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स्पर्श ( प्रीत की रीत )

'तो क्या मैं समझू कि...।'

'नहीं शिवा! ऐसा बिलकुल नहीं कि मैं उसकी ओर से हमेशा आंखें बंद किए रहूंगा। मैं उसकी प्रत्येक गतिविधि पर नजर रख रहा हूं। मैंने उसके पीछे अपना एक आदमी भी लगा दिया है जो यह देखता है कि वह कहां जाती है और किन-किन लोगों से मिलती है।'

शिवा ने कहा- 'फिर आप उसे रंगे हाथों क्यों नहीं पकड़ते? आप उसकी गलतियों को क्यों नजरअंदाज कर रहे हैं?

'नहीं-अभी यह उचित नहीं शिवा! और फिर यह भी तो हो सकता है कि डॉली वास्तव में गलत न हो और हम ही उसके विषय में गलत सोच रहे हों। सुनी-सुनाई बातों पर विश्वास करना भी तो ठीक नहीं।'

'तो क्या यह नाटक हमेशा चलता रहेगा?'

'यह कैसे हो सकता है? नाटक कितना भी लंबा क्यों न हो किन्तु एक-न-एक दिन तो उसे खत्म होना ही पड़ता है। उसी प्रकार से यह नाटक भी एक दिन समाप्त हो जाएगा।'

'आप जानें भैया!' शिवा बोली- 'मैंने तो डॉली से इस संबंध में कहना ही छोड़ दिया है।' इतना कहकर शिवानी वहां से चली गई।

राज ने प्याला उठा लिया।

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डॉली ने चौक से पहले ही ऑटोरिक्शा छोड दिया और घर की दिशा में बढ़ने लगी। उसका मन आज पहले से भी अधिक अशांत था। अशांति का कारण यह न था कि उसके जीवन के एक किनारे पर जय खड़ा था और दूसरे पर राज। एक उसका पति था और दूसरा उसके जीवन का पहला प्रेम। एक ओर समाज का बंधन था तथा दूसरी ओर भावनाओं का तूफान। उसे इन दोनों में से अंततः किसका चुनाव करना था—यह उसने अभी सोचा भी न था। उसकी अशांति का मुख्य कारण तो यह था कि वह अपने जेवरों में से । एक जेवर बेच आई थी और राज उससे जेवरों की मांग कर रहा था।

वह किसी-न-किसी बहाने बिके हुए जेवरों की बात छुपा भी सकती थी। असली बात तो यह थी कि यदि वह राज को समस्त आभूषण सौंप देगी तो उसके पास क्या शेष रहेगा? जय का मुकदमा तो अभी चल रहा था और उसके लिए

अभी और भी पैसों की जरूरत थी। समस्त आभूषणों के हाथों से निकल जाने पर तो वह कहीं से एक भी पैसा का प्रबंध नहीं कर सकती थी। डॉली समझ न पा रही थी कि ऐसी स्थिति में वह क्या करे। यही सब सोचते-सोचते वह घर पहुंची। राज उस समय लॉन में बैठा चाय का प्याला खाली कर रहा था। डॉली उसके। समीप आई तो वह उससे बोला- 'थक गई हो शायद?'

'हां।'

'ऐसा भी क्या घूमना कि थकान महसूस हो।'

'नहीं-ऐसी थकान भी नहीं।'

'खैर, चाय लोगी?'

'नहीं, अभी नहीं।'

‘सिर में दर्द होगा?'

'किन्तु ऐसा भी नहीं कि सहन ही न हो।'

'आज मुझे विवाह के लिए कुछ सामान खरीदना था। तुम जल्दी लौट आतीं तो ठीक रहता।'

'आपको सुबह ही कह देना चाहिए था। मेरे लिए बाहर जाना इतना आवश्यक भी न था।' डॉली ने कहा और राज के सामने रखी पत्रिका उठाकर वह उसके पन्ने उलटने लगी।

राज उसे ध्यान से देख रहा था। बोला- 'मेरे विचार से तुम्हारा बाहर जाना आवश्यक था। आवश्यक न होने पर कोई बाहर नहीं जाता। हो सकता है घर रहने से तुम्हारे सिर में दर्द रहता हो। बुरा न मानना-कुछ लोगों को यह बीमारी होती है कि घर में नहीं रह सकते। उनके लिए बाहर रहना और इधर-उधर घूमना आवश्यक होता है।'

डॉली ने राज के इन शब्दों पर कोई ध्यान न दिया और बातों का विषय बदलकर बोली 'अंदर न चलेंगे?'

'क्यों?'

'सर्दी बढ़ रही है।'

'अभी ऐसा मौसम कहां। तुम्हें शायद थकान की वजह से महसूस हो रही हो। वैसे कल तो घर ही रहोगी न?'

'आप कहते हैं तो।'

'नहीं।' राज ने चाय समाप्त करके प्याला रख दिया और बोला- 'मेरी ओर से ऐसा कोई प्रतिबंध नहीं। यह तो तुम्हारे मन की बात है। मन न लगे तो घूम आना।'

'कोई काम होगा?'

'हां। सोच रहा था-कल तुम्हें साथ लेकर वह आभूषण रख दूं। शादी में बहुत थोड़ा समय रह गया है।'

डॉली फिर कांप गई किन्तु उसने तुरंत ही अपनी घबराहट पर काबू कर लिया और बोली- 'क्या कल ही आवश्यक है?'

'कहीं जाओगी?'

'यों ही पूछ बैठी।'

'परसों सही-मैं छुट्टी कर लूंगा।'

'ठीक है।' डॉली ने फंसे-फंसे स्वर में कहा और उठकर राज की व्हील चेयर थाम ली।

राज बोला- 'रहने दो न।'

'अदंर न चलेंगे?'

