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सुलग उठा सिन्दूर complete

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" जब्बार ने अटैची बॉक्स से निकालकर बेड के ऊपर रख दी---------उसे खोला और देव के साथ-साथ दीपा भी करेंसी नोटों से लबालव भरी अटैची को आंखें फाड़कर देखती रह गई ।

सफलता के कारण जब्बार के होंठों पर थिरक रही व्यंग्यात्मक मुस्कान में कई रंग और अा मिले----बारी-बारी से उन दोनों को देखता हुआ बोला----------"मेरे ख्याल से अब इस बहस में पड़ने की हमें जरूरत नहीँ है कि यहाँ जगबीर नाम का कोई आदमी रहा था या नहीं------------------दोलत सामने है और इसे अकेले हड़प कर जाने की तुम्हारी स्कीम बुरी तरह फ्लॉप हो चुकी है!"

"म-मेरी ऐसी कोई स्कीम नहीं थी!" देव बड़बड़ाया ।

किन्तु उसके शब्दों पर कोई ध्यान न देकर जब्बार ने कहना जारी रखा------"हालांकि जैसा खतरनाक खेल तुमने मेरे साथ खेला है, उसकी रोशनी में मुझे तुम्हारे साथ हुआ हर समझौता पूरी तरह भुला देना चाहिए, मगर मैं तुम्हारी तरह वादा खिलाफी वाला नहीं हुं---------इसमें पांच लाख तुम्हारे हैं---पांच मेरे!"

देव की आंखें चमक उठी ।

उस चमक को देखकर दीपा के जिस्म में एक सिहरन-सी दौड़ गई, जगबीर द्वारा कहे गए शब्द रह-रहकर उसके कानों में गुजंने लगे, मगर वह चुप रही---------शायद दीपा भी देखना चाहती थी कि दौलत के लालच में फंसा उसका सिन्दूर सचमुच सुलग उठा है या नहीं ??

"मगर इनका बंटवारा मेरी दूसरी शर्त पूरी होने के बाद होगा!"

"दूसरी शर्त ?'

"अफकोर्सं-केविन में बैठकर तुमने मेरी वह शर्त भी मानी थी-बोलो-मानी थी कि नहीं----दीपा के सामने चुप क्यों हो - - बीवी के सामने शर्म आ रही है क्या?"

दीपा का दिल बहुत जोर-जोर से उसकी पसलियों पर चोट करने लगा ।

"जवाब दो देव---तुमने शर्त मानी थी या नहीं ?"

"मानी थी!"

उफ-जैसे सैकडों नश्तर दीपा के दिलो-दिमाग और जिस्म में पेवस्त हो गए ।

जब्बार ने चटखारा-सा लेकर पूछा…"क्या शर्त थी वह?"

"दीपा की रात...!"

"खामोश!" भारतीय अबला के मुंह से पहली बार दहाड़ उभरी ---अपनी गन्दी जुबान को लगाम दो मिस्टर देव वर्ना मुंह नोच लुंगी मेरे पति हो--हुहं--तुम हो मेरे सुहाग----जगबीर नाम उस पेशवर गुण्डे ने सही कहा था, मेरा सिन्दूर सुलग उठा है और मुझे खबर ही नहीं-भारतीय स्त्री सदियों से सिन्दूर की लाज पर सती होती अाई हैं, लेकिन अगर उसे तुम जैसे पति मिलते रहे तो ये परम्परा टूट-कऱ बिखर जाएगी!"

देव शान्त खडा रहा, जबकि जब्बार खिलखिलाकर हंसने के बाद बोला-----"शायद तुम्हें अपनी भूल का अहसास हो रहा होगा दीपा डार्लिग कि अाज से एक साल पहले तुम्हारे द्वारा किया गया चुनाव कितना गलत था…अगर तुमने मुझे चुना होता और आज मेरी जगह देव होता तो मैं हरगिज वह पार्ट प्ले न करता जो इसने किया है!"

दीपा से पहले ही देव बोल पड़ा-------'"मैं वेकार की बातों में समय नहीं गंवाना चाहता जब्बार-दीपा तुम्हारे हवाले है-मेरे पांच लाख मुझे दो ।"

मारे नफरत के दीपा मानो पागल होगई-गर्जी-"मैं तुम्हारी जर खरीद गुलाम नहीं हूं---तुम कौन होते हो मेरी एक रात का फैसला करने बाले? '

"तुम्हारा पति?"

"तुम जैसे पति को लाश में बदलकर मैं लग्न मण्डप में टांग सकती हूं !"

" शटअप ।"

"यू शटअप ।" चीखती हुई दीपा गुस्से में भरकर उस पर झपटी, परन्तु देव ने उसे अपने मज़बूत वन्धन में जकड़ लिया ।।

जबकि चटखारा लेता हुआ जब्बार बोला-"अरे..अरे. .अरे यहां तो पति-पत्नी का झगड़ा शुरू हो गया. . नो. .नो. . .मिस्टर देव---तुम्हारी बीबी मुझें इस मूड में नहीं चाहिए---मुझें तो किसी-मुस्कराती दीपा की जरूरत है!"

बंधन से निकलने के लिए बुरी तरह मचल रही दीपा को जकड़े देव ने कहा-"हमारे बीच हुए सौदे में इसका 'मूड' तय नहीं हुआ था, इसके इस मूड की कल्पना तो तुम्हें पहले ही कर लेनी चाहिए थी और फिर वह मर्द ही क्या जो बिगड्री हुई वला को सीधी न कर सके-मर्द हो तो इसे इसी रूप में कबूल करो----अगर यह किसी वेश्या की तरह तुम्हारी बांहों में जा जाती तो क्या मजा आता-बिगड्री हुई औरतों को सीधी करके रात गुजारते का मजा ही कुछ और हेै !"

"बात पसन्द आई-इसे मेरे हवाले करो!"

और दीपा की एक न चली ।।

देव ने अपने मजबूत हाथों से उसे जब्बार की तरफ धकेल दिया ।

 


अपना रिवॉल्वर वाला हाथ उपर उठाकर जब्बार ने दीपा को पकड़ने की कोशिश की ही थी कि दीपा से कहीं ज्यादा तेजी के साथ देव स्वयं जब्बार पर झपटा!

रिवॉल्वर हाथ से निकलकर एक तरफ जा गिरा!

देव का घूंसा उसके चेहरे पर इतनी जोर से पड़ा कि मुह से चीख निकालता हुआ वह "धड़ाम' से फर्श पर जा गिरा ।।

दीपा बेड पर जा गिरी थी ।

देव ने झपटकर रिवॉल्वर उठा लिया_और अगले पल नजारा पूरी तरह बदला हुआ था ।

अपनी तरफ से जब्बार पूरी फुर्ती के साथ खडा हुआ ।

मगर , उसके ठीक सामने खड़ा , देव रिवाल्वर ताने फुंफकार रहा था----" अब अगर तुम हिले भी भेजा उडाकर रख दूगा ।"

जब्बार के होश फाख्ता ।

"ये दौलत मुझे जरूर चाहिए बेटे,

लेकिन अगर तुम ये सोचे हुए थे कि इसके लिए मैं अपनी बीवी की पवित्रता को भंग हो जाने दूगां तो यह तुंम्हारी सबसे बड़ी भूल थी ।"

दीपा चमत्कृत !

"अब तुम रंग बदल रहे हो देव, तुमने खुद मेरी शर्तें स्वीकार की थी! "

"जरूर की थी और इसलिए की थीं कि अगर न करता तो आज तुम मेरे धोखे में न फंसते!"

"क्या मतलब?"

