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सूनी आंखो में उदासी complete

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Guest
सूनी आंखो में उदासी

“ बाबा की रानी हूँ ,आंखो का पानी हूँ,

बह जाना है जिसे, दो पल कहानी हूँ,

अम्मा की बिटिया हूँ,आंगन की मिटियां हूँ,

टूक टूक निहारे जो परदेसी चिट्ठीयां हूँ,.”




उस छोटे से कमरे के एक कोने में पडे छोटे से टेबल पर रखे मोबाइल पर यही गीत बज रहा था और कविता वहीं नीचे रखे स्टोव पर रोटियां सेंक रही थी...उसकी आंखों से आंसू बह कर तवे पर गिर रहे थे और गिरने के साथ ही भाप की तरह उड़ते जाते थे ! पापा चाहे कितने भी नाराज़ होते थे ये गीत कविता का रामबाण होता था पापा को मनाने का लेकिन आज 12 दिन हो गये थे घर से आये ,पापा आज भी नाराज़ थे ! लाड करने वाली माँ ,जान छिड़कने वाला बड़ा भाई और दुनिया के सबसे अच्छे पापा..सबकुछ ही तो छोड़ आयी थी कविता !

डेढ़ घंटे की मशक्कत के बाद वो आंटा गूथ पायी थी और अब रोटी बना रही थी तो हाथ बार बार जल जा रहा था ! घर पर कभी कोई काम नहीं किया था उसने ! जब भी मम्मी कुछ काम करने के लिये कहती तो पापा कहते थे " ज़िंदगी भर तो ये सब करना ही है अभी से क्या जरूरत है ! पढने दो उसे अभी ! कविता को पापा बहुत याद आ रहे थे ! वो लाड़-प्यार,वो अपना प्यारा सा घर, वो मम्मी के हाथ का खाना ..सबकुछ बहुत याद आ रहा था ! कविता का जहन पिछ्ले 2 महीने में उसकी ज़िंदगी मे आये इस भूचाल में उलझा जा रहा था –

कॉलेज के दूसरे साल में और जीवन के बीसवें बरस मे उसे भी पहली पहली बार इश्क़ हो गया था ! विरेंदर उसके कॉलेज में ही पढता था !कविता बी.ए कर रही थी और विरेंदर एम.ए ! 2 साल की मुहब्बत में विरेंदर उसकी जिंदगी मे इस कदर शामिल हो गया था की उसके बिना जीने की सोचती भी नही थी वो ! विरेंदर की फेमिली में सिर्फ एक बड़ी बहन थी जो शादी के बाद अपने घर रहती थी ! विरेंदर कॉलेज के बाद खुद की मिठाई की दुकान पर बैठता था !

उस दिन पहली बार उसने अपने पापा को इतने गुस्से मे देखा था जब घर पर ये बात पता चली थी की वो किसी लड़के के साथ पिक्चर देखने गयी थी ! किसी जान पहचान वाले ने उन्हें साथ में देख लिया था और घर पर कह दिया था ! बडी मुश्कील से उसने मां को कहा था की वो किसी लड़के को पसंद करती है ! पापा को भी बतान चाहा था उसने लेकिन पापा ने उस से बात भी नहीं की थी ! कविता अक्सर विरेंदर से कहती थी मेरे पापा मुझे बहुत प्यार करते हैं ,पापा मेरी खुशी के लिये कुछ भी कर सकते हैं..वो जरूर मान जायेंगे ! आज लग रहा था,कितने बड़े भुलावे में थी वो !

हफ्ते भर में उसकी शादी के लिये रिश्ता आ गया था .. “लड़का भरतपुर मे इंजीनियर है,अच्छा घर है,अच्छे लोग हैं ..शादी वहीं होगी” –पापा ने फैसला सुना दिया था ! उसके बाद विरेंदर से बड़ी मुश्किल से मिल पायी थी वो ! घर छोड़ना या विरेंदर को छोडना.....2 साल की मुहब्बत या बीस साल का प्यार...एक को चुनना था उसे ! जाने क्यूं 2 साल की मुह्ब्बत 20 साल के उस प्यार पर भारी पड़ गयी थी ! कविता आज तक पापा की किसी बात के खिलाफ नही गयी थी, उसके अपने हर फैसले के पिछे पापा की हाँ होती थी पर आज जिंदगी के सबसे बड़े फैसले में पापा उसके साथ नहीं थे !

विरेदर के साथ घर से "भाग" आयी थी वो..दो दिन मुम्बई में उसके एक दोस्त के यहां रुके थे और तीसरे दिन चॉल मे ये एक छोटा सा कमरा किराये पर लिया था ! घर से आने के तीसरे दिन ही मंदिर मे शादी कर ली थी दोनों ने ! विरेंदर ने कहा था की जल्दी ही यहां से चले जायेंगे ! आज 10वां दिन था इस चौल में ! एक बार घर पर कॉल किया था उसने - “ये समझ लेना मर गये हम सब तुम्हारे लिये और तुम हमारे लिये” पापा ने कहा था ,कविता के आंसू पापा को पिघला नहीं पाये थे ,बाबा की रानी बाबा के लिये मर चुकी थी !

कविता का ध्यान चौल में लगे टीन के उस दरवाजे पर हो रही दस्तक पर गया, साड़ी के पल्लू से आंसू पोंछते हुये उसने उठ्कर दरवाज़ा खोला ! सामने विरेंदर खड़ा था ..

“कैसी हो जान...अरे मना किया था न तुम्हें कुछ भी करने के लिये..मैं कर देता ना आकर..”उसने कविता को बाहों मे भरते हुए कहा !

“खाली ही थी तो...छोडिये रोटी जल जायेगी...” उसने विरेंदर के दोनों हाथों को अपनी कमर से अलग किया तो नज़र उसके काले नीले हो रही हथेली पर पड़ी ! विरेंदर ने एक ऑटोमोबाईल की दुकान पर मेकनीक की नौकरी कर ली थी, उसके हाथों में दो तीन जगह छाले पड़े हुये थे ! कविता की आंख एक बार फिरसे भर आयी ! उसने विरेंदर के हाथों को चूम लिया ! विरेंदर उसे देखता रहा ..जून का महिना था और गर्मी चरम पर थी और पसीने से कविता लग्भग भीग चुकी थी..,कमरा हल्के धुयें से भर गया था, कमरे में कोई खिड़की भी नहीं थी..ना लाइट....ना फैन..!विरेंदर को दुख हो रहा था..उसने कविता के गालों को सहलाते हुये कहा-

“मैं तुम्हें कुछ नहीं दे पाया ना जान,.!..बस कुछ दिनों की बात है फिर हम यहां से चले जायेंगे ” उसने कविता को खुद में समेट लिया! कविता को लगा “गलत कहते हैं लोग की सिर्फ प्यार के सहारे ज़िंदगी नही कटती”

“मैं आपके साथ ऐसे ही सारी ज़िंदगी बिता लूंगी विरेंदर...मुझे कुछ नहीं चाहिये ” उसने विरेंदर की आंखो मे देखते हुये बड़े प्यार से कहा और उससे लिपट गयी ! दोनों एकदुसरे के आगोश मे खोते जा रहे थे ,तवे पर रखी रोटी से धुआं निकलने लगा था !

दोनो को मुम्बई आये हुये एक महिने से ज्यादा हो गया था ! विरेंदर को एक BPO मे जॉब मिल गयी थी ! उसने इंगलिश मे एम.ए किया था तो उसकी इंग्लिश बहुत अच्छी थी और इसी वजह से उसकी सेलरी भी ठीक थी ! चौल से निकलकर वो लोग एक ठीक ठाक एरिये में कमरा लेकर रहने लगे थे !एक छोटा सा कमरा था एक रसोई और बाथरूम ! कविता उसी एक कमरे में अपने सपनों का घरोंदा बसाने लगी थी ! विरेंदर का प्यार उसके लिये दिन प्रतिदिन और बढ़ता ही जा रहा था ! वो दिवानों की तरह कविता की हर बात मानता ! कभी जुही चौपाटी पर घूमने जाते तो कभी बाहर पिक्चर देखने और कभी कभी बाहर डिनर करने ! सेलरी बहुत ज्यादा तो नहीं थी लेकिन कविता खुश थी !!उसने जो चाहा था उसे मिल गया था ! जब जीवन मे सच्चा प्यार हो तो फिर किसी और चीज के होने न होने से फर्क नहीं पड़ता ! लेकिन उन रिश्तों को भूलना भी इतना आसान था क्या जिनकी बुनियाद पर ज़िंदगी के बीस बरस बीते थे ;

 


“पापा की बहुत याद आती है !” थाली मे खाना परोसते हुये कविता ने बुझे हुये लहजे मे कहा ! फर्श पर पालथी मारकर बैठे हुये विरेंदर ने उसकी ओर देखा..

“कुछ दिन और रुक जाओ जान ! चलेंगे हम एक दिन.. उनका गुस्सा थोड़ा और कम हो जाये फिर !” उसने कविता की आंखो मे झांकते हुये कहा !

“सच मे विरेंदर??..आप चलेंगे वहाँ ! आप कितने अच्छे हो !..आई लव यू...उम्म्ममुआह्ह्ह्ह्ह..” उसने चहकते हुये विरेंदर को गाल को चूम लिया,फिर खुद ही उदास हो गयी..

“पापा नहीं मानेंगे..वो हमे कभी माफ नहीं करेंगे..." उसकी आंखे भर आयीं !

“जरूर मान जायेंगे..जब इतने दिन बाद तुमको अपने सामने देखेंगें तो..तुम कहती थी ना “बाबा की रानी हूँ” फिर ?? “ विरेंदर ने उसे दुलारते हुये कहा !

“हाँ...चल कर पापा को पकड़ कर खूब रोयुंगी..फिर जरूर मान जायेंगे...है ना ?” वो खूब खुश हो गयी थी !

“हाँ बिल्कुल...चलो अब खाना दे दो भूख लग रही है बहुत तेज वाली !”

“ओह ! हाँ ..सोरी मैं भूल गयी..” उसने थाली मे खाना निकाला और फिर दोनों एक साथ एक ही थाली से खाने लगे ! खाने के बाद कविता बरतन समेटती उन्हें धोने चली गयी जबकी विरेंदर बेड पर चढकर अपनी छोटी सी सेकेंड हैंड टी.वी को चलाकर चैनेल बदलने लगा !

जुलाई का महिना था और रात में लगभग 11 बजे के आसपास खूब झमाझम बारिश शुरु हो गयी ! विरेंदर कविता के मखमली जिस्म को अपनी बाहों मे कसे उसके सुर्ख लाल होठों को बेरहमी से चूम रहा था ,कविता मधहोशी मे कभी उस से छूटने को जोर लगाती तो कभी उसके साथ चुम्बन मे डूब जाती ! बाहर होती बारिश को सुरुर और प्रेम-अगन में पागल दो जिस्म ..!

