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सुलग उठा सिन्दूर complete

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"यानी अब भी इसके दबाव डालने पर आए हैं?"

"ऐसा सोचकर इनकी भावनाओं का अनादर न कीजिये बाबूजी?" पति का साथ देने हेतु दीपा झूठ बोलती चली गई----" केवल आपसे अत्यधिक डरे हुए होने के कारण न आ पा रहे थे, जबकि सच्चाई यह है कि आपको और मांजी को याद कर-करके पिछले पांच दिन से लगातार आंसू वहा रहे हैं, इनकी यह तड़प , मुझ पर देखी न गई और आपसे हाथ जोड़कर यह विनती करने आईं हू कि मुझ अभागिन को न सही, अपने बेटे को स्वीकार कर लीजिए वावूजी!"

"तुम्हें क्यों नहीं?"

"स-सारे फसाद की जड़ मैं ही तो हु!"

"नहीं-तुम गलत सोच रही हो--फसाद की जड़ तुम नहीं वल्कि इस पाजी का विद्रोही स्वभाव है----मुझ से टकराने का इसकी इच्छा है--तुम्हारा कोई दोष नहीं है बेटी--यदि इसे तुम्ही से शादी करनी धी हमसे जिक्र क्यों नहीं किया----ये शिकायत है कि सीधे कोर्ट मैरिज क्यों कर ली इसने--- चाहे जैसी वनी हो, मगर अब तुम हमारी बहु हो और इस घर की बहू हो और इस पाजी से पहले इस घर पर तुम्हारा हक है !"

"'व-वाबूजी!" दीपा सचमुच भावुक हो उठी । भावनाओं के भंवर में फंसा भगतसिंह कहता चला गया--"अब कभी यह न सोचना बहू कि हम इस विद्रोही को तुम्हरे बिना कबूल कर लेंगे-----हां तुमसे इतना जरूर चाहते है तुम इस कम्बख्त के दिमाग से पिता से टवकर लेने का भूत उतार दो !"

" ब--बाबूजी !" चीखकर दीपा उनके चरणों में गिर पड़ी-- आशीर्वादस्वरूप उसके सिर पर अपना हाथ सरसरा रहे कर्नल की आंखों में आंसू थे…अंजली की आँखों में दूर-दूर तक खुशी की चमक और देव की आंखों में सफलता की ।

कर्नल भगतसिंह को विभाग की तरफ़ से जो विशाल कोठी मिली

हुई थी ।

उसके मुख्य द्वार पर नहीं, वल्कि चारों तरफ़ मिलिट्री का सख्त पहरा रहता था ।

मिलिट्री के एक ट्रक में भरकर उसी दिन शाम को देव और दीपा का सारा सामान उसके दोस्त के स्थान से यहाँ ले अाया गया था ।

मकान की चाबी देव को दे दी गई ।

उस दिन के अखबार में छपा कि जब्बार नामक एक सब-इंस्पेक्टर अपनी डयूटी और फ्लैट से रहस्यमय ढंग से गायब हेै-जहां देव को यह सकून मिला कि जब्बार के उसके पास आने की पुलिस को कोई जानकारी नहीं है, वहीं यह पंढ़कर दिलो-दिमाग पर थोड़ा आतंक हावी हुआ कि पुलिस पता लगाने की कोशिश कर रही है कि सब-इंस्पेक्टर आखिर कहाँ गायब हो गया है ?

मगर गुजरते हुए दिनों ने इस आतंक परं वक्त की पर्त जमा ।

एक हफ्ता गुजर गया ।

अखवार में जब्बार के बारे में कुछ न छपा।

जगबीर, सुक्खू या कुबड़े भिखारी में से भी उसने किसी की शक्ल न देखी ।

वह और दीपा सामान्य बेटे-बहू के रूप में अपने मां-बाप के पास रहने लगे थे------देव वैंक जाने लगा----इस एक हफ्ते में हालात यह हो गई कि हफ्ते भर पहले जो कूछ हुआ था वह सव देव और दीपा को स्वप्न-सा महसूस होने लगा ।

उनके दिमागों को ये सवाल बेचैन किए दे रहे थे कि कुबड़े भिखारी ने उन्हें कोठी में रहने का निदेश क्यों दिया है और अव यह उनसे सम्पर्क स्थापित क्यों नहीं कर रहा है?

हफ्ते भर बाद ।

देय वैंक में बैठा अपनी सीट पर काम कर रहा था कि किसी ने काउंटर खटखटाया-----देव ने चौंककर सवालिया नजरों से ग्राहक की तरफ देखा जिसके चेहरे पर फ्रेच कट दाढ़ी, हिप्पी जैसी मूंछे और आँखों पर काले लैसों वाला चश्मा था ।

''कहिए ?"

जवाब में उसने मोटी उंगलियों से विशिष्ट अंदाज में नाक खुजलाई तो देव बुरी तरह चौंक पड़ा, मुंह से बरबस ही निकला------"त--तुम ? "

"बैंक के बाद घंटाघर आना, वहां खडा ग्रे कलर की फियेट तुम्हें मेरे पास पहुंचा देगी, नम्बर इस कागज में लिखा है?" कहने के साथ ही उसने कागज का एक छोटा--सा पुर्जा काउंटर पर उसकी तरफ सरका दिया ।

देव ने उस पर लिखा गाडी का नम्बर पढा-उघर फ्रेंच कट दाढ़ी बाला वैंक के मुख्य द्वार की तरफ बढ़ रहा था…देव ने ध्यान से देखा, उसके बाएं कंधे के पीछे कूबड़ साफ चमक रहा था------देखकर न जाने क्यों देव के समूचे जिस्म में चीटियां--सी रेंगने लगी ।।

आंखों से वाली पट्टी हटते ही देव ने खुद को कीमती सांमान से खूबसूरती के साथ सजे एक विशाल और आलीशान कमरे में पाया----पट्टी हटाने वाला सुक्खू था, सावधान की मुद्रा में जगबीर उसके दाई तरफ़ खड़ा था और विशिष्ट अंदाज में नाक खुजलाने बाला इस वक्त भिखारी वाले लिबास मे एक विशाल मेज के पीछे ऊंची पुश्त वाली रिवांल्विग चेयर पर बैठा था ।

कुछ देर खामोशी रही ।

कमरे को निरीक्षण करने के बाद देब की नजरें भिखारी पर जम गई, वोला-"आप लोग आंखों पर पट्टी बांध कर मुझे यहां क्यों लाए हो"

"आराम से बैठकर बातें करने के लिए!"" धतुरे के नशे से सराबोर आखों वाले भिखारी ने विशिष्ट अन्दाज में नाक खुजलाते हुए कहा------" आंखों पर पट्टी इसलिए बांधनी पड्री ताकि यह न जान सको कि तुम्हें कहां लाया गया है!"

" क्या बातें करना चाहते हो?"

"बैठो ---- ये कुर्सी तुम्हारे ही लिए है !" उसने मेज के इस तरफ पड़ी एकमात्र कुर्सी की और संकेत करते हुए कहा ।

देव आगे बढ़कर ठीक, उसके सामने बैठे गया ।

 


उसका बैठना ही जैसे कोई संकेत अागे बढ़कर जगबीर ने कमरे के एक कोने में रखे वीडियो सेट को आन कर दिया---दो मिनट बाद 'सोनी' के कलर टीबी की बियालीस इंची स्क्रीन पर देव जब्बार की वर्दी पहनता नजर आने लगा ।

देव का हलक सूख गया, बोला-"बार-बार ये फिल्म दिखाकर तुम कहना क्या चाहते हो?"

"तुम्हें बार-वार यह फिल्म देखते रहना चाहिए, ताकि जो कुछ तुमने किया है उसकी याद दिमाग में ताजा वनी रहे-मुमकिन है कि इस एक हफ्ते में तुम यह भूल गए हो कि तुम किस हद तक हमारे चंगुल-मे फंसे हुए हो!"