"मतलब साफ है, उस वक्त तुम्हारी मांग मान लेने में मुझे कोई हिचक महसूस नहीं हुई, क्योंकि मेरी योजना के मुताबिक ये शर्तें कभी पूरी नहीं होनी थी और मैं कभी भी तुम्हें दिए गए फतवे का लाभ उठा सकता था जैसे इस वक्त उठाया, इस दौलत को हासिल करने के लिए मैं कभी कोई ऐसा कदम उठाने से नहीं हिंचका, जिससे मुझे नुकसान न हो-उन कदमों में चेकपोस्ट पर तुम्हारी तरफ उछाली गई दीपा की मुस्कान भी थी, दीपा की एक मुस्कान में अपने को वहां से निकाल लेना मेरे ख्याल से घाटे का

सौदा कतई न था---ये दूसरी बात है कि वह मुस्कान सफ़ल साबित न हुई !!

" तुम झूठ बोल रहे हो देव ।" एकाएक दीपा कह उठी-"मुझें सुनाने के लिए तुम जब्बार से यह सब कह रहे हो, हकीकत ये ... ।"

" दीपा, हकीकत वो है जो तुम अब सुन रही हो!"

" 'एक जब्बार की ही क्या बात है?" दीपा ने कहा---' 'क्या तुमने मेरी तरफ़ उठी जगबीर की अश्लील नजरे नहीं देखी थीं, क्या उन्हें सह लेना मर्दानगी थी?"

"उन्हें सह लेना समझदारी थी, पहले ही कह चुका हूं दीपा कि इस दौलत को हासिल करने के लिए मैं कोई भी ऐसा कदम उठाने ---- कुछ भी ऐसी बात सहने के लिए तैयार था, जिससे मुझे या तुम्हें नुकसान न होता हो--------उसने तुम्हे अश्लील नजरों से देखा, मैं दरवाजे की चटकनी के मामले में उससे नहीं उलझा, इन सब बातों से हमारा क्या बिगड गया?"

"ल-लेकिन जब उसने मुझे मारा?"

" तुम्हारी हालत देखकर एक बार को तो मुझे गुस्सा आगया था, शीघ्र ही खुद को सम्भाल लिया, उस वक्त का गुस्सा मेरे सारे सेटअप को बिगाड़ सकता था, इसलिए पी गया और उल्टी उससे ऐसी बाते की कि जिससे उसे लगे कि मुझे तुम्हारी कोई

परवाह नहीं है!"

"वे बाते उसने मुझें बताई थी!'"

"ओह , इसी वजह से मेरे दूध पिलाते वक्त चीख पडी़ थी ।"

दीपा ने पूछा-"वे बाते तुमने उससे क्यों की थी?"

"ताकि वह भोचवका रह जाए!" देव ने बताया---"" अपने उस प्रयास-में मैं सफ़ल था, मनोविज्ञान ये कहता है दीपा कि इंसान वह काम जरूर करता है जो उससे बिना वजह बताए ना करने के लिए कहा जाए-जब मैंने जगबीर से कहा कि 'तुम्हारी' यह हालत देखकर मुझे कोई दुख नहीं हुआ है तो अपनी यह बहादुरी उसे बेकार लगी, जो तुम्हारे जिस्म पर दिखाई थी?"

खुशी के कारण दीपा की अावाज कांप रही थी…"क्या ये सव बाते सच हैं देव?"

"तुम जानती हो दीपा कि मैं तुम्हारी कसम खाने के बाद कमी झूठ नहीं बोल सकता!" कहते हुए देव की नजरें जब्बार पर स्थिर थी---"'और तुम्हारी कसम खाकर कहता हूं कि तुम्हारा लालच देकर मैं इन को चक्कर में जरूर डाले हुए था, किन्तु सिर्फ तब तक जब तककि बात केवल बातों तक सीमित थी--अपनी

योजना के अनुसार मुझे इनमें से किसी को भी तुम तक पहुचने का मौका नहीं देना था और यदि पहुंच जाएं, तब-इतना कांफिडेंस मुझे खुद पर था कि ऐसे वक्त पर नजारा बदल दूगा, ठीक उसी तरह तरह इस वक्त बदला है!"

"द-देव-ओह-देव ।" दीवानी-सी होकर वह दौड़ती हुई उसकी तरफ़ अाई ।

ठीक उसी वक्त जब्बार ने हरकत करने की चेष्टा की, किंतु पूरी तरह सतर्क देव ने बाई कलाई से दीपा को अंक में भरते हुए कहा---" हिलना मत जब्बार, ये न सोचना कि मेरे जीवन के इन भावुक क्षणों का तुम कोई लाभ उठा सकोगे!"

जवार कसमसाकर रह गया ।

 


"ओह...म… मुझे माफ कर देना देव, गुस्से में जाने मैं तुम्हें क्या-क्या कह गई. "

" 'यह वक्त इन बातों का नहीं है दीपा, सामने खड़ा सर्प मोका लगते ही हमें डसने की कोशिश करेगा-मुझे छोड़कर तुम अटैची सम्भालो !"

"न-नहीँ देव. ..अब ये लालच छोडो, हमे वह मनहूस दौलत नहीं चाहिए?"

"बेवकूफी भरी बातें मत करो!" अचानक देव का चेहरा कठोर हो गया----" अब हम उस दौलत को नहीं छोड़ सकते, क्योंकि उसे छोड़ देने से हमारा जुर्म कम नहीं होगा!"

दीपा ने चौककर देव की तरफ देखा, उसके चेहरे पर वही कठोरता थी वह…जो उसके अडिग निश्चय का प्रमाण होती है-वह समझ गई कि देव नहीं सुनेगा ।

सामने पड्री दौलत एक बार फिर उसे लालच में फंसा चुकी है ।

वह अटैची की तरफ बढी ।

" तुम अपनी जगह से हिलोगे भी नहीं जब्बार, क्योंकि अगर हिले फिर कभी हिलने के कविल नहीं छोडूंगा, मेरे हाथ में रिवॉल्वर है-मामले की डोर के सारे सिरे इस वत्त मेरे हाथ में है और इसलिए मुझें तुमसे झूठ बोलने की कोई जरूरत नहीं है, और ये अव भी कह रहा हूं जगबीर मेरे दिमाग की कल्पना नहीं, हकीकत था!"

"फिर वह दोलत छोड़कर यहां से क्यों गायब हो गया?"

"यह सवाल मेरे लिए भी एक गुत्थी है, लॉन में दबी दौलत जाने किसने यहाँ पहुंचा दी, अगर किस्मत ने मौका दिया तो इस गुत्थी को मैं सुलझाऊंगा जरूर मगर... ।"

"मगर.. ?"

"तुमने कहा था न कि मैं इस दौलत को अकेला हड़प कर जाना चाहता हूं ?" देव ने जहरीले स्वर में कहा-"तुमने ठीक कहा था, मगर मेरी योजना वह हरगिज नहीं थी जो तुम सोच रहे थे, अब मैं तुम्हें, यह सारी रकम अकेला हड़प करके दिखाऊँगा ! "

अटैची के नज़दीक पहुच गई दीपा को घूरता हुआ जब्बार बोला-----" देव को रोक लो, वर्ना… ।"

"तुम शायद भूत गए कि रिवॉल्वर मेरे हाथ में है?" '

"मगर तुम उसे चला नहीं सकते, ट्रेगर दबाने का मतलब है यहाँ लोगों इकट्ठा कर लेना और यदि लोग इकट्ठा हो गए गये, तुम अपनी स्कीम में कभी कामयाब न हो सकोगे!"

"यह मैं तुमसे बेहतर जानता हूं कि मुझे क्या करना है, लेकिन इस भुलावे में ना... । जब्बार उसके पीछे देखकर-----"'न----नहीं जगबीर!"

