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सियालदाह की एक घटना -वर्ष 2012

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सियालदाह की एक घटना -वर्ष 2012

मित्रगण, क्या आपने कभी किसी लिबो सिक्के के बारे में सुना है? ये एक चमत्कारी सिक्का है! यदि इसके सामने तेज गति से चलती बस आ रही हो तो ये उसके इंजन को बंद कर सकता है, किसी भी मशीन को रोक सकता है! हाँ, यदि कार्बनपेपर में लपेटा गया हो तो ऐसा नहीं करेगा यह! यदि जलती हुई मोमबत्ती के पास इसको लाया जाए तो उसकी लौ इसको तरफ झुक जाती है! चावल के पास लाया जाए तो चावल इसकी ओर आकर्षित हो जाते हैं! यदि बिजली के टेस्टर को इस समीप लाया जाए तो वो जलने लगता है! आपकी इलेक्ट्रॉनिक घड़ी इसके संपर्क में आते ही बंद हो जायेगी, बैटरीज फट जाएंगी! ए.ए. सेल्स पिघल जायेंगे!

दरअसल इस सिक्के में तीन ऊर्जा-क्षेत्र जोते हैं, जर्मनी में निर्मित एक ख़ास मशीन इसकी इस ऊर्जा को सोखती है! इस मशीन की कीमत दस लाख डॉलर के आसपास है, यदि इस सिक्के को किसी बड़े बिजली के ट्रांसफार्मर के पास लाया जाए तो वो फट जाता है! इसको टेस्ट करने में ०.१ लाख डॉलर का खर्च आता है, और इसका परीक्षण निर्जन स्थान एवं समुद्रीय तट-रेखा के पास ही किया जाता ही!

अब प्रश्न ये कि ये सिक्के आये कहाँ से?? और इसमें इतनी शक्ति कैसे है? कौन सी शक्ति?

बताता हूँ,

सबसे पहले शक्ति बताता हूँ, इस सिक्के में ताम्र-इरीडियम नामक पदार्थ होता है, ये अति विध्वंसक और दुर्लभ तत्व है! अब पुनः प्रश्न ये कि ये सिक्के आये कहा से?

वो भी बताता हूँ!

१६०३ ईसवी में, ईस्ट इंडिया कंपनी ने भारत में अपना व्यापार आरम्भ कर लिया था, इसका मुख्यालय लंदन इंग्लैंड में था, उन्होंने भारत में कुछ सिक्के अथवा मोहरें ढलवायीं ताकि व्यापार को समृद्धि मिले! इस प्रकार वर्ष १६१६ ईसवी, १७ मार्च को एक खास मुहूर्त था, गृह-कुटमी मुहूर्त, ये पांच घंटे का था, ये ग्रहण समय था, एक अत्यंत दुर्लभ खगोलीय घटना! ईस्ट इंडिया कंपनी ने इस समय पर कुछ भारतीय मनीषियों और खगोल-शास्त्रियों के हिसाब से, अलग अलग वजन और आकार के, अलग अलग सिक्के ढलवाए, ये कुल १६ थे, हाथों से बने, इनमे इरीडियम-ऊर्जा समाहित थी! आज भी कुल सिक्के १६ ही हैं! ऐसा ही एक सिक्का ईस्ट इंडियन कंपनी ने हांगकांग के राजा लियो को भेंट किया था सन १६१६ में ही! बाद में यही सिक्का अमेरिका में १८७१ में २०० बिलियन डॉलर का बिका था!
 
विशेषताएं:- लिबो सिक्के पर एक ओर जहां उस खुदरा मूल्य अंकित है वहीँ दूसरी ओर उस पर नौ ग्रह भी बने हुए हैं, इसीलिए इनको नवग्रह-सिक्के भी कहा जाता है, लिबो का यूनानी भाषा में अर्थ है सूर्य-प्रहरी! इनमे और भी विशेषताएं हैं, इनको चार्ज मभी किया जा सकता है तब ये अपनी क्षमता में वृद्धि कर लेते हैं! ८७ प्रकार के पदार्थ इसमें संघनित होते हैं प्रत्येक की अपनी विशेषता है! इस पर अंकीर्ण नवग्रह जैसे चन्द्र, मंगल, बुध, बृहस्पति, शनि, शुक्र, शनि, राहु और केतु के साथ स्व्यं सूर्य भी होते हैं, कइयों पर नाग बने हैं और कइयों पर कुछ अन्य चिन्ह भी अंकित हैं! ये सभी ग्रह एक दूसरे से शिराओं से जुड़े हुए हैं और इन्ही से इसमें ऐसी शक्तियां निहित हैं! कहा जाता है, इन सिक्कों में सभी ग्रहों के पदार्थ अवशोषित हैं! धातुविद् जानकारों ने ये पदार्थ तीन भाग में बांटे हैं, इनमे इक्कीडयम, इरीडियम और वीरेडियम मुख्य हैं! सन १६१६ में इन सिक्कों की कीमत ही लाखों में थी और आज तो खरबों रुपयों में है!