'अंदर तो चलूंगा किन्तु तुम मेरे लिए कष्ट न करो।'

'कष्ट कैसा?' आपकी सेवा करना तो मेरा धर्म है।'

राज ने यह सुनकर घृणा से दांत पीस लिए किन्तु फिर शांत लहजे में बोला- 'हां यह तो है।'
 
डॉली ने फिर कुछ न कहा और राज की व्हील चेयर को धकेलते हुए वह कमरे की ओर बढ़ने लगी। उसके दिलो-दिमाग पर अब भी उलझनों की धुंध छाई हुई थी। और यह धुंध उस समय भी थी जब वह रात के खाने के पश्चात बिस्तर पर लेटी किन्तु वह कुछ सोच पाती उससे पूर्व ही राज ने उसे अपनी ओर खींच लिया और उसपर झुककर बोला 'नींद आने लगी?'

'नहीं-अभी नहीं।' डॉली ने उत्तर दिया।

'अच्छा एक बात पूछू?'

'वह क्या?'

'क्या तुम्हारी भावनाएं कभी नहीं मचलती?'

'किस प्रकार की भावनाएं?'

'एक-दूसरे के अस्तित्व में समा जाने की-एक-दूसरे को प्यार करने की भावनाएं।'

'नहीं।'

'यह कैसे हो सकता है? इस प्रकार की भावनाएं तो पशु-पक्षियों के हृदय में भी उमड़ती हैं।'

'मेरे साथ वास्तव में ऐसा ही है। शायद इसका कारण यह है कि मैंने इस विषय में कभी सोचा ही नहीं। शायद इसका कारण यह है कि मैंने आरंभ से ही पीड़ाएं देखी हैं।'

'किन्तु।' डॉली के मस्तक पर फैले बालों को पीछे हटाते हुए राज बोला- 'अब तो तुम्हारे जीवन में कोई पीड़ा नहीं। अतीत बीत चुका है और वर्तमान सामने है।'

डॉली बोली- 'वही बीता हुआ अतीत तो दु:ख देता है।'

'भूल जाओ न उसे।'

'काश! यह इतना सरल होता।'

'किन्तु तुम यह क्यों नहीं सोचतीं कि अब तुम्हारी एक अलग दुनिया है और उस दुनिया में मैं भी तुम्हारे साथ हूं। अपने लिए नहीं तो कम-से-कम मेरे लिए तो तुम्हें सब कुछ भूल जाना चाहिए।'

'कोशिश करूंगी।'

'कब?'

'जब मन की उलझनों से मुक्ति मिलेगी।'

राज ने यह सुनकर दीर्घ निःश्वास ली और बोला- 'बहुत मुश्किल है तुम्हें समझना।' कहकर उसने करवट बदल ली।'

डॉली ने पूछा- 'क्यों-नींद आने लगी?'

'और क्या करूं?' राज ने पूछा। स्वर में नाराजगी थी।

'मैंने आपको तो कुछ नहीं कहा। मैंने आपकी भावनाओं से तो खिलवाड़ नहीं किया।' 'आप तो नाराज हो गए।'

'डॉली! संबंध प्रेम का हो अथवा वासना का। यह आग तभी अच्छी लगती है-जब दोनों ओर लगी हो और मैंने आरंभ से ही देखा है कि तुम्हारे हृदय में वह आग कभी नहीं भड़की। ऐसे क्षणों में तुमने परायों जैसा ही व्यवहार किया है।'

'प्रयास करूंगी कि फिर ऐसा न हो।'

'क्या मतलब?'

'करीब तो आइए।'

राज को डॉली के इन शब्दों से प्रसन्नता हुई और उसने करवट बदल ली। तभी डॉली ने उसे अपने ऊपर खींच लिया और उसके गले में बांहें डालकर उसके होंठों से अपने होंठ सटा दिए।

राज के अस्तित्व में वासना का तूफान चीख उठा।

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डॉली ने अगली सुबह एक निर्णय लिया और उसने सेफ में रखे आभूषणों में से एक और आभूषण निकालकर शेष आभूषण राज के सामने रख दिए। उस समय शिवानी भी वहीं थी।

आभूषणों को देखते हुए उसने राज से कहा 'भैया! इनकी संख्या तो दस थी। इस समय तो आठ ही हैं।'

डॉली ने कहा- 'दो मेरे पास हैं-मैंने उन्हें अलग रख दिया है।'

'भैया! देखना वह कौन से हैं? शायद उनकी कीमत कुछ अधिक हो।' शिवानी फिर बोली। उसके शब्दों में डॉली के प्रति संदेह की झलक थी।

राज ने भी उसकी बात का समर्थन किया। वह बोला- 'डॉली! दिखा सकोगी उन्हें?'

डॉली कुछ भी न कह सकी। चेहरा झुक गया-कंठ सूख गया और चेहरे पर सन्नाटा फैल गया। उसे समझते देर न लगी कि शिवानी उस पर संदेह कर रही थी। यह भी हो सकता है कि शिवानी को सच्चाई का पता चल गया हो। शिवानी उसके चेहरे के एक-एक भाव को पढ़ने का प्रयास कर रही थी। राज भी उसी की ओर देख रहा था। वह फिर बोला- 'तुमने कोई उत्तर नहीं दिया डॉली!'

'आपको जेवर तो दे दिए।'

'मैं उनकी बात कर रहा हूं जो तुम्हारे पास हैं।'

'और।' शिवानी बोली- 'यह भी सच है कि भैया उन्हें लेंगे नहीं, देखकर लौटा देंगे।'

'देखने की आवश्यकता ही क्या है?'

'किन्तु इसमें आपत्ति भी क्या है?'

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..

'वो दो आभूषण मैंने अपने लिए रखे हैं। क्या मुझे इतना भी अधिकार नहीं कि इनमें से दो आभूषण अपने लिए न रख सकू?'