देव वहुत पुरानी जाल में फंस गया।

उसने जैसे ही मुड़कर पीछे देखा वैसे ही जब्बार का जिस्म हवा में लहराकर उसके ऊपर आ गिरा । बौखलाहट में देव के हाथ से रिवॉल्वर 'निकलकर जाने कहां जा गिरा । "

एक दूसरे से गुथे वे-फर्श पर गिरे।

दीपा अपने स्थान पर खडी उन्है देखती रह गई ।

जबकि वे जंगली भेडियों की तरह एक-दूसरे से भिड़े हुए थे----कभी देव हावी हो रहा था कभी जब्बार ।

एक दूसरे से गुथे ही वे खड़े हो गए ।

देव के हाथ जाने कैसे जब्बार की गर्दन पर जम गए और फिर दांत भींचे देव अपनी उंगलियों का कसाव बढाता चला गया ।

शुरू में जब्बार ने भरपूर विरोध किया, परन्तु शीघ्र ही उसका विरोध शिथिल पड़ता चला गया ।

देय होश में न था ।

जब्बार के हाथ-पेर ढीले पड़ते चले गए ।

चेहरा सुर्ख ।

बाहर को उबल पड़ रही आंखों की एक-एक नस चमकने लगी ।

जीभ बाहर को लटकती जा रही थी और उस वक्त उसके हलक से 'गु-गूं' की आवाज़ निकल रही थी जब दीपा दोड़कर उनके नजदीक पहुंची, दोनों हाथों से देव की कलाई को उसकी गर्दन से हटाने की कोशिश करती हुई चीखी--"देव --- देव छोडो इसे, क्या कर रहे हो…मर जाएगा ।"

मगर ।

देव सुने तो तब जब होश में हो ।

खून सवार था उस पर । हाथ लोहे के फौलादी शिकंजे बनकर जब्बार की गर्दन पर कसे थे, चीखती हुई दीपा ने उसकी बाई कलाई पर जोर से काट लिया ।

एक चीख के साथ देव पीछे हटा !

उसकी कलाई पर दीपा के दांतों से वना एक अण्डाकार जख्म था ।

मगर उसके हटने के बावजूद जब्बार पीठ टिकाए खड़ा रहा।

आंखें पूरी तरह बाहर को उबली हुई थीं । कुछ देर पहले सुर्ख नजर आ रहा चेहरा, राख का बना चेहरा-सा महसूस हो रहा था -निस्तेज ।

हाथ-पांव ढीले, जीभ चमडे़ के टुकडे की तरह लटक रही थी ।

जिस्म में जीवन का कहीं कोई चिन्ह नहीं ।

 


दीबार का सहारा लिए खड़ी जब्बार की लाश अभी तक देव को घूर रही थी , जबकि उसे पागलों की तरह झंझोड़ती हुई दीपा चीख पडी़ --- " जब्बार ------ जब्बार !"

बैंलस बिगडते ही लाश किसी भारी बोरे की तरह दीबार के साध फिसली और धड़ाम से फर्श पर गिर गई ।

" य --- ये क्या किया देव , जब्बार मर गया है ।"

देव के मुह से एक शब्द न निकला , किसी स्टैचू में बदलकर रह गया वह ।

घबराकर दीपा ने उसे झिंझोड़ा ----" देव----- देव ----- होश में आओ , जब्बार मर गया है ।"

" मैं जानता हूं ।" अपने स्वर को सन्तुलित बनाने की भरपूर चेष्टा के साथ देव ने कहा ---" मगर अब तुम चीखो मत --- अगर 'तुम्हारी' आवाज किसी ने सुन ली तो .......!"

दीपा के जिस्म में झुरझुरी सी दौड़कर रह गई ।

देव ने सबाल किया ---- " क्या तुमने जब्बार के आने से पहले किसी मोटरसाईकल की आवाज सुनी थी दीपा ?"

" म--मैंनें ध्यान नहीं दिया ।"

" देखना पड़ेगा-----!" बड़बड़ाने के बाद कुछ देर देव चुप रहा , फिर बोला ----" तुम यहीं ठहरो , मैं देखकर आता हूं कि बाहर इसकी मोटर साईकल खड़ी है या नहीं ?"

" न ---नहीं देव ।" दीपा दौड़कर उससे लिपट गई ---" मैं अकेली यहाँ नहीं रह संकूगी, या तो मुझें अपने साथ ले जाओं या फिर इस लाश को यहां से हटा लो!"

"'लाश तो हटानी पड़ेगी ही, लेकिन उससे पहले देखना पड़ेगा कि बाहर मोटर साइकिल है या नहीँ-----अगर है तो सबसे पहले हमे वह हटानी पडे़गी, वह किसी भी समय हमारे लिए मुसीबत खड़ी कर सकती है!"

"केसे ?"

"नम्बर प्लेट देखकर कोई भी समझ सकता है कि मोटर साइकिल किसी पुलिस वाले की है और नम्बर के नीचे छोटे-छोटे अक्षरो में शायद इसने 'जब्बार' भी लिखवा रखा हैे----माई गोड…कल जव जब्बार के गायब होने का समाचार अखबारो में छपेगा तो पुलिस को यह वताने वाला कोई भी व्यक्ति पैदा है सकता है कि फ्लां-से-फ्लां टाइम के बीच उसने जब्बार के मोटर साइकिल यहाँ देखी थी ।"

"ओह ।" दीपा के चेहरे पर रहा-सहा रंग भी उड़ गया।

" आओ , तुम ड्राइंगरूम में बैठना!" दीपा का हाथ पकडकर वह उसे ड्राइंगरूम में ले आया, बोला-" मैं बाहर जाकर देखता हूं ।"

दरवाजा आहिस्ता से खोलकर देव बाहर चला गया, सारे कमरे में चकराती हुई दीपा की दृष्टि श्रीकृष्ण के एक कलेण्डर पर स्थिर हो गई----हाथ स्वयं जुड़ गए, कलेण्डर के पार्श्व में कुरुक्षेत्र दर्शाया गया था और वहां चकराता हुआ सुदर्शन चक्र ।

"ये तुम कैसा चक्र घुमा रहे हो माखनचोर ?" दीपा कह उठि----" पति पर रहम करना, देव भटक जरूर गयां है मगर वह दुर्योधन की तरह दुष्ट नहीं है-उसे सदबुद्धि दो, अगर तुमने मेरा सुहाग उजाड़ा, मैं…त-तो मैं याशोदा की तरह तुम्हें बांधकर. पीटूंगी ।"

दरवाजे पर आहट हुई ।

छलक आए आंसुओं को साड्री के पल्लू से पोंछती हुई है घूमी दरवाजे पर खडे देव ने भी उस कलेण्डर को देखा…साम--दाम, दण्ड और भेद नीति से लोगों को छलने वाला बंसी रहा था ।

"क-क्या रहा?" दीपा ने पूछा ।

उसने दो टूक जवाब दिया……"मोटर साइकिल खडी है ।"

" फिर ?" दीपा कांपकर रह गई ।

"घबराने से कोई समस्या हल नहीं होनी दीपा, बल्कि ऐसी कोई गल्ती हो सकती है जो कल हमारे लिए मुसीबत वन जाए, अत: हमें हर काम सोच-समझकर, पूरे होशो-हवास में उठाना है ।" दीपा जैसे गूंगी हो गई थी ।

"सबसे पहले जब्बार की मोटर साइकिल अपने घर के सामने से हटानी पडेगी!"

दीपा चुप रही और उसकी चुप्पी से थोडा खीजकर देव कह उठा----"दीपा, बोलती क्यों नहीं?"

" क_क्या ?"

"देखो दीपा!" उसे समझाने का प्रयन्त करते हुए देव ने कहा-"जो हो चुका है उसे अव बापस नहीं लाया जा , सकता--अगर हमे बचना है तो उसके लिए प्रयत्न करने होंगे और तुम्हारी मदद के बिना मैं कुछ नहीं कर सकता!"

"य-ये खून भी तो तुमने मेरी मदद से ही किया है?"