ऐसा ही एक सिक्का पद्मा जोगन के पास मैंने देखा था! पद्मा जोगन रहने वाली नरसिंहगढ़, मध्य-प्रदेश की थी, लेकिन उस समय वो सियालदाह में रह रही थी, उसको ये सिक्का उसके गुरु योगी राज कद्रुम ने दिया था! वो उसको अपने गले में बंधी एक छोटी सी डिब्बी में रखती थी, कार्बन पेपर में लपेट कर! खूब चर्चा में रही वो! बहुत लोगों ने प्रपंच लड़ाए लेकिन कुछ काम न आये! और फिर वर्ष २०१२ के दशहरे के दिन पद्मा जोगन अपने स्थान से गायब हो गयी! उसने कभी किसी को नहीं बताया कि वो कहाँ जा रही है! कहते हैं उसने जल-समाधि ले ली, कुछ कहते हैं हत्या हो गयी, कुछ कहते हैं भूमि में समाधि ले ली! लेकिन उसका सिक्का? वो कहाँ गया? उस सिक्के का मोल बहुत अधिक है! और इस तरह हुई उस सिक्के की खोज आरम्भ!

मेरे पास ये खबर दिवाली से दो रोज पहले आयी थी, हालांकि मुझे कोई आवश्यकता नहीं थी सिक्के की, मै बस इस से चिंतित था कि पद्मा जोगन का क्या हुआ? वो पैंतालीस साल की थी, हाँ, देखने में कोई तीस साल की लगती थी, सुन्दर और अच्छी मजबूत कद काठी की थी, मेरी मुलाक़ात उस से करीं पद्रह वर्ष पहले हरिद्वार में हुई थी, तभी से वो और मै एक दूसरे को जानते थे, सिक्के वाली बात तो मुझे बाद में पता चली थी! तब मेरी ज़िद पर वो सिक्का उसने मुझे दिखाया था, उसने बिजली का टेस्टर उसके पास रखा था और वो जलने लगा था! बहुत अजीब सा सिक्का लगा था मुझको वो!

खैर, एक दिन मेरा आना हुआ सियालदाह शर्मा जी के साथ, तब मै उसके स्थान पर गया था, तब तक वो समाधि ले चुकी थी, ऐसा मुझे बताया गया, उसने किसी को बताया भी नहीं था और बिना खबर किये वो गायब भी हो गयी थी!

जब मै वहाँ गया तो मुझे वहाँ के संचालक भान सिंह से मिलने का अवसर प्राप्त हुआ, भान सिंह राजस्थानी थे, उन्होंने भी मुझे पद्मा जोगन के बारे में वही बताया जो कि सुना-सुनाया था! कोई ठोस और पुख्ता जानकारी नहीं मिल सकी थी!

उस दिन शाम के समय मै और शर्मा जी आदि लोग बैठे हुए थे, मदिरा का समय था, वही सब चल रहा था, तभी पद्मा जोगन का ज़िक्र चल पड़ा! मेरी बात हुई इस औघड़ से, वो पद्मा जोगन के गायब होने से कुछ घंटे पहले ही मिला था उस से, नाम था छगन!

"तुम्हे कुछ आभास हुआ था?" मैंने पूछा,

"नहीं तो" वो बोला,

"कोई आया गया था उसके पास से?" मैंने पूछा,

"मै उसके साथ दोपहर से था, कोई आया गया नहीं था" उसने कहा,

"क्या पद्मा ने कुछ कहा था इस बारे में?" मैंने पूछा,

"नहीं तो" वो बोला,

मै सोच में पड़ गया!
 
पद्मा जोगन के जान-पहचान का दायरा वैसे तो बहुत बड़ा था, परतु उसको एकांकी रहने ही पसंद था, इक्का-दुक्का लोगों के अलावा और किसी से नहीं मिलती थी, तो हत्या वाला सिरा ख़ारिज किया जा सकता था, न उसके पास धन था और न कोई अन्य विशेष सिद्धि, हाँ मसान अवश्य ही उठा लेती थी, हाँ, वो सिक्का किसी से दुश्मनी का सबब बन सकता था, किसी धन की चाह रखने वाले के लिए, ये सम्भव था,

"छगन?" मैंने पूछा,

"जी?" उसने कहा,

"कोई नया आदमी मिलने आता था उस से?" मैंने पूछा,

"नहीं तो" वो बोला,

"कोई औरत?" मैंने पूछा,

"हाँ, एक औरत आती थी" उसने सुलपा खींचते हुए बताया,

"कौन?" मैंने पूछा,

"बिलसा" उसने धुंआ छोड़ते हुए कहा,

और सुलपा मुझे थमा दिया, मैंने कपडे की फौरी मारी और एक कश जम के खेंचा! तबियत हरी हो गयी! बढ़िया सुतवां लाया था छगन!