राज बोला- 'डॉली! बात अधिकार की नहीं, उन्हें देखने की है। और इसमें कोई बुराई भी नहीं।'

डॉली ने इस बार साहस से काम लिया और शिवानी को कनखियों से देखते हुए घृणा से कहा- 'बात बुराई की नहीं। असली बात यह है कि मुझ पर संदेह किया जा रहा है। मेरे विषय में यहां तक सोचा जा रहा है कि या तो मैंने वो आभूषण किसी को दे डाले हैं अथवा बेच दिए

'यह संभव है।' शिवानी अपना संदेह न छुपा सकी और कह गई।

डॉली ने यह सुनकर क्रोध से दांत पीस लिए और विद्रोहपूर्ण स्वर में बोली 'यदि यह संभव है तो इसके अतिरिक्त और भी बहुत-सी बातें संभव हो सकती हैं। मैं यह भी कह सकती हूं कि तुमने मेरी अनुपस्थिति में यह सेफ खोली और उसमें से दो आभूषण निकालकर किसी को दे दिए।'

'डॉली!' राज चिल्लाया।

'आप मत बोलिए। यदि शिवानी मुझ पर संदेह कर सकती है तो मैं भी उस पर संदेह कर सकती हूं।' डॉली चिल्लाई- 'बल्कि अब तो मैं यही कहूंगी कि ऐसा ही हुआ है। शिवानी ने मेरे दो आभूषण चुराए हैं।'

यह सुनकर राज के चेहरे पर सन्नाटा फैल गया।

जबकि शिवानी क्रोध के कारण पागल-सी हो गई और घृणा से चिल्लाई- 'नीच! कमीनी! तू बेघर, बेसहारा थी-मैंने तुझे अपने घर में शरण दी। सहारा दिया। तुझे अपना माना-तुझे हृदय से लगाया और तुझसे जन्म भर का रिश्ता जोड़ा और तूने मुझे उसके बदले में दिया तो यह रिश्तों का दर्द-जीवन-भर की पीड़ा। तूने–तूने तो एक ही पल में सारे रिश्ते तोड़ दिए। मेरा एक-एक उपकार भुला दिया तूने।'

'तूने मुझे पर कोई उपकार नहीं किया।' डॉली भी चुप न रही और चिल्लाई- 'और यह भी झूठ है कि तूने मुझे सहारा दिया। सच तो यह है कि तेरे मन में आरंभ से स्वार्थ की भावना थी। तू मुझे आरंभ से ही अपने भैया के लिए पसंद कर रही थी। तू बहू बनाना चाहती थी मुझे अपने घर की। तूने मुझसे एक-दो बार पूछा भी था कि भैया तुझे कैसे लगते हैं। सच्चाई यह है कि तूने सब कुछ अपने स्वार्थ के लिए किया है।' इतना कहकर वह मुड़ी और तेज-तेज पग उठाते हुए कमरे से बाहर चली गई।

राज सन्नाटे जैसी स्थिति में बैठा उसे जाते देखता रहा। तभी वह चौंका। निकट खड़ी शिवानी अपना चेहरा घुमाए हौले-हौले सिसक रही थी। राज कुछ क्षणों तक तो उसके आंसुओं को देखता रहा और फिर उसके समीप आकर स्नेह से बोला- 'बुरा मत मानो शिवा! जीवन में कभी-कभी ऐसा भी होता है।'

'भैया!'

'मैं जानता हूं तुम पर झूठा आरोप लगाया गया है। मैं यह भी जानता हूं कि डॉली ने अपना अपराध छुपाने के लिए तुम्हें अपराधी ठहराया है और जब यह सब मैं जानता हूं तो तुम्हें डॉली की बातों का बुरा नहीं मानना चाहिए।'

'भैया! मैं नहीं जानती थी कि...।'
 
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'जीवन में यही तो होता है शिवा! प्रायः वही होता है जो हम नहीं जानते। प्रायः दर्द भी उन्हीं से मिलता है जिन्हें हम अपना मानते हैं। दर्द कभी गैरों से नहीं मिलता। जाओ-अब नाश्ता ले आओ, मुझे देर हो रही है।'

शिवानी ने अपने आंसू पोंछ लिए और बाहर चली गई।

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जय के मुकदमे का दिन।

विटनेस बॉक्स में खड़ा जय आज भी एकटक नजरों से डॉली को देख रहा था और अगली पंक्ति में बैठी डॉली की आंखों में आंसुओं की बूंदें झिलमिला रही थीं। हरिया एवं चौधरी भी वहीं थे।

उचित समय पर अदालत की कार्यवाही शुरू हुई। सरकारी वकील मिस्टर हेगड़े ने अपने स्थान से उठकर जज महोदय को संबोधित किया 'मीलॉर्ड! अब मैं यह मुकदमे से संबंधित चंद गवाह पेश करने की इजाजत चाहता हूं।'

'इजाजत है।'

'थॅंक मीलॉर्ड!' मिस्टर हेगड़े ने कहा- 'मेरा सबसे पहला गवाह हरिया है और यह वो चश्मदीद गवाह है जिसने अपनी आंखों से मुलजिम जय को जमींदार कृपाल सिंह पर गोलियां चलाते देखा है।'

हरिया अदालत में पेश हुआ। विटनेस बॉक्स में आकर उसने एक नजर चौधरी पर डाली और इसके उपरांत जज महोदय की ओर देखकर वह बोला- 'हुजूर! यूं तो मेरा नाम हरिराज है-किन्तु लोग मुझे हरिया ही कहते हैं।'

'तुम्हें अपनी गवाही में क्या कहना है?'

'हुजूर! सबसे पहले तो मुझे यही कहना है कि जमींदार साहब का खून छोटे मालिक अर्थात् जय साहब ने किया है। दरअसल हुजूर! उस रात छोटे मालिक लगभग दस बजे रुद्रपुर से लौटे थे। आते ही मुझसे बोले- 'हरिया क्या यह सच है कि मेरे पिता अपनी कुल संपत्ति दीना की। भतीजी डॉली के नाम लिख रहे हैं।' हुजूर! मैं तो इस संबंध में कुछ जानता न था किन्तु मुझे इतना पता था कि जमींदार साहब कभी-कभी डॉली को लेकर शहर आते थे और अपने ही मकान में रहते थे।'

डॉली यह सुनकर चौंक गई।

जबकि जय अपने क्रोध पर नियंत्रण न रख सका और गला फाड़कर चिल्लाया- 'यह झूठ है जज साहब! यह हरामजादा झूठ बोल रहा है। मेरी डॉली गंगा एवं गीता की तरह पवित्र है। डॉली के किसी से अनैतिक संबंध नहीं हो सकते।'

