• Hello Friends You can Register on the Forum and by posting you can earn money too.

सुरभि और जिन्न फ़ैज़ान का इश्क़ complete

  • Thread starter Thread starter StoryPublisher
  • Start date Start date
S

StoryPublisher

Guest
सुरभि और जिन्न फ़ैज़ान का इश्क़

"मम्मी?" बोली सुरभि अपनी मम्मी से,

सर्दी के दिन थे, आज रविवार था, धूप का आनंद ले रहे थीं माँ बेटी!

"हाँ बोल?" बोली माँ,

"वो सामने, अशोक का पेड़ है न?" बोली वो,

माँ ने देखा,

"हाँ, वही है" बोली माँ!

"क्या फूल हैं न उसमे?" बोली वो,

"फूल? कहाँ है फूल?" बोली माँ,

गौर से देखते हुए उस पेड़ को!

"आपको वो लाल चटक फूल नहीं दिख रहे?" बोली सुरभि,

हैरत से!"कहाँ हैं फूल?" माँ ने फिर से गौर से देखा,

अब ग्रिल तक गयीं वो, और गौर से देखा,

उन्हें तो बस चटक हरे पत्ते ही दिखे!

आई वापिस,

"तुझे फूल दिख रहे हैं उसने?" म ने पूछा,

"हाँ, देखो, कितने प्यारे हैं!" बोली मुस्कुरा कर सुरभि!

"या तो तू मज़ाक कर रही है, या फिर तेरी आँखों का अब इलाज ज़रूरी है!" बोली माँ, खीझ कर,

और आ बैठीं फिर से, फोल्डिंग-पलंग पर, माँ मेथी के पत्ते साफ़ क रही थीं,

और सुरभि, कानों में, एअर-फ़ोन लगा, मोबाइल-फ़ोन में गाने सुन रही थी,

जब माँ से बातें कीं, तो गले में लगा लिया था वो एअर-फ़ोन!

"कमाल है मम्मी! खैर छोडो!" बोली सुरभि,

और कान में, फिर से लगा लिया उसने अपन एअर-फ़ोन!

सुरभि, मेडिकल की छात्रा थी, तृतीय वर्ष की,

बहुत सुंदर और अच्छे बदन वाली है वो सुरभि!

उसके तन पर, कोई भी कपड़ा हो,

फब जाता है, ऐसा बदन है सुरभि का!

चेहरा ऐसा सुंदर,

कि उसकी सहेलियां ही उसे न जीने देतीं!

सुलझे हुए व्यक्तित्व वाली है सुरभि!

नए ज़माने की हवा से दूर है,

साड़ी पहनती है कभी कभी,

मैंने सबसे पहले साड़ी में ही देखा था उसको,

बाकी, सूट-सलवार, जीन्स आदि कुछ नहीं,

कट-स्लीव्स, क़तई नहीं!

केश, कमर से नीचे तक!

सुसंस्कृत! और समझदार!

श्याम सिंह का परिवार, नॉएडा में रहता है,

परिवार में, श्याम सिंह, सरकारी नौकरी करते हैं,

पत्नी गृहणी हैं,

एक बड़ी बेटी है ये सुरभि,

और एक छोटा बेटा है, कुणाल,

कुणाल, इंजीनियरिंग कर रहा है, और घर से बाहर रहता है,

महीने में, एक बार घर आता है , सीधा-सादा लड़का है वो!

श्याम सिंह जी के बड़े भाई भी सरकारी नौकरी में हैं,

उनका परिवार भी, उनके पास ही, रहता है,

उनके पिताजी बड़े भाई के पास रहते हैं,

श्याम सिंह जी के बड़े भाई के तीन लड़के हैं,

इसीलिए, अपने ताऊ-ताई और अपने सभी भाइयों की लाड़ली है ये सुरभि!

तो उस दिन सुरभि ने अशोक के फूल देखे थे,

पेड़ पर लगे हुए, बहुत कम ही देखते हैं ये फूल!

अशोक का वृक्ष चाहे वृद्ध हो, ठूंठ बन, गिर जाए,

फूल नहीं देता, जब तक कि कोई रजस्वला कन्या उसको स्पर्श न करे!

इस से पहले भी, कोई दस दिन पहले,

सुरभि जब स्नान करने गयी थी,

तो बाल्टी के पानी में, उसको अजीब से छोटे छोटे नीले रंग के कुछ फूल मिले थे!

उसने उनको निकाल लिया था बाहर,

और जब स्नान कर लिया, तो बदन के कोने कोने से, एक भीनी भीनी सुगंध बनी रही, अगले दिन तक, उसके सहपाठी भी चकित थे, कि पूरी कक्षा में ये सुगंध आ कहाँ से रही है! जिस से छू जाए, वही महक जाए! ऐसी सुगंध थी वो! और हैरत की बात ये, कि सुरभि को ये सुगंध नहीं आ रही थी! और जब वो लौटी कक्षा से, तो गुसलखाने में रखे हुए वो फूल, थे ही नहीं वहां! शायद माँ ने फेंक दिए हों! यही सोचा उसने, और बात आई गयी हो गयी!

दो दिन बाद की बात होगी,

अपनी कक्षा में थी उस दिन सुरभि,

संग में उसकी दो सहेलियाँ थीं, जिनसे वो खुलकर बात करती थी,

एक जिला सागर, मध्य प्रदेश से थी, कामना,

और एक ऊना, हिमाचल प्रदेश से, पारुल,

प्यास लगी कामना को,

तो चली पानी पीने,

संग उसके, वो पारुल भी चली,

बाहर, एक जगह, वाटर-कूलर लगा था, वहीँ से पानी पिया करते थे विद्यार्थी,

तो वाटर-कूलर काम नहीं कर रहा था, वापिस हुईं दोनों,

अब बाद में कैंटीन से पीना पड़ता उनको, कोई बात नहीं,

समय भी हो चला था, आ कर बैठ गयीं वे दोनों,

कुछ ही देर में, सुरभि गयी पानी पीने,

सुरभि ने वाटर-कूलर की टंकी के नीचे रखा गिलास,

तो पानी आ गया! पानी पी लिया उसने, गिलास फेंक दया,

डिस्पोजेबल गिलास रखे जाते थे वहां,

पानी पिया, और वापिस हुई,

कक्षा का समय समाप्त हुआ, तो अब चलीं कैंटीन,

कामना और पारुल ने पानी पिया सबसे पहले,

और ले आयीं उस सुरभि के लिए भी!

सुरभि ने मना किया,

"प्यासी ही रहेगी क्या?" बोली कामना,

"क्यों? पानी पी तो लिया मैंने?" बोली सुरभि,

"कहाँ पिया पानी?" पूछा कामना ने,

"वहीँ से, वाटर-कूलर से?" बोली वो,

"लेकिन वो तो खराब है?" बोली कामना,

"जा, जाकर देख, चल रहा है!" बोली सुरभि,

"पारुल? वो चल रहा था क्या?" पूछा कामना ने, पारुल से,

"नहीं!" बोली पारुल,

"लेकिन जब मैं गयी, तो चल रहा था?" बोली सुरभि!

"नहीं चल रहा!" आवाज़ आई एक लड़के की,

ये अरिदमन था, लखनऊ से था वो, साथ ही पढ़ता था उनके,

"क्या?" बोली सुरभि,

"हाँ, नहीं कल रहा, उसका स्विच भी ऑफ है!" बोला वो,

"ऐसा कैसे हो सकता है?" बोली सुरभि,

"आ! चल कर देख!" बोली पारुल,

अब तीनों चल पड़ीं उधर ही!

और जब वाटर-कूलर देखा,

तो स्विच ऑफ था उसका!

पानी, नाम को नहीं था उसमे!

"अब तूने क्या सपने में पिया पानी?" बोली कामना!

"मेरा यक़ीन कर! मैंने यहीं से पिया था पानी!" बोली वो,

और तब उसने डस्टबीन में झाँका,

एक ही गिलास पड़ा था! वो भी सुरभि का!

वो गिलास, उन दोनों ने भी देखा!

अब वे भी सन्न!

ऐसा कैसे हो सकता है?

वाटर-कूलर बंद!

स्विच ऑफ!
 
लेकिन डस्टबीन में पानी का गिलास!

क्या माना जाए इसे! कैसे आया पानी!

खैर,

ज़्यादा माथा-पच्ची नहीं की उन्होंने,

सीधा कैंटीन गयीं, और अपना खाना खाया,

लेकिन, सुरभि के मन में ये बात घूमती ही रही!

जब वो बंद था, तो पानी आया कैसे?

क्या कुछ पलों के लिए चल पड़ा था?

या बचा हुआ पानी था?

जब उत्तर नहीं मिलता मानव-मस्तिष्क को,

तो उसको भूलना ही बेहतर समझता है वो!

तो वो भी भूल गयी! आया होगा, कैसे आया होगा, पता नहीं!