"कौन बिलसा?" मैंने पूछा,

''रंगा पहलवान की जोरू" उसने सुलपा लेते हुए कहा,

"वो मालदा वाला डेरू बाबा का रंगा पहलवान?" मैंने पूछा,

"हाँ, वही" उसने धुआं छोड़ते हुए गर्दन हिलाई,

"तो बिलसा काहे आई इसके पास?" मैंने पूछा,

"कोई रिश्ता है दोनों में" उसने कहा,

"किसमे?" मैंने पूछा,

"रंगा में और पद्मा में" वो बोला,

'अच्छा?" मैंने हैरत से पूछा,

"हाँ" वो बोला,

"क्या रिश्ता है?" मैंने पूछा,

"ये नहीं पता?" उसने बताया,

मेरे लिए जानना ज़रूरी था!

"अब बिलसा कहाँ है?" मैंने पूछा,

"वहीँ मालदा में" वो बोला,

"अच्छा, डेरू बाबा के पास?" मैंने पूछा,

"हाँ" उसने कहा,

अब मैंने छगन को अंग्रेजी माल बढ़ाया उसके गिलास में! उसने उठाया, बत्तीसी दिखायी और गटक गया!

"छगन?" मैंने कहा,

"हाँ जी" वो बोला,

"पद्मा के सिक्के के बारे में कुछ पता है?" मैंने पूछा,

"नहीं जी" वो बोला,

"कहीं बिलसा इसी मारे तो नहीं आती थी वहाँ?" मैंने शक ज़ाहिर किया,

"पता नहीं जी" उसने कहा,

"चल कोई बात नहीं, मैं खुद बिलसा से पूछूंगा!" मैंने कहा,

"वहाँ जाओगे?" उसने पूछा,

"हाँ" मैंने कहा,

"मैं भी चलूँ?" उसने पूछा,

"चल" मैंने कहा,

"ठीक है" वो बोला,

अब हमारा कार्यक्रम तय हो गया, कल हम मालदा जाने वाले थे!
 
अगले दिवस हम निकल पड़े मालदा, सुबह कोई सात बजे, ये तीन सौ छब्बीस किलोमीटर दूर है सियालदह से, सो बस पकड़ी और चल दिए, पूरा दिन लग जाना था, अतः नाश्ता-पानी कर के चल दिए थे!

जब हम वहाँ पहुंचे तो रात के ९ बज गए थे, यात्रा बड़ी बुरी और थकावट वाली थी, घुटने, पाँव और कमर दर्द कर रहे थे! हम सीधे अपने जानकार के डेरे पर पहुंचे, हम वहीँ ठहरे, और स्नान आदि से निवृत हो कर भोजन किया और फिर लम्बे पाँव पसार कर सो गए!

सुबह उठे तो ताज़ा थे, थकावट हट गयी थी! दूध आ गया गरम गरम! दूध पिया और साथ में कुछ मक्खन-ब्रेड भी खाये, नाश्ता हो गया!

"छगन?" मैंने कहा,

"हाँ जी?" वो बोला,

"डेरू बाबा का डेरा कहाँ है यहाँ?" मैंने पूछा,

"होगा यहाँ से कोई पचास किलोमीटर" वो बोला,

"चल फिर" मैंने कहा,

"चलो जी" वो बोला.

अब हम उठे, मैं संचालक से मिला उसको बताया और हम वहाँ से निकल गए डेरू बाबा के डेरे के लिए!

सवारी गाड़ी पकड़ी और उसमे बैठ कर चल दिए, डेढ़ घंटा लग गया पहुँचने में वहाँ, ऊंचाई पर बना था डेरा, बड़ा सा स्वास्तिक बना था दरवाज़े पर और झंडे कतार में लगे थे!

हम अंदर गए, परिचय दिया तो उप-संचालक से बात हुई, उसने हमे एक कक्ष में बिठाया, डेरू बाबा वहाँ नहीं था, खैर, हमे तो रंगा से मिलना था, उप-संचालक ने एक सहायक को भेज दिया उसको बुलवाने के लिए और चाय मंगवा दी, हम चाय पीने लगे, पंद्रह मिनट के बाद सहायक आया और बताया कि रंगा गया हुआ है डेरू बाबा के साथ और शाम को आना है उनको वापिस!

खैर जी,

अब हमने रंगा पहलवान की पत्नी से मिलने की इच्छा जताई, उप-संचालक ने सहायक को भेज दिया बिलसा को बुलवाने के लिए!