'ऑर्डर-ऑर्डर।' जज साहब ने मेज की टॉप पर हथौड़ा बजाया और जय से बोले- 'मुलजिम जय! तुम्हें यह ताकीद की जाती है कि तुम बीच में कुछ न बोलोगे।'

जय खून जैसा यूंट पीकर रह गया।

'बयान जारी रहे।'

हरिया ने इस बार अपने कंठ में अटके थूक को निगला और कहा- 'तो हुजूर! मैं यह कह रहा था कि मुझे जमींदार साहब के इरादे का कुछ पता न था। मेरा उत्तर सुनकर छोटे मालिक उसी वक्त अपनी गाड़ी में बैठे और रामगढ़ चले गए। फिर वह लौटे कोस होने पर, काफी गुस्से में थे। मुझे यह समझते देर न लगी कि रामगढ़ में बाप-बेटे के बीच कोई झगड़ा हुआ है। थोड़ी देर बाद जमींदार साहब भी वहीं आ गए। उनके साथ डॉली भी थी।'

यह सुनकर जय फिर चिल्लाया- 'जज साहब! यह झूठ है। यह बकवास है। यह हरामजादा झूठी गवाही दे रहा है। सच्चाई यह है कि डॉली मेरे पिता के साथ नहीं बल्कि मेरे साथ आई थी।'

'ऑर्डर...ऑर्डर।' जज साहब ने हथौड़ा बजाया और बोले- 'मुलजिम जय! यदि तुमने फिर गवाह को बयान देने से रोका तो अदालत तुम्हारे साथ सख्ती से पेश आ सकती है। बयान जारी रहे।'

जय ने चेहरा झुका लिया।

डॉली घृणा से दांत पीसती रही।
 
चौधरी मुस्कुराता रहा और हरिया ने फिर कहा 'मैं यह कह रहा था हुजूर! कि जमींदार साहब डॉली को लेकर वहां आए और सीधे अंदर वाले कमरे में चले गए। थोड़ी देर बाद छोटे मालिक भी वहां पहुंच गए। मैं उस वक्त दरवाजे में खड़ा था और जानता था कि पिता-पुत्र के बीच झगड़ा अवश्य होगा और यही हुआ। छोटे मालिक ने अपने पिता के सामने संपत्ति की बात रखी। जमींदार साहब ने गुस्से में कहा कि संपत्ति उनकी है और वह उसे किसी के भी नाम लिख सकते हैं। बस हुजूर! बातों में बात बढ़ गई और यहां तक बढ़ी कि छोटे मालिक ने अपनी रिवाल्वर निकालकर जमींदार साहब को गोली मार दी।'

'उसके पश्चात क्या हुआ?'

'होना ही क्या था हुजूर!' हरिया बोला 'जमींदार साहब का खून हो गया और छोटे मालिक डॉली का हाथ पकड़कर उसे अपने कमरे में ले गए। यह देखकर मैं उसी वक्त थाने पहुंचा और मैंने इस खून की सूचना दी।' इतना कहकर हरिया ने अपनी बात समाप्त की।

जज महोदय ने कपूर साहब से पूछा- 'क्या सफाई पक्ष के वकील गवाह से क्रास क्वेश्चन करना चाहेंगे?'

'यस युअर ऑनर!' इतना कहकर कपूर साहब आगे बढ़े और हरिया के सामने आकर बोले 'तुम्हारा नाम?'

'हरिया-पिता का नाम दाताराम और गांव रामगढ़।'

'हरिया! तुमने अपने बयान में बताया कि जमींदार साहब के डॉली से अवैध संबंध थे और वह कभी-कभी डॉली को लेकर शहर आते थे।'

'बिलकुल।'

'तुम! डॉली के चाचा दीना को जानते थे?'

'बिलकुल जानता था।'

'फिर तो तुम यह भी जानते होगे कि जिस समय जमींदार साहब का खून हुआ उससे पहली रात जमींदार साहब के गुंडों ने दीना को पीट-पीटकर मार डाला था और उसकी लाश झाड़ियों में फिकवा दी थी।'

हरिया इस प्रश्न पर उलझकर रह गया और बोला- 'नहीं वकील साहब! यह सब मैं नहीं जानता।'

'खैर, तुम रामगढ़ कब गए थे?'

'जिस दिन जमींदार साहब का खून हुआ, उससे एक महीना पहले।' यह सुनकर कपूर साहब के होंठों पर मद्धिम-सी मुस्कुराहट फैल गई। जज महोदय की ओर देखकर वह बोले- 'प्वाइंट नोट किया जाए युअर ऑनर! सच्चाई यह है कि हरिया उस रात बारह बजे से लेकर दो बजे तक रामगढ़ में रहा और तीन बजे लौटा।'

'ऑब्जेक्शन मीलॉर्ड!' हेगड़े चिल्लाया- 'मेरे विद्वान मित्र गवाह से ऐसे प्रश्न पूछ रहे हैं जिनका इस मुकदमे से कोई संबंध नहीं।'

'संबंध है युअर ऑनर!' कपूर साहब उससे भी अधिक शक्ति से चिल्लाए 'मेरे इस प्रश्न का मुकदमे से सीधा संबंध है।

सच्चाई यह है युअर ऑनर कि उस रात जब मेरा क्लाइंट अपनी गाड़ी लेकर रामगढ़ गया तो हरिया एक अन्य मार्ग से उससे पहले ही रामगढ़ पहुंच गया और वहां चौधरी दिलावर सिंह से मिला। मैं गवाह से पूछना चाहता हूं कि उसका चौधरी दिलावर सिंह से क्या संबंध था?'
 
हरिया को बताना पड़ा- 'हुजूर! मेरा चौधरी साहब से इतना ही संबंध था कि मैं लगभग एक वर्ष पहले उन्हीं की हवेली में काम करता था।'

'थॅंक हरिया!' कपूर साहब बोले- 'और अब तुम यह बताओगे कि जब तुम रामगढ़ से लौटे तो उस समय तुम्हारे साथ कौन था?'