" मुझे सब कुछ याद है, प्लीज…सेट बंद कर दीजिए!"

"बंद तो नहीं होगा, हां-तुम्हें इसकी वॉल्यूम जरूर कम कर देनी चाहिए सुक्खू !" भिखारी के शब्दों के साथ ही सुक्खू ने आवाज बंद कर दी, बुरी तरह व्यग्र देव ने पूछा-------"आप लोग आखिर मुझसे चाहते क्या हैं?"

" बताएंगे , यहीं बताने तो यहाँ लाया गया है, मगर उससे पहले तुम्हें कम…से-कम एक और देख लेनी चाहिए!" कहने के साथ ही उसने नाक खुजलाई और संकेत मिलते ही जगबीर फुल साईज फ्रीज की तरफ बढ़ गया ।

उसने फ्रीज खोला ।

उंसमे ठुंसी जब्बार की लाश को देखते ही देव फीज हो गया, मुंह से हेैरत में डूबा स्वर निकला------" य---ये यहां ?"

"जी हां, ये यहां!"

" म----मगर लॉन से निकलकर तुमने इसे यहाँ क्यों रखा है?"

"ताकि ज़रूरत पड़ने पर फिल्म के साथ-साथ को जब्बार की ताजातरीन लाश भी सौपी जा सके!" कुबड़े भिखारी ने मोहक मुस्कान के साथ कहा ।

"त--तुम ऐसा नहीं कर सकते!"

"बिल्कुल नहीं करेंगें----बशर्तें कि तुम काम खत्म होने तक हमारे हर आदेश का पालन करते रहो…तुम हमारा काम करो, फिल्म और लाश का अस्तित्व हमेशा के लिए खत्म करने की जिम्मेदारी हमारी हैे…साथ ही तुम्हे बीस लाख भी मिलेगे !"

पसीने-पसीने हो गए देव ने थोड़ा-झुंझलाकर पूछा---"कितनी बार पूछ चुका है कि अाप मुझसे क्या काम लेना चाहते है?"

"सबसे पहले यह बताता हूं कि मैं कौन हूं । " कहने के बाद कुबड़े भिखारी ने "डनहिल" की सिगरेट सुलगाई और गाढ़ा धुआं उगलता हुआ बोला-" मेरा नाम मुश्ताक है और पाकिस्तान के सर्वोच्च मिलिट्री जासूसी विंग का एजेन्ट नम्बर जेड हूं।"

देव का दिल गेंद के समान उछलने लगा ।

"मेरे चीफ ने मुझे एक ऐसा खास काम सौंपकर हिन्दुस्तान भेजा है, जिसका सम्बंध कर्नल भगतसिंह और उसकी कोठी से है!" वह कहता चला गया-----" यूं समझ लो कि एक छोटी-सी फाइल है, जो मुझें पाकिस्तान ले जाना है----यह फाइल तुम्हारे बाप के चार्ज में उसकी कोठी में हे-सबसे पहली बात तो ये कि किसी बाहरी व्यक्ति के लिए उस कोठी में घुसना ही छलांग मारकर चीन की दीवार को पार कर जाने जैसा काम है दूसरी ये कि फाइल के चारों तरफ सुरक्षा व्यवस्थाएं इतनी कड़ी हैं कि किसी बाहरी व्यक्ति के द्वारा उसे हासिल करना सूरज को मुट्ठी में बन्द कर लेने जितना कठिन है इसलिए मेरी नजर तुम पर पडी़ ।।"

देव की जीभ तालू से चिपककर रह थी ।

सिगरेट में कश लगाने के बाद वह पुन: कहता चला गया----"मुझें एक मात्र तुम ही ऐसे व्यक्ति नजर आए जो मेरी समस्या सॉल्व का सकते थे-सो, अपने साथियों से तुम्हारी हिस्ट्री

अपने पिता से तुम्हारे सम्वन्ध और तुम्हारी कमजोरियों का पता लगाने के लिए कहा-वहीं शायद तुम्हें यह बता देने में भी कोई हर्ज नहीं है कि सुक्खू और जगबीर भारत स्थित पाकिस्तानी जासूस हैं-वलजीत भी इनका साथी था, जो कचहरी में मारा गया…पाकिस्तान से हिन्दुस्तान के लिए मेरी रवानगी के साथ ही ट्रांसमीटर पर इन्हें मेरे चीफ का हुक्म मिल गया था कि जब तक मैं हिन्दुस्तान में रहू ये लोग मेरे मातहत काम करें---अतः यही मेरे वे साथी हैं, जिन्होंने तुम्हारे बारे में पूरी जानकारी एकत्रित की-इसके बाद तुम्हारी "लालची प्रवृति' को लक्ष्य बनाकर किस तरह तुम्हे फंसाया गया, यह सब तुम जानते ही हो…ट्रेजरी में दस लाख की लूट मेरो लम्बी स्कीम का एक छोटा-सा हिस्सा थी ---- थोड़ी सी गडबड के कारण बलजीत उसमें मारा गया , मगर हमें कोई गम नहीं है क्योंकि जिस महान् लक्ष्य के लिए मैं यहां आया हूं उसकी पूर्ति के लिए हममें से किसी की भी जान की कोई कीमत नहीं है!"

" "अब आप मुझसे यह चाहते हैं कि वह फाइल चुराकर मैं आप तक पहुचाऊं?"

"इस काम की वास्तविक कीमत अपनी पत्नी सहित खुद को फांसी से बचाना है, जो रकम मैं तुम्हें दूगा वह तो तुम्हारा पुरस्कार होगी !" कहते-कहते ही उसका लहजा कठोर होता चला गया------"लेकिन अगर तुमने देशभक्त बनने की कोशिश की तो इसी देश का कानून तुम्हें फांसी के फंदे पर लटका देगा ।"

देव के जिस्म झुरझुरी-सी दोड़कर रह गई, सामने बैठा व्यक्ति उसके सोचने की शक्ति पर डाका मार चुका था, मुश्ताक ने पुन: कहा…"मैं तुम्हारे मुंह से सुनना चाहता हूँ कि तुम काम करने के लिए तैयार हो या नहीं?"

"कोठी में यह फाइल कहाँ रखी है?"

"'वेरी गुड, मुझे तुमसे इसी समझदारी की उम्मीद थी!" कहते वक्त धतूरे के नशे से सराबोर आंखों में सफलता की चमक हिलौरे मारने लगी…दराज खोलकर उसने एक फाइल निकाली और उसे देव के सामने डालता हुआ बोला------"इस फाइल के कवर को ध्यान से देख लो यह उस फाइल के कवर की नकल है, जो हमें चाहिए ।"

देव ने देखा-सनमाइका की तरह चमचमाते कवर के बीचोंबीच भारतीय सेना का चिह्न वना हुआ था और उस चिह्न के ठीक नीचे लिखा था-एम. एक्स. 555 ।

अन्य बहुत-सी फाइले रखी होंगी, किन्तु हमे सिर्फ यह फाइल चाहिए जिस पर एम. एक्स. 555 लिखा हो, यह क्रोड नम्बर है!"

"यह सब मैं समझ चुका है!" अजीब मानसिक स्थिति में फंसे देव ने कहा-"और अब यह जानना चाहता हूं कि फाइल कोठी में कहां रखी है और इसकी हिफाजत के क्या इन्तजाम है?"

"वह सब खुद तुम्हारा बाप यानी कर्नल भगतसिंह बताएगा!"

