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"यानी अब भी इसके दबाव डालने पर आए हैं?"
"ऐसा सोचकर इनकी भावनाओं का अनादर न कीजिये बाबूजी?" पति का साथ देने हेतु दीपा झूठ बोलती चली गई----" केवल आपसे अत्यधिक डरे हुए होने के कारण न आ पा रहे थे, जबकि सच्चाई यह है कि आपको और मांजी को याद कर-करके पिछले पांच दिन से लगातार आंसू वहा रहे हैं, इनकी यह तड़प , मुझ पर देखी न गई और आपसे हाथ जोड़कर यह विनती करने आईं हू कि मुझ अभागिन को न सही, अपने बेटे को स्वीकार कर लीजिए वावूजी!"
"तुम्हें क्यों नहीं?"
"स-सारे फसाद की जड़ मैं ही तो हु!"
"नहीं-तुम गलत सोच रही हो--फसाद की जड़ तुम नहीं वल्कि इस पाजी का विद्रोही स्वभाव है----मुझ से टकराने का इसकी इच्छा है--तुम्हारा कोई दोष नहीं है बेटी--यदि इसे तुम्ही से शादी करनी धी हमसे जिक्र क्यों नहीं किया----ये शिकायत है कि सीधे कोर्ट मैरिज क्यों कर ली इसने--- चाहे जैसी वनी हो, मगर अब तुम हमारी बहु हो और इस घर की बहू हो और इस पाजी से पहले इस घर पर तुम्हारा हक है !"
"'व-वाबूजी!" दीपा सचमुच भावुक हो उठी । भावनाओं के भंवर में फंसा भगतसिंह कहता चला गया--"अब कभी यह न सोचना बहू कि हम इस विद्रोही को तुम्हरे बिना कबूल कर लेंगे-----हां तुमसे इतना जरूर चाहते है तुम इस कम्बख्त के दिमाग से पिता से टवकर लेने का भूत उतार दो !"
" ब--बाबूजी !" चीखकर दीपा उनके चरणों में गिर पड़ी-- आशीर्वादस्वरूप उसके सिर पर अपना हाथ सरसरा रहे कर्नल की आंखों में आंसू थे…अंजली की आँखों में दूर-दूर तक खुशी की चमक और देव की आंखों में सफलता की ।
कर्नल भगतसिंह को विभाग की तरफ़ से जो विशाल कोठी मिली
हुई थी ।
उसके मुख्य द्वार पर नहीं, वल्कि चारों तरफ़ मिलिट्री का सख्त पहरा रहता था ।
मिलिट्री के एक ट्रक में भरकर उसी दिन शाम को देव और दीपा का सारा सामान उसके दोस्त के स्थान से यहाँ ले अाया गया था ।
मकान की चाबी देव को दे दी गई ।
उस दिन के अखबार में छपा कि जब्बार नामक एक सब-इंस्पेक्टर अपनी डयूटी और फ्लैट से रहस्यमय ढंग से गायब हेै-जहां देव को यह सकून मिला कि जब्बार के उसके पास आने की पुलिस को कोई जानकारी नहीं है, वहीं यह पंढ़कर दिलो-दिमाग पर थोड़ा आतंक हावी हुआ कि पुलिस पता लगाने की कोशिश कर रही है कि सब-इंस्पेक्टर आखिर कहाँ गायब हो गया है ?
मगर गुजरते हुए दिनों ने इस आतंक परं वक्त की पर्त जमा ।
एक हफ्ता गुजर गया ।
अखवार में जब्बार के बारे में कुछ न छपा।
जगबीर, सुक्खू या कुबड़े भिखारी में से भी उसने किसी की शक्ल न देखी ।
वह और दीपा सामान्य बेटे-बहू के रूप में अपने मां-बाप के पास रहने लगे थे------देव वैंक जाने लगा----इस एक हफ्ते में हालात यह हो गई कि हफ्ते भर पहले जो कूछ हुआ था वह सव देव और दीपा को स्वप्न-सा महसूस होने लगा ।
उनके दिमागों को ये सवाल बेचैन किए दे रहे थे कि कुबड़े भिखारी ने उन्हें कोठी में रहने का निदेश क्यों दिया है और अव यह उनसे सम्पर्क स्थापित क्यों नहीं कर रहा है?
हफ्ते भर बाद ।
देय वैंक में बैठा अपनी सीट पर काम कर रहा था कि किसी ने काउंटर खटखटाया-----देव ने चौंककर सवालिया नजरों से ग्राहक की तरफ देखा जिसके चेहरे पर फ्रेच कट दाढ़ी, हिप्पी जैसी मूंछे और आँखों पर काले लैसों वाला चश्मा था ।
''कहिए ?"
जवाब में उसने मोटी उंगलियों से विशिष्ट अंदाज में नाक खुजलाई तो देव बुरी तरह चौंक पड़ा, मुंह से बरबस ही निकला------"त--तुम ? "
"बैंक के बाद घंटाघर आना, वहां खडा ग्रे कलर की फियेट तुम्हें मेरे पास पहुंचा देगी, नम्बर इस कागज में लिखा है?" कहने के साथ ही उसने कागज का एक छोटा--सा पुर्जा काउंटर पर उसकी तरफ सरका दिया ।
देव ने उस पर लिखा गाडी का नम्बर पढा-उघर फ्रेंच कट दाढ़ी बाला वैंक के मुख्य द्वार की तरफ बढ़ रहा था…देव ने ध्यान से देखा, उसके बाएं कंधे के पीछे कूबड़ साफ चमक रहा था------देखकर न जाने क्यों देव के समूचे जिस्म में चीटियां--सी रेंगने लगी ।।
आंखों से वाली पट्टी हटते ही देव ने खुद को कीमती सांमान से खूबसूरती के साथ सजे एक विशाल और आलीशान कमरे में पाया----पट्टी हटाने वाला सुक्खू था, सावधान की मुद्रा में जगबीर उसके दाई तरफ़ खड़ा था और विशिष्ट अंदाज में नाक खुजलाने बाला इस वक्त भिखारी वाले लिबास मे एक विशाल मेज के पीछे ऊंची पुश्त वाली रिवांल्विग चेयर पर बैठा था ।
कुछ देर खामोशी रही ।
कमरे को निरीक्षण करने के बाद देब की नजरें भिखारी पर जम गई, वोला-"आप लोग आंखों पर पट्टी बांध कर मुझे यहां क्यों लाए हो"
"आराम से बैठकर बातें करने के लिए!"" धतुरे के नशे से सराबोर आखों वाले भिखारी ने विशिष्ट अन्दाज में नाक खुजलाते हुए कहा------" आंखों पर पट्टी इसलिए बांधनी पड्री ताकि यह न जान सको कि तुम्हें कहां लाया गया है!"
" क्या बातें करना चाहते हो?"
"बैठो ---- ये कुर्सी तुम्हारे ही लिए है !" उसने मेज के इस तरफ पड़ी एकमात्र कुर्सी की और संकेत करते हुए कहा ।
देव आगे बढ़कर ठीक, उसके सामने बैठे गया ।