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स्पर्श ( प्रीत की रीत )

संध्या अभी दूर थी। आकाश में बादलों के टुकड़े तैर रहे थे। खिड़की के सामने बैठा राज उन्हें ध्यान से देख रहा था। एकाएक शिवानी ने अंदर आकर उसे पानी का गिलास दिया और बोली 'भैया! मुझे लगता है कि मैंने ही आपको धोखा दिया है।'

'क्यों?'

'मैं ही डॉली को न समझ पाई।'

'हम लोग तो अपने-आपको ही नहीं समझ पाते-फिर दूसरों को किस प्रकार समझ सकते हैं?'

'मैं डॉली की बात कर रही हूं।'

'तुम्हारा मतलब है-तुम डॉली को नहीं समझ पाईं?'

'हां।'

'किन्तु न समझने से हानि क्या हुई?'

'क्या इससे भी बड़ी कोई हानि हो सकती है कि वह आपको धोखा दे रही है। अब देखिए न डॉली भाभी का अकेले घर से बाहर जाना और दिन-भर इधर-उधर घूमना। लोग क्या सोचते होंगे?'

'तुम क्या सोचती हो?' राज ने पूछा और दो घूँट पानी पीकर गिलास शिवानी को थमा दिया।

शिवानी बोली- 'अभी तक तो कुछ विशेष नहीं सोचती किन्तु हो सकता है-भविष्य में मुझे यह सोचना पड़े कि डॉली और ज्योति में कोई अंतर नहीं और भैया! यदि ऐसा हुआ तो इसमें सबसे बड़ा दोष मेरा होगा-मेरा, क्योंकि डॉली के सामने विवाह का प्रस्ताव मैंने ही रखा था।'

राज ने कुछ न कहा।

शिवानी सामने आकर बोली- 'भैया! क्या डॉली भाभी की यह गतिविधियां देखकर आपका मन दुखी नहीं? क्या आप मन-ही-मन उनकी तुलना ज्योति से नहीं करते?'

'करता हूं शिवा।'

'मैं यह भी देख रही हूं कि पिछले एक सप्ताह से आप दोनों एक-दूसरे से खिंचे-खिंचे रहते हैं। इतने ही समय में यह दूरी?'

'मिट जाएगी?'

'किन्तु कैसे?'

'अपने आपसे समझौता करना पड़ेगा और किसी भी पीड़ा को भूलने का सबसे अच्छा उपाय यह होता है कि आदमी अपने आपसे, अपने भाग्य से और परिस्थितियों से समझौता कर ले। तुम्हारे मन में डॉली के प्रति कोई द्वेष नहीं होना चाहिए।'

'नहीं भैया!' शिवानी बोली- 'यदि डॉली भाभी ने अपने आपको बदलने का प्रयास न किया तो मैं उन्हें कभी क्षमा न कर पाऊंगी।'

'क्षमा न करके क्या करोगी?'

'म मेरा मतलब है...।'

'बच्चों जैसी बातें मत करो। डॉली से तुम्हारा अपनेपन का रिश्ता है और जिन लोगों से अपनेपन का रिश्ता होता है उनके प्रत्येक अपराध को क्षमा किया जाता है। जाओ चाय की तैयारी करो। डॉली भी आती होगी।'

'भैया! आपने यह नहीं सोचा कि वह जाती कहां है?'

'तुम भी विचित्र हो शिवा! साधारण-सी बात को कितना बढ़ा रही हो। डॉली बच्ची तो है नहीं-उसे अपने भले-बुरे का ज्ञान है। मन बहलाने के लिए कहीं चली जाती होगी।'

'और यदि।' शिवानी फिर बोली- 'उनके कदम किसी गलत राह पर चल पड़े तो?'

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'शिवा प्लीज!' राज ने बेचैनी से कहा और व्हील चेयर की दिशा बदलकर बोला- 'तुम्हें यह सब नहीं कहना चाहिए। डॉली पर मुझे पूरा भरोसा है। वह कभी किसी गलत राह पर न चलेगी और यदि ऐसा हुआ भी तो मैं उसकी उन राहों से भी समझौता करूंगा। जानती हो क्यों? । क्योंकि मैं अपने जीवन में अन्य किसी को लाना नहीं चाहता।'

शिवानी उसे आश्चर्य से देखने लगी।

एकाएक राज को कुछ याद आया और वह बातों का विषय बदलकर बोला- 'और आज बुद्ध प्रकाश जी का फोन आया था। उन्होंने विवाह के लिए अगले महीने की बीस तारीख निश्चित की है। बात यह है कि उनकी पत्नी का स्वास्थ्य ठीक नहीं रहता।'

'आप उनसे कह दें-अभी हमारा विवाह का कोई इरादा नहीं।'

'क्या मतलब?'

'मतलब यह कि मैं अभी विवाह न करूंगी।'

'पागल हो गई हो क्या? विवाह की सभी बातें तय हो चुकी हैं और तुम कह रही हो कि...। और फिर अब तो मुझे और घर की संभालने की भी समस्या नहीं रही-डॉली जो है।'

'मुझे डॉली पर भरोसा नहीं।'

'किन्तु मुझे तो है।' राज बोला- 'कितना ख्याल रखती है वह मेरा। चाय, नाश्ता, खाना और...।'

'ये सब बनावटी बातें हैं। अन्यथा मुझे लगता है कि हाथी के दांत खाने के तथा दिखाने के। अलग-अलग हैं।' शिवानी ने यह सब एक ही सांस में कहा और तेज-तेज पग उठाते हुए कमरे से बाहर चली गई।