कविता के होठों से निची आते हुये विरेंदर उसके गले के चूमने लगा ! और हर चुम्बन के साथ कविता और पागल हुये जा रही थी..उसके जिस्म पर बस दो झीने से वस्त्र थे जो उसके अंगो से फूटती यौवन की कलियों को छुपा पाने मे असमर्थे थे ! काले रंग के उन दो छोटे अंतरंग वस्त्रों मे उसका यौवन ढकने की बजाय और उभर रहा था ! गले से निचे आते हुये विरेंदर ने अपने होठों को उन वस्त्रों के उपर से ही कविता के वक्षों पर फिराने लगा ! कभी उन जवानी की पहाडियों पर दाँत गड़ा दे रहा था तो कभी उनके बीच की घाटी मे जीभ डाल कर चूम लेता ! कविता उसके बालों मे हाथ फिराते हुये उसके सिर को अपने उभारों पर दबा ले रही थी ! विरेंदर कविता के एक स्तन को ब्रा के उपर से ही मुंह मे भरकर चुसने लगा और दुसरे को अपनी मजबूत हथेली मे पकड़कर बेरहमी से मसलने लगा ! कविता के मुंह से सिसकियां निकलने लगीं !

“जान !..”कविता ने मदहोशी की आवाज़ मे विरेंदर को पुकारा ! दो बार बुलाने के बाद विरेन्दर ने सर उठाकर देखा...

“वो निकाल कर ना....” आज भी कविता विरेंदर से उतना ही शर्माती थी जितना पहली रात को शरमायी थी !

“क्या?”विरेंदर ने नादानी से पुछा..

“ये बुद्धू..” कविता ने हाथ अपने ब्रा पर रख दिये ! और आंखे बंद कर ली !

“ओह..अच्छा ! जानती हो..तुम्हारी ये मासूमियत तुम्हारे इस खूबसूरत जिस्म से ज्यादा पागल कर देती है मुझे...थैंक्स जान ...!” मुस्कुराते हुये विरेंदर ने कहा और अपने हाथ ब्रा के अंदर डालकर कविता के निप्पल पकड़ कर उमेठ दिये ! वो दर्द और मजे से सिसक उठी !

“जानवर हो आप पूरे...ये कहा था क्या मैंने...??”कविता ने बनावटी गुस्से से कहा !

“लो जी अभी लो...”विरेंदर ने निपप्प्ल से हाथ हटाया और हाथ मे फसाकर एक झटके से उसके ब्रा को खींच लिया ! चर्रर्रर्रर्र की आवाज़ के साथ ब्रा उसके हाथ में झूल गया उसको एक ओर फेंकते हुये विरेंदर एक बार फिर से कविता के स्तनों पर टूट पड़ा ! ..एक स्तन को मुहं में लेकर पीते हुये वो दुसरे को हथेली में दबाये बेरहमी से निचोड रहा था !

“विरेंदर...प्लीज़्ज़्ज़....आह...उम्म्म...लाइट्स..बंद्..कर दो ना..प्लीज़्ज़्ज़्ज़्ज़्ज़..”

“जो हुक्म मल्लिका-ए हुस्न...” विरेंदर ने बिस्तर से छ्लांग लगायी और एक पल मे लाईट बंद करता हुआ फिर से कविता के उपर टूट पड़ा ! कविता की सिस्कियां आहों मे बदल रही थीं और गहरा होती रात के साथ वो सिस्कियां और वो आहें और गहरी होती जा रही थीं ! बाहर बारिश सावन के आने की आहट थी ,अंदर प्रेम और यौवन की बारिश दो तपते जिस्मों के संगम की गवाह बन रही थी ! विरेंदर और कविता के प्रेम के एक और खूब्सूरत दिन का अंत एक मदहोश और रंगीन रात के साथ हुआ था !

आज शुक्रवार था !विरेंदर ऑफीस जाने के लिये नहाकर कपडे पहन रहा था और कविता किचन मे नाश्ता बना रही थी ! कविता नाश्ता लेकर आयी तो विरेंदर किसी से फोन पर बात कर रहा था..करीब 2 मिनट बाद उसने फोन रखा !

“कविता ,शालिनी का फोन था...” विरेंदर ने कहा ! शालीनी विरेंदर की दीदी का नाम था जो अहमदाबाद मे रहती थीं ! रविवार को वो आने को कह रही थीं उन दोनों से मिलने ऐसा विरेंदर ने बताया उसे और ये सुनकर कविता बहुत खुश थी ! ससुराल के ताल्लुक से किसी अपने के ना होने का अहसास उसे बहुत शिद्दत से महसूस होता था और जब विरेंदर ने बताया की दीदी आना चाहती है तो कविता ने फौरन उन्हें आने को बोलने को कह दिया !

विरेंदर भी खुश था ..”सब ठीक हो जायेगा जान...ऐसे ही एक दिन पापा भी आयेंगे ना..है ना? “ कविता ने विरेंदर के गले लगते हुये कहा !

“हाँ मेरी जिंदगी..जरुर आयेंगे..लेकिन पहले हम चलेंगे उन्हे मनाने फिर..चलो अब मैं लेट हो रहा हूं..!..अपना ख्याल रखना ” विरेंदर ने कविता के होठों को चूम लिया और बाहर निकल गया !

कविता आज बहुत खुश थी दीदी के आने का सुनकर ! उनके इस घर में भी कोई मेहमान आने वाला था..और विरेंदर की खुशी से वो और भी खुश थी ..विरेंदर के इर्द गिर्द ही तो उसके सारे सपने और उसकी ज़िंदगी थी..उसके कपड़े समेटती हुयी वो बाथरूम मे पहुंची ही थी कि दरवाज़े पर दस्तक हुयी ! कविता सोच में पड़ गयी ! यहां पर इस वक़्त कौन हो सकता है..वो तो यहाँ किसी को जानते भी नहीं ...हिचकते हुये वो दरवाज़े की ओर बढ़ गयी !

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दोनो को मुम्बई आये हुये एक महिने से ज्यादा हो गया था ! विरेंदर को एक BPO मे जॉब मिल गयी थी ! उसने इंगलिश मे एम.ए किया था तो उसकी इंग्लिश बहुत अच्छी थी और इसी वजह से उसकी सेलरी भी ठीक थी ! चौल से निकलकर वो लोग एक ठीक ठाक एरिये में कमरा लेकर रहने लगे थे !एक छोटा सा कमरा था एक रसोई और बाथरूम ! कविता उसी एक कमरे में अपने सपनों का घरोंदा बसाने लगी थी ! विरेंदर का प्यार उसके लिये दिन प्रतिदिन और बढ़ता ही जा रहा था ! वो दिवानों की तरह कविता की हर बात मानता ! कभी जुही चौपाटी पर घूमने जाते तो कभी बाहर पिक्चर देखने और कभी कभी बाहर डिनर करने ! सेलरी बहुत ज्यादा तो नहीं थी लेकिन कविता खुश थी !!उसने जो चाहा था उसे मिल गया था ! जब जीवन मे सच्चा प्यार हो तो फिर किसी और चीज के होने न होने से फर्क नहीं पड़ता ! लेकिन उन रिश्तों को भूलना भी इतना आसान था क्या जिनकी बुनियाद पर ज़िंदगी के बीस बरस बीते थे ;

“पापा की बहुत याद आती है !” थाली मे खाना परोसते हुये कविता ने बुझे हुये लहजे मे कहा ! फर्श पर पालथी मारकर बैठे हुये विरेंदर ने उसकी ओर देखा..

“कुछ दिन और रुक जाओ जान ! चलेंगे हम एक दिन.. उनका गुस्सा थोड़ा और कम हो जाये फिर !” उसने कविता की आंखो मे झांकते हुये कहा !

“सच मे विरेंदर??..आप चलेंगे वहाँ ! आप कितने अच्छे हो !..आई लव यू...उम्म्ममुआह्ह्ह्ह्ह..” उसने चहकते हुये विरेंदर को गाल को चूम लिया,फिर खुद ही उदास हो गयी..

“पापा नहीं मानेंगे..वो हमे कभी माफ नहीं करेंगे..." उसकी आंखे भर आयीं !

“जरूर मान जायेंगे..जब इतने दिन बाद तुमको अपने सामने देखेंगें तो..तुम कहती थी ना “बाबा की रानी हूँ” फिर ?? “ विरेंदर ने उसे दुलारते हुये कहा !

“हाँ...चल कर पापा को पकड़ कर खूब रोयुंगी..फिर जरूर मान जायेंगे...है ना ?” वो खूब खुश हो गयी थी !

“हाँ बिल्कुल...चलो अब खाना दे दो भूख लग रही है बहुत तेज वाली !”

“ओह ! हाँ ..सोरी मैं भूल गयी..” उसने थाली मे खाना निकाला और फिर दोनों एक साथ एक ही थाली से खाने लगे ! खाने के बाद कविता बरतन समेटती उन्हें धोने चली गयी जबकी विरेंदर बेड पर चढकर अपनी छोटी सी सेकेंड हैंड टी.वी को चलाकर चैनेल बदलने लगा !

जुलाई का महिना था और रात में लगभग 11 बजे के आसपास खूब झमाझम बारिश शुरु हो गयी ! विरेंदर कविता के मखमली जिस्म को अपनी बाहों मे कसे उसके सुर्ख लाल होठों को बेरहमी से चूम रहा था ,कविता मधहोशी मे कभी उस से छूटने को जोर लगाती तो कभी उसके साथ चुम्बन मे डूब जाती ! बाहर होती बारिश को सुरुर और प्रेम-अगन में पागल दो जिस्म ..!

कविता के होठों से निची आते हुये विरेंदर उसके गले के चूमने लगा ! और हर चुम्बन के साथ कविता और पागल हुये जा रही थी..उसके जिस्म पर बस दो झीने से वस्त्र थे जो उसके अंगो से फूटती यौवन की कलियों को छुपा पाने मे असमर्थे थे ! काले रंग के उन दो छोटे अंतरंग वस्त्रों मे उसका यौवन ढकने की बजाय और उभर रहा था ! गले से निचे आते हुये विरेंदर ने अपने होठों को उन वस्त्रों के उपर से ही कविता के वक्षों पर फिराने लगा ! कभी उन जवानी की पहाडियों पर दाँत गड़ा दे रहा था तो कभी उनके बीच की घाटी मे जीभ डाल कर चूम लेता ! कविता उसके बालों मे हाथ फिराते हुये उसके सिर को अपने उभारों पर दबा ले रही थी ! विरेंदर कविता के एक स्तन को ब्रा के उपर से ही मुंह मे भरकर चुसने लगा और दुसरे को अपनी मजबूत हथेली मे पकड़कर बेरहमी से मसलने लगा ! कविता के मुंह से सिसकियां निकलने लगीं !

“जान !..”कविता ने मदहोशी की आवाज़ मे विरेंदर को पुकारा ! दो बार बुलाने के बाद विरेन्दर ने सर उठाकर देखा...

“वो निकाल कर ना....” आज भी कविता विरेंदर से उतना ही शर्माती थी जितना पहली रात को शरमायी थी !

“क्या?”विरेंदर ने नादानी से पुछा..

“ये बुद्धू..” कविता ने हाथ अपने ब्रा पर रख दिये ! और आंखे बंद कर ली !

“ओह..अच्छा ! जानती हो..तुम्हारी ये मासूमियत तुम्हारे इस खूबसूरत जिस्म से ज्यादा पागल कर देती है मुझे...थैंक्स जान ...!” मुस्कुराते हुये विरेंदर ने कहा और अपने हाथ ब्रा के अंदर डालकर कविता के निप्पल पकड़ कर उमेठ दिये ! वो दर्द और मजे से सिसक उठी !

“जानवर हो आप पूरे...ये कहा था क्या मैंने...??”कविता ने बनावटी गुस्से से कहा !

