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आई पास उसके,
आँखों से आँखें मिलायीं!
मुस्कुराई, और लगा लिया गले!
"आओ, आओ! बाहर आओ!" बोली वो,
और तब, अशुफ़ा, ह'ईज़ा, ले चलीं उसे बाहर!
जो देखता, थम जाता!
जो देखती, रुक जाती!
जो पानी भर रहा होता,
वो भूल जाता पानी भरना,
और फीत कस रहा होता,
रुक जाता! जो औरत, आ रही होती, रुक जाती,
उसको ग़ौर से देखती,
उसको नज़र-ए-बद से बचाने के लिए,
उसके सर पर, हाथ वारे जाते!
एक और लड़की आई उधर, भागते भागते!
रुकी उनके पास!
देखा उसने सुरभि को! झाँका आँखों में उसकी!
मुस्कुराई, और लगा लिया गले से!
"ये सुरभि हैं! हमारी ख़ास!" बोली ह'ईज़ा, सुरभि की बाजू थामते हुए! इतरा कर!
"सुरभि! ये फ़'ईमा हैं!" बोली ह'ईज़ा!
फ़'ईमा, बेहद सुंदर लड़की थी!
हरी आँखें, भूरे बाल और कसा हुआ बदन!
लेकिन सुरभि, आज सभी पर भारी पड़ रही थी!
"आइये हमारे साथ सुरभि!" बोली फ़'ईमा!
और हाथ पकड़ उसका, ले चली अपने साथ,
अपने तम्बू में लायी! बिठाया,
दूध पिलाया उसको, और खाने की भी पूछी!
तभी बाहर शोर सा हुआ!
दूर, क्षितिज पर, कुछ ऊँट नज़र आने लगे थे!
उनके साथ चलते हुए कुछ लोग भी!
"आ गए वे लोग!" बोली अशुफ़ा!
जैसे ही देखा सुरभि ने,
उसका दिल, ज़ोर से धक्!
क्यों?
किसलिए?
उसका तो कोई न था इस क़ाफ़िले में?
फिर दिल ज़ोर से धक्?
किस वजह से?
क्या बात हुई?
आँखें बंद हो चलीं!
"हुमैद आ रहे हैं! फ़ैज़ान भाई आ रहे हैं!" बोली अशुफ़ा!
और जब आँख खुली,
तो नींद टूट गयी थी!
सपना ख़त्म हो गया था!
लेकिन हाँ!
उन फीतों का कसाव, अभी भी उसकी कमर पर था!
वो कुछ सोचती, कि अलार्म बज उठा!
आज बड़ा ही बुरा सा लगा वो अलार्म!
आज पहली बार चिढ सी हुई उसे!
बंद कर दिया उसने उसे!
खड़ी हुई, खिड़की से बाहर झाँका,
संदेसा देने वाले चाँद अब न थे उधर!
वो उठी, खिड़की में से बाहर झाँका, न थे वो अब!
खिड़की बंद कर दी उसने,
और चली गुसलखाने तब,
'हुमैद और फ़ैज़ान आ रहे हैं!' शब्द गूंजे कानों में, उस अशुफ़ा के!
स्नान करने चली, तो दो नीले से फूल, बाल्टी में पड़े थे!
आज नहीं उठाये वो फूल,
भरा पानी, और स्नान किया,
बदन, महक उठा उसका!
कई बार कमर को छुआ उसने अपनी,
जैसे वो फीतें अभी भी कसी हों कमर पर!
वस्त्र पहने, केश संवारे, सामान उठाया,
और चली मम्मी-पापा के पास,
बातें हुईं उसकी, बैठ गयी, चाय-नाश्ता आ गया था,
वो किया, और खाना रख लिया अपने लिए!
निकल पड़ी घर से वो फिर, पकड़ी सवारी और जा पहुंची,
खुश-खबरी ये मिली कि,
उसने जो काम जमा किया था, वो सबसे अव्वल रहा!
सैंतीस छात्र-छात्राओं में से, अव्वल आना, अपने आप में, सफलता थी!
सभी ने मुबारकबाद दी! उसके प्रोफेसर ने ही, विशेष तौर पर!
खुश हो गयी थी सुरभि!
दोपहर में, कैंटीन में बैठीं थीं तीनों ही,
भोजन बस किया ही था,
कि खिड़की से, एक हरसिंगार का फूल,
घूमता हुआ, चला आया अंदर, गिरा हाथ पर उसके!
"अरे वाह! देख, फूल भी खिंचे चले आ रहे हैं तेरे लिए!" बोली कामना,
फूल उठा लिया था उसने, सुरभि ने,
सूंघा, तो वही ख़ुश्बू!
अपना बैग खोला उसने,
और जैसे ही खोला, वो दंग रह गयी!
