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सुलग उठा सिन्दूर complete

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दीपा की रूह फ़ना हो गई…दहशत के कारण अधमरी-सी नजर आने लगी वह, मगर यह सोचकर कि कहीं देव नाराज न हो जाए--तुम चाहे जो करो, मगर जो बताना है…लोटकर आने के वाद खुद ही बताएंगे ।"

गुस्से से उफनता हुआ वह गरजा-----"और तू कुछ नही बकेगी ?"

"नहीं ।"

जवाब में जगवीर ने एक झटके से अपनी कमर पर बंधी बेल्ट खींच ली-गुरांया-"अब भी नहीं?"

चमडे की चौडी वैल्ट के हवा में झूलते सिरे पर पीतल का चौडा "वक्कल' लगा हुआ था, जो रोशनदान से अन्दर प्रविष्ट होती धूप के दायरे में आकर शीशे की तरह चमका-उसकी चोट जिस्म पर पड़ने की कल्पना मात्र से दीपा के छक्के छूट गए चाहा कि सब कुछ बता दे, किन्तु एक वार फिर देव की याद आते ही बेली----" अगर तुमने मेरे साथ कोई जबरदस्ती करने को चेष्टा भी तो मैं चीखूंगो-चिल्लाऊंगी ---यहां लोग जमा हो जाएंगे।"

"मुझे धमकी देती है -चीख---- खूब चिल्ला…मेरा कुछ नहीं बिगड़ेगा-घूल में मिलेंगे तो तुम्हारे मनसूबे-मेरे साथ तू और तेरा पति भी फांसी के फन्दे पर झूलेगा।"

दीपा को यह वार भी खाली जाता नजर आया तो सकपका गई ।

"मुझ पर तेरी इन खोखली धमकियों का असर नहीं होगा।" उसने एक वार पुन: चेतावनी दी----"सलामत रहना चाहती है तो बता-तुम लोगों से उसका क्या सम्बन्थ है?"

बेचारी दीपा!

बताए भी तो कैसे?

उसने होंठ सी लिए और उसकी चुप्पी से जगबीर शायद समझ गया कि मार खाने के बावजूद वह इतनी जोर से नहीं चीखेगी कि आवाज मकान की सीमाएं तोड सके ।

और हुआ भी यही ।

एकाध वार और पूछने पर भी जब दीपा ने होंठ सिये रखे तो गुस्से में उफनते हुए जगबीर ने बेल्ट घुमाकर पूरी ताकत से उसके जिस्म पर मारी-पीतल के "बक्कल' की जोरदार चोट दीपा की पीठ पर पड़ी-दर्द के कारण वह तिलमिला उठी ।

जगबीर एक वार शुरु हुआ तो फिर इस तरह मारता चला गया, जैसे उसके सामने हाड-;मांस की नहीं, वल्कि रूई की बनी लड़की हो और सचमुच दीपा रूई की ही वनी मालूम पड़ रही थी, क्योंकि इस डर से अपने ज़बड़े उसने सख्ती के साथ भींच रखे थे कि कहीं हलक से चीख न निकल जाए----"मुंह से कराहे और दर्द की बिलबिलाहट निकल रही थी ।

हर चोट पर वह गूंगी मछली के समान तड़प उठती।

कैसी बिडम्बना थी उसके सामने?

वह पिट रही थी, किन्तु मुंह से चीख तक न निकाल सकती थी ।

वह फर्श पर गिर गई-क्रई जगह से कपडे फट गए…जिस्म पर जगह-जगह बने जख्मों से खून बहने लगा, मगर जगबीर ने बिजली की तरह घूमता बैल्ट वाला हाथ तब तक न रोका जब तक स्वय न थक गया ।

जव वह रुका तब तरह-हांफ रहा था ।

स्वयं को होश में रखने के दीपा ने लाख प्रयास किए मगर आंखे बन्द होती चली गई । "

देव वहुत ही ध्यान से जब्बार के चेहरे का निरीक्षण कर रहा था ।

इस केबिन में आने और वास्तविक स्थिति को जानने से जो जब्बार शेर की तरह गर्ज रहा था, वही इस वक्त चूहे से भी कहीं ज्यादा दीन-हीन नजर आने लगा…चेहरा इस कदर पीला पड़ गया कि हल्दी पुती हुई--सी महसूस हो रही थी।

'हत्या’ की कल्पना मात्र ने उसके होश उड़ा दिए थे ।

कुछ देर पहले जो दूसरों के लिए स्वयं 'आतंक' वना हुआ था, वह हल्का…सा झटका लगते ही इतना ज्यादा आतंकित हो उठा कि आंखों में थिरकते मौत के साए साफ नज़र आने लगे---कांपते स्वर में बोला----"न-नहीं-ऐसा मुझसे नहीं होगा ।"

"यह हमे करना पडे़गा ।" देव ने दुढ़त्तापूर्बक कहा । "

"क…क्यों..क्यों करना पडेगा?"

जब्बार' बौखला गया ।

" क्योंकि हम मज़बूर हैं---इसके अलावा हमारे पास कोई रास्ता नहीं है।"

"त-तुम मजबूर होगे ।" वह एक झटके से बोला----" म-मैं भला क्यों मजबूर होने लगा-इस सारे मामले से मेरा कोई सम्बन्थ नहीं है-इसे झमेले से मुझे दुर ही रखो-मुझे तुमसे कोई सौदा नहीं करना--जंगल से उठाकर लूट का माल और तुम्हारी पत्नी लाये----तुम जानो------समझो कि चेकपोस्ट पर मैंने कुछ देखा ही नहीं था-वात खत्म हुई ।"

"बड़ी ही जहरीली मुस्कराहट के साथ कहा देव ने-"तुम्हारे यूं कह देने से बात खत्म नहीं हो जाएगी जब्बार!"

"क्यों नहीं हो जाएगी?"

"पहले ही 'विस्तारपूर्वक समझा चुका हूं कि हम एक किश्ती में सवार हैं---वह किश्ती जो भंवर में फंस चुकी है और अब डूबती-सी नजर आ रही है, मगर याद रखो-अगर हमने प्रयास किए तो किश्ती किनारे लग सकती है, जबकि इसे डूबता जानकर इससे कूदने वाला हर हालत में भंवर में डूब मरेगा ।"

"म--मेरी समझ में कुछ नहीं आ रहा कि तुम क्या वक रहे हो?"

 


"हमें चेकपोस्ट से निकालने और उससे भी बढ़कर मेरे घर में घूसकर दीपा से बकवास करने की जो गलतियां तुम कर चुके हो भुगतनी ही होंगी-तुम या मैं चाहकर भी अब…दामन झाड़कर इस झमेले से निकल नहीं सकते----घबराकर तुम्हारे तुम्हारे यूं अलग हो जाने से इस असफल प्रयास का एक ही मतलब है-जगबीर की सफलता---- और उसकी सफलता का मतलब है -- उसके हाथो हमारा खात्मा----- या अगर वह गिरफ्तार हो गया तो क्या मैं और तुम खुद को अदालत में इस झमेले से दूर साबित कर सकेंगे ?"

जब्बार को लगा देव ठीक कह रहा हेै---उसकी बात सटीक और तर्क संगत थी--इस झमेले से खुद को साफ बचाकर निकल ले जाने का कोई रास्ता नजर न आया और जगबीर की हत्या किए जाने की कल्पना मात्र उसके होश उडाये दे रही थी…बोला---;"'म-मगऱ मैं जगबीर की हत्या नहीं कर सकता ।"

“क्या तब भी नहीं जबकि मैं तुम्हें इस बात की पूरी गारंटी दूं कि कोई पुलिस…कोई अदालत तुम्हें जगबीर का हत्यारा नहीं समझेगी ।"

"क-क्या मतलब?"

"तुम पुलिस वाले हो और पुलिस वाले सर्वशक्तिमान होते हैं-- चाहे जिस घटना को चाहे जो रूप में अदालत के सामने पेश कर सकते हैं ।"

"क्या बकवास कर रहे दो तुम? "

हल्की-सी मुस्कान के साथ देव ने कहा-"जिन हालातों में तुम जगबीर को गोली मारोगे वे हालात ऐसे होंगे कि कोई भी यह कल्पना तक न कर सकेगा कि तुमने उसे अपने स्वार्थवश गोली मारी है----आदालत और सारे पुलिस वालों की नजरों में तुम्हारी वह हरकत एक मुजरिम विरुद्ध की गई एक पुलिस की कार्यवाही होगी----तुम अपने अफसरों और दूसरे पुलिस वालों के सामने-खुले आम-अपने सर्विस रिवॉल्वर से जगबीर को शूट करोगे औरे बाद में वहीं अफसर तुम्हारी वहादुरी की तारीफ करेंगें---मुमकिन है कि अगली छब्बीस जनवरी को तुम्हें एक खतरनाक डाकू को मार गिराने के सिलसिले में विशेष रूप पुरस्कृत भी किया जाए ।"

"य-यह सब कैसे होगा?" अपने प्रयास में अर्द्धसफलता मिलने पर देव ने एक गहरी सांस ली ।

एक नई सिगरेट सुलगाने के वाद वह बोला…"हम एक टाइम फिक्स कर लेगे, उस फिक्स टाइम पर तुम्हारे आँफिस के फोन की घण्टी बज उठेगी-उस वक्त आँफिस में तुम्हारे अलावा तुम्हारा कोई मातहत भी होगा-याद रहे, रिसीवर तुम्हें नहीं उठाना मातहत उठाएगा, फोन पर इस तरफ मैं-होऊंगा--रिसीवर के उठाए जाते ही मैं पूछूंगा कि वह कौन बोल रहा है----बह बतायेगा--मैं रिसीवर किसी अधिकारी को देने के लिए कहुंगा, जाहिर है कि वह मुझसे कारण पुछेगा---मैं खुद को जल्दी में दर्शाता उससे कहूँगा कि मैं ट्रेजरी लुटेरे के सम्बन्थ में इंफॉरमेशन देना चाहता हूं, समय कम है अत: जल्दी से अपने किसी अफ़सर से वात कराये---उसके अफसर के नाम पर उस वक्त वहाँ तुम अकेले होगे-स्वाभाबिक है कि -वह रिसीवर तुम्हें ही देगा !"

"यकीनन ।" जब्हार ने कहा…"मगर फिर?"