“लो जी अभी लो...”विरेंदर ने निपप्प्ल से हाथ हटाया और हाथ मे फसाकर एक झटके से उसके ब्रा को खींच लिया ! चर्रर्रर्रर्र की आवाज़ के साथ ब्रा उसके हाथ में झूल गया उसको एक ओर फेंकते हुये विरेंदर एक बार फिर से कविता के स्तनों पर टूट पड़ा ! ..एक स्तन को मुहं में लेकर पीते हुये वो दुसरे को हथेली में दबाये बेरहमी से निचोड रहा था !

“विरेंदर...प्लीज़्ज़्ज़....आह...उम्म्म...लाइट्स..बंद्..कर दो ना..प्लीज़्ज़्ज़्ज़्ज़्ज़..”

“जो हुक्म मल्लिका-ए हुस्न...” विरेंदर ने बिस्तर से छ्लांग लगायी और एक पल मे लाईट बंद करता हुआ फिर से कविता के उपर टूट पड़ा ! कविता की सिस्कियां आहों मे बदल रही थीं और गहरा होती रात के साथ वो सिस्कियां और वो आहें और गहरी होती जा रही थीं ! बाहर बारिश सावन के आने की आहट थी ,अंदर प्रेम और यौवन की बारिश दो तपते जिस्मों के संगम की गवाह बन रही थी ! विरेंदर और कविता के प्रेम के एक और खूब्सूरत दिन का अंत एक मदहोश और रंगीन रात के साथ हुआ था !

आज शुक्रवार था !विरेंदर ऑफीस जाने के लिये नहाकर कपडे पहन रहा था और कविता किचन मे नाश्ता बना रही थी ! कविता नाश्ता लेकर आयी तो विरेंदर किसी से फोन पर बात कर रहा था..करीब 2 मिनट बाद उसने फोन रखा !

“कविता ,शालिनी का फोन था...” विरेंदर ने कहा ! शालीनी विरेंदर की दीदी का नाम था जो अहमदाबाद मे रहती थीं ! रविवार को वो आने को कह रही थीं उन दोनों से मिलने ऐसा विरेंदर ने बताया उसे और ये सुनकर कविता बहुत खुश थी ! ससुराल के ताल्लुक से किसी अपने के ना होने का अहसास उसे बहुत शिद्दत से महसूस होता था और जब विरेंदर ने बताया की दीदी आना चाहती है तो कविता ने फौरन उन्हें आने को बोलने को कह दिया !

विरेंदर भी खुश था ..”सब ठीक हो जायेगा जान...ऐसे ही एक दिन पापा भी आयेंगे ना..है ना? “ कविता ने विरेंदर के गले लगते हुये कहा !

“हाँ मेरी जिंदगी..जरुर आयेंगे..लेकिन पहले हम चलेंगे उन्हे मनाने फिर..चलो अब मैं लेट हो रहा हूं..!..अपना ख्याल रखना ” विरेंदर ने कविता के होठों को चूम लिया और बाहर निकल गया !

कविता आज बहुत खुश थी दीदी के आने का सुनकर ! उनके इस घर में भी कोई मेहमान आने वाला था..और विरेंदर की खुशी से वो और भी खुश थी ..विरेंदर के इर्द गिर्द ही तो उसके सारे सपने और उसकी ज़िंदगी थी..उसके कपड़े समेटती हुयी वो बाथरूम मे पहुंची ही थी कि दरवाज़े पर दस्तक हुयी ! कविता सोच में पड़ गयी ! यहां पर इस वक़्त कौन हो सकता है..वो तो यहाँ किसी को जानते भी नहीं ...हिचकते हुये वो दरवाज़े की ओर बढ़ गयी !

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कविता ने दरवाज़ा खोला तो सामन एक लड़की खड़ी थी ..सांवला रंग,लम्बा कद,तीखे नैन नक्श और खूब बड़ी बड़ी आंखे..जींस के साथ लम्बा सा कुर्ता पहने हुये बडी फ्रेश सी लग रही थी !

“नमस्ते ! मेरा नाम श्वेता है ..यहीं आपके पड़ोस मे रहती हूँ..”

“जी नमस्ते ,मैं कविता !”

“हम लोग गांव गये थे..कल शाम को आये तो वर्मा अंकल ने बताया की उन्होंने नये किरायेदार रख लिये हैं मैंने सोचा चलो मिल्कर आते हैंं..” लड़की बातों से सीधी लग रही थी !

“जी अच्छा किया आपने..हम तो यहाँ किसी को नहीं जानते...तो इसलिये..”कविता ने कहा !

“अरे कोई बात नहीं..आपके घर के दाहिनी ओर से तीसरा घर हमारा है...कभी भी आइये..बस मैं और मेरे भईया ही रहते हैं..”

“जी जरूर..अभी मेरे हसबैंड ऑफीस गये हैं..किसी दिन उनके साथ आउंगी...आप अंदर आइये ना..”कविता को लगा 10 मिनट से वो दरवाज़े पर खड़ी है !

वो लड़की कविता के साथ अंदर आ गयी..और फिर जब लड़्कियों के बातों का सिलसिला चला तो वक़्त की किसे परवाह...कविता को श्वेता अच्छी लगी थी और उसने अपनी सारी कहानी उसे सुना दी !

“तो आपने लव मैरेज किया है...नाइस यार..लकी हो आप दोनों..”

“ह्म्म्म..लकी तो हूँ शायद..लेकिन प्यार पाने के लिये बड़ी कीमत चुकानी पड़ती है..”कविता ने खोये खोये से लहजे में कहा !

“जी..मै समझती हूं..अच्छा आप बोर हो जाती होंगी घर पर...नहीं??”

“होती तो हूँ...लेकिन कोई बात नहीं..”कविता ने कहा !

“हमारा एक स्कूल चलता है यहीं पास में..अभी 2 साल पहले शुरु किया है..हम नये टीचर रख रहे हैं..गर आप चाहें तो...” लड़की ने कहा !

“अरे नहीं..मैं तो बस..”

“मैने ऐसे ही कह दिया..अगर आप का मन करे तो..अपने हब्बी से पुछ लिजिये वो हाँ कहें तो ही..वरना ऐसे घूमने भी आ सकती हैं आप...जब भी मन करे..”

“आप भी वहां पे टीचर हैं क्या..”कविता ने पुछा

“जी..मैं मेरे भईया हैं, और मेरा छोटा भाई भी आने वाला है..फिर शायद मुझे घर जाना पड़े..मम्मी की तबियत ठीक नहीं रहती है....हमारा घर पुणे में है..”

“अच्छा..देखुंगी मैं..”कविता ने कहा !

“जी जरूर सोचियेगा..काफी स्टुडेंट्स हो गये हैं अब त !!....थोड़ी ईक्स्ट्रा इनकम भी हो जायेगी आपकी और घर पर बोर भी नहीं होंगे...मैं एक दोस्त की तरह कह रही हूँ..बाकी आपको जैसा सही लगे...” लडकी ने कहा और चलने को तैयार हो गयी !

कविता उसे बाहर छोड़ कर आयी और जाते जाते वो कविता को अपना फोन नंम्बर देती गयी !

कविता को टीचिंग का शौक शुरु से था लेकिन घर छोड़ने के बाद उसने सिर्फ विरेंदर के सपने याद रखे थे अपने सपने वो अपने घर पर ही छोड़ आयी थी..जिन सपनों से विरेंदर जुड़ा था सिर्फ वही याद थे ! आज श्वेता की बातों ने जाने अनजाने फिर से उन सपनों की याद ताजा कर दी थी ! कविता ने दरवाज़ा बंद किया और कपडे लेकर बाथरूम मे घुस गयी !

शाम को विरेंदर घर लौटा तो कुछ बुझा बुझा सा था और काफी लेट भी आया था ! तकरीबन 11 बजे, नहीं तो आम तौर पर 9.30-10 तक आ जाता था !खाना खाने के बाद कविता उसके सर को अपनी गोद मे रखे तेल मालिश कर रहे थी..विरेंदर आंखे बंद किये हुये उसके हाथों की नर्मी को अपने सर पर महसूस कर रहा था !

“विरेन !..”कविता प्यार से विरेंदर को कभी कभी विरेन बुलाती थी !

“ह्म्म...”

“आप कुछ परेशान लग रहे हैं..कोई बात है क्या..”

“नहीं जान ! बस ऑफीस की थोड़ी टेंसन रहती है..पता नहीं कब निकाल दे..ऐसी जॉब का कोई भरोसा नहीं होता..”

“ज्यादा मत सोचा करो आप..हम आपके साथ हर हाल मे रह लेंगे..”

“आई नो दैट जान !”विरेंदर ने उसके हाथ को चूम लिया !

“एक बात बतायें..वो आज हमारे पड़ोस की एक लड़की आयी थी..श्वेता ! ..”

“अच्छा जी ! पडोसन मिल गयी आपको..फिर तो बढीयां है..गप्पे मारने के लिये कोई तो रहेगा..” विरेंदर ने मुस्कुराते हुये कहा !

“अरे नहीं ! वो पढाती हैं..उनका खुद का स्कूल है..”

“ओह..”

“हाँ..एक बात कहें..”

“हाँ बोलो ना”

“वो कह रही थीं की हम भी वहां आकर पढायें..वैसे भी यहाँ दिन भर बोर ही होते हैं आपके जाने के बाद...” कविता ने कहा ..

“अगर आप कहें तो..”उसने बड़े प्यार से विरेंदर की ओर देखते हुये पुछा !

“क्या जरुरत है पढ़ाने की..यार अब मैं इतना भी बेकार नहीं हूं की हम दोनों के लिये ना कमा सकूं.” विरेंदर ने बेरुखी से कहा !

“मेरा वो मत्लब नहीं था विरेन..सोरी !” कविता की आवाज़ मे उदासी थी !

“कोई बात नहीं..ये सब फालतू की बातें मत सोचा करो..जब तक मैं हूँ तुम्हें कुछ करने की जरुरत नहीं है...हां अगर मर गया.....”

“ऐसा मत कहा करो आप..प्लीज़....मेरी जान निकल जाती है आपके कहने भर से.. मेरी उमर लग जाये आपको...”कविता ने उसके होठों पर हाथ रख दिया था..आंखो से टप टप आंसू गर रहे थे और वो जोर से विरेंदर से लिपट गयी थी !...

“अरे पागल..वो तो मैं ऐसे ही कहता हूं,जिससे तुम मुझसे ऐसे ही लिपट जाओ..”विरेंदर ने उसे अपने बाहों में भर लिया और अपने होठ उसके होठों पर रख दिये !आंखे बंद किये हुये कविता विरेंदर के हाथों को अपने जिस्म पर रेंगते हुये महसूस कर रही थी ! उसका मन के किसी कोने में रौशन एक छोटा सा दिया बुझ गया था !

रात के दुसरे पहर में आंखे बंद किये हुये दोनों एकदुसरे के लिये तो सो रहे थे,लेकिन नींद ना कविता की आंखों में थी ना विरेंदर के !

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दुसरे दिन शाम के 4 बजे तक विरेंदर की बहन शालिनी आ पहुँची ! कविता ने पूरे मन से उनका स्वागत किया और वो खुश भी बहुत थी ! विरेंदर भी घर पर ही था !!

