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स्वाहा

से भी लम्बे फल का यह चाकू खोलकर उसेने जमीन पर रख दिया और अपने बन्दर को इशारा किया।

बन्दर हरकत में आया और चाकू अपने मुंह में दबाकर बड़ी फुर्ती से रस्सी पर चढ़ गया। यह गया और वह आया का प्रदर्शन करते बन्दर उसी तेजी से लौट भी आया था। पर अब वह बाबू उसके मुंह में नहीं था। वह खामोशी से राजू मदारी के पास आ बैठा।

राजू मदारी ने आंखें बन्द की और तेजी से कुछ पढ़ने लगा ।

"कुछ देर बाद उसने आंखे खोली तो उसकी बड़ी-बड़ी आंखों में खून उतरा आ था। उसकी आंखें ऐसी खौफनाक नजर आ रही थीं कि उन चारों में से किसी की भी हिम्मत न थी कि उसकी आंखों में आंखें डालकर देख सके।

अब उसने उंगली से जमीन पर एक रेखा खींची और आदेश पूर्ण स्वर में फुंफकारा, "सीधा हाथ।"

कुछ क्षणों में ही सीधा हाथ कंधे से अलग होकर जमीन पर आ गिरा। ऐसा लगता था जैसे चाकू से काटकर फेंका गया हो। वह रक्त रंजीत हो रहा था।

राजू मदारी ने धरती पर दूसरी लकीर खींची वह बोला - "उल्टी बाह। "

और कुछ ही क्षणों में दूसरी बांह भी कटकर खून उगलती जमीन पर आ गिरी।

फिर उसने तीसरी रेखा धरती पर खींची और हुक्म दिया- "दाई टांग | "

दाई टांग आने में चन्द सेकेन्ड लगे।

और फिर इसी तरह चौथी, पांचवीं और छठी लकीर पर उल्टी टांग, सिर और फिर कटा हुआ धड़ नीचे आ गिरा और वह सिर और दूसरे अंग इन्द्रजीत के ही थे।

इस मंजर ने उन चारों भाड़े के कातिलों की सिट्टी-पिट्टी गुम कर दी। उन्होंने तो इस बेढ़ब शख्स को महज बन्दर का तमाशा दिखाने वाला मदारी ही समझा था। लेकिन वह तो उनसे भी बड़ा और संगदिल कातिल निकला था। उसने जैसा कि दावा किया था हाथ लगाए बिना ही इन्द्रजीत के टुकड़े कर दिए थे। जिन्हें वह वे चारों अपनी आंखों से आश्चर्यचकित हाकर देख रहे थे।

“इब यूं आंखें फाड़े कै, (क्या) देखो हो। जाओ, अपना सस्ता पकड़ो। सुबह-सुबह ताव दिलवाकर हमसे खून करवा दिया वो भी एक बालक का महापाप करवाया रे तत्म ने हमसे अब अपनी शक्लें गुम करो रे। म्हारे को कहीं गुस्सा न आ जाए और फिर तम्म चारों भी इधर इस दायरे में कटे-फटे पड़े न दिखो जाओ, भागो...।" यह बात उसने इस अंदाज में कही कि उन चारों के पैर उखड़ गये।

"वैसे भी वे इन्द्रजीत को यहां कत्ल करने के लिए लाए थे वो उसे गोली मारकर कत्ल करते, अब वह बिना गोली के कत्ल हो गया था। ऐसी निर्ममता के साथ तो वे भी उसे नहीं मार सकते थे।

अब उनका यहां रुकना बेकार था, फिर इस बेढ़व मदारी का खौफ था ही। चारों अपने-अपने घोड़े की तरफ लपके उछलकर उन पर सवार हुए और उन्हें एड़ियां मारकर हवा हो गए। जंगल में कुछ देर तक उनके गोड़ों की टापों की आवाज गूंजती रही, फिर मध्यम पड़ गई।

.
 
राजू भदारी को जब यकीन हो गया कि वे चारों दूर जा चुके है तो उसने अपनी रन पर हाथ मारकर जोरदार कहकहा लगाया और फिर अपने बराबर बैठे बन्दर से बोला-

"ला रे रसिया चाकू...।"

वह बेचारा बंदर भी इतनी देर से अपने मुंह में चाकू दबाए परेशान हो रहा था उसने फौरन ही उसके सामने आकर चाकू अपने दातों से छोड़ दिया। मदारी ने खुला हुआ चाकू बन्द किया और अपनी धोती में बाध लिया। फिर उसने ऊंची आवाज में पुकारा--

"आ रे छोरे।"

यह आवाज सुनकर इन्द्रजीत जो एक पेड़ के पीछे छिपा तमाशा देख रहा था। हसता हुआ पेड़ की ओट से निकल आया और राजू मदारी के सामने आकर खड़ा हो गया ।

अब वहां इन्द्रजीत की लाश के टुकड़े थे, न आकाश की तरफ जाती रस्सी थी। हां, उस मदारी की लाठी जमीन पर