"तुम्हरे 'हैलो' कहते ही मैं कहुंगा कि यदि मुझे दस हजार रुपये इनाम मिले तो मैं ट्रेजरी के लुटेरों में से एक का पता बता सकता हूं---तुम स्वाभाविक अन्दाज में पूछोगे कि तुम कौन है और कहां से बोल रहा हूं--जवाब में मैं क्रहुंगा कि फिलहाल मैं अपना नाम-पता नहीं बता सकता, लुटेरे के पकड़े जाने के बाद इनाम पाने खुद थाने आऊंगा, अत: 'यदि आप लुटेरे को गिरफ्तार करना चाहते तो पता नोट करे----इतना सुनते ही तुम अपने मातहत को पता नोट करने का हुक्म दोगे----इधर से मैं तुम्हें पता बताऊंगा, उथर तुम मेरे शब्दों को दोहराते रहोगे, ताकि मातहत पूरा पता नोट कर सके-यह पता मेरे घर का होगा ।"

" फ--फिर ?" जवार ने थूक निगला ।

देव ने एक और कश लगाने के बाद आगे कहा-"पता लिखने के बाद मैं तुमसे कहूंगा कि इस एड्रेस पर एक पति-पत्नी रहते है, उन्हे रिवॉल्वर की नोक पर धमका रखा है और उन्हें आतंकित करके जबरदस्ती वहाँ पनाह लिए हुए हैं---अतः पुलिस की सारी कार्यवाही इस ढंग से हो कि लुटेरा बेगुनाह पति-पत्नी को कोई नुकसान न पहुचा सके ।"

"इसके बाद?"

"फोन करने के बाद मैं घर पहुच जाऊंगा, दीपा को हमारी योजना के बारे में पहले ही से पता होगा…उथर तुम रिसीवर रखते ही एक्टिव नजर आओगे-अपने अफसरों को इस अज्ञात फोन की सूचना दोगे, तुम सच बोल रहे हो इस बात का गवाह तुम्हारा मातहत होगा ।"

"मैं समझ रहा हूं।" देव ने पूछा-""तुम खुद ही बताओ किं इसके वाद अफसर क्या कहेगें ?"

"ये भी केई पूछने वाली बात है, जाहिर है कि तुम्हरे एड्रेस पर छापा मारा जाएगा ।"

"गुड ।" देव बोला---“अज्ञात व्यक्ति ने इस्कॉरमेशन तुम्हें दी है यानी तुम इस मामले के हीरो होगे…अतः छापा मारने को पुलिस टीम में तुम शामिल होगे ।"

"स्वाभाविक है ।"

"' तुम उन पति-पत्नी की सुरक्षा की दलील के साथ जिन्हें ट्रेजरी लुटैरे ने कवर कर रखा है, यह सलाह दोगे कि छापा सादे वरत्रो में , इस ढंग से मारा जाए कि लुटेरा पति-पत्नी को कोई नुक्सान न पहुचा सके-यानी पहले मकान को चुपचाप चारों तरफ से घेर लिया जाए और फिर हमला एकदम इस तरह किया जाए कि लुटेरे को कुछ करने का अवसर ही न मिले।"

" मेरे अलावा दूसरे अफसर भी ऐसी ही कोई योजना बनाएंगे, क्योंकि कानूनन हम सौ मुजरिमों को गिरफ्तार करने के लिए भी किसी एक बेगुनाह की जान को खतरे में नहीं डाल सकते ।"

"मैं जानता हूं इसीलिए यह स्कीम बनाई है----खैर, जव गुप्त रूप से मेरे मकान को घेरा जाए तब तुम्हारी डयूटी मकान के पिछले हिस्से में ही लगे, यह इंतजाम तुम्हें करना ।"

"हो जाएगा, मगर इससे फायदा?"

"मकान में घुसने के अन्य सभी रास्ते क्योंकि उस वक्त बंद होंगे अत: सादे लिबास में पुलिस बीम मुख्यद्वार ही खटखटाएगी----उस वक्त मैं और जगबीर बेडरूम में होगे , दीपा ड्राइंगरूम मे-द्रोनों कमरों के बीच का दरवाजा बंद होगा-की हाल के जरिये कमी मैं और कभी जगवीर ड्राइंगरूम में झांक रहे होंगे-उस वक्त मैं बौखलाने की एस्टिंग करके जगबीर से कहुंगा कि-"अरे । उस को तो मैं पहचानता हूं---वह पुलिस अफसर है, उसे मैंने चेकपोस्ट पर देखा था---वह सुनते ही जगबीर का बौखला जाना स्वाभाविक है, मैं उससे कहूँगा कि शायद पुलिस वालों को यहाँ तुम्हारे या दौलत होने का शक हो गया ----वडी स्वाभाविक बात है कि उस वक्त जगबीर के दिमाग में वहाँ से भाग जाने के अलावा दुसरी बात नहीं आएगी----भागने का एकमात्र -रास्ता बेडरुम की वह खिड़की होगी,

जो मकान के पिछले हिस्से में है…मैं उसे वहां से फरार हो जाने के लिए प्रोत्साहित करूगा ओंर मजबूरी में फंसा वह ऐसा ही करेगा ।"

"पीछे मैं मोजूद होऊंगा ही, अत: भागते हुए ही जगबीर को गोली मारकर उसका काम तमाम कर दूंगा ।"

"खेल खत्म पैसा हजम ।" देव बोला…"फायर करने से पहले तुम उसे इतनी जोर से चीखकर रुक जाने की चेतावनी दोगे कि जिसे तुम्हारे अफसर सुन सकें-इस चेतावनी पर जगबीर रुके या न रुके, मगर तुम्हें फायर कर… देना है…जिस्म के ऐसे हिस्से पर जहाँ गोली लगते ही वह ढेर हो जाए….याद रहे, वह मरना चाहिए----- अन्य अफसरों के वहाँ पहुचने तक भी उसमे कोई सांस ऱह गया तो वह हमारे सारे किए-धरे पर पानी फेर जाएगा ।"

"मगर हमें हिदायत होती है कि हम भागते हुए मुजरिम की टांग पर गोली मारें जिस्म के किसी ऐसे संवेदनशील स्थान पर नहीं जहाँ लगने से उसकी मौत हो जाए-उसके इस तरह मरने पर अफसर मुझसे तरह-तरह के सवाल का सकते हैं ।"

"तुम्हारे पास एक माकूल जवाब होगा ।"

"क्या ?"

. "चेतावनी के बावजूद जब वह नहीं रुका, भागता ही रहा तो तुमने विवश होकर उसकी टांग पर गोली चलाई-संयोग से उसी क्षण वह भागता हुआ किसी वस्तु से ठोकर खाकर गिरा-जिस वक्त वह लड़खड़ाकर गिर रहा था तभी टांगो पर चलाई गई गोली उसके सिर में लगी ।"

 


"यह तो किसी को भी ‘एनकाउन्टर' दिखाने' की पुलिस की बहुत पुरानी दलील है ।"

"जानता हूं और मैं तुम्हें वही इस्तेमाल करने की हिदायत दे रहा हूं , कियेंकि पुलिस इस नायाब तरीके की आजतक कहीं कोई काट पैदा नहीं हो सकी है ।"

इस बार जवार कुछ बोला नहीं, चुपचाप देव को घूरता हुआ शायद यह सोचता रहा कि इस आदमी से वह ऐसी नायाब स्कीम की ख्वाब में भी कल्पना नहीं कर सकता था-उसे मानना पड़ा कि सामने बैठे देव नामक व्यक्ति के मस्तक के अंदर खतरनाक मस्तिष्क छुपा हुआ है ।

" कैसी लगी योजना, क्या तुम्हें इस सारे ड्रामे में कहीं कोई ऐसा 'झोल' या 'छिद्र' नजर आया जिसके जरिये तुम्हारा कोई अफसर या कानून यह जान सके कि हम आपस में मिले हुए हैं और जगबीर की हत्या स्वार्थवश की गई है?"

"योजना तो तुम्हारी निस्सन्देह 'फुलप्रूफ' है, परन्तु ।”

" परन्तु ?"

"इस पर अमल करना उतना आसान नहीं है जितनी आसानी से तुमने योजना सुना दी ।"

"अमल तो हमेशा ही कठिन और जोखिम-भरा होता है इस स्कीम में उतने खतरे नहीं हैं, अगर हम थोडी सी हिम्मत----थोड़ा-सा साहस करें तो सफ़ल हो सकती है और यदि 'हम जगबीर के हाथों मरना या कानून की गिरफ्त से बचते हुए पांच-पांच लाख के मालिक बनना चाहते हैं तो स्कीम को अमल करने का हौंसला हमें जुटाना ही होगा ।"

"मान लिया कि यह सब हो गया, उसके बाद क्या होगा ।”

" बाद से मतलब ?"

"जगबीर के मरऩे के बाद पुलिस तुम्हारे और दीपा के बयान लेगी, क्या बयान दोगे … पुलिस जानना चाहेगी कि अज्ञात फोनकर्ता कौन था, हम किसे पेश करेगे?"

"'मैं खुद को पेश करूंगा ।"

" तुम ?"

" मैं कहूंगा कि पिछली रात किसी ने ,हमारे मकान का दरवाज़ा खटखटाया, उस वक्त मैं और दीपा सो रहे थे--शायद तीन-चार , बार दरवाजा खटखटाये जाने पर मेरी नींद टूटी…मैंने यह सोचकर कि जाने रात के इस ववत कौन है, दरवाजा खोलने से पहले पूछा --- जब बाहर से आवाज आई-"पुलिस'… सुनते ही मैं यह चकरा गया कि रात के इस वक्त मुझ शरीफ शहरी के दरवाजे पर भला पुलिस का कंया काम-- हड़बड़ाकर दरवाजा खोला और दरवाजा खुलते ही किसी जिन्न की तरह वह खतरनाक आदमी अंदर घुस आया…मेरी कनपटी पर रिवॉल्वर रख दिया…-घिन्धी बंध गई -तभी से हम उसकी रिवॉल्वर की नोक पर डरे, सहमे और आतंकित से अपने ही धर में कैद हैं ।"

"फिर तुमने पुलिस को फोन कैसे कर दिया?"

"सुबह हुई, आँफिस का टाइम हुआ…मैं उसके सामने गिडगिड़ाया कि वह मुझें छुटटी की अर्जी के लिए आँफिस जाने दे, अगर विना अर्जी के छुटटी ली तो मेरी नौकरी जा सकती है-काफी गिडगिडाने परं उसने मुझे इस शर्त पर भेज दिया कि अर्जी देकर तुरन्त ही वापस आ जाऊंगा…घमकी दी कि यदि मैंने पुलिस या अन्य किसीसे भी उसके यहां होने का जिक्र किया तो बीबी को मार डालेगा----. बावजूद मैंने आँफिस में अर्जी देने के बाद लौटते वक्त एक बूथ से फोन कर दिया ।"

"फोन अज्ञात बनकर क्यों किया?"