"क--क्या...?" देव उछल पड़ा-------"ब---बाबूजी भला क्यों बताने लगे?" रहस्यमयी मुस्कान के साथ मुश्ताक ने दराज से एक छोटा टेपरिकार्ड निकलकर मेज पर रख दिया, बोला…"इसमे कर्नल भगतसिंह और ब्रिगेडियर अजीत चतुर्वेदी की आवाजे महफूज हैं फाइल की सुरक्षा व्यवस्था के वारे में सवाल कर रहे हैं-अजीत चतुर्वेदी और ज़वाब दे रहे हैं कर्नल भगतसिंह ।"

हैरत के कारण देव की आंखे फटी-की-फटी रह गईं, मुंह से बरबस ही सवाल निकला---"ये आवाजें तुम्हारे पास कहां से आगई ।"

"भारत स्थित पाकिस्तानी जासूसों को हमेशा ऐसी ही खुफिया जानकारियों की तलाश रहती है, सो-मौका लगते ही उनकी बातचीत टेप कर ली गई-यह टेप पाकिस्तान में मेरे चीफ़ के पास पहुचां इसे सुनने के बाद ही मुझे यहां भेजा गया है!"

"सुरक्षा व्यवस्था ध्यान से सुन लो, क्योकिं अपने अभियान में तुम्हें कदम-कदम पर इसकी जरूरत पडेगी!" कहने के साथ ही उसने प्ले वाला स्विच आन कर दिया ।

 


अभी देव दीपा को इतना ही बता पाया था कि वे लोग पाकिस्तानी जासूस हैं और उससे कोई ऐसी सेैनिक फाइल चाहते हैं जो बाबूजी के चार्ज मे-कोठी में ही कहीं रखी है कि दीपा भड़क उठी----"नहीं-नहीं-तुम ऐसा घिनौना काम नहीं करोगे देव !"

"दीपा तुम बार-बार यह क्यों भूल जाती हो कि हम पूरी तरह उनके चंगुल में हैं-अगर हमने उनका कहा न् माना तो वे फिल्म और जब्बार की लाश को......!"

"पुलिस के सुपुर्द कर देगे-यही न ?"

"हा !"

" करने दो !" दीपा ने पूरी सख्ती के साथ कहा---"ज्यादा'-से-ज्यादा यही होगा न कि इस देश का कानून हमें फांसी के फ़न्दे पर लटका देगा-----हमें वह मंजूर है देव, लेकिन देश के गुप्त दस्तावेज किसी भी हालत में उन्हें नहीं देगे-ऐसा करना अपने मुल्क के साथ गद्दारी होगी-उस माटी के साथ विश्वासघात होगा ---जिसमे हम जन्मे हैं-जाने उन फाइलों में क्या है-उनके आधार पर जाने दुश्मन हमारे वतन को किस हाल में पहुंच दे----नहीं देव...हम ऐसा नहीं कर सकते----- ऐसा करने की अपेक्षा फांसी पर चढ़ जाना गर्व की बात होगी-बोलो---कहोे देव कि तुम ऐसा नहीं करोगे!"

“तुम भावुक हो रही हो दीपा!"

"क्या अपने वतन कै लिए तुम्हारे दिल में कोई जज्बा नहीं है---क्या अपनी जान बचाने के लिए तुम मुल्क को दुश्मनों के हाथ वेच दोगे ?"

"नहीं!"

“फिर कहते क्यों नहीं कि अव तुम उनके किसी आदेश का पालन नहीं करोगे?"

"ऐसी बाते मैं सिर्फ सोचा करता हूं कहा नहीं करता ।"

"क्या मतलब ?"

"वक्त से पहले कही गई सही बात भी दुख देती है । दीपा----वेशक हमें वहीँ करना है जो तुम कह रही हो, मगर ज़रा सोचो-----वह करने के लिए इस वक्त हम क्या कर सकते हैं?"

"इसी वक्त बाबूजी के पास जा सकते हैं?"

"क…क्या बक रही हो?" देव के छक्के छूट गए ।

"मैं ठीक कह रही हूं देव-बात करने के लिए हमें अपनी जान का मोह त्यागना होगा ----- इसी वक्त बाबूजी के पास चलते हैँ-पूरी सच्चाई के साथ उन्हें वह सबकुछ बताते है, जो हमारे साथ गुजरा और फिर यह बताएंगे कि अव वे पाकिस्तानी जासूस हमसे क्या चाहते हैं?"

"इससे क्या होगा?"

"दुश्मन के हर मनसुवे पर पानी फिर जाएगा!" जोश में भरी दीपा कहती चली गई--"'उनकी हर योजना नाकाम हो जाएगी"

"लोहे को सिर्फ तब अपने मनचाहे आकार में ढाला जा सकता है जब चोट तब की जाए जव लोहा गर्म हो-ठंडे लोहे पर हधौड़े पटकने से वह मनचाहे आकार में तबदील नहीं होता-हां-छितरा जरूर जाता है!"

"क्या मतलब?"

"जरा सोचों-इस वत्त बाबूजी से जिक्र करके हम पाकिस्तानी जासूसों का क्या बिगाड सकेगे-हम यह भी तो नहीं जानते कि वे कहां रहते हैं-इन हालातों में न तो वे कभी पकड़े जा सकेंगे और न ही हमारे बयान पर कोई यकीन करेगा-पुलिस और कानून के अलावा बाबूजी भी यहीं समझेंगे कि हम जब्बार के कत्ल की मुकम्मल सजा से बचने के लिए एक ऐसी कहानी गढ़ रहे है, जिससे हम देशभक्त प्रमाणित हों और जब्बार की हत्पा के जुर्म में सजा सुनाते वक्त अदालत इस कहानी के मद्देनजर रखकर हमारे साथ रियायत बरते!"

चुप रह गई दीपा-एक बार फिर वह देव के तर्कों से परास्त हो गई थी ।

उसके चेहरे पर अपने शब्दों की समुचित प्रतिक्रिया देखकर देव ने आगे कहा----"हर हाल में वही करना है जो तुम कह रही हो, मगर तव जबकि मुश्ताक और उसके साथियों को गिरफ्तार कराने की स्थिति में हों । "

'"क्या तुम सच कह रहे हो?"

"सोलह अाने!"

"मगर ऐसे हालात कब जाएंगे?"

"जब हम जान लेंगे कि मेरी आंखों पर पट्टी बांधकर वे कहाँ ले गए थे-वह जगह कहां है जहाँ बैठकर उन्होंने मुझसे ये सब जाते की?"

" क्या ऐसा हो सकेगा?"

"जरूर होगा, क्योंकि जो काम वे मुझसे लेना चाहते हैं वह एक-या दो दिन में निपट जाने वाला नहीं है----ज़व तक वह कई बार मुझसे सम्पर्क स्थापित करने की कोशिश करेंगे--कभी--न-कभी तो हाथ ऐसा मौका लगेगा ही, जिसका लाम उठाकर मैं उनका पता जान लूगा-वह उसका आखिरी दिन होगा ।"

"ऐसा उनका काम ही क्या है---एक फाइल ही तो चाहते हैं-वह भी ऐसी जो इसी कोठी में हे-फाइल बाबूजी के रखे हुए स्थान से गायब करके उन्हें देनी ही तो है-मेरे ख्याल से बहाने करके उसे ज्यादा दिन नहीं रोका जा सकेगा!"

'"रोकने के लिए बहाना करने की जरूरत नहीं है?"

"उस फाइल को चुराना इतना आसान नहीं है दीपा जितना तुम समझ रही हो----मुश्ताक ने खुद बताया है कि बाबूजी ने फाइल की सुरक्षा के इतने इन्तजाम कर रखे हैं कि उस तक पहुंचना लगभग असम्भव है!"

"मैं समझे नहीं!"

 
अौर उसे समझाने के लिए, देव सुरक्ष...ाम करने के लिए मज़बूर कर सकते हैं!-" [/SIZE]
 


देव ने कलेजे पर पत्थर रखकर कह दिया----" ऐसा ही कर लो ।"

" क्या मतलब ?"

" मैं तुम्हारा कोई भी हुक्म मानने से साफ़ इंकार करता हु!"

