पर मेरे अन्दर की वासना से मैं ज्यादा दिन बच न सकी और एक दिन तारा से पूछ लिया कि क्या वो ऐसा कर सकती है कि हम मिल सकें और सब कुछ सुरक्षित तरीके से बिना किसी के शक कहीं मिल सकें?

उसने मुझे फिर समझाया कि अगर मैं तैयार हूँ तो वो मेरे लिए सारा इन्तजाम कर देगी। मुझे तो उस पर पूरा भरोसा था, मैंने उस दोस्त को सन्देश भेज दिया कि मैं मिलना चाहती हूँ।

उसी रात हमने फिर बातें की और उनसे कह दिया कि जब मुझे मौका मिलेगा, मैं उन्हें बुला लूँगी।

इधर तारा को सारी बात मैंने बता दी। उसने कहा कि अगले हफ्ते का दिन तय कर लो, मैं झारखण्ड आऊँगी और सब इंतज़ाम कर दूंगी।

मैंने अपने दोस्त को भी फ़ोन कर के अगले हफ्ते आने को कह दिया।

अगले हफ्ते बुधवार को तारा हमारे गाँव आ गई और शाम को मुझसे मिली। हमने तय किया कि अगले दिन हम शहर जायेंगे।

मेरे घर वाले तारा के साथ कहीं आने जाने से रोकते टोकते नहीं थे तो मुझे कोई चिंता नहीं थी, बस शाम को अँधेरा होने से पहले मुझे घर लौटना था।

अगले दिन हम सुबह 8 बजे घर से निकल गए और करीब नौ बजे शहर पहुँच गए। रास्ते भर मेरा दिल जोर जोर से धड़क रहा था यह सोच कर कि क्या होगा ऐसे किसी इंसान के साथ जिससे मैं पहले कभी मिली नहीं।

मुझे अभी तक नहीं पता था कि तारा ने क्या इंतज़ाम कर रखा है।

पहले तो वो मुझे एक होटल में ले गई, पर मुझे बहुत डर लगा, मैंने इन्कार कर दिया।

फिर उसने बताया कि वो इसी होटल में है और हम अलग कमरा लेंगे।

हम वह अन्दर गए और हमने कमरा ले लिया यह कहकर कि तबियत ख़राब है, थोड़ा फ्रेश होने के लिए कुछ देर के लिए चाहिए कमरा।

दो औरत 40 बरस के ऊपर, सोच उनको ज्यादा परेशानी नहीं हुई और हम कमरे में चले गए।

कमरे में जाते ही तारा ने मुझे कहा कि उसको फ़ोन कर बुला लो हमारे कमरे में!

मैंने थोड़ा हिचकते हुए फ़ोन किया और उन्हें हमारे कमरे में आने को कहा।

10 मिनट के बाद दरवाजा खटखटाने की आवाज आई, तारा ने दरवाजा खोला तो सामने एक लम्बा सा 60 साल का मर्द खड़ा था।

उसने अपनी पहचान बताई और तारा ने उसे अन्दर बुला लिया।

वो मुझे देख कर मुस्कुराया और मैं भी दिल के धड़कनों को काबू में करते हुए मुस्कुरा दी।

हम बेड पर बैठ कर बातें करने लगे, मैंने उस दोस्त को बस यही बताया था कि तारा मेरी सबसे अच्छी दोस्त है और उसको बस इतना बताया है कि वो मुझे प्यार करता है और मिलना चाहता था।

बाकी असल बात क्या है मेरे और तारा के बीच थी और उनके और मेरे बीच।

मैंने उनको देखा.. वो चेहरे से कुछ ज्यादा उम्रदराज नहीं लग रहे थे। उनका बदन भी इतना सुडौल था कि कोई भी एक नजर में कह सकता था कि ये फ़ौज के बड़े अफसर होंगे।

मैंने गौर किया कि उनके चेहरे और आँखों में एक रौनक थी.. ऐसा जैसा कि वो मुझे देख कर कितने खुश हैं।

हम तीनों आपस में बात करने लगे.. पहले तो कुछ देर जान-पहचान हुई।

फिर तारा ने ज्यादा समय नहीं लिया और उनसे उनके कमरे की चाभी मांग कर हमें बोली- आप लोग आपस में बातें करो.. मैं कवाब में हड्डी नहीं बनना चाहती।

वो मुस्कुराते हुए वहाँ से चली गई।

मैं थोड़ी शरमाई सी थी.. पर घबराहट ज्यादा थी.. क्योंकि मैं उनसे पहली बार मिल रही थी और सब कुछ करने की हामी भी भर दी थी।

उन्होंने बातचीत शुरू की.. मैंने भी उनके सवालों के जवाब देने शुरू किए। पहले तो हम अपने घर-परिवार और बच्चों की बातें करने लगे।

फिर धीरे-धीरे एक-दूसरे के बारे में और फिर पसंद-नापसंद और फिर पता ही नहीं चला.. कि कब हम ऐसे घुल-मिल गए.. जैसे हम पहली बार नहीं मिल रहे हों।

अजीब सा जादू था उनके बात करने के अंदाज में..

हमें बातें करते हुए एक घंटा हो चुका था और मेरे दिमाग और दिल से अब अनजानेपन की बात भी निकल चुकी थी।

फिर मैंने उनसे कहा- मैं बाथरूम होकर आती हूँ।

मैं बाथरूम गई और पेशाब कर वापस आकर उनके बगल में दुबारा बैठ गई।

मेरे आने के कुछ देर बाद उन्हें भी पेशाब करने की सूझी.. तो वो भी कर आए और आकर मेरे बिल्कुल करीब बैठ गए।

मुझे उनका हल्का सा स्पर्श हुआ और मेरा दिल जोर से ‘धक्क’ किया..। नाभि के पास एक अजीब सी गुदगुदाहट शुरू हुई और ऐसा लगा जैसे मेरी चूत में जाकर खत्म हो गई।

उन्होंने फिर मुझसे कहा- कितने समय रुकोगी यहाँ?