उसी तरह पड़ी थी जैसी उसने फेंकी थी। इन्द्रजीत की समझ में कुछ न आया कि यह सब क्या तिलस्म था। उसे इस बात की खुशी थी कि उसकी जान बच गई थी। किराए के उन कातिलों से राजू मदारी ने उसे बचा लिया था चाहे अपनी नजरबन्दी के जह के सदके ही सही।

हुआ यह था कि-

"राजू मदारी वहां से कुछ दूर समाधि लगाए बैठा, जाने किस साधना में लीन था। उसका बन्दर रसिया पेड़ों पर इधर से उधर झूमता फिर रहा था। यह बन्दर रसिया सई था, जिसने इन्द्रजीत को पड़ से बंधा देखा था और फिर फौरन ही राजू मदारी के पास जाकर उसे इशारे से अपनी समाधि से उठने पर मजबूर कर दिया था।

फिर इधर आकर राजू मदारी ने छिपकर यहां क तमाशा देखा था और यह समझने में देर नहीं लगी थी कि किराए के

कातिल हैं और इस लड़के से मारकर निकल जाने स इरादा रखते हैं। उसे पहली नजर में ही किशोर इन्द्रजीत बहुत

अच्छा लगा था उसका कोई बेटा न था। बस एक बेटी थी। इन्द्रजीत से एक दो साल बड़ी होगी। उसने फोरन ही

इन्द्रजीत को बचाने और अपना बेटा बनाने का फैसला कर लिया।

इस राजू मदारी ने बंदर और रीछ जरूर पाल रखे थे। लेकिन वह गली-कूचों मे रीछ बन्दर का तमाशा दिखाने वाली में सेन था। वह अपने फल का प्रदर्शन राजाओं, नवाबों, जागीरदारों और बड़े लोगों के सामने करता था। और अपने इस धन्धे मे राजू मदारी का नाम भी था कि बड़े-बड़े लोग उसे अपने यहां के बड़े समारोहों, में आते रहने थे।

उसका दो-ढाई घन्टे का तमाशा लोगों को दम व खुद कर देता था।

राजू मदारी एक मुद्दत से एक मददगार की तलाश में था। उसकी बेटी अब जबान हो गई थी। राजू मदारी के साथ वही जाती थी, लेकिन वह अब नहीं चाहा था कि इन तमाशों में अपनी बेटी को साथ रखे। इन्द्रजीत को देखकर उसके दिल की कली खिल गई और उसने खड़े खड़े फैसला कर लिया फ्रई उसे उन चारों कातिलों से इन्द्रजीत की जान कैसे बचानी है।

उनसे जान छुड़ाने में उसे ज्यादा मेहनत न करनी पड़ी थी। वे चारों मूर्ख खुद ही उसके जाल में फंस गए थे। फिर जब उन्होंने इन्द्रजीत टुकड़े धरती पर गिरते देखे तो उनके होश ही उड़ गए थे और फिर उन्होंने वहां से भाग लेने में ही भलाई समझी थी। कातिल तो चले गए थे पर अब राजू मदारी के सामने मसला यह था कि वह इन्द्रजीत को अपना कैंस बनाए । .

इन्द्रजीत छोटा जरूर था लेकिन नादान न था । अब तो उसे या भी मालूम हो गया था कि शिकार की आड़ में उसके कत्ल की साजिश रची गई थी और यह साजिश उसके चाचा रमाकांत ने की थी। उसके दिल में इंतकाम की आग भड़क उठी थी।

लेकिन फिल्हाल तो उसके सामने इस जंगल से निकलकर दिल्ली पहुंचने अई समस्या थी।

इन्द्रजीत अपनी इस समस्या के बारे में सोच रहा था और राज मदारी यह सोच रहा था कि इन्द्रजीत की रूह पर किस

'
 
तरह कब्जा किया जाए कि वह सब कुछ भूल जाए और उसे छोड़कर कही जाने का नाम न ।

"छोरे तू कौन है?" उसने इन्द्रजीत से पूछा। और ये बदमाश तमने कहां से लाए ?"

जवाब में इन्द्रजीत ने संक्षेप में अपने बारे में सब कुछ बता दिया। चौधरी रमाकांत और सावनपुर के बारे में सुनकर राजू मदारी चौंका। यह नाम उसका कही सुना हुआ था। सारी कहानी सुनकर उसने इन्द्रजीत को तसल्ली दी।

“तुम अब बेफिक्र हो जाओ छोकरे। तुम्हें अब कोई खतरा नहीं है।" वह बोला था-"मेरे साथ मेरी बस्ती चली। वहां से "तुम्हारा दिल्ली जाने का बन्दोबस्त कर दिया जाएगा।”

राजू मदारी अगर उसे साथ जाने की पेशकश न करता, तो भी इन्द्रजीत में उसके साथ जाना ही था। वह जंगल से अकेला तो निकल नहीं सकता था। उसने राजू मदारी की पेशकश फौरन कबूल कर ली और उसके साथ हो लिया।
 