"'द…दीपा...प्लीज, व्यंग्य मत करो…मैं इसे मारना नहीं चाहता था!"

"झूठ बोल रहे हो तुम…तुम्हारे दिमाग के अनुसार इसका मर्डर ही समस्या का हल था और जान-बूझकर जब्बार की हत्या की है, ये सव उस मनहूस दौलत ने कराया है!"

"अब बहस में पड़ने का न कोई लाभ है-न समय ।" देव ने कहा…"जों हो चुका है, कानून में उसके लिए एक ही सजा है ---- अगर मुझे उससे बचाना चाहती हो तो मेरी मदद करनी होगी !"

 


" म-मगर मैं तुम्हारी क्या मदद कर सकती हूं ?" दीपा फफक पडी ।

"सिर्फ यह कि हौसला रखो, धैर्य से काम लो---- मन में विश्वास पैदा करो कि इस झमेले से हम निकल जाएंगे-मुझे मोटर साइकिल को लेकर एेसे कहीं ठिकाने लगाने जाना पड़ेगा, इस बीच तुम् यहाँ अपना दिल मजवूत करके रहो!"

"अगर तुम्हें किसी ने जब्बार की मोटर साइकिल पर देख लिया ? "

"ये सारे रिश्क तो लेने ही पड़ेगे, मगर फिर भी मेरे दिमाग ने एक स्कीम है!"

" क्या ?"

"मैं अभी आता हूं तुम यहीं ठहरो!" कहने के बाद देव बेडरूम के अन्दर आ गया, दरवाजा बन्द करके अन्दर से चटकनी चढ़ा ली ।"

लॉन की तरफ़ खुलने वाली खिड़की भी बन्द ।

अटैची बन्द करके बहीं रखी, जहाँ से जब्बार ने बरामद की थी ।"

इसके बाद उसने अपने ही नहीं, बल्कि जब्बार की लाश के भी---बूट सहित सभी ऊपरी कपड़े उतार लिए। अपने कपडों का बंडल बनाकर पुराने अखवार में लपेटा।

बूट सहित जवार के कपड़े पहने ।

जब्बार का पैर शायद उससे एक नम्बर छोटा था । अत: अपने पैर उसने जूतों में जबरदस्ती ठूंस रखे थे और कपडों को देखकर कोई भी कह सकता था कि वे कपड़े उसके नहीं हैं । "

हां, तन पर पुलिस की वर्दी तो थी ही ।

कैप हाथ में लिए वह ड्रेसिंग टेवल के सामने स्टूल पर जा बैठा, कैप एक तरफ रखी-हाथ में थोड़ी-सी क्रीम ली ---उसमें थोड़ा काजल मिलाया, हथेली पर रगड़ा --- गौर से देखने के वाद शायद वह सन्तुष्ट न हुआ-थोड़ा काजल और मिलाया ।

तीस मिनट बाद चेहरे सहित जिस्म का हर हिस्सा उसके वास्तविक रंग से वहुत अलग और काला नजर आ रहा था, सेफ़ से निकालकर काले और चौड़े लेंसों वाला एक चश्मा आंखों पर लगाया- सिर पर कैप रखी ।

शीशे में स्वयं को निहारकर देव सन्तुष्ट हुआ ।

एक कोने-में पड़ा रिवॉल्वर होलस्टरं में ठूंसा, एक हाथ में अपने कपडों और जूतों का बण्डल-दूसरे में मोटर साइकिल की चाबी लिए जव वह दरवाजा खोलकर ड्राइंगरूम में पहुचा तो करीब एक घंटे से प्रतीक्षारत दीपा बुरी तरह चौंककर खडी हो गई ।

चेहरे पर हैरानगी लिए वह देव को अभी तक देखही रही थी कि उसने पूछा-"कैसा लग रहा हुं ?"

"भगवान ही जाने कि तुम क्या करना चाहते हो?"

"जो मोटर साइकिल मुझे चलानी है उसके लिए यह वर्दी जरूरी है!" देव ने कहा----"-फिर अगर किसी ने जब्बार को यहां आते देखा है तो जाते भी दिखना चाहिए ! "

"'म…मगर तुम जब्बार तो बिल्कुल नहीं लग रहे हो, कद-काठी में वहुत फर्क है, कपड़े देखकर कोई बता भी सकता है कि ये तुम्हारे नहीं है ।"

"मेने कब कहा कि मैं जब्बार दिख रहा हूं ?"

" फिर ?"

"आम आदमी को सिर्फ पुलिस की वर्दी दिखती है, बेवजह कोई किसी की शक्ल या कपड़े नहीं देखता------फिर मैं मोटर साइकिल इतनी तेज चलाऊ'गा कि कोई मेरी शक्ल और कपडों की तरफ़ ध्यान ही न दे सकें-ये मेकअप सिर्फ उस मोटर साइकिल के साथ खुद को खपाने के लिए है!",

"अगर रास्ते में कहीं जवार का कोई परिचित मिल गया ?"'

"तो खेल खत्म समझे!"

"क-क्या मतलब?" दीपा हकंला गई ।

"खेल खत्म का मतलब खेल खत्म ही होता है दीपा ।" देव ने कहा, "ये वर्दी, ये मेकअप मैंने खुद को जब्बार साबित करने के लिए नही किया है और न ही पुरजोर कोशिश के वाद मैं जब्बार दिख सकता हूं---ये सव सिर्फ एकं पुलिसवाला दिखने और अपना

वास्तविक हुलिया छपाने के लिए किया है-जानता हूं कि किसी के भी द्वारा गौर से देखते ही पकडा जाऊंगा और यदि जब्बार का कोई परिचित मिल गया तो यह समझा जाएगा कि हमारा मुकद्दर वहुत खराब था!"

दीपा कांपकर रह गई ।

 


"इन सव खतरों से गुजरते हुए मुझे यह मोटर साइकिल ठिकाने लगानी होगी!"

"क-कहां और कैसे?"

"शहर के बाहर हिंडन नदी है, उसके समानान्तर दूर तक एक कच्चा रास्ता-चला गया है, जो अक्सर सुनसान पड़ा रहता हे-मेरा मैं इरादा वहीं जाने का है, उपयुक्त स्थान और माहौल देखकर मोटर-साइकिल मुझें नदी में डाल देनी है!" `

"य-यह काम वहुत खतरनाक है!"

"फिर भी मुझें करना पड़ेगा, तुम यहीं रहना दीपा और हौंसला बनाए रखना----तुम्हारे भगवान ने साथ दिया तो सब कुछ सही-सलामत निपट जाएगा, कोई आए तो कहना कि मैं धर पर नहीँ' हूं और शायद समझाने की जरूरत नहीं है कि किसी को बेडरूम में न जाने देना ।

" अ--अपना ख्याल रखना देव!" दीपा के आंखें डबडबा गई ।

देव के निकलते ही दीपा ने दरवाजा अन्दर से बन्द कर लिया, दौड़कर कृष्णजी के कलेण्डर के सामने पहुंची और पालथी मारकर वहीं बैठ गई ।

नेत्र बन्द, हाथ जुडे हुए।

मन-ही-मन अपने सुहाग की रक्षा के लिए गिड़गिड़ाती रही वह ।

धीरे-थीरे शाम हो गई ।

अजीव-अजीब भयंकर और डरावनी शंकाएं उसके मस्तिष्क में जहरीले सर्प बनकर गिज़बिजाने लगे और जव अचानक दरवाजे पर दस्तक हुई तो वह उछल पड़ी । दीवानावार भागती हुई दरवाजे तक पहुंची, कि फिर शायद इस विचार के वशीभूत ठिठक गई कि कौन हैं सम्भलकर उसने सन्तुलित स्वर में पूछा--"क-कौन हैं?"

"मैं है दीपा?"

