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से भी लम्बे फल का यह चाकू खोलकर उसेने जमीन पर रख दिया और अपने बन्दर को इशारा किया।
बन्दर हरकत में आया और चाकू अपने मुंह में दबाकर बड़ी फुर्ती से रस्सी पर चढ़ गया। यह गया और वह आया का प्रदर्शन करते बन्दर उसी तेजी से लौट भी आया था। पर अब वह बाबू उसके मुंह में नहीं था। वह खामोशी से राजू मदारी के पास आ बैठा।
राजू मदारी ने आंखें बन्द की और तेजी से कुछ पढ़ने लगा ।
"कुछ देर बाद उसने आंखे खोली तो उसकी बड़ी-बड़ी आंखों में खून उतरा आ था। उसकी आंखें ऐसी खौफनाक नजर आ रही थीं कि उन चारों में से किसी की भी हिम्मत न थी कि उसकी आंखों में आंखें डालकर देख सके।
अब उसने उंगली से जमीन पर एक रेखा खींची और आदेश पूर्ण स्वर में फुंफकारा, "सीधा हाथ।"
कुछ क्षणों में ही सीधा हाथ कंधे से अलग होकर जमीन पर आ गिरा। ऐसा लगता था जैसे चाकू से काटकर फेंका गया हो। वह रक्त रंजीत हो रहा था।
राजू मदारी ने धरती पर दूसरी लकीर खींची वह बोला - "उल्टी बाह। "
और कुछ ही क्षणों में दूसरी बांह भी कटकर खून उगलती जमीन पर आ गिरी।
फिर उसने तीसरी रेखा धरती पर खींची और हुक्म दिया- "दाई टांग | "
दाई टांग आने में चन्द सेकेन्ड लगे।
और फिर इसी तरह चौथी, पांचवीं और छठी लकीर पर उल्टी टांग, सिर और फिर कटा हुआ धड़ नीचे आ गिरा और वह सिर और दूसरे अंग इन्द्रजीत के ही थे।
इस मंजर ने उन चारों भाड़े के कातिलों की सिट्टी-पिट्टी गुम कर दी। उन्होंने तो इस बेढ़ब शख्स को महज बन्दर का तमाशा दिखाने वाला मदारी ही समझा था। लेकिन वह तो उनसे भी बड़ा और संगदिल कातिल निकला था। उसने जैसा कि दावा किया था हाथ लगाए बिना ही इन्द्रजीत के टुकड़े कर दिए थे। जिन्हें वह वे चारों अपनी आंखों से आश्चर्यचकित हाकर देख रहे थे।
“इब यूं आंखें फाड़े कै, (क्या) देखो हो। जाओ, अपना सस्ता पकड़ो। सुबह-सुबह ताव दिलवाकर हमसे खून करवा दिया वो भी एक बालक का महापाप करवाया रे तत्म ने हमसे अब अपनी शक्लें गुम करो रे। म्हारे को कहीं गुस्सा न आ जाए और फिर तम्म चारों भी इधर इस दायरे में कटे-फटे पड़े न दिखो जाओ, भागो...।" यह बात उसने इस अंदाज में कही कि उन चारों के पैर उखड़ गये।
"वैसे भी वे इन्द्रजीत को यहां कत्ल करने के लिए लाए थे वो उसे गोली मारकर कत्ल करते, अब वह बिना गोली के कत्ल हो गया था। ऐसी निर्ममता के साथ तो वे भी उसे नहीं मार सकते थे।
अब उनका यहां रुकना बेकार था, फिर इस बेढ़व मदारी का खौफ था ही। चारों अपने-अपने घोड़े की तरफ लपके उछलकर उन पर सवार हुए और उन्हें एड़ियां मारकर हवा हो गए। जंगल में कुछ देर तक उनके गोड़ों की टापों की आवाज गूंजती रही, फिर मध्यम पड़ गई।
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बन्दर हरकत में आया और चाकू अपने मुंह में दबाकर बड़ी फुर्ती से रस्सी पर चढ़ गया। यह गया और वह आया का प्रदर्शन करते बन्दर उसी तेजी से लौट भी आया था। पर अब वह बाबू उसके मुंह में नहीं था। वह खामोशी से राजू मदारी के पास आ बैठा।
राजू मदारी ने आंखें बन्द की और तेजी से कुछ पढ़ने लगा ।
"कुछ देर बाद उसने आंखे खोली तो उसकी बड़ी-बड़ी आंखों में खून उतरा आ था। उसकी आंखें ऐसी खौफनाक नजर आ रही थीं कि उन चारों में से किसी की भी हिम्मत न थी कि उसकी आंखों में आंखें डालकर देख सके।
अब उसने उंगली से जमीन पर एक रेखा खींची और आदेश पूर्ण स्वर में फुंफकारा, "सीधा हाथ।"
कुछ क्षणों में ही सीधा हाथ कंधे से अलग होकर जमीन पर आ गिरा। ऐसा लगता था जैसे चाकू से काटकर फेंका गया हो। वह रक्त रंजीत हो रहा था।
राजू मदारी ने धरती पर दूसरी लकीर खींची वह बोला - "उल्टी बाह। "
और कुछ ही क्षणों में दूसरी बांह भी कटकर खून उगलती जमीन पर आ गिरी।
फिर उसने तीसरी रेखा धरती पर खींची और हुक्म दिया- "दाई टांग | "
दाई टांग आने में चन्द सेकेन्ड लगे।
और फिर इसी तरह चौथी, पांचवीं और छठी लकीर पर उल्टी टांग, सिर और फिर कटा हुआ धड़ नीचे आ गिरा और वह सिर और दूसरे अंग इन्द्रजीत के ही थे।
इस मंजर ने उन चारों भाड़े के कातिलों की सिट्टी-पिट्टी गुम कर दी। उन्होंने तो इस बेढ़ब शख्स को महज बन्दर का तमाशा दिखाने वाला मदारी ही समझा था। लेकिन वह तो उनसे भी बड़ा और संगदिल कातिल निकला था। उसने जैसा कि दावा किया था हाथ लगाए बिना ही इन्द्रजीत के टुकड़े कर दिए थे। जिन्हें वह वे चारों अपनी आंखों से आश्चर्यचकित हाकर देख रहे थे।
“इब यूं आंखें फाड़े कै, (क्या) देखो हो। जाओ, अपना सस्ता पकड़ो। सुबह-सुबह ताव दिलवाकर हमसे खून करवा दिया वो भी एक बालक का महापाप करवाया रे तत्म ने हमसे अब अपनी शक्लें गुम करो रे। म्हारे को कहीं गुस्सा न आ जाए और फिर तम्म चारों भी इधर इस दायरे में कटे-फटे पड़े न दिखो जाओ, भागो...।" यह बात उसने इस अंदाज में कही कि उन चारों के पैर उखड़ गये।
"वैसे भी वे इन्द्रजीत को यहां कत्ल करने के लिए लाए थे वो उसे गोली मारकर कत्ल करते, अब वह बिना गोली के कत्ल हो गया था। ऐसी निर्ममता के साथ तो वे भी उसे नहीं मार सकते थे।
अब उनका यहां रुकना बेकार था, फिर इस बेढ़व मदारी का खौफ था ही। चारों अपने-अपने घोड़े की तरफ लपके उछलकर उन पर सवार हुए और उन्हें एड़ियां मारकर हवा हो गए। जंगल में कुछ देर तक उनके गोड़ों की टापों की आवाज गूंजती रही, फिर मध्यम पड़ गई।
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