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खान वो चिलचिलाती धूप उस सहरा की,
और कहाँ ये अन्धकार!
देख न सकी!
आँखें बंद कर लीं!
और फिर धीरे से खोलीं!
हुई खड़ी,
जाने लगी नीचे,
दरवाज़ा बंद किया,
उतरी नीचे, और सीधा अपने कमरे में!
पूरे सवा घंटे थी वो ऊपर!
यूँ कहो कि,
उस सहरा में! पूरे सवा घंटे!
सवा घंटे का इंतज़ार!
बहुत बड़ा होता है!
जब एक एक लम्हा, ऐसा लम्बा खिंचे,
कि उसकी शाम ही न हो!
इंतिहा ही न आये!
एक एक सांस,
सीने में घुट घुट के आये!
तो ये सवा घंटा तो,
एक ज़िंदगी के बराबर था!
घुट घुट के, एक ज़िंदगी काट ली थी उसने!
सुरभि!
ये बेचैनी नहीं है, तो फिर क्या है?
कमरे में गयी,
अपने को दर्पण में देखा,
अपनी चुनरी उठायी,
सर पर ओढ़ी,
और किया वैसे ही उस चुनरी को,
जैसे उस तम्बू में,
वो अपने दांतों में दबाये बैठी थी!
वो देखती रही!
और तब,
एक मुस्कान सी उभरी होंठों पर उसके!
दर्पण के करीब हुई,
और फिर, आँख से आँख मिलायी!
एक हया सी उतरी आँखों में,
लरज गयी अपने आप से ही!
न देख सकी वो,
हट गयी, वहाँ से, और चुनरी समेत, जा बैठी बिस्तर पर!
ये बेचैनी का आलम था! और बेचैनी! उसकी क्या कहूँ!
सुरभि ने क़ुबूल ही नहीं किया अभी तक!
चुनरी हटा ली थी मुंह से, और रख दी थी सिरहाने!
तभी माँ की आवाज़ आई उसे,
चली बाहर, जवाब देते हुए,
पहुंची माँ के पास, पिता जी भी आ चुके थे,
बैत गयी पास में उनके, पिता जी ने पैसे दिए उसको,
रख लिए उसने, और माँ ने खाना लगवा दिया,
तीनों ने खाना खाया फिर, कुणाल अपने ताऊ के पास था,
उसका रोज का यह हाल था, ताऊ-ताई के यहीं खाना खाता था वो!
खान खा लिया सुरभि ने, और चली अपने कमरे तक,
आई अंदर, पंखा चलाया, तेज किया,
और फिर, अपना बैग उठाया, रखा बिस्तर पर,
खुद भी बैठी वो, और बैग में से कुछ ज़रूरी सामान निकाल लिया,
बैग रखा एक तरफ, और उठा ली अपनी किताबें!
करनी शुरू की अपनी पढ़ाई,
घंटा भर पढ़ी वो,
और तभी, उसकी नज़र खिड़की पर पड़ी!
पड़वा के चाँद निकल आया था!
आज, बहुत सुंदर लग रहा था!
जैसे किसी सुंदर सी कन्या की किसी आँख का बिम्ब!
उसने रख दी अपनी किताब, बीच में अपना पेन फंसा कर!
सरकाई कुर्सी, और खोली खिड़की!
दीदार किये उसने चाँद के!
और चाँद भी, जैसे उसकी भोली बातों में आ गए!
करोड़ों लोग, चाँद को देख रहे होंगे,
लेकिन उस रोज, वो चाँद, केवल सुरभि को ही देख रहे थे, ऐसा लगा!
सुरभि, चौखट पर अपने दोनों कोहनियां रख,
हाथों में अपना चेहरा रख,
खड़ी हो गयी थी!
और अपलक, चाँद को निहारे जा रही थी!
"मेरा संदेसा ले जाओगे?" बोली मन से,
चाँद से मुखातिब हो कर!
"आज भी?" बोली वो,
अपलक देखे!