राजू मदारी ने वहां से थोड़े असले पर अपना डेरा डाला हुआ था।

वह तन्त्र-मन्त्र का ज्ञाता था और इसी सम्बन्ध में अपनी साधना के लिए वह इन बीहड़ों का रूख करता था। उस दिन भी वह वहां किसी मन्त्र सिद्धि के अपने अमल में मग्न था। वह इन्द्रजीत को लेकर उसी अमल वाली जगह पर पहुंचा।

बंदर रसिया उसके कंधे पर बढ़ा हुआ था।

. उस जगह धरती पर रीछ की खाल थी। एक तरफ झोली रखी हुई थी। खाल के सामने पानी से एक बाल्टी रखी थी। राजू मदारी ने इस बाली में इन्द्रजीत को पानी पिलाया और फिर रीछ की डाल तह करके झोली में डाली। झोली अपने कन्धे पर लटकाई । बाल्टी हाथ में पकड़ी। रसिया को कन्धे पर चढ़ाया और फिर लम्बे-लम्बे डग भरता ह्या एक तरफ चल दिया।

इन्द्रजीत उसके पीछे छे लिया था।

लगभग दो घन्टे निरन्तर चलते रहने के बाद वे जंगल से और फिर एक नहर के पुल को पार करके जिंस जगह पहुंचे वहां सामने ही झोपड़ियों की एक बस्ती थी। इन झोंपड़ियों में कुछ कच्चे-पक्के मकान भी दिखाई दे रहे थे। यही वह बस्ती थी जहां राजू मदारी रहता था।

इस बस्ती में राजू मदारी का मिट्टी का बना दो कमरों का मकान था। कमरों के सामने एक खुला सहन था और सहन

के गिर्द चार फुट ऊंची एक कच्ची चारदीवारी खिंची थी।

यह एक छोटी-सी बस्ती थी, जिसमें अधिकांश खेल-तमाशे दिखाने वाले मदारी आबाद थे। हर डेरे के सामने रींछ, बन्दर, बकरे व कुत्ते बंधे हुए थे। राजू मदारी का मकान सबसे अच्छा और बड़ा था। वह इस बस्ती का सरदार था और मुखिया कहलाता था। राजू मदारी की बेटी का नाम कटारी था।

कटारी चौदह-पन्द्रह साल की एक यौवन के आंगन में कदम रखती आकर्षक अधखिली कली थी। वह अपनी मां पर

गई थी। उसकी मां को मरे दो सोल हुए थे। उसकी मां बस्ती की सबसे खूबसूरत औरत थी। यही हाल कटारी का था ।

वह बस्ती की सबसे खूबसूरत लड़की थी। राजू मदारी के यहां दो लड़के भी हुए थे लेकिन वे दोनों चार साल के होकर

चल बसे थे। दोनों की ही मौत गर्दन तोड़ से हुई थी।

राजू मदारी बेटे की बड़ी लालसा थी और उसे अपनी यह लालसा पूरी होती नजर आ रही थी। इन्द्रजीत के रूप में उसे एक पला-पलाया बेटा मिल गया था। वह रास्ते भर सोचता आया था कि बस्ती में पहुंचकर वह इन्द्रजीत पर ऐसा कौन-सा जादू-टोना करे कि वह उसका गुलाम और आज्ञाकारी बनकर बस्ती में रह जाए और कहीं जाने का नाम न ले।

और राजू मदारी के लिए यह कोई कठिन काम न था। वशीकरण मंत्रों का सिद्ध था वह किसी के दिल पर कढ़ना जमाने के उसे बहुत से अमल आते थे। रात के शंहशाह उल्लू का पंजा उसके गले में ताबीज के रूप में पड़ा हुआ था । यह राजू मदारी राक पहुंचा हुआ आमिल और तांत्रिक था।

उसनें घर पहुंचकर सबसे पहला काम ही यही किया। एक छोटे से सफेद कागज पर उल्लू के पंजे से कुछ रहस्यमय निशान बनाए। निशान बनाने के दौरान वह अ बड़बड़ाता भी जा रही था। फिर उसने कटारी से एक गिलास शर्बत से लाने को कहा। कटोरी ने शर्बत से भरा गिलास बाग के सामने रखा तो उसने उस उल्लू के पंजे को शर्बत में डालकर उसे थोड़ा निकोल लिया और कटारी से कहा कि वो यह शर्बत को इन्द्रजीत को दे आए।

इन्द्रजीत दूसरे कमरे में खाट पर पसरा पड़ा था। वह एक लम्बी दूरी तय करके आया था। थक गया था।

कटोरी कमरे में दाखिल हुई तो इन्द्रजीत ने नजरें उठाकर उसकी तरफ देखा । कटारी ने हालांकि 'घर में आते हुए पहले ही देख लिया था लेकिन वह उसके सामने अब आई थी। कटारी ने भी उसे गौर से देखा। दोनों एक-दूसरे को देखकर एक साथ मुस्कराए। कटारी ने गिलास आगे बढ़ाया-