इस आवाज़ को वह लाखों में पहचान सकती थी । तेजी-से आगे बढ़कर उसने दरवाजा खोल दिया----देव को देखते ही राहत नाम की चीज उसकी आत्मा तक उतरती चली गई और जब देव हल्के से मुस्कराया तो दिमाग में गिजविजाते जहरीले सर्प एकाएक जाने कहीं गायब हो गए?

अन्दर जाकर उसने दरवाजा बन्द करते हुए पूछा…" कोई आया था?"

" न-नहीं-आप तो ठीक हैं?"

"हां ।" अागे वढ़कर वह एक सोफे पर ढेर होता हुआ बोला----"काम सही सलामत निपट गया है, कहीं कोई खास गड़बड़ नहीं हुई-कच्चा रास्ता पैदल तय करने की वजह से थोड़ी थकान है!"

दीपा ने मन-ही-मन भगवान का शुक्रिया अदा किया ।

एक सिगरेट सुलगाने के बाद ,देव ने कहा--" सबले ज्यादा टिपीकल काम पूरा हो चुका है दीपा, अव हमे बहुत ज्यादा चिन्तित होने की कोई जरूरत नहीं है!"

"अन्दर जब्बार की लाश जो पड़ी है!"

"वह कोई खास प्राब्लम नहीं है, केवल उस गड्डे को कब्र में बदलना होगा, जिसमें हमने अटैची दबाई थी और इस काम के लिए हमें रात की इन्तजार करनी पडेगी!"

हर तरफ़ रात का सन्नाटा । कमरे में घुसते ही थकान से बुरी तरह चूर देव सोने पर गिर पड़ा----दीपा दरवाजा बन्द करके अन्दर से चटकनी चढ़ा ली----जब्बार की लाश को दफनाने में हालांकि उसने देव की कोई खास मदद न की थी, किन्तु फिर भी वह थकी हुई थी-उसके समीप सोफे पर बैठ गई ।

"किस्सा खत्म-अब हम दस लाख के मालिक है दीपा!"

"मैं खुश नहीं हूं देव!" ".

" क्यों ? "

"जिस लाश को दफ़नाकर तुम किस्सा खत्म समझ रहे हो वह कभी भी कोई भी रंग दिखा सकती है-कोई नहीं जानता कि जुर्म के बीच से फूटा हुआ पौधा कब कहां सिर उभार दे?"

"ये सब कानून द्वारा प्रचारित बातें हैं---- इस वक्त सिर्फ इसलिए खुश नहीं हो, क्योंकि डरी हुई हो…जब तुम्हारे दिमाग से डर निकल जाएगा और दस लाख का इस्तेमाल करोगी तो महसूस होगा कि खुशी क्या होती है?"

दीपा चुप रह गई ।।

वह जानती थी कि देव से बहस करने का कोई लाभ नहीं है और थकान के बावजूद प्रसन्नचित्त नजर अा रहे देव ने एक सिगरेट सुलगाई-खड़ा होता हुआ बोला- दो कप चाय वना लो । "

" तुम ?"

" मैं बेडरूम में हु-अभी तक दस लाख को जी भरकर देखा तक नहीं है!" वह अन्दर वाले कमरे की तरफ बढता हुअा बोला----"अब बाकायदा उनसे वात करूंगा?"

दीपा कूढ़कर रह गई । जाने क्या-क्या कहने की इच्छाओं की कब्र दिल में लिए वह किचन की तरफ बड़ी ।

 
उधर…बेडरूम में पहुंचकर देव ने लाइट ओंन की-सिगरेट में मस्ती के साथ कश लगाता हुआ वेड के समीप पहुचा-प्लाई उठाते ही उसके हलक से घुटी-घुटी-सी चीख निकल पडी ।

बुरी तरह हड़बड़ा उठा ।

फ़टी-फटी आगे से बाँक्स में लेटी लाश को देखता रहा---" सुक्खू की लाश थी-एकाएक लाश के होंठ मुस्कराने के अंदाज में फैले और वातावरण में बैसी ही खिलखिलाहट गूंज गई , जैसे कोई चुड़ैल मुंह में पल्लू ठूंसकर हंसी हो ।।

लाश के सफेद दांत चमके थे उसे ।

बुरी तरह बौखलाकर देव ने प्ताईनुमा ढक्कन बन्द किया और खुद 'धम्म' से उस पर बैठ ।।

तभी हड़बड़ाई-सी दीपा ने कमरे में दाखिल होकर पूछा-"क-----क्या हुआ देव ?"

"य-यहां लाश है!" देव की आवाज कांप रही थी ।

दीपा के होश उड़ गए ।

बॉक्स के अन्दर से सुवखू की लाश प्लाईनुमा ढक्कनं को उठाने का प्रयास कर रही थी, किन्तु देव के वजन के कारण वह पूरी तरह कामयाब न हो पा रही थी ।

कमरे में 'खट्ट-खट्ट' की आवाज गूंजने लगी ।

दीपा यही मुश्किल से पूछ पाई--" क-किसकी लाश ?"

देव के किसी जवाब से पहले ही वेड के बक्से का दूसरा हिस्सा खुला ।

दीपा चीखकर पीछे हट गई-हड़बड़ाकर देव भी खड़ा हो गया और उसके खडे होते ही प्लाईनुमा ढक्कन तेजी से उलट गया-बॉक्स के दूसरे हिस्से से उछलकर जगवीर बाहर अाया ।

"त-तुम ?" देव चीख पड़ा ।

तभी उसके नजदीक वाले बॉक्स से सुक्खू की लाश बाहर निकली और उसे देखते ही मारे डर के दीपा वापस भागी, किन्तु ड्राइंगरूम में पहुचते ही ठिठक गई ।

स्तब्ध रह गई वह ।

भय की ज्यादती के कारण मुंह से कोई आवाज न निकल सकी-आखें सोफे पर बैठे एक बूढे़ पर स्थिर, सम्मोहित-सी हो गई--दीपा हिली तक नहीं-जैसे चाबी खत्म होने पर खिलोना रुक जाता है ।

सोफे पर बैठा था बूढ़ा कुवड़ा ।

जिस्म पर भिखारियों जैसा लम्बा चोगा--सन की तरह सफेद लम्बे वाल-वैसी ही धनी दाढी-मूंछें और धातूरे के नशे से सुर्ख कटोरे जैसी मोटी-मोटी आंखें ।

कुछ देर बाद देव ने भी उस कमरे में कदम रखा ।

उसके एक तरफ़ जगबीर था-दूसरी तरफ़ सुक्खू-दौनों के हाथ में रिवॉल्वर ।

"द-देब ।" वह चीखकर देव से जा लिपटी।

" बहुत चीख-पुकार हो चुकी!" एकाएक जगबीर गुर्राया…"अब अगर दोनों में से किसी के मुंह से आवाज निकाली तो अंजाम वही होगा "जो तुमने सब-इंस्पेक्टर जब्बार का किया है!"

देव की दृष्टि सोफे पर बैठे भिखारी पर स्थिर थी।

साफ़ नजर आ रहा था कि उसके बाल--मूंछ और दाढ़ी नकली है--उनका इस्तेमाल उसने अपना वास्तविक चेहरा छुपाने के लिए किया है-अचानक भिखारी के हलक से आवाज निक्ली----"'शायद अाप लोग सबसे ज्यादा हैरान सुवखू को देखकर होंगे, क्योकि आपकी नजरों में यह उसी वक्त मर चुका है, जव जंगल में आपने इसके जख्म से गोली निकलने की कोशिश की थी, मगर वहाँ आप धोखा खा गए ये, क्योंकि वास्तव में सुवखू में एक ऐसी क्वालिटी है कि वह लगातार दो घटे तक न सिर्फ सांस रोक सकता है-बल्कि नब्ज और दिल की धडकन भी बन्द रख सकता हे-उस दोरान बड़े से बडा डॉक्टर भी इसे मृत घोषित करेगा?"