थोड़े उत्तेजित हो चले मुश्ताक ने कहा…"तुम भूल रहे हो कि-------- ।"

"सुन चुका हुं----बार-बार एक ही धमकी देने की चेष्टा मत करो!" उसका वाक्य बीच ही में काटकर देव प्रत्यक्ष ने पूरी हिम्मत के साथ कह उठा-"मैं तुम्हारे रिवॉल्वर की गोली से मरने के लिए तैयार हूं----और दीपा के साथ फांसी के फंदे पर झूल जाने के लिए भी---मगर कान खोलकर सुन लो----मैं इंकार कर चुका हूं---अव जो चाहते हो करो!"

मेकअप की पर्तों के पीछे छुपा मुश्ताक का चेहरा आग-भभूका हो उठा-किसी हिंसक पशु की गुर्राहट निकली उसके मुह से-"तुम शायद पागल हो गए हो ।"

"पागल तुम हो गए हो मिस्टर मुश्ताक!" उसकी कमजोरी भांपकर देव ने पूरी तरह हावी होने का निश्चय कर लिया था-----"औंर इसका सबूत यह है कि तुम मुझे बेवकूफ़ समझ रहे हो--मगर अब मैं समझ चुका हूं कि तुम मेरा बाल भी बांका नहीं कर सकते, क्योंकि जितना नुकसान तुम मुझे पहुचाओगे उससे कई गुना ज्यादा खुद तुम्हें पहुंचेगा ।।”

"'त--तुम बहुत बडी गलतफ़हमी के शिकार हो रहे हो मिस्टर देव ।"

" मगर उसके एक भी लफ्ज पर ध्यान दिए विना-देव कहता चला गया----" किसी अन्य से एम. एक्स. ट्रिपल फाईव चुरवा लेने की धमकी केवल मुझें डराने के लिए है-वास्तव में उस पर अमल नहीं हो सकता, ये बात में अच्छी तरह समझ चुका हू मिस्टर मुश्ताक कि एम. एक्स. ट्रिपल फाइव चुराकर सिर्फ मैं तुम्हें दे सकता दूं-सिर्फ मैं!"

इस बार देव के चुप होने पर मुश्ताक गुर्राया नहीं । देव ने महसूस किया कि यह अपने गुस्से पीने का प्रयास कर रहा है यह देव की सफलता थी, उत्साहित होकर बोला----"मुझें फंसाने के लिए जितनी मेहनत तुमने की है-मेरे बाद, मां या किसे अन्य को फंसाने के लिए कई ज्यादा मेहनत करनी होगी, फिर भी जरूरी नहीं कि वह फंस ही जाए, वेैसे भी वह मुझसे ज्यादा बेहतर मोहरा साबित न होगा------ वह भी मेरे ही जेसा रुख अस्तियार करे ----तब तुम क्या करोगे-क्या फिर कोई नया मोहरा तलाश करोगे-इस तरल शायद जिन्दगी भर तुम मोहरे तलाश कर उन्हे फांसाने और खत्म करने का ही काम करते रहोगे ।। ट्रीपल एक्स अपने स्थान पर महफूज रहेगी ।।।"

मुश्ताक का जी चाहा कि वह दोनों हाथ बड़ाकर देव का मुंह नोच ले, मगर परिस्थितियां उसे ऐसा करने का मौका नहीं रही थी, अत: सिर्फ देव को घूरता रह गया । अपने शब्दों का समुचित प्रभाव देखकर देव ने अागे कहा-"और शायद इस फिल्म और जब्बार की लाश के साथ मुझे कानून के हवाले करके फिर कभी तुम्हें कोई मोहरा फंसाने की जरूरत भी न पड़े, क्योकिं अपने बयान में मैं तुम्हारे सारे मनसूबे खोलकर दुख दूंगा?"

"इससे क्या होगा?"

"मुमकिन है कि कानून के लम्बे हाथ तुम तक न पहुच पाएं और तुम सुरक्षित पाकिस्तान पहुंच जाओ, मगर एम. एक्स. ट्रिपल फाइव कभी हासिल नहीं कर सकोगे दोस्त, क्योंकि अदालत में मेरे बयीन के तुरन्त वाद उसकी समूची सुरक्षा व्यवस्था चेज कर दी जाए !!"

दांत पीसते हुए मुश्ताक ने कहा------"हम इतने बेवकुफ नहीं हैं कि यह बयान देने के लिए तुम्हें अदालत तक जाने दे !"

"यानी ये फिल्म और जवार की लाश बेकार हो गई ।" देव ने बडी ही जानदार मुस्कराहट के साथ कहा-"इन्हें तुम कभी अदालत तक ले जाने वाले नहीं हो।"

"मैं तुंम्हें इसी वक्त, इसी जगह शूट कर दुगा?"

" अगर मैं शम तक घर न पहुचा तो वह सव दीपा बाबू जी को बता देगी, जो कि मुझे अदालत में बताना था!" देव ने पूरी दुढ़ता के साथ सफेद झूठ बोला-""मैं हर सुबह ऐसे निर्देश देकर घर से बैंक के लिए निकला करता हूं ।"

-"लेकिन अगर तुम तरह हमारी स्कीम पर काम करने से इंकार ही कर देते हो तो तुम हमारे किस काम के रहे, मिशन तो तब भी पुरा न होगा और तव मी…इस हालत में क्यों न तुम्हें खत्म ही करदे?"

"यानी दोनों का सत्यानाश?"

"तुम्हारे अड्रियलपने का अंजाम इसके अलादा और हो भी क्या सकता है?"

" कोइं ऐसी तरकीब क्यों नहीं सोचते-जिससे दोनों को लाभ हो ?"

देव को वहुत गौर से देखते हुए मुश्ताक ने पूछा-"आखिर तुम चाहते क्या है"' मुश्ताक का यह वाक्य हथियार डाल देने जैसा था ।

देव समझ गया कि वह जीत गया है और मन-ही-मन इस विजय की खुशी के नशे में चूर देव ने कहा-"सिर्फ तुम्हें यह समझाना कि जितना मैं तुम्हारे चंगुल में हूं उतने ही तुम भी मेरे, यानी इस वक्त हम समानान्तर स्थिति में है और जब समान स्थिति के दो व्यक्तियों की किसी काम में पार्टनरशिप होती है तो कोई भी एक पार्टनर दूसरे पार्टनर पर दबाव डालकर काम् नहीं ले सकता-उन्हें बराबरी के स्तर पर जाकर, एक्र-दूसरे का सम्मान करते हुए काम करना चाहिए !"

"मैँ समझा नहीं!"

" यह बात अपने दिमाग से निकाल दो कि मैं तुम्हारे हुक्म मानने या स्कीम पर काम करने के लिए मजबूर हूं -धमकियां छोडो़, अगर सचमुच मुझसे काम लेना चाहते हो तो मेरे अधिकार अपने बराबर समझो-स्वेच्छापूर्वक या अपने लाभ के लिए मैं कुछ भी कर सकता हूं ?"

हैरान मुश्ताक के मुंह से निकला-"क्या तुम सच कह रहे हो ?"

"झूठ बोलने की मुझे जरूरत नहीं है!"

" ठीक है, भविष्य मैं तुम्हें कोई धमकी नहीं दूंगा?"

"तो सबसे पहले लगातार चल रहे उस वी.सी.आर. ओर टी.बी को बन्द करो!"

"देव ने आराम से कुर्सी पर पसरते हुए कहा-"बिना विश्राम किए वहुत देर तक चलते रहने से उनके फुंक जाने का खतरा उत्पन्न हो जाता है!"

मुश्ताक का संकेत मिलते ही सुक्खू ने सेट आँफ कर दिया।

 


अपनी जीत पर मन-ही-मन रीझते देव ने कहा…"जाहिर है कि मज़बूर करके अब तुम मुझसे काम नहीं ले सकते और जव दो पार्टियां इस स्थिति में अामने-सामने होती हैं तो उनके बीच सिर्फ सौदा हो सकता है!"