"लो राह पीला।" वह बोली ।

इन्द्रजीत ने गिलास उसके हाथ से ले लिया। शर्बत मीठा और ठण्डा था। उसे बहुत प्यास लगी थी। उसने एक ही सांस
 
में पूरा गिलास पी लिया ।

अमल किए इस इस शर्बत ने अपना रंग दिखाया। इस शर्बत ने उससे उसका अतीत तो नहीं छीना । इन्द्रजीत की यह तो याद रहा कि वह कौन है। कहां से आया है। लेकिन वह अपने भविष्य और भावी प्रोग्रामों से बेगाना हो गया। इस बस्ती का आकर्षण और इस घर से दिलचस्पी उसके मन-मस्तिष्क पर हावी हो गई। यही का होकर रह जाने की यदि दिल में समा गई।

कभी अन्दर से कोई जोर लगाता, उसे याद दिलाता कि उसे अपने घर दिल्ली जाना है। अन्दर की इस आवाज पर वह कभी उठ खड़ा भी होता लेकिन बावजूद कोशिश के वह इस बस्ती की सीमाओं से निकेल न पाता।

उस पर घबराहट सी छा जाती ।

इस तरह दो साल बीत गए। तांत्रिक राजू मंदारी ने धीरे-धीरे उसे अपना फन सिखाना शुरू कर दिया।

इन्द्रजीत अब छोटे-मोटे तेमाशे करके देखने वालों को हैरान कर देता था।

राजू मदारी ने नजरबंद के तमाशों के साथ-साथ उसे जंगल का इल्म भी सिखाना शुरू कर दिया था। राजू मदारी जानवरों की आवाजों का माहिर था। वह अपने मुंह से ऐसी आवाजें निकालता था कि वाछित पक्षी या जानवर उसकी आवाज सुनकर उसके सामने आ जाता था।

इन्द्रजीत को शिकार का शौक था ही उसने बहुत जल्द विभिन्न परिन्दों और पशुओं की आवाजें सीख ली और अब यह उसका प्रिय शुगल था कि वह सुबह-सवेरे जंगल का रुख करता और जंगल में उसे जहां कहीं में तीतर नजर आता वह जाल बिछाकर बैठ जाता और अपने मुह से तीतर से बुलाने की आवाज निकालता ।

दो-चार आवाजों के बाद तीतरों अ जवाब बाने लगता और वे उड़ते हुए, दौड़ते हुए उसकी तरफ खींचे चले आते और

फिर जब वह देखता कि आठ-सात तीतर जमा हो गये हैं तो वह झटका मारकर जाल खींच लेता। यूं चार-पांच तीतर

जाल में जरूर फंस जाते। वह इन तीतरों को जाल से पिंजरे में हस्तान्तरित कर लेता और बस्ती में आ जाता।

कटारी इन तीतरों को जिव्ह करके बड़े शौक से पकती और यूं दावतें उड़ती।

बस्ती के निकट ही एक नहर थी। इन्द्रजीत अपनी तैराकी का शौक इस नहर में पूरा करता राजू मदारी भी अपने खेल-तमाशों में उसे अपने साथ रखने समा था।

यूं वक्त गुजरता गया यहां तक की इन्द्रजीत जवान है। गया। एक तो इन्द्रजीत बेहद खूबसूरत था, ऊपर से जवान और फिर जादूगर तांत्रिक भी। अपने इन गुणों के सदके वह आस-पास के इलाकों में बेहद लोकप्रिय बन चुका था ।

बस्ती की नव-यौवनाएं उसकी एक नजर को तरसती थीं- अगर वह नजर उठाकर नही देखता था। खुद कटरी झलफ्रि उससे दो-तीन साल बड़ी थी लेकिन अपना दिल हार बैठी थी। वह इन्द्रजीत पर हर वक्त अपनी जान न्यौछावर करने के तैयार रहती थी। मगर इन्द्रजीत अपनी धुन में मम्न रहता था। राजू मदारी उसे बेटे की तरह चाहता था इसलिए इन्द्रजीत भी साफ-पाक नजर से देखता था।

यूं ही एक दिन राजा बहगम नगर का एक करिन्दा, राजू मदारी के पास, बहराम नगर के राजा का पैगाम लेकर पहुंचा। दो दिन बाद ही सजा की बेटी नयना सगाई थी और इस मौके पर राजू मदारी के खेल-तमाशे का आयोजन रखा गया. था। राजू मदारी को ऐसे महत्वपूर्ण बुलावों पर खुशी होती थी। उसने फौरन ही उसने फौरन ही हामी भर ली और प्रोग्राम तय कर लिया।

दो दिन बाद दोपहर को राजा साहब की गाड़ी उन्हें लेंनें आ गई। वे ढ़ाई घन्टे के सफर के बाद बहराम नगर पहुंच गए। राजा की हवेली इस मौके पर दुल्हन की तरह सजी हुई थी। हवेली के हरे-भरे लीन मे राजू मदारी का खेल होना था। शाम होते ही मेहमान आना शुरू हो गए।