थोड़ी देर में एक अधेड़ उम्र की औरत आयी वहाँ, उसने नमस्कार किया हमने भी नमस्कार किया,

"बिलसा? तू ही है?" शर्मा जी ने पूछा,

"हाँ" उनसे कहा,

"आदमी कहाँ है तेरा?" उन्होंने पूछा,

''गया हुआ है डेरू बाबा के साथ" उसने बताया,

"अच्छा" अब मैंने कहा,

"शाम तलक आयेंगे" वो बोली,

"एक बात बता, पद्मा जोगन को जानती है तू?" मैंने पूछा,

वो चुप!

"बता?" मैंने पूछा,

"नहीं" उसने कहा,

अब छगन ने मुझे देखा और मैंने बिलसा को!

"वो सियालदाह वाली पद्मा जोगन?" मैंने पूछा,

"हाँ" उसने कहा,

"कहाँ गयी वो?" मैंने पूछा,

"पता नहीं" वो बोली,

"आखिरी बार कब मिली तू उस से?" मैंने पूछा,

"तभी उसके जाने के दो दिन पहले" वो बोली,

"कुछ बताया था उसने?" मैंने पूछा,

"नहीं" वो बोली,
 
"मैंने कुछ पूछा?" मैंने कहा,

"नहीं" वो बोली, और फिर एक दम से उठकर चली गयी बाहर!

मैं आश्चर्यचकित!

"ये बहुत कुछ जानती है, या फिर कुछ भी नहीं खाकधूर कुछ भी नहीं" मैंने कहा,

"लेकिन ये उठ क्यों गयी?" शर्मा जी ने पूछा,

"अपने आदमी के सामने बात करेगी" मैंने कहा,

"यानि कि शाम को" वे बोले,

"हाँ, मैंने कहा,

"चलो कोई बात नहीं, शाम को ही सही" उन्होंने कहा,

"हाँ, शाम को सही" मैंने कहा,

अब हम उठे वहाँ से, बिलसा का रवैय्या पसंद नहीं आया मुझे, लगता था कुछ छिपा रही है हमसे! पर अब शाम को ही बात बन सकती थी!

हम कक्ष से बहार आये, उप-संचालक के पास गए और फिर शाम को आने की कह दिया, वो तो हमको वहीँ रोक रहे थे, लेकिन मैंने मना कर दिया,

हम बाहर आ गए, बाहर आकर भोजन किया और फिर अपने डेरे पर वापिस आने के लिए सवारी गाड़ी पकड़ ली, आराम से हम आ गए अपने डेरे पर!

छगन वहाँ से अपने किसी जानने वाले के पास चला गया और अब यहाँ रह गए हम दोनों, हमने आराम किया और एक झपकी लेने के लिए अपने अपने बिस्तर पर लेट गए!

जन आँख खुली तो २ बजे थे, मौसम सुहावना था, शर्मा जी सोये हुए थे अभी, मैं बाहर आ गया और आकर एक पेड़ के नीचे वहाँ पत्थर से बनी एक कुर्सी पर बैठ गया, और पद्मा जोगन के बारे में सोचने लगा, कोई क्यों चाल खेलेगा उस से? सिक्के के लिए? हाँ, ये हो सकता है, लेकिन वो कहाँ गयी? ये था सवाल असली तो!

तभी शर्मा जी भी बाहर आ गए और मेरे पास आ कर बैठ गए!

"कब उठे?'' उन्होंने पूछा,

"अभी बस आधा घंटा पहले" मैंने कहा,

"थक गया था मैं, इसीलिए ज़यादा सो लिया" वो बोले,

"कोई बात नहीं" मैंने कहा,

"चाय पी जाए" वे बोले,

उन्होंने एक सेवक को चाय लाने के लिए कह दिया! वो चला गया और हम बातचीत करते रहे!

"ये पद्मा जोगन शादीशुदा थी?" उन्होंने पूछा,

"हाँ" मैंने कहा,

"तो इसका आदमी?" उन्होंने पूछा,

"शादी के एक महीने बाद ही रेल से कटकर मर गया था" मैंने कहा,

"ओह" वे बोले,

"कोई संतान?" उन्होंने पूछा,

"कोई नहीं" मैंने कहा,

"ओह" वे फिर बोले,

"तो सियालदाह वो अपने गुरु के साथ रहती थी?" वे बोले,

"हाँ, उसके गुरु ने ही उसकी शादी करवायी थी" मैंने कहा,

"अच्छा" वे बोले,

सहायक चाय लाया और हमने चाय की चुस्कियां लेना आरम्भ किया, साथ में चिप्स भी लाया था, देसी चिप्स!
 
हम चाय का मज़ा ले रहे थे, तभी छगन का वहाँ आना हुआ, ओ जिस से मिलकर आया था वो एक स्त्री थी, छगन के गाँव की स्त्री, छगन हमारी तरफ बढ़ा तो मैंने कहा, "मिल आये छगन?"