ये कहते हुए उन्होंने मेरा हाथ पकड़ लिया।

 
मैं घबरा सी गई और पता नहीं मेरे मुँह से ऐसा क्यों निकल गया कि जल्दी कर लो.. मुझे शाम तक जाना है।

इतना सुनने की देर थी कि उन्होंने मुझे अपनी बाँहों में भर लिया और मेरे चेहरे को एक हाथ से ऊपर उठा के बोला- मुझे लगता है.. जैसे मुझे तुमसे प्यार हो गया और तुम्हें पा लेना चाहता हूँ।

उन्होंने बड़े प्यार से मेरे होंठों को चूम लिया।

उनके होंठों का अपने होंठों पर स्पर्श मिलते ही मैंने उन्हें कस कर पकड़ लिया और मेरी आँखें बंद हो गईं।

उन्होंने अपने होंठ मेरे होंठों से अलग किए.. तो मेरी आँखें खुल गईं और उनसे नजरें मिल गईं.. मुझे उनकी आहों में आग सी दिखाई दी।

मैं झटके से उनके सीने में अपना चेहरा छिपाते हुए उन्हें और जोर से पकड़ते हुए चिपक गई।

हम बिस्तर पर ही बैठे एक-दूसरे से चिपके हुए थे।

जब उन्होंने देखा कि मैं उनसे अलग नहीं हो रही हैं.. तो उन्होंने अपना एक हाथ मेरी जाँघों को पकड़ते हुए मुझे बिस्तर पर घसीटते हुए बीचों-बीच ले आए और फिर उसी हालत में मुझे लिटा दिया।

मैं उन्हें अभी भी पकड़े हुए थी। उन्होंने करवट ली.. मैं पीठ के बल हो गई और वो मेरे ऊपर हो गए।

उन्होंने मेरी तारीफ़ करते हुए कहा- तुम सच में सुन्दरता की मूरत हो।

बस ये कहते ही उन्होंने मेरे होंठों पर अपने होंठ रख दिए और मुझे चूमने लगे।

कुछ समय के बाद उन्होंने मेरे पूरे चेहरे और गर्दन में चुम्बनों की बरसात सी शुरू कर दी और मेरे मुँह से बस लम्बी-लम्बी साँसों की आवाजें निकल रही थीं।

मेरे बदन में कंपकंपी सी शुरू होने लगी थी। मैं भी थोड़ी उत्तेज्जित हो रही थी।

उन्होंने मेरे होंठों को चूसना शुरू कर दिया.. साथ ही अपने हाथों से मेरी साड़ी ऊपर उठाने की कोशिश भी और मेरी नंगी जाँघों पर हाथों को फेरने भी लगे थे।

उनकी जुबान बाहर आ गई और मुझे ऐसा लगा कि जैसे वो अपनी जुबान से मेरे मुँह के अन्दर कुछ ढूँढ़ रहे हों.. मैंने भी अपनी जुबान निकाल दी।

फिर क्या था.. वो मेरी जुबान से अपनी जुबान लड़ाने और चूसने लगे और मैंने भी उनका साथ देना शुरू कर दिया।

हम करीब 10 मिनट ऐसे ही एक-दूसरे को प्यार करते रहे। फिर वो मेरे ऊपर से हटे और मेरी साड़ी को उतारने लगे। मैं भी जानती थी कि वे ये सब क्या कर रहे हैं.. सो मैंने कोई विरोध न करके.. उन्हें सहयोग देने लगी।

मैं अब पेटीकोट और ब्लाउज में आ चुकी थी.. उन्होंने एक झलक मुझे ऊपर से नीचे घूर के देखा और मेरी भरे हुए स्तनों को दोनों हाथों से दबाते हुए मेरे ऊपर झुक कर मुझे फिर से चूमने और चूसने लगे।

अब मैं भी खुल चुकी थी और गर्म होने लगी थी.. सो मैं उन्हें बार-बार जोर से पकड़ती.. छोड़ती और उन्हें पूरा सहयोग देने लगी।

थोड़ी देर यूँ ही मुझे ऊपर से नीचे तक चूमने के बाद वो मुझे अलग होकर अपने कपड़े उतारने लगे।

उन्होंने पूरे कपड़े उतार दिए बस चड्डी को रहने दिया।

उनका बदन तो कुछ खास आकर्षक नहीं था.. क्योंकि वो काफी उम्रदराज थे।

फिर मेरे ब्लाउज के हुक खोलने लगे और ब्लाउज भी निकाल दिया। अब मैं सिर्फ ब्रा में थी और मेरा पेटीकोट भी जाँघों से ऊपर था। इस हालत में देख मुझे उनमें वासना की एक आग सी दिखी।

वो भूखे शेर की तरह मेरे ऊपर टूट पड़े और जहाँ-तहाँ मुझे चूमने लगे। उनके चुम्बनों की बारिश से मैं तड़प गई और मैंने फिर से उन्हें कस के पकड़ लिया।

उन्होंने चूमते हुए अपना हाथ मेरी पीठ पर ले जाकर मेरी ब्रा के हुक खोल दिए और झट से उसे निकाल दिया.. और थोड़ा उठ कर मेरे नग्न स्तनों को ललचाई निगाहों से घूरने लगे।