"यह सोचकर कि यदि किसी वजह से पुलिस उसे गिरफ्तार करने में नाकामयाब न हो जाए, तो उसके कहर से और अपनी बीबी को यह कहकर बचा सकू कि जाने किसने को सूचना दी थी ।"

एक बार फिर जब्बार कोई सवाल न रहने के कारण चुप रह गया, जबकि कुटिल मुस्कराहट के साथ देव ने कहा---"कैसी रही?"

"यानी इनाम के …दस हजार मार लेने की भी तुमने एक सुदृढ़ -योजना बना रखी है?"

"हम बराबर के पार्टनर हैं यानी पांच मेरे, पांच तुम्हारे ।"

" मगर तुमने शायद यह नहीं सोचा कि जगबीर की मौत के बाद पुलिस तुम्ही से पूछेगी कि ट्रेजरी से लुटा गया दस लाख कहां है ? "

"मुझे क्या मालूम?" देव ने कहा…"मैं ओंर दीपा भी यहीँ कहेगी कि जब जगबीर यहाँ आया तो उसके पास लूट का कोई रूपया नहीं था-सामान के नाम पर उसके हाथ मे सिर्फ ऐक रिवॉल्वर था, जिससे उसने हमें कवर किया ।"

" पुलिस तुम्हारे इस बयान पर यकीन नहीं करेगी ।"

"यकीन न करने की तो खेर कोई बात नहीं है, किंतु हमारे बयान के बावजूद पुलिस मकान की तलाशी जरूर लेगी, जब नहीं मिलेगा तो सोचेगी रुपया उस लुटेरे के पास होगा जो मैटाडोर लेकर भागा था ।"

"'रुपया तुम्हारे घर में है फिर भला तलाशी में पुलिस को मिलेगा क्यों नहीं?"

"'है-मगर ऐसी जगह नहीं जहाँ तक पुलिस पहंच सके । "

"तुम पुलिस को बेवकूफ मत समझो--- मैं दावे के साथ कह सकता हूं अगर रुपया मकान मै है तो वह उसे पाताल से भी खोज निकालेगी ।"

"इस बहस में पड़ने का कोई लाभ नहीं है, विश्वास करो कि ट्रेजरी का एक करेंसी नोट भी उनके हाथ नहीं लगेगा-यह मेरी गारण्टी है, अब ज्यादा समय बरबाद न करके तुम सीघे-सीधे शब्दों में यह बताओ कि उक्त स्कीम पर काम करने लिए तैयार हो या नहीं?"

जब्बार सोच में पड़ गया ।

देव ने कह्म-----"हमें जल्दबाजी, में कोई काम नहीं करना है, धैर्य बडी चीज है-दीपा की इस सीख में कितना दम था यह बात एक ठोकर लगने के बाद मेरी समझ में आई है ।"

" "क्या मतलब?"

"उसने कहा था कि जंगल से दौलत हमें तब लानी चाहिए जब पुलिस की सरगर्मी ठंडी पड़ जाए, लेकिन मैं नहीं माना, अपनी उसी बेवकूफी की वजह से इस लफडे में इतना गहरा फंस गया. कि निकलने के लिए नई-नई स्कीमें बनानी पढ़ रही हैं--खैर मेरे कहने का मतलब ये है कि हमें किसी किस्म की जल्दबाजी दिखाने की ज़रुरत नहीं है-अगर तुम्हें सोचने के लिए समय चाहिए तो यह मिल सकता है।"

"क्या सोचने के लिए?"

"यह कि स्कीम कितनी सुदृढ़ है, उसमें कहीं लोच तो नहीं है-किसी भी स्कीम पर अमल करने से पहले उसे ठोक-बजाकर देख लेना चाहिए, ताकि जो कमी हो उसे दुरुस्त किया जा सके, क्योंकि अमल के बाद स्कीम की कमी बहुत दुख देती है ।"

"शायद तुम ठीक कह रहे हो?"

 


"इसीलिए मैं चाहता कि तुम स्कीम रूपी इस मशीन का अच्छी तरह निरीक्षण कर लो--- कोई कावला या स्क्रु ठीला तो नहीं है, क्योंकि वक्त रहते उसे कसा जा सकता है ।"

"अगर मैं तुम्हारी स्कीम पर काम करने से इंकार ही कर दूं तो ?"

देव ने विना तनिक भी विचलित हुए कहा---इस बारे में भी अच्छी तरह सोच लेना कि तुम इंकार करने की स्थिति में हो भी या नहीं और हाँ---ना करेनेे में तुम्हारा कहां-कंहां कितना नफा-नुकसान हो सकता है---मैं तुम्हें पूरे बीबीस घण्टे का समय देता हूं--- कल इसी समय इस केबिन में फिर मुलाकात होगी ।" कहने के साथ ही देव उठकर खड़ा हो गया ।

जवार का दिमाग अभी तक हवा में घूम रहा था ।

देव ने दुसरी बार दस्तक दी तो अन्दर से पुछा गया---" कौन है ?"

आवाज जगबीर की थी और उसे सुनते ही देव का माथा ठनक गया------दरअसल यह सवाल अन्दर दीपा द्वारा किया जाना चाहिए था, अत: जल्दी से बोला----" मैं देव हूं , दरवाजा खोलो ।"

दरवाजा एक झटके से खुला।

सामने खड़े जगबीर को देखते ही उसके मुंह से निकला-"दीपा कहाँ है ?"

"बताता हूं अन्दर आओ ।" कहने के साथ ही उसने रास्ता दे दिया?

अन्दर कदम रखते ही देव की नजर दीपा पर पडी और वह चौंक पड़ा-दृष्टि फर्श पर पड़े पत्नी के जख्मी शरीर पर चिपककर रह गई , दीपा बेहोश थी----वहुत गौर से निरीक्षण करने पर देव थोड़ा निश्चिन्त नजर आया, मुंह से निकला----" सब क्या है, किसने किया?"

"मैंने ।"" चटकनी चढ़ाकर घूमते हुए जगबीर ने पूरी ढिठाई से कहा ।

देव तेजी से पलटा, गुर्राया---"तुमने ?"

"हाँ ।"

"मगर क्यों?"

"मैंने पहले ही कहा था कि अपना हुक्म न मानने वाले लोग मुझे कतई पंसन्द नहीं है और तुम्हारी बीबी का विद्रोही स्वर सुनकर मैंने रात ही तुमसे इसे समझाने के लिए कहा था, मगर तुमने शायद इसे समझाया नहीं, यह उसी का परिणाम है ।"

"लेकिन दीपा ने किया क्या?"

"बता नहीं रहीं थी कि जब्बार कौन है?"

देव ने चतुराई के साथ पूछा----"कौन जब्बार?"

"क्या तुम जब्बार नाम के किसी आदमी को नहीं जानते?" जगबीर ने उसे खा जाने वाली नजरों से घूरते हुए पूछा ।

देव ने पहले ही से सोचा-समझा जवाब दिया…"जानता हूं मगर क्या वह मेरे बाद यहाँ आया था?"

" हां । "

"ओह ।" यह शब्द देव के मुंह से इस तरह निकला जैसे अनायास निकला हो, जबकि वह अनुमान लगा चुका था कि दीपा की हालत क्यों और किस तरह हुई है, लेकिन कमाल की बात ये थी कि उसके चेहरे पर वेदना. उत्तेजना या दीपा के लिए सहानुभूति का हल्का-सा भी लक्षण नहीं उभरा-हां यह उसने जरूर कहा ---" मुझे यह मारपी ट और हिसां पसन्द नहीं है जगबीर । "

"तुम्हारी पसन्द-नापसन्द से मेरी सेहत पर कोई फर्क नहीं पडता ।" उसे झिड़कने के-से अन्दाज में जगबीर बोला-----"" मेरे सवालों का जवाब नहीं दिया और ऐसे मौकों पर सामने वाले की अक्ल दुरुस्त करने का एक ही तरीका आता हैं-बही, जो मैंने इस *** पर किया ।"

दीपा के लिए गाली सुनकर भी देव सामान्य रहा, बड़े ही निश्चित भाव से उसने एक सिगरेट सुलगाई और पूछा-"तुम्हारे सवालों के ज़वाब में दीपा क्या कह रही थी?"

"यह कि मेरे हर सवाल का जवाब लोटकर आने पर तुम दोगे ।"

"ठीक कह रही थी वह । देव सोफे पर पसरता हुआ बोला---"तुन्हें थोडे धैर्य से काम लेना चाहिए था, मेरे आने तक इन्तजार करते ।"

"इन्तजार करना न मेरी आदत है, न जरूरत--- मैनें तुम्हारी बीबी को मारा है, अब बोलो-----क्या कर सकोगे मेरा?"

"कुछ भी नहीं ।" देव ने बड़े आराम से कहा ।

जगबीर जैसा व्यक्ति भी चौंक पडा…"क्या मतलब?"

"मतलब ये माई डियर जगबीर कि एक साल पहले मैंने प्यार में अंघा होकर इससे शादी की थी, इसके लिए अपने दौलतमंद बाप को छोडा था---उफ----'उस वक्त मैं खुद को इसका कितना बड़ा दीवाना महसूस करता था-शादी से पहले रातों को रोया करता था इसके लिये-लगता था इसके बिना मैं, मेरा जीवन अधूरा है…अगर यह मुझे न मिली तो मैं आत्महत्या कर लूगा, मगर शादी के बाद, आज एक साल बाद जब उन बातो को याद करता हूं तो खुद पर हंसो आती है-अपनी उस वक्त की बुद्धि पर तरस आता है-सोचता हू कि क्या हो गया था मुझे और इस लडकी से शादी करने की बेवकूफी मैंने कैसे कर दी -फिर भी , कल तक मैं इसे सहन का रहा था, मगर कल जब से दौलत मेरे हाथ लगी है तब से जो पार्ट इसने प्ले किया है, उसकी वजह से मेरे लिए इसे सहन करना मुश्किल हो रहा है, टॉर्चर करते-करते अगर तुम इसे मार डालते स्वयं ही मेरी एक बहुत बडी समस्या हल हो जाती ।"

जगबीर के चेहरे पर हैरत के भाव फैल गए ।

वास्तविकता यह थी कि गुस्से और जोश की ज्यादती के कारण उसने दीपा की पिटाई कर तो दी थी, परन्तु उसके बाद यह सोच-सोचकर परेशान हो रहा था कि अपनी बीबी की यह हालत देखकर देव कहीं भड़क न उठे और वह ये भी सोचता रहा था कि भड़के हुए देव को किस तरह काबू में लाएगा, मगर यहाँ तो मामला ही उलटा था ।

 


अपनी बीवी के बारे में किसी पति के ये बिचार उसने पहली बार ही सुने थे।

धीरे धीरे चलता हुआ वह सोफे के नजदीक पहुंचा और उसके सामने धीरे से बैठता हुआ बोला --" तो इसे इस अवस्था में देखकर तुम मुझसे इतने सवालात क्यों कर रहे थे?"