तीन दिन बाद की बात है,

अपने घर में ही थी सुरभि,

रात का समय था, अपनी पढ़ाई कर रही थी वो,

इसी सिलसिले में, उसे एक किताब की तलाश थी,

पूरा कमरा छान मारा उसने अपना,

फर्श, अर्श सब देख डाले,

नहीं मिले वो किताब! और का भी ज़रूरी!

कल जमा भी करना था कक्षा में,

कहीं किसी सहेली को तो नहीं दे दी?

फ़ोन उठाया, तो फ़ोन किया उसने,

पूछा, जवाब वही, कि नहीं है किताब उसकी उनके पास!

अब फिर से ढूँढा! न मिले!

अपने दूसरे कमरों में भी तलाश करे,

वहाँ भी न मिले!

छत पर गयी, वहाँ ढूँढा, वहाँ भी नहीं!

अब गयी तो गयी कहाँ?

चिंता लग गयी बेचारी को! क्या करे अब!

आई अपने कमरे में,

और जैसे ही नज़र पड़ी अपनी उन खुली किताबों पर,

तो वही किताब, दायें रखी थी उधर!

उसने दौड़ कर, झट से उठायी!

शायद निगाह न पड़ी हो उसकी!

उसने पलटे पृष्ठ,

और पलंग पर बैठ, कमरा लगा दीवार से,

पढ़ने लगी,

कुछ पंक्तियों को छांटा, और फिर,

एक सफ़े पर उतार लिया उसने!

देर रात तक, पढ़ती रही वो, और करीब डेढ़ बजे,

अपन काम फ़ारिग कर, किताबें करीने से रख,

चादर ओढ़, बत्ती बुझा, सो गयी सुरभि!

सुबह जब नींद खुली, तो पूरा कमरा गुलाब की ख़ुश्बू से महका हुआ था!

उसके नथुने भर उठे!

स्नान करने गयी, तो बाल्टी में, फिर से नीले रंग के छोटे छोटे फूल दिखे!

उसने उठाये वो, कुल चार थे, रख दिए एक जगह,

स्नानादि से निवृत हुई, तो वो फूल ले चली बाहर,

वस्त्र पहने, और दर्पण देखा, आज तो रूप ही निखर गया था उसका!

उसका गोरा रंग, आज गुलाबी आभा ले रहा था!

चली बाहर, माँ से मिली, पिता जी से मिली, अखबार पढ़ रहे थे पिताजी,

उनसे बातें कीं, वो फूल पिता जी को दिखाए, आ गए होंगे कहीं से, या गिर गए होंगे, बाहर भी तो ऐसे ही फूल लगे हैं शायद, या फिर माली के संग आ गए होंगे, बात टल गयी फिर से, और फिर चाय-नाश्ता भी आ गया!

तीनों ने मिलकर, चाय नाश्ता किया, वो भीनी भीनी महक, अब आने लगी थी!

अब इस से, माँ को क्या और पिता जी को क्या!

उसके बाद सुरभि तैयार हुई, माँ ने दोपहर का खाना तैयार कर दिया था,

आज कामवाली नहीं आई ही, उसकी तबीयत ठीक न थी,

तो आज माँ ने ही रसोई संभाल रखी थी!

खैर, अपना बैग संभाल, चल पड़ी अपनी कक्षा के लिए!

वहां पहुंची, तो सारा कक्ष जैसे डूब गया उस भीनी भीनी सुगंध में!

ऐसा कोई न था, जिसको वो महक न आ रही हो!

"क्या परफ्यूम में नहा कर आ यी है आज?" बोली कामना,

"नहीं तो?" बोली वो,

"सारा कमरा महक उठा है!" बोली कामना!

"लेकिन मुझे तो नहीं आ रही?" बोली वो,

"और आज क्या लगाया है चेहरे पर? दूध से नहायी है क्या?" बोली कामना,

"क्यों? कुछ नहीं लगाया?" बोली सुरभि!

"तो चमक कैसे रही है आज इतनी?" बोली कामना, हंस कर!

"चल! हमेशा ही मज़ाक!" बोली वो,

बाद में, जब कक्षा खत्म हुई, तो कैंटीन चलीं तीनों!

वहां एक लड़का भी था, यश, एक बिगड़ैल रईसज़ादा!

हमेशा से ही, रास्ता रोका करता था सुरभि का,

हालांकि सुरभि ने दो-टूक उत्तर दे भी दिया था उसको,

लेकिन बाज नहीं आया था, पिछले महीने वो गया हुआ था कहीं बाहर,

अब आया था, और आते ही, नज़रें लड़ाने की कोशिश किया करता था सुरभि से!

कोई चार बजे, जब सुरभि चली घर के लिए,

तो बाहर, एक चौराहा पार करते हुए, पारुल और कामना तो चली गयीं थी अपने पी.जी. में,

वे वहीँ, पास में ही रहा करती थीं, और सुरभि को आना था वापिस घर अपने, नॉएडा,

वो सड़क के बाएं चल रही थी, कि गाड़ी का हॉर्न बजा!

सुरभि ने पीछे देखा, ये यश था!

गाड़ी बराबर की उसने उसके, सुरभि चलती ही रही,

"आ जा सुरभि, वहीँ तक छोड़ दूंगा!" बोला वो,

सुरभि कुछ न बोली! चलती रही!

और वो भी चलता रहा, धीरे धीरे!

"गलत मत समझो! आ जाओ, बैठो!" बोला अब अदब से!

न सुना सुरभि ने, अपनी राह चली,

"अरे पीछे बैठ जाओ? हम ड्राइवर ही सही आपके!" बोली वो,

सुरभि ने गुस्से से देखा उसे!

और जैसे ही देखा,

गाड़ी के बोनट से, निकला धुँआ!

गाढ़ा, सफेद रंग का! यश उतरा, और जैसे ही बोनट उठाया,

वैसे ही आग लगी गयी, वायरिंग में आग लगी थी!

 
सुरभि ने ध्यान न दिया! और अपनी राह, चलती चली गयी!

न देखा पीछे मुड़कर! पकड़ी सवारी, और हुई सवार!

पहुंची घर, हाथ-मुंह धोये, कपड़े बदले, और लेट गयी!

लेटी, तो आँख लगी!

और जब आँख लगी,

तो कुछ दिखाई दिया उसे,

सपना था वो! लेकिन सपना ऐसा, कि सोते सोते भी होंठों पर, मुस्कुराहट आ गयी!

सपने में देखा,

एक उपवन है!

बहुत बड़ा!

बड़े बड़े पेड़ हैं उधर!

चीड़ के पेड़, ऐसे लगें जैसे पेड़ों के तनों पर,

झोंपड़ियां रख दी गयी हों!

पास में ही एक झरना बह रहा था!

नीला जल था उसका,

सूरज के किरणें, जब टकरातीं,

तो इन्द्रधनुष सा बन जाता था!

नीचे, जहां झरना गिरता था,

वहां ऐसा साफ़ पानी था कि,

नीचे का तल, साफ़ दीखता था!

वहां सफेद सफेद पक्षी भी थे,

और उनका मधुर शोर भी था!

पास में ही, वैसे ही ठीक उन फूलों जैसे ही, नीले फूल वो,

की झाड़ियाँ लगी थीं! फूल खिले थे सभी में,

गुच्छे बने थे फूलों के!

बर्रे आदि, सब रसास्वादन कर रह थे उनका!

महक फैली थी वहाँ!

घास, तोतई रंग की थी, मखमली, मुलायम!

उसने सफेद कपडे पहने थे!

शफ़्फ़ाफ़ सफेद रंग था, धूप जैसे और निखार देती थी उन्हें!

वो जगह, स्वर्ग का सा कोना लगती थी!

दूर पहाड़ियों पर,

बर्फ जमी थी, सफेद रुई के समान चमक रही थी वो!

जैसे, बादल नीचे उतर कर, उनकी चोटियों पर, विश्राम कर रहे हों!

तभी, एक तितली आकर बैठी उसके घुटने पर,

उस तितली का रंग, जामुनी, हरा और पीला था!

ऐसी तितली, कभी न देखी थी उसने!

वो तितली उडी,

और एक पीले रंग के फूल पर बैठ गयी!

सुरभि खड़ी हुई,

और चली आगे,

आगे गयी तो देखा,

फलदार वृक्ष लगे हैं,

आलूबुखारे अपना चटक रंग बिखेर रहे थे!

खुरमैनी लगी थीं!

हवा के संग, अपनी डाल सहित,

हिलती जा रही थीं!

बड़े बड़े कंधारी अनार लगे थे!

अनार के पेड़, लदे थे उनसे!

बड़े बड़े घंटी की आकार के, लाल-पीले फूल लगे थे उन पर!

थोड़ा और आगे चली वो!

सामने, खिन्नी के पेड़ देखे!

पीली-पीली खिन्नियाँ लगी थीं उन पर!

हाव चलती,

तो खिन्नियों की मनमोहक ख़ुश्बू,

नथुनों में समा जाती!

बड़े बड़े सुल्तानी गुलाब लगे थे!