राज ने बेचैनी से होंठ काट लिए।

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द्वार खुला था। डॉली ने ऑटोरिक्शा से उतरकर अंदर प्रवेश किया तो दूसरे ही क्षण उसके पांव कांप गए और हृदय अज्ञात की आशंका से धड़क उठा। न जाने राज उसके विषय में क्या सोच बैठे? फिर भी वह धीरे-धीरे आगे बढ़ी और चलकर अपने कमरे में आ गई। उस समय शिवानी किचन में थी और राज वहां न था। यह जानकर डॉली ने संतोष की सांस ली और दर्पण के सामने आकर अपने बाल संवारने लगी।

तभी वह चौंकी। एकाएक किसी ने पीछे से आकर कहा- 'न छेड़ो इन घटाओं को बरस जाएंगी तो क्या होगा?' कहने का अंदाज शायरना था। डॉली फुर्ती से घूम गई। यह राज था जो व्हील चेयर पर बैठा मुस्कुरा रहा था। डॉली उससे बोली- 'क्षमा करना-आने में कुछ देर हो गई। रामगढ़ की दो-तीन सहेलियां मिल गई थीं। शहर घूमने आई थीं।'

'आप भी कमाल करती हैं मैडम! हम तो ऐसे मौसम में घटाओं की बात कर रहे हैं और आप अपनी सहेलियों की बात ले बैठीं।'

'नहीं, मैं तो यह कह रही थी कि...।'

'अब छोडिए भी मैडम! आइए थोडी देर के लिए लॉन में बैठते हैं। देखिए न हवाओं में कितनी ताजगी है और आकाश में बादलों के टुकड़े किस प्रकार गले मिल रहे हैं।'

डॉली चौंक पड़ी। सोचने लगी-राज को एकाएक क्या हुआ? पिछले एक सप्ताह से तो वह उससे इतना नाराज था कि बोलता भी कम था किन्तु आज उसके व्यवहार एवं वाणी में इतनी मधुरता! उसे यों विचारमग्न देखकर राज फिर बोला- 'लगता है देवीजी को हमारा प्रस्ताव पसंद नहीं आया।'

'न नहीं तो।'

'तो आओ न।'

'कहां?'

'लॉन में अथवा कहीं भी खुले आकाश के नीचे।'

'ठीक है।' इतना कहकर डॉली ने ब्रुश रख दिया और पीछे से व्हील चेयर को थाम लिया। इसके उपरांत वह राज को लेकर लॉन में आ गई। राज ने झूठ न कहा था-मौसम अच्छा था। ताजगी भरी हवाएं चल रही थीं और छोटे से लॉन में उगे फूलों के पौधे यूं झूम रहे थे मानो नृत्य कर रहे हों।'

राज ने डॉली का हाथ अपने हाथ में ले लिया और फिर मुस्कुराते फूलों को ध्यान से देखते हुए उसने डॉली से पूछा- 'डॉली कैसा लग रहा है यह सब?'

'क्या?'

'ये हंसते-खिलखिलाते फूल, ताजा हवाएं और आकाश में आंख-मिचौली खेलते बादल।'

'अच्छा तो है।'

'क्या यह सब देखकर तुम्हें ऐसा नहीं लगता कि प्रकृति हम इंसानों से कहीं अधिक बुद्धिमान और समझदार है। हम लोग तो छोटी-छोटी पीड़ाओं से घबराकर जीवन को बोझ समझ बैठते हैं और अपने आपको उदासी की धुंध में छुपा लेते हैं किन्तु यह प्रकृति, क्या तुमने इसे कभी आंसू बहाते देखा है? किसी से नाराज होते देखा है? आंधियां तो प्रकृति के लिए भी आती है-तूफान तो इसे भी झकझोर डालते हैं, किन्तु यह प्रकृति कभी दुखी हुई?'

डॉली बोली- 'आज यह कविता क्यों?'

'डॉली! यह कविता नहीं बल्कि सच्चाई है। हमें हंसना चाहिए, मुस्कुराना चाहिए इन फूलों की भांति। ऐसा नहीं कि हम जीवन को बोझ समझ बैठें और जो हमारे अपने हैं उन्हें भी अपना न समझें।'

'जी।'

'तो फिर एक वादा करो डॉली!'

'वह क्या?'

'यह कि हम एक-दूसरे से कभी नाराज न होंगे।'

'मैं कहां नाराज होती हूं।'

'चलो मैंने माना कि मैं नाराज होता हूं किन्तु भविष्य में हमारा प्रयास यह होना चाहिए कि हम एक-दूसरे को नाराज न करें।'

'जी।' डॉली ने सिर्फ इतना ही कहा। राज का अभिप्राय वह जान गई थी।

राज बोला- 'तो आओ बैठो।'

डॉली बैठ गई। राज के व्यवहार पर उसे अब भी आश्चर्य हो रहा था। उसी समय शिवानी वहां आई और चाय की ट्रे मेज पर रखकर जाने लगी। राज ने उसे पुकारा- 'शिवा!'

शिवानी रुक गई। डॉली की ओर नजरें भी न उठीं। चेहरे पर नाराजगी के भाव थे।

राज ने पूछा- 'चाय न लोगी?'

'मैं ले चुकी हूं।' शिवानी धीरे से बोली।

'कब?'