शालिनी को कविता बहुत पसंद आयी थी..मन का सारा गुस्सा झाग की तरह शांत हो गया था-

“पता है तुझे ,जब मैंने पहली बार तुम दोनों के घर से भागकर शादी करने की बात सुनी थी तो मुझे भी बहुत गुस्सा आया था, एक ही भाई था मेरा जिसकी शादी के कितने अरमान थे, लेकिन आज कविता से मिल्कर मैं बहुत खुश हूँ..” शालिनी ने कहा ! खाने के बाद फर्श पर ही बिस्तर लगा था और तीनों एक साथ सो रहे थे !

“क्या करता यार..इसके पापा कभी नहीं मानते..और एक वो साला भी है इसका भाई..हिटलर की औलाद..” विरेंदर ने मुस्कुराते हुये कहा ! कविता ने घूर कर देखा !

“हमारे पापा और भाई को कुछ मत कहना आप..” उसने तुनक कर कहा, तो शालिनी खिल्खिल्ला कर हंस दी !

“थैंक यू सो मच दीदी आप यहाँ आयीं..अब तक ये घर नहीं था,किसी बड़े के होने से ही घर घर होता है ..” कविता ने शालिनी के गले मे बाहें डाल दी ..4-5 घंटो मे ही वो शालिनी से बहुत घुल मिल गयी थी !

“मैं खुश हूँ कविता..बहुत खुश..!! अच्छा सुन विरेंदर ! जॉब की ज्यादा टेंशन मत लिया कर,कविता कह रही थी तू कुछ परेशान है...अगर यहां नौकरी की कोई प्रोबल्म हो जाये तो अहमदाबाद आ जाना..तेरे जीजा का बिजिनेस काफी फैल गया है..उनके साथ ही तू भी लग जाना..एक ही तो भाई है मेरा..” शालिनी ने विरेंदर के बालों मे प्यार से हाथ फेरते हुये कहा !

“ह्म्म देखुंगा..अभी तो ऐसी कोई बात नहीं है..कोई दिक्कत नहीं है..” विरेंदर ने सपाट लहजे मे कहा !

बातों में आधी रात गुजर गयी और फिर विरेंदर सो गया ,कविता और शालिनी बातें करती रहीं !मेरा..सुबह सबके जगने से पहले ही कविता ने उठकर नाश्ता तैयार कर दिया था ! विरेंदर ने हाफ-डे लिया था ऑफीस से क्युंकी शालिनी को आज ही जाना था !

सबने साथ नाश्ता किया और उसके बाद शालिनी विरेंदर को लेकर मार्केट चली गयी ! 2 घंटे बाद वो लोग वापस आये तब तक कविता लंच तैयार कर चुकी थी, सबने लंच किया ! खाने के बाद शालिनी चलने को तैयार हुयी तो कविता बहुत उदास हो गयी !

“क्या दीदी,कम से कम एक दो दिन तो रुकती आप,ऐसे भी कोई आता है क्या..”

“फिर आउंगी मेरी छोटी भाभी..अभी तो जाना पड़ेगा..तुम्हारे जीजु को कल बाहर जाना है..अभी तो बस देखने आयी थी कौन है वो जो मेरे मासूम भाई को ले उड़ी थी” शालिनी ने कविता को गले से लगाते हुए कहा ! कविता मुस्कुरा कर रह गयी !

शालिनी ने एक बड़ी सी लॉकेट वाला मंगलसूत्र,एक सोने की रिंग और एक ईयर रिंग और कविता की ओर बढ़ा दिया

“ये लो,तुम्हारी मुंह दिखायी..” शालिनी ने मुस्कुराते हुये कहा !

“दीदी आप आ गयी वही बहुत है..”कविता की आंख भर आयी थी !

“रख लो पागल..ससुराल से शगुन के गहने आते हैं, और तेरा पूरा ससुराल तो एक मैं ही हूं ना, अब शादी के समय मैं दे नहीं पायी तो वही समझ कर रख ले..” शालिनी बोली !

कविता ने विरेंदर की ओर देखा...

“उसकी ओर क्या देख रही है..ये तेरी मेरी बात है ना..और वो क्या मना कर देगा क्या..” शालिनी ने गुस्सा होते हुये कहा ,तो कविता ने झट से उसके हाथ से वो जेवर थाम लिये !विरेंदर कुछ नहीं बोला !

“सॉरी दीदी !”

“कोई बात नहीं..मैं बहुत खुश हूं तुम दोनों को खुस देखकर..आना तुम लोग अहमदाबाद, जब भी टाइम मिले”

“जी” कविता शालिनी के गले से लग गयी ! कविता को गले लगाकर शालिनी ने उसके माथे को चूम लिया

“हमेशा खुश रहना दोनों” वो विरेंदर के साथ स्टेशन के लिये चल पड़ी!

रात के 12 बज रहे थे ..कविता बिन खाये पीये विरेंदर का इंत्जार कर रही थी..आज बहुत लेट हो गया था उसे और कविता बार बार कॉल कर रही थी पर वो फोन नहीं उठा रहा था ! लगभग 12.30 बजे दरवाज़े पर दस्तक हुयी ,पर दस्तक काफी तेज थी.. “विरेंदर तो ऐसे नॉक नहीं करते..पर इतनी रात को और कौन हो सकता है..”

“कौन !” उसने बिना दरवाज़ खोले ही तेज आवाज़ मे पुछा !

“क्युं किसी और का इंत्ज़ार कर रही थी क्या तुम..मैं हूं विरेंदर ”

कविता जवाब सुनकर एकदम सन्न रह गयी..उसने कुछ गलत तो नहीं पुछा था पर इस जवाब का मतलब ? आवाज़ विरेन्दर की ही थी उसने झट से दरवाज़ा खोला...

“इतनी देर लगती है क्या दरवाज़ा खोलने में “ विरेंदर के कदम और आवाज़ दोनों लड़खड़ा रहे थे ,वो अंदर आते ही बेड पर पसर गया !

“विरेन ! आप ठीक तो हैं ना...आपने शराब.....” कविता सदमे में थी !

“ क्यूं..तुमसे पुछकर सबकुछ करूं..हैं ??..यही चाहती हो ना तुम..”

“मुझसे ऐसी क्या गल्ती हो गयी विरेन..”कविता के आंख से आंसू बहने लगे,

“कुछ नहीं..तुमसे क्या गल्ती होगी..गल्ती तो मुझसे हुई है..तुम्हें पहचानने में..बहुत बड़ी गल्ती हो गयी..” विरेंदर बड़बड़ाये जा रहा था !

“मैंने ऐसा क्या कर दिया विरेंदर..ऐसी बात क्यूं कर रहे हो आप..प्लीज़्ज़...”

“तो क्यूं कहा तुने शालिनी से की मैं कम कमाता हूं,क्युं कहा की मेरी नौकरी का भरोसा नहीं..बोल...और क्युं लिये तुने वो जेवर उस से.....तुझे दौलत चाहिये ना..मैं लाकर दुंगा तुझे..मैं..लाकर..दूंगा...तुझे....दौलत्त्त्त....” विरेंदर होश मे नहीं था उसकी आंखें बंद हो रही थी !

“आप थोड़ा सा खा लिजिये वीरेन,थोडी देर सो लिजिये....सुबह बात करेंगे..प्लीज़्ज़...” कविता लगातर रो रही थी और खुद को सम्भाले रखने की जी तोड़ कोशिस कर रही थी !

“नहीं!!!!!!!!..अभी बात करेंगे...बोल्लो...तुमने क्यूं कहा ..क्यूं...क्या मैं तुम्हारे लायक नहीं हूं..बोलो....”विरेंदर की आवाज़ तेज होती जा रही थी !

कविता डर से कांपने लगी थी..

“मैंने ऐसा नहीं कहा विरेन...जब दीदी ने पुछा आपकी जॉब के बारे में तो मैंने सिर्फ वही कहा जो आप कह रहे थे की जॉब सेक्योर नहीं है..बस..और कुछ नहीं कहा.....” कविता विरेन से थोडी दूरी पर खडी डर से कांप रही थी..आजतक उससे ऐसी कभी किसी ने बात नहीं की थी ..

“झूठ..तुझे हमेसा से पैसे चाहिये थे... कल स्कूल मे पढ़ाने को बोल रही थी और आज झट से वो जेवर ले लिये...”

“दीदी को बुरा लगता विरेन अगर मैं नहीं लेती तो...मैं वो जेवर कभी नहीं पहनूंगी... फिर भी अगर आपका दिल दुखा तो आई एम सोरी..प्लीज़्ज़. प्लीज़्ज़...आपके सिवा कौन है अब मेरा....खा लिजिये..थोड़ा सा...” जाने कौन से मिट्टी की बनी थी कविता !

विरेन कुछ नहीं बोला बस उसे घूरता रहा....कविता के आंसू गालों पर लुढक रहे थे,उसकी आंखें लाल हो रही थीं..विरेंदर ने मुहं फेर लिया कविता चंद पल उसकी ओर देखती रही और अचानक से फर्श पर गिर पड़ी ! विरेंदर एकटक उसे देखता रहा और फिर भाग कर उसके पास पहुंचा और उसे बाहों मे भरकर चीखकर रोने लगा....

“आई एम सोरी जान...प्लीज़ आंखे खोलो...आई एम सोरी....आई एम सोरी...” वो लगातार उसके माथे और उसके गालों को चूम रहा था और उसके चेहरे को अपने सीने मे छुपा ले रहा था ! कविता की आंखे बंद थी पर आंसू बहे जा रहे थे...विरेंदर कविता के सर को गोद मे रखे अपने हाथ से अपने गालों पर थप्पड़ मारने लगा..वो लगातार चिल्लाये जा रहा था... “आई एम सोरी....आई एम सोरी...”

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कविता ने आंखे खोली और हाथ बढ़ाकर विरेंदर के आंसू पूंछने लगी..विरेंदर ने उसको देखा और उसको खुद में और समेट लिया...”माफ कर दो मुझे....”

“हम आपसे गुस्सा हैं ,”कविता ने धीरे से कहा !

विरेंदर कुछ नहीं बोला बस उसका हाथ पकड़े रोता रहा !

“आप चुप हो जाइये,हम ठीक हैं बस चक्कर आ गया था..आप कुछ खा लिजिये..प्लीज़..” कविता ने उसके आंसू साफ करते हुये कहा !

“विरेंदर ने उसे गोद मे उठाया और बिस्तर पर लिटाकर खुद बाथरूम में घुस गया ..लगभग 10 मिनट बाद वो बाहर निकला ! अब वो काफी हद तक सामान्य लग रहा था ! वो कविता से नज़रें नहीं मिला रहा था ..कविता की ओर कनखियों से देखता हुआ वो किचन मे घुस गया और बाहर निकला तो हाथ मे थाली पकड़े था और थाली मे कटोरियों मे सब्जी,दाल और चपाती रखी थी ! वो कविता के पास बैठ गया और सहारा देकर उसे बेड के सिरहाने से लगाकर बैठा दिया.! कविता एकटक उसे देखे जा रही थी !

“तुम भी खा लो..”उसने थाली अपने और कविता के बिच रख दी !

कविता ने सब्जी के साथ रोटी का एक निवाला विरेंदर की ओर बढ़ाया !

“तुम तो..तुम खाओ..मैं खा लूंगा..”अभी जो हुआ था उसकी वजह से विरेंदर झिझक रहा था..जैसे जैसे नशा कम हो रहा था उसे समझ आ रहा था की उसने कितनी बुरी तरह से डाँटा था कविता को !