हवा के संग, जैसे हिल, उसी को सलाम बजा रहे थे!

नरगिस के फूलों के पौधों की,

दूर तलक, कतार चली गयी थी!

उसके होंठों पर, मुस्कान तैर गयी!

वो मुस्कान, सोती हुई सुरभि के होंठों पर भी थी!

वो और आगे चली!

एक जगह,

बड़ा सा संग-ए-मरमर का पत्थर पड़ा था,

उसने टेक ली उस से, और खड़ी हो गयी!

हज़ारी गेंदों के फॉलो की महक उठी!

उसने पीछे देखा,

हर जगह लगे हुए थे वो!

हर जगह, पूरी ज़मीन ही पीली हुई पड़ी थी उनसे!

उसने फिर से टेक ले ली,

आँखें बंद हो गयीं उसकी!

और तभी,

उसके गाल से कुछ टकराया,

उसने आँखें खोली अपनी!

और छुआ गाल,

एक पत्ता था, छोटा था!

चटक हरे रंग का!

बीच में, एक रेखा थी उस पत्ते के,

सफेद रंग की! ये लफ़ीश का पत्ता था!

पूरा पेड़ ऐसा लगता है कि जैसे,

जन्नत से उखाड़ कर यहां लगाया गया हो!

कश्मीर में, मुग़लों के बागों में,

ये पेड़ लगवाये गए थे वहां! वे बहुत प्रकृति-प्रेमी थे!

हिन्दुस्तान में, अनार, अनानास, तरबूज, खरबूजा,

आड़ू, लीची, अमरुद आदि फल, वे ही लाये थे,

इनका श्रेय, उन्हीं को जाता है,

कश्मीर का सेब, वही लाये थे हिन्दुस्तान में,

बाबर, ऐसे हज़ारों पौधे और पेड़ों के बीज लाया था!

तो लफ़ीश का पत्ता था वो!

वो चली आगे,

एक जगह,

अंगूर की बेलें लगी थीं!

मोटे मोटे,

काले और हरे अंगूर!

उसने, एक काला अंगूर तोड़ा,

और खाया उसे, ऐसा मीठा,

के आँखें बंद हो गयीं उसकी!

इतने में ही आँख खुली उसकी!

उसने कितना प्यार सपना देखा था!

उठी, कपड़े सही किये,

तो दांत में कुछ फंसा सा लगा,

उसने निकाला, तो ये काले अंगूर का छोटा सा छिलका था!

मुंह में, अभी भी स्वाद बाकी था, उस मीठे अंगूर का!

उसने पानी पिया, तरज़ीह न दी इस ख्याल को, और लग गयी अपने दूसरे कामों में,

 
भाई का फ़ोन आया था,

तो भाई से भी बातें हुई उसकी, कुणाल ठीक था, पढ़ाई भी ठीक चल रही थी!

रात को खाना खाया उसने,

कपड़े बदले, और पढ़ाई करने बैठ गयी, पढ़ी देर रात तक,

रात गहराई, तो उसने फिर बत्ती बंद की,

नाईट-लैंप जलाया, और चादर ओढ़, सोने की कोशिश करने लगी,

जल्दी ही नींद आ गयी उसे!

नींद आई, तो फिर से एक सपना आया!

वो इस बार,

एक ऊंंची पहाड़ी पर थी,

दूर दूर तक, नीचे हरे-भरे पेड़ लगे थे!

दृश्य बहुत सुंदर था वो! वो मुस्कुरा पड़ी!

वो एक पत्थर पर जा बैठी,

ऊपर चोटी पर, बर्फ जमी थी,

बादल बातें कर रहे थे उस से उस समय!

उसकी नज़र, सामने बैठे दो खरगोशों पर गयी!

वे फुदक-फुदक कर, घास चर रहे थे,

सफेद रंग के थे, जैसे सफेद रंग के गोले हों!

वो कभी-कभी देख लेते थे सुरभि को!

और तभी एक आया उसके पास, आगे के पाँव उठा,

उसके घुटने पर पाँव टिका लिए उसने,

सुरभि ने, उसके सर पर हाथ फेरा!

उसके कानों पर, इतने में ही दूसरा भी आ गया वहां!

उसके सर पर भी हाथ फेरा उसने,

अब तो दोनों ही, जैसे दोस्त बन गए सुरभि के!

फुदक फुदक कर बार बार, सर पर हाथ फिरवाने चले आएं!

फिर वो उठी, और चली आगे,

थोड़ी दूर पर ही, एक छोटी सी झाड़ी पड़ी,

उस पर, गोल-गोल, पीले पीले बेर से लगे थे!

सुरभि ने तोड़ा एक, और खाया!

ऐसा मीठा, कि दो-चार और तोड़ लिए उसने!

उनमे गुठली तो थी, लेकिन ज़रा सी!

और मीठे ऐसे, कि जैसे शहद!

वो और आगे चली, जब चली, तो सामने एक खुला सा मैदान था, छोटा सा,

वहां, एक कक्ष बना था, जैसे पहाड़ी मकान हुआ करते हैं!

उसकी छत सुनहरी, और दीवारें लाल थीं!

सीढ़ियां बनी थीं उसमे जाने के लिए!

और उसके आसपास, रंग-बिरंगे फूल लगे थे!

क्या तितलिया, और क्या भंवरे! क्या बर्रे! उड़ रहे थे आसपास!

वो चल पड़ी, उस कक्ष के लिए,

सीढ़ियां चढ़ी,

और आई अंदर!

अंदर का नज़ारा देखा, तो जैसे महल!

छत का रंग सुनहरा था! बेल-बूटे बने थे, जगह जगह, नक्काशी ही, हुई थी!

छत के चारों कोनो में,

सफेद और नीले रंग के पत्थरों से बने, फूल लटक रहे थे!

चार फानूस लटके थे उसमे!

कांच के थे, सुरभि एक के नीचे खड़ी हुई,

और उस फानूस में, उसकी आकृति सैंकड़ों में बदल गयी!

वो मुस्कुरा पड़ी!

दीवारों पर, नक्काशीदार पत्थर जड़े थे!

दीवारों पर, फ़ारसी नक्काशी और पीले, सफेद और नीले रंग के चमकते हुए रत्न से जड़े थे!

वो चली दीवार के पास,

छुआ उसको,

एक भी दरार नहीं थी, जैसे पूरी दीवार पर, चित्र लगा हो!

ऐसा महीन काम किया गया था!

उसकी नज़र, बायीं तरफ पड़ी, वहाँ एक चौखट थी,

दरवाज़ा नहीं था उसमे,

वो चल पड़ी उस तरफ,

चौखट में घुसी,

जैसे ही घुसी, तो दंग रह गयी!

प्याजी रंग के बड़े बड़े पर्दे लटके थे उधर!

दीवारों पर, नक्काशीदार, जालियां लगी थीं पत्थरों की!

और एक, बड़ा सा पलंग रखा था वहां!

उसके पाये, सोने से बने थे!

फर्श, सफेद था, पानी जैसा सफेद!

अपना पूरा अक्स नज़र आता था उसमे!

पलंग पर, मखमली लाल, चादर पड़ी थी!

मोटे मोटे गद्दों पर!

और चार मसनद रखे थे उस पर!

मसनदों पर, काला मखमली कपड़ा चढ़ा था!

वो चली आगे, घूमी, अपनी कमर, पलंग की ओर के,

और झूल गयी पीछे!

कम से कम दस बार, वो रुकने से पहले, उस पलंग पर, झूलती रही!

उसकी मुस्कुराहट इस बार हंसी में तब्दील हो गयी थी!

ऊपर, छत पर, दर्पण लगा था,

ठीक पलंग के ऊपर!

पलंग जितना ही बड़ा था वो दर्पण!

वो उसमे, अपने आपको देखती रही!

देखती, और लरज जाती!

हवा चली, ठंडी हवा कमरे में आई, एक दीवार के पर्दे हिले!

खुश्बूदार हवा थी! हवा में सुगंध बस गयी थी जैसे!

उसे प्यास लगी,

उठी, कमरे में देखा उसने,

तो एक कोने में, एक पत्थर से बना छोटा सा चबूतरा था!

उस पर, नीले रंग के पत्थरों से, सुराही की सी आकृति बनी थी!

उस आकृति में, सुराही से, झरना बह रहा था! फूट रहा था,

फव्वारे के तरह! और चारों तरफ पानी बिखर रहा था!

 
वो चली उधर,

उधर, सो सुराही रखी थीं!

और दो ही गिलास, गिलास भी, शाही और सुराही भी शाही!

सोने से बने थे वे बर्तन!

उसने एक सुराही का ढक्क्न खोला,

सूंघ, तो केसर और खसखस के तेज ख़ुश्बू आई!

ढक्क्न रखा उस पर,

दूसरी सुराही से ढक्क्न उठाया,

सूंघा, कोई ख़ुश्बू नहीं! यही जल था!

गिलास में भरा, और पिया!

वो जल था या अमृत!