ऐसा लग रहा था जैसे मेरे भरे-भरे मांसल स्तनों जैसी कोई चीज़ पहले उन्होंने कभी देखी ही नहीं थी।

फिर अचानक से एक झटके में उन्होंने मेरे एक स्तन को हाथ से पकड़ा और उसे मसलते हुए अपना मुँह मेरे दूसरे स्तन पर लगा कर चूचुक को ऐसे चूसने लगे.. जैसे कोई बच्चा दूध पीता है।

मैं सहमी सी उनके इस तरह के व्यवहार को अपने अन्दर महसूस करते हुए मजे लेने लगी। कभी मेरे चूचुक को वो होंठों से भींच कर खींचते तो कभी दांतों से कुतरते।

इसी तरह उन्होंने मेरे दूसरे स्तन को पीना शुरू कर दिया और पहले वाले स्तन को हाथों से दबाने और सहलाने लगे।

मेरी चूत उनकी इन हरकतों से गीली होनी शुरू हो चुकी थी.. पर मैं कोई खुद से कदम उठा नहीं रही थी.. बस उनका साथ दे रही थी।

उन्होंने जी भर के मेरा स्तनपान करने के बाद मेरे पेट को चूमते हुए नीचे मेरी चूत के ऊपर अपना मुख रख दिया और ऊपर से रगड़ते हुए पेटीकोट का नाड़ा खोल कर पेटीकोट को नीचे सरका दिया।

अब मैं सिर्फ पैन्टी में थी और उन्होंने एक बार अपना सर ऊपर उठा कर मेरी पैन्टी की ओर देखा.. शायद उन्हें मेरी मॉडर्न तरह की पैन्टी देख कर ये अचम्भा सा लगा होगा।

क्योंकि मैं अमर की दी हुई पैन्टी के बाद ऐसी ही पैन्टी पहनने लगी थी पतली स्ट्रिंग वाली।

उन्होंने तुरंत फिर मेरी पैन्टी के ऊपर से चूत.. जो फूली हुई दिख रही थी उस पर हाथ फेरते हुए होंठों से चूम लिया और सहलाते हुए मेरी पैन्टी को किनारे सरका कर मेरी चूत खोल दी और उसे चूम लिया।

मैं एकदम से सिहर गई और ऐसा लगा.. जैसे पेशाब की पतली सी तेज़ धार निकल गई हो.. पर ऐसा कुछ हुआ नहीं था.. बस वो मेरे जिस्म की एक सनसनाहट थी।

मैंने उनके सर को छोड़ कर खुद अपनी पैन्टी को पकड़ा.. तो उन्होंने मेरे हाथों को पकड़ते हुए मेरी पैन्टी को खींचते हुए मेरी पैन्टी निकाल कर मुझे पूर्ण रूप से नंगा कर दिया।

अब तो मेरे शरीर पर एक धागा भी नहीं था। मेरा पूरा नंगा जिस्म उनके सामने दिन के उजाले में था.. क्योंकि कमरे में बल्ब बुझाने के बाद भी दो तरफ से सूरज की रोशनी आ रही थी।

कमरे का नज़ारा भी बहुत सुन्दर था। कमरा बड़ा नहीं था.. पर साफ़ और सही था.. परदे खुले थे.. पर इस तरह से था कि खिड़कियाँ खुली होने के बाद भी कोई अन्दर देख नहीं सकता था।

अब उन्होंने अपनी जगह बदली और मेरे करीब आकर घुटनों के बल बैठ गए। फिर मेरी टाँगों को फैलाते हुए हुए मेरी और मुस्कुराते हुए देखा। मैंने भी शरमाते हुए उन्हें देख कर अपनी निगाहें छुपा लीं।

उन्होंने मेरी चूत के बालों पर हाथ फेरते हुए बालों को मेरी चूत के छेद से अलग किया और झुक कर अपना मुँह मेरी चूत के पास रख दिया।

मैं समझ गई कि वो मेरी चूत को चाटने वाले हैं, मेरी जाँघों की नसें सिकुड़ने लगीं.. चूत भी फड़फड़ाने लगी।

तभी उन्होंने कहा- क्या तुम बुर को साफ़ नहीं करतीं?

मैं सहमते हुए बोली- रोज तो धोती हूँ.. यहाँ तक कि पेशाब करने के बाद भी पानी से धोती हूँ।

इस पर वो मुस्कुराए.. उनके कहने का मतलब बाल सफाई से था.. पर मैं कुछ और समझ गई।

पर जो भी हो.. उन्होंने मुस्कुराते हुए मेरी चूत के दोनों होंठों को दोनों हाथों की उंगलियों से फैला कर छेद को चूम लिया.. ऐसा लगा जैसे एक बिजली का झटका मेरी चूत से होता हुआ मेरे दिमाग में चला गया।

फिर क्या था.. मेरी चूत के छेद पर उन्होंने अपनी जुबान फिराई और चाटने की प्रक्रिया शुरू कर दी।

कुछ मिनटों के बाद मेरी चूत के छेद को उंगलियों से और फैला कर उसमें अपना थूक डाल दिया और फिर चाटने लगे। ऐसा लगा.. मानो मेरी चूत को पूर्ण रूप से गीला और चिपचिपा कर देना चाहते हों।

मेरी चूत तो शुरू से ही गीली थी.. पर मैं पता नहीं क्यों उनके अंदाज को मस्ती से ले रही थी।

काफी देर उनके चाटने और चूसने से मुझे अहसास होने लगा जैसे अब मैं झड़ जाऊँगी और हुआ भी यही।