"इसलिए कि कहीं तुम्हारे इस तरह इसे मारने से कोई गडबड न हो गई हो ?

"केसी गडबड़ ?”

" मारने से पहले तुम्हें इसका मुंह बांध देना चाहिए था ।"

" क्यों ?"

"मेरी तरह इसकी इस लूट के माल में कोई दिलचस्पी नहीं है, अत चीख-भी सकती थी, उससे लोग यहीं जमा हो जाते-तुमसे यह शरणस्थल तो छिन ही जाता, मेरे हाथ से भी दस लाख जाते, उलटे जेल में चक्की पीस रहा होंता-इन्ही सब शकाओं से ग्रस्त होकर मैंने कहा, था कि तुम्हें इसे इस तरह नहीं मारना चाहिए था ।"

"म-मगर यह तो पिटती रही और अंत तक इस भय से इसके जबड़े सख्ती के साथ भिंचे रहे कि कहीं हलक से चीख न निकल जाए ।"

"मैं जानता है कि इसने ऐसा क्यों किया?"

" क्यों ?"

"उसी वजह से जिस वजह से इसने तुम्हारे सवालो के जवाब नहीं दिए ।"

" मैं समझा नहीं ।"

"यह बेवकूफ आज़ भी मेरी उतनी हीं दीवानी है जितनी एक साल पहले थी, उतना ही नहीं बल्कि शायद उससे भी ज्यादा चाहती है मुझे--इसने सोचा होगा कि पता नहीं जब्बार के बारे में तुम्हें बताना मेरे हक में होगा या नहीं-मुंह से चीख इसने इसलिए नहीं निकलने दी होगी, क्योंकि इसे इल्म हो गया होगा कि इसकी चीख मुझें फांसी के फंदे तक पहुंचा सकती है।"

" इतना सब जानने के वावजूद इसके बारे में तुम्हारे ऐसे बिचार हैं ?"

" क्योंकि इस एक साल की ठोकरों ने मुझे वता दिया है कि इस तरह एक दूसरे के लिए मर मिटने की भावनाएं बेवकूफी के सिवा कुछ नहीं , खैर…अब ये बकवास टॉपिक छोड़कर यदि हम मुद्दे पर आएं तो बेहतर होगा ।"

" मैं भी यही चाहता हूं ।"

"तो बताओ इसने जब्बार के बारे में तुम्हें क्या बताया और वह इससे क्या बाते करके यहां से गया हैं ?"

"यह मैं तुम्हें वाद में बताऊंगा कि उसने इससे क्या बातें की…उसके बारे में दीपा ने केवल नाम और यह बताया कि वह पुलिस में सब-इंस्पेक्टर है, इससे ज्यादा जब्बार के बारे में तुम्हारे मुंह से जानना चाहता हूं ।"

"वह हमारा पुराना परिचित है ।" देव ने नित्संकोच बताना शुरू कर दिया----हम-तीनो एक ही कालेज के स्टुडेण्ट थे और वह दीपा का मुझसे भी बड़ा दीवाना था, मगर दीपा उसे घास नहीं डालती थी-एक साल बाद हमने कल ही उसे देखा था-चैकपोस्ट पर वाहनों की चैकिंग कर रहे पुलिस दल में वह शामिल था-पता लगा कि सब…इंस्पेक्टर वन गया है… ।"

देव ने चेकपोस्ट वाली सारी घटना विस्तार पूर्बक बता दी ।

सुनने के वाद जगबीर गम्भीर हो गया---देव को रीड करने के से अंदाज में घूरता हुआ बोला---" यह महत्वपूर्ण घटना तुमने रात ही मुझे क्यों नहीं बताई थी ?"

"तुमने पूछा ही नहीं । "

"क्या मतलब?"

"कल सारे दिन जो कुछ भी मैंने किया----जो भी हम पर गुजरी, उसका पूरा विवरण तुमने हमें सुनाया, हमे लगा कि कहीं-न-कहीं छुपे तुम गुप्त रुप से वॉच कर रहे थे--मेने सोचा तुम्हें चेकपोस्ट पर घटी घटना भी मालूम होगी ।"

"जानते हो मैं यहां कैसे पहुचा?"

"नहीं ।"

'जगबीर शुरू हो गया-"परसों शाम…ट्रैजरी के एक बहादूर चौकीदार की वजह से कचहरी में ही लूट के माल के साथ में भाग जाने की हमारी योजना बिखर गई थी…गजेन्द्र वहीं-चौकीदार की गोली से मारा गया--- जख्मी हो जाने के वावजूद मैटाडोर लेकर भाग जाने में कामयाब रहा और मैं बड़ी मुश्किल लोगों से -जान बचाकर कचहरी से फरार हो जाने में कामयाब हो सका ।"

"यह सव मैं अखबार में पढ़ चुका हूं ।"

"हम तीनों के बीच यह बात पहेले ही तय हो चुकी थी कि यदि लुट के बीच बिछूड़ गए तो कहाँ मिलेंगे?" जगबीर ने बताया---"यही तय हुआ-था, जहाँ इस वक्त भी पैटाडोर खड़ी होगी-काफी प्रयासों बाद भी मैं परसों सारी रात और कल दिन में उस स्थान तक नहीं पहुच सका-जानता था कि गजेन्द्र बेचारा तो पहुंचने के लिए जिन्दा ही न बचा हेै ---हां--माल और मैटाडोर सहित वहां सुक्खू मेरा इन्तजार जरूर कर रहा होगा--- कल रात-आठ बजे मैं तरह वहाँ पहुंचा, मेैटाडोर और सुक्खू की लाश यथास्थान थी , मगर दौलत से भरा सन्दूक गायब मेरे होश उड़ गए-समझ न सका कि आखिर यह सब क्या हो गया है-दौलत कहां गई ।"

देव शान्ति के साथ सुन रहा था ।

सांस लेने के लिए रुका जगबीर आगे बोला-"भूखा-प्यासा और थका-हारा मैं मैटाडोर के अन्दर पड़ा दौलत गायब होने की गुत्थी को सुलझाने का असफल प्रयास कर ही रहा था कि तुम वहाँ पहुंच गए-कार की आबाज ने मुझें काफी पहले ही सजग कर दिया था…सो तुम्हारे वहां पहुचने से पहले ही मैटाडोर से बाहर निकलकर एक तरफ छुप गया-वही छुपकर तुम्हारी बाते सुनी…पीछा किया तो जाना कि दौलत से भरा सन्दूक तुमने कहाँ छुपा रखा है---अब सारी स्थिति मेरे सामने साफ़ थी- -दिमाग से विचार उभरा कि तुम दोनों को ढेर करके दौलत अपने कब्जे में ले लूं किन्तु सोचा इससे होगा क्या-वर्तमान हालातों भी दौलत के साथ कहीं दूर निकल जाना मेरे वश में न था, अतः स्कीम बनाई कि पुलिस की सरगर्मी ठंडी पड़ने तक तुम्हारे घर ही में पनाह लूं ---वस-मैं तुम्हारी कार की डिग्गी में छुप गया ।"

" ओह ! "

"मैँ इतना ज़रूर जानता हूं कि चेकपोस्ट पर गाड़ी रुकी--चैकिग हुई…मगर यह नहीं जान सका कि जब्बार ने दौलत देखने के बावजूद वहाँ से निकाल दिया था-यहाँ पहुचने के बाद मैं डिग्गी से निकलकर लॉन के एक पेड पर चढ़ गया--अटैची

सहित दोलत को_तुम्हें लॉन में गाड़ते देखा--इतनी सव कार्यवाही देखने के बाद मुझे यकीन हो गया कि अपने अपराध-बोध से घिरे तुम मुझें पनाह देने के लिए विवश हो और इस तरह मैं तुम्हारे सामने प्रकट हो गया ।"

देव चुप ही रहा।

"अब तुम सब बताओ कि जब्बार ने तुम लोगों को चेकपोस्ट से क्या सोचकर निकाल दिया था और वह यहां किसलिए आया?"

"यह भी मुझसे बेहतर तुम ही जानते हो ।”

" क्या मतलब?"

"चेकपोस्ट पर की गई जब्बार की हरकत ने अभी तक मेरी खोपडी घुमा रखी है--मुझे तो यह लगता है कि दौलत को देखते ही मेरी तरह उसके दिमाग में भी उसे हासिल करने की ललक पैदा हो गई होगी-मैं सोच रहा था कि इस सम्बन्थ में यहां आकर वह शीघ्र ही मुझसे बात करेगा---उम्मीद के अनुसार वह आया, मगर मेरे बाद और अब तुम या दीपा ही बता सकती हो कि वह क्या चाहता था?"

 


" तुम्हारा अनुमान ठीकं है----वह लूट की दौलत भी से आधा हिस्सा चाहताहै ।"

"ओह'"

"मगर वह सिर्फ इतना ही नहीं चहता है ।"

थोडा चौंकते हुए देव ने पूछै---" फिर ?"

"पांच लाख के अलावा ।" जगबीर बहुत ध्यान से उसके चेहरे को निरीक्षण करता हुआ बोला---"वह तुमसे दीपा की एक रात भी चाहता है ।"

देव चौंका बिल्कुल नहीं ।

न ही उसके चेहरे पर कोई नागवारी का भाव उभरा बल्कि होंठों पर बड़ी ही धूर्तता-भरी मुस्कान खेल गई----बोला--- -कुछ अनुमान था कि वह ऐसी ही कोई डिमांड रखेगा, क्योंकि दीपा पर शुरू से ही उसकी गन्दी नजर है ।"

"वया तुम उसकी डिमांड मानोगे?"

जगबीर के इस सवाल का जवाब देव ने एकदम नहीं दिया कुछ देर तक उसे देखता रहने के बाद बोला----" इस बारे में सोचने का अभी से मौका कहां मिली है?"

"तो अब सोच लो ।"

विनती करने के से अंदाज में जगबीर की तरफ़ देखते हुए देव ने पूछा…"क्या इस मामले में तुम मेरी कोई मदद कर सकते हो?"

"मुझसे क्या मदद चाहते हो?"

"जब्बार की डिमांड को देखते हुए वर्तमान हालातों मे मुझे उसके साथ क्या करना करना चाहिए ?"