'अभी कुछ देर पहले।'

'तो बैठो न।'

'मैं खाने की तैयारी कर रही हूं।' शिवानी ने शुष्क लहजे में कहा और वहां से चली गई।

उसके जाते ही राज ने डॉली से कहा- 'यह लड़की बहुत संवेदनशील है। इसके हृदय में ऐसी बातें भी चोट कर जाती हैं जो साधारण होती हैं।'

'जी।' डॉली ने इतना ही कहा। शिवानी की नाराजगी वह समझती थी।

'चाय लो।'

डॉली ने प्याला उठा लिया।

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खिड़की के पीछे छुपा चांद यह सब देखता रहा और राज एवं डॉली न जाने कब तक एक-दूसरे की बांहों में सिमटे रहे। इसके पश्चात राज सो गया और डॉली करवट बदलकर आकाश में मुस्कुराते चांद को देखने लगी। आंखों में नींद न थी। उसकी कल्पना में बार-बार जय की आकृति बनती और फिर लुप्त भी हो जाती। जय की पीड़ा उसके लिए असहनीय हो गई थी और उसे किसी प्रकार भी वह शीघ्र-से-शीघ्र जेल की चारदीवारी से बाहर लाना चाहती थी किन्तु यह सब उतना सरल भी न था। कपूर साहब ने उसे बीस हजार का प्रबंध करने के लिए कहा था और इतनी बड़ी रकम का प्रबंध वह किसी भी दशा में नहीं कर सकती थी।

रात पल-पल अपना सफर पूरा करती रही और डॉली यही सोचती रही कि वह इतनी बड़ी रकम का प्रबंध कहां से करे। कपूर के अनुसार यदि रकम का प्रबंध हो जाता है तो फिर जय के बरी होने में कोई संदेह ही न था। एकाएक डॉली के मस्तिष्क में एक विचार बड़ी तेजी से कौंध गया। विचार ने उससे कहा- 'तेरे पास जेवर तो हैं-उनका मूल्य भी एक लाख से कम नहीं।'

'अर्थात्।'

'यह कि तुझे बीस हजार की कीमत का कोई जेवर बेच देना चाहिए।'

'राज को पता चल गया तो?' डॉली ने स्वयं से प्रश्न किया।

'कैसे चलेगा पता? जेवरों का डिब्बा तो तेरी ही अलमारी में रहता है और राज उस अलमारी को हाथ भी नहीं लगाता।'

'नहीं-मैं यह सब न कर पाऊंगी।'

'नहीं कर पाएगी तो फिर जय का क्या होगा? कैसे वह अपना मुकदमा जीत पाएगा? कैसे वह जेल से बाहर आएगा? क्या तू चाहती है कि वह जीवन भर उसी चारदीवारी में घुटता रहे-क्या तू चाहती है कि वह फांसी के फंदे में झूल जाए?'

'नहीं-नहीं।'

'तो फिर तू साहस क्यों नहीं जुटाती। तुझे जय से अधिक अपनी चिंता क्यों है?'

'मुझे सिर्फ जय की चिंता है। उसके लिए मैं इस समाज को नहीं संसार को भी ठुकरा सकती हूं। मैं-मैं अपने प्राण भी दे सकती हूं जय के लिए। हां-मैं उसके लिए कुछ भी कर सकती हूं-मैं उसके लिए सब कुछ कर सकती हूं। मुझे न तो राज से मोह है और न ही इस घर से। यदि आवश्यकता पड़ी तो मैं जय के लिए इस घर को भी छोड़ सकती हूं। सब कुछ छोड़ सकती हूं।' डॉली बड़बड़ाई।

तभी राज ने उसे अपनी आवाज से झिंझोड़ दिया- 'डॉली! नींद नहीं आई?'

डॉली यह सुनकर कांप-सी गई।

उसकी ओर से कोई उत्तर न पाकर राज ने उसे अपनी ओर खींच लिया और बोला- 'आओ मैं तुम्हें सुला दूं।'

'नींद तो आ रही थी।'

'ऊंडं खुली आंखों में नींद नहीं आती।'

'मेरी आंखें?'

'मैंने देखी हैं।' राज डॉली पर झुक गया और उसके होंठों पर उंगली फिराते हुए बोला- 'तुम एकटक नजरों से चांद को देख रही थीं।' 'चांद होता ही इतना सुंदर है कि...।'

'तुम्हारा यह मुखड़ा भी तो चांद से कम नहीं, बल्कि सच पूछो तो चांद तुम्हें देखकर ईर्ष्या से छुप जाए।'

'कविता करना तो कोई आपसे सीखे।'

'नहीं, यह कविता नहीं डॉली! यह तो प्रशंसा है तुम्हारे सौंदर्य की और प्रशंसा भी ऐसी जो झूठी नहीं।' राज ने कहा और इसके उपरांत वह उसके वक्ष को चूमने लगा। ऐसा करते समय उसके सांसों की गति एकाएक ही बढ़ गई थी।

डॉली को उसका इरादा समझते देर न लगी। वह बोली- 'ऊंडं-अब सोने दो न।'

'सो जाना-ऐसी भी क्या जल्दी है?'

'ना बाबा! यह सब अब नहीं।'

'क्यों?' राज ने पूछा और डॉली के सुदृढ़ उभारों को टटोलने लगा।

डॉली बोली- 'मुझसे यह सब सहन नहीं होता और फिर एक ही रात में बार-बार...।'

'चलो आज मान लो।'

'कल फिर?'