इससे पहले कि मैं खुद को काबू कर पाती.. मैं अपनी एड़ियों को बिस्तर पर दबाती और जाँघों को उनके सर पर भींचने लगी। मैं इस वक्त लम्बी सांस खींचती.. होंठों को दबाती.. सिसकारी लेते हुए उनके बालों को कस के खींचते हुए अपनी व्याकुलता दिखा रही थी, तभी मैं अपनी कमर उनके मुँह में उठाते हुए.. हल्की पतली सी पानी की धार छोड़ते हुए झड़ गई।

अब मैं लम्बी-लम्बी साँसें लेते हुए अपनी कमर दोबारा बिस्तर पर रख कर उनके मुँह को अपनी चूत से अलग करने का प्रयास करने लगी।

कुछ पलों के बाद उन्होंने मेरी चूत से अपना मुँह अलग किया और चूत से लेकर नाभि.. पेट को चूमते हुए मेरे स्तनों को पकड़ चूसने लगे।

मेरा हाथ भी अब नीचे उनकी चड्डी के पास चला गया और ऊपर से ही उनके लंड को मैं सहलाने लगी।

वो मेरे स्तनों को बारी-बारी से दोनों हाथों से जोर-जोर मसलने और चूसने लगे। मैं हल्के हल्के स्वर में कराहती हुई उनके लंड को चड्डी के ऊपर से मसलने में मग्न हो गई।

कुछ देर बाद मैंने उनकी चड्डी को सरकाना शुरू कर दिया और जाँघों तक सरका कर लंड बाहर निकाल कर हाथों से पकड़ा.. तो ऐसा लगा मानो ये आज मेरी जान ले लेगा।

जैसा मैंने कंप्यूटर पर देखा था.. वैसा ही मोटा और तगड़ा लग रहा था.. मानो कोई 40 साल का मर्द का लंड हो.. एकदम तना हुआ मोटा और गर्म..

मैं हाथों से उसे हिलाने लगी.. तो लंड का सुपाड़ा खुल कर बाहर आ गया।

तभी उन्होंने एक हाथ मेरे बाएं स्तन से हटाया और मेरे कूल्हे पर ले जाकर रख दिया और जोर से मसलते हुए करवट ली, हम दोनों अब एक-दूसरे के आमने-सामने थे।

वो मेरे चूतड़ों को सहलाते और दबाते हुए अब मेरे होंठों का रसपान करने लगे। मैं भी उनकी जुबान से जुबान और होंठों से होंठों को लड़ाते हुए हुए चूमने और चूसने लगी।

ऊपर हम मुँह से मुँह लगा एक-दूसरे को चूमने-चूसने और चाटने में व्यस्त थे.. नीचे हमारे हाथ एक-दूसरे के जननागों को मसल रहे थे। वो बहुत उत्तेजित हो गए थे और उन्होंने मेरी दाईं टांग उठा कर अपनी टाँगों के ऊपर रख ली। अब वे मेरे चूतड़ों को मसलते.. तो कभी मेरी मोटी जाँघों को सहलाते.. तो कभी अपने लंड को मेरे हाथों से पकड़ने के बाद भी मेरी चूत के ऊपर दबाते।

काफी देर बाद उन्होंने मुझे चूमना बंद करके मेरे सर को पकड़ कर नीचे किया और झुकते हुए खुद ऊपर उठने लगे।

मैं समझ गई कि लंड को चूसने का इशारा था।

 
मैंने नीचे की तरफ सरकते हुए उनकी चड्डी को निकाल कर उन्हें नंगा कर दिया। वो पीठ के बल लेट गए.. मैं उठ कर बैठ गई और लंड को हाथ से पकड़ ऊपर-नीचे किया.. तो उनका सुपारा खुल और बंद होने लगा।

तभी उन्होंने मेरे सर को पकड़ा और मैं झुक कर उनके सुपारे को बाहर करके ऊपर अपनी जुबान फिरा कर उसे थूक से गीला कर दिया, फिर अपना मुँह खोल धीरे-धीरे लंड को मुँह में समा लिया।

मेरे ऐसा करते ही वो सिसकारी लेने लगे और मेरे सर को पकड़ सहलाने लगे। मैंने करीब 3-4 मिनट चूसा और लंड थूक से पूरा भीग गया।

तभी उन्होंने मुझे खींच कर अपने ऊपर लिटा लिया और फिर से हमारे होंठ एक-दूसरे के होंठों से खेलने लगे।

मैंने उनके सर को दोनों हाथों से पकड़ लिया और चूमने लगी। उन्होंने अपने दोनों हाथों को मेरे पीछे ले जाकर मेरे पीठ को सहलाते हुए चूतड़ों को मसलते हुए जाँघों को फैला दिया।

अब मैं उनके ऊपर दोनों टाँगें फैला कर लेट गई। मैं उन्हें लगातार चूम रही थी। वो नीचे से अपनी कमर उठा कर लंड को मेरी चूत में ऊपर से रगड़ रहे थे और मैं ऊपर से जोर लगा चूत को लंड पर रगड़वा रही थी।

कुछ देर के बाद इसी अवस्था में चूमते हुए हम उठे और उन्होंने मेरे कूल्हों को पकड़ते हुए मुझे बिस्तर पर लिटा दिया और मेरे ऊपर आ गए।

मुझे उनके लंड का स्पर्श चूत पर बहुत सुखद लग रहा था। वो घुटनों के बल मेरी टाँगों के बीच बैठ गए। फिर लंड को हाथ से पकड़ कर मेरी चूत की दरार के बीच ऊपर-नीचे सुपाड़े को रगड़ा।