"हाँ जी" वो बोरा और अपना झोला एक तरफ रख दिया,

"कुछ लाया है क्या वहाँ से?" मैंने पूछा,

"हाँ, कुछ सामान है" उसने बताया,

"अच्छा" मैंने कहा,

"सोचा लेता आऊं, बाद में नहीं आना होता इधर" वो बोला,

"चल ठीक रहा" मैंने कहा,

"हाँ जी" वो बोला,

"जा चाय ले आ अंदर से" मैंने कहा,

वो चाय लेने चला गया,

"गुरु जी, ये छगन क्या करने जाता था उस जोगन के पास?" शर्मा जी ने पूछा,

"ऐसे ही जाता होगा, मिलने के लिए" मैंने कहा,

"हम्म" वे बोले,

"और वैसे भी जोगन बहुत कम मिला करती थी मिलने वालों से" मैंने कहा,

"अच्छा" वे बोले,

छगन चाय ले आया इस बीच, चाय पीने लगा,

"आज शाम निकलते हैं छह बजे, क्यों छगन?" मैंने पूछा,

"हाँ, चलते हैं" वो बोला,

"और सुना छगन, कोई ऐसी बात जो काम की हो?" मैंने पूछा,

"ऐसी तो कोई बात नहीं, हाँ एक बात मुझे खटकती थी वहाँ" वो बोला,

"क्या?" अब मैंने चौंका,

"बिलसा जब भी आती थी तो अक्सर उसके साथ एक लड़की होती थी" वो बोला,

"लड़की?" मैंने पूछा,

"हाँ जी" वो बोला,

"कैसी लड़की?'' मैंने पूछा

"बाहरी" उसने कहा,

बाहरी मतलब किसी डेरे की नहीं,

"क्या उम्र होगी उसकी?" मैंने पूछा,

"बीस-बाइस से ज्यादा नहीं होगी" वो बोला,

अब रहस्य में एक गाँठ और लगा दी थी कस के छगन ने!

"बिलसा कुल कितनी बार आयी होगी मिलने के लिए?" मैंने पूछा,

"करीब छह-सात बार, चार-पांच महीने में" वो बोला,

"अच्छा" मैंने कहा,

इसके बाद मैं चिंता में पड़ा, कौन लड़की? किसलिए आती थी? क्या कारण था? खैर, अब इसका पता बिलसा या रंगा से मिल सकता था, और आज शाम हम जाने वाले थे वहाँ,

मैं और शर्मा जी अपने कमरे में आ गए, छगन नहाने धोने चला गया,

"अब ये लड़की कौन?" शर्मा जी ने पूछा,

"पता नहीं?" मैंने कहा,

'वो भी बाहरी?" उन्होंने पूछा,

"पता करते हैं आज" मैंने कहा,

"ये तो रहस्य गहराता जा रहा है" वे बोले,

"हाँ, अवश्य ही कुछ गड़बड़ है, पक्का" मैंने कहा,

"अंदेशा है मुझे भी ऐसा" उन्होंने ऐसा कह और मोहर दाग दी!

"बाहरी, अर्थात कोई और" मैंने स्व्यं से सवाल किया,

"लेकिन कौन? किसलिए?" एक और सवाल!

इसी उहापोह में आगे का समय कटा, खैर जी, खाना खाया और फिर टहलने के बाद वापिस कक्ष में आ गए हूँ तीनों, पांच बज चुके थे और छह बजे करीब निकलना था वहाँ से, सो सोचा थोडा सा आराम और फिर कूच!

इस बीच छगन ने मुझे कुछ और बातें भी बताईं, कुछ ज़रूरी भी और कुछ ऐसे ही!

और अब बजे छह,

"चलो" मैंने कहा,

"चलिए" वे बोले,

और हम निकल गए,

डेरू बाबा के डेरे पहुंचे. अब वहाँ रौनक सी थी, हम अंदर गए और फिर संचालक से हमने रंगा पहलवान से मिलने की इच्छा जताई, अपना परिचय भी दिया,

"आप लोग बैठिये, मैं बुलवा लेता हूँ" संचालक ने कहा,

"ठीक है, धन्यवाद" मैंने कहा,

हम कक्ष में बैठ गए!

और थोड़ी देर बाद रंगा पहलवान आ गया अपनी पत्नी बिलसा के साथ, चेहरे पर अजीब से भाव लिए!
 