मुंह में, अपने सीधे हाथ की कनिष्ठा,
अपने दांतों में दबा, चाँद से मन ही मन, बातें कर रही थी सुरभि!
"कर दो आज भी एक एहसान?" बोली वो,
चाँद, जैसे मुस्कुराये!
चाँद पर, सुरभि की नज़र, जैसे सूराख किये जा रही थी!
सुरभि और झुकी थोड़ा,
अब उसकी भौंहों के पास थे चाँद!
मोटी मोटी आँखें, और उनकी पुतलियाँ,
ऐसी सुंदर लगें, कि देखने वाला बस, देखते ही रह जाए!
ऊँगली निकल ली उसने,
अब होंठ बंद कर लिए थे अपने!
पाँव हिलाने लगी थी अपने!
"ले जाओ संदेसा! बोलना, मुझे बुलाएं वो! याद आ रही है उनकी!" बोली मन ही मन!
फिर, चाँद को देखते हुए,
कुर्सी पर बैठ गयी!
एक अंगड़ाई ली उसने, कस कर!
और खिसका ली कुर्सी आगे!
खिड़की की चौखट पर, दोनों हाथ बिछा लिए!
और टिका दिया चेहरा उन पर!
याद आया उसको वो सहरा!
वो चिलचिलाती धूप!
वो ऊंटों के गले में बंधी घंटियाँ!
वो तेज हवाएँ!
वो रेत का उड़ना!
आँखें बंद हो गयीं उसकी!
उसका मन, ले चला था उसको उस सहरा में अब!
उसने देखा,
एक नागफनी है, बड़ी सी!
काफी बड़ी!
उसमे, कोटर बने हैं,
सफेद और चितकबरी सी चिड़िया हैं वहां,
मुंह में तिनका दबाये कोई,
कोई कृमि दबाये!
इस छोटी सी जान को, कितना ढूंढना पड़ता होगा!
छोटे से पंखों से, कितना आसमान पार करती होगी!
उस नागफनी में, फूल लगे थे, लाल और पीले रंग के!
हवा चलती, तो उनकी पंखुड़ियां, हिल कर,
अपने वजूद को उस हवा में जोड़ देती थीं!
और हवा, उनके वजूद को, दूर दूर तक ले जाती!
उसने आसपास देखा,
बाएं एक तरफ,
हरा-भरा झुरमुट था पेड़ों का!
वो वहीँ चल पड़ी,
सर पर कपड़ा बंधा था,
उसने उस से अपना मुंह ढका, और चल पड़ी!
हवा चलती, तो ठेलती उसके बदन को!
वो चली जा रही थी आगे आगे!
हवा के संग संग! जैसे हवा ही बता रही हो उसको पता!
वो वहां पहुंची, ये एक छोटा सा नख़लिस्तान था!
कोई तालाब नहीं था यहां, लेकिन एक कुआँ था उधर,
चौड़ा सा, उसने झाँक कर देखा उसमे.
पानी था उसके अंदर!
और साथ में ही, एक मांद बनी थी, शायद ऊंटों को पानी पिलाने के लिए!
वो एक पेड़ के नीचे जा बैठी,
पेड़, कांटेदार था वो वाला,
लेकिन छाया कांटेदार नहीं होती!
वो वहीँ बैठ गयी थी, पीछे ही, छोटे और मोटे, खजूर के पेड़ लगे थे!
उनके तनों से, कपड़े बंधे थे, क़तरन जैसे!
तभी उसको, दूर से, दो औरतें आती दिखाई दीं!
सर पर, घड़ा रखा था और हाथ में पीले रंग का पीपा पकड़ा था!
वो खड़ी हो गयी!
इंतज़ार किया उनके आने का!
वे औरतें, आती गयीं करीब!
और करीब! और करीब!
और आ पहुंचीं वहाँ!
सुरभि को देखा,
मुस्कुराईं वो!
बुलाया अपने पास,
नज़र उतरी, चिबुक पर छू कर!