फिर चूत के छेद पर लंड को टिका कर मेरे ऊपर झुकते हुए मेरे एक चूचुक को होंठों में दबाते हुए लंड को चूत में घुसाने की कोशिश करने लगे।

मैंने भी उनके सर को जोर से पकड़ा और नीचे से कमर उठाने लगी। मुझे महसूस होने लगा कि लंड धीरे-धीरे मेरी चूत में घुस रहा और फिर मेरी साँसों के साथ मेरी सिसकियाँ घुलने लगीं।

लंड लगभग आधा घुस चुका था.. तब उन्होंने अपना हाथ लंड से हटा लिया और मेरे कूल्हों पर ले जाकर पकड़ लिया और ऊपर उठाने लगे।

कुछ ही पलों के जोर और ताकत के कारण उनका मोटा लंड मेरी चूत में समा गया और दोनों की सिसकी साथ-साथ निकलने लगी।

कुछ देर हम यूँ ही लंड और चूत को अपनी-अपनी कमर हिला-डुला कर सही स्थिति में ले आए।

फिर उन्होंने अपने दोनों हाथों से मेरे कंधों को नीचे से पकड़ लिया और मैंने उनको गले से जकड़ लिया और हम दोनों होंठों को होंठों से मिला कर चूमने लगे। धीरे-धीरे हम दोनों के नीचे के अंग भी हिलने लगे।

मैंने अपनी टाँगों को उठा कर उनकी जाँघों के ऊपर रख दिया और अब वो मुझे चूमते हुए अपने लंड को मेरी चूत के अन्दर धकेलने लगे।

मुझे बहुत मज़ा आने लगा था और उनको भी..

तभी तो कुछ पलों के बाद उनकी गति तेज़ होने लगी और एक मर्दाना ताकत का एहसास मुझे होने लगा। करीब 7-8 मिनट होते-होते झटकों में काफी तेज़ी के साथ-साथ जोर भी आने लगा और मेरी सिसकारियों में भी तेजी आ गई, उनके हर झटके पर मैं कुहक सी जाती और ऐसा लगता ही नहीं कि ये इतनी उम्र के मर्द हैं।

काफी देर के बाद उनके झटके रुक-रुक के और धीमी हो कर लगने लगे.. पर हर झटके पर मुझे मेरी बच्चेदानी में चोट का असर दिखता.. जिससे मुझे और भी मजा आता और मैं कभी-कभी उनको कस कर पकड़ कर जाँघों से उन्हें भींचती और कराहते हुए अपनी कमर ऊपर उठा देती और चूत को लंड पर दबाने लगती।

हम दोनों वासना के सागर में डूब चुके थे और मस्ती में खो गए थे।

करीब 15 मिनट हम इसी तरह एक-दूसरे की नजरों से नज़रें मिलाए हुए सम्भोग करते रहे पर अब मुझे महसूस होने लगा था कि वो थक चुके हैं, उनके धक्कों में ढीलापन आ गया था।

वो पसीने-पसीने हो गए थे और साँसें भी लम्बी-लम्बी ले रहे थे, इधर मेरे जिस्म की आग इतनी तेज़ हो गई थी कि मुझे बस तेज़ धक्कों की इच्छा हो रही थी।

मैंने जोर देकर उन्हें इशारा किया.. पर वो मेरे ऊपर से उठ गए और बगल में लेट गए।

मैंने उनसे पूछा- क्या हो गया आपका?

तब वो बोले- नहीं, अब तुम ऊपर आ जाओ और चुदो..

मैंने देखा उनका लंड भीग कर चमक रहा था और बार-बार तनतना रहा था। इधर जब मैंने अपनी चूत की तरफ देखा तो चूत के किनारों पर सफ़ेद झाग सा था और चूत के बालों पर हम दोनों का पसीना और पानी लग कर चिपचिपा सा हो गया था।

मैंने तुरंत बगल में पड़े तौलिये से अपनी चूत को साफ़ किया और उनके ऊपर अपनी टाँगें फैला कर बैठ गई।

मैंने एक हाथ से चूत को फ़ैलाने की कोशिश की.. और दूसरे हाथ से लंड को पकड़ सीधा कर चूत के छेद पर रास्ता दिखाते हुए कमर नीचे दबाने लगी।

मेरी चूत भीतर से इतनी गीली हो चुकी थी कि बस लंड को छेद पर टिकाने की देरी थी। मैंने जैसे ही अपनी कमर उनके ऊपर दबाई.. लंड सटाक से मेरी चूत की दीवारों को चीरता हुआ अन्दर समा गया।

मैंने अपने घुटनों को बिस्तर पर सहारा दिया और अपनी कमर का पूरा वजन उनके लंड पर रख उनके ऊपर झुक कर.. अपने स्तनों को उनके मुँह में दे दिया।

वो मेरे स्तनों को चूसने-काटने लगे और मैं मछली की तरह मचलती हुई कमर हिला कर लंड को अपने अन्दर-बाहर करने लगी।

मैं तेज़ी से धक्के दे रही थी और सिसकार भी रही ही..

उधर वो एक हाथ से मेरे स्तन को मसल-मसल कर पी रहे थे और दूसरे हाथ से मेरे चूतड़ों को दबाते और सहलाते हुए सम्भोग का मजा ले रहे थे।

जब-जब मैं धक्के लगाती.. मुझे मेरी चूत के भीतर उनके सुपारे के खुलने और बंद होने का सा महसूस हो रहा था।

मैं करीब दस मिनट तक धक्के लगाती रही और मुझे भी थकान सी होने लगी थी, मेरे धक्कों की गति धीमी होने लगी थी और जाँघों में अकड़न सी महसूस होने लगी थी.. पर मन में बस चरम सुख ही था.. तो मैं धीरे-धीरे धक्के लगाती रही..