'नो, वचन देता हूं।'

डॉली ने फिर कुछ न कहा और घृणा से आंखें मूंद लीं। जबकि राज ने उसे बाहों में भरा और इसके उपरांत वह उस पर झुकता चला गया।
 
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राज जा चुका था। शिवानी अपने कमरे में किसी पुस्तक के पृष्ठ उलट रही थी। कल शाम से उसके एवं डॉली के बीच कोई वार्तालाप न हुआ था। डॉली ने भी उसे कुछ कहने की आवश्यकता न समझी थी।

इस समय भी वह किचन से निकली और शिवानी वाले कमरे को देखते हुए अपने कमरे में आ गई। कमरे में आते ही उसने द्वार बंद किया और सेफ खोलकर जेवरों वाला डिब्बा निकाल लिया किन्तु ऐसा करते ही उसका हृदय कांप गया। मन में एक ही सोच थी-कहीं राज को पता चल गया तो? इस सोच के कारण उसके मस्तिष्क में द्वंद्व-सा छिड़ गया। परस्पर विरोधी विचार एक-दूसरे से यों टकराए कि वह काफी देर तक कोई निश्चय न कर सकी। तभी उसे शिवानी का ध्यान आया। शिवानी के मन में दरवाजा बंद देखकर कोई शंका जन्म ले सकती थी और इसके अतिरिक्त वह किसी काम से । अंदर भी आ सकती थी। यह सोचते हुए डॉली ने

अपने हृदय को मजबूत किया और डिब्बे से दो-तीन जेवर निकालकर अपने बैग में डाल लिए और डिब्बा उसी स्थान पर रख दिया। इसके पश्चात वह तैयार होकर कमरे से बाहर निकली-और इससे पूर्व कि वह बरामदे की । सीढ़ियां उतर पाती-किसी की आवाज ने उसके बढ़ते हुए कदम रोक दिए- 'जा रही हो?' यह शिवानी थी जो उसी के समीप आ रही थी।

डॉली ने चेहरा झुका लिया।

शिवानी उसके निकट आकर बोली- 'एक बात पूछू?'

'वह क्या?'

'इस घर से तुम्हारा क्या रिश्ता है?'

'इस प्रश्न का उत्तर तुम्हारे पास भी है।'

'लेकिन मैं तुमसे पूछ रही हूं।'

'मैं-मैं बहू हूं इस घर की।'

'बहू-अर्थात् गृहलक्ष्मी। अर्थात् इस घर की इज्जत, इस खानदान की मर्यादा है न?'

'हां।' डॉली ने धीरे से कहा।

'झूठ बोलती हो तुम!' शिवानी एकाएक गुस्से से चिल्लाई- 'तुम्हारा न तो इस घर की इज्जत से कोई संबंध है और न ही इस खानदान की मर्यादा से कोई रिश्ता है।'

'शिवा!'

'मैं पूछती हूं डॉली! मैं तुमसे पूछती हूं कि यदि तुम्हें इस घर की इज्जत एवं मर्यादा का ध्यान होता तो क्या तुम प्रतिदिन यों बन-संवरकर बाहर जातीं? यदि तुमने इस घर को अपना घर समझा होता तो क्या तुम इसकी आबरू को यों ठोकर मारतीं? मैं पूछती हूं क्या शरीफ घरों की औरतें यही सब करती हैं?'

'मैंने ऐसा कुछ नहीं किया।"

'तुम ऐसा कर रही हो डॉली! तुम यही सब कर रही हो। कोई अंतर नहीं तुममें और ज्योति में।'

'तुम-तुम कहना क्या चाहती हो?'

'सिर्फ यह कि बदलो अपने आपको। छोड़ दो उन राहों को जिनमें बदनामी के कांटों के अतिरिक्त और कुछ नहीं। इस घर को अपना समझो और यह सोचो इस घर की आबरू तुम्हारे हाथों में है। तुम नहीं जानतीं-ज्योति ने भैया को कितने दु:ख दिए थे। ज्योति के कारण न जाने कितनी मानसिक यातनाएं सहीं उन्होंने। मैं चाहती हूं कि उनके जीवन में फिर वैसा ही कोई तूफान न आए।'

'मैं सिर्फ इतना ही कह सकती हूं कि मेरे कारण कोई तूफान न आएगा।' डॉली बोली।

'नहीं डॉली! तूफान का कारण तो तुम ही होगी और मुझे यह भी विश्वास है कि यदि तुमने अपनी आदतें न बदलीं तो तूफान अवश्य आएगा।'

'तुम भी तो यहीं हो। क्या उस तूफान को तुम न रोक पाओगी?'

'अफसोस तो यही है डॉली कि मैं यहां नहीं रहूंगी। अगले महीने की बीस तारीख को मेरा विवाह है। यद्यपि मैं विवाह के पक्ष में नहीं, क्योंकि मैं जानती हूं कि मेरे जाते ही यह घर तिनके-तिनके होकर बिखर जाएगा। सब कुछ लुट जाएगा यहां का, किन्तु भैया हैं कि अपनी जिद्द पर अड़े हैं।'

'बस अथवा और कुछ?'

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'बस इतना ही डॉली!' शिवानी के शब्दों में अथाह पीड़ा थी। वह बोली- 'यदि मान सकती हो तो अपनी सहेली की इस प्रार्थना को जरूर मान लेना।'
 
'बस इतना ही डॉली!' शिवानी के शब्दों में अथाह पीड़ा थी। वह बोली- 'यदि मान सकती हो तो अपनी सहेली की इस प्रार्थना को जरूर मान लेना।'

'कोशिश करूंगी।' डॉली ने घृणा से कहा और बरामदे की सीढ़ियां उतर गई।

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राज ने बरामदे में आते ही डॉली को पुकारा 'डॉली! भई कहां हो तुम?' कोई उत्तर न मिला।

राज व्हील चेयर के पहिए घुमाता हुआ कमरे में आ गया। उसी समय शिवानी कमरे में आ । गई। उसके हाथ में पानी का गिलास था। गिलास मेज पर रखकर वह वापसी के लिए मुडी तो राज ने उसे रोककर पूछा- 'डॉली कहां है?'

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शिवानी ने कोई उत्तर न दिया।

राज फिर बोला- 'तुमने बताया नहीं डॉली कहां है?'

'आप यह प्रश्न उन्हीं से क्यों नहीं पूछते?'

'शिवानी! मैं तुमसे पूछ रहा हूं।'

'मेरा उत्तर आपको पसंद न आएगा।'

'क्यों?'

