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दीपा की रूह फ़ना हो गई…दहशत के कारण अधमरी-सी नजर आने लगी वह, मगर यह सोचकर कि कहीं देव नाराज न हो जाए--तुम चाहे जो करो, मगर जो बताना है…लोटकर आने के वाद खुद ही बताएंगे ।"
गुस्से से उफनता हुआ वह गरजा-----"और तू कुछ नही बकेगी ?"
"नहीं ।"
जवाब में जगवीर ने एक झटके से अपनी कमर पर बंधी बेल्ट खींच ली-गुरांया-"अब भी नहीं?"
चमडे की चौडी वैल्ट के हवा में झूलते सिरे पर पीतल का चौडा "वक्कल' लगा हुआ था, जो रोशनदान से अन्दर प्रविष्ट होती धूप के दायरे में आकर शीशे की तरह चमका-उसकी चोट जिस्म पर पड़ने की कल्पना मात्र से दीपा के छक्के छूट गए चाहा कि सब कुछ बता दे, किन्तु एक वार फिर देव की याद आते ही बेली----" अगर तुमने मेरे साथ कोई जबरदस्ती करने को चेष्टा भी तो मैं चीखूंगो-चिल्लाऊंगी ---यहां लोग जमा हो जाएंगे।"
"मुझे धमकी देती है -चीख---- खूब चिल्ला…मेरा कुछ नहीं बिगड़ेगा-घूल में मिलेंगे तो तुम्हारे मनसूबे-मेरे साथ तू और तेरा पति भी फांसी के फन्दे पर झूलेगा।"
दीपा को यह वार भी खाली जाता नजर आया तो सकपका गई ।
"मुझ पर तेरी इन खोखली धमकियों का असर नहीं होगा।" उसने एक वार पुन: चेतावनी दी----"सलामत रहना चाहती है तो बता-तुम लोगों से उसका क्या सम्बन्थ है?"
बेचारी दीपा!
बताए भी तो कैसे?
उसने होंठ सी लिए और उसकी चुप्पी से जगबीर शायद समझ गया कि मार खाने के बावजूद वह इतनी जोर से नहीं चीखेगी कि आवाज मकान की सीमाएं तोड सके ।
और हुआ भी यही ।
एकाध वार और पूछने पर भी जब दीपा ने होंठ सिये रखे तो गुस्से में उफनते हुए जगबीर ने बेल्ट घुमाकर पूरी ताकत से उसके जिस्म पर मारी-पीतल के "बक्कल' की जोरदार चोट दीपा की पीठ पर पड़ी-दर्द के कारण वह तिलमिला उठी ।
जगबीर एक वार शुरु हुआ तो फिर इस तरह मारता चला गया, जैसे उसके सामने हाड-;मांस की नहीं, वल्कि रूई की बनी लड़की हो और सचमुच दीपा रूई की ही वनी मालूम पड़ रही थी, क्योंकि इस डर से अपने ज़बड़े उसने सख्ती के साथ भींच रखे थे कि कहीं हलक से चीख न निकल जाए----"मुंह से कराहे और दर्द की बिलबिलाहट निकल रही थी ।
हर चोट पर वह गूंगी मछली के समान तड़प उठती।
कैसी बिडम्बना थी उसके सामने?
वह पिट रही थी, किन्तु मुंह से चीख तक न निकाल सकती थी ।
वह फर्श पर गिर गई-क्रई जगह से कपडे फट गए…जिस्म पर जगह-जगह बने जख्मों से खून बहने लगा, मगर जगबीर ने बिजली की तरह घूमता बैल्ट वाला हाथ तब तक न रोका जब तक स्वय न थक गया ।
जव वह रुका तब तरह-हांफ रहा था ।
स्वयं को होश में रखने के दीपा ने लाख प्रयास किए मगर आंखे बन्द होती चली गई । "
देव वहुत ही ध्यान से जब्बार के चेहरे का निरीक्षण कर रहा था ।
इस केबिन में आने और वास्तविक स्थिति को जानने से जो जब्बार शेर की तरह गर्ज रहा था, वही इस वक्त चूहे से भी कहीं ज्यादा दीन-हीन नजर आने लगा…चेहरा इस कदर पीला पड़ गया कि हल्दी पुती हुई--सी महसूस हो रही थी।
'हत्या’ की कल्पना मात्र ने उसके होश उड़ा दिए थे ।
कुछ देर पहले जो दूसरों के लिए स्वयं 'आतंक' वना हुआ था, वह हल्का…सा झटका लगते ही इतना ज्यादा आतंकित हो उठा कि आंखों में थिरकते मौत के साए साफ नज़र आने लगे---कांपते स्वर में बोला----"न-नहीं-ऐसा मुझसे नहीं होगा ।"
"यह हमे करना पडे़गा ।" देव ने दुढ़त्तापूर्बक कहा । "
"क…क्यों..क्यों करना पडेगा?"
जब्बार' बौखला गया ।
" क्योंकि हम मज़बूर हैं---इसके अलावा हमारे पास कोई रास्ता नहीं है।"
"त-तुम मजबूर होगे ।" वह एक झटके से बोला----" म-मैं भला क्यों मजबूर होने लगा-इस सारे मामले से मेरा कोई सम्बन्थ नहीं है-इसे झमेले से मुझे दुर ही रखो-मुझे तुमसे कोई सौदा नहीं करना--जंगल से उठाकर लूट का माल और तुम्हारी पत्नी लाये----तुम जानो------समझो कि चेकपोस्ट पर मैंने कुछ देखा ही नहीं था-वात खत्म हुई ।"
"बड़ी ही जहरीली मुस्कराहट के साथ कहा देव ने-"तुम्हारे यूं कह देने से बात खत्म नहीं हो जाएगी जब्बार!"
"क्यों नहीं हो जाएगी?"
"पहले ही 'विस्तारपूर्वक समझा चुका हूं कि हम एक किश्ती में सवार हैं---वह किश्ती जो भंवर में फंस चुकी है और अब डूबती-सी नजर आ रही है, मगर याद रखो-अगर हमने प्रयास किए तो किश्ती किनारे लग सकती है, जबकि इसे डूबता जानकर इससे कूदने वाला हर हालत में भंवर में डूब मरेगा ।"
"म--मेरी समझ में कुछ नहीं आ रहा कि तुम क्या वक रहे हो?"