राजू मदारी के लिए एक छटा-सा स्टेज बनाया नया था। सामने घास पर कुर्सिया बिछी हुई थी। लोग आते-जाते थे और बैठते जाते थे। मदारी, इन्द्रजीत के साथ स्टेज पर मौजूद था। वे अपने खेल की तैयारियों में व्यस्त थे।
 
कुछ देर बाद सामने की विशेष सिंहासन नुमा कुर्सियों पर राजकुमारी नयना और उसका मंगेतर कुंवर बलराज आकर

बैठ गए। नयना की तरफ उसके होने वाले ससुर थे और कुंवर बलराज के साथ राजा बहराम नगर आकर विराजमान

गए। कुर्सियां अब आमंत्रित मेहमानों से भरी नजर आ रही थीं। राजा बहराम नगर ने राजू मदारी से खेल शुरू करने का इशारा किया और राजू मदारी ने अपने गले में पड़े हुए 'रात के शंहशाह उल्लू के पजे को चूमका क्क नार लगाया और रजा बहराम नगर को झुककर सलाम किया।

• सलाम के बाद उसने पेशेवर मदारियों की तरह बांसुरी अपने होठो से लगाई और दांए हाथ में डुगडुगी लेकर दोनों को

एक साथ बजाना किया। बांसुरी की लय और डुमडुगी की ताल पर इन्द्रजीतन नाचना शुरू किया।

यूं दोनों ने मिलकर एक समां सा बांध दिया।

इन्द्रजीत काली पेन्ट और लाल कमीज पहने हुए था इस पर उसका सुर्ख सफेद रंग, धुघराले बाल, कानों में पड़े बाले आकर्षक चुम्बकीय आंखे और फिर एक खास विशिष्ट अंदाज का नाच देखने वालों की नजरें उस पर इस नरह

गई हुई थीं जैसे वह इस दुनिया का इंसान न होकर अंतरिक्ष का कोई प्राणी हो ।

नाव और संगीत समाप्त हुआ तो इन्द्रजीत स्टेज से राजा बहराम नगर के पास पहुंचा और बड़े आदरपूर्ण लहजे में अंग्रेजी में बोला-

"श्रीमान जी, मुझे मंगनी की अंगूठी दरकार है।"

उसे इंगलिश बोलने देखकर नयना को एक खुशगवार हैरत हुई और इससे पहने कि उसके पिताश्री कुछ कहते उसने जल्दी से ही मंगनी की अंगूठी अपनी उंगली से निकालकर इन्द्रजीत के हवाले करनी चाही। इन्द्रजीत ने इशारे से उसे रोका और फिर उसने चौड़े मुंह की शीशे की एक बोतल का ढक्कन खोला और राजकुमारी नयना को अंगूठी उसमें डालने का इशारा किया।

नयना अपनी अंगूठी इसमें डाल दी। इन्द्रजीत ने वहीं खड़े-खड़े बोतल का ढक्कन बंद किया और इस अगली पंक्ति में

बैठे हुए लोगों को एक-एक करके बोतल में बन्द अंगूठी दिखाई और फिर उस बोतल को लेकर स्टेज पहुच गया और

उस बोतल को एक स्टूल पर रख दिया।

बोतल में बंद अंगठी सबको दिखाई दे रही थी। अब इन्द्रजीत ने अपनी जेब से एक काला रुमाल निकाला और उसे एक खास अन्दाज में लहराकर वोतल पर डाल दिया। बोतल रुमाल से छिप गई। राजू मदारी ने बासूरी और डुगडुगी बजाते हुए स्टूल के गिर्द एक चक्कर लगाया। चक्कर खत्म होते ही इन्द्रजीत ने वह रुमाल बोतल से खींच लिया।

देखने वालों ने देखा कि अंगूठी बोतल से गायब थी। नयना का दिल धक्क से रह गया। उसने अपने मंगेतर कुंवर बलराज की तरफ देखा ।

" आश्चर्यजनक ! अविश्वसनीय! कुंवर के मुंह से निकला।

तभी राजू मदारी बोल उठा "सत्यानास ! राजा साहब! म्हारे छोटे से गलती हो गई। राजकुमारी जी की अंगूठी मिलना अब मुश्किल है। "

"अरे, यह क्या बोल रहे हो?" कुंवर बलराज परेशान होकर बोला। राजा साहब उसकी बगल में बैठे थे। वह आराम . से बैठे मुस्कराते रहे। उन्होंने कोई टिप्पणी नहीं की थी।

राजू मदारी भी कुंवर की अनसुनी कर दूसरा तमाशा दिखाने में जूट गया। पेशेवर मदारियो के से खेल दिखाए जा रहे थे। इस बार राजू गदारी ने इन्द्रजीत को स्टेज पर लेटने को कहा जब वह लेट गया तो राजू मदारी ने उसके ऊपर एक बहुत बड़ी सफेद चादर डाली और लोगों स विनती की कि बहुत ही नाजुक खेल है। इसमें लड़के की जान भी जा सकती हैं इसलिए इस तमाशे के दौरान कोई एक शब्द भी न बोले और आपने हाथ भी एक-दूसरे से दूर रखें।