'इसलिए क्योंकि सच का घूँट कड़वा होता है। हर किसी से सहन नहीं होता।'

'तू-तू कहना क्या चाहती है?'

'सिर्फ यह कि आपने डॉली से विवाह करके ठीक नहीं किया।'

'क्यों?' राज चौंककर बोला- 'डॉली में ऐसी क्या बुराई है?'

'बुराई आंखों से देखी जाती है भैया! और जहां तक मैं समझती हूं आपने डॉली के मामले में अपनी आंखें हमेशा बंद रखी हैं।'

'शिवा! मुझे पहेलियां पसंद नहीं।'

'पहेलियां मुझे भी पसंद नहीं भैया!'

'तो फिर तू बताती क्यों नहीं कि बात क्या है?'

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'भैया!' शिवानी को कहना पड़ा- 'डॉली ऐसी राहों पर चल पड़ी है जिनका अंत ही बर्बादी होता है।'

'शिवा!' राज एकाएक गुस्से से चीख पड़ा।

शिवानी दृढ़ता से कहती रही- 'यह सच है भैया! और यदि आप सोचते हैं कि यह झूठ है तो पूछिए डॉली से-उससे पूछिए कि वह प्रतिदिन बन-संवरकर कहां जाती है? कहां रहती है वह सुबह से शाम तक? किससे मिलती है? क्या करती है? मैं आपसे भी पूछती हूं भैया, क्या भले घरों की बहुएं यही सब करती हैं? दिन-भर बाजारों में घूमना और पर-पुरुषों से मिलना। क्या हमारा समाज इसे पसंद करता है? क्या यही हमारी संस्कृति है?'

राज यह सुनते ही गुस्से से चीख पड़ा 'जुबान संभालकर बात करो शिवा! डॉली पर इस प्रकार के आरोप लगाने का तुम्हें कोई अधिकार नहीं।'

'भ-भैया!'

'और।' राज फिर बोला- 'यदि यह सब सच भी है तब भी तुम्हारा इन सब बातों से कोई संबंध नहीं। डॉली अच्छी अथवा बुरी जैसी भी है मेरी पत्नी है।'

यह सुनकर शिवानी की आंखें भर आईं। रुंधे स्वर में वह बोली- 'यह-यह आप कह रहे हैं भैया!'

'हां और मैं यह भी कह रहा हूं कि भविष्य में तुम डॉली पर कोई इल्जाम न लगाओगी और यदि ऐसा हुआ तो मैं समझूगा कि इस घर की इज्जत को वह नहीं तुम नीलाम कर रही हो।'

'यह-यह आपने ठीक कहा भैया! बिलकुल ठीक कहा आपने। यकीन कीजिए, भविष्य में मैं कुछ भी न कहूंगी।' कहते ही शिवानी के होंठों से सिसकियां फूट पड़ी किन्तु इसके पश्चात वह कमरे में न रुकी और तेजी से बाहर चली गई।

उसके जाते ही राज ने पानी का गिलास उठाया और उसे एक ही सांस में खाली कर दिया। डॉली लगभग एक घंटे पश्चात लौटी।
 
उस समय राज के हाथों में डायरी थी और वह कुछ लिखने में व्यस्त था। डॉली दबे पांव कमरे में आई और राज पर पीछे से झुककर बोली- 'शायद कोई कविता लिख रहे हैं?'

'आं!' राज ने चौंककर डॉली को देखा और बोला- 'हां डॉली! एक कविता ही लिखी है।'

'अच्छा देखू तो।'

'ऊंह रहने दो।'

'वह क्यों?'

'बहुत दर्द है इसमें।'

'आपका?'

'कुछ अपना कुछ पराया।'

'फिर तो मैं जरूर पढूंगी। क्या पता किसी पंक्ति में मेरा दर्द भी छुपा हो।' इतना कहकर डॉली ने राज के हाथ से डायरी ले ली और पढ़ने लगी। डायरी में लिखा था

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सागर को छूकर लौटने वाली हवाओं हरी-भरी वादियों की खामोश फिजाओं

तुम उनसे मिलो तो मेरा सलाम कहना वो सुन सकें तो पैगाम कहना

तुम न समझ सको रिश्तों का दर्द यह अलग बात है। हमने तो तुम्हें अपना माना है,

अपना जाना है...।

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डॉली ने यह सब पढ़कर डायरी राज को लौटा दी। राज ने पूछा- 'कैसी लगी?'

'कविता तो जैसी भी है ठीक ही है किन्तु एक बात न समझ सकी।'

'वह क्या?'

'यह रिश्तों का दर्द क्या होता है?'

'डॉली-यह नियम है कि मनुष्य जब चोट खाता है तो अपनों से ही खाता है और जब दर्द मिलता है तो वह भी अपनों से ही मिलता है और जानती हो-अपने कौन होते हैं? वे जिनसे हृदय का रिश्ता होता है।'

'हूं।' डॉली सामने बैठ गई और बोली- 'बात तो काफी गहरी कही आपने लेकिन आपको यह दर्द कहां से मिला?'

'उनसे जो यूं तो दोस्त बनकर आए थे मगर दुश्मनों से भी बुरे निकले।' ।

राज ने कहा और फिर एकाएक कुछ सोचकर वह बोला- 'खैर छोड़ो। मैं तुमसे बताना भूल गया कि शिवानी के विवाह की तारीख पक्की हो चुकी है।'

'कौन-सी है?'

'अगले महीने की बीस।'

'आपका मतलब-सिर्फ बाइस दिन?'