रंगा पहलवान अन्दर आया और सामने पड़े मूढ़े पर बैठा गया, देह उसकी पहलवान की ही थी, जवानी में खूब पहलवान रहा होगा, पता चलता था, उसकी पत्नी वहीँ एक चारपाई पर बैठ गयी, अब मैंने बात आरम्भ की, "रंगा, मैं दिल्ली से आया हूँ, पद्मा जोगन के बारे में जानना चाहता हूँ, तुम्हारी पत्नी बिलसा अक्सर उसके पास जाया करती थी"

"हाँ, जाया करती थी" उसने कहा,

"कोई लड़की भी जाती थी बिलसा के साथ, कोई बाहरी लड़की" मैंने पूछा,

"हाँ, वो लड़की मेरी भतीजी है, कोलकाता में रहती है" उसने बताया,

"तुमको तो मालूम है, पद्मा जोगन अचानक से गायब हो गयी थी?" मैंने कहा और सीधे ही मुख्य विषय पर आ गया,

"हाँ, सुना था" उसने कहा,

"क्या पद्मा जोगन ने इस बारे में कभी बिलसा को कुछ बताया था?" मैंने पूछा,

"नहीं" उसने कहा,

"क्या बिलसा कुछ कहेगी इस बारे में?" मैंने पूछा,

"नहीं" उसने कहा,

"क्यों?" मैंने पूछा,

"आप बताइये कि क्यों बताये?" उसने कहा,

"मैं तो जानना चाहता हूँ कि कुछ सुराग मिल जाए कुछ उसका?'' मैंने कहा,

"आप जानना चाहते हैं?" उसने कहा,

"हाँ" मैंने कहा,

"बताता हूँ" उसने कहा,

अब मेरे कान खड़े हुए!

"पद्मा जोगन ने स्व्यं कहीं जाकर समाधि ले ली है, कहाँ ये नहीं पता, यदि पता होता तो मैं आपको अवश्य ही बताता, जितना जानता हूँ उतना ही बताया है" वो बोला,

"ये तुमको कहाँ से पता चला?" मैंने पूछा,

"मुझे एक औघड़ दीना नाथ ने बताया था" वो बोला,

उसकी आवाज़ में लरज़ नहीं थी, कपट नहीं था, छल नहीं था, अस्वीकार नहीं किया जा सकता था!

"अच्छा! ये औघड़ दीनानाथ कहाँ रहता है?" मैंने पूछा,

"ये सियालदह में ही है" उसने मुझे फिर पता भी दे दिया,

अब हमारा काम यहाँ ख़तम हो गया था, रंगा ने भरसक बताया था, यक़ीन करना ही था, चोर में साहस नहीं होता, नहीं तो वो चोरी ही न करे!

अब हम उठे वहाँ से और फिर वापिस चल दिए अपने डेरे की तरफ, रंगा पहलवान छोड़ने आया हमको बाहर तक, नमस्कार हुई और फिर हम वापिस चल पड़े!
 
औघड़ दीनानाथ! अब इस से मिलना था! और ये सियालदाह में था, अर्थात अब वापिस सियालदह जाना था उस से मिलने के लिए, जहां का पता था वो जगह काफी जंगल जैसी थी, वहाँ क्रियाएँ आदि हुआ करती थीं, साधारण लोग वहाँ नहीं जा सकते थे, काहिर हमको तो जाना ही था, बिलसा और रंगा दोनों ही कड़ी से बाहर थे अब, और वो लड़की भी! अब फिर से थकाऊ यात्रा करनी थी! तीन सौ किलोमीटर से अधिक की यात्रा, पूरा दिन लग जाना था! पर क्या करें, जाना तो था ही!

तो मित्रो, हम तीनों निकल पड़े वहाँ से अगले दिन सुबह, नाश्ता कर लिया था, भोजन बाद में कहीं करना था, हमने बस पकड़ी और निकल दिए! हिलते-डुलते, ऊंघते-जागते आखिर रात को सियालदह पहुँच गए! जाते ही अपने अपने बिस्तर में घुस गए, थकावट के मारे चूर चूर हो गए थे, लेटे हुए भी ऐसा लग रहा था जैसे बस में ही बैठे हैं! फिर भी, नींद आ ही गयी! हम सो गए!

जब सुबह उठे तो सुबह के आठ बजे थे, शर्मा जी जाग चुके थे और कक्ष में नहीं थे, छगन दोहरा हुआ पड़ा था अपने बिस्तर में! मैं भी उठा और दातुन की, फिर स्नान करके आया और फिर अपने बिस्तर पर बैठ आज्ञा, छगन को जगाया और छगन नमस्ते कर बाहर चला गया! अब शर्मा जी आ गए, वे नहा-धो चुके थे पहले ही!