ऐसा मीठा! ऐसा स्वाद पानी का! जैसे सारी थकान मिट गयी हो!

वो लौटी अब बाहर,

उस दूसरे कक्ष में आई,

और अब चली बाहर!

बाहर आई, तो गुलाब बिछे थे हर जगह!

उसके रास्ते में, सीढ़ियों में!

वो चल पड़ी आगे!

आई बाहर,

और उस कक्ष के साथ चली!

जब चली, तो हवा भी चली!

सर्द सी हवा थी वो!

वो एक वृक्ष के नीचे चलने को हुई!

और जैसे ही वाहन पहुंची,

एक झूला टंगा था वहाँ!

झूला, बहुत पसंद था सुरभि को वैसे ही! झूलना!

वो बैठ गयी उस पर,

और वो झूला,

अपने आप ही झूल चला!

जब झूला झूल लिया,

तो चली आगे,

आगे एक झरना गिर रहा था!

और पास में ही,

आलूबुखारे के पेड़ थी,

आलूबुखारे,

ज़मीन से बस कुछ ही इंच नीचे थे!

वो चली उधर,

और एक आलूबुखारा,

तोड़ लिया, खाया उसे, ऐसी मिठास,

कि उसने एक और तोड़ लिया!

दो खाते ही,

डकार आ गयी थी उसे!

पेट भर गया था!

भरता भी क्यों नहीं!

आलूबुखारा, संतरे से बड़ा जो था!

वो अब चली वापिस,

जब चली,

तो फिर से गुलाब बिछे थे!

हर जगह!

वो मुस्कुरा पड़ी!

चलती रही!

आगे, वो कक्ष पार किये,

और आगे चली,

वो दोनों ही खरगोश बैठे थे,

उधर ही देखते हुए,

बाट जोह रहे थे जैसे उसकी!

उठा लिया एक को!

उसका एक पाँव गीला था,

दाग लग गया, कपड़े में उसके!

रात भर, वो उसी जगह पर घूमती रही,

और हुई सुबह!

अलार्म बजा!

वो उठी,

तो नज़र, अपने कपड़े पर लगे, दाग पर जा पड़ी! मिट्टी का वही दाग!

वो दाग, ठीक वहीँ था, सपने में जैसे लगा था, गरदन के नीचे,

उसने दर्पण में देखा, बड़ी हैरान हुई, फिर बिस्तर को देखा,

वहां कोई मिट्टी नहीं थी, अब उसने झाड़ा उसे, तो आसानी से झड़ गया!

उसके बाद चली स्नान करने वो,

और जब पहुंची, तो लाल रंग का एक छोटा सा फूल पड़ा था बाल्टी में,

ठीक वैसा ही, जैसे सपने में देखे थे, थोड़ा चकरा सी गयी वो,

आखिर, ये आते कहाँ से हैं ये?

खैर, पड़े रहने दिया वो फूल उसमे ही, पानी भरा,

और स्नानादि से फ़ारिग गो गयी वो,

वस्त्र पहने, केश संवारे, रूप उसका निखरता जा रहा था!

और बदन में, चुस्ती-फुर्ती के साथ साथ, कसाव भी दीखने लगा था!

आई बाहर, माँ से मिली, पिता जी से मिली, और चाय-नाश्ता भी आ गया,

चाय-नाश्ता किया उसने, उसके बाद अपना सामान उठाया,

और चल पड़ी अपनी कक्षा के लिए!

कक्षा में पहुंची,

और जा बैठी,

उसे आते ही, कक्ष फिर से महक पड़ा!

ख़ुश्बू ही ख़ुश्बू!

जैसे, उसके साथ ही चली आई हो वो सारी ख़ुश्बू बाहर से!

"आज फिर से परफ्यूम में नहा कर आई है क्या?" बोली कामना,

"तू फिर से?" बोली सुरभि!

"देख, तेरे आने से पहले, ये ख़ुश्बू नहीं थी, तू आई, तो पूरा कक्ष महक पड़ा है! अब बता!" बोली कामना,

"मुझे नहीं पता!" बोली वो,

दोपहर में, कैंटीन में बैठीं थीं वो,

अपना भोजन कर रही थीं,

तभी सामने से, वही लड़का, यश गुजरा,

उसको घूरता हुआ, और फिर मुस्कुराता हुआ, जा बैठा,

देखने लगा उसी को, सुरभि ने कोई ध्यान नहीं दिया!

 
जब खाना खा लिया, हाथ वग़ैरह साफ़ कर लिए,

तो चले कक्षा में, आज कुछ काम भी जमा कराना था,

करा दिया जमा,

और फिर चार बजे, उसकी सहेलियों ने काम जमा करा ही दिया था पहले, तो वो निकलीं वहां से,

कक्षा में सबसे आखिर में निकल पायी थी सुरभि,

बाहर आई,

और जैसे ही आई,

वही खड़ा था, यश!

वो उस से बचते चली, तो आ गया सामने!

"मेरी बात तो सुन लो?" बोला वो,

"हटो सामने से?" बोली वो,

"नहीं हटूंगा!" बोल वो,

तो वो जगह बनाते हुए चली!

और जैसे ही चली, उस यश ने, उसका हाथ पकड़ना चाहा!

और जैसे ही चाहा!

उसको जैसे किसी ने मारी लात खींच कर सीने में!

दूर जा गिरा!

कराह निकल गयी!

और सुरभि, निकल गयी वहां से!

उतर आई सीढ़ियां,

तेज कदमों से, बाहर चली, चौराहा पार किया,

ली सवारी, और चल पड़ी!

उसने ये भी न सोचा, कि यश को लात किसने मारी?

लात मारी, या उठा कर फेंका?

आखिर किसने? न सोचा, देखा भी नहीं!

अच्छा ही हुआ, ऐसा ही होना चाहिए साथ में उसके, यही सोचा बस!

खैर, पहुँच गयी घर, धोये हाथ-मुंह!

थोड़ा बहुत खाया, कपड़े बदले, और जा लेटी बिस्तर पर,

कीं आँखें बंद, नींद का झोंका आया, और बह चली वो उसमे!

फिर से सपना आया उसको!

इस बार,

वो एक समंदर किनारे खड़ी थी!

दूर दूर तक,

साफ़ पानी था उसका!

रेत ऐसी साफ़, कि मोती लगे!

पानी ऐसा साफ़,

कि कांच लगे!

नारियल के पेड़ लगे थे वहां!

बहुत सुंन्दर दृश्य था वो!

दूर समंदर में,

पानी के बड़े बड़े जहाज जैसे खड़े थे!

वो चली आगे,

शंख पड़े थे वहां,

सफेद, पीले और रंग-बिरंगे!

लाल रंग के केंकड़े, उसे देख,

झट से अंदर रेत में घुस जाते थे!

उसे बहुत अच्छा लगा उधर खड़े होना!

हवा चल ही रही थी,

उसकी नज़र, पानी में पड़ी,

लाल-सुनहरी मछलियाँ,

पकड़ा-धकड़ी में लगी थीं! कभी कभी तो, एक आद,

ऊपर भी कलाबाजी खा लिया करती थी!

वो और आगे चली,

किनारे के साथ साथ,

यहां वनस्पति बहुत ज़्यादा थी,

चारों तरफ, हरियाली ही हरियाली!

बैठ गयी एक जगह,

रेत पर ही,

एक नारियल के पेड़ों के झुण्ड के नीचे!

देखती रही समंदर!

बहुत प्यारा लग रहा था उसको वो!

समंदर की लहरें आतीं,

किनारे से टकरातीं,

और फिर से लौट जातीं!

बहुत सुकून दे रहा था ये नज़ारा!

और फिर, सागर का वो शोर!

कितना मधुर लग रहा था सबकुछ!

जे चाहता था, कि यहीं काट दी जाए,

पूरी की पूरी ज़िंदगी!

अलग!

सबसे अलग!

इस सारी दुनिया से अलग!

कोई चिक-चिक नहीं,

कोई झिक-झिक नहीं!

वो लेट गयी,

वो रेत, कैसे, कितना सुकून दे रहा था!

उन घरों के गद्दों से कहीं ज़्यादा आरामदेह!

ठंडा लग रहा था!

उसने अपनी ऊँगली से, उस रेत पर, नाम लिखा अपना!

अचानक से, एक सफेद फूल टपका उसके ऊपर,

उसके गाल पर,

उसने उठाया,

चम्पा जैसा फूल था!

लेकिन पूरा गुलाबी था!

बीच में से, नीला था!

और ख़ुश्बू ऐसी, कि मदमस्त कर दे!

उसने आँखें बंद कर ली,!

नारियल के पेड़ों के पत्ते जब हिलते,

तो सूरज की किरणें, छनती हुई,

उसकी बंद आँखों पर पड़तीं!

आँखों की बंद पलकों में, लाल-संतरी रंग घुल जाता!

उसने करवट ली एक तरफ,

तेज हवा चली!