एक बड़ा सा सुल्तानी गुलाब उसके बैग में रखा था!
उसने आहिस्ता से बाहर निकाला उसे,
"कितना बड़ा फूल!" बोली कामना!
"मैंने तो आज ही देखा है ऐसा बड़ा फूल!" बोली पारुल!
सोच में डूबी थी वो!
ऐसा, कैसे हुआ? कैसे आया बैग में?
सुबह तो था नहीं? न रात को रखा?
तो आया कहाँ से?
"असली है क्या ये?" आई आवाज़ एक,
ये अरिदमन था!
"हाँ!" बोली कामना,
उठ आया वो,
लिया हाथों में फूल,
"कमाल है! यहां का तो नहीं है!" बोला वो,
"फिर कहाँ का है?" पूछा कामना ने,
"मैंने तुर्की में देखे थे ऐसे बड़े गुलाब!" बोला वो,
"यहां भी तो होंगे?" बोली कामना,
"पता नहीं!" कहा उसने,
दिया वापिस फूल,
"ताज़ा भी है!" बोली कामना,
"हाँ, और रंग कैसा बढ़िया है!" बोली वो,
"सुर्ख लाल है!" बोली कामना,
और वो सुरभि!
खो गयी थी विचारों में!
कैसे आया ये फूल?
"ले, रख ले!" बोली कामना,
पकड़ा सुरभि ने वो फूल,
और रखा बैग में फिर से!
तीन बजे हुई वापिस उसकी,
सारे रास्ते वो यही सोचती रही!
ख्यालों में डूबी रही!
बैग खोला उसने,
तो वो गुलाब नहीं था उसमे,
एक ख़याल, और जमा हो गया पहले वालों में!
उसने बैग टटोल मार सारा,
नहीं मिला वो फूल!
जा पहुंची घर अपने, हाथ-मुंह धोये,
चाय पी, और कुछ खाया भी,
उसके बाद, कपड़े बदल लिए, और पढ़ने के लिए ले ली किताब!
लेकिन नींद कैसे आये!
वो फूल?
कहाँ से आया?
और कहाँ गया?
ये संयोग है क्या?
कहीं निकाल तो नहीं लिया कामना ने?
हो भी सकता है!
अक्सर ऐसा कर देती है वो!
और बाद में, बता भी देती है!
रख दी किताब उसने!
अब लेट गयी थी,
छत को देखे जाए!
फिर, खिड़की को देखा,
आँखों से आँखें मिलायीं!
मुस्कुराई, और लगा लिया गले!
"आओ, आओ! बाहर आओ!" बोली वो,
और तब, अशुफ़ा, ह'ईज़ा, ले चलीं उसे बाहर!
जो देखता, थम जाता!
जो देखती, रुक जाती!
जो पानी भर रहा होता,
वो भूल जाता पानी भरना,
और फीत कस रहा होता,
रुक जाता! जो औरत, आ रही होती, रुक जाती,
उसको ग़ौर से देखती,
उसको नज़र-ए-बद से बचाने के लिए,
उसके सर पर, हाथ वारे जाते!
एक और लड़की आई उधर, भागते भागते!
रुकी उनके पास!
देखा उसने सुरभि को! झाँका आँखों में उसकी!
मुस्कुराई, और लगा लिया गले से!
"ये सुरभि हैं! हमारी ख़ास!" बोली ह'ईज़ा, सुरभि की बाजू थामते हुए! इतरा कर!
"सुरभि! ये फ़'ईमा हैं!" बोली ह'ईज़ा!
फ़'ईमा, बेहद सुंदर लड़की थी!
हरी आँखें, भूरे बाल और कसा हुआ बदन!
लेकिन सुरभि, आज सभी पर भारी पड़ रही थी!
"आइये हमारे साथ सुरभि!" बोली फ़'ईमा!
और हाथ पकड़ उसका, ले चली अपने साथ,
अपने तम्बू में लायी! बिठाया,
दूध पिलाया उसको, और खाने की भी पूछी!
तभी बाहर शोर सा हुआ!
दूर, क्षितिज पर, कुछ ऊँट नज़र आने लगे थे!
उनके साथ चलते हुए कुछ लोग भी!
"आ गए वे लोग!" बोली अशुफ़ा!
जैसे ही देखा सुरभि ने,
उसका दिल, ज़ोर से धक्!
क्यों?
किसलिए?
उसका तो कोई न था इस क़ाफ़िले में?
फिर दिल ज़ोर से धक्?
किस वजह से?
क्या बात हुई?
आँखें बंद हो चलीं!
"हुमैद आ रहे हैं! फ़ैज़ान भाई आ रहे हैं!" बोली अशुफ़ा!
और जब आँख खुली,
तो नींद टूट गयी थी!
सपना ख़त्म हो गया था!