यह चेतावनी सुनकर सब लोग सम्भलकर बैठ गए। कोई शख्त अगर हाथ बांधे बैठा था तो उसने अपने दोनों हाथ अलग कर लिए और पूरी तवज्जो के साथ तमाशा देखने लगे।
 
कुछ देर बाद सामने की विशेष सिंहासन नुमा कुर्सियों पर राजकुमारी नयना और उसका मंगेतर कुंवर बलराज आकर

बैठ गए। नयना की तरफ उसके होने वाले ससुर थे और कुंवर बलराज के साथ राजा बहराम नगर आकर विराजमान

गए। कुर्सियां अब आमंत्रित मेहमानों से भरी नजर आ रही थीं। राजा बहराम नगर ने राजू मदारी से खेल शुरू करने का इशारा किया और राजू मदारी ने अपने गले में पड़े हुए 'रात के शंहशाह उल्लू के पजे को चूमका क्क नार लगाया और रजा बहराम नगर को झुककर सलाम किया।

• सलाम के बाद उसने पेशेवर मदारियों की तरह बांसुरी अपने होठो से लगाई और दांए हाथ में डुगडुगी लेकर दोनों को

एक साथ बजाना किया। बांसुरी की लय और डुमडुगी की ताल पर इन्द्रजीतन नाचना शुरू किया।

यूं दोनों ने मिलकर एक समां सा बांध दिया।

इन्द्रजीत काली पेन्ट और लाल कमीज पहने हुए था इस पर उसका सुर्ख सफेद रंग, धुघराले बाल, कानों में पड़े बाले आकर्षक चुम्बकीय आंखे और फिर एक खास विशिष्ट अंदाज का नाच देखने वालों की नजरें उस पर इस नरह

गई हुई थीं जैसे वह इस दुनिया का इंसान न होकर अंतरिक्ष का कोई प्राणी हो ।

नाव और संगीत समाप्त हुआ तो इन्द्रजीत स्टेज से राजा बहराम नगर के पास पहुंचा और बड़े आदरपूर्ण लहजे में अंग्रेजी में बोला-

"श्रीमान जी, मुझे मंगनी की अंगूठी दरकार है।"

उसे इंगलिश बोलने देखकर नयना को एक खुशगवार हैरत हुई और इससे पहने कि उसके पिताश्री कुछ कहते उसने जल्दी से ही मंगनी की अंगूठी अपनी उंगली से निकालकर इन्द्रजीत के हवाले करनी चाही। इन्द्रजीत ने इशारे से उसे रोका और फिर उसने चौड़े मुंह की शीशे की एक बोतल का ढक्कन खोला और राजकुमारी नयना को अंगूठी उसमें डालने का इशारा किया।

नयना अपनी अंगूठी इसमें डाल दी। इन्द्रजीत ने वहीं खड़े-खड़े बोतल का ढक्कन बंद किया और इस अगली पंक्ति में

बैठे हुए लोगों को एक-एक करके बोतल में बन्द अंगूठी दिखाई और फिर उस बोतल को लेकर स्टेज पहुच गया और

उस बोतल को एक स्टूल पर रख दिया।

बोतल में बंद अंगठी सबको दिखाई दे रही थी। अब इन्द्रजीत ने अपनी जेब से एक काला रुमाल निकाला और उसे एक खास अन्दाज में लहराकर वोतल पर डाल दिया। बोतल रुमाल से छिप गई। राजू मदारी ने बासूरी और डुगडुगी बजाते हुए स्टूल के गिर्द एक चक्कर लगाया। चक्कर खत्म होते ही इन्द्रजीत ने वह रुमाल बोतल से खींच लिया।

देखने वालों ने देखा कि अंगूठी बोतल से गायब थी। नयना का दिल धक्क से रह गया। उसने अपने मंगेतर कुंवर बलराज की तरफ देखा ।

" आश्चर्यजनक ! अविश्वसनीय! कुंवर के मुंह से निकला।

तभी राजू मदारी बोल उठा "सत्यानास ! राजा साहब! म्हारे छोटे से गलती हो गई। राजकुमारी जी की अंगूठी मिलना अब मुश्किल है। "

"अरे, यह क्या बोल रहे हो?" कुंवर बलराज परेशान होकर बोला। राजा साहब उसकी बगल में बैठे थे। वह आराम . से बैठे मुस्कराते रहे। उन्होंने कोई टिप्पणी नहीं की थी।