"स-सोद्वा" मुश्ताक चीख पड़ा----" कैसा सौदा?"

"एम. एक्स ट्रिपल फाइव की सुरक्षा-व्यवस्था के बारे में सुनकर इतना अंदाजा मैं लगा ही सकता हूं कि वह इस देश की रीढ़ की हड्डी है और इतने बड़े देश की रीढ़ की हड्डी की कीमत बीस लाख नहीं हो सकती!"

"तुम क्या चाहते हो?" उसे बहुत गहरी नजरों से देखते हुए मुश्ताक ने पूछा ।

" बीस करोड़ ।"

"ब-बीस करोड ?"

"क्यों-जुबान हकला क्यों गई, तुम्हीं ने तो कहा था कि एम. एक्स. ट्रिपल प

फाइव के सामने दौलत और बलजीत जैसी दस-बीस जानों का कोई महत्व नहीं है !"

"कहा जरूर था, मगर बीस करोड वहुत होते हैं!"

"सोच लो, आखिर मैं अपने देश की रीड़ की हड्डी तुम्हारे हवाले कर रहा हूं और यदि मुझे बीस करोड मिले तो मैं विना सुने तुम्हारी हर स्कीम पर काम करने और कोई भी खतरा उठाने के लिए पूरी तरह तैयार हूँ ।"

" इस धूर्त युवक के सामने मुश्ताक को वे दोनों चीजे बिल्कुल बेकार हो गई लगी, जिन्हें उसने एक लम्बी योजना के वाद बडी मेहनत से तैयार किया था, वोला…"अगर मुझे पहले मालूम होता कि 'सिर्फ' पैसे के लिए काम कर दोगे तो न इतनी मेहनत करते, न ही इतना समय बरबाद ।"

"वह तुम्हारी अपनी समझ थी!"

"खैर...सौदा हमे मंजूर है?" मुश्ताक ने हथियार डाल दिए!

देव ने सपाट स्वर में कहा---"दस अभी------दस काम कोने के बाद ।"" '

"यह शर्त नहीं मानी जाएगी!" एकाएक मुश्ताक दुढ़त्तापूर्वक कह उठा ।

" क्यों ?"

"तुम्हें सारी रकम काम पुरा होने के बाद मिलेगी?"

"मगर जुर्म की दुनिया का नियम है, काम करने वाला 'तब रकम’ का आधा भाग काम् करने से पहले लेता है, आधाा बाद ।"

"न ऐसा कोई नियम है और न ही सौदा इस तरह होगा!" इस बार मुश्ताक भी पूरी दुढ़ता के साथ कह रहा था-----"अब तुम बराबर के स्तर से बढकर हमारे सिर पर चढ़ने की कोशिश कर रहे हो-जिस तरह तुम यह कह रहे दो कि तुमने अपनी जान की परवाह छोड़ दी है, उसी तरह हम भी अपने मिशन की सफलता-असफलता का मोह छोड़ कर तुम्हें कानून के हवाले कर जाएंगे और स्वयं पाकिस्तान चले जाऐंगे ।"

"यानी तुम सारी रकम काम पूरा होने के बाद दोगे?"

"निस्सन्देह ।"

"सारी बात एक पक्षीय नहीं होगी ।" देव ने कहा--" एम. एक्स. ट्रिपल फाइन को पूरी रकम वसूल करने के बाद तुम्हें सौपूंगा, यानी पहले तुम बीस करोड़ मुझे दोगे उसके बाद एम. एक्स. ट्रिपल फाईव तुम्हें दूंगा ।"

" मंजूर है ।"

"वेरी गुड...अब मैं तुम्हारी स्कीम् के बारे में जानना चाहूगा, सुरक्षा व्यवस्था के वारे में, जो अहम बाते बाबूजी और ब्रिगेडियर चतुर्वेदी की वार्ता वाले टेप से ज्ञात नहीं होती, उनके विना एम. एक्स. ट्रिपल फाईव तक नहीं पहुंचा जा सकता!"

"मैँ तुमसे पूरी तरह सहमत हूं ।"

"वे बाते कहां से पता लगेगी?"

"खुद कर्नल भगतसिंह बताएगा!"

"व----बावूजी?" देव उछल पड़ा-------"वे भला क्यों बताने लगे, नहीँ-हरगिज नहीं---- मुझे तुम्हारी योजना का यह पहला पाइंट ही बिल्कुल बेकार लगा, बाबूजी को मैं बचपन से जानता हूं----दावा पेश कर सकता हूं कि चाहे जो तरकीब इस्तेमाल कर लो मगर वे एक लपज न उगलेंगे, मर जाएंगे मगर कुछ बताएंगे नहीं!"

 


"फिर भी कह रहा हूं कि तुम जो सवाल उससे करोगे, वह उन सबका --जवाब बेहिचक देता जाएगा"

"म--मैं सबाल करूंगा?" देव के देवता कूच कर गए ।

" हां तुम ।"

"तुम्हारा दिमाग तो ठिकाने है मिस्टर मुश्ताक या बाबूजी के हाथों ही मुझे कत्ल कराने की योजना घड़ रहे हो-एम. एक्स.ट्रिपल फाइव या-उसकी सुरक्षा व्यवस्था से सम्बन्धित अगर एक लफ्ज भी उनके सामने मुह से निकला तो वे मेरे सारे जिस्म में अंगारे भर देगें ।"

मुश्ताक ने मोहक मुस्कान के साथ कहा----"ऐसा नहीं होगा"

" दिमाग ठिकाने लाओ, हर हाल में ऐसा ही होगा ।"

"तुम खुद जानते हो कि तुम्हारी मौत से हमारा मिशन अधूरा रह जाएगा, तब-जरा सोचो कि क्या हम तुम्हें कोई ऐसा काम करने की सलाह दे सकते हैं, जिससे तुम्हारी जान को खतरा हो?"

देव को महसूस हो रहा था कि दिमाग हवा में तान्डव्र कर रहा है, मुश्ताक के शब्दों की गहराई को वह समझ न पा रहा था, मुंह से बोल न फूटा-सामने बैठे मुश्ताक को सिर्फ इस तरह देखता रहा जैसे इंसान नहीं अजूबा हो--------" मैं फिर सलाह दूंगा कि जानकारियां कलेक्ट करने की कोई अन्य तरकीब सोचो, वाबूजी से कुछ नहीं उगलवाया जा सकता!"

"तभी न. . जब वे अपने होशो-हवास में हो ?"

"मतलब?"

"कर्नल भगतसिंह से हर सवाल का जवाब ये गोली लेगी!" कहने के साथ ही मुश्ताक ने दराज से एक गोली निकाल मेज पर रख दी ।

""गोली?" इन शब्दों के साथ देव की नजर रिफिल रहित भगवा रंग की उस गोल एवं चिकनी गोली पर स्थिर हो गई, बोला----" इससे क्या होगा?"

मुश्ताक ने बताया ।

सुनकर देव की आंखें मारे हैरत के फट-सी पडी । उसके चुप होने पर बोला-""क्या तुम सच कह रहे हो…क्या सचमुच इस गोली में यह करामात है?"

"अगर यकीन न हो तो तुम पर प्रयोग करके दिखांऊ ।" मुस्कराते हुये मुश्ताक ने कहा…मेरे पास ऐसी पांच गोलियां और है ।"

"अगर इसमें सचमुच यह खूबी है तो कमाल है!" देव का अाश्चर्य कम न हो रहा था-"मगर मैंने कभी इस गोली, के बारे में कुछ नहीं सुना ।"

"सुनोगे भी कैसे...बाजार में खुले अंग्रेजी दवाइयों के स्टोर्स पर तो यह मिलती नहीं है-भारत पाकिस्तान जैसे छोटे मुल्कों की सरकार पर भी यह तुम्हें नहीं मिलेगी!"