"'तुम कौन हो और हमें यह सारा नाटक दिखाने का क्या मतलब?"

"जमाना नाटक का नहीं रहा मिस्टर देव…फिल्म का आ गया है--------------छोटे-छोटे बच्चे भी आजकल पढाई छोड़कर फिल्में देखने लगे हैं इसलिए हमने फैसला किया कि क्यों न आप लोगों को भी एक फिल्म दिखाई जाए-क्यों सुक्खू ?"

"यस कमाण्डर-अाप कभी कुछ गलत नहीं कहते!"

" गुड !" कहते हुए भिखारी ने अपनी गन्दी झोली से पोर्टेबल टी.वी. और वीसीआर. निकलकर सेटर टेबल पर रख दिया ।

भिखारी ने वीसीआर. का कनेक्शन टीबी. को दिया----सुक्खू ने उसे बिजली के एक स्विच से जोड़ा-स्क्रीन पर लाईट आ गई । देव और दीपा र्किकर्त्तव्यबिमूढ़ से सव कुछ देखते रहे ।

 


भिखारी ने झोले से एक कैसेट निकालकर वीसीआर. में डाल दी और प्ले का स्विच आन करते ही फिल्म शुरू हो गई-----प्रारम्भिक के

दृश्य देखते ही देव-दीपा उछल पड़े ।

इसी कमरे में खड़ा सब-इंस्पेक्टर जवार देव पर इलजाम लगा रहा था कि लूट की दौलत को अकेले हड़प कर जाने के लिए उसने क्या चाल चली ।

देव ओर-दीपा सफाई देते नजर आ रहे थे ।

वे समझ गए कि जब्बार के कल्ल की पूरी वीडियो फिल्म तैयार कर ली गई है और इस सच्चाई ने उन्हें आत्मा की गहराई तक हिलाकर रख दिया ।।

छोटी-सी स्क्रीन पर फिल्म चल रही थी।

डायलॉग गूंज रहे थे ।

सब कुछ शीशे की तरह साफ ।

हर दृश्य को वे ठीक उसी तरह स्तब्ध अंदाज में देख रहे थे, जैसे बच्चे अमिताभ की मौत के दृश्य को दुनिया-जहान भुलाकर देखते हैं ।

उधर-स्कीन पर देव जब्बार की गर्दन दवा रहा था और इधर-स्क्रीन के सामने खड़ा देव चीख पड़ा---"स्टॉप इंट-प्लीज़ स्टॉप इंट...इसे ,बन्द कर दीजिए!"

भिखारी ने साउण्ड वॉल्यूम कम करते हुए पूछा…"क्यों----फिल्म पसन्द नहीं अाई ?"

" आप लोग क्या चाहते हैं मुझसे ?" वह बुरी तरह हांफ़ता हुआ बोला-----चेहरा पसीने-पसीने हुआ पड़ा था…दीपा को काटो तो खून नहीं !

" हमारे शूटिंग सेक्शन की तुम्हें तारीफ़ करनी पड़ेगी!" भिखारी ने कहा…"तुम लोग चाहे इस कमरे में रहे या अन्दर वाले में, मगर कैमरों की रेंज तुम पर रही और मजे की बात ये है कि एक नहीं, तीन-तीन कैमरों की मौजूदगी के बावजूद तुम्हें इल्म न होने दिया गया कि शूटिंग चल रही है ।"

स्क्रीन पर जवार मर चुका था ।

"भगवान के लिए इसे बद कर दीजिए!" देव दांत भीचकर गिड़गिड़ा उठा ।

"ये बेचारी तुम्हारा क्या ले रही है-साउण्ड तो मैंने घटा ही दिया हेै-फिल्म चलने दो-उससे बातो में डिस्टर्ब नहीं होता…क्यों सुक्खू ?"'

"यस कमाण्डर-अाप कभी कुछ गलत नहीं कहते ।"

स्कीन पर पडी जब्बार की लाश को देखकर देव और दीपा के छक्के छूटे जा रहे थे, जबकि कुबड़े भिखारी ने विशिष्ट अंदाज में अपनी ऊगलियों से नाक खुजलाते हुए कहा----" वह वक्त आ गया है जव तुम पति-पनी को जान लेना चाहिए कि अब तक जो भी हुआ उसका रचयिता मैं हूं-स्क्रीन पर जो फिल्म चल रही हैं अाप लोग मुझे उसका लेखक और डायरेक्टर भी कह सकते हैं!"

"क-कया मतलब?" देव बड्री मुश्किल से पूछ पाया ।

अाम-तौर से लोग मानते है कि दुनिया एक बहुत बडा रंगमंच है-मगर सव एक बहुत बड़े नाटक में काम करती कठपुतलियां…इन कठपुतलियों की डोर भगवान के हाथ में है…ठीक इसी तरह ट्रेजरी में पड़ी डकैती से जो फिल्म शुरू हुई तुम सब उसके आर्टिस्ट हो-तुमने वही पार्ट प्ले किया जो मैंनें कराया----स्क्रीन पर नजर अाने वाले अदाकारी की डोर लेखक और डायरेक्टर के ही हाथों में होती है न?"

"मैं समझा नहीं!"

दीपा के मुंह से एक लफ्ज न निकला, जबकि कूबड़े भिखारी ने थैले से एक अन्य वीडियो फिल्म निकाली-पहली फिल्म वी.सी.आर. से निकालकर उसमें -दूसरी डाली और इस बार प्ले का स्विच आंन करते ही स्क्रीन पर जंगल का दृश्य उभर अाया ।

सुवखू के जिस्म से गोली निकालने का प्रयास करते देव और दीपा ।

कमरे में सुक्खू की उस वक्त की चीखें गूंजने लगीं ।

देव और दीपा को काटो तो नहीं ।

"यह मेरी फिल्म का पहला दृश्य---------अगर अब भी नहीं समझे तो सुनो !"

कहने के बाद कुबड़े भिखारी ने पुन: अपने विशिष्ट अंदाज में नाक खुजलाई और वोला-----"सबसे पहले लेखक के तौर पर मैंने एक सशक्त कहानी तेयार की अस कहानी का अधार तुम्हारी दौलत हासिल करने की महत्वाकांक्षा थी---हमें मालूम था कि अपनी शादी की वर्षगांठ पर तुम औंघड़नाथ के मंदिर जाने बाले हो--------उससे ठीक एक दिन पहले ट्रेजरी में मेरे इशारे पर डकैती डाली गई----वहां हमारा एक साथी मारा गया----उसका हमें अफसोस है, किन्तु फिर भी---सुक्खू दौलत से भरी---मैटाडोर के साथ वहां पहुंचने कामयाब हो गया जहां मेरे द्वारा तैेयार की गई कहानी के अनुसार इसे पहुचना था…अगले दिन…सूक्खू द्वारा तुम्हे सड़क से मैटाडोर तक ले जाना---अपने जिस्म से गोली निकलवाने के दौरान मर जाने का नाटक करना आदि मेरी कहानी के महत्वपूर्ण प्वाइंट थे, जो बडी खूबसूरती के साथ शूट किए गए! "

 


सुवखू की मौत के बाद स्कीन पर चल रही अपनी और दीपा की तकरार पर नज़रे टिकाए देव ने पूछा----"ये सव तुमने क्यों किया?"

"क्योंकि जानता था कि उन हालातों में लूट की दौलत को हथिया लेने के अलावा तुम्हारे जेहन में कोई अन्य विचार नहीं आएगा-----तुमने हर पल----हल कदम पर वही किया, जिसका अनुमान मैं तुम्हारा करेक्टर रीड करके पहले ही लगा लिया था!”