'क-कोई भी नहीं।'

'तुम झूठ बोलते हो हरिया! सच्चाई यह है कि रामगढ़ से तुम चौधरी को अपने साथ लेकर आए थे और उसे तुमने अपने कमरे में छुपा दिया था। जिस वक्त जमींदार साहब वहां पहुंचे, चौधरी । उस वक्त भी तुम्हारे कमरे में तुम्हारी चारपाई के नीचे छुपा था। और इस बात का प्रमाण है यह छुरा जो चौधरी भूले से तुम्हारे कमरे में ही छोड़ आया था।' इतना कहकर कपूर साहब ने अपने वस्त्रों के अंदर से सफेद कपड़े में लिपटा एक छुरा निकाला और उसे जज साहब तक पहुंचाकर वह गर्व से बोले- 'युअर ऑनर! इस छुरे के साथ फिंगरप्रिंट एक्सपर्ट मिस्टर राय की रिपोर्ट भी है। अदालत चाहे तो इस छुरे पर पाए गए उंगलियों के निशानों को हरिया एवं चौधरी दिलावर सिंह की उंगलियों के निशानों से मिला सकती है। छुरे पर हरिया की उंगलियों के निशान भी हैं और वो इसलिए हैं क्योंकि मेरे क्लाइंट के गिरफ्तार होने के पश्चात हरिया ने इसे उठाकर अपने संदूक में रखा था।'

यह देखकर चौधरी का मस्तिष्क सन्नाटे में डूब गया और हरिया अपनी घबराहट छुपाने के लिए इधर-उधर देखने लगा।

अदालत में कुछ क्षणों के लिए सन्नाटा रहा।

इस सन्नाटे को फिर भी कपूर साहब की आवाज ने तोड़ा-अपनी ऐनक को दुरुस्त करते हुए वह जज महोदय से बोले- 'युअर ऑनर! सच्चाई यह है कि चौधरी दिलावर सिंह एवं जमींदार साहब के बीच पिछले दो वर्षों से एक खेत को लेकर मुकदमा चल रहा था और उस मुकदमे के कारण दोनों एक-दूसरे के खून के प्यासे बने हुए थे। चौधरी किसी भी ढंग से जमींदार साहब का खून कर देना चाहता था और इसके लिए उसने हरिया को भी अपनी ओर मिला रखा था।

'किन्तु युअर ऑनर! मैं इस बात को आगे बढ़ाने से पहले अदालत को यह भी बताना चाहता हूं कि डॉली का इस मुकदमे से क्या संबंध है। यह इसलिए भी आवश्यक है क्योंकि गवाह नंबर एक अपने बयान में कई बार डॉली का नाम दोहरा चुका है। दरअसल युअर ऑनर! लगभग दो वर्ष पहले जब डॉली के माता-पिता का स्वर्गवास हो गया तो रामगढ़ का दीना उसे अपने साथ ले गया। दीना उसका दूर के रिश्ते का चाचा था किन्तु दीना ने डॉली की इस विवशता का अनुचित लाभ उठाया और फिर एक दिन जमींदार कृपाल सिंह के हाथों उसका सौदा कर दिया। जिस सुबह जमींदार साहब का खून हुआ उस सुबह उन्हें बारात लेकर दीना के घर पहुंचना था और डॉली को अपनी दुल्हन बनाना था किन्तु हुआ यह कि डॉली बारात आने से पूर्व ही रात के समय रामगढ़ से निकल भागी। डॉली को रामगढ़ में न पाकर जमींदार साहब ने दीना को अपने घर बुलाया और उसे इतना मारा कि उसका प्राणांत हो गया। इसके पश्चात दीना का दाह-संस्कार भी कर दिया गया। यह बात पुलिस तक इसलिए न पहुंची क्योंकि गांव वाले जमींदार साहब से डरते थे। गांव में केवल चौधरी ही ऐसा था जो इस घटना की सूचना पुलिस को दे सकता था किन्तु वह ऐसा कर पाता उससे पहले ही हरिया उसके पास पहुंच गया।'

इतना कहकर कपूर साहब एक पल के लिए रुके और फिर बोले– 'युअर ऑनर! अब यह कहानी दूसरी ओर मुड़ती है। उसी रात मेरा । क्लाइंट रुद्रपुर से यहां आता है। उसने हरिया से अपने पिता के विषय में पूछा तो हरिया ने उससे जमींदार साहब के विवाह की बात बताई। मेरे क्लाइंट को यह अच्छा न लगा और वह उसी समय इस विवाह को रोकने के लिए रामगढ़ के लिए चल पड़ा। यह देखकर हरिया तुरंत रामगढ़ पहुंचा और उसने चौधरी से पूरी बात बताई। दरअसल हरिया जानता था कि अब इस विषय को लेकर पिता-पुत्र के बीच झगड़ा हो और वह इस अवसर का लाभ उठाए। योजनानुसार चौधरी को उनमें से एक का खून करना था और दूसरे को जेल भिजवाना था किन्तु हुआ यह कि मेरा क्लाइंट उस रात रामगढ़ न पहुंचा और चौधरी की यह योजना खटाई में पड़ गई और मेरा क्लाइंट रामगढ़ इसलिए न पहुंच सका-क्योंकि मार्ग में उसे डॉली मिल गई थी। डॉली कहीं इस दु:ख से घबराकर आत्महत्या न कर बैठे-यह सोचकर मेरे क्लाइंट ने रामगढ़ जाने का विचार त्याग दिया और डॉली को लेकर यहां स्थित अपने पिता के मकान पर आ गया। हरिया एवं चौधरी उससे पहले ही यहां आ चुके थे। अब प्रश्न यह उठता है कि चौधरी यहां क्यों आया? युअर ऑनर! इसके पीछे मुख्य कारण यह था कि जमींदार के हाथों दीना का खून हो चुका था और इस घटना के कारण जमींदार को रामगढ़ रुकना न था। चौधरी यह सब जानता था। चौधरी यह भी जानता था कि जमींदार सीधे शहर में स्थित अपने मकान पर पहुंचेंगे-बेटा भी वहीं होगा और वहां पिता-पुत्र के बीच झगड़ा अवश्य होगा। मैं पहले ही अर्ज कर चुका हूं कि चौधरी पिता-पुत्र के झगड़े का लाभ उठाना चाहता था अर्थात् वह एक ही तीर से दो शिकार करना। चाहता था। 'और यही हुआ। जमींदार सुबह होते ही रामगढ़ से यहां आ गए। संयोगवश जय उस समय मकान में न था और वो डॉली की जिम्मेदारी हरिया पर छोड़कर कुछ देर के लिए बाजार चला गया था। जमींदार को वहां जय तो न मिला-किन्तु डॉली मिल गई। डॉली को देखकर उन्हें खुशी हुई और उन्होंने उसे अपनी वासना का शिकार बनाना चाहा। तभी मेरा क्लाइंट वहां पहुंच गया। उसने अपने पिता को ऐसा करने से रोका और उसी समय चौधरी ने खिड़की के पीछे से छुपकर जमींदार को गोली मार दी।