पर बीच-बीच में उनके झटके मुझे नीचे से भी मिलते.. जो इतने तेज़ होते कि मेरे मुँह से सिसकारी के साथ निकलता- प्लीज धीरे..

वो झटके मेरी बच्चेदानी में लंड की मार होते थे।

मैं थकने के साथ-साथ झड़ने के करीब ही थी.. पर उनकी स्थिति देख कर लग रहा था.. जैसे अभी उन्हें काफी समय लगेगा।

उन्होंने मुझे उठने का इशारा किया, मैं उठ कर बिस्तर पर बैठ गई।

फिर वो भी उठ कर बैठ गए और मुझे घुटनों के बल आगे की तरफ झुका दिया, मैं अपने हाथों और घुटनों के बल झुक गई.. जैसे कुतिया होती है।

वो मेरे पीछे गए और मेरे बड़े-बड़े मांसल चूतड़ों को हाथों से सहलाने और दाबते हुए चूमने लगे, बोले- कितने मस्त चूतड़ हैं तुम्हारे..

फिर घुटनों के बल खड़े होकर उन्होंने मेरी चूत में लंड घुसा दिया।

मैं तो उनकी तारीफ़ सुनी-अनसुनी करती.. बस लंड को अपनी चूत में चाहती थी.. सो बस अपनी गाण्ड हिलाते हुए मजे लेने लगी।

कुछ ही देर में वो इतनी तेज़ी और जोरों से धक्के मारने लगे कि मुझे लगा कि अब तो मैं गई ‘आह्ह्ह्ह ऊउईइ ओह्ह्ह्ह’ करती हुई मैं बिस्तर पर गिरने लगी।

मेरी चूत की नसें सिकुड़ने लगी थीं मेरे हाथों और टाँगों की मांसपेशियां अकड़ने लगी थीं..

तभी उन्होंने सामने रखे दोनों तकियों को मेरी चूत के नीचे रख दिया और मैं पूरी तरह से बिस्तर पर लेट गई, मेरे साथ-साथ मेरे ऊपर अपने लंड को मेरी चूत में दबाते हुए वो भी मुझ पर गिर गए थे।

मेरी साँसें तेज़ हो गई थीं.. मेरे मुख से मादक आवाजें निकल रही थीं और उनके झटकों के थपेड़े मेरे कूल्हों पर पड़ रहे थे।

मैंने अपनी चूत को भींचना शुरू कर दिया था.. मुझे लगने लगा था कि रस का फव्वारा मेरी नाभि से छूट रहा है.. जो चूत के रास्ते निकलने वाला है।

मैंने बिस्तर के चादर को जोर से पकड़ लिया.. अपनी गाण्ड को जोरों से हिलाने लगी… चूत को भींचते हुए झड़ने लगी और मेरे मुँह से निकलने लगा- प्लीज रुको मत.. चोदते रहो प्लीज.. और तेज़ और तेज़.. अह्ह्ह ईह्ह्ह्ह ओह्ह्ह.. हायय और तेज़ और तेज़..।

 
मेरी ऐसी हालत देख वो और तेज़ी से धक्के मारने लगे।

मैं उनके हर वार को अपनी चूत में महसूस करने लगी और मुझे सच में बहुत मजा आने लगा था।

फिर तभी मेरी चूत जैसे सख्त हो गई और चूत से पेशाब की धार निकलेगी… ऐसा लगा। मैंने अपनी गाण्ड उठा दी.. साँसें मेरी रुक सी गईं.. मैंने चूत को सिकोड़ दिया और पानी छोड़ते हुए झड़ गई।

इधर मैं अपनी साँसों को काबू करने में लगी थी.. उधर वो मुझे धक्के पर धक्के दे कर संभोग किए जा रहे थे।

मैं अपने जिस्म को ढीला करने लगी थी.. पर वो अभी भी धक्के लगा रहे थे और मेरे मुँह से कराहने की आवाजें कम नहीं हो रही थीं।

करीब 4-5 मिनट धक्के लगाने के बाद उनका लंड मेरी चूत में पहले से भी ज्यादा सख्त और गरम लगने लगा।

मैं समझ गई कि अब वो झड़ने वाले हैं पर मैं नहीं चाहती थी कि उनका रस मेरी चूत में गिरे.. तो मैंने तुरंत उन्हें हटाने की कोशिश की.. पर उन्होंने एक हाथ से मेरा सर जोर से बिस्तर पर दबा दिया और एक हाथ से कंधे को रोक सा दिया।

मैं ‘नहीं नहीं’ करती ही रही कि उनके जोरदार 8-10 धक्कों के साथ पिचकारी की तेज़ धार मेरी चूत के भीतर महसूस हुई।

वो झड़ते हुए और हाँफते हुए मेरी पीठ के ऊपर निढाल हो गए।

मैं समझ गई कि मेरी कोशिश बेकार गई.. और उन्होंने अपना बीज मेरे भीतर बो दिया.. सो अब कोई फ़ायदा नहीं..

उनकी आँखें बंद थीं और धीरे-धीरे उनका लंड मेरी चूत के भीतर सिकुड़ कर अपनी सामान्य स्थिति में आ गया।

हम दोनों कुछ देर यूँ ही पड़े रहे.. फिर मैंने उन्हें अपने ऊपर से हटने को कहा।

वो जैसे ही हटे.. मैंने देखा तकिया पूरी तरह से भीग गया था। उनका सफ़ेद और गाढ़ा रस मेरी चूत से बह कर बाहर आने लगा..