देव की जुबान तालू में जा चिपकी थी ।

"जगबीर को ठीक उसी तरह तुम्हारे धर में घुसकर तुम पर हावी होना था जिस तरह हुआ, मगर जब्बार एक ऐसा करेक्टर था, जो जबरदस्ती मेरी कहानी में घुस अाया---और शायद तुम समझ सकते हो कि अपनी कहानी में घुस जाए अनचाहे करेक्टर से लेखक बौखला उठता है-यही हालत मेरी हो गई----मुझे अपनी सारी कहानी छिन्न-भिन्न होती नजर आई !"

"म-मैं समझ नहीं पा रहा हूँ कि तुम क्या कह रहे हो?"

"हमें एक खास काम है-ऐसा काम जिसे सिर्फ तुम ही अंजाम दे सकते हो, मगर जानते थे कि सामान्य अवस्था में हमारे आदेशों का पालन नहीं करोगे, इसलिए तुम्हें दौलत के चक्रव्यूह में फंसाकर मजबूर करने की योजना बनाई किन्तु जब्बार बीच में आ गया-पहले से तेयार की गई अपनी कहानी में मैंने-जब्बार के द्वारा चेकपोस्ट पर दौलत को देख लिए जाने की कल्पना न की थी, इसीलिए जब ऐसा हुआ तो मैं बौखला गया, परन्तु वह बौखलाहट बहुत ज्यादा देर तक कायम न रही…दौलत को हथियाने के चक्कर में तुम जवार और जगबीर को टकराने के लिए साजिशें रचने लगे और उन्हें साजिशों की वजह से हमने जब्बार को भी अपनी कहानी में एडजेस्ट कर लिया-हमारे ही इशारे पर जगबीर ने ऐन वक्त पर इस स्थान से बाहर न निकलने का फैसला करके जब्बार के हाथों इसका कत्ल कराने की तुम्हारी स्कीम पर पानी फेर दिया और ऐसे हालात पैदा कर दिए जिनमें फंसकर अपने हाथों से जब्बार का कल्ल कर दो…दोलत को लॉन से बेडरूम में पहुचाना-एकाएक जगवीर का गायब हो जाना आदि हमारी ही स्कीम के अंग थे और उसमें फंसकर तुमने जब्बार की हत्या कर दी!"

देव के मन-मस्तिष्क और तन-वदन पर हैरत का पहाड़ टूटकर गिर पड़ा-उसने स्वप्न में भी नहीं सोचा था कि सुवखू , की नकली मौत से लेकर जब्बार के कत्ल तक, की धटना किसी की साजिश हों सकती है-यह सोचकर हैरत से उसकी आंखें फटी की फटी रह गई कि अपने स्वतंत्र मस्तिष्क से उसने अब तक जो कुछ किया वह किसी के इशारे पर किया था मुंह से एक लफ्ज न फूट सका, जबकि कुबड़ा भिखारी कहता चला गया "इस वक्त लूट की दौलत हमारे कब्जे में है----जितने समझदार तुम हो उतना समझदार आदमी सहज ही कल्पना कर सकता है कि अगर हम ये फिल्म अदालत को दिखा दे तो वह क्या फैसला सुनाएगी?"

दीपा में तो मानो सोचने-समझने की शक्ति ही न बची थी--देव की रूह तक कांपकर रह गई-वह बड़ी मुश्किल से बोल पाया…"इतना सब कुछ आपने क्यों किया?"

"वेरीगुड-----शीघ्र मतलब की बात पर अाकर साबित कर दिया कि तुम समझदार हो!" कुबड़े भिखारी ने विजयी मुस्कान के साथ कहा-दरअसल हम सिर्फ यह चाहते हैं कि तुम अपनी बीबी के साथ अपने दोस्त के इस फटीचर मकान में नहीं,.बल्कि अपने माता-पिता के साथ उनकी आलीशान कोठी में रहो!"

कुबड़े भिखारी की मांग सुनकर देव की बुद्धि चकरा गई…मुंह से बरबस ही निकला-"इससे तुम्हें क्या लाभ होगा?"

"फिलहाल तुम केवल इतना समझ सकते हो मिस्टर देव कि मैं टूटे हुए परिवार बर्दाश्त नहीं कर पाता-उन्हें जोड़ना ही मेरा काम है-----तुम कर्नल भगतसिंह के इकलौते पुत्र हो-दीपा से शादी के बाद उससे अलग रहने लगे-कर्नल भगतसिंह के बुढापे के लिए मैं इसे उचित नहीं समझता, अत: चाहता हूं कि उसकी लाठी बनकर साथ रहो!"

देव न समझ सका कि कुबड़े भिखारी की इस मांग के पीछे क्या छुपा है --- बोला----" तुमने मेरे पिता का सिर्फ नाम सुना हे-उनके करेक्टर को में शायद ठीक से जानते नहीं हो!"

" क्या मतलब?"

"वे मर जाना पसन्द करेंगे, किन्तु दीपा के साथ मुझे स्वीकारेंगे नहीं-वहां रहना तो दूर----अपनी कोठी में हमारी एंट्री तक को वे बर्दाश्त नहीं केरेंगे-----वे वहुत जिद्दी और सिद्धान्तवादी व्यक्ति हैं-मैं समझ सकता कि मां मुझे ही नहीं, बल्कि अपनी बहू को भी एक नजर के लिए चौबीस घंटे तड़पती होगी, परन्तु आज एक साल गुजर गया है…न उन्होंने खुद हमारी कोई खबर ली और न ही मां को हमसे मिलने दिया!"

"मैँ जानता हुं.!"

"फिर भी कह रहे हो की । "

"कर्नल भगतसिंह बहुत जिद्दी है-अपनी जिद के कारण ही उसने न तुम्हारी खबर ली और न ही तुम्हारी मां को तुमसे मिलने दिया, परन्तु अन्दर-ही-अन्दर वह पुरी तरह टूट चुका है-अपने इकलौते बेटे के लिए तड़प रहा है और इस वक्त वह उस

स्टेज पर है जहां यदि तुम स्वयं जाकर उससे माफी मांगो-उसफे साथ रहने की बात कहो तो वह तुम्हें तुरन्त' माफ़ ही नहीं कर देगा बल्कि दीपा को भी स्वीकार कर लेगा क्योंकि ऐसो होने पर उसकी जिद बनी रहेगी ।"

उसकी उसकी आंखों में झांकते हुए देव ने पुछा----" तुम इतना सब कैसे जानते हो?"

"मेरे पास कर्नल भगतसिंह की आवाज से भरा एक टेप है जो वक्त आने पर तुम्हें सुनाया जाएगा-फिलहाल वही करो जो मैं कह रहा हूं ।"

"लेकिन ------- !"

"में इंकार सुनने का आदी नहीं हूँ मिस्टर देब!" एकाएक कुवड़े भिखारी का स्वर खुरदरा और सख्त हो गया ।

देव का सारा जिस्म कांपकर रह गया ।

कुवड़ा भिखारी कहता चला गया…अगर तुमने मेरे आदेशों का पालन किया तो न सिर्फ लूट के दस लाख तुम्हें लौटा दिए जाएंगे, बल्कि कामयाबी पर दस लाख तुम्हें हम अपनी तरफ से देगे-सोच लो…सोचने के लिए तुम्हारे पास अभी काफी वक्त है-एक तरफ़ जेल की कोठरी ही नहीं बल्कि फांसी का फंदा है-दूसरी तरफ़ दस नहीं------बील लाखं रुपये----जिसे चाहो चुन सकते हो…क्यों सुक्खू ?"