“खा लिजिये..” कविता ने फिर से कहा और विरेंदर ने चुपचाप उसके हाथ से निवाला खा लिया ! कविता ने एक निवाला खुद के मुंह मे डाला ! दोनों खाने लगे ! खाना खाने के बाद दोनों बिस्तर पर लेट गये लेकिन सो ना विरेंदर रहा था न कविता ! दोनों दो ओर मुंह करके लेटे थे !

“अभी भी नाराज़ हो..”विरेंदर ने पुछा !

“हाँ.!!.नाराज़गी बस इतनी सी है की हमसे कुछ कहने के लिये आपको शराब का सहारा लेना पड गया ! बस इसलिये..और सच कहें तो आपसे उतने नाराज़ नहीं हैं जितने खुद से हैं..”

“इसमें तुम्हारी कोई गलती नहीं है..वो मैंने ऑफीस के एक दोस्त के साथ पी ली थी...सॉरी..”विरेंदर ने कहा !

“नहीं विरेंदर जी !...शराब तो सिर्फ हमारे दिल की बातों को हमारी जुबान तक ले आती है,बोलते हम वही हैं जो दिल मे होता है...और खुद से नाराज़ हम इसलिये हैं की कुछ कमी रही होगी हमारी चाहत में तभी तो आपको हमसे कुछ कहने के लिये शराब के सहारे की जरुरत पड़ी” कविता ने उदास लहजे में कहा !

“नहीं..गलती मेरी है..बहुत इगो (ego) है मेरे अंदर...कभी कभी वही हावी हो जाता है..”विरेंदर ने कहा !

“अगर ये इगो है तो आपका ये इगो एकदिन हमारे इस संसार को बिखेर देगा विरेंदर” कविता के लहजे मे बहुत मायुसी थी !

“ऐसा कभी नहीं होगा..मैं जानता हूं तुम ऐसा कभी नहीं होने दोगी..माफ कर दो प्लीज़्ज़ यार......”विरेंदर कविता की ओर पलट गया और उसे खिंचकर खुद से लगा लिया..कविता के गालों पर अभी भी सूख चुके आंसुओं के निशान थे ! वो गुमसुम सी आंखे बंद किये बस लेटी रही ! विरेंदर अपने हाथों से उसके गालों को साफ करने लगा !

“मैं गुस्से में पागल हो जाता हूं,मुझे पता है मैंने तुम्हें बहुत हर्ट किया है...आई एम सॉरी जान..अब कभी शराब को हाथ नहीं लगाउंगा..पक्का वाला प्रॉमिस..माफ कर दो प्लीज़्ज़्ज़...”

कविता अब भी कुछ नहीं बोली !

“देखो माफ नहीं करोगी तो मुझे नींद भी नहीं आयेगी..प्लीज़ मान जाओ....” विरेंदर उसके गालों को सहलाता हुआ बड़े प्यार से उसे मना रहा था पर कविता आंखे बंद किये चुपचाप लेटी रही और थोड़ी ही देर में उसे नींद आ गयी ! विरेंदर उसके खूबसूरत मुखड़े को निहारता रहा और फिर झुक कर उसके माथे को चूम लिया !

“ जान ! तुम्हें रुलाने की सजा दुंगा खुद को मैं वो” कहते हुए वो बिस्तर से उठ गया !

सुबह कविता की नींद देर से खुली...उसने इधर उधर देखा ,विरेंदर कही नज़र नहीं आया..उसने फोन उठाया तो उसपर विरेंदर का मेसेज आया हुआ था....2 मेसेज थे..पहला-

“गुड मॉर्निंग जान ! ऑफीस जा रहा हूँ...तुम सो रही थी मैंने जगाया नहीं..रात के लिये मैं बहुत शर्मिंदा हूं !..आई लव यू...मैं गुस्से मे पागल हो जाता हूं.मुझे सम्भाल लेना कविता....मुझे छोड़ मत देना..मैं तुम्हारे बिना जी नहीं पाउंगा..”

कविता ने दूसरा मेसेज देखा-

“मेरा गुस्सा मेरा दुश्मन है..बस कुछ पलों के लिये मुझे सम्भाल लिया करो....मैं तुमसे बहुत प्यार करता हूं...कभी मेरी मुहब्बत पर शक मत करना..मैं तुम पर कभी गुस्सा नहीं करुंगा.. जब तक तुम्हारा साथ है तब तक मैं हूं ,तुम्हें खोने से बहुत डरता हूं...मुझे कभी मत छोडना...अच्छा सुनो ! उस स्कूल में जाकर पता कर लेना कब से ज्वाइन करना है ..शाम तक मिलता हूं..लव यू..”

कविता ने फोन एकतरफ रखा और विरेंदर के बारे में सोचने लगी...कितना अजीब है वो..रात को एक पल के लिये तो ऐसा लगा था उसे की वो किसी और ही विरेंदर को जानती थी...उसका वो वहशी अंदाज ..और फिर रात से लेकर सुबह तक जाने कितनी बार माफी भी मांग चुका था...क्या था वो ! कौन सा वाला रूप असली था, कविता समझ नहीं पा रही थी ! कविता के दिमाग में एक नयी सोच ने जन्म लिया था..क्या उसने कोई गलती कर दी थी विरेंदर को पहचानने में ?? उन दोनों के प्रेम कहानी भी तो कितनी अनोखी थी..कितनी अलग....विरेंदर से पहली मुलाकात और वो पहली नज़र का इश्क़..कविता खो सी गयी उन यादों में...

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विरेंदर कविता का सीनियर था ! ऐसी कुछ खास बात नहीं थी विरेंदर में लेकिन प्यार तो किसी से भी हो जाता है..और फिर सिम्पल होना भी तो एक बहुत बड़ी खूबी होती है !.कॉलेज मे स्टुडेंट यूनियन के इलेक्शन होने को थे और उसी समय कविता की मुलाकात हुयी थी विरेंदर से.. विरेंदर कॉलेज के एक ग्रूप के साथ उनकी क्लास में आया था.! हर प्रेम कहानी में कुछ खास हो ऐसा जरूरी तो नहीं..ऐसा ही सोचती थी कविता..विरेंदर को पहली बार देखा तभी अच्छा लगा था उसे और फिर विरेंदर ने भी बड़ी गहरी नज़र से देखा था उसे ! कुछ दिनों बाद पता चला की विरेंदर भी उसी तरफ से कॉलेज आता है जिधर से वो आती थी ! एक दो बार रास्ते में आते जाते देखा भी था दोनों ने एकदुसरे को ,विरेंदर अपनी पुरानी हीरो होंडा बाइक से कॉलेज आता था जबकी कविता रिक्शे से या फिर शेयरिंग वाले आटो से ! कॉलेज में एक सहेली थी कविता की ..पूनम..! पूनम विरेंदर के पड़ोस में ही रहती थी और उसी से कविता को पता चला था की विरेंदर अपने घर पर अकेले रहता है और उसकी सिर्फ एक बड़ी बहन हैं जो शादी के बाद अपने घर रहती हैं !उसने ये भी बताया था कि विरेंदर की मिठाई की दुकान है !

उस दिन बारिश हो रही थी और कविता बहुत देर से कॉलेज में बारिश के बंद होने का इंत्जार कर रही थी ..किसी तरह बारिश बंद हुयी तो फिर ना कोई ऑटो मिल रहा था ना रिक्शा ! शाम के 4 बज गये थे और आसमान में खूब बादल घिर आये थे ! कविता पैदल ही घर के लिये निकल पड़ी ! लग्भग चार किलोमीटर की दूरी थी कॉलेज से घर की और वो एक किमी ही आई थी की तेज हवा के साथ फिर से हल्की फुहार पड़ने लगी ! वो बार बार पिछे मुड़कर देख रही थी पर कोई आटो नज़र नहीं आ रहा था….काली घटा की वजह से अंधेरा हो गया था...तेजी से वह घर की ओर चली जा रही थी कि तभी एक बाइक आकर उसके थोड़ा आगे रुकी...

“आइये बैठ जाइये..बारिश तेज होने वाली है..” कविता ने देखा विरेंदर एक किनारे बाइक रोके बड़ी शराफत से कह रहा था !

“जी..मैं चली जाउंगी..”उसने झिझकते हुये कहा !

“बैठ जाइये..भीग जायेंगी..” विरेंदर ने फिर कहा ,तो वो झिझकते हुये ही सही पर बैठ गयी ,विरेंदर ने बाईक बढ़ा दी ! काफी देर तक दोनों चुप थे फिर विरेंदर ने चुप्पी को तोड़ा -

“मैं यहीं गंगा नगर मार्केट मे रहता हूं.. वो फव्वारे के पास वाली मिठाई की दुकान है न, वो मेरी ही है..”हल्की फुहार पड़ रही थी विरेंदर ने बाइक की स्पीड तेज रखी थी और बाइक पर बैठी कविता चुपचाप उसकी बातें सुन रही थी !

“आप फर्स्ट ईयर में हैं ना...देखा था आपको क्लास में आपकी...” उसने फिर कहा

“जी” कविता ने बस इतना ही कहा..पहली बार किसी गैर के साथ ऐसे जा रही थी और उपर से रास्ता भी एक्दम सुनसान...कोई जान पहचान वाला देख लेगा तो जाने क्या सोचेगा.. उसने सर से सरका कर दुपट्टा थोड़ा सा चेहरे के उपर से दुसरी ओर कंधे पर कर लिया जिससे उसका आधा चेहर ढंक गया !

कविता को विरेंदर बहुत शरीफ लगा था..हलांकी उसने एक दो बार सुना था की विरेंदर बहुत गुस्से वाला है..पूनम ने भी उसे एक बार बताया था की विरेंदर ने अपनी दुकान पर आये एक लौंडे को बुरी तरह मारा था,हाँ पर ये भी बात थी की उस लौन्डे ने उसकी दुकान में आयी किसी लड़की के बैक पर हाथ लगाया था ..और एक बार कॉलेज में भी ऐसी ही किसी बात पर विरेंदर ने कुछ लड़कों के साथ लड़ाई की थी जिसमें उसे भी काफी चोटें आयी थीं ! पर कविता को विरेंदर में कोई ऐब नज़र नहीं आता था...अगर कोई गंदी हरकत करे तो उसके खिलाफ आवाज़ उठाना गलत तो नही! कविता हमेशा यही सोचती ! और फिर जिस से इश्क़ हो जाये उसमे कहाँ कोई कमी दिखती है !

कभी कभी जब पूनम नहीं आती थी तो कविता विरेंदर के साथ बाइक पर घर चली जाती..हाँ चेहरे को जरूर दुपट्टे से ढंकना पड़ता था ! उसे विरेंदर का साथ अच्छा लगता था ! उसकी सादगी भा गयी थी कविता को ! उसकी वो सीधी सच्ची बातें उसे बहुत अच्छी लगती थी ! दिवाली आयी तो विरेंदर ने मिठाई का एक बड़ा सा डिब्बा कविता को थमा दिया !,जब कविता ने डिब्बा थाम लिया तो विरेंदर ने हिम्मत करके एक नीले रंग की एक साड़ी भी उसकी ओर बढ़ा दिया ..कविता पहले झिझकी ,फिर शर्मायी और अंत मे आंखे झुकाकर उसे थाम लिया ! नये साल पर एक खूबसूरत से सफेद रंग का रेशमी स्वेटर कविता ने अपने हाथों से बुनकर विरेंदर को गिफ्ट किया था ! विरेंदर कितना खुश हुआ था उस दिन !