राजू मदारी भी कुंवर की अनसुनी कर दूसरा तमाशा दिखाने में जूट गया। पेशेवर मदारियो के से खेल दिखाए जा रहे थे। इस बार राजू गदारी ने इन्द्रजीत को स्टेज पर लेटने को कहा जब वह लेट गया तो राजू मदारी ने उसके ऊपर एक बहुत बड़ी सफेद चादर डाली और लोगों स विनती की कि बहुत ही नाजुक खेल है। इसमें लड़के की जान भी जा सकती हैं इसलिए इस तमाशे के दौरान कोई एक शब्द भी न बोले और आपने हाथ भी एक-दूसरे से दूर रखें।

यह चेतावनी सुनकर सब लोग सम्भलकर बैठ गए। कोई शख्त अगर हाथ बांधे बैठा था तो उसने अपने दोनों हाथ अलग कर लिए और पूरी तवज्जो के साथ तमाशा देखने लगे।
 
अपनी इस सोच पर उसे अन्दर ही अन्दर हंसी आई।

राजू मदारी की अल्हड़ जवान बेटी कटारी, नयना से कहीं ज्यादा खूबसूरत थी और वह इन्द्रजीत से प्यार भी बहुत करती थी लेकिन इन्द्रजीत ने उस पर कभी ध्यान नहीं दिया था। उसी पर क्यों किसी भी लड़की की तरफ उसने कभी ध्यान नहीं दिया था। लेकिन नयना ने देखकर उसके दिल को जाने क्या हो गया था। अपने इस रवैये पर वह बार-बार गौर कर रहा था मगर उसकी समझ में भी कहा कुछ आ रहा था ।

. अब खेल के सिलसिले में उसकी एकाग्रता हु गई थी और बह बार-बार गलती कर रहा था और राजू मदारी डांट खा रहा था-"होश कर ! होश कर !"

राजू मदारी के बार-बार टोकने पर उसे होश करना पड़ा। यह जादू के और नजरबन्दी के खेल थे। बेध्यानी घातक भी सिद्ध हो सकती थी ।

अंतत: खेल-तमाशा खत्म क्या हुआ। राजू मदारी ने राजा साहब से ईनाम बटोर इजाजत ली और बापसी का सफर अपनाया। राजा साहब की गाड़ी ही उन्हें बस्ती तक छोड़ने आई थी।
 
रात को अपनी बस्ती में वापस पहुंच गए।

राजा साहब की गाड़ी उन्हें उनके ठिकाने पर छोड़ गई लेकिन इन्द्रजीत का दिल अपने ठिकाने पर नहीं रहा था। उसका दिल तो कहीं दूर- बहराम नगर में ही रह गया था और वह एक चेहरा था जो उसकी आंखो में समाकर रह मया था राजकुमारी नयना की छवि उसकी निगाहो से हटती ही नहीं थी।

फिर वह हुआ जिसकी कि आशा ही नहीं की जा सकती थी।

एक शाम राजा बहराम नगर की गाड़ी, मदारियों की इस बस्ती आबादी से दूर, बाहर करीब आकर खड़ी हो गई थी। गाड़ी में सिर्फ ड्राईवर ही था और वह इन्द्रजीत की तलाश में यहां आया था।

इन्द्रजीत घर पर मौजूद था। उसने ड्राईवर को अपने दरवाजे पर देखा तो उसके चेहरे पर अनार से फूटने लगे। ड्राईवर ने इधर-उधर देखकर उसके कान के निकल, राजदराना सरगोशी में, कहा था- "राजकुमारी जी आई हैं।"

"ओह...!" इन्द्रजीत के बदन में सनसनी सी दौड़ गई। उसने भी सरगोशी में पूछा - "कहा है वह ?" "नहर के पुल पर वहां वह आपका इंतजार कर रही हैं।"

"मेरा इंतजार!" इन्द्रजीत का दिल तेजी से धड़कने लगा।

"ओह! चलो।"

राखा साहब की गाड़ी बस्ती के बाहर खड़ी थी। इन्द्रजीत उसमें बैठकर पर पहुंचा। ड्राईवर ने माड़ी रोक दी। इन्द्रजीत उतरकर तेजी से भागा। पुल के उस पार चादर में लिपटी राजकुमारी उसे नजर आ रही थी। उसने चादर कुछ इस ढंग से लपेट रखी थी कि आसानी से पहचानी न जा सके।

इन्द्रजीत जब नयना के पास आ तो सूर्य अस्त हो चुका था। शाम गहरा रही थी। अन्धेरा से फैलता जा रहा था।

इन्द्रजीत उसके सामने पहुंचकर खामोशी से खड़ा हो गया।

नयना ने अपने चेहरे से चादर हटाई और धीरे से बोली - "मैं हूँ नयना !"

"जानता हूँ।"

"सच बताना क्या तुम्हें मेरे यहां आने की आशा थी ?"

"नहीं, बिल्कुल नहीं।" इन्द्रजीत ने स्पष्टवादिता से काम लेते हुए कहा । “लेकिन मैं तो आ गई हूँ... तुम्हारी आशा के विपरीत।" राजकुमारी नयना की आंखों में डूबते सूर्य की सुखीं थी।

"क्या तुम्हें मेरा आना अप्रिय लगा ?"