" फिर तुम पर कहाँ से आ गई?"

"एफ. सोलह की तरह अमेरिका ने मेरे देश को दी है!"

"क्या मतलब?" देव की बुद्धि घूम गई ।

"मतलब ये देव प्यारे कि इस नायाब गोली का आविष्कार अमेरिका की खुफिया एजेन्सी सी. आई . ए. के खास डॉक्टरों ने किया है, क्योंकि यह टेबलेट जनसाधारण के किसी काम की नहीं है, न तो इसे मार्किट में भेजा गया और न ही इसका प्रचार किया गया…इनका इस्तेमाल सी. आई. ए. के जासूस अपने दुश्मन के जासूसों से उऩके देश का रहस्य उगलवाने के के लिये करते है , तुम जानते ही हो कि अमेरिका हमारे राष्ट्रपति का दोस्त है, जिन शर्तों पर उन्होंने हमें 'एफ-16‘ विमान दिए हैं, उन्ही शर्तों पर ये तीस गोलियां----उनमें से पांच लेकर मैं चला था, मगर तुम्हारा काम एक ही गोली से हो जाएगा, दूसरी की भी ज़रूरत नहीं पड़ेगी ।"

"यकीन तो नहीं अाता कि इस गोली में वह खासियत है जो तुम कह रहे हो, मगर जब तुम कह रहे हो तो यकीन करना ही पड़ेगा ।" देव ने कहा-----"माना कि वह सच हो जाएगा जो तुम कह रहे हो, उसके बाद?"

"उसके बाद क्या?"

"मैं एम. एक्स. द्विफ्त फाइव तक पहुचने की पूरी स्कीम जानना चाहता हूं ।"

"पहले इस गोली का इस्तेमाल करके रिपोर्ट हमारे पास लाओ उसके बाद हम तुम्हें विस्तारपूर्वक अागे की स्कीम के वारे में, वताएंगे!"

 


रात के ग्यारह बजे ।

बेडरुम में दीपा ने फुसफुसाकर पूछा-----"'ऐसा ऐसे हो सकता है ?"

"इस गोली से ।" देव ने मुश्ताक द्वारा दी गई गोली उसे दिखाई ।

"गोली?" दीपा के मस्तक पर बल पड़ गए।

"हां, मुश्ताक के मुताबीक यह गोली बडी करामाती है, अगर यह किसी तरह बाहू जी के पेट में पहुच जाए तो फिर मैं जो भी सबाल उनसे करूंगा वे मुझे बिल्कुल सही…सही जवाब देते चले जाएगें ।"

"क्या बकवास कर रहे हो, मैंने कभी ऐसी किसी गोली के वारे मे नहीं सुना है ।"

"मैंने भी यही कहा था, मगर उसने बताया किं…!"

देव सी. आइ.ए. वाली वात उसे विस्तारपूर्वक बताता चला गया। सुनने के बाद दीपा बोली-----"यकीन नहीं अाता कि वह , सच रोल रहा हेैृ ।"

"झूठ बोलने से उसे लाभ भी क्या होगा?"

दीपा को कोई उचित जवाब न सूजा जबकि देव ने कहा-"दुनिया में ऐसी बहुत-सी नायाब चीजे हैं दीपा, जिनके बारे में हमने कभी नहीं सुना…यह टेबलेट भी उन्हीं में से एक हो सकती है और फिर, पत्र-पत्रिकाओं में मैंने पढ़ा है कि सी.अाई.ए. के वैज्ञानिक दुश्मम मुल्कों के जासूसों से रहस्य उगलवाने के लिए एक--से--एक नये और नायाब तरीके ईजाद करते रहते है ।"

"कूछ देर के लिए मान भी लिया कि या सही है, मगर पेट मैं पहुंचने के बाद क्या बाबूजी हमेशा हरेक के सवालों का सहीं जवाब देते रहेगे?"

" नहीं, किसी भी व्यक्ति के दिमाग पर इस गोली का असर केवल दो घंटे रहता है-पेट में गोली पहुचने के पांच मिनट बाद से दो घंटे तक-इस बीच अाप उससे जितने चाहे सवाल कर ले-आपको हरेक का सही जबाब मिलेगा और दो घंटे किसी भी आदमी से उसकी, पूरी जिन्दगी के ऱहस्य उगलवाने के लिए वहुत है ।"

"माना कि किसी भी तरीके से हम इसे वाबूजी के पेट में पहुंचा देते हैं, दो घंटे के दोरान उनसे सबकुछ मालुम भी कर लेते हैं, मगर उसके बाद, क्या तुमने यह कल्पना की है कि नॉर्मल स्थिति में आने के बाद जब बाबूजी की समझ में यह बात अाएगी कि हमने उनसे क्या कुछ मालूम कर लिया है तो हमारे प्रति उनका क्या व्यवहार होगा !"

"कुछ भी नहीं!"

" क्या मतलब?"

"इस गोली की सम्पूर्ण खूबियां अभी तुमने सुनी कहां है, पहले ही वक-वक करने लगी हों!" देय ने कहा----" दो घंटे बाद इसका असर खत्म होने पर बाबूजी को सिर्फ ऐसा महसूस होगा जैसे वे गहरी नीद के बाद जागे हो--------उन दो घंटे में क्या हुआ, कौन उनके पास आया और क्या बातें की इस बारे में कुछ याद नहीं रहेगा ।"

हैरत में डूबी दीपा के कंठ से निकला------" क्या तुम सच कहं रहे हो ? "

" मुश्ताक के मुताबिक सच यही है और यह सुनकर शायद तुम्हें ताजूब होगा कि इसे पानी से लेकर किसी भी सब्जी है साथ दिया जा सकता है----गोली क्षण भर में घुलनशील ही नहीं, वल्कि पूरी तरह स्वाद और गंधहीन भी है!"

"अगर यह सच है तो ये टेबलेट दुनिया का नवां आश्चर्य है?"

देव चुप रहा, उसने दीपा को सिर्फ गोली के बोरे में बताया था । अन्य उन बातों के बारे में बिल्कुल नहीं जो मुश्ताक से हुई ।

अपने मुश्ताक पर हावी होने और बीस करोड़ के सौदे के बारे में दीपा से उसने जिक्र तक ना किया ।

भगवान ही जाने कि वास्तव में वह करना क्या चाहता था, वह जो बड़बड़ा रहा था----"हमैं यह पहले ही निर्धारित करना होगा कि बाबूजी को गोली कब, कैसे और किन हालातों में खिलाई जाए-----वर्ना कुछ गडबड हो सकती है और यदि एक बार गडबड हो गई तो सारे मनसुबो पर पानी फिर जाएगा"

"मैं समझी नहीं देव ।"

"मां, रामू बंसी और तीन नौकर चौबीस घंटे कोठी में रहते हैं-पहली बात तो उन्हें धोखा देकर बाबूजी के खाने या पीने की किसी चीज में टेबलेट मिलाना ही एक समस्या होगी----दूसरे, यदि किसी तरह मिला भी दे तो मां और जासूसों की मौजूदगी में बाबूजी से खुलकर सवाल नहीं किए जा सकेंगे-यदि उनमे से किसी ने छुपकर भी हमारी बाते सुन ती तो सारे किए-धरे पर पानी फिर जाएगा!"

"परसों रात को मांजी घर से बाहर जाएंगी ।"

"कहां?"

"इसी कालोनी में कोई कैप्टन बंसल रहते हैं ।"

"हां रहते हैं-मैं उन्हे जानता हूं बाबूजी कै-अच्छे दोस्त हैं, मगर तुम उसे कैसे जानती हो?"

 


"अाज शाम उनके यहाँ से एक कार्ड अाया है, शायद कैप्टन वंसल के लड़के की शादी है-लान में बैठे मां और बाबूजी उनके यहाँ कार्यक्रमों में जाने पर बाते कर रहे थे-घुड़चडी में बाबूजी ने स्वयं जाने का निश्चय किया है, बारात में तुम्हें भेजेंगे रतजगे में उन्होंने मांजी को जाने का हुक्म दिया है ।"

"मतलब ये कि परसों सारी रात मां घर से बाहर रहेगी?"