'हां।'

'कमाल है-विवाह में केवल बाइस दिन रह गए और आप हाथ-पर-हाथ धरे बैठे हैं।'

'नहीं-ऐसी तो कोई बात नहीं। दरअसल मेरे सामने पैसे की समस्या है।'

'शादी में कितना खर्च होगा?'

'कम-से-कम दो लाख।'

'और आपके पास कितना है?'

'एक लाख का प्रबंध हो जाएगा।'

'एक लाख उधार नहीं मिल सकते?'

'नहीं ऐसा कोई संबंधी अथवा मित्र नहीं।'

'फिर कैसे होगा?'

'तुम चाहो तो सब कुछ हो सकता है।'

'मैं।' डॉली चौंककर बोली- 'मैं क्या कर सकती हूं?'

'तुम मुझे वह जेवर दे सकती हो जो विवाह के समय तुम्हें दिए थे। उन्हें गिरवी रखकर एक लाख की रकम मिल सकती है। बाद में जब स्थिति ठीक होगी तो जेवर तुम्हें मिल जाएंगे।' राज ने कहा और इसके उपरांत वह डॉली को ध्यान से देखने लगा।

डॉली यह सुनकर कांप-सी गई। उनमें से एक जेवर तो वह आज बेच भी आई थी।
 
'देखो डॉली!' राज उसे विचारमग्न देखकर बोला- 'क्योंकि तुम इस घर की बहू हो इसलिए इस घर की जितनी जिम्मेदारी मुझ पर है-उतनी ही तुम्हारे कंधों पर भी है और यदि जिम्मेदारी न भी हो तब भी मेरी प्रत्येक समस्या में हाथ बंटाना तुम्हारा धर्म है और फिर हमें उन जेवरों को बेचना थोड़े ही है, सिर्फ गिरवी रखना है। क्या सोच रही हो?'

डॉली बोली- 'क्या-क्या इस समस्या का अन्य कोई समाधान नहीं? मेरा मतलब है रकम का प्रबंध किसी अन्य ढंग से हो जाता।'

'डॉली! मैं इस संबंध में काफी गहराई से सोच चुका हूं। मुझे कोई समाधान नजर नहीं आता।'

'क्या आप विवाह की तारीख नहीं बदल सकते?'

'कैसी बातें करती हो डॉली! सब कुछ तय हो चुका है और तुम तारीख बदलने की बात कर रही हो। नहीं-यह संभव नहीं। यदि मैंने इस संबंध में कुछ भी कहा तो रिश्ता टूट जाएगा।'

डॉली का कंठ सूख गया। कोई उत्तर न दे सकी।

राज उसे अब भी ध्यान से देख रहा था। वह बोला- 'तो क्या मैं यह समझू कि तुम इस समस्या में मेरा साथ न दोगी?'

'नहीं, मैं आपका साथ अवश्य दूंगी।' डॉली ने कहा और उठ गई।

राज बोला- 'थॅंक डॉली! तुमने यह कहकर मेरे सिर से बहुत बड़ा बोझ उतार दिया।'

'जी।' डॉली ने केवल इतना ही कहा और बाहर चली गई। राज उसे ऐसी नजरों से देखता रहा-जैसे उसे डॉली पर दया आ रही हो।

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जय के मुकदमे का दूसरा दिन।

अदालत के कक्ष में आज भी उतनी ही भीड़ थी। उस भीड़ में डॉली के अतिरिक्त हरिया एवं रामगढ़ का चौधरी भी मौजूद था। विटनेस बॉक्स में खड़े जय का हुलिया आज भी वैसा ही था, किन्तु आज उसने अपना चेहरा न झुका रखा था और वह अपलक नजरों से अगली पंक्ति में बैठी डॉली को देख रहा था।

उचित समय पर अदालत की कार्यवाही शुरू हुई। सरकारी वकील मिस्टर हेगड़े ने एक छोटा-सा पैकेट जज महोदय की मेज तक पहुंचाया और फिर अदालत को संबोधित करते हुए वह बोला 'मीलॉर्ड! यह वही रिवाल्वर है जिससे जमींदार कृपाल सिंह का खून किया गया था। पैकेट में वे दो गोलियां भी हैं जो पोस्टमार्टम के समय कृपाल सिंह के जिस्म में पाई गई थीं। फिंगरप्रिंट एक्सपर्ट की रिपोर्ट के अनुसार रिवाल्वर पर मुलजिम की उंगलियों के निशान पाए गए थे।

अतः मीलॉर्ड! अब यह बात बिलकुल साफ हो गई है कि मुलजिम जय ने अपने पिता ठाकुर कृपाल सिंह का खून किया है। इसलिए मैं अदालत से प्रार्थना करता हूं कि वह इस मुकदमे में और अधिक वक्त जाया न करके मुलजिम जय को कड़ी-से-कड़ी सजा दें। थॅंक मीलॉर्ड!'

'नहीं युअर ऑनर!' हेगड़े की बात समाप्त होते ही सफाई पक्ष के वकील कपूर साहब एक झटके से उठे और चिल्लाए- 'इस पैकेट में रखी रिवाल्वर, रिवाल्वर पर पाए गए मेरे क्लाइंट की उंगलियों के निशान और मृतक के जिस्म से निकली इन गोलियों से किसी। प्रकार भी यह सिद्ध नहीं होता कि ठाकुर कृपाल सिंह का खून मेरे क्लाइंट ने किया है।'

जज महोदय ने प्रश्न किया- 'क्या सफाई पक्ष के वकील यह कहना चाहते हैं कि यह रिवाल्वर मुलजिम जय की नहीं?'