उसके सर का कपड़ा ठीक किया उन्होंने!
और कहाँ ये अन्धकार!
देख न सकी!
आँखें बंद कर लीं!
और फिर धीरे से खोलीं!
हुई खड़ी,
जाने लगी नीचे,
दरवाज़ा बंद किया,
उतरी नीचे, और सीधा अपने कमरे में!
पूरे सवा घंटे थी वो ऊपर!
यूँ कहो कि,
उस सहरा में! पूरे सवा घंटे!
सवा घंटे का इंतज़ार!
बहुत बड़ा होता है!
जब एक एक लम्हा, ऐसा लम्बा खिंचे,
कि उसकी शाम ही न हो!
इंतिहा ही न आये!
एक एक सांस,
सीने में घुट घुट के आये!
तो ये सवा घंटा तो,
एक ज़िंदगी के बराबर था!
घुट घुट के, एक ज़िंदगी काट ली थी उसने!
सुरभि!
ये बेचैनी नहीं है, तो फिर क्या है?
कमरे में गयी,
अपने को दर्पण में देखा,
अपनी चुनरी उठायी,
सर पर ओढ़ी,
और किया वैसे ही उस चुनरी को,
जैसे उस तम्बू में,
वो अपने दांतों में दबाये बैठी थी!
वो देखती रही!
और तब,
एक मुस्कान सी उभरी होंठों पर उसके!
दर्पण के करीब हुई,
और फिर, आँख से आँख मिलायी!
एक हया सी उतरी आँखों में,
लरज गयी अपने आप से ही!
न देख सकी वो,
हट गयी, वहाँ से, और चुनरी समेत, जा बैठी बिस्तर पर!
ये बेचैनी का आलम था! और बेचैनी! उसकी क्या कहूँ!
सुरभि ने क़ुबूल ही नहीं किया अभी तक!
चुनरी हटा ली थी मुंह से, और रख दी थी सिरहाने!
तभी माँ की आवाज़ आई उसे,
चली बाहर, जवाब देते हुए,
पहुंची माँ के पास, पिता जी भी आ चुके थे,
बैत गयी पास में उनके, पिता जी ने पैसे दिए उसको,
रख लिए उसने, और माँ ने खाना लगवा दिया,
तीनों ने खाना खाया फिर, कुणाल अपने ताऊ के पास था,
उसका रोज का यह हाल था, ताऊ-ताई के यहीं खाना खाता था वो!
खान खा लिया सुरभि ने, और चली अपने कमरे तक,
आई अंदर, पंखा चलाया, तेज किया,
और फिर, अपना बैग उठाया, रखा बिस्तर पर,
खुद भी बैठी वो, और बैग में से कुछ ज़रूरी सामान निकाल लिया,
बैग रखा एक तरफ, और उठा ली अपनी किताबें!
करनी शुरू की अपनी पढ़ाई,
घंटा भर पढ़ी वो,
और तभी, उसकी नज़र खिड़की पर पड़ी!
पड़वा के चाँद निकल आया था!
आज, बहुत सुंदर लग रहा था!
जैसे किसी सुंदर सी कन्या की किसी आँख का बिम्ब!
उसने रख दी अपनी किताब, बीच में अपना पेन फंसा कर!
सरकाई कुर्सी, और खोली खिड़की!
दीदार किये उसने चाँद के!
और चाँद भी, जैसे उसकी भोली बातों में आ गए!
करोड़ों लोग, चाँद को देख रहे होंगे,
लेकिन उस रोज, वो चाँद, केवल सुरभि को ही देख रहे थे, ऐसा लगा!
सुरभि, चौखट पर अपने दोनों कोहनियां रख,
हाथों में अपना चेहरा रख,
खड़ी हो गयी थी!
और अपलक, चाँद को निहारे जा रही थी!
"मेरा संदेसा ले जाओगे?" बोली मन से,
चाँद से मुखातिब हो कर!
"आज भी?" बोली वो,
अपलक देखे!