"सारी रात रतजगे में शामिल रहना जरुरी नहीं है, बीच में उठकर भी आ सकती हैं----हां , जैसा प्रोग्राम ये होता है उसके अनुसार रात के ग्यारह-बारह बज जाना अाम बात है ।"

"वेरी गुड--इतनाही काफी है दीपा, परसों रात का समय ही सबसे ज्यादा उचित रहेगा-ग्यारह बजे तक मैं सारा काम निपटालुगा ।"

"मगर 'रामू' और 'बंसी' का क्या करोगे?"

"मेरे दिमाग में एक टूटी-फूटी स्कीम का खाका वन रहा है!"

" क्या ?"

"दो पैग के वाद डिनर बाबूजी अपने कमरे में ही लेते हैं, उस वक्त नौ के करीब का टाईम होता है और डिनर उनके कमरे में पहुचाता है बंसी ।"

" जानती हूं ।"

"और फिर देव दिपा को समझाता चला गया कब क्या करना है । "

" ऐसा तुम कैसे कर सकोगे ?"

" जैसे भी हो करना तो पड़ेगा ही दीपा --- खतरे तो उठाने ही होंगें ।"

कहीं खोई सी दीपा ने कहा----"खतरे तो हमने मुजरिमाना काम करने के लिए भी उठाए हैं देव, यह तो फिर भी एक पवित्र काम है-उन कामों में मैं तुम्हारा विरोध कर रही थी, परन्तु दुश्मन मुल्क के षडृयंत्र को तहस-नहस करने के इस गौरवमयी काम को करने में मैं हर खतरे का मुकाबला करने के लिए तुम्हारे साथ हूं ।"

दीपा की बात सुनकर देव किसी दूसरी ही मस्ती में मुस्कराया, काश-------वह जानता कि उसका "आल्हा दिमाग'' उसे कितने भयंकर और जटिल चक्रव्यूह में फंसाने वाला है ।।।।

गडबड शुरू में ही हो गई और वह भी ऐसी कि जिसकी दोनों में से किसी ने कल्पना न की थी ।

बंसल के यहां जाने के समय पर अंजली ने कहा-"चलो बहु, तैयार हो जाओं ।"

"कहां के लिए?"

"बंसल के यहाँ आज रतजगा है!"

"म-मगर मैं वहां?" दीपा हक्ला गई-----"मैं वहां भला क्या करूंगी मांजी ?"

"किसी के यहाँ 'फवशन में करना ही क्या होता है-मेरे साथ रहना----ग्यारह-बारह के करीब लोट अाएंगे-कॉलोनी की औरतों से मिलना हो जाएगा!"

पुरी तरह बौखला गई दीपा, कुछ समझ में न आया कि क्या करे-ममद के लिए उसने पलटकर देव की तरफ देखा, तभी देव स्वयं उपरोक्त वार्ता पर हवका-बक्का ऊंट की तरह गर्दन. उठाए मुर्खों के समान उन्हें देख रहा था, अजीब हड़बड़ाए स्वर में दीपा बोली --"म--मगर--म-मैं वहां नहीं जा सकूगी मांजी?"

" क्यों ?"

"व-वो बात ये है कि मेरी तबीयत ठीक नहीं है ।"

उलझी--सी अंजली ने पुछा…"क्या हुआ तुम्हारी तबीयत को?”

"अ---आज शाम से सिर में दर्द---दिमाग की नसें फटी जा रही है!" कहती हुई दीपा के चेहरे पर ढेर सारा पसीना आया।

"अकेले पड़े-पड़े तो सिर में दर्द होगा ही-मेरे साथ चल, वहां पड़ोस की महिलाओं में हंस-बोलेगी तो दर्द खुद-ब-खुद गायब हो जाएगा!"

"न-नहीं मांजी?" देव की चुप्पी ने दीपाके चेहरे पर सफेदी फैला दी, वह इतनी ज्यादा नर्वस हो गई थी कि ठीक से कुछ बोल भी न सकी, जबकि अंजली ने देव से कहा----" अरे तू मिट्टी के माधो की तरह चुप क्यो बैठा है, मेरे साथ जाने के लिए इसे बोलता क्यों नहीं--- शादी को एक साल हो गया है---न तो यह पडोसियों को ठीक से जानती है, न ही पडोसी इसे-जान-पहचान और परिचय बड़ाने के यही मौके होते हैं!"

बात को सम्भालने की कोशिश में देव के होश उड़े जा रहे खुद को नियंत्रित रखने की भरसक चेष्टा के साथ उसने कहा---"द--दिपा ठीक कह रही है मां, रहने दो-आज सचमुच इसकी तबीयत ठीक नहीं है?"

"तुझे कैसे मालूम ?"

"क-क्या अाप देख नहीं रही कि इसके चेहरे से किस तरह पसीना फूट रहा है?"

"'अरे?“ दीपा की तरफ़ देखती हुई अंजली चौक पडी----"वाक्रई तुम्हें इतना पसीना क्यों छूट रहा है बहु--चेहरा भी इस तरह पीला पड़ा है जैसे हल्दी पुती हो!"

"ज-जब सिर में होता है तो मेरी यही हालत हो जाती है मांजी ।"

"तब तो किसी डॉक्टर को बुलाना चाहिए !"

"न-नहीं!" भय का मारा देव चीख पड़ा----"इसमें डाक्टर की कोई जरूरत नहीं है मां, यह दीपा का पुराना रोग हे-थोड़ा आराम करेगी तो खुद-ब-खुद ठीक जो जाएगी!"

"तो यहाँ क्यों बैठी है, आराम करना चाहिए!"

" हां यहां क्यों बेठी हो दीपा, अपने कमरे में जाकर आराम करो ।"

संकेत मिलते ही दीपा उठकर कमरे की तरफ वड़ी, वह इतनी तेजी के साथ जा रही थी जैसे डर हो कि कहीं अंजली आवाज देकर साथ चलने के लिए कह सकती है और इसी प्रयास में कदम बूरी तरह लड़खड़ा रहे थे ।

साढे अाठ बजे ।

देव-कमरे में दाखिल हुआ ही था कि दीपा ने पूछा-"क्या मांजी बंसल के यहाँ गई?"

"हां ।"

"उफ्फ" वह मुंह से इस तरह की आवाज उत्पन्न करती बेड पर गिर गई जैसे किसी वहुत बड़े तनाव से मुक्ति मिली हो बोली---"मांजी ने तो सारी योजना ही चौपट कर दी थी देव!"

"मेरे भी होश उड़ गए थे-उफ-योजना भले ही चाहे जितनी ठोक-बजाकर तेयार कर लो, मगर ऐसी ..हल्की…फुल्की कमियां उसमे रह जाती हैं, जिनकी वजह से ऐन वक्त पर या तो सब कुछ गड़बड़ात्ता नजर अाता है या गड़बड़ा ही जाता है, वक्त पर अगर सही निदान न सूझे तो एक छोटा-सा प्वाइंट बडी-से-बडी़ अौर सुदुढ़ योजना को भी चौपट कर सकता है!"

वेड पर पड्री दीपा गहरी-गहरी सांसे लेने से ज्यादा कुछ न कर सकी ।

"इस वक्त बाबूजी का दूसरा पैग चल रहा होगा ।” रिस्टवांच पर नजर डालते हुए देव ने कहा----"पौने नौ बजे बंसी शायद उन के लिए चपातियां सेकनी शुरू कर देता है-तुम्हें ठीक नो बजने में पांच मिनट पर किचन में पहुचना है!"