उसके बल, उड़कर, उसके चेहरे पर आ गए,

उसने धीरे से, उँगलियों से हटाया उनको!

वो खड़ी हुई,

तेज हवा चली,

और उसके बदन के कपड़े,

जैसे चिपक गए उसके शरीर से!

जैसे उसको आगे बढ़ने को कह रहे हों!

वो आगे चली!

एक जगह रुक गयी!

कई झाड़ियाँ लगी थीं वहाँ,

पीले फूलों से लदी हुई थीं!

दूर समंदर में से एक आवाज़ आई,

जैसे किसी बड़े पानी के जहाज ने,

हॉर्न दिया हो, पूरे तीन बार!

वो मुस्कुरा पड़ी!

और जब झाड़ियाँ देखीं,

तो वे फूल उसके क़दमबोशी कर रहे थे!

वो उठी,

और उठाये वो फूल,

और रख दिए, वहीँ,

हाथ में पीला रंग चढ़ गया था उसके!

ये उनका पराग था!

वो आगे चली,

आगे, पानी आया हुआ था,

वो रुकी,

गीली रेत पर,

लहरों से बने झाग, बुलबुले बना रहे थे!

वो बनते, सतरंगा प्रकाश छोड़ते,

और फ़ना हो जाते!

वो मुस्कुरा पड़ी! सारी रात, वहीँ, उसी किनारे पर, घूमती रही वो!

अलार्म बजा,

और उसकी आँख खुली, छह बज चुके थे!

उसने अलार्म बंद कर दिया था, उठी अपने बिस्तर से, और चली गुसलखाने की तरफ,

जैसे ही दर्पण पर किया, वापिस हुई,

दर्पण में देखा, अपने बाल सही किये उसने,

और जैसे ही सही किये, अपने हाथों की उंगलियां देखीं उसने!

दर्पण में, और फिर, अपने हाथ की उंगलियां देखीं!

पीला रंग चढ़ा था उन पर! अब वो जा बैठी बिस्तर पर,

हाथ देखे फिर से, पीला रंग चढ़ा था अभी भी,

पंछ कर देखा, न पुंछा! उठी, चली गुसलखाने, और धोये हाथ,

पीला रंग धुल गया! लेकिन अब उसके दिमाग में, कुछ चलने लगा था!

ऐसा कैसे सम्भव है?

वो वाटर-कूलर?

वो अंगूर का छिलका और वो स्वाद?

वो खरगोश से लगा, कपड़े में दाग?

और अब ये, पीला रंग?

ये सब है क्या?

संयोग एक के बाद एक ऐसे तो कभी नहीं होते?

तो ये सब है क्या?

स्नान करने के लिए बाल्टी में पानी डालना चाहा,

तो फिर से, वही दो नीले फूल!

गुसलखाने में एक रौशनदान था,

लेकिन उसमे जाली लगी थी, और था भी ऊपर,

उसमे से ये फूल नहीं आ सकते थे,

आते भी, तो सीधा बाल्टी में ही न गिरते!

और वो महक, जो पूरे कक्ष में, कक्षा की, फ़ैल जाती थी,

वो सब क्या है?

और वो, यश की गाड़ी में, एन-वक़्त पर आग लगना,

और जब वो हाथ पकड़ना चाहता था, तो उसको किसने रोका?

किसने पिटाई की उसकी? अब दिमाग उलझ गया था उसका!

खैर, कपड़े पहने, केश संवारे और उठाया सामान अपना,

गयी, मम्मी-पापा के पास,

तो पिता जी किसी से बातें कर रहे थे,

 
बातचीत से पता चलता था कि, वे परेशान है किसी बात से,

चाय-नाश्ता आ गया था, वे चाय-नाश्ता करने लगे,

"पापा?" बोली सुरभि,

"हाँ बेटा?" बोले पिता जी,

"आज सुबह सुबह किस पर गरम हो रहे हो?" बोले वो,

"अरे वो अमृत लाल है, अब काम नहीं हुआ तो पैसे वापिस कर? न पैसे ही दे रहा है, और काम अब होने का नहीं, पैसे के लिए, रोज आज-कल, आज-कल कर रहा है!" बोले पिता जी,

"वो ज़मीन वाला?" पूछा सुरभि ने,

"हाँ, वही!" बोले वो,

"कितने पैसे दिए थे?" पूछा उसने,

"पांच लाख" बोले वो, गरदन हिलाते हुए,

"तो टेंशन न लो, आ जाएंगे पैसे!" बोली सुरभि,

हाथ पोंछे, उठी, हाथ-मुंह धोने गयी,

आई वापिस, हाथ पोंछे, कामवाली, खाना ले आई थी उसका, दिया उसे,

उसने रखा, और उठाया अपना सामान,

अपने मम्मी-पापा से बात की और चली बाहर!

ली सवारी, और चल पड़ी अपनी कक्षा के लिए,

जब वहाँ पहुंची, तो थोड़ी देर में ही खबर लग गयी उसे कि,

वो लड़का यश, अस्पताल में भर्ती है! पसलियां टूट गयी हैं उसकी,

कल यहीं से उस एम्बुलेंस में ले जाया गया था,

कारण का पता नहीं चला है अभी तक!

ये सुन, कान गरम हो गए सुरभि के!

उसने देखा था कि कैसे घसिटता हुआ गया था वो कल,

कराह निकल पड़ी थी उसकी!

दोपहर में, वो कैंटीन में बैठी थीं, भोजन किया जा रहा था,

बाहर हवा चल रही थी, तभी खिड़की के रास्ते,

हरसिंगार का एक फूल, उड़ता हुआ आया, और सीधा,

सुरभि के सीधे हाथ पर, ऊपर आ बैठा!

उसने उठाया फूल, सूंघा, वही ख़ुश्बू! वही, जो उसको,

उस कक्ष में घुसने से पहले आई थी!

उसने उस फूल को, आराम से उठाया, और रख लिया अपने बैग में!

उस दिन आधे घंटे पहले ही कक्षा समाप्त हो गयी,

तब चली वो अपने घर के लिए,

पर किया चौराहा, और ले ली सवारी! बैठी और चल दी,

बीच रास्ते में, एक जगह, उसको एक सड़क किनारे,

कुछ फूल पड़े मिले, गुलाब के, वैसे ही, बड़े बड़े!

सपना याद आ गया उसे, खो गयी सपने में!

याद आ गए वो बड़े बड़े गुलाब के फूल!

सपने में खोयी हुई सुरभि, आ गयी घर!

सामान रखा, हाथ-मुंह धोये, चाय पी, कुछ खाया थोड़ा सा,

और फिर चली आराम करने,

जा लेटी, एक किताब थी, वही पढ़ने लगी,

थोड़ी देर में ही, ऑंखें हुईं भारी, किताब रखी एक तरफ,

चादर ली, घुटनों पर ओढ़ी, और कर ली आँखें बंद!

आई नींद,

और जब नींद आई,

तो आया सपना!

इस बार,

वो एक रेगिस्तान में थी!

सर्द हवा चल रही थी!

उसे सर्दी लगने लगी थी,

आसपास देखा,

तो थोड़ा दूर, अलाव जलता हुआ दीखा उसे!

वो चल पड़ी उधर के लिए,

हवा ऐसी सर्द थी,

कि कंपकंपी छूट जाए!

वो तेज क़दमों से बढ़ चली उधर!

वो पहुंची वहां,

कुछ महिलायें, और कुछ पुरुष बैठे थे वहां,

उन्होंने, तम्बू लगाये हुए थे अपने,

कुल आठ या दस होंगे!

खानाबदोश लगते थे वो,

उसको देख,

एक महिला उठी,

और अपन गरम कपड़ा, जो एक कंबल सा था, दे दिया उसे,

और बिठा लिया अपने साथ,

महिलायें, कोई गीत गुनगुना रही थीं!

उस महिला ने, उसको खाने को कुछ दिया,

ये खजूर के मुलायम टुकड़े थे!

बहुत मीठे, और नरम!

कंबल ओढ़ने से, सुरभि की सर्दी कम हो गयी थी!

वो खजूर के टुकड़े खाए जा रही थी,

पुरुष उसे देखते, तो हंस देते, मुस्कुरा देते!

फिर उस महिला ने, एक सुरभि की उम्र की ही लड़की से कुछ बात की,

वो लड़की उठी, और आई सुरभि के पास,

मुस्कुराई, और हाथ किया आगे,

सुरभि ने हाथ बढ़ा, पकड़ लिया उसका हाथ!

वो उठ गयी, और वो लड़की, उसको ले चली एक तरफ,

जहां ले गयी, वो उसी का तम्बू था,

अंदर एक बड़ा सा बिस्तर बिछा था!

कंबल पड़े थे बड़े बड़े, फर लगा था उन पर,

उसको बिठाया गया उस बिस्तर पर,

और उस लड़की ने, पानी दिया, एक सुराही से निकाल कर,

सुरभि ने पानी पिया, और जैसे ही पिया, उसी पानी की याद आ गयी!