'यह देखकर मेरा क्लाइंट तुरंत कमरे से निकला और उसने हत्यारे को तलाश किया, किन्तु चौधरी उससे पहले ही बाहर जा चुका था। यह देखकर हरिया ने पुलिस को सूचना दी और पुलिस ने वहां आकर मेरे क्लाइंट को गिरफ्तार कर लिया।'

कपूर साहब की बात समाप्त होते ही हेगड़े उठा और हंसकर जज साहब से बोला- 'मीलॉर्ड! यह खुशी की बात है कि मेरे विद्वान मित्र पेशे से वकील होने के साथ-साथ बहुत अच्छे कहानीकार भी हैं। जो कहानी इन्होंने सुनाई है-वह वास्तव में बहुत अच्छी है, किन्तु इस बात को सभी जानते हैं कि कहानियां सिर्फ कहानियां होती हैं और उनका सच्चाई से कोई रिश्ता नहीं होता।'

'युअर ऑनर!' कपूर साहब बोले- 'यह कहानी नहीं बल्कि सच्चाई है। मैं इस कहानी की सत्यता को सिद्ध करने के लिए अदालत में कई सुबूत पेश कर सकता हूं।'

यह सुनकर जज महोदय ने कहा- 'अदालत सफाई पक्ष को आदेश देती है कि वह अगली तारीख पर इस कहानी से संबंधित सुबूत एवं गवाह पेश करे।' इसके पश्चात अदालत की आज की कार्यवाही समाप्त हो गई।

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डॉली आज पहले की भांति निराश न थी। अदालत कक्ष से निकलकर वह कपूर साहब के ऑफिस में पहुंची और बोली- 'अंकल! अब मुझे पूरा विश्वास है कि जय साफ बरी हो जाएगा।'

'किन्तु इस कामयाबी का श्रेय मुझे नहीं-मदान साहब को मिलेगा। आप नहीं जानती-उन्होंने किस-किस ढंग से हरिया एवं चौधरी के खिलाफ सुबूत जुटाए हैं।'

'तो क्या वो छुरा भी?'

'हां, वो छुरा मुझे मदान साहब ने ही दिया था। इसके अतिरिक्त और भी कई सबूत हैं जो मुझे आजकल में मिल जाएंगे।'

'फिर तो...।'

'यूं समझिए कि चौधरी अब खुली हवा में सांस न ले पाएगा। अदालत को यह मानना पड़ेगा कि जमींदार साहब का खून चौधरी ने किया है।'

'थॅंक अंकल!'

'अगली पेशी पर आपकी गवाही जरूरी है। आपको अपनी गवाही में क्या कहना है-यह मैं आपको मदान साहब से मिलने के बाद बता दूंगा। हां, एक बात और है।'

"वह क्या?'

'आपको अभी कुछ रुपयों का प्रबंध और करना होगा।'

'कितने रुपयों का?'

'कुल मिलाकर दस हजार।'

'रुपयों का प्रबंध हो जाएगा।'

'फिर ठीक है। आप मुझसे अगले सप्ताह मिल लें और रुपए अपने साथ लेती आएं।
 
'जी।' डॉली ने कहा और बाहर आ गई। उसके पास अभी एक आभूषण और था और उसे बेचकर वह बड़ी आसानी से इतनी रकम का प्रबंध कर सकती थी।

इसी विषय में सोचती-सोचती वह लगभग एक घंटे बाद घर पहुंची। उस समय घर में राज के दो-तीन दोस्त मौजूद थे। बरामदे में बाजार से खरीदा गया ढेर सारा सामान पड़ा था। शिवानी के विवाह में केवल आठ दिन का समय रह गया था।

शिवानी ने तो उससे बहुत पहले ही बोलना छोड़ दिया था और अब राज भी उससे कम ही बोलता था। घर का वातावरण प्रत्येक समय तनावपूर्ण रहता–किन्तु डॉली इस ओर कोई ध्यान न देती। यंत्रचालित-सी वह घर के कुछ कार्य पूरे करती और फिर खा-पीकर सो जाती।

ड्राइंगरूम में राज एवं उसके दोस्त किसी बात पर ठहाके लगा रहे थे किन्तु डॉली ने इस ओर कोई ध्यान न दिया और वह बरामदे से होकर सीधे अपने कमरे में आ गई। दोपहर ढल चुकी थी और संध्या होने में अभी देर थी। उसी समय राज अंदर आ गया।

डॉली ने उसे देखकर एक पत्रिका उठाई और उसके पन्ने उलटने लगी। राज उसे ध्यान से देखने लगा। कुछ क्षणों उपरांत वह बोला- 'मेरे यह दोस्त चंडीगढ़ से आए हैं।'

'ठीक है।' डॉली ने उसकी ओर देखा भी नहीं और कहा।

'तुमसे मिलना चाहते हैं।'

'क्यों?'

'तुम उनके मित्र की पत्नी हो इसलिए।'

'क्या आप उनसे यह नहीं कह सकते कि अब मेरे और डॉली के बीच संदेह एवं अविश्वास की बहुत ऊंची-ऊंची दीवारें खड़ी हो गई हैं? क्या । आप उनसे यह नहीं कह सकते कि अब मेरे एवं डॉली के बीच पति-पत्नी जैसा कोई संबंध नहीं है?'