एक खामोश मुहब्बत पनप चुकी थी दोनों के बीच जो कॉलेज में दुसरे साल के अंत तक दोनों के दिलों में बस चुकी थी ! फिर इजहार और इकरार भी हो गया ! उस दिन बड़ी हिम्मत करके उसके साथ फिल्म देखनी गयी थी जब पडोस में रहने वाले लड़के ने उसे देख लिया था और आकर चुगली भी कर गया था हरामखोर ! जब विरेंदर से बिछड़ने की नौबत आ गयी तो डरी डरी सी रहने वाली कविता ने विरेंदर के साथ घर छोड़ने का इतना बड़ा फैसला ले लिया था ! मुहब्बत चीज ही ऐसी है..बुजदिल से बुजदिल इंसान मे हिम्मत आ जाती है और बहुत बड़े बड़े सूरमा भी मज्बूर हो जाते हैं इसके आगे !

वो दिन थे और आज का दिन था..विरेंदर का गुस्सा देखा था उसने....बिना किसी बात के कितनी बुरी तरह से लताड़ दिया था उसने कविता को...कविता का ध्यान एक बार फिर से विरेंदर के भेजे मेसेज की ओर लौट आया..विरेंदर ने खुद उसे स्कूल में पढ़ाने के लिये कहा था..पर कविता को कोई खास खुशी नहीं हुयी थी ! अगर विरेंदर को पसंद नहीं तो मैं नहीं जाउंगी उसने सोच लिया था !

हर रोज की तरह कविता का आज का दिन भी बोरिंग ही बीता था..शाम को विरेंदर जल्दी आ गया..और रोज की अपेक्षा आज वो शांत था और कविता से नजरें भी नहीं मिला रहा था.....कविता ने भी कोई पहल नहीं की ! चाय बनाकर विरेंदर को दी और किचन मे घुसे गयी ! विरेंदर चाय पीते हुये कुछ देर तक कविता को किचन में सब्जी काटते देखता रहा और फिर चुपके से पिछे से जाकर उसे बाहों मे भर लिया....

“अब मान भी जाओ..कब तक नाराज़ रहोगी.”उसने अपने गालों को कविता के गालों पर रगड़ते हुये बड़े प्यार से कहा !

“आपसे कितने दिन नाराज़ रह सकती हूं..सबकुछ तो छोड़कर आई हूँ आपके साथ,अब आपको छोड़कर कहाँ जा सकती हूँ..” कविता ने कहा !

“ऐसे मत कहो यार..जो चाहे सजा दे लो पर अब नाराज़ मत रहो..तुम्हारी नाराज़गी मुझसे और बर्दाश्त नहीं होगी..”विरेंदर की आवाज़ में बहुत उदासी थी ! कविता कुछ नहीं बोली !

“कितनी बार तो सॉरी बोल चुका हूँ,अब क्या करुं..” वो कविता के सामने आकर खड़ा हो गया !

“कविता,मैं कभी कभी गुस्से में पागल हो जाता हूँ..मुझे अह्सास है मेरी गल्ती का..अब ऐसा कभी नहीं होगा..माफ कर दो..प्लीज़्ज़्ज़्ज़्ज़्ज़..”उसने कविता का चेहरा अपनी हथेली में भर लिया !

“मैं हमेशा तुम्हारे साथ रहुंगा....बस कभी-कभी भटक जाता हूं कुछ पलों के लिये,उन कमजोर लम्हों में मुझे सम्भाल लेना कविता .. मैं अकेले नहीं जी सकता..” वो कविता के गले से लग गया, कविता वैसे ही खड़ी रही !

“ठीक है विरेन..अब हटिये..हमें सब्जी काटने दिजिये...”कविता ने बेरुखी से कहा और उसको खुद से अलग कर दिया ! विरेंदर उसे देखता रहा और फिर चुपचाप आकर बिस्तर पर लेट गया ! कविता खाना बनाकर आई तब तक विरेंदर सो गया था ..उसने एक गहरी नज़र विरेंदर पर डाली और उसके जगाने के लिये आगे बढ़ी तो देखा की विरेंदर के पैर में एड़ी से थोड़ा उपर पजामे पर काफी खून लगा हुआ था...उसने झुककर देखा...वहां से अभी भी रिस रिसकर खून निकल रहा था...कविता ने पजामे को थोड़ा सा मोड़ दिया..घुटने से थोड़ा निचे गहरा जख्म लगा हुआ था ,उसपर बंधा कपड़ा एक तरफ हट गया था और वहां से खून बह रहा था...कविता की आंख मे आंसू आ गये..

“विरेन !”उसने जोर से विरेंदर का कन्धा हिलाया.

“अह्ह्ह्हां.....”विरेंदर झट्के से उठ बैठा और साथ ही कराह उठा ..हाथ अपने आप..जख्म पर पहुंच गया..

कविता एकटक उसे देखती रही...विरेंदर समझ गया उसने चोट देख लिया है..कुछ नहीं बोला..

“क्या हुआ है ये ??..”कविता उसे चुप देखकर गुस्से से बोली !

“वो..आज ट्रेन से उतरते समय जरा सी खंरोच लग गयी थी..वही...है..बस.”विरेंदर ने कहा !

“तो आपने बताया क्युं नहीं..अब इतनी बुरी हो गयी हूं मैं..”कविता की आंख डबडबा गयी...गुस्से में बड़्बड़ाते हुये जल्दी जल्दी वो आल्मारी में से फर्स्ट-एड का डिब्बा ले आयी और उसके पैर पर बैन्डेज बांधने लगी !

“ये तो मामूली चोट है..बस तुम ...”

“मामूली चोट ??..इतना गहरा कट लगा है..चलिये आप डॉक्टर के पास...अभी चलिये..”कविता रो भी रही थी और उसपर गुस्सा भी हो रही थी ??...विरेंदर मुस्कुरा रहा था !

“वाह..! ये आइडिया अच्छा है तुम्हें मनाने का...”उसने मुस्कुराते हुये कहा !

“हां हाँ..दुश्मन हूं ना मैं आपकी...मुझे रुलाना आपको पसंद है ना..चलिये अब डॉक्टर के पास..” कविता ने गुस्से में कहा !

“तुम तो जान हो मेरी..अब तुम मान गयी तो ये जख्म भी भर जायेगा..अब तो तुमने बैंडेज कर ही दी है....कल सुबह दिखा लूंगा..अभी तो जोरों की भूख लगी है..कल से खाना नहीं खाया..”विरेंदर ने किसी मासूम बच्चे की तरह कहा तो कविता तड़प उठी..

“सॉरी मेरी जान...आई एम सॉरी बाबू......खाना क्यूं नहीं खाया आपने..बताओ....”कविता उसके गले लगकर रोने लगी !

विरेंदर ने कविता को जोर से गले लगा लिया...उसका मन एक्दम हल्का हो गया..जो जख्म उसने खुद को सजा के तौर पर दिया था वही उसके लिये दवा बन गया था !

“मुझे छोड़्कर कभी मत जाना कविता....”

“नहीं कभी नहीं जाउंगी जान....”

एक बार फिरसे सबकुछ ठीक हो गया था..फिरसे मुहब्बत की कसमें खायी जा रही थीं, साथ निभाने के वादे किये जा रहे थे ! आने वाले वक़्त में देखना था कितनी मजबूत है इन कसमों और वादों कि डोर !

दोनों ने साथ में खाना खाया, विरेंदर का पैर चोट के आस पास काला हो गया और काफी सूजन थी....कविता ने वहां पर एक दवा लगायी और सेंकाई की ! विरेंदर ने वादा किया की वो सुबह उठते ही डॉक्टर के पास जायेगा !

अगले दिन विरेंदर ऑफीस नहीं गया था और सुबह 11 बजे के लगभग जब वो डॉक्टर के पास से वापस आया तो उसके हाथ में कुछ पन्ने थे....उसने कविता को पकड़ा दिया !

“तुम स्कूल में पढ़ाने जा रही हो..मैंने सारी बात कर ली है और ये रहा वहां का फॉर्म..” विरेंदर ने मुस्कुराते हुये कहा ! ..कविता अवाक़ विरेंदर की ओर देखती रही...हाथ में वो कागज़ पकड़े हुये कविता की आंखों में खुशी के आंसू झिलमिला पड़े !

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कविता और विरेन्दर की लाईफ में सबकुछ ठीक चल रहा था..कविता स्कूल में पढ़ाने लगी थी और वो बहुत खुश थी इस बात से ..उसको खुश देखकर विरेंदर भी खुश हो जाता था ! हर रोज वो स्कूल से आकर घर के सारे काम पहले के जैसे ही निपटा लेती थी..विरेंदर को कभी कोई शिकायत का मौका नहीं देती थी वो ! स्कूल के स्टाफ के साथ भी कविता काफी घुल मिल गयी थी..श्वेता और उसके बड़े भइया राकेश के अलावा तीन मेल और तीन फेमेल टीचर थे ! राकेश ही स्कूल का प्रिंसपल भी था !

कविता का टाइम अच्छ बीत जाता था और साथ ही साथ 6000 रुपये की इनकम भी हो जाती थी ! एक बात थी जो कविता को कभी कभी परेशान करती थी...उसे ऐसा लगता था कि राकेश उसमे कुछ ज्यादा ही दिलचस्पी लेता है..कभी छुट्टी लेनी हो,या फिर स्कूल से जल्दी निकलना हो...या फिर कोई और बात हो..वो कविता को हमेसा बहुत स्पेशली ट्रीट करता था ! लेकिन उसने ना कभी कविता से कोई उल्टी सीधी बात की था और ना कभी ऐसी कोई हरकत जिसका कविता को बुरा लगे !कविता को कभी कभी ये सब अपना वहम भी लगता ! उसने एक बार सोचा विरेंदर से कहे लेकिन फिर सोचा कहेगी क्या और फिर विरेंदर का गुस्सा !! पता नहीं वो क्या मतलब निकाले इस बात का ! और कहीं उसे मना ही कर दे स्कूल में पढा*ने से ! और फिर राकेश ने कभी कुछ गलत बर्ताव नहीं किया था उसके साथ !

वक़्त बितता रहा....कविता श्वेता के साथ काफी घुल मिल गयी थी..वो अक्सर कविता के घर आती रहती थी और विरेंदर से भी अच्छे से जान पहचान हो गयी थी..!!.जनवरी का महिना चल रहा था, ठंड देश के बाकी हिस्सों कि तुलना मे मुम्बई मे कम ही होती है ! विरेंदर रात को खाने के बाद कविता के साथ लेटा हुआ था...

“कविता,मुझे कुछ दिनों की ट्रेनिंग के लिये बंगलोर जाना पड़ेगा..कम्पनी भेज रही है उसके बाद शायद कुछ प्रमोशन भी हो ..” विरेंदर ने कहा !

“ओह ! कब जाना होगा आपको और कितने दिन के लिये..” कविता ने कहा !

“3 दिन बाद जाना है....शायद 10 दिन रुकना होगा..”विरेंदर ने कहा !

“आई विल मिस यू..”कविता ने उसके गले में बाहें डालते हुये कहा !