"अभी तो बीस मिनट है ।"

 


"इन बीस मिनटों में हमें अपनी योजना को फिर अच्छी तरह ठोक-बजा लेना चाहिए दीपा। उन सम्भावनाओं पर गोर कर लेना चाहिए जब वैसी ही कोई मुसीबत खड़ी हो सकती है जेैसी कुछ देर पहले मां ने खड़ी करदी ।"

इस तरह, बीस मिनट उन्होंने एक-दूसरे से बौखलाहट भरे सवाल कर-करके और पूरी योजना को दोहराकर गुजार दिए-नौ बजने में सात मिनट पर देव ने कहा-"टाइम गया है,अब तुम्हें किचन में पहुंच जाना चाहिए--अगर थाली लेकर वंसी निकल गया तो देर हो जाएगा!"

दीपा उठी ।

उसकी टांगे कांप रही थी, अभी दरवाजे तक पहुची नहीं थी कि देव ने कहा…"ठहरो!"

वह सकपकाकर पलटी ।

" तुम वहुत ज्यादा नर्वस हो, शक्ल से ही एब्नार्मल नजर आ रही हो दीपा----खुद को सम्भालो-अपने देश हैं लिए हमें ही हिम्मत के साथ काम करना है ।"

"श-श्योर" सूखे कंठ से वह बडी़ मुश्किल से कह सकी।

"याद रहे. ..काम के बीच अप्रत्याशित दिक्कत कहीं भी, किसी भी रूप में अा सकती है और उसका मुकाबला तुम्हें तुरन्त करना होगा-ऐसे हर अवसर पर हमे दृढ रहना है, दिमाग पर से अपना नियन्त्रण खोना नहीं है, पूरे होशो-हवास और हौंसला बनाए रखना है-हल्की-सी चूक का नतीजा हमसे ज्यादा हमारे देश के लिए घातक होगा!"

"म-मैं समझती है देव ।"

"जाओ, समय हो गया है!" दीपा घूमी और कमरे से निकल गई-गेैलरी लगभग भागते हुए पार करके किचन के नजदीक पहुची-अन्दर से आहट सुनकर समझ गई कि बंसी अभी वहीं हे, खुद को नियंत्रित किया उसने औऱ किचन में दाखिल होती हुई बोली-"क्या कर रहे हो बंसी?"

" ब बहूरानी---आप यहां ?"

"हां ---क्युं मैं किंचन में नहीं आ सकती?"

"आ क्यों नहीं सकती, अाप तो मालकिन हैं!" बंसी ने दाल भरी कटोरी गेस से उठाकर एक 'स्लैब' पर रखी थाली में रखते हुए कहा…"चौंका इसलिए, क्योकि आज अाप किचन में पहली बार आई हैं न?"

"हां-कमरे में पड़ी-पड़ी बौर हो रही थी, अचानक ख्याल आया क्यों न अाज बाबूजी को अपने हाथ का बना आमलेट खिलाया जाए ?"

ठंडी सब्जी से भरी एक अन्य क्टोरी गेस पर रखते हुए बंसी ने कहा…"आपके दिमाग में वड़ा अच्छा ख्याल अाया वहुरानी, मगर ।"

"मगर?" दीपा का दिल धाड़-थाड़ करके बजने लगा ।

"डिनर में साहब आमलेट पसन्द नहीं' करते हैं, एक बार मैंने बना दिया था तो नाराज हो गए-कह्रने लगे कि यह ब्रेकफास्ट में खाने की चीजहै!"

"वाह...ये भी कोई बात हुई, आज मैं आमलेट बनाती हूं अगर नाराज हो तो कहना कि 'मैंने' बनाया है-खाकर बताएं कि कैसा है, उंगलियां चाटते रह जाएंगे और मुझे विश्वास है कि आज के बाद वे डिनर में आमलेट जरूरत लिया करेंगे ।"

"सो तो ठीक है बहूरानी ---मगर अंडा तो है ही नहीं, आमलेट बनाओगी कहां से?"

बंसी के ये शब्द गड़गड़ाती हुई बिजली बनकर दीपा के मनन्मस्तिष्क पर गिरे-स्टेचू में बदलकर रह गई वह जबकि गर्म हो जाने पर बंसी ने सब्जी की कटोरी भी थाली में रखी और गेस आँफ करने के लिए हाथ बड़ाया ही था दीपा लगभग चीख पड़ी----" ठहरो ।"

बंसी चोंक पड़ा ।

दीपा ने की अटपटे स्वर में पूछा---"सूजी तो होगी?"

"है-मगर बात क्या है वहूरानी--आप घवराई हुई-सी क्यों है?" बंसी ने पहली बार उसे ध्यान से देखा और यूं देखने पर दीपा के होश फाख्ता हो गए…लगा कि बंसी उसे देख नहीं वल्कि घूर रहा हैँ…उसके हृदया में छुपे भाव पढ़ना चाहता है शायद-भीतर-ही-भीतर घबराहट के ‘जर्म्स' और बढ़ गए, बोली---"न-नही----घबराहट जैसी तो बात नहीं है, लाओ----जरा सूजी का डब्बा उठाकर मुझे दो !"

"ल-लेकिन आप करना क्या चाहती हैं?"

"हलवा बनाऊँगी!"

"आप भी कमाल करती हैं बहूरानी, शराब के बाद भी कहीं कोई मीठा लेता होगा…क्या आप नहीं जानतीं कि डिनर से पहले साहब दो पेग लेते हैं?"

-हक्की-बक्की दीपा ने पूछा…"क्या शराब के बाद कोई मीठा नहीं खाता?"

"आप भी कमाल करती हैं बहूरानी, शराब के बाद भी कहीं कोई मीठा लेता होगा…क्या आप नहीं जानतीं कि डिनर से पहले साहब दो पेग लेते हैं?"

-हक्की-बक्की दीपा ने पूछा…"क्या शराब के बाद कोई मीठा नहीं खाता?"

"नहीं !"

" क्यों?"

"अब मुझें क्या मालूम वहूरानी, मैंने तो कभी पी नहीं है---अच्छा नहीं लगता होगा !"

' "आज उन्हें खाना ही होगा ।" दीपा को जब कोई तर्कसंगत बात न सूझी तो अजीब स्वर में कह उठी-"कहना कि 'मैंने' बनाया है, जरूर खा लेगें ।"

"आज कोई खास बात है क्या वहूरानी?"

दीपा हड़बड़ा गई---"क-क्या मतलब-नहीं तो ।"

"तब फिर अाज अाप साहब को अपने हाथ का वना कुछ-न-कूछ खिलाने पर इतना जोर क्यों दे रही हैं?"

. "अ-आज मेरा मूड है!"

बंसी ने उसी कंटीली मुस्कान के साथ कहा---" अगर आपकी इतनी ही जबरदस्त इच्छा है तो बना दीजिए हलवा, मैं ले जाऊंगा"

" सूजी का डिब्बा कौन-सा है?

बंसी ने कार्निंश से एक डिब्बा उतारकर उसके सामने रखते हुए कहा…-"ये लो!"

"घी" और चीनी?"

बंसी ने दो डिब्बे-और उतारे दिए।

मुश्किल से तो हालात यहां तक पहुंचे थे और अब दीपा को लग रहा था कि उसे सब्जी, दाल या दही में से किसी में भी गोली डालने का अवसर नहीं मिलेगा-पहली बात तो यह कि आमलेट के लिए वह बंसी को प्याज और मिर्च अादि काटने पर लगा संकती थी, जबकि हलवे हेतु उसे बंसी को देने के लिए कोई काम नजर न अा रहा था और दुसरी बात ये कि उसे लग रहा था कि बंसी को शक हो गया है---इस अवस्था में वह मुझ पर कड़ी नजर रखेगा, या तो लह मुझें अपना काम करने का मोका देगा ही नहीं और यदि मैंने जबरदस्ती करने की कोशिश की और उसने देख लिया 'तो गजब ढोजाएगा ।

 
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