'यह बात सच होती तो कह भी डालता।'

'तो फिर सच क्या है?'

'यह कि रिश्ते इतनी आसानी से नहीं टूटते।'

'मुश्किल भी कुछ नहीं होती।'

'अपनी बात कह रही हो?'

'आपकी।' डॉली शुष्क एवं विद्रोहपूर्ण स्वर में बोली- 'और सच्चाई यह है कि यह रिश्ता मेरी नहीं आपकी ओर से टूट रहा है।'

'वह क्योंकर?'

'पूछिए अपने आपसे।' डॉली ने पत्रिका रख दी और बोली- "कितना संबंध है मेरे और आपके बीच पिछले पंद्रह दिनों से? एक ही घर, एक ही छत एवं एक ही बिस्तर पर रहते हुए भी हम एक-दूसरे से बोलना पसंद नहीं करते।'

'कुछ भूलें तो तुमसे भी हुई होंगी।'

'मेरी भूल केवल यह है कि मैंने आपको दो आभूषण नहीं दिए, किन्तु मैं आपसे पूछती हूं कि क्या मेरा इतना अधिकार भी न था।'

'तुम्हारा अधिकार न होता तो वह तुम्हें दिए ही क्यों जाते? मुख्य बात तो यह थी कि तुमने शिवा पर चोरी का आरोप लगाया जबकि आभूषण तुम्हारे ही पास थे।'

'मेरे पास थे और रहेंगे भी। मुझे तो बुरा यह लगा कि शिवानी ने मुझे संदेह एवं अविश्वास की दृष्टि से देखा। शिवानी ने समझा कि आभूषण मैंने बेच दिए हैं।'

'चलो, अब यह सब खत्म करो।'

'नहीं, अब यह सब इतनी सरलता से खत्म न होगा।'

'शिवानी तो चली जाएगी।'

'शिवानी रहे अथवा जाए इससे मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता।' इतना कहकर डॉली उठी और खिड़की के समीप आकर बाहर का दृश्य देखते हुए वह बोली- 'मैंने एक निर्णय लिया है।'

'वह क्या?'

'मैं यहां से चली जाऊंगी।'

यह सुनकर राज के हृदय पर चोट लगी। वह कुछ क्षणों तक तो डॉली का चेहरा देखता रहा और फिर थके से स्वर में बोला- 'कहां?'

'कहीं भी।'

'इस घर को छोड़कर?'

'आप जानते हैं-मेरा इस घर से कभी कोई रिश्ता नहीं रहा।'

'फिर।' राज तड़पकर बोला- 'फिर वह सब क्या था? तुम्हारी मांग में मेरे नाम का सिंदूर, माथे पर मेरे नाम की बिंदिया और हाथ में मेरी प्रीत के कंगन?'

__

'एक धोखा-एक छल और कपट।'
 
राज घायल होकर रह गया। यों लगा मानो डॉली ने सैकड़ों नश्तर उसके हृदय में उतार दिए हों। एक पल मौन रहकर वह बोला- 'और तुम्हारा वह अग्नि के इर्द-गिर्द फेरे लेना-अग्नि को साक्षी करके जीवनभर साथ निभाने का वचन लेना।'

'वह-वह भी एक धोखा था।'

'न-न डॉली! ऐसा नहीं हो सकता। कोई भी भारतीय नारी झूठे फेरे नहीं ले सकती। हिंदुस्तान की संस्कृति में जन्मी और पली कोई भी औरत अग्नि को साक्षी मानकर झूठे वचन कभी नहीं दे सकती। तुम-तुम झूठ बोलती हो डॉली! तुम झूठ बोलती हो।'

'यह सच है राज!'

'सच है।' राज उसे पागलों की भांति देखता रहा। फिर वह आगे बढ़ा और डॉली को भगवान की तस्वीर की ओर मोड़कर उसे झिंझोड़ते हुए बोला- 'तो फिर कहो। कहो भगवान के सामने कि वह सब एक नाटक था। कहो कि तुमने झूठ कहा था। कहो कि तुम्हारी मांग में भरा यह सिंदूर मेरा न था। कहो कि तुम मेरी न थीं।

बोलो, जवाब दो डॉली!'

डॉली ने खामोशी से चेहरा झुका लिया।

उसे यों मौन देखकर राज फिर चिल्लाया 'बोलो डॉली! बताओ। कहो कि तुम मुझे वास्तव में धोखा दे रही थीं। छल रही थीं तुम मुझे दर्द का प्याला पिला रही थीं तुम मुझे रिश्तों के नाम पर। लूट रही थीं तुम मुझे।' कहते-कहते राज की आवाज रुंध गई और आंखों में आंसुओं की बूंदें झिलमिला उठीं। डॉली ने फिर भी कुछ न कहा।

राज ने उसे छोड़ दिया और दर्द भरे अंदाज में बोला- 'और यदि यह सच है। यह सच है तो तुमने ठीक न किया डॉली! इससे तो बेहतर था कि तुम मुझे विष देकर मार डालतीं। छुरा उतार देतीं मेरे हृदय में। या फिर उसी वक्त दूर चली जातीं मेरे जीवन से। कम-से-कम इतनी पीड़ाएं तो न मिलतीं मुझे। वो गम जिसे भुलाने के लिए मैंने तुम्हारा सहारा लिया। वो अतीत जिसे भूलने के लिए मैंने तुम्हारे आंचल में मुंह छुपाया-आज इतनी बड़ी चोट तो न देता मुझे।' राज इससे अधिक न कह सका और आंसुओं को रोकने के लिए अपने होंठों को काटने लगा।

डॉली कुछ क्षणों तक तो वहां खड़ी अपने ही विचारों से लड़ती रही। फिर वह मुड़ी और कमरे से बाहर चली गई।

राज अपनी आंखें पोंछता रहा।

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आने वाली सुबह बहुत उदास थी। राज के लिए भी और डॉली के लिए भी। रात यूं ही बीत गई थी और दोनों में से कोई भी न सो पाया था। राज तो शीघ्र ही तैयार होकर अपने ऑफिस चला गया और डॉली समाचार पत्र उठाकर अपने कमरे में आ गई।