“बस दस दिन की तो बात है..जाना तो पडेगा नहीं तो आगे कोई चांस नहीं है इस कम्पनी में..पर मेरा मन यहीं लगा रहेगा..तुम यहां अकेली रहोगी.”विरेंदर ने कहा !

“कोई बात नहीं..आप जाइये और मन लगाकर अपनी ट्रेनिंग किजिये..मेरी चिंता मत किजिये बिल्कुल भी “कविता ने कहा !

“ह्म्म...चलो अब तो तुम्हारे स्कूल का स्टाफ भी है..!”

“मतलब ??”

“अरे श्वेता और उसके घर के लोग भी तो पड़ोस में ही रहते हैं और तुम्हें अच्छे से जान भी गये हैं” विरेंदर ने कहा !

“ह्म्म..वो तो है, आप जाइये !...कपडे कल देख लुंगी कौन कौन से ले जाने हैं और हां कल थोड़ा जल्दी आ जाइयेगा , चल कर एक अच्छा सा बैग ले लेंगे”

“अच्छा ठीक है..कोशिश करुंगा ,जल्दी ना आ पाया तो तुम श्वेता के साथ चली जाना मैं फोन करके बता दुंगा...”

“नहीं ! आपके साथ ही जाउंगी..आप प्लीज आ जाना......” कविता ने बड़े प्यार से कहा !

“ठीक है आ जाउंगा..” विरेंदर को अच्छा लगता था जब कविता उसे ऐसे बोलती थी..थोड़ा स्पेशल फील होता था और मुहब्बत के रिश्ते में कभी कभी ऐसे वाला “स्पेशल फील” रिश्ते के लिये टोनिक का काम करता है ! एक एहसास कि दुनिया के लिये ना सही पर किसी एक के लिये तो आप बहुत खास हो..सबसे खास ! एक दुसरे के आगोश मे समाये हुये दोनों आने वाले दिनों के नये खूबसूरत सपने सजो रहे थे !

3 दिन बाद विरेंदर बंगलोर के लिये निकल गया ! दो दिन हुये थे उसके गये हुये और कविता को लग रहा था जैसे बरसों के बिछड़े हों ! और कोई था भी तो नहीं उसके पास ,उसकी सारी दुनिया विरेंदर के ही दम से तो थी ! जाने के बाद से विरेंदर से उसके ज्यादा बात भी नहीं हो पायी थी..सिर्फ पहुंचने के बाद उसने फोन करके बताया था की वो पहुंच गया है ! रात के 9 बज रहे थे..कविता ने अपने लिये खाना नहीं बनाया था..वो अकेली कभी नहीं रही थी और फिर अकेले उसे खाने का मन भी नहीं कर रहा था ! लेकिन भूख भी लगी थी और उसे , अभी 8 दिन और अकेले रहना था ! ऐसे कब तक चलेगा ! यही सोचकर चावल चढा दिया कूकर में ! फ्रीज़ में पड़ी सब्जी गरम की और थोड़ा सा चावल लेकर खाने बैठी तो विरेंदर की याद आ गयी..आंख भर आयी उसने फोन उठाया और विरेंदर को कॉल लगा दिया.....दो बार पूरी रिंग गयी पर किसी ने फोन नहीं उठाया ..तीसरी बार कॉल रीसीव हुयी..

“हेल्लो !”कविता आवाज़ को सम्भाल्ते हुये बोली !

“हेलो जान...सॉरी टाइम नहीं मिल रहा था कॉल करने का..कैसी हो तुम” विरेंदर की आवाज़ सुनकर कविता को और रोना आ रहा था लेकिन खुद को सम्भाल रखा था उसने !

“कोई बात नहीं ! आप कैसे हैं..खाना खा लिया आपने..”उसने पुछा ,कविता को ऐसा लग रहा था की विरेंदर के रूम में और कोई भी है..किसी के हंसने की आवाज़ आ रही थी !

“मैं ठीक हूँ..वो हाँ...मैने खा लिया, तुमने खाया..?”विरेंदर जैसे बेमन से बात कर रहा था ऐसा लग रहा था किसी जल्दी में हो !

“जी..बस खाने जा रही हूं..आपकी याद आ रही थी...” कविता ने कहा !

“अच्छा ठीक है..मैं बाद में फोन करुंगा...बाय “विरेंदर ने कहा और फोन काट दिया ,कविता अभी भी मोबाइल कान से लगाये हुये थी ! उसकी आंख भर आयी..फोन एक तरफ रखा उसने ! सामने प्लेट मे खाना रखा था लेकिन अब उसका मन एकदम खाने का नहीं हो रहा था...कितनी बेरुखी से बात की थी विरेंदर ने उस से !

“ट्रेनिंग मे बिजी होंगे इसलिये बात नहीं कर पा रहे ...मैं भी ना..” खुद को जबर्दस्ती समझाते हुये कविता ने खाने का निवाला मुंह को लगाया ! आंखो में भरे आंसू गालों पर छलक पड़े ! काफी देर तक रोती रही वो और फिर खाने को एकतरफ सरका कर लेट गयी !

अगले दिन कविता को सुबह सुबह हल्का फीवर था ..उसने श्वेता को कॉल किया बताने के लिये कि वो स्कूल नहीं आ पायेगी...

“कविता जी ,मैं तो कल शाम को ही पूने के लिए निकल गयी थी..खैर मैं भइया को कॉल करके बता देती हूं..सब ठीक है ना ज्यादा प्रोब्लम तो नहीं है..” श्वेता को पता था की विरेंदर मुम्बई में नहीं है !

“नहीं ! बस थोड़ा सा फीवर लग रहा है तो..” कविता ने कहा !

“ओह..ठीक है फिर आप रेस्ट करो..नो इसू ! कोई प्रोबल्म हो तो भईया को बोल देना आप..वो हैं वहीं पर.”श्वेता ने कहा !

“जी ! नहीं उसकी कोई जरुरत नहीं होगी ! थैंक्स ! बाय.!” कविता ने कहा और फोन कट कर दिया !

कविता का मन घर में नहीं लग रहा था ..बुखार की दवा ली थी उसने और अभी बुखार नहीं था तो वो ऐसे ही मन बह्लाने के लिये पास वाले पार्क मे चली गयी थी ! कोई 500 मीटर की दूरी थी पार्क से घर तक की..! शाम के 5 बज रहे थे जब वो पार्क से निकली घर के लिये !! घर से कोई 200 मीटर की दूरी पर अचानक से उसे चक्कर आया और वो रोड पर बैठ गयी..कई दिन सो वो ठीक से खा पी नहीं रही थी..शायद कमजोरी की वजह से ऐसा हो रहा था !

कुछ देर बाद वो उठी और फिर से घर की ओर चल दी..अचानक पीछे से आती गाड़ी के होर्न की तेज आवाज़ उसके कानों में पड़ी..कविता जल्दी से एक किनारे हो पाती इस से पहले ही नीले रंग की वेगनोर उसके बेहद करीब से सर्ररर से निकली !! कविता लहराकर बुरी तरह एक किनारे को गिरी और उसका सिर रोड के किनारे लगे पत्थर पर टकराया..उसकी आंखों के सामने अंधेरा छाने लगा....सिर में जोर का दर्द हो रहा था ! हाथ माथे पर लगाया तो लाल गाढ़ा खून हाथ में लग गया..उसकी आंखें बंद होने लगी ..कोई था जो उसे जोर जोर से आवाजें दे रहा था, उसने जोर लगाकर आंखे खोली..सामने राकेश खड़ा था..राकेश ने उसे बाहों में उठा लिया ,उसकी आंखे बंद होती गयीं , फिर उसे कुछ होश ना रहा !

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रात के कोई 9 बजे कविता को होश आया...उसने सर में जोर का दर्द हो रहा था उसने आंखें खोली तो पास ही चेयर पर राकेश को बैठे देखा..

“आप ??” उसने उठकर बैठना चाहा !

“प्लीज़ आप लेटी रहिये..!!“ राकेश ने उसे उठने नहीं दिया !

“जी मैं..! आप रोड पर जा रही थीं तभी मैं भी उधर से आ रहा था ,फिर आप उस गाड़ी वाले से बचने के चक्कर में गिर गयीं और आपको चोट लग गयी थी..तो मैं आपको यहाँ ले आया !” राकेश ने कहा !

कविता ने इधर उधर देखा ,,ये उसका घर नहीं था..ये तो राकेश का घर था..वो झटके से उठकर बैठ गयी..

“आह्ह्ह..!” उसके सर में जोर का दर्द हुआ !

“देखिये आपको डॉक्टर ने रेस्ट करने को कहा है..प्लीज़्ज़..” राकेश बहुत शालिनता से उससे बात कर रहा था !

“आपको मुझे मेरे घर ले जाना चाहिये था !”कविता ने अपनी साडी ठीक करते हुये कहा !

“आपको चोट लगी थी और श्वेता ने बताया था आपकी तबियत भी ठीक नहीं थी....आपके घर पर कोई था नहीं है...इसलिये मैं..!” राकेश ने अपनी बात अधुरी छोड़ दी !

“फिर आप मुझे हॉस्पिटल क्यूं नहीं ले गये..” कविता राकेश से ऐसे सवाल कर रही थी जैसे वो कोई मुजरिम हो !

“जी ! वो मैंने मेरे पहचान के एक डॉक्टर को तुरंत फोन कर दिया था..वो आये थे और उन्होंने कहा ज्यादा चोट नहीं लगी है बस आपको आराम की जरुरत है ..और..”

“और क्या..??”

“और वीकनेस है ..बस !” राकेश ने कहा ! कविता ये जानती थी की राकेश के दिल में उसके लिये कुछ तो है और इसिलिये उसे बहुत अजीब लग रहा था.और इसीलिये वो इतने सवाल भी कर रही थी !

वो कुछ देर तक राकेश को देखती रही..फिर बोली...

“थैंक्स सर ! अब मैं घर जा रही हूं...”

“नहीं ! आपको फीवर है..आई मीन था..रात में फिर से बढ़ गया तो..??? ” राकेश ने जल्दी से कहा !

“कुछ नहीं होगा..मामुली बुखार है..चलती हूं..”कविता ने उठने की कोशिश की तो एक बार फिर से लड़खड़ा गयी ,जल्दी से राकेश उसे थाम ना लेता तो वो फर्श पर गिर जाती..! राकेश ने उसके दायें बाजू को थाम लिया था और उसका आधा जिस्म राकेश के जिस्म से जा लगा था ! कविता सन्न रह गयी और खींचकर एक जोरदार थप्पड़ उसने राकेश के गाल पर जड़ दिया ....

“हिम्मत कैसे हुयी तुम्हारी मुझे छुने की...दूर हट जाओ मुझसे..” कविता चीखती हुयी बोली !

राकेश उसे थामे हुये एकटक उसे देखता रहा ! बड़े आराम से उसने कविता को वापस बिस्तर पर बिठा दिया ! आंखे भर आयीं थी पर कुछ कहा नहीं उसने !

“कुछ देर रुक जाइये फिर मैं आपको आपके घर छोड़ आउंगा...प्लीज़्ज़...” राकेश ने ऐसे कहा जैसे कुछ हुआ ही ना हो ! जबकी कविता खुद समझ नहीं पायी थी की अचानक उसने क्या कर दिया ..वो एकट्क किचन की ओर जाते हुये राकेश को देखती रही !