"बिल्कुल नहीं।" इन्द्रजीत ने फिर सच्चाई से कहा ।

"तुम्हें तो लड़की होना चाहिए था।"

"वह क्यों?" इन्द्रजीत हैरान हुआ।

"कोई बात खुलकर कहते ही नहीं." वह हंसी। उसकी हंसी में बड़ा जादू था।

"आप क्या कहलवाना चाहती हैं?"

"यह बताओ तुम कौन हो?"

"मैं... मैं इन्द्रजीत हूँ।"
 
." मैंने तुम्हारा नाम नहीं पूछा है। तुम्हारा नाम मैं जानती हूँ...1"

"फिर? फिर क्या जानना चाहती हो?"

"तुम इस धंधे, इस बस्ती और इन लोगों में बिल्कुल, 'मिस फिट' नजस आते हो।" नयना ने अपनी निगाहें उसके चेहरे पर गाड़ दी थी, "जैसे टाट में मखमल का पेबन्द । "

इन्द्रजीत ने सकुचाते हुए कहा- "अगर मैं कहूँ कि आप ठीक कहती हैं तो क्या आप मान लेंगी। *

“हां, क्यों नहीं ?" नयना के होठों पर मुस्कान तैर आई। मैं सच्चाई जानना चाहती हूँ।"

"मैं एक फरेब में फंसा हुआ हूँ।" इन्द्रजीत ने जवाब दिया, वह एकाएक ही उदास दिखने लगा था- "जानता हूँ कि फरेब का शिकारे हू फिर भी इस तिलस्म, इस जादू से निकलने को जी नहीं चाहता। मैं तो जैसे कैदी हूँ किसी का।”

"किसके कैदी हो ? राजू मदारी के ?""

"हां यूं ही समझो...।"

"निश्चिन्त हो जाओ। मैं तुम्हें इसकी कैद से निकाल लूंगी।" वह खुल के मुस्कराई, उसके मोतियों जैसे चांद चमके- " और तुम्हें अपना कैदी बना लूंगी। बोलो, बनोगे मेरे कैदी ? "

"हां, खुशी से...।" इन्द्रजीत बेअख्तयार बोला था ।

"इतनी जल्दी इकरार न करो अच्छी तरह सोच-समझ लो मैं तीन दिन के बाद फिर आऊंगी। यहीं इसी पुल पर इसी वक्त, मेरा इन्तजार करना । करोगे ना?"

"हां, क्यों नहीं।" इन्द्रजीत मुस्कराया।

"तो फिर जाओ...।"

"जाऊं कैसे... जाने को जो नहीं चाहता । जिन्दगी में पहली बार अहसास हुआ कि मैं... मैं हूँ ।"

"यह तो बड़ी अच्छी, बड़ी शुभ शुरूआत है। आज तुम्हें अपने होने का अहसास हुआ है फिर वह दिन ज्यादा दूर नहीं

जब तुम्हें मेरे होने का विश्वास हो जाएगा...।"

इन्द्रजीत चौंका. उसने धीरे से पूछा "तुम भी कैद में हो किसी की ?"

"हां एक अंगूठी की कैद में...।" नयना ने बड़े अजीब से उदास लहजे में कहा- "वह अंगूठी मेर हाथ पर रखी गई थी। ने ही रखी थी वह वह अंगूठी अभी तक मेरे हाथ में है... मैंने आज तक पहनी" ।

कितनी बड़ी कैसी जज्बाती बात कह दी थी नयना ने इन्द्रजीत भाव व्हिवल-सा बोला "लाओ दिखाओ हाथ कहां है वह अंगूठी ?"

नयना ने अपनी चादर से हाथ निकाला और उसके सामने करके मुट्ठी खोल दी। लेकिन उसके हाथ मैं कुछ न था, हाथ खाली था। अपनी मुट्ठी खाली देखकर नयना परेशान हो गई। बात परेशान होने ही वाली थी। उसने गलत नहीं कहा था। मंगनी वाले दिन इन्द्रजीत ने वह अंगठी गायब करने के बाद फिर अब नयना की हथेली पर रखी थी तो नयना ने उसे पहनने के बजायं अंगूठी अपने मंगेतर कुंवर की जेब में डाल दी और फिर जाते हुए जब कुंवर ने उसे अंगूठी वापस की तो उसने वह अपने पर्स में डाल ली। तब से अब तक वह अंगूठी नयना के पर्स में थी। आज कार से उतरते वक्त उसने वह अंगूठी पेर्स से निकालकर अपनी मुट्ठी में दबा ली थी और अभी कुछ क्षण पहले वह अंगूठी उसके हाथ में थी। बस, मुट्ठी खोलते ही वह अंगूठी गायब हो गई।

"" कहां है अंगूठी ?" उसे हैरान-परेशान देख इन्द्रजीत ने पूछा।

"मुझे नहीं मालूम कहां गई?" नयना बोली-"अभी तो मेरे हाथ में थी।"
 
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