"कहाँ घूम आये?" मैंने पूछा,

"दूध पीने गया था" वे बोले,

'वाह! राघव मिला?" मैंने पूछा,

"हाँ, उसी ने प्रबंध किया" वे बोले,

"बढ़िया है" मैंने कहा,

"आप चलिए?" उन्होंने पूछा,

"यहीं आ जाएगा राघव अभी" मैंने कहा,

"हाँ, ये तो है" वे बोले,

"हाँ" मैंने कहा,

"अच्छा गुरु जी?" उन्होंने कहा,

"हाँ?" मैंने कहा,

"कहाँ जाना है आज?" वे बोले,

"है यहाँ से कोई बीस किलोमीटर" मैंने कहा,

"कब चलना है?" वे बोले,

"चलते हैं कोई ग्यारह बजे" मैंने कहा,

"ठीक है" वे बोले,

तभी एक सहायक आया, लोटा लाया, लोटे में दूध और साथ में एक गिलास, साथ में रस्क! मैंने पीना आरम्भ किया!

"दूध बढ़िया है" मैंने कहा,

"गाय का है जी" वे बोले,

'वाह!" वे बोले,

"अब शहर में ऐसा दूध कहाँ!" मैंने कहा,

"हाँ जी!" वे बोले,

मैंने दूध समाप्त किया!

"शर्मा जी?' मैंने कहा,

"जी?" वे बोले,

"अभी थोड़ी देर बाद चलते हैं बाहर, मुझे एक महिला से मिलना है" मैंने कहा,

"कौन?" वे बोले,

"श्रद्धा" मैंने कहा,

"समझ गया" वे बोले,

"हाँ" मैंने कहा,

"उचित है" वे बोले,

श्रद्धा वहाँ रेलवे विभाग में कार्यरत थीं, उनसे मिलने जाना था, मेरे पुराने जानकारों में से एक हैं वे!

फिर कुछ देर बाद!

"चलें?" मैंने पूछा,

"चलिए" मैंने कहा,

और हम दोनों फिर निकल पड़े श्रद्धा से मिलने के लिए!

उनके घर!
 
हम श्रद्धा जी के घर पहुंचे, भव्य और विनम्र स्वागत हुआ, मुझे दिल्ली की वापसी कि भी टिकट करानी थी, सो चाय आदि पी कर और ब्यौरा देकर हम वापिस आ गए यहाँ से, जब वापिस आये तो छगन वहीँ मिला हमसे, अब हमको दीनानाथ औघड़ के पास जाना था, अतः एक फटफटी सेवा लेकर उसमे बैठकर हम पहुँच गए दीनानाथ के ठिय़े पर, बाहर कुछ लोग खड़े थे, जैसे कोई तैयारी चल रही हो, किसी आयोजन की! पता चला ये एक बाबा नेतराम का आश्रम है और औघड़ दीनानाथ आजकल यही शरण लिए हुए हैं! हम अंदर गए, छगन रास्ता बनाता संचालिका के पास पहुंचा, और दीनानाथ औघड़ के बारे में मालूमात की, एक सहायक हमको दीनानाथ के कक्ष तक ले गया और हमने कक्ष में प्रवेश किया, अंदर दीनानाथ कौन स था पता नहीं था, पता करने पर पता चल गया, वो कोई पचास बरस का औघड़ रहा होगा, दरम्याना क़द था उसका, लम्बी-लम्बी काली सफ़ेद दाढ़ी थी और शरीर का कोई अंग ऐसा नहीं था जो भस्मीभूत ना हो! गले में और भुजाओं में तांत्रिक आभूषण सुसज्जित थे उसके!

"आइये बैठिये" वो बोला,

हम बैठ गए!

"कहिये, क्या काम है?" उसने पूछा,

"पद्मा जोगा, उसी के बारे में बात करनी है" मैंने कहा,

वो ना तो चौंका और ना ही चेहरे के भाव बदले उसके! हाँ, कुछ पल शांत हुआ और अपने चेले-चपाटों को उसने बाहर भेज दिया,

"क्या बात करनी है उसके बारे में?" उसने पूछा,

"वो गायब हो गयी अचानक से, क्या आपको कुछ मालूम है?'' मैंने पूछा,

वो शांत हुआ!

कुछ देर दाढ़ी पर हाथ फिराया!

"बला!" वो बोला,

"बला?" मैंने हैरत से पूछा,

"हाँ बला!" वो बोला,

"कैसे?" मैंने पूछा,

"वो लिबो सिक्का, वही बला" उसने कहा,

"अर्थात?" मैंने पूछा,

"हाँ, उसी की वजह से वो गायब हुई होगी, खबर तो ये हर जगह थी" वो बोला,'

"हुई होगी?" मैंने पूछा,

"हाँ" वो बोला,

"आपने वो सिक्का देखा था?" मैंने पूछा,

"हाँ" वो बोला,

"हम्म" मैंने कहा,

और मैं अब अधर में था!

"किसको जानकारी थी?" मैंने पूछा,

"नुकरा नुकरा पर" उसने कहा,

अर्थात नुक्कड़ नुक्कड़ पर!