मुंह में, अपने सीधे हाथ की कनिष्ठा,
अपने दांतों में दबा, चाँद से मन ही मन, बातें कर रही थी सुरभि!
"कर दो आज भी एक एहसान?" बोली वो,
चाँद, जैसे मुस्कुराये!
चाँद पर, सुरभि की नज़र, जैसे सूराख किये जा रही थी!
सुरभि और झुकी थोड़ा,
अब उसकी भौंहों के पास थे चाँद!
मोटी मोटी आँखें, और उनकी पुतलियाँ,
ऐसी सुंदर लगें, कि देखने वाला बस, देखते ही रह जाए!
ऊँगली निकल ली उसने,
अब होंठ बंद कर लिए थे अपने!
पाँव हिलाने लगी थी अपने!
"ले जाओ संदेसा! बोलना, मुझे बुलाएं वो! याद आ रही है उनकी!" बोली मन ही मन!
फिर, चाँद को देखते हुए,
कुर्सी पर बैठ गयी!
एक अंगड़ाई ली उसने, कस कर!
और खिसका ली कुर्सी आगे!
खिड़की की चौखट पर, दोनों हाथ बिछा लिए!
और टिका दिया चेहरा उन पर!
याद आया उसको वो सहरा!
वो चिलचिलाती धूप!
वो ऊंटों के गले में बंधी घंटियाँ!
वो तेज हवाएँ!
वो रेत का उड़ना!
आँखें बंद हो गयीं उसकी!
उसका मन, ले चला था उसको उस सहरा में अब!
उसने देखा,
एक नागफनी है, बड़ी सी!
काफी बड़ी!
उसमे, कोटर बने हैं,
सफेद और चितकबरी सी चिड़िया हैं वहां,
मुंह में तिनका दबाये कोई,
कोई कृमि दबाये!
इस छोटी सी जान को, कितना ढूंढना पड़ता होगा!
छोटे से पंखों से, कितना आसमान पार करती होगी!
उस नागफनी में, फूल लगे थे, लाल और पीले रंग के!
हवा चलती, तो उनकी पंखुड़ियां, हिल कर,
अपने वजूद को उस हवा में जोड़ देती थीं!
और हवा, उनके वजूद को, दूर दूर तक ले जाती!
उसने आसपास देखा,
बाएं एक तरफ,
हरा-भरा झुरमुट था पेड़ों का!
वो वहीँ चल पड़ी,
सर पर कपड़ा बंधा था,
उसने उस से अपना मुंह ढका, और चल पड़ी!
हवा चलती, तो ठेलती उसके बदन को!
वो चली जा रही थी आगे आगे!
हवा के संग संग! जैसे हवा ही बता रही हो उसको पता!
वो वहां पहुंची, ये एक छोटा सा नख़लिस्तान था!
कोई तालाब नहीं था यहां, लेकिन एक कुआँ था उधर,
चौड़ा सा, उसने झाँक कर देखा उसमे.
पानी था उसके अंदर!
और साथ में ही, एक मांद बनी थी, शायद ऊंटों को पानी पिलाने के लिए!
वो एक पेड़ के नीचे जा बैठी,
पेड़, कांटेदार था वो वाला,
लेकिन छाया कांटेदार नहीं होती!
वो वहीँ बैठ गयी थी, पीछे ही, छोटे और मोटे, खजूर के पेड़ लगे थे!
उनके तनों से, कपड़े बंधे थे, क़तरन जैसे!
तभी उसको, दूर से, दो औरतें आती दिखाई दीं!
सर पर, घड़ा रखा था और हाथ में पीले रंग का पीपा पकड़ा था!
वो खड़ी हो गयी!
इंतज़ार किया उनके आने का!
वे औरतें, आती गयीं करीब!
और करीब! और करीब!
और आ पहुंचीं वहाँ!
सुरभि को देखा,
मुस्कुराईं वो!
बुलाया अपने पास,
नज़र उतरी, चिबुक पर छू कर!
उसके सर का कपड़ा ठीक किया उन्होंने!