कल शाम राज से बहुत कुछ कह डाला था उसने। कह तो गई थी किन्तु पूरी रात पश्चाताप की अग्नि में जलती रही थी। सोचती रही थी राज से उसे यह सब न कहना चाहिए था। यह ठीक था कि राज से विवाह करना उसकी विवशता रही थी। यह भी सच था कि राज को उसने हृदय से पति न माना था। उसने छला था राज को और आरंभ से ही धोखा दिया था किन्तु फिर भी उसे राज का हृदय न तोड़ना चाहिए था। उससे यह न कहना चाहिए था कि वह वैवाहिक संबंध तोड़ रही है।

असल में यह उसके मन की नहीं, उसकी भावनाओं की दुर्बलता थी, इस विश्वास के पश्चात कि जय साफ छूट जाएगा-डॉली की भावनाओं में एकाएक हलचल मच गई थी। उसने टटोला था अपने अंतर्मन को और तब यह पाया था कि उसे जय के लिए राज को छोड़ना-ही-छोड़ना था। राज से संबंध तोड़े बगैर वह जय के साथ रह भी नहीं सकती थी। किन्तु अभी तो जय जेल में ही था। अभी तो उस पर खून का मुकदमा चल रहा था। सच-जय के छूटने से पहले उसे राज से ऐसी बात कभी नहीं कहनी चाहिए थी।

तभी पल-पल निकट आते किसी के कदमों ने डॉली की विचाराधारा तोड़ दी। अखबार से नजरें हटाकर उसने देखा–यह शिवानी थी। शिवानी निकट आकर बोली- 'कुछ कहना था तुमसे।'

'वह क्या?' डॉली ने पूछा। स्वर वैसा ही था-अपरिचितों जैसा।

'मैंने सुना है तुम यह घर छोड़कर जा रही हो?'

'तुमसे किसने कहा?'

'भैया ने।'

'और क्या कहा?'

'यह कि तुमने विवाह के नाम पर एक नाटक किया था। यह कि तुम्हारा अग्नि के इर्द-गिर्द फेरे लेना और शादी का सुर्ख जोड़ना पहनना-यह सब एक दिखावा था।'

'यह सच है।'

'तो क्या...?'

'अभी मेरा ऐसा कोई इरादा नहीं।'

'इरादा करने से पहले एक बात जरूर सोच लेना।'

'वह क्या?'

'तुमने भले ही उनके साथ विवाह का नाटक किया हो–किन्तु भैया ने तुम्हें वास्तव में चाहा है। बहुत प्यार किया है उन्होंने तुम्हें। और यदि तुमने उनके प्यार को ठुकराया तो वह इस दु:ख को सह न पाएंगे।'

डॉली चुप रही।

शिवानी फिर बोली- 'मैं तुमसे इन बातों के अतिरिक्त एक बात और कहना चाहती हूं।'

'बोलो।'

'ज्योति इसी शहर में है। भैया के जिस मित्र से उसने विवाह किया था उसका देहांत हो चुका है और वह आजकल विधवा का जीवन जी रही है।' डॉली ने सामान्य लहजे में पूछा- 'यह सब तुम मुझसे क्यों कह रही हो?' 'यह बताने के लिए कि ज्योति फिर इस घर की बहू बनना चाहती है और से कई बार मिल चुकी है।'

'इसमें दिक्कत क्या है? तुम्हारे भैया जब भी चाहें उसे अपने घर ले आएं।'

'तुम्हें कोई दुःख न होगा।'

'नहीं।'

यह सुनकर शिवानी उसे कई क्षणों तक आश्चर्य से देखती रही और फिर बोली- 'यह-यह तुम कह रही हो?'

'हां।' डॉली ने कहा और फिर से अखबार देखने लगी। शिवानी को उससे ऐसे उत्तर की आशा न थी। वह उसे कुछ पलों तक तो अचरज एवं घृणा से देखती रही और फिर बोली- 'क्या मैं जान सकती हूं कि तुम ऐसा क्यों चाहती हो?'

'मतलब?'

'तुम यह रिश्ता क्यों तोड़ना चाहती हो?'

'विवशता है मेरी।'

'विवशता कैसी?'

'यह न बता पाऊंगी।'

'तुम मेरी सहेली हो–क्या इस नाते भी तुम मुझसे अपनी विवशता न बताओगी?'

'तुम भली प्रकार जानती हो कि अब हम दोनों के बीच ऐसा कोई रिश्ता नहीं।'

'चलो।' शिवानी बोली- 'मित्र न सही-दुश्मन समझकर बता दो।'

'समय आने पर बता दूंगी।'

'समय कब आएगा?'

'यह मैं नहीं जानती।'

'तो फिर।' शिवानी इस बार उसके समीप बैठ गई और नम्रता से बोली- 'मेरी एक विनती मान लो।'

'वह क्या?'

'यहां से जाने का नाम न लो। तुम जानती हो कि मैं अगले सप्ताह यहां से चली जाऊंगी और यदि तुम भी चली गईं तो भैया बिलकुल अकेले रह जाएंगे। उनके ऐसे बहुत से कार्य हैं जिन्हें वे स्वयं नहीं कर पाते और उनके लिए उन्हें दूसरों का सहारा लेना पड़ता है। यदि तुम्हारा सहारा भी छूट गया तो वह किसका सहारा लेंगे?'

'इसके लिए ज्योति जो है।'

'किन्तु भैया उससे घृणा करते हैं।'

'वह चाहें तो इस घृणा को प्रेम में भी बदल सकते हैं।'

'डॉली! यह संभव नहीं। समझने की कोशिश करो-ज्योति ने उन्हें ऐसे जख्म दिए हैं जो कभी नहीं भर सकते। एक तुम ही हो जो उनके जख्मों को भर सकती हो।'

यह सुनकर डॉली ने कुछ न कहा और वह सोचने वाले अंदाज में अपने होंठों को काटने लगी।
 
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