ठीक वैसा ही पानी था वो, जैसा उसने उस पहाड़ी पर बने, कक्ष में पिया था!

गिलास दे दिया वापिस, गिलास भी ठीक वैसा ही था!

वो लड़की आई उसके पास, तम्बू के मुहाने पर, पर्दा डाल दिया गया था,

अंदर अब लालटेन जल रही थी, अब सर्द माहौल से बचाव हुआ था,

"क्या नाम है तुम्हारा?" पूछा सुरभि ने,

"ह'ईज़ा!" मुस्कुरा के बोली,

हरे रंग की आँखें थीं उस लड़की की! जैसे, लौ जल रही हों!

"और आपका नाम?" पूछा उस लड़की से,

"सुरभि!" बोली वो,

नाम दोहराया उस लड़की ने उसका!

"आपको भूख लगी होगी, हम लाते हैं आपके लिए खाना!" बोली वो लड़की,

और चली गयी बाहर!

सुरभि, उस आरामदायक बिस्तर पर लेट गयी!

और कुछ ही देर में,

वो लड़की उसके लिए खाना ले आई,

उठी सुरभि,

दिया खाना उसको,

सुरभि ने पकड़ा,

एक कटोरे में, सब्जी थी,

खबूस-रोटियां थीं,

खाना शुरू किया सुरभि ने!

लाजवाब खाना था वो!

कभी नहीं खाया था उसने ऐसा खाना!

वो लड़की, पानी ले आई उसके लिए,

और रख दिया पानी,

बैठ गयी साथ ही!

सुरभि ने खाना खा लिया,

पेट भर गया था उसका, फिर पानी पिया,

और बातें शुरू हुईं उन दोनों के बीच,

"ये कौन सी जगह है ह'ईज़ा?" पूछा उसने,

"ये गाँव है, खरकश!" बोली वो,

"और ये है कहाँ? कौन सा देश है?" पूछा सुरभि ने,

"ये सु'आ'हारा है! आप इसे सहारा नाम से जानते हैं!" बोली वो,

"सहारा! रेगिस्तान?" बोली वो,

"हाँ! लेकिन यहां, एक नख़लिस्तान भी है, रु'आ'फ़ीज़ा! पास में ही!" बोली वो,

"अच्छा!" बोली वो,

मुस्कुरा पड़ीं दोनों!

"तुम बहुत सुंदर हो ह'ईज़ा!" बोली सुरभि!

"आप से ज़्यादा नहीं! सुरभि!" बोली वो लड़की!

मुस्कुरा पड़ीं दोनों!

बाहर, हवा चल रही थी, शोर हो रहा था रेत का, जो उड़कर, फिर से बैठ जाया करती थी नीचे!

 
हवा ऐसी तेजी थी, कि उस तम्बू की कनातें भी, अंदर की और दब जाया करती थीं, आवाज़ ऐसी कि जैसे तूफ़ान चल रहा हो! ये सहारा था! दिन में चिलचिलाती हुई गर्मी और रात में सर्द हवा! अपनी असल ज़िंदगी में, कभी रेगिस्तान न देखा था लेकिन आज देख रही थी! आज वो तु'आरेग लोगों के गाँव में थी! ये सच में, पक्के हाड़ वाले रेगिस्तानी लोग हैं! खानाबदोश, लेकिन ईमानदार! ये नमक के तिजारती हैं! आज भी इनका लाया नमक, दुनिया में सबसे अधिक पौष्टिक और खनिज-लवण वाला होता है! एक समय था, जब इनका नमक, पूरे यूरोप और भारतीय उपमहाद्वीप, चीन आदि में लाया जाता था! बरसों से, इनका यही काम है! अंदर तम्बू में, सर्दी तो नहीं थी, लेकिन सुरभि ने ऐसा माहौल कभी न देखा था, उसके रोएँ खड़े थे, ह'ईज़ा देख रही थी, उसने सुरबी का हाथ पकड़ा, और जब रोएँ देखे, तो मुस्कुराई!

"आपको सर्दी लग रही है?" बोली ह'ईज़ा,

"नहीं तो?" बोली वो,

"ठहरिये, अभी रात बाकी है, हम आपके लिए, खिच्चा लाते हैं!" बोली वो, और उठकर चली,

खिच्चा, ऊंटनी का दूध होता है, औटा कर, गाढ़ा बना लिया जाता है, ये सर्दी का तोड़ है! आधा कप पिया जाए, तो पसीने छुड़ा देता है!

ह'ईज़ा, ले आई खिच्चा, और दे दिया सुरभि को,

सुरभि ने लिया, उसमे पिस्ते पड़े थे, स्वाद खोये जैसा था उसका!

पी लिया उसने, और तब, कोई दस मिनट में ही,

बदन से गर्मी फूटने लगी!

ये था खिच्चा का कमाल!

क़ुदरत ने, सबकुछ जैसे सोच कर ही रखा होता है,

ऊँट, रेगिस्तान की नब्बे फी सदी समस्याओं को दूर करता है!

आवागमन, दूध, मक्खन, घी और खाल आदि इसी से प्राप्त किये जाते हैं!

हवा फिर से चली!

और कनातें फिर से अंदर झुकीं!

अब लेट गयी थी सुरभि, और ह'ईज़ा उसके साथ बैठ, देखे जा रही थी सुरभि को!

"आप सो जाइए!" बोली ह'ईज़ा,

मुस्कुरा पड़ी सुरभि!

"तुम नहीं सोओगी?" पूछा उसने,

"आप सोइये पहले, आप मेहमान हैं हमारे!" बोली ह'ईज़ा, मुस्कुराते हुए!

तभी अंदर वो महिला आई,

देखा सुरभि को, मुस्कुराई,

"अब सर्दी तो नहीं बिटिया?" पूछा उसने,

"नहीं, अब ठीक हूँ!" बोली वो,

"सो जाओ बिटिया! रात बाकी है अभी!" बोली वो,

उस महिला ने, एक कंबल उठाया, और मुस्कुराते हुए चली गयी बाहर!

"ये तुम्हारी माँ हैं ह'ईज़ा?" पूछा सुरभि ने,

"हाँ!" बोली वो,

"बहुत अच्छी हैं!" बोली सुरभि!

"हाँ, माँ अच्छी ही होती हैं!" बोली ह'ईज़ा!

हवे चली ज़ोर से!

तम्बू का मुहाना जैसे काँप उठा!

ह'ईज़ा उठी, और मज़बूती से कस दिया उस खाल के पर्दे को!

और वापिस आ बैठी!

वो रेगिस्तानी रात!

वो सर्दी भरी रात! वो खजूर के टुकड़े, हम्दा कहा जाता है उन्हें!

वो तम्बू! वो कंबल! और वो ह'ईज़ा! सब जैसे सच था!

सुरभि की आँख लग गयी थी!

तेज हवा चली!

मुहाने से अंदर आई,

मुंह से टकराई ठंडी हवा सुरभि के!

और आँख खुली!

उठ गयी थी सुरभि!

घड़ी पर नज़र पड़ी उसकी, सात बजे थे!

लेकिन, बदन, अब भी ठंडा था उसका!

उसने माथा छू कर देखा,

सर्द था माथा!

वो रेगिस्तानी सर्दी, जैसे अभी भी बदन में फुरफुरी के रूप में,

पैबस्त हो गयी थी सुरभि के! रोएँ अभी भी खड़े थे उसके!

उसके ज़हन में, एक शब्द गूँज रहा था,

तु'आरेग! वो उठी, और अपना कंप्यूटर चालू किया,

और ढूँढा ये शब्द!

मिल गया, ये एक रेगिस्तानी क़बीला था!

आज भी, सहारा के वासी हैं ये!

सब याद आ गया उसे!

वो हम्दा, वो खिच्चा!

वो सर्दी! वो कनात और वो महिला!

और वो, प्यारी सी, हरी आँखों वाली लड़की, ह'ईज़ा!

हैरान थी वो! और आई होंठों पर मुस्कान!

वो लड़की, ह'ईज़ा, उसके ख्यालों में बस गयी!

खड़ी ही, चली गुसलखाने, अभी भी जैसे,

उसी रेगिस्तान में थी वो!

रोएँ अभी तक खड़े थे उसके!

दोनों बाजू, अपने अंदर दबाये खड़ी थी!

मुंह में, अभी तक, खिच्चे का स्वाद बरक़रार था!

मुंह धोया, और चली बाहर,

माँ और पिता जी के पास!

पिताजी प्रसन्न थे उसके!

"आ बेटी! तेरा कहना था कि पैसे मिल जाएंगे! तो दे गया वो पैसे आज!" बोले वो,

मुस्कुरा गयी वो!

"छह महीने से, आज-कल कह रहा था! आज दे गया!" बोले वो,

"अच्छा हुआ पापा!" बोली वो,

समय हुआ खाने का,

और खाना खाया सभी ने,

कुणाल का फ़ोन आया था,

वो कल आ रहा था घर!