"यस कमान्डर अाप कभी कुछ गलत नहीं कहते ।"

आयु पचास के अास-पास-कद साढे़ छः फुट -बलिष्ट जिस्म औऱ रोबीले चेहरे वाले कर्नल भगतसिंह जिस्म में कहीं भी-हल्का-सा झुकाव न था-अघेड़ होने के बावजूद अभी तक वह जबान शेर नजर जाता था…मक्खन में मिले सिन्दुर जैसे रंग वाले भगतसिंह के चेहरे पर कटारीदार मुछों और भवों का एक भी बाल सफेद न था।

सुर्ख, मोटी एवं सामने खडे व्यक्ति की पसलियां तक गिन लेने में सक्षम नजर आती अांखों के इस मालिक के जिस्म पर मिलिट्री की वर्दी ठीक उसी तरह फबती थी, जैसे नारी की गोद में बच्चा ।

 
सुबह का वक्त ।

जिस्म पर गाउन डाले लॉन में पड़ी चेयर पर बैठा वह आज का अखवार देखारहा था कि ध्यान कोठी के लोहे वाले द्धार की तरफ चला गया…वहां खड़े दो सेनिक किसी से उलझे हुए थे-----भगतसिंह उसे न देख सका, जिससे वे बांते कर रहे थे । अतः कुर्सी पर वैठे-ही-बैठे उन्हें आवाज़ में पूछा…"कौन है बंतासिंह?"

सिपाही अभी कोई जवाब न दे पाया या कि देव और दीपा पर उसकी नजर पड्री-उन्हे देखते ही भगतसिंह इस तरह चौंककर खड़ा हो गया जैसे बिच्छू ने डंक मारा हो…हलक से गुर्राहट फूट पडी…-""त----तुम?"

"हां-हां बाबू जी !" देव बड़ी मेहनत के बाद कह सका-"म-मैं हूं !!

भगतसिंह ने अखबार ऐक तरफ फेंका-एकाएक उसका समूचा चेहरा भभकने लगा था…भृकुटियां तन गईं…मोटी भवे कमान के मानिन्द फड़कने लगी और घास को रोंदता हुआ-सा जब वह कि उनकी तरफ बढा तो देव का हलक सूख गया ।

दीपा की टांगें कांपने लगी ।

दिल हथोड़े की शक्ल अख्तियार कर रह रह कर पसलियों पर चोट करने लगा…भगतसिंह उनके नजदीक पहुचा---- इस वक्त वह उसे कच्चा चबा जाने के से अंदाज में घूर रहा था, उस वक्त दोनों के जिस्म में सिहरन दोड़ती चली गई ।

मारे दहशत के देव के हलक से आबाज न निकल सकी ।

जबकि भगतसिंह गुर्राया-"'इस दरवाजे के अन्दर झांकने की तुम्हारी हिम्मत कैसे हुइं?"

"व-बो बात ये बाबूजी कि?"

"खामोश!" कर्नल भगतसिंह इतनी जोर से दहाड़ा कि वे हिलकर रह गए---"' एक लफ्ज सुनना नहीं चाहता------''' जाओ यहां से-तुमसे मेरा कोई सम्बन्ध नहीं है!"

देव और दीपा के हलक सूख गए।

हिम्मत करके दीपा भगतसिंह के चरणो में झुकी कर्नल इस तरह पीछे हट गया जैसे उसने किसी नागिन के फन को पैरों की तरफ बढ़ते देखा हो-चींखा'-""पीछे हटो !"

देव ने डरते हुए कहा…"हमें माफ़ कर दो बाब्रूजी!"

"म-माफ...तुझे माफ कर दूं नालायक!"

अभी भगतसिंह का वाक्य पूरा न हुआ था कि बरांडे से दौड़कर लॉन में आती हुई एक अधेड़ महिला चीख पडी-------" द--देव ।"

"‘म…मां!" समय का लाभ उठाने की मंशा से देव भावुक स्वर में चीखकर उसकी तरफ़ लपका------उधर--साल की अवधि और ममता ने महिला को तो सचमुच पागल ही कर दिया था-दोड़कर यह देव से लिपट गई ।

"होश में आओ अंजली! ” भगतसिंह दहाड उठा…"हमारे घर में उस पाजी के लिए कोई जगह नहीं है, जिसने हमारा हुक्म मानने से इंकार कर दिया!"

"द-द-देव हमारा बेटा है नाथ!"

"तुम्हारा हो सकता है…मेरा यह कोई नहीं!"

" ऐसा न कहिए नाथ!" अंजली तड़प उठी-"बच्चा अगर गलती कर दे तो वह मां-बाप का दुश्मन नहीं वन जाता…माफ़ कर दीजिए इसे !"

"म-माफ?" अत्यधिक क्रोध में कर्नल भगतसिंह दांत भींचकर कह उठा…"इसे माफ कर दूं …इस पाजी को, इसने हमारी इच्छा के विरुद्ध न सिर्फ शादी की हैं बल्कि पूरे एक साल से हमें तड़पा भी रहा है…इतना खुद्दार हो गया ये कि इस एक साल में एके पल के लिए भी पलटकर इधर न देखा-जानने की कोशिश नहीं की कि मां-बाप किस हाल में हैं?"

"बाबूजी ।"

""श……शटअप ।" बुरी तरह चीखते हुए कर्नल भगतसिंह की आंखें भर आईं-."‘अपनी गन्दी जुबान से हमारा नाम न लो…तुम शायद हमें यह दिखाना चाहते थे कि अगर हम गुस्से वाले हैं तो कम तुम भी नहीं हो--- हमने घर से निकाल दिया तो तुमने पीछे पलटकर नहीं-देखा---कभी जानने की कोशिश नहीं की कि मां-वाप जिन्दा हैं या मर गये ?"

दीपा जहाँ आश्चर्य से अपने ससुर को देखती रह गई, वहीं यह समझते ही देव का हौंसला बढा कि बाबूजी उसके प्रति भावुक हैं…उनका गुस्सा. इसी भावुकता के कारण है…हिम्मत करके बोला-म-म--मुझे माफ कर ।।"

" बार-बार इन शब्दों को दोहराकऱ दिमाग खराब मत करो!" आंखों में आंसू भरे भगतसिंह गुर्राया…"मैं ये जानना चाहता हूं कि आज तुम यहाँ क्यों अाए ?"

"केसी बात कर रहे हैं आप?" अंजली कह उठी…" हर रोज अाप इनकी इन्तजार करते रहे हैं, कहते रहे हैं कि अगर आपने गुस्से में इन्हें घर से निकाल दिया था तो इसका मतलब ये तो नहीं नहीं कि ये पलटकर देखे ही नहीं…आज इन्हें खुद अपनी गलती का अहसास हुआ है, माफी मांगने अाए है तो अाप !"

"आज मुझे यह शिकायत नहीं है अंजली कि इसने मेरी इच्छा के विरूद्ध शादी की…शिकायत ये है कि ये आज अाए हैं…एक साल बाद…इस बीच क्या कभी इन्हें हमारी याद नहीं आई…हमारी तरह क्या ये कभी हमारे लिए नहीं तड़पे?"

"हम तड़पे है बाबूजी ।" देव ने सफेद झूठ वोला-"एक दिन भी ऐसा नहीं गुजरा जब हमें आपकी याद न अाई हो, मगर !"

"मगर "

"आपसे डरे होने के कारण न अा सके!""

"आज डर नहीं लगा?"

"पांच दिन पहले हमारी मैरिज एनीवर्सरी थी, यही दिन जव आपने नाराज होकर हमें घर से निकाल दिया था…उस दिन हमे आपकी बहुत याद आई-सारे दिन रोते-तड़पते रहे, मेरी पीडा देखकर दीया यहां आने और आपसे माफी मांगने की जिद करने लगी……डर का मारा मैं न माना किन्तु आज, यह कहकर दीपा मुझे यहां ले ही आई कि वह खुद आपसे माफी मांगेगी, इसे विश्वास था कि जो विनती वह आपके पैर पकड़कर करेगी, अाप उसे टाल न पाएंगे!"

 
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