उसने कितना गलत किया था राकेश के साथ..”चाहे वो मेरे बारे मे कोई भी जज्बात रखता हो लेकिन अभी जो हुआ था उसमें उसकी कोई गलती नहीं थी, ना उसने जानबुझकर कुछ किया था ! और मैंने उसे थप्पड़ मार दिया..”कविता को बहुत आत्मग्लानी हो रही थी और उसे रोना भी आ रहा था ! किसी तरह उसने खुद को सम्भाल रखा था !

लगभग 20 मिनट बाद राकेश वापस आया ! उसके हाथ में टिफीन था !

“चलिये आपको घर छोड़ देता हूं..” उसने कहा ! कविता उसकी ओर देखती रही और उठने की कोसिश करने लगी..बार बार कोसिश करके भी वो खुद से उठ नहीं पा रही थी ! राकेश आगे बढ़ा और उसके करीब जाकर उसके एक बाजु को थामकर उसे खड़ा किया और फिर कविता उसके सहारे धीरे धीरे चलने लगी ! कुछ दूर चलने के बाद कविता काफी हद तक खुद से चलने लगी थी लेकिन उसे बहुत कमजोरी फील हो रही थी..2-3 दिन से ठीक से खाया नहीं था उसने ! चोट की वजह से और भी कमजोरी लग रही थी ! माथे पर पट्टी बंधी थी ! 300 मीटर की दूरी लगभग 35 मिनट मे तय की उसने..! वो दरवाज़ा खोलकर अंदर चल दी पर राकेश दरवाज़े पर ही रुक गया !

“कविता जी !” कविता ने मुड़कर देखा राकेश चौखट के पास ही खड़ा था !

“आ जाइये !” कविता ने शर्मिंदगी से कहा ..ये जो कुछ थोड़ी देर पहले उसने किया था उसी का नतीज़ा था !

राकेश अंदर आ गया ..

“ ये दलिया बनायी है आपके लिये,खा लिजियेगा और ये दवा है सोने से पहले जरूर ले लिजियेगा.. बिना कुछ खाये दवा मत खाइयेगा..” राकेश ने कहा !..वो कविता को डॉक्टर की दी हुयी हिदायतें बता रहा था और कौन सी दवा कब लेनी है ये भी पर इस बीच एक बार भी वो कविता की आंखों में देखकर बात नहीं कर रहा था ! कविता को बुरा लग रहा था ,खुद पर गुस्सा आ रहा था उसे !

“चलता हूं कविता जी..ये मेरा कार्ड है जिसपर मेरा मोबाइल नम्बर है..कभी भी कोई भी जरुरत पड़े तो बेझिझक बस एक कॉल कर दिजियेगा ! चाहता तो था की रात तक आप वहीं रुक जातीं इसीलिये आपको वहाँ..” राकेश कहते कहते चुप हो गया ! कविता भी खामोशी से बस सुन रही थी !

काफी देर बाद राकेश ने कविता की ओर देखा....

“ कविता जी ! मन में जिसके लिये प्रेम हो अगर उसे मैला करने का ख्याल भी मन में आ जाये तो फिर जीवन का कोई मतलब नहीं बचता ! प्रेम बहुत पवित्र होता है, इसमें पाने और खोने का डर नहीं होता! गुड नाइट !” राकेश ने खोये खोये से अंदाज़ में कहा और बाहर चला गया !

कविता को उसकी बात ज्यादा तो समझ में नहीं आयी थी पर इतना समझ गयी थी की जो वो सोच रही थी वो ठीक था ! राकेश उसे पसंद करता था ! उसने उठकर दरवाज़ा बंद किया ....एक बार फिर से मन राकेश की बातों में उलझ रहा था, ! क्या क्या बोल गया था वो....प्रेम,खोना,पाना..!! वो भी तो इस प्रेम के लिये ही सबकुछ छोड़कर चली आयी थी ! अचानक उसका ध्यान विरेंदर की ओर गया ! उसने फोन उठाया..एक भी मिस कॉल नहीं ! छन्न से कुछ टूट गया था उसके मन के भीतर !

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शारीरिक दुख और बढ़ जाता है अगर मानसिक तकलीफ हो तो ! कविता एकटक फोन को देखे जा रही थी,कुछ सोचकर उसने कॉल लगाया विरेंदर को ! एक ,दो ,तीन,चार..पूरे पाँच बार कॉल किया कविता ने पर एक भी बार कोई जवाब नहीं मिला ! चुपचाप वो एकटक फोन को देखती रही..सारी मुहब्बत,सारी आशिक़ी ,वो कसमें वो वादे...सब कुछ ही तो देख लिया था उसने इन चंद दिनों में !

जिसके लिये सब कुछ ..सब कुछ छोड़कर चली आयी थी वो उसे भूल गया था ,अब कौन ठौर थी जहाँ जाती..कविता फोन की स्क्रीन को ऐसे घूर रही थी जैसे कोइ चमत्कार होगा और विरेंदर उसके भीतर से आ जायेगा..वो चुपचाप वैसे ही बैठी रही...दो घंटे बीत गया पर विरेंदर की कॉल नहीं आयी ! कविता का जब्त जवाब दे गया..बेबसी और तन्हाई ने दर्द में और इजाफा कर दिया था..कविता फूट फ़ूट कर रने लगी..कंठ से आवाज़ नहीं निकल रही थी लेकिन घुटी हुयी आहों के सहारे आंखो से दर्द बहे जा रहा था...

“पापा..पापा...मम्मी..आप कहाँ हो पापा......” कविता की उन आहों में मम्मी थीं, पापा थे और 22 सालों के दुलार के वो भीगी से यादें थीं, विरेंदर कहीं नहीं था ! कविता घंटो बिलखती रही..ना उसने दलिया खाया और ना ही दवा..सुबह होते होते सर जिस्म दर्द से तपने लगा था..बिस्तर से उठ नहीं पा रही थी वो..सर पर जहां चोट लगी थी वहां से हल्का हल्का खून रिसने लगा था ! कविता बार बार फोन को देख रही थी..आंखे सूज कर लाल हो गयी थीं..एक नज़र दीवार पर लगी घड़ी पर डाली, सात बज गये थे ! कविता रात भर एक पल को भी सोयी नहीं थी, जिस्म पर लगी चोट से ज्यादा दर्द उसे विरेंदर की बेरुखी ने दिया था ! पापा मम्मी का वो लाड-प्यार....वो खूब्सूरत दिन....सबने खूब रुलाया था उसे रात भर, यादें भी तो ऐसे ही वक़्त पर चली आती हैं !

दरवाज़े पर किसी ने दस्तक दी....

“कौन ?” कविता ने बड़ी हिम्मत जुटाकर पुछा !

“कविता जी मैं हूँ..राकेश.!!..आपकी तबियत कैसी है..आप ठीक हैं ना..डॉक्टर के पास चलना है या आप कहें तो मैं फोन कर देता हूं वो आ जायेंगे..” राकेश ने पूरी बात एक सांस मे कह दिया ,जैसे डर हो की कविता उसे फिर कुछ कहने का मौका भी देगी या नहीं !

कविता को इस समय एक दोस्त की बहुत जरुरत थी लेकिन वो राकेश को फेस नहीं करना चाहती थी..इस हाल मे तो बिल्कुल नहीं...

“मैं ठीक हूं आप जाइये, “ उसने संछिप्त सा जवाब दिया ,अपनी रुलाई को रोकने की जी तोड़ कोशिस कर रही थी !

“जी वो आपके लिये नाश्ता लाया था.” राकेश ने कहा !

कविता ने अपने हाथों से अपने मुंह को दबा लिया और आंखों से ढेर सारे आंसु बरस पड़े !

“जी मैं बना लुंगी कुछ..आप प्लीज़ जाइये और दोबारा मत आइयेगा..मैं चली जाउंगी डॉक्टर के पास..” कविता ने कोई एक मिनट बाद जवाब दिया !अपने इस जवाब पर उसे खुद ही खुद से नफरत हो रही थी लेकिन वो किसी तरह इन कमजोर पलों से बचने की कोशिस कर रही थी !

“जी !..कोई जरुरत हो तो फोन कर दिजियेगा आप..टेक केयर !” राकेश की आवाज़ मे दुख साफ महसूस किया था कविता ने !एक बार फिर से उसने अपने मुंह को जोर से दबा लिया कहीं रुलाई ना फूट पड़े ! कुछ पलों के बाद कदमों की आहट दरवाज़े से दूर जाते महसूस हुयी ! राकेश वापस जा रहा था ! इतने देर से रुकी हुयी कविता की रुलाई फ़ूट पड़ी....वो खूब जोर जोर से हिचकियां ले लेकर रोने लगी...! सबसे ज्यादा याद उसे पापा की आ रही थी...सारे गिले शिकवे और सारा संकोच एक साइड कर दिया,, उसने अपना फोन उठाया और अपने पापा को कॉल लगा दी..घर की लैंडलाइन का नम्बर याद था उसे...एक हाथ से आंसू पोंछते हुये दुसरे हाथ से वो बार बार घर वाली लैंड्लाइन पर कॉल लगाये जा रही थी लेकिन हर बार टूं टूं की वही इर्रिटेट करने वाली आवाज़...कविता समझ गयी घर का नम्बर या तो बदल गया था या फिर शायद बंद हो गया था ..पर एक झूठी उम्मीद के लिये ही सही वो अभी भी बार बार फोन लगाये जा रही थी...

“प्लीज़्ज़ पापा..एक बार बात कर लो..मैं ठीक हो जाउंगी उसके बाद..” कविता रोते हुये बड़बड़ाये जा रही थी...!इसी बीच एक बार फिर से दरवाज़े पर दस्तक हुयी.... दो बार..तीन बार..कविता दरवाज़े की ओर देख रही थी और आंखों से बहते आंसुओं को पोंछते हुये बार बार कॉल लगाये जा रही थी......उसे लगा था राकेश फिर से वापस आ गया है...दर्द और झुंझलाहट ने गुस्से का रूप ले लिया..वो राकेश को बुरी तरह से डांटने वाली थी कि तभी दरवाज़े पर किसी ने आवाज़ लगायी....

“कोई है ??..कविता..!”

कविता के हाथ से मोबाइल छुटकर बिस्तर पर गिर गया...कानों पर उसे यकीन नहीं हो रहा था ! पैरों में जैसे सारे जिस्म का खून सिमट आया हो...ये आवाज़ तो वो लाखों की भीड में भी पहचान सकती थी....आंखों के आंसू और तेजी से बहने लगे....दौड़कर वो दरवाज़े पर पहुंची और एक झटके में दरवाज़ा धाड़ से खोल दिया ,वो सही थी..- सामने पापा खड़े थे ; उसके अपने पापा, आंखों मे आंसू और दिल में ढेर सारा दुलार लिये !

कविता ऐसे पापा से लिपट गयी जैसे कसाई के चंगुल से भागे हुये बछडे को उसकी मां मिल गयी हो ! पापा का कलेजा छलनी हो गया था उसकी सूरत देखकर !

“थैंक्यू पापा ! आप आ गये... थैंक्यू !.. पापा..!!! आई एम सोरी ...आई एम सोरी पापा..” कविता की सिस्कियों में बहुत दर्द उमड़ आया था ! कविता के साथ साथ पापा भी रो रहे थे !

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