द्वार खुला था। डॉली ने ऑटोरिक्शा से उतरकर अंदर प्रवेश किया तो दूसरे ही क्षण उसके पांव कांप गए और हृदय अज्ञात की आशंका से धड़क उठा। न जाने राज उसके विषय में क्या सोच बैठे? फिर भी वह धीरे-धीरे आगे बढ़ी और चलकर अपने कमरे में आ गई। उस समय शिवानी किचन में थी और राज वहां न था। यह जानकर डॉली ने संतोष की सांस ली और दर्पण के सामने आकर अपने बाल संवारने लगी।
तभी वह चौंकी। एकाएक किसी ने पीछे से आकर कहा- 'न छेड़ो इन घटाओं को बरस जाएंगी तो क्या होगा?' कहने का अंदाज शायरना था। डॉली फुर्ती से घूम गई। यह राज था जो व्हील चेयर पर बैठा मुस्कुरा रहा था। डॉली उससे बोली- 'क्षमा करना-आने में कुछ देर हो गई। रामगढ़ की दो-तीन सहेलियां मिल गई थीं। शहर घूमने आई थीं।'
'आप भी कमाल करती हैं मैडम! हम तो ऐसे मौसम में घटाओं की बात कर रहे हैं और आप अपनी सहेलियों की बात ले बैठीं।'
'नहीं, मैं तो यह कह रही थी कि...।'
'अब छोडिए भी मैडम! आइए थोडी देर के लिए लॉन में बैठते हैं। देखिए न हवाओं में कितनी ताजगी है और आकाश में बादलों के टुकड़े किस प्रकार गले मिल रहे हैं।'
डॉली चौंक पड़ी। सोचने लगी-राज को एकाएक क्या हुआ? पिछले एक सप्ताह से तो वह उससे इतना नाराज था कि बोलता भी कम था किन्तु आज उसके व्यवहार एवं वाणी में इतनी मधुरता! उसे यों विचारमग्न देखकर राज फिर बोला- 'लगता है देवीजी को हमारा प्रस्ताव पसंद नहीं आया।'
'न नहीं तो।'
'तो आओ न।'
'कहां?'
'लॉन में अथवा कहीं भी खुले आकाश के नीचे।'
'ठीक है।' इतना कहकर डॉली ने ब्रुश रख दिया और पीछे से व्हील चेयर को थाम लिया। इसके उपरांत वह राज को लेकर लॉन में आ गई। राज ने झूठ न कहा था-मौसम अच्छा था। ताजगी भरी हवाएं चल रही थीं और छोटे से लॉन में उगे फूलों के पौधे यूं झूम रहे थे मानो नृत्य कर रहे हों।'
राज ने डॉली का हाथ अपने हाथ में ले लिया और फिर मुस्कुराते फूलों को ध्यान से देखते हुए उसने डॉली से पूछा- 'डॉली कैसा लग रहा है यह सब?'
'क्या?'
'ये हंसते-खिलखिलाते फूल, ताजा हवाएं और आकाश में आंख-मिचौली खेलते बादल।'
'अच्छा तो है।'
'क्या यह सब देखकर तुम्हें ऐसा नहीं लगता कि प्रकृति हम इंसानों से कहीं अधिक बुद्धिमान और समझदार है। हम लोग तो छोटी-छोटी पीड़ाओं से घबराकर जीवन को बोझ समझ बैठते हैं और अपने आपको उदासी की धुंध में छुपा लेते हैं किन्तु यह प्रकृति, क्या तुमने इसे कभी आंसू बहाते देखा है? किसी से नाराज होते देखा है? आंधियां तो प्रकृति के लिए भी आती है-तूफान तो इसे भी झकझोर डालते हैं, किन्तु यह प्रकृति कभी दुखी हुई?'
डॉली बोली- 'आज यह कविता क्यों?'
'डॉली! यह कविता नहीं बल्कि सच्चाई है। हमें हंसना चाहिए, मुस्कुराना चाहिए इन फूलों की भांति। ऐसा नहीं कि हम जीवन को बोझ समझ बैठें और जो हमारे अपने हैं उन्हें भी अपना न समझें।'
'जी।'
'तो फिर एक वादा करो डॉली!'
'वह क्या?'
'यह कि हम एक-दूसरे से कभी नाराज न होंगे।'
'मैं कहां नाराज होती हूं।'
'चलो मैंने माना कि मैं नाराज होता हूं किन्तु भविष्य में हमारा प्रयास यह होना चाहिए कि हम एक-दूसरे को नाराज न करें।'
'जी।' डॉली ने सिर्फ इतना ही कहा। राज का अभिप्राय वह जान गई थी।
राज बोला- 'तो आओ बैठो।'
डॉली बैठ गई। राज के व्यवहार पर उसे अब भी आश्चर्य हो रहा था। उसी समय शिवानी वहां आई और चाय की ट्रे मेज पर रखकर जाने लगी। राज ने उसे पुकारा- 'शिवा!'
शिवानी रुक गई। डॉली की ओर नजरें भी न उठीं। चेहरे पर नाराजगी के भाव थे।
राज ने पूछा- 'चाय न लोगी?'
'मैं ले चुकी हूं।' शिवानी धीरे से बोली।
'कब?'
'अभी कुछ देर पहले।'
'तो बैठो न।'
'मैं खाने की तैयारी कर रही हूं।' शिवानी ने शुष्क लहजे में कहा और वहां से चली गई।
उसके जाते ही राज ने डॉली से कहा- 'यह लड़की बहुत संवेदनशील है। इसके हृदय में ऐसी बातें भी चोट कर जाती हैं जो साधारण होती हैं।'
'जी।' डॉली ने इतना ही कहा। शिवानी की नाराजगी वह समझती थी।
'चाय लो।'
डॉली ने प्याला उठा लिया।
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