मैं जमीन पर खड़ी हुई और तुरंत बाथरूम गई। वहाँ से खुद को साफ़ करके वापस आई.. तो देखा कि दो बज चुके हैं। हमें अपनी काम-क्रीड़ा में इसका पता ही नहीं चला।

वो अभी भी नंगे बिस्तर पर सुस्ता रहे थे, मैंने कहा- मुझे जाना होगा..

और मैं अपने कपड़े समेटने लगी।

मैं जैसे ही अपनी पैन्टी लेने बिस्तर के करीब गई.. उन्होंने मुझे फिर से पकड़ लिया और बिस्तर पर खींचने लगे।

अब मैं विनती करने लगी- बहुत देर हो जाएगी सो मुझे छोड़ दें..

पर उन्होंने अपनी ताकत लगाते हुए मुझे अपने करीब लेकर मुझे सीने से चिपका लिया और बिस्तर से उठ खड़े हो गए।

उन्होंने मुझे अपनी बांहों में भींचते हुए कहा- इतनी भी जल्दी क्या है.. अभी मेरा दिल भरा नहीं है!

मैंने विनती करनी शुरू कर दी- अगर देर हुई तो मेरे घर में बच्चे और परिवार वाले शक करेंगे..

पर वो मेरी बात जैसे सुनने को तैयार ही नहीं थे, वे मुझे चूमते हुए धकेलने लगे और मैं बाथरूम के दरवाजे के पास दीवार से टकरा गई।

मैं बार-बार ‘नहीं.. नहीं..’ कर रही थी.. पर उन्होंने मुझे इतनी जोर से पकड़ रखा था कि मैं पूरी ताकत लगा कर भी अलग नहीं हो पा रही थी।

मेरे बार-बार कहने को सुन कर उन्होंने अपना मुँह मेरे मुँह से लगा दिया और मेरा मुँह बंद कर दिया। उन्होंने अब अपने हाथ मेरे पीठ से हटा के चूतड़ों पर रख दिए।

अब मेरे चूतड़ों को जोर से दबाते हुए ऐसा करने लगे.. जैसे उन्हें फैलाना चाहते हों।

मैंने अपनी टाँगें आपस में चिपका रखी थीं और मेरा पूरा बदन टाइट हो गया था। वो अब मुझे चूमते हुए अपनी जुबान मेरे मुँह में घुसाने का प्रयास करने लगे.. पर मैंने अपने दोनों होंठों को पूरी ताकत से बंद कर रखा था।

उनके काफी प्रयास के बाद भी जब मैंने अपना मुँह नहीं खोला.. तो उन्होंने मेरी निचले होंठ को अपने दोनों होंठों से दबा लिया और खींचने-चूसने लगे, फिर दाँतों से दबा कर जोर से काट लिया।

मैं दर्द से सिसियाई और मैंने अपना मुँह खोल दिया.. फिर क्या था उन्होंने तुरंत अपनी जुबान मेरे मुँह में घुसा दी और मेरी जुबान को टटोलने लगे।

मैं भी अब समझ गई कि यह इंसान मानने वाला नहीं है, मैं भी अपनी जुबान को उनकी जुबान से लड़ाने लगी।

उधर वो मेरे चूतड़ों को दबाते और खींचते हुए अपने शरीर को मेरे शरीर से चिपकाते और धकेलते रहे।

हम दोनों काफी देर तक चूमते रहे।

अभी हमें सम्भोग किए मुश्किल से आधा घंटा ही हुआ होगा कि मुझे महसूस होने लगा कि उनका लंड खड़ा हो रहा और मेरी नाभि को सहला रहा।

मेरी लम्बाई उनसे काफी कम थी.. सो उनका लंड मेरी नाभि को छू रहा था। उनका अंदाज भी ऐसा था जैसे मेरी नाभि को ही सम्भोग केंद्र समझ लिया हो।

मैंने अपने पेट पर ज्यादा दबाव देख कर उनका लंड हाथ से पकड़ लिया और हिलाने लगी। मेरे द्वारा उनके लंड को कुछ ही पलों तक हिलाने से उनका लंड पूरी तरह सख्त होकर खड़ा हो गया.. जो कि मेरी चूत में घुसने को तैयार हो चुका था।

उन्होंने मुझे चूमना छोड़ कर.. मेरे स्तनों को चूसना शुरू कर दिया। वे बारी-बारी से झुक कर थोड़ा थोड़ा चूस कर मुझे गरम करने लगे।

उनका हाथ मेरे चूतड़ों से हट कर मेरी जांघों में चला गया और कस के पकड़ कर उन्हें फैलाने की कोशिश करने लगे।

मैं भी अब थोड़ा जोश में आने लगी और मेरी चूत फिर से गीली होनी शुरू हो गई, मैंने भी अपनी टाँगें फैला दीं और चूत उनके आगे खोल दी।

वो अब मेरी दोनों टाँगों के बीच चले आए और कमर थोड़ा झुका कर मेरी चूत के बराबर खड़े होकर अपने लंड को मेरी चूत पर धकेलने लगे।

मैंने उनका लंड अभी भी पकड़ रखा था और हिला रही थी.. पर जैसे ही उनका लंड मेरी चूत के भग्नासे को छुआ.. मैं ऊपर से लेकर नीचे तक गनगना गई।

मैं तो पहली बार से भी ज्यादा खुद को गर्म महसूस करने लगी और उनके लंड को पकड़ कर अपनी चूत की दरार के बीच ऊपर-नीचे रगड़ने लगी।