"क्या तुम उसकी डिमांड पूरी कर सकते हो?"

"जी तो नहीं चाहता, क्योंकि दस के पांच लाख रह जाना मुझे गंवारा नहीं, दूसरे भले ही मैं दीपा से पीछा छूड़ाना चाहता हुं, लेकिन इसकी एक रात किसी अन्य के लिए हो यह बर्दाश्त नहीं कर सकता ।"

"सच कह रहे हो?"

"बिल्कुल सच ।"

"तो क्या करोगे?" जगबीर ने पूछा----"अगर तुमने उसकी डिमांड न मानी तो वह हंगामा खड़ा कर सकता है---पुलिस वाला होने के नाते ऐसी बहुत-सी शक्तियां उसके हाथ में हैं, जिनके इस्तेमाल से वह तुम्हें फांसी के फ़न्दे तक पहुचा सकता है ।"

"यही सोचकर तो परेशान हूं ।"

"ये धर मेरे लिए उस वक्त तक एक सुरक्षित पनाहगाह है जब तक कि तुम पति-पत्नी महफूज हो ।" जगबीर ने क्रहा----"जब्बार तुम्हारे साथ जो कुछ भी गडबड करेगा अप्रत्यक्ष रूप से उसका असर मुझ पर भी पडे़गा और अपनी सुरक्षा के लिए मैं तुम्हारी मदद करने के लिए तैयार हूं ।"

"किस किस्म की मदद?"

" पुलिस वालों से पहले भी मेरा कई बार वास्ता पड़ चुका है और अनुभव है कि ये किसी के सगे नहीं होते---न इनकी दोस्ती अच्छी न दुश्मनी-वह गडबड जरूर करेगा-भले ही तुम उसकी डिमांड मान लो, तब भी वह कोई-न-कोईं गडबड जरूर करेगा ।"

"फिर क्या करें?"

"उसका एक ही इलाज है ।"

"क्या? "

"हत्या ।"

"ह-हत्या--नहीं ।" डर जाने की बड़ी खुबसूरत एस्टिंग की देव ने ।

"जब तक वह जिन्दा है-हम दोनों के लिए बराबर का खतरा बना रहेगा--उसकी मौत ही हमें उससे निजात दिला सकती है ।"

जगबीर अपने स्वर को प्रभावशाली बनाने की पूरी कोशिश करता हुआ बोल----"' तुम घबराओ नहीं-तुम्हें खास कुछ नहीं करना पडेगा-----' करूंगा मैं तुम सिर्फ मेरे सहायक होगे ।"

“म-मगर इस खतरनाक काम में मैं तुम्हारी कोई मदद नहीं कर सकता।"

."मैं समझता हूं---तुम एक पारिवारिक आदमी हो…कत्ल की कल्पना मात्र तुम्हारे होश गुम कर सकती है---पडी हुई दौलत हाथ लग जाने पर उसे हथिया लेने का इरादा अलग बात है और कोई जुर्म करना अलग, लेकिन... ।"

"लेकिन... ।" देव डरे हुए शरीफ व्यक्ति की बेहतरीन एक्टिंग कर रहा था।

"'इसके अलावा दरअसल कोई चारा नहीं है… फिक्र मत करो-मेरे लिए कत्ल करना कोई नई बात नहीं और. वैसे भी---वर्तमान हालातों में उसका कत्ल करना वहुत आसान है…किसी को कानों--कान खबर भी न लगेगी कि जब्बार नाम का सब-इंस्पेक्टर कैसे और कहाँ गायब हो गया?"

"ऐसा किस तरह होगा?"

"अशी तुमसे उसकी मुलाकात नहीं हो सकी है, जबकि तुम्हारी बीवी की नजरों में तुम्हें जलील करने के लिए वह इसके सामने इसकी एक रात तुम्हीं से मांगना चाहता है ।"

"फ-फिर ?"

"दीपा के सामने अपनी डिमांड मनवाने के लिए वह शीघ्र ही तुमसे बात करने यहां आएगा, मगर वापस नहीं जा सकेगा ।"

"क-क्या ?"

" जाहिर है कि यहाँ आने के बारे में किसी को बता कर नहीं आएगा, यानी कौई नहीं जानता होगा कि वह यहां आया था, अत: यहीं से वापस न भी लोटे तो पुलिस यहाँ पहूंचने से रही ।"

"वह तो ठीक है, मगर ।"'

"जव वह आए और तुम्हारे सामने अपनी डिमांड रखे तो तुम उसे कबूल कर लोगे-किसी तरह दीपा को भी समझाकर इसके लिए तैयार कर लोगे, भले ही इसे भी पूरी स्कीम बतानी पड़े ।"

"लेकिन स्कीम होगी क्या?"

"दीपा की एक रात लेने के लिए तुम उसे दीपा के साथ बेडरुम में भेज दोगे--वहाँ मैं छुपा होऊंगा ही-------तुम्हारी बीबी की पवित्रता भंग करने से पहले ही मैं उसका काम तमाम कर दूगा ।"

हैरत से आंखे फाड़कर देव ने पूछा-"क्या तुम उसका कत्ल कर दोगे?"

"इस ढंग से कि आवाज बेडरूम् से यहाँ तक भी न आ सकेगी ।"

"म-मगर उसके बाद क्या होगा…जब्बार की लाश का हम क्या करेगे?"

"करना ही क्या है…जिस तरह लॉन में दौलत गड्री हुई है उसी तरह एक लाश भी गाड़ देगे-जव किसी को यह ही मालूम न होगा कि अंतिम वार वह 'यहां आया था तो किसी के द्वारा इस लान की खोजबीन करने का सवाल ही नहीं उठता।"

 


"कह तो तुम ठीक रहे हो, मगर यह बहुत खतरनाक काम है ।”

"तुम डरो मत…मैं सब सम्भांल लूंगा-दरअसल उसका एक मात्र यही इलाज है-जब तक वह जिन्दा रहेगा धारदार नंगी तलवार की तरह हमारी गर्दनों के ऊपर लटकता रहेगा ।"

देव कुछ कहना ही चाहता था कि बेहोश पड़ी दीपा के हलक से दर्द में डूबी कराह निकली-उसकी चेतना लोट रही थी-उठकर खड़े होते हुए देव ने कहा----"इतना समझ लो कि भविष्य में दीपा पर इस तरह की कोई सख्ती नहीं होनी चहिए, वरना सारे किए धरे पर पानी फिर सकता है ।"

जगबीर कुछ बोला नहीं ।

हर तरफ अंधेरा ।

सन्नाटा ।

मकान के बरांडे मे देव और दीपा एक-दूसरे से सटे खड़े थे-काफी देर तक चुपचाप उसी अवस्था में खडे़ रहे-देव के दिलो--दिमाग पर, छाया खौफ काफी हद तक कम हो था !

जबकि दीपा अभी तक बूरी तरह आतंकित थी-उसके जिस्म पर पटिृटयां वंधी हुई थी, जो उसके होश में आने पर स्वयं देव ने बांधी थी--उस वक्त जगबीर बेडरूम में चला गया था ।

देव को सामने देखकर दीपा भड़की थी…जगबीर द्वारा किए गए व्यवहार की शिकायत की उसने मगर हैरत की बात थी कि देव तनिक भी उत्तेजित नहीं हुआ।

दीपा को देव के व्यवहार पर क्षोभ हुआ----गुस्सा भी वहुत आया, परंतु कुछ बोली नहीँ-हां--देव ने जरूर कहा---" मैंने बात कर ली है-अव वह कभी ऐसा व्यवहार नही करेगा ।"

उस वक्त दीपा का जी चाहा कि कह दे----" जो व्यक्ति किसी पराये मर्द द्वारा अपनी पत्नी की यह हालत किए जाने पर भी चुप रहे वह मर्द नहीं होता--- लालच ने तुम्हें नपुंसक कर दिया है।"

परन्तु।

ऐसा कह न सकी वह ।

केवल सोचकर रह गई -अन्दर-ही-अन्दर कसमसाकर ।।

और इस वक्त !

अपने एक मात्र सहारे से लता के समान लिपटी वह थर--थर कांप रही थी।।

देव ने उसे कसकर भीचते हुए कहा…""क्या बात है तुम-तुम इस तरह कांप क्यों रही हो ?"

" ये हम किस झमेले में फंस गए देव-मुझे अब भी डर लग रहीं है कि अगर वह दरिन्दा जाग गया और उसने हमें यहां बातें करते देख लिया तो क्या होगा?"

"निश्चिन्त रहो-मैंने उसके रात के खाने में नींद की गोली मिला दी थी-अच्छी तरह बैक का चुका हूं कि इस वक्त वह उसी के नशे में पड़ा सो रहा है-तुप जानती ही हो कि दरवाजा मैंने ड्राइंगरूम की तरफ से बन्द कर दिया है…अव वह यहीं नहीं आ सकता ।"

"म-मगर इस तरह कब तक चलेगा देव----आज उसने मुझे वहुत मारा है, मगर तुम कुछ नहीं बोले----क्या हो गया है तुम्हें --- तुम वही देव हो न _जो राह चलते यदि मुझे पर कोई कोहनी भी मार देता था तो तुम उससे लड़ने-मरने को तैेयार हो जाते ।"

" मैं अब ही तुम्हारा वही देव हूं दीपा ।"

"न-नहीं...तुप झूठ बोल रहे हो ।" दीपा ने दवे स्वर में विद्रोह किया…"वह देव मुझे किसी दूसरे के लिए मुस्कराने को नहीं कह सकता था…व्रह मेरी तरफ़ उठी किसी अश्लील नजर को बर्दाश्त नहीं कर सकता था-अगर तुम वहीं देव होते तो-उस दरिन्दे की इधर से दरवाजा खुला रहने की शर्त नहीं मानते ।"

"इन सव धटनाओं को मैं सहन नहीं कर रहा दीपा, बल्कि जहर के घूंट समझकर पी रहा हूं ।"

"क्या मतलब ?"

"मतलब ये कि वक्त ने मुझे तुम्हारी नजरों में नपुंसक बना दिया है ---हालातों के चक्रव्यूह ने जकड़कर इस हद तक मजबूर कर दिया है कि मैं कुछ नहीं कर सकता और मैं तुम्हें बदला हुआ देव नजर 'आ रहा हूं , मगर फिक्र न करो---मैं धीरे-धीरे हालातों को अपनी गिरफ्त लेने की कोशिश कर रहा हूं---काफी हद तक कामयाब भी हुआ हूँ…जेसै ही मैं पूरी तरह कामयाब होऊंगा-इन दोनों के द्वारा किए गए तुम्हारे एकाएक अपमान का बदला लूंगा ।"

"तुम अकेले हो-वे दो हैं-क्या कर सकोगे देव?" दीपा ने कहा…"वे दोनों चक्की के दो पाट जैसे है और हमारी स्थिति गेहू और धुन जैसी-- हमें तो उनके बीच पिसना ही है ।"

"मैं इन दोनों पाटों को आपस में टकराकर तोड़ दूगा ।"

"वह कैसे?"