घर में उसके आने की ख़ुशी थी,

सुरभि भी, भाई का ही इंतज़ार कर रही थी!

रात हुई,

पढ़ने बैठी,

जैसे ही खोली किताब,

वो हरसिंगार का ताज़ा फूल,

उसी पृष्ठ पर था, रखा हुआ!

अभी तक, ख़ुश्बू थी उसमे!

मुस्कुरा पड़ी सुरभि!

उठाया उसने उस फूल को,

और रख दिया मेज़ पर, एक तरफ!

देर रत तक पढ़ी सुरभि, कुछ लिखा भी उसने,

और कोई डेढ़ बजे, उसने सोने की तैयारी की!

बत्ती बंद की, पानी पिया, नाईट-लैंप जलाया, चादर ओढ़ी,

और लेट गयी, जैसे ही लेटी,

वो उसी रेगिस्तान में जा पहुंची,

उस लड़की ह'ईज़ा के पास! कितनी प्यारी लड़की है वो ह'ईज़ा!

मुस्कान आई होंठों पर,

और फिर आई नींद!

 
जब नींद आई, तो फिर से सपना आया!

ये वही नख़लिस्तान था!

रु'आ'फ़ीज़ा!

ह'ईज़ा ने हाथ पकड़ा हुआ था सुरभि का!

"आओ, वो देखो!" बोली ह'ईज़ा!

सामने, एक तालाब सा था, बड़ा सा,

आसपास, सफेद सी रेत थी, एक और क़बीला आया हुआ था वहां,

लाल, मैरून कपड़े पहने थे उन स्त्री-पुरुषों ने!

सभी स्त्री-पुरुष, मज़बूत देह वाले, और गोरे रंग के थे!

उनकी लड़कियां, बेहद सुंदर थीं, ऐसे ही उनके नौजवान!

ह'ईज़ा को देख, सर झुकाते थे सभी!

"ये कौन लोग हैं ह'ईज़ा?" पूछा सुरभि ने,

"ये बे-दु'ईं क़बीला है!" बोली वो!

"कितने सुंदर लोग हैं ये!" बोली सुरभि!

"हाँ! लेकिन आप जैसा कोई नहीं!" बोली वो,

मुस्कुरा पड़ी सुरभि!

एक जगह, एक महिला ने बुलाया ह'ईज़ा को,

ह'ईज़ा, ले चली सुरभि को संग अपने,

उस महिला ने, सर पर हाथ फेरा सुरभि के,

गले से लगाया, और माथे को चूमा!

और, आँखों में उसकी, सुरमा भी लगा दिया,

सुरमा लगते ही,

सुरभि की आँखें, जैसे उस रेगिस्तान की चमक की आदी हो गयीं!

अब ज़ोर न पड़ रहा था आँखों पर!

मित्रगण, ये सुरमा, इसीलिए लगाया जाता है,

ये जहां आँखों को ठंडक पहुंचाता है, वहीँ तेज से तेज चमक का भी आदी बनाता है आँखों को,

यूँ कहें कि, ये आपके लिए सन-ग्लास का काम करता है!

सुरभि की बड़ी बड़ी आँखें, और सुंदर हो गयीं!

उस महिला ने, सुरभि के माथे पर, दायीं तरफ, एक चन्द्रमा सा भी बना दिया!

ये नज़रबट्टू था! नज़र-ए-बद से बचाने वाला!

सुरभि का मन किया कि,

अपनी ज़िंदगी, यहीं बिता दी जाए!

कितने भले और प्यारे लोग हैं ये!

कितना ममत्व है इन महिलाओं में!

उनके ऊँट, पानी पी रहे थे,

जिस तरह से, वे अपनी आगे के टांगों को मोड़ते थे,

उसको देख, सुरभि बिन मुस्कुराये न रह सकी!

तभी एक पुरुष आया,

आयु में, पिता समान था सुरभि के,

माथे पर हाथ फेरा!

सर पर हाथ फेरा!

और गले से लगाया उसने!

"ह'ईज़ा, अशुफ़ा के पास ले जाओ बिटिया को!" बोला वो,

"जी! ले जाते हैं!" बोली ह'ईज़ा,

और ले चली उसको वो एक तरफ,

एक तम्बू था वो, खाल का बना हुआ,

बाहर, रात में जले अलाव की लकड़ियाँ पड़ी थीं,

उन पर, पानी डालकर, बुझा दिया गया था,

पास में, बकरियां भी बंधी थीं,

उनकी मैं-मैं बड़ी प्यार लगी सुरभि को!

जैसे सारी बकरियां उसे ही देख रही थीं!

वो अंदर गए तम्बू के,

तो अंदर, एक बेहद ही खूबसूरत लड़की खड़ी थी,

यही थी अशुफ़ा!

उस क़बीले सरदार की बेटी!

आँखें, उसकी भी सुरमयी और हरी थीं!

सुरभि को देख, दौड़ी चली आई वो!

और लगा लिया गले से!

सुरभि भी, ऐसे मिली उसको कि जैसे,

न जाने कब से वाक़फ़ियत हो उन दोनों में!

अशुफ़ा ने, पानी पिलाया उसको!

गिलास, फिर उस जैसा!

और बिठाया, गद्दे पर!

खाने को, हम्दा दिया गया!

वही, मीठे खजूर!

सुरभि जैसे, अपने आपको,

वहीँ का हुआ मानने लगी थी!

अशुफ़ा, ह'ईज़ा से, सुरभि की सुंदरता के बारे में कहे जा रही थी,

और सुरभि,

सब सुने जाए,

यक़ीन करे उन पर,

और यही सोचे, कि, काश,

ये सपना न हो!

हक़ीक़त हो!

ऐसी हक़ीक़त, जिसकी वो अब तलबग़ार हो चली थी!

तु'आरेग और बे-दु'ईं लोग, सच में अपने लगने लगे थे उसे!

सुरभि को लगने लगा था कि जैसे वो भी इन्ही में से एक है! कितने अदब वाले लोग हैं ये!

तमाम ज़िंदगी यही कट जाए, तो उस से बड़ी कोई नैमत नहीं उसके लिए!

तेज हवा चली, और मुहाने का पर्दा हिला, अंदर तक आ गया,

ह'ईज़ा उठी, और पर्दे को कस के बाँध दिया, उसकी डोरियों को,

उन लट्ठों से बाँध, लपेट दिया!

"ह'ईज़ा?" बोली अशुफ़ा,

"हाँ?" जवाब दिया ह'ईज़ा ने!

"वो खिच्चा ला, दे सुरभि को!" बोली अशुफा,

"अभी लायी!" बोली वो, और चली बाहर,

"अशुफ़ा?" कहा सुरभि ने,

"हाँ, सुरभि?" बोली वो,

"मुझे भी यहीं रख लो!" बोली वो,

हंस पड़ी अशुफ़ा! सुरभि के गालों पर, दोनों हाथ रख दिए!

और चूम लिया उसका माथा!

"हम लोग, अलग हैं सुरभि! कर लगी बसर?" बोली अशुफ़ा!

"क्यों नहीं!" बोली जोश से,

"रात बीत जाने दो, सहर के बाद सोचना!" बोली वो,

रात! कितनी हसीन रात है ये!

रेगिस्तान! दूर-दराज में!

कुछ ही सूखे से पेड़ों के नीचे!

बाहर, अलाव जलते हुए!

हम्दा खाया जा रहा था सभी के द्वारा!

ये तम्बू!

लेकिन रात?

रात कहाँ है?

ये तो दिन है?

बाहर झाँका उसने, पर्दा हटा कर,

धूप खिली थी! चमक पड़ी रेगिस्तान की,

और नींद खुल गयी उसकी चमक से!

हाँफते हुए उठी सुरभि!

घड़ी देखी!

ढाई बजा था रात का!

लेकिन वो चमक?

ह'ईज़ा?

अशुफ़ा?

खड़ी हुई,

माथे पर, पसीने की बूँदें छलछला गयी थीं!

पोंछा माथा अपना,

जग से, गिलास में पानी डाला,

और पीने से पहले, वो गिलास देखा,

अपने आप ही, मुस्कान बिखर गयी होंठों पर!

'रात बीत जाने दो, सहर के बाद सोचना!' आये ये अलफ़ाज़ याद उसे!

मन ही मन, अशुफ़ा याद आई उसे!

कितनी प्यारी है वो! बड़ी बहन सा प्यार करती है!

काश, ये सपना न होता! काश..........

झट से पानी पिया, पानी का स्वाद, अजीब सा लगा उसे!

रखा गिलास, आखिरी घूँट अभी मुंह में ही था,

उसको, कई घूँटों में पिया, कि आ जाए वही स्वाद, किसी एक छोटे घूँट में!

न आया, पी लिया पानी!

जा लेटी, करवट ली, उसका गद्दा, जैसे पत्थर का सा बन गया था!

याद आ रहा था, वो फर वाला मोटा गद्दा!

आँखें बंद कीं उसने,

और कोशिश की नींद की!

आई नींद!