'नो युअर ऑनर! क्योंकि इस रिवाल्वर का लाइसेंस मेरे क्लाइंट के नाम है-अतः यह तो स्पष्ट है कि रिवाल्वर मेरे क्लाइंट की है। मैं तो अदालत को यह बताना चाहता हूं कि इस प्वाइंट की रिवाल्वरें और भी अनेक लोगों के पास मौजूद हो सकती हैं। साथ ही उन रिवाल्वरों पर उनके धारकों की उंगलियों के निशान भी अवश्य ही मौजूद होंगे। साथ ही उनके चैंबरों में भरी हुई गोलियां चाहे उन्हें चैंबर से निकाल दिया जाए, वे भी उसी प्वाइंट की होंगी। कहने का तात्पर्य यह है युअर ऑनर कि खून इसी रिवाल्वर से हुआ हो यह आवश्यक नहीं। पुलिस के पास इस बात का कोई भी प्रमाण नहीं कि मृतक के जिस्म से निकाली गईं ये गोलियां इसी रिवाल्वर की हैं, क्योंकि मैं पहले ही दरख्वास्त कर चुका हूं कि इस प्वाइंट की रिवाल्वरें और भी अनेक लोगों के पास हो सकती हैं और ये गोलियां भी किसी भी रिवाल्वर की हो सकती हैं।

'किन्तु मीलॉर्ड!' हेगड़े बोला- 'मेरे विद्वान मित्र भूल रहे हैं कि पुलिस को यह रिवाल्वर घटनास्थल पर मिली है।'
 
'यह झूठ है युअर ऑनर!' कपूर साहब इस बार गला फाड़कर चिल्लाए– 'पुलिस को यह रिवाल्वर घटनास्थल से नहीं बल्कि मेरे क्लाइंट के कमरे से मिला है और यह उनके कमरे में होनी भी चाहिए थी युअर ऑनर क्योंकि मेरे क्लाइंट को इसे रखने का अधिकार था। अदालत चाहे तो इस संबंध में पुलिस इंस्पेक्टर मिस्टर शर्मा का बयान ले सकती है।'

'लेकिन।' हेगड़े फिर बोला- 'मीलॉर्ड! मुलजिम जय ने पुलिस के सामने स्वीकार किया है कि ठाकुर कृपाल सिंह का खून उसी के हाथों से हुआ है।'

'किन्तु युअर ऑनर! अदालत इस बात को भली प्रकार जानती है कि मुलजिम का पुलिस के सामने दिया हुआ बयान कोई मायने नहीं रखता। पुलिस की यातनाओं से बचने के लिए तो प्रत्येक मुलजिम को यही कहना पड़ता है कि अपराध उसने किया है। किसी भी मुलजिम का सही बयान वह माना जाता है जो अदालत में दिया जाता है और वैसे भी युअर ऑनर! मेरा क्लाइंट तो इस बात को पहले ही स्वीकार कर चुका है कि उसने पुलिस के सामने झूठा बयान दिया था। थॅंक युअर ऑनर!'

इतना कहकर कपूर साहब अपने स्थान पर बैठ गए।

उसी समय अदालत की आज की कार्यवाही समाप्त होने की घोषणा हो गई।

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जय अदालत कक्ष से निकलकर जेल की गाडी की ओर बढ़ा तो डॉली एकाएक उसके सामने आ गई। डॉली की आंखों से टप-टप आंसू बह रहे थे। उसे यों रोते देखकर जय के चेहरे पर दर्द का तूफान फैल गया। वह बोला- 'रोती क्यों हो पगली?'

'न रोऊं तो क्या करूं?' डॉली सिसक उठी और बोली- 'कैसे समझाऊं अपने आपको? किस प्रकार दिलासा दूं स्वयं को? तुमसे नेह लगाया-तुम संग प्रीत की डोरी बांधी। अपना सब कुछ तुम्हें माना और मैं तुम्हारी सूरत को भी तरस गई।'

'पगली! यह तो समय की बात होती है। मिलन और बिछोह अपने हाथ में थोड़े ही होता है। क्या पता है-ईश्वर ने हम दोनों को केवल पीडाएं सहने के लिए ही धरती पर भेजा हो।'

'जय-जय!'

'हो सकता है-कभी अच्छा समय भी आए। हो सकता है यह दो बिछुड़े हृदय फिर एक हो जाएं। निराश क्यों होती हो और वैसे भी तुम जो मेरे लिए इतनी तपस्या कर रही हो-क्या तुम्हें उस पर कोई भरोसा नहीं? तुम यह क्यों सोचती हो कि तुम्हें उसका फल न मिलेगा?'

'मुझे अपनी तपस्या पर पूरा भरोसा है जय!'

'भरोसा है तो निराशा छोड़ दो। आंसू पोंछ लो और मुस्कुराओ। एक बात याद रखो। सिर्फ यह याद रखो कि यदि हमारे भाग्य में मिलन लिखा है तो संसार की कोई शक्ति हमें जुदा न कर पाएगी। हम एक रहेंगे डॉली! हमेशा एक रहेंगे।'

डॉली को जय के इन शब्दों से काफी बल मिला।

उसने अपनी सिसकियां पी डालीं और फिर बातों का विषय बदलकर बोली- 'जय! मैंने तुम्हारा केस प्राइवेट डिटेक्टिव मिस्टर मदान को सौंप दिया है। ऐसा मैंने चौधरी के विरुद्ध प्रमाण जुटाने के लिए किया है। कपूर साहब ने कहा था कि यदि हमें चौधरी के विरुद्ध उचित प्रमाण मिल जाते हैं तो फिर तुम्हारे बरी होने में कोई संदेह न रहेगा।'

'लेकिन डॉली-!'