"जब्बार जब यहां आया और तुमसे बाते की तो जगबीर उसके बारे में जान गया था और यह बौखला उठा…इस बात का सबूत तुम्हारे जिस्म पर चोटों के ये निशान हैं----मैं आया---तब तुम बेहोश थीं…जब्बार का भूत उसके दिमाग में घुसाकंर मैंने उसे आतंकित कर दिया ।"

" फ-फिर ?"

"नतीजा वही निकला जो मैं चहता था ।" देव ने कहा---- जगबीर के दिमाग में निश्चय ही यह बात है कि पुलिस की सरगर्मी ठंडी पडने पर हमारा काम तमाम करके वह दस लाख के साथ इस शहर से निकल जाएगा, मगर मैंने जब्बार को हव्वा बनाकर उसके दिमाग में घुसेड़ दिया है और अव उसे ये बात जंच गई है कि हमसे पहले उसे जब्बार को खत्म करना होगा----यह काम करने के लिए वह तैयार है और इसके लिए उसे मेरी मदद की जरूरत है, अत: मुझे विश्वास में लेकर, सब्जा बाग दिखाकर उसकी हत्या करने के लिए मेरी मदद चाहता है ।"

"तुम्हारी मदद?"

देव ने उसे जब्बार की हत्या के संबंध -मे जगबीर से हुई सारी बातें साफ़-साफ बता दीं…सुनकर दीपा की सांस रुक गई-बोली-"यह खेल बहुत खतरनाक मोड़ लेता जा रहा है देव ----प्लीज----अपने-आपको इससे निकाल लो ।"

देव ने अपनी ही धुन में कहा-----"' मैंने जब्बार की अक्ल भी दुरुस्त कर दी है।"

"जब्बार की?"

"वह मुझे बाहर मिल गया था--- मैं उसे एक होटल मे ले गया…मेंरी बातें सुनने से पहले वह मुझ पर बहुत हाबी था--मुझें ब्लेक मेल करके पांच लाख और तुम्हारी एक रात हासिल करने का ख्वाब देख रहा था कमीना, मगर जब मैंने उसे घर पर छुपे जगबीर के बारे में बताया तो बौखला गया…इस हद तक घबरा गया कि खुद ,को मुझसे इस मामले से अलग रखने की रिक्वेस्ट करने लगा ।"

 


" मैं उससे हुई तुम्हारी पूरी बातें सुनना चाहती हूं !"

देव ने वेहिचक बता दी---दीपा बुरी तरह आतंकित हो उठी…इस कदर कि काफी देर तक तो उसके मुंह से बोल ही न फूटा---देव ने हल्के से उसे झंझोड़ा-"क्या लोच रही हो ?"

"त-तो कल वह तुमसे मिलेगा ?"

"हर हालत मे ।" देई ने द्रुढ़तापूर्वक कहा-"जब्बार को न सिर्फ वहां आना होगा, बल्कि मेरे द्वारा रखा गया जगबीर की हत्या का आंफर भी स्वीकार करना होगा ।"

"य-ये खून-खरावा-कत्ल की ये योजनाएं---क्या यह सव जुर्म नहीं है देव-देखते-ही-देखते तुम और तुम्हारे साथ मैं मी मुजरिम नहीं वन गई हुं ?"

" हम यह सब कुछ करने के लिए मज़बूर हैं ।" देव ने कहा----"' अगर मैं ऐसा कुछ नहीं करता हूं तो तुम्हारी बात सच हो जायेगी चक्की के इन दो पाटों के बीच हम पिसकर रह जाएंगे और खुद को बचाना जुर्म नहीं -- आत्मरक्षा होती है ।"

"तुम मुझे नहीं खुद को बहला रहे हो-जब्बार के साथ मिलकर जगबीर की हत्या का प्लान वनाया है और जगबीर के साथ मिलकर जब्बार की-आखिर करना क्या चाहते हो तुम ।"

"इस वक्त मैं ऐसी स्थिति में हूं कि जो चाहू कर सकता हूं ।"

"क्या मतलब?"

"मैं इन दोनों के चंगुल में था-एपने दिमाग से मैंने इन दोनों हीं को उल्टे अपने चंगुल में ले लिया---"' यह सफलता कम है?" देव का स्वर गर्वीला था----और अब इस स्थिति में हूं कि पहले जिससे चाहूं उससे निजात पा सकता हूं---मजे की वात ये होगी कि कत्ल मैं नहीं…चक्की का दुसरा पाट करेगा-मुझे सिर्फ यह फैसला करना है कि किससे किसका कत्ल कराया जाए ?"

" तुम आग से खेल रहे हो देव और इस खेल को खेलने बाला खुद को झुलसने से नहीं बचा सकता ---मेरी राय अब भी यहीं है कि ये खेल बन्द कर दो ।"

"तुम समझ क्यों नहीं रहीं कि मेरे करने से खेल वन्द नहीं हो जाऐगा-मेरी स्थिति तो उस आदमी जैसी है जिसे तैरना नहीं आता था मगर, पानी में गिर पड़ा और अब-उल्टे-सीधे हाथ-पैेर मारकर मैं खुद को डूबने से बचाने की कोशिश कर रहा हूं--अगर मैंने यह कोशिश बन्द कर दी तो निश्चय ही डूब जाऊँगा । "

दीपा देव की तरफ देखती रह गई-हालाकि अंधेरे की वजह से उसे देव का चेहरा साफ नहीं चमका था, किन्तु इतना वह समझ गई कि उसकी वह एक नहीं सुनेगा…वैसे भी-अब वह स्वयं महसूस कर रही थी कि वे दलदल में इस हद तक धंस चुके हैं कि गन्दगी से स्वयं को बचाने का हर प्रयास व्यर्थ होगा, बोली-----------"काश-तुमने लालच न किया होता देव शुरू में ही मेरी बात मान लेते तो आज गुनाह की इस दलदल में इतने गहरे न फंसते ।"

"जो गुजर गया अब उस पर सोचते रहने से कोई लाभ नहीं होगा…इस वक्त हालत की सारी डोरियों के सिरे मेरे हाथ में हैं और हम थोडी-सी होशियारी से काम ले तो सफ़ल हो सकते हैं-----हां जो कुछ भी मुझे करना है उसमें तुम्हारी मदद की जरूरत जरूर पड़ेगी ।"

"मैं तुमसे अलग कहां हुं देव, भारतीय नारी तो हर हाल में पति के साथ है ।"

"गुड----तुम्हारी इसी अदा के तो हम दिवाने हैं ।" कहने के साथ देव ने उसके होठों का चुम्बन लिया और बोला----""जगबीर को नींद की मैंनें तुमसे सलाह लेने के लिए खिलाई थी कि पहले किसके द्वारा किसको मरवाया जाये?"

"क्या मतलब?"

"मेरा ख्याल ये है कि पहले जगबीर से निजात पाई जाये तो हमें तीन फायदे होंगे ।" देव ने कहा-पहला तो यह कि उससे हमें अपनी जान का खतरा है, जब्बार से नहीं---दूसरा--वह पेशेवर कातिल है, उसकी अपेक्षा मैं जब्बार को जल्दी अपनी बातों में फंसा सकता हुं , तीसरा और सबसे बडा लाभ ये होगा फि उसकी लाश हमारे लिए कोई समस्या खड़ी नहीं करेगी---पीछे के लॉन से उठाकर पुलिस उसे खुद अपने साथ ले जाएगी ।"

"मगर उसके बाद जब्बार का क्या करोगे?"

"उसकी डिमांड मानने का नाटक ।" देव ने पूरी धूर्तता के साथ कहा ---" उसकी हत्या के लिये मैं अपने दिमाग को कष्ट देने की जहमियत उठाने की जरूरत नहीं समझता ---जगबीर की स्कीम से ही काम चला लुंगा , जब वह तुम्हारे साथ रात गुजारने यहां आएगा तो वह काम मैं करूगां जो इस वक्त जगबीर करने के लिए तैयार है, उसकी लाश को लॉन में दफना देना हमारे लिए लॉन में दौलत गाड़ देने से ज्यादा कठिन नहीं होगा ।"

"लुटेरों द्वारा इस्तेमाल की गई मैंटाडोर बरामद"

सुबह के अखबार में उक्त शीर्षक पर नजर पड़ते ही देव सम्भलकर बैठ गया और ध्यान से समाचार को पढ़ने लगा, लिखा था-कल शाम साढे़ सात बजे एक -ग्रामीण ने जंगल में एक मैंटाडोर की मौजूदगी की सूचना दी…सुचना मिलते ही पुलिस तुरन्त वहां पहुंची और जांच पड़ताल के बाद पाया कि यह वही मैटाडोर है जिसे लुटेरों ने ट्रेजरी लूटने के लिए इस्तेमाल किया था।

लूट की रकम सहित जो लुटेरा कचहरी से मैटाडोर लेकर फरार हुआ था, वह जख्मी था---गार्ड द्वारा चलाई गई गोली उसकी जाँघ में लगी थी-मैंटाडोर ही ड्राइविंग सीट पर खून के निशान मिले है----परन्तु न तो लूटी गई रकम ही मैटाडोर से बरामद हो सकी-न ही जख्मी लुटेरा।" यह पंक्ति पढ़कर देव उछल पड़ा ।

दिमाग में बिजली की तरह सवाल कौधा-"'सुक्खू की लाश कहां गई ।"'

जवाब नदारदा . . . दिमाग घूमकर रह गया उसका-लगा कि कहीं मैंने गलत तो नहीं पढा है?