और फिर से, वहीँ, बे'दु'ईं क़बीले में जा पहुंची!

हाथ पकड़ रखा था अशुफा ने उसका,

उसके नाखूनों को सहला रही थी अशुफ़ा!

कोई गीत गुनगुनाते हुए!

 
"क्या गुनगुना रही हो?" पूछा सुरभि ने,

"एक लोक-गीत है(श'उआ'ज़ी कहा जाता है इसे)" बोली अशुफ़ा,

"क्या मायने हैं इसके?" पूछा सुरभि ने,

"मायने! एक क़बीला है, दूर-दराज में रहता है! नमक लाते हैं मर्द उनके, और औरतें, परिवार चलाती हैं, मर्द, महीने में, एक आद बार ही घर आते हैं, तो शाम को, ब्याहता औरतें, उनके आने का इंतज़ार करती हैं! वो अपने साथ, बर्तन, गहने, नए कपड़े, कंघियां और खाने का सामान लाते हैं! तो वो, चाँद से कहती हैं, कि तुम तो देख रहे हो उन्हें! ज़रा उनको मेरा भी संदेसा पहुंचा देना, कि रेगिस्तान में, कोई दिल उसके लिए धड़क रहा है! उसका इंतज़ार कर रहा है कोई! वे भी चाँद को देखते हैं, और यही गीत गाते हैं! ये यही है, यही है इसके मायने!" बोली अशुफ़ा!

"ओह! बहुत प्यार है! तो कोई आपका बाहर है अभी?" पूछा सुरभि ने,

"हाँ!" बोली वो,

"कौन?" पूछा सुरभि ने,

"मेरे खाविंद हुमैद और मेरे भाई!" बोली वो,

"क्या नाम है भाई का आपके?" पूछा सुरभि ने!

"फ़ैज़ान!" बोली अशुफ़ा!

फ़ैज़ान!

क्यों लगा ऐसा ये नाम सुनकर कि,

वो अपना सा ही है?

क्यों चेहरे के भाव बदल गए एक साथ?

क्यों लगा कि, ये गीत उसे भी गाना चाहिए?

क्यों लगा कि उसे भी इंतज़ार है?

माथे में शिकन पड़ीं!

होंठ सूख गए थे उसके!

खुली नींद!

पसीने में नहायी थी सुरभि!

नींद उड़ गयी थी आँखों से!

उठी वो,

अपने होंठ छुए,

सूख गए थे होंठ!

पानी पिया उसने,

और खिड़की के बाहर नज़र गयी!

चाँद!

चमक रहे थे!

जैसे देख रहे हों उसे!

वो चली खिड़की के पास!

खोल दिया उसे!

चाँद को देखा!

आज से पहले, ऐसे न देखे थे चाँद!

आज तो रूप बदल गया था!

मन किया, संदेसा भेज दूँ! अभी! इसी लम्हे!

खुली रहने दी खिड़की!

और होंठों पर,

एक मुस्कान चली आई!

अपने आप ही,

वो गीत निकलने लगा मुंह से!

वही, जो गुनगुना रही थी अशुफ़ा!

जा लेटी फिर से!

चाँद को देखते हुए ही!

चाँद, तो जैसे इंतज़ार कर रहे थे!

कि कब सुरभि संदेसा भेजे,

और वो जाकर खबर करें!

फिर से मुस्कान आई सुरभि के होंठों पर!

आँखें बंद कीं अपनी,

और चली गयी नींद के आग़ोश में!

अपने आपको,

उसी तम्बू में पाया!

खिच्चा ले आई थी ह'ईज़ा,

दिया गया सुरभि को,

उसने पिया, वही स्वाद, खोये जैसा!

"कब तक आएंगे वो?" पूछा सुरभि ने,

"कल-परसों में आने वाले हैं!" बोली वो,

कल या परसों!

बहुत दूर है कल!

और परसों तो शायद, साल सा बीतेगा!

ऐसे ख्याल आये दिल में!

खिच्च पी लिया गया था!

"आओ सुरभि!" बोली खड़ी होते हुए अशुफ़ा!

वो खड़ी हुई,

ह'ईज़ा भी,

और अशुफा, ले चली उसको,

जहां ले गयी, वो बड़ी ही सुंदर जगह थी!

एकदम साफ़!

जब एक क़बीला, ऐसे किसी नख़लिस्तान पर ठहरता है,

तो सारी साफ़-सफाई करके आगे बढ़ता है,

गंदगी का नामोनिशान नहीं रहता!

दूर से लाये हुए, खजूर के पौधे,

फूलों के पौधे, रूप दिए जाते हैं!

एक तम्बू, हमेशा तैयार रहता है,

उसमे खाना, दिशा-ज्ञान,

निकटतम शहर से दूरी,

कपड़े, कंबल आदी का इंतज़ाम किया जाता है,

ताकि कोई भूला-भटका वहां पहुंचे,

तो ये ज़ालिम रेगिस्तान,

उसकी जान न ले ले!

इस से, उन क़बीलों के नाम पर दाग नहीं लगे!

इसीलिए ऐसा किया जाता है,

जब भी कोई नया क़बीला वहाँ आता है,

तो ज़रूरत की सभी चीज़ें रख दिया करता है!

ये है, वहां का रिवाज़!

"कितनी सुंदर जगह है!" बोली सुरभि!

"आपको पसंद आई?" पूछा अशुफ़ा ने!

"बेहद!" बोली वो,

"हाँ, सुंदर जगह है!" बोली अशुफ़ा!

"नहाओगी?" पूछा ह'ईज़ा ने!

"हाँ!" बोली वो,

ले गयी एक सुरक्षित जगह!

वहां केवल औरतें ही जा सकती हैं,

मर्दों को मनाही होती है!

सभी पालन करते हैं इसका,

उसको स्नान करवाया गया!

खुशबूदार इत्र लगाया गया!

उसकी ऐसी खिदमत की,

कि सुरभि को दुनिया में सबसे भाग्यशाली होने का,

गुमान भर आया ज़हन में!

आ गयीं वापिस तम्बू में,

खाना लगाया गया,

सुरभि को खिलाया गया,

जब सुरभि ने खा लिया,

तो बाद में दोनों ने खाया,

हलीम-बिरयानी थी!

बेहद लज़ीज़ थी!

सुरभि को, बहुत पसंद आई वो!

पानी पिलाया गया उसको,

इस पानी का स्वद, ठीक वैसा ही था,

जैसा उसने उस सुराही से पिया था!

इस पानी में,

कुछ अलग ही स्वाद था!

कुछ अलग ही आनंद देता था!

जिस से, प्यास तो बुझती ही थी,

जिस्म में, ताक़त आ जाया करती थी!

और उसके थोड़ी देर बाद, शरबत पिलाया गया!

ऐसा शरबत उसने, कहीं भी, कभी भी, न पिया था!

जब सुरभि शरबत पी रही थी, तो अशुफ़ा उसको ग़ौर से देखे जा रही थी!

"ह'ईज़ा?" बोली अशुफ़ा,

"हाँ?" दिया जवाब उसने,

"ज़रा मुहाने पर खड़ी हो तो?" बोली अशुफ़ा,

ह'ईज़ा उठी, और हुई खड़ी, तम्बू के मुहाने पर,

तब अशुफ़ा ने, सुरभि को, बे'दु'ईं क़बीले की पारम्परिक पोशाक़ पहनाई,

लाल रंग का एक लम्बा सा कुरता,

लाल रंग की घुमावदार सलवार,

कमर में फीत कसे, सुनहरे रंग के,

छाती पर, एक छोटी सी, अचकन,

उसके भी फीत कसे, कमर के पीछे,

और सर पर बुर्क़े की तरह का कपड़ा,

और मुंह पर, नाक और होंठ ढके हुए, एक नीले रंग की, झीनी सी नक़ाब!

वल्लाह! आफ़रीन!

क़यामत सी बरपा हो गयी!

आसमान की कड़कती बिजली,

उस तम्बू में क़ैद हो गयी!

वो नक़ाब, किसका दिल न चीर दे!

किसकी निगाह को न चस्पा कर ले!

अशुफ़ा ने फौरन ही उसको एक गोल-दर्पण दिखाया!

जैसे ही अक्स पड़ा दर्पण में, कहीं चटक ही न जाता!

अपने आपको ही न पहचान पायी!

बस, उस झीनी नक़ाब में से, उसके सुर्ख गुलाबी होंठ, फ़ैल गए थे, एक झीनी मुस्कान के साथ!

अशुफ़ा ने दर्पण लिया वापिस,

और थाम लिया चेहरा सुरभि का, अपने दोनों हाथों में,

आँखों को, एक एक करके देखा!

और चूम लिया माथा उसका!

लगा लिया गले से, भींच लिया सुरभि को!

"ह'ईज़ा?" पुकारा अशुफ़ा ने!

आई अंदर ह'ईज़ा!

मुंह खुला रह गया उसका!

ऊपर से नीचे तक देखा!

 
Back
Top