लेकिन हाँ!
उन फीतों का कसाव, अभी भी उसकी कमर पर था!
वो कुछ सोचती, कि अलार्म बज उठा!
आज बड़ा ही बुरा सा लगा वो अलार्म!
आज पहली बार चिढ सी हुई उसे!
बंद कर दिया उसने उसे!
खड़ी हुई, खिड़की से बाहर झाँका,
संदेसा देने वाले चाँद अब न थे उधर!
वो उठी, खिड़की में से बाहर झाँका, न थे वो अब!
खिड़की बंद कर दी उसने,
और चली गुसलखाने तब,
'हुमैद और फ़ैज़ान आ रहे हैं!' शब्द गूंजे कानों में, उस अशुफ़ा के!
स्नान करने चली, तो दो नीले से फूल, बाल्टी में पड़े थे!
आज नहीं उठाये वो फूल,
भरा पानी, और स्नान किया,
बदन, महक उठा उसका!
कई बार कमर को छुआ उसने अपनी,
जैसे वो फीतें अभी भी कसी हों कमर पर!
वस्त्र पहने, केश संवारे, सामान उठाया,
और चली मम्मी-पापा के पास,
बातें हुईं उसकी, बैठ गयी, चाय-नाश्ता आ गया था,
वो किया, और खाना रख लिया अपने लिए!
निकल पड़ी घर से वो फिर, पकड़ी सवारी और जा पहुंची,
खुश-खबरी ये मिली कि,
उसने जो काम जमा किया था, वो सबसे अव्वल रहा!
सैंतीस छात्र-छात्राओं में से, अव्वल आना, अपने आप में, सफलता थी!
सभी ने मुबारकबाद दी! उसके प्रोफेसर ने ही, विशेष तौर पर!
खुश हो गयी थी सुरभि!
दोपहर में, कैंटीन में बैठीं थीं तीनों ही,
भोजन बस किया ही था,
कि खिड़की से, एक हरसिंगार का फूल,
घूमता हुआ, चला आया अंदर, गिरा हाथ पर उसके!
"अरे वाह! देख, फूल भी खिंचे चले आ रहे हैं तेरे लिए!" बोली कामना,
फूल उठा लिया था उसने, सुरभि ने,
सूंघा, तो वही ख़ुश्बू!
अपना बैग खोला उसने,
और जैसे ही खोला, वो दंग रह गयी!
एक बड़ा सा सुल्तानी गुलाब उसके बैग में रखा था!
उसने आहिस्ता से बाहर निकाला उसे,
"कितना बड़ा फूल!" बोली कामना!
"मैंने तो आज ही देखा है ऐसा बड़ा फूल!" बोली पारुल!
सोच में डूबी थी वो!
ऐसा, कैसे हुआ? कैसे आया बैग में?
सुबह तो था नहीं? न रात को रखा?
तो आया कहाँ से?
"असली है क्या ये?" आई आवाज़ एक,
ये अरिदमन था!
"हाँ!" बोली कामना,
उठ आया वो,
लिया हाथों में फूल,
"कमाल है! यहां का तो नहीं है!" बोला वो,
"फिर कहाँ का है?" पूछा कामना ने,
"मैंने तुर्की में देखे थे ऐसे बड़े गुलाब!" बोला वो,
"यहां भी तो होंगे?" बोली कामना,
"पता नहीं!" कहा उसने,
दिया वापिस फूल,
"ताज़ा भी है!" बोली कामना,
"हाँ, और रंग कैसा बढ़िया है!" बोली वो,
"सुर्ख लाल है!" बोली कामना,
और वो सुरभि!
खो गयी थी विचारों में!
कैसे आया ये फूल?
"ले, रख ले!" बोली कामना,
पकड़ा सुरभि ने वो फूल,
और रखा बैग में फिर से!
तीन बजे हुई वापिस उसकी,
सारे रास्ते वो यही सोचती रही!
ख्यालों में डूबी रही!
बैग खोला उसने,
तो वो गुलाब नहीं था उसमे,
एक ख़याल, और जमा हो गया पहले वालों में!
उसने बैग टटोल मार सारा,
नहीं मिला वो फूल!
जा पहुंची घर अपने, हाथ-मुंह धोये,
चाय पी, और कुछ खाया भी,
उसके बाद, कपड़े बदल लिए, और पढ़ने के लिए ले ली किताब!
लेकिन नींद कैसे आये!
वो फूल?
कहाँ से आया?
और कहाँ गया?
ये संयोग है क्या?
कहीं निकाल तो नहीं लिया कामना ने?
हो भी सकता है!
अक्सर ऐसा कर देती है वो!
और बाद में, बता भी देती है!
रख दी किताब उसने!
अब लेट गयी थी,
छत को देखे जाए!
फिर, खिड़की को देखा,