देव ने जल्दी से वह पंक्ति दुबारा पडी, साफ-साफ वही लिखा था और आगे के मैटर में तो यह बात और ज्यादा स्पष्ट हो रही थी, लिखा था…"काफी खोजबीन के बाद पुलिस को घटना स्थल से थोडी दूर एक कार के टायरों के निशान हैं जिन्हें मुजारिमों द्वारा मिटाने की कोशिश की गई मालुम पड़ती है----पुलिस का अनुमान है कि लूट के बाद लुटेरों का वहां मिलना पहले ही से तय रहा होगा-कचहरी से भागा लुटेरा कार लेकर वहाँ पहुंचा, रकम से भरा सन्दूक मैटाडोर से कार में ट्रांसफर-किया और अपने जख्मी साधी को साथ लेकर वहां से निकल गया…पुलिस कार और दोनों लुटेरों को सरगर्मी से तलाश कर रही है, डी-आई-जी द्विवेदी ने आशा व्यक्त की है कि लुटेरे शीघ्र ही कानून की गिरफ्त में होंगें ।"

पूरा समाचार पढ़ने तक देव के चेहरे पर पसीना उभर आया ।

उसके ठीक सामने, सोफे पर बैठा जगबीर एक आलपिन से अपने ग़न्दे दांतों को कुरेदता हुआ ध्यान से उसे देख रहा था, बोला ---"'ऐसा---क्या छपा है अखवार में?"

" आं?" देव उछल पड़ा । उसने ध्यान से सेन्टर टेबल पर पांव पसारे बैठे जगबीर की तरफ़ देखा और बोला-पुलिस मैटाडोर तक पहुच गई है!"

" तो तुम क्यों दुबले हुए जा रहे हो, अव पुलिस के वहा पहुंचने से हमारी सेहत पर क्या फ़र्क पड़ने वाला ?”

"सुक्खू की लाश मैटाडोर से गायब हो गई!"

"क…क्या?” जगबीर उछल पड़ा!

'"हां, अखबार में साफ-साफ लिखा है कि पुलिस को वहां से सिर्फ मैंटाडोर मिली, लूट की रकम और सुक्खू की लाश नहीं और इसीलिए पुलिस अभी यह नहीं जानती कि सुक्खू मर चुका है, वह उसे फरार और जख्मी ही समझ रही है!"

"क्या बकवास कर रहे हो?" कहने के साथ ही वह न सिर्फ एक झटके से खड़ा हो गया, बल्कि झपटकर उसने देव से अखवार छीन लिया!

जगबीर ने पूरा समाचार पढ़ा ।

चेहरे पर भूचाल के से भाव उत्पन्न हो गए । उसके चेहरा ऊपर उठते ही देव ने पूछा---" तुमने ठीक से देखा था न, क्या सुक्खू सचमुच मर चुका था?"

"क्या वेवकूफाना सवाल रहे हो, उसकी लाश जमीन से उठाकर तुमने ही तो मैटाडोर की ड्राइविंग सीट पर रखी थी! "

" हां, रखी थी!" हतप्रभ से अंदाज में देव बड़बड़ाया---"मगर परसों रात जब हम दौलत लेने वहां गए थे तब मैटाडोर के नज़दीक भी नहीं फटके थे, जबकि अपने बयान के अनुसार तुम मैटाडोर में ही थे-क्या उस वक्त तक लाश यथास्थान थी!"

"विल्कुल वहीं थी, आखिर यह सव पूछकर तुम जानना क्या चाहते हो ?"

"मैं यह सोच रहा हूं कि जिसे हम सुक्खू की लाश समझ रहे थे, कहीं वह सिर्फ उसका बेहोश जिस्म ही तो न था, बाद में उसे होश आया हो और वह ।"

"वया बेसिर-पैर की कल्पनाएँ कर रहे हो?" जगबीर उसका वाक्य बीच में ही काटकर चीख पड़ा---- " क्या बेहोश जिस्म से बदबू निकल सकती है, मैटाडोर के अन्दर तीखी संड़ाध फैली हुई थी!"

 


"अगर वह लाश थी तो कहां चली गई ?" कसमसाकर सेन्टऱ टेबल पर घूंसा मारते हुए देव ने कहा…"पुलिस को मिली क्यो नहीं?"

"इन सवालों ने मेरे दिमाग को भी झंझोड़कर रख दिया है!"

"वह लाश थी, दोलत से भरा सन्दूक नहीं जिसे मेरी तरह कोई लालच में फंसकर अपने साथ ले जाए-खुद चलकर वह कहीं जाने से रही, फिर गायब कहीं हो गई ?"

एकाएक जगबीर चुटकी बजाकर कह उठा---एक बात हो सकती है!"

""क्या? " देव ने व्यग्रतापूर्वक पूछा ।

"मुजरिमों को भ्रम में डालने और टैररार्ईज करनेके लिऐ पुलिस कभी-कभी अखबारों में झूठी रिपोर्ट छपवा देती है, मुझे यह रिपोर्ट भी ऐसी ही लगती है!"

"मैं समझा नहीं!"

"हां--केवल यही बात हो सकती है!" अपने शब्दों से स्वयं ही को संतुष्ट करने का-सा प्रयास करता जगबीर बड़बड़ाया---" निश्चय ही पुलिस ने यही किया होगा?"

"क्या बात है?" देव उतावला था…"तुम मुझें क्यो नहीं समझाते?"

"ये इस मैेदान का वहुत पुराना खिलाडी हूं देब वह उसे समझाने वाले अंदाज में बोला-पुलिस के हर हथकंडे से वाकिफ हूं जब उसे किसी केस विशेष का कोई सुराग नहीं मिल रहा होता वे अखबार में गलत रिपोर्ट छाप देते हे…मुज़रिर्मों को जाल में फंसाने या उनके नजदीक पहुंचने का यह पुलिस का एक तरीका होता है, अखवार को वे मुजरिम के विरुद्ध एक हथियार के रूप में इस्तेमाल करते हैं !"

"किस तरह ?"'

"माना कि कुछ अपराधी अपराध करने के वाद अपने नीयत और सुरक्षित स्थान पर जा छुपते हैं---- यह स्थान इतना सुरक्षित होता है कि लाख सिर पटकने पर भी पुलिस वहाँ नहीं पहुच पाती, पुलिस के पास कोई सुराग नहीं होता---ऐसे मौंको पर वह अख़बार में खबंर छपवा देते हैं कि जहाँ मुजरिम छुपे हुए हैं, वहा का कुछ-कुछ सुराग पुलिस को मिल गया है-वस, इसे पढ़ते ही छुपे हुए मुजरिम बौखला जाते हैं, उस स्थान को छोड़कर बाहर निकल पड़ते हैं और सुरक्षित स्थान से बाहर जाते ही पकड़ लिए जाते हैं ।

"लेकिम इस झूठी रिपोर्ट से उसे क्या फायदा होने वाला है!"

"हम बेवजह बौखला उठे हैं, क्या यह उनकी सफलता नहीं है-----दरअसल मुजरिर्मों में हड़बड़ाहट फैला देना ही गलत रिपोर्ट का काम होता हैं क्योंकि उस अवस्था में वे कुछ नए कदम उठाते हैं, गलतियां करते हैं और उन्हीं की वजह से पकडे़ जाते हैं---वे चाहते हैं क्रि भ्रम में फंसकर हम सुक्खू की लाश की छानबीन करें , ताकि पुलिस को हम तक पहुचने का मोका मिल जाए!"

इस वार देव को कुछ सूझा नहीं, केवल जगबीर को देखता रहा, जबकि जगबीर बोला-"भगवान का शुक्र है कि जल्दी ही मेरा दिमाग पुलिस की गलत रिपोर्ट वाली चाल तक पहुच गया, वर्ना हम निश्चय ही इस गुस्थी को सुलझाने के प्रयास में फंस जाते---खुद को तनाव मुक्त कर लो देव, दिमाग से यह वात निकाल दो कि पुलिस को सुक्खू की लाश नहीं मिली है---हर हालत में वह लाश

ही थी और न तो लाश को कोई गायब करेगा न ही यह स्वयं चलकर कहीं जा सकती है!"

एकाएक देव के दिमाग में जब्बार चकरा उठा ।

जब्बार बता सकता था कि अखवार की रिपोर्ट सही है या पुलिस की चाल? उसने तेजी से कलाई घड़ी पर नजर डाली, "जगबीर ने पूछा…"कहीं जाना है क्या?"

"हां ।"

" कहां ?"

"कल संडे था मगर आज कम-से-कम अर्जी देने तो मुझे आँफिस जाना ही पडे़गा!"

" ओह ।" जगबीर के मुंह से निकला और तभी हाथो में चाय के दो पाले लिए दीपा ने वहां कदम रखा, देव ने जगबीर को चेतावनी वी…"याद रखना, मैं किसी भी हालत में कल

जैसी हिंसा से भरी किसी बदतमीजी को बरंदाश्त करूगां ।"

'" तुम भी याद रखना, आँफिस छुट्टी की अर्जी देने के बाद सीधे आओगे--- किसी आलतु-फालतू आदमी से बात करने का अंजाम वहुत भयानक होगा ।"

" नहीं--नही-ऐसा नहीं हो सकता!" जगबीर की पूरी बात सुनने के बाद दीपा हिस्टीरीयाई अंदाज़ में चीख पड़ी---" तुम बकवास कर रहे हो, देव ऐसा हरगिज नहीं कर सकता । वह आज भी मुझे उतना ही प्यार करता है!"

" हुं !" जगबीर के होंठों पर एक धिक्कार भरी फीकी मुस्कान उभर आई----"मुझे तरस आ रहा है तुम पर, जब बेहोश थी, उसने वह एक-एक बात अपने मुंह से कही, जो तुम्हें बताई है ।"

"श-शटअप!" वह दहाड़ उठी------"प्लीज अपनी गन्दी जुबान बन्द रखो?"

"वाकई, तुम भारतीय महिलाएं बेवकूफ़ होती हो-प्रलय के अन्तिम सिरे तक तुम्हारी समझ में शायद यह बात नहीं आएगी कि पति परमेश्वर नहीं, बल्कि सिर्फ एक दोस्त है---------लाइफ़ पार्टनर---जो बावफा भी हो सकता है और बेवफा भी---जिसके लिए तुम मरी जा रही हो, जिसे तुम भगवान मानती हो जिसके दिलो--दिमाग से तुम्हारे प्यार का नशा छंट चुका है, वहां तो इस वक्त दौलत का नशा हावी है-----तुम्हारी मांग भरा सिन्दूर सुलग रहा है दीपा और हैरत की बात है किं तुम्हें पता ही नहीं-------वह इस कदर गिर चुका है कि तुम्हें मेरे या जब्बार के ही नहीं, वल्कि दौलत के लिए खून पीने भेड़ियों तक के हवाले कर सकता हैं ।"

"अगर देल ने यह सब कहा भी है तो तुम मुझे क्यों बता रहे हो?"

"आगाह कर रहा हूं तुम्हें ।"

"क्यों?" दीपा ने सवाल किए----" मैं तुम्हारी कौन लगती हूं, तुम्हें क्या सहानुभूति है मुझसे ?"