मैंने अपनी चूत को आगे की तरफ कर दिया.. और उनके लंड के सुपाड़े को अपनी दाने जैसी चीज़ पर रगड़ने लगी।

वो अब मेरी जाँघों को छोड़ कर मेरे स्तनों को जोर-जोर से मसल कर मेरे चूचुकों को दाँतों से दबा-दबा कर खींचने और चूसने लगे।

मुझे अपने स्तनों में दर्द को तो एहसास हो ही रहा था.. पर उस दर्द में भी.. पता नहीं गर्म होने की वजह से मजा आ रहा था।

मैं जोर-जोर से लम्बी साँसें ले रही थी और मेरी सिसकियां उनकी हरकतों के साथ ताल मिला रही थीं।

मैं अब पूरी तरह से बेकरार सी हो गई और मैंने अपनी एक टांग पास में पड़ी कुर्सी पर रख अपनी चूत के छेद को लंड के निशाने पर रख दिया.. और लंड पकड़ कर सुपारे को चूत में घुसा लिया।

फिर मैंने उनके चूतड़ों को दोनों हाथ पीछे ले जाकर खुद को एक टांग से सहारा देकर अपनी चूत उनके तरफ धकेला.. लंड आधा सरसराता हुआ मेरी चूत में घुस गया।

पता नहीं उनको मेरी चूत में लंड घुसा हुआ महसूस हुआ या नहीं.. क्योंकि वो अभी भी मेरे स्तनों से खेलने और चूसने में व्यस्त थे।

मैंने खुद ही अपनी चूत को उनके लंड पर धकेलना शुरू कर दिया और लंड अन्दर-बाहर होने लगा।

पर शायद उनके दिमाग में कुछ और ही चल रहा था, उन्होंने मेरी चूत से अपना लंड बाहर खींच लिया और मुझे चूमते हुए नीचे बैठ गए।

उन्होंने पहले मेरी नाभि और पेट में ढेर सारा चुम्बन किया और फिर मेरी चूत को एक हाथ से सहला कर चूत को चूमने लगे।

थोड़ी देर बाद उन्होंने अपने दोनों हाथों से मेरी चूत के दोनों होंठों को फैला दिया और दो उंगली डाल कर अन्दर-बाहर करने लगे।

मैं तो पहले से इतनी गीली हो चुकी थी कि क्या कहूँ.. ऐसा लगने लगा था.. जैसे मेरी जान निकल जाएगी।

थोड़ी देर उंगली से खेलने के बाद मेरी चूत को उन्होंने और फैला दिया.. तो मैं कराह उठी और अपनी जुबान मेरी चूत से चिपका दी। वो मेरी चूत को चूसने लगे और जुबान को मेरी चूत के छेद पर धकेलने लगे।

उनके इस तरह करने से मैं और भी उत्तेजित हो रही थी और ऐसा लगने लगा कि अब ये मुझे ऐसे ही झड़ जाने पर मजबूर कर देंगे।

मैंने उनके सर को पकड़ा और बालों को खींचते हुए ऊपर उठाने का प्रयास करने लगी.. ताकि हम सम्भोग शुरू करें.. पर वो हिलने को तैयार नहीं थे।

मैंने अपनी एक टांग से खुद और ज्यादा सहारा नहीं दे पा रही थी कि तभी उन्होंने मेरी दूसरी टांग जो कुर्सी पर थी.. उसे उठा अपने कंधों पर रख दिया और अपना मुँह मेरी चूत से चिपका कर चूसने लगे.. ऐसे.. जैसे रस पीना चाहते हों।मेरे लिए अब बर्दाश्त करना मुश्किल था और मैंने दोनों जाँघों के बीच उन्हें कस कर दबा लिया.. पर उन पर तो कोई असर ही नहीं था।

वो अपनी जुबान को मेरी चूत के छेद में घुसाने का प्रयास करते.. तो कभी मेरी चूत के होंठों को दांतों से खींचते.. तो कभी मेरी दाने को काट लेते.. और मैं कराहती हुई मजे लेती रही।

मैं अब उनसे विनती करने लगी- आह्ह.. बस करो.. और शुरू करो न.. मुझे घर भी जाना है।

समुझे लगा कि उन्होंने मेरी बात सुन ली और मान गए, उन्होंने मेरी तरफ सर उठा कर देखा और कहा- चुदने के लिए तैयार हो?

मैंने भी उनके ही भाषा में कहा- अब तड़पाओ नहीं यार.. चोद भी दो..

फिर दोबारा उन्होंने मेरी चूत को चूमा और जुबान जैसे ही मेरे छेद पर लगाई.. मेरा फ़ोन बजने लगा।

फ़ोन की आवाज सुनते ही मेरा तो जोश ही ठंडा हो गया।

फ़ोन बगल में ही टेबल पर था और यह मेरी बड़ी जेठानी का था।

मैंने उंगली मुँह पर रख कर उन्हें चुप रहने का इशारा किया और फ़ोन उठा लिया।

जेठानी ने फ़ोन उठाते ही कहा- कब तक आओगी?

मैंने उत्तर दिया- बस एक-डेढ़ घंटे में पहुँच जाऊँगी।

तब उन्होंने कहा- मार्किट से थोड़ा मीठा और पनीर साथ ले आना।

मैंने हाँ बोल कर फ़ोन काट दिया और बोली- अब मुझे जाना होगा.. वरना घर में लोग तरह-तरह के सवाल करेंगे।

पर उन्होंने मेरी चूत को चूमते हुए कहा- अभी तो मजा आना बाकी है.. बस थोड़ी देर और रुक जाओ।

 
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