"आपके हिसाब से क्या हुआ होगा?" मैंने पूछा,

"मार दिया होगा, गाड़ दिया होगा कहीं किसी ने?" उसने भौंहे उचकाते हुए कहा,

"और वो खुद कहीं चली गयी हो तो?" मैंने पूछा,

"हो सकता है" वो बोला,

अब तक चाय आ गयी, पीतल के कपों में! हमने चाय पीनी आरम्भ की,

"आपने 'खोज' नहीं की उसकी?" मैंने पूछा,

"क्या ज़रुरत?" उसने मेरी बात काट दी!

अब मामला और गम्भीर!
 
दीनानाथ का बताने का लहज़ा बहुत रूखा था, उसने ये दिखाया था कि वो क्या जाने क्या हुआ पद्मा जोगन का! ये बात मुझे अच्छी नहीं लगी थी, अब मेरा लहजा भी उसी की तरह हो गया!

"देख लगा लेते तो 'खोज' हो जाती" मैंने कहा,

"मैंने बताया नहीं? क्यों?" उसने मुझे घूर के कहा,

"इसलिए कि कम से कम वो आज ज़िंदा होती" मैंने कहा,

"और फिर और मुसीबत पैदा किया करती" उसने कहा,

"नहीं, आवश्यक नहीं ये" उसने कहा,

खैर, अब ये स्पष्ट हो ही गया कि दीनानाथ के हृदय में कोई जगह नहीं पद्मा जोगन के लिए, चाहे वो जिए या मरे!

"ठीक है, कोई बात नहीं" मैंने कहा,

उसने हाथ जोड़े,

"चलता हूँ" मैंने कहा,

"अब आप लगा लो देख" उसने कहा,

व्यंग्य किया,

"हाँ, वो तो लगाऊंगा ही" मैंने कहा,

"पता चल जाए तो मुझे भी बता देना" उसने कहा,

"हाँ" मैंने कहा,

अब मैं वहाँ से निकला, मुंह का स्वाद कड़वा कर दिया था उसके व्यवहार ने, अब देख लगानी ही थी मुझे! अन्य कोई रास्ता नहीं था, खोज ज़रूरी ही थी! मैंने पद्मा जोगन के रहस्य से पर्दा उठाना चाहता था, चाहे किसी को कोई फ़र्क़ पड़े या नहीं परन्तु मुझे उत्सुकता थी जहां एक तरफ वहाँ निजी चाह भी थी!

अब हम वहाँ से वापिस आये, मैं अपने स्थान पर पहुंचा, मैंने छगन से किसी जगह के बारे में पूछा, उसने हामी भर ली, जगह का प्रबंध हो गया,

अगली दोपहर मैं छगन के साथ उसके स्थान पर पहुँच और एक खाली स्थान पर कुछ सामग्रिया आहूत कर मैंने देख लगायी, पहली देख भम्मा चुड़ैल की थी, वो खाली हाथ आयी, दूसरी देख वाचाल की, वो भी खाली हाथ आया, तीसरी देख कारिंदे की और वो भी बेकार! अब निश्चित था कोई अनहोनी घटी है पद्मा जोगन के साथ, अब मेरे पास देख थी एक ख़ास, शाह साहब भिश्ती वाले! मैंने शाह साहब का रुक्का पढ़ा, एक पेड़ के तने में एक चौकोर खाना छील और उसमे काजल भर दिया, अब दरख़्त को पाक कर मैंने शाह साहब की देख लगायी, पहले एक रास्ता दिखा, उस रास्ते पर बुहारी करने वाला आया, फिर एक भिश्ती आया, पानी छिड़क कर जगह साफ़ की, फिर एक तखत बिछाया गया, और उस पर क़ाज़ी साहब बैठे, शाह साहब, उनको पद्मा जोगन के बारे में पूछा गया और उनके नेमत और मेहरबानी से कहानी आगे बढ़ी, तीन-चार मिनट में ही कहानी पता चल गयी, मैंने शाह साहब का शक्रिया किया और फिर पर्दा ढाँपने के लिए अपनी पीठ उनकी तरफ कर ली! शाह साहब की सवारी चली गयी! और मेरे हाथ मेरा सवाल का उत्तर लग गया!

मैं वापिस आया वहाँ से, छगन और शर्मा जी वहीँ बैठे था,

"काढ़ लिया?" छगन ने पूछा,

"हाँ" मैंने कहा,

"खूब!" वो बोला

"हाँ" मैंने कहा,

"हत्या हुई उसकी?" उसने पूछा,

"नहीं" मैंने कहा,

"फिर?" उसने पूछा,

"बता दूंगा" मैंने कहा,

"जी" वो बोला.

अब हम वहाँ से अपने स्थान के लिए निकल पड़े!
 
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