"एक तुम हो जो मेरे हाथों से पिटती रहीं, लेकिन उसकी बेहतरी के मुह से चीख न निकलने दी और एक वह है जिसके अनुसार उसे खुशी तब होती जब मैं तुम्हें जान से मार डालता----इसी बिरोधाभास ने मेरे दिल में तुम्हारे लिए सहानुभूति भर दी…तुम्हारे दिल में उसके लिए भरे अटूट प्यार और तुम्हारे लिए उसकी भावनाओं ने मुझे हिलाकर रख दिया है!"

"तुम कहना क्या चाहते हो?"

"यह कि किसी पर इतना विश्वास करना ठीक नहीं दीपा, जो आदमी तुम्हारी पवित्रता तक को दांव पर लगाने के लिए तैयार हो गया वह तुम्हारा पति नहीं हो सकता ।"

"जो तुमने कहा, अगर एक मिनट के लिए उसे सच मान भी लू तो मैं कर क्या सकती हूं ?"'

जगबीर की आंखें चमक उठीं--"अगर तुम मेरा साथ दो तो मैं तुम्हारी मदद कर सकता हूं ।"

" कैसे ?"

"अगर तुम चाहो तो मैं हमेशा के लिए अपना सकता हूं पुलिस की सरगर्मी ठंडी पड़ने पर हम दोनों दस लाख के साथ इस शहर से कहीं दूर निकल जाएगे ।"

"लेकिन उससे पहले देव का मर्डर भी तो करना पडेगा?"

जगबीर चुप रहकर उसे घूरता हुआ यह जज करने की चेष्टा करता रहा था कि यह वाक्य उसने किस मूड में बोला है, जबकि दीपा ने पुन: चंचल अंदाज में पूछा----"हे न?"

जगबीर कुछ न बोला ।

 


दीपा खिलखिलाकर हंस पडी, बोली----"क्या अब भी यह सिद्ध करने की जरूरत है कि तुम झूठ बोलकर मुझे देव के विरूद्ध क्यों भड़का रहे थे----एक भारतीय पत्नी को पति के विरुद्ध वहकाकर हासिल करने के ये ख्याली मनसूबे अपने दिमाग से निकाल फेंको मिस्टर जसबीर!"

"क्या सोचा ?"

"सोचा तो खेर वही था जिसमें हम दोनों का फायदा है, लेकिन कल शाम-- -मैटाडोर प्राप्त करने के बाद यह सोचने पर मजवूर हो गया कि तुम लोगों के साथ काम करना चाहिए या नहीं?"

" क्यों ?"

"तुमने मुझसे झूठ बोला ?"

" क्या?"

"तुमने बताया था कि मैटाडोर की ड्राइविंग सीट पर एक लुटेरे की लाश है, लेकिन जब एक आदमी की सुचना पर पुलिस टुकडी के साथ मैं वहां पहुचा तो कोई लाश नहीं मिली!"

‘"क्या तुम सच कह रहे हो?"

"मैं झूठ क्यों बोलूंगा, बल्कि यह जानना चाहता हूं कि तुमने मुझसे झूठ क्यों बोला ?"

"यकीन करो, मैंने झूठ नहीं बोला था -- वहां सुक्खू नामक लुटेरे की लाश थी!"

"फिर गायब कहाँ हो गई?"

"यह गुत्थी मुझे भी पागल किए दे रही है!" देव ने कहा…"सुबह का अखवार पढते ही मैं और जगबीर दोनों चौक पड़े, क्योकि लाश हमने अपनी आंखों से देखी थी, बल्कि मैंने तो खुद उसे ड्राइविंग सीट पर रखा था-इस सम्बन्ध में आपस में हमारी काफी बहस हुई और अन्त में जगबीर ने यह निर्णय लिया कि मुज़रिमों में हड़बड़ाहट फैलाने के लिए पुलिस ने गलत रिपोर्ट की है !"

"यह गलत है, मैं मैटाडोर बरामद करने वाली पुलिस टीम में था---वहाँ से हमेँ कोई लाश नहीं मिली ।"

"अजीब बात है, फिर सुक्खू की लाश आखिर चली कहाँ गई, कौन, कहां और क्यों ले गया ?" देव बड़वड़ाया----"लाश भला किसी के क्या काम आ सकती है ?"

काफी देर तक वे इसी गुत्थी पर बात करते रहे, बात क्या…अगर यह कहा जाए तो ज्यादा उपयुक्त होगा कि नए-नए शब्दों में वे हैरत व्यक्त करते रहे ।

नतीजा निल ।।।।

अन्त में विषय बदलते हुए देव ने कहा----" खैर --वक्त शायद इस गुत्थी को सुलझा देगा-फिलहाल तुम यह बताओ कि मेरी योजना में कहीं कोई कमी नजर आई या नहीं?"

"योजना एकदम सॉलिड है और मैं उम पर वर्क करने के लिए भी तैयार हूं परन्तु!"

"परन्तु क्या ?"

"तुम्हें मेरी शर्तें माननी पड़ेगी!"

"मुझे तुम्हारी शर्तें पता लग चुकी है ।" वह पूरी तरह सामान्य स्वर में कह रहा था…"अपनी समझ में तुम शायद दीपा की एक रात मांगकर ऐसी शर्त रख रहे हो जिस पर मैं ना-नुकर करूंगा, किन्तु वास्तविकता ये है कि अगर बाकी के पांच लाख छोड़कर

तुम दीपा को हमेशा के लिए भी लेना चाहो तो मैं तैयार हूं ?"

"हमेशा के लिए अव मुझे वह नहीं चाहिए ।"'

" जैसी 'तुम्हारी मर्जी ।"

अगले दिन पुलिस की आपातकालीन मीटिंग में जब्बार बोल रहा था-"फोन करने वाले ने जो कुछ कहा उससे जाहिर है कि डाकू उस घर में पति-पत्नी को रिवॉल्वर से कवर करके जबरदस्ती रह रहा है, वे पति-पत्नी इस वक्त डरे हुए, आतंकित और जबरदस्त तनाव में होंगे!"

"सब-इंस्पेक्टर जब्बार का कहना ठीक है !" इंस्पेक्टर शुक्ला पुलिस अधीक्षक से मुखातिब होकर बोला-"डाकू पर इस वक्त खून सवार होगा और जैसे ही उसे यह लगेगा कि पुलिस उस तक पहुच गई है तो यह पागल हो उठेगा----पागलपन में वह पति-पत्नी में से किसी की हत्या भी कर सकता है!"

"यह बात हमें ध्यान में रखनी है!" 'उप-पुलिस अधीक्षक महोदय बोले-हम पुलिस वाले हैं, यह बात उसे ठीक तब पता लगे जब हम उसके सिर पर हों, चाहकर भी यह कुछ न कर सके!"

अचानक एक इंस्पेक्टर ने अपनी राय व्यक्त की…"मेरी राय आय सब महानुभावों से अलग है सर!"

"आपकी क्या राय है?"

"मेरे ख्याल से तो यह फोन झूठा है!"

सभी चौंक पड़े जब्बार बेचारे के तो छक्के ही छूट पड़े…आपे से बाहर होकर वह चीख ही तो पड़ा…"क्या बात कर रहे हैं आप, क्या मैं झूठ बोल रहा हूं-ऐसा फोन आया था, सार्जेन्ट बलजीत गवाह ।"

"मैँ ये नहीं कह रहा कि तुम्हारे पास फोन नहीं आया, भला तुम्हें ऐसा झूठ बोलने की क्या जरूरत पड़ी है और फिर तुम्हारे पास फोन पर बताया गया एड्रेस है!"

"ती फिर ।" बह वहुत उत्तेजित नजर आ रहा था । "

"मेरा मतलब ये है फोन यूं ही किसी मनचले ने कर दिया होगा!"

सभी दंग ।

हाल में खामोशी छा गई ।

उप-पुलिस अधीक्षक महोदय बोले----" आप बड़ी अजीब बात कर रहे मिस्टर नागर, क्या अपने विचार के पक्ष में अपके पासं कोई तर्क है?"

"जी हां !"

"पेश कीजिए!"

"कल शाम हम मैटाडोर बरामद कर चुके हैँ…घटनास्थल का निरीक्षण करने के बाद हम इस निष्कर्ष पर पहुंचे थे कि दो डाकू रकम लेकर कार से फरार हो गए हे-यहां ये प्वाइंट गोर करने वाला है कि वे दो हैं, जबकि फोनकर्ता के अनुसार यह सिर्फ एक डाकू है, जिसने कथित घर में पनाह ली है!"

जवार के रोंगटे खडे हो गए, सुदुढ़ योजना उसे यहीं धराशायी होती नजर आई, जबकि नागर तर्क से प्रभावित होते हुए 'उप-पुलिस अधीक्षक कह रहे थे…"मार्बलस-हमें तुम्हारे सोचने

का अन्दाज पसन्द आया, नागर, आगे कहो!"

"पहली बात तो ये कि जब वे जंगल में मिल चुके है तो अलग-अलग क्यों होगे ?" उत्साहित नागर ने कहा----"दूसरी ये कि चेकपोस्ट पर अभी तक चेकिंग चल रही है, ऐसी अवस्था में वे हरगिज शहर का रुख नहीं करेगे, जबकि जंगल से ही शहर से बाहर चले जाने के लिए सड़क उनके सामने है!"

"यानी तुम्हारे ख्याल से अब उन्हें शहर के अन्दर होना ही नहीं चाहिए?"

"तर्कसंगत बात तो यही है सरा"

"निश्चय ही तुम्हारी दलीलें दमदार हैं!" उप-युनिस अधीक्षक महोदय ने कहा…"हालांकि जंगल में पहुचकर, रकम हाथ में आ जाने के बाद सचमुच उनके शहर में आने का कोई औचित्य नहीं है, मगर फिर भी…

.......अगर कुछ देर के लिए मान लिया जाए कि माल सहित वे किसी तरह चेकपोस्ट पर चल रही चैकिंग को धोखा देकर शहर में आ भी गए है, किसी अजनबी के मकान में घुसकर वे इस तरह नहीं रहेंगें …निश्चय ही शहर में उनके पास अपना ठिकाना रहा होगा, हालात ऐसे थे कि वे आराम से वहां जाकर रह सकते थे, फोनकर्ता ने जिस स्थिति में दिए गए एड्रेस पर एक डाकू की मौजूदगी बताई है उस स्थिति में कोई मूजरिम तभी रहता जब यह इतना विवश हो कि यहीं से निकलते पकड़ा जाने वाला हो!"

एक अन्य पुलिस अफसर ने भी इस से मिलता जुलता तर्क दिया!

 
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