'पहली पेशी पर चौधरी मुझसे मिला था। उसने मुझे धमकी दी थी कि मैं तुम्हारे मुकदमे की पैरवी न करूं। साथ ही उसने यह भी स्वीकार किया कि जमींदार साहब का खून उसने किया है। उसने बताया कि वह उस समय उसी मकान में मौजूद था और खिड़की के पीछे खड़ा था। हालांकि उस समय उसका इरादा ऐसा न था किन्तु जब उसने पिता-पुत्र के बीच विवाद होते देखा तो उसने इस अवसर का लाभ उठाया और जमींदार साहब का खून कर दिया। मैंने यह सब कपूर साहब को बताया तो उन्होंने मुझे सलाह दी कि मैं इस संबंध में किसी प्राइवेट जासूस की मदद लूं।'

'पर डॉली!' जय बोला- 'प्राइवेट डिटेक्टिव की फीस?'

'दे दी है मैंने।'

"कितने?'

'बीस हजार।

'बीस हजार!' जय चौंककर बोला- 'किन्तु इतनी बड़ी रकम?' डॉली शायद जानती थी कि जय उससे यह प्रश्न अवश्य करेगा। अतः वह बोली- 'कंपनी से मिल गई थी। वेतन से कटती रहेगी।'

'डॉली! न जाने तुम्हारे ये उपकार मैं कैसे उतार पाऊंगा।'

'नहीं जय! मैंने तुम पर कोई उपकार नहीं किया। अपनों के लिए किया गया कार्य उपकार माना भी नहीं जाता। मैंने तो जो कुछ भी किया है-अपने लिए किया है। अपने प्यार के लिए किया है।'

तभी साथ खड़े कांस्टेबल ने जय को गाड़ी की ओर बढ़ने का आदेश दिया।

यह देखकर डॉली की आंखों में फिर आंसू आ गए। रुंधे स्वर में वह बोली- 'जय!'
 
'चलता हूं डॉली!'

'अपना ध्यान तो रखोगे न?'

'बिलकुल रखूगा डॉली! किन्तु अपने लिए नहीं, तुम्हारे लिए। अपन-अपने प्यार के लिए। अच्छा अब चलता हूं।' इतना कहकर वह कांस्टेबल के साथ जेल की गाड़ी की ओर बढ़ गया।

उसके जाते ही डॉली की आंखें सावन-भादों बन गईं।

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संध्या का समय था। आकाश में डूबते सूर्य की लालिमा अभी शेष थी। लॉन में अपनी व्हील चेयर पर बैठा राज आकाश में उड़ती पक्षियों की टोलियों को देख रहा था। संध्या के कारण ये पक्षी अपने घोंसलों की ओर लौट रहे थे। तभी शिवानी वहां आई और मेज पर चाय का प्याला रखकर जाने लगी।

राज जानता था कि शिवानी उससे नाराज है। पिछले सप्ताह शिवानी के प्रति कई कटु वाक्य उसके मुंह से निकल गए थे। राज को अपने शब्दों पर पश्चाताप भी हुआ था।

शिवानी को यों चुपचाप जाते देखकर उसके हृदय में पश्चाताप की वही भावना फिर उठी और उसने शिवानी को पुकारा– 'शिवा!'

शिवानी के पांव रुक गए।

'नाराज हो गईं?' राज फिर बोला।

'नहीं।'

'किन्तु तुम्हारा यों प्रत्येक समय मौन रहना और कुछ न कहना?'

'क्या कहूं?'

'कुछ अपने विषय में कुछ डॉली के विषय में।'

'अपने विषय में कहने के लिए तो कुछ रहा ही नहीं। पंद्रह-बीस दिन की मेहमान हूं, रही डॉली की बात तो वह आपकी पत्नी है। उसके विषय में कुछ कहा तो आपको बुरा लगेगा और ऐसा हुआ भी है।'

'न-नहीं शिवा!'

'भैया!' शिवा फिर बोली- 'यह तो संसार का नियम है और अधिकांश परिवारों में यही होता है। लोग विवाह के पश्चात अपनी पत्नी के होकर रह जाते हैं और बहनों को भूल जाते हैं। यदि आप भी ऐसा ही कर रहे हैं तो इसमें बुरा क्या है? बहनें तो वैसे भी पराई होती हैं। अपने बाबुल के घर रहना ही कितना होता है जबकि पत्नी तो हमेशा साथ देती है। हमेशा साथ रहती है।' शिवानी के इन शब्दों में अथाह पीड़ा थी।

राज तड़पकर बोला- 'न-नहीं शिवा! ऐसा बिलकुल नहीं है। तुम मेरी बहन हो-तुम मेरे लिए आज भी वही नन्ही गुड़िया हो और मेरे हृदय में तुम्हारे लिए आज भी वही ममता है। यकीन करो-मैं अपनी गुड़िया के लिए संसार के प्रत्येक रिश्ते को ठुकरा सकता हूं। मैं मानता हूं-मैंने डॉली का पक्ष लिया और तुम्हें अनुचित कहा। मैं यह भी मानता हूं कि डॉली के कदम किसी गलत राह पर चल रहे हैं और वह हमें धोखा दे रही है। उसका प्रत्येक सुबह । बन-संवरकर घर से निकलना और संध्या को लौटना मुझे भी पसंद नहीं। अच्छे घरों की औरतें यह सब करती भी नहीं हैं।'

'फिर आप उसे रोकते क्यों नहीं?'

'इसलिए शिवा! क्योंकि बुराई को कभी बुराई से समाप्त नहीं किया जाता, क्योंकि कुमार्ग पर चलने वाले किसी भी व्यक्ति को लड़ाई-झगड़े से सही मार्ग पर नहीं लाया जाता। ऐसा करने से वह व्यक्ति विद्रोही हो जाता है और विद्रोही की भावना उस व्यक्ति से कुछ भी करा सकती है।'
 
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