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स्वाहा

दरवाजे पर वह वैसे ही रखा था। उल्लू बड़े शांत भाव से बैठा हुआ था। रेखा को देखकर उस उल्लू ने अपनी गर्दन जरा-सी टेढ़ी की और एक अजीब सी आवाज निकाली। रेखा को यही लगा था जैसे उल्लू ने उसे देखकर शी दर्शाई हो।

रेखा ने कुछ सोचा और फिर कुण्डा पकड़कर पिन्जरे को उठा लिया। उल्लू ने कोई उछल-कूद न मचाई थी। रेखा पिनजरा उठाए नीचे उतर आई। उसने इधर-उधर देखा। उसे गंगा मौसी की तलाश थी। इस जीने का एक रास्ता घर के अन्दर जाता था और दूसरा रास्ता थोड़ा-सा घूमकर बाहर के लीन की तरफ। उसने पिंजरे को बाहर बाले दरवाजे की • तरफ छोड़ा और खुद गंगा मौसी के कमरे की तरफ भागी ।

गंगा मौसी अभी पूजा करके हटी ही थी कि रेखा को इस तरह बदहवास कमरे में घुसते हुए देखा तो क्षण भर के लिए घबरा गई।

"क्या हुआ रेखा! खैर तो है...?"

"खेर कहां है, मौसी !" वह नीचे कालीन पर ही उनके निकट बैठ गई।

"बीबी आपकी चाय यहीं ले आऊं या बाहर पीएंगी।" माया ने कमरे में आते हुए पूछा।

"माया, देखो वह पिन्जरा सीढ़ियों के करीब रखा है तुम उसे उठाकर बाहर दीवार के साथ रख आओ। कहते हैं-उल्लू

बड़ा मनहूस होता है। जहां बैठता है-दीरानी फैल जाती है।"

"उल्लू...!" गंगा मौसी एकदम चौंकी "कहां है उल्लू..?"

"हाय, बीबी ! मुझे डर लगता है। वह मेरे पिन्जरा उठाते ही मुझ पर झपटता है।” माया सहम सी गई।

" अच्छा तुम इसे रहने दो और मेरी चाय इधर ही ले आओ।" रेखा तेजी से बोली।

"जी, ठीक है बीबी!" माया आदरपूर्ण स्वर में बोली और तेजी से कमरे से निकल गई। यही डर था दिल में कि कहीं उसे पिन्तरा उठाने को न कह दें।

गंगा मौसी का मुंह मारे हैरत के अभी तक खुला हुआ था। यही नहीं समझ पा रही थी कि या अचानक उल्लू कहां से आ गया... और वह भी पिन्जरे में गंगा मौसी ने फिर सवाल करना चाहा कि रेखा ने हाथ के इशारे से उन्हें सब करने को कहा और बोली-

"मैं बताती हूँ, मौसी । आप परेशान न हों।"

और फिर रेखा ने मौसी को उल्लू की कहानी सुना दी कि वह कहां से आया है और कैसे आया है। इस बीच माया चाय दे गई थी।

"अरे, वह कौन मनहूस शख्स था जो अपने लगे सगे को हमारे हवाले करके चला गया।" मौसी की परेशानी, झल्लाहट बन चली थी "रेखा तुम जल्दी से इस मनहूस को अपने घर से निकालो।"

"मौसी, परेशान होने की जरूरत नहीं है, में अभी उसका कुछ बन्दोबस्त करती हूँ।" रेखा ने उन्हें तसल्ली देते हुए कहा- हालाकि खुद उसकी अपनी जान निकली जा रही थी।" मौसी, सुनिये! मैंने यह लिफाफा खोल लिया है- "रेखां ने लिफाफा उनके सामने लहराया।'

"अरे, हां? क्या निकला इसमें..?" मौसी क्षण भर के लिए उस उल्लू को भूल गई ।

" एक कागज है इसमें मौसी उस पर हाथ से दो तस्वीरें बनी हुई हैं।" रेखा ने बताया ।

"लेकिन वह तो तुम्हारे किसी सपने और उसके फल-हल की बात कर रहे थे। रेखा तुमने मुझे बताया नहीं कि कैसा ख्वाब देखा था। "

"बस मौसी में आज आपको बताती। मैं पिछले पांच दिनों से निरन्तर वह सपना देख रही थी।"
 
"अरे, रेखा क्या कोई डरावना ख्वाब था वह। "

"ऐसा ख्वाब मौसी कि ख्याब देखने के बाद जब मेरी नींद टूटती तो मेरी जान निकली हुई होती।" रेखा सहम गई। "तो पगली मुझे बताय क्यों नहीं। अकेली ऊपर सोती है। अब मत सोना ऊपर...।"

" अरे नहीं मौसी...।" रेखा बे बात मुस्कराई "ऐसा भी क्या डरना बस थोड़ी देर डर लगता है फिर मैं सो जाती हूँ, मैं आपको ख्वाब बताती हूँ, फिर आपको ये तस्वीरें दिखाऊंगी? दादा जी ने लिफाफा अकेले में खोलने की हिदायत की थी और ख्वाब बताने या यह तस्वीरें किसी को दिखाने की तो कोई हिदायत है नहीं उनकी ।"

फिर रेखा ने पूर्व विवरण के साथ अपना वह सपना मौसी के सामने दोहराया।

"अरे यह वही मनहूस उल्लू तो नहीं है, जो तुम्हें झोपड़ी की छत पर बैठा दिखाई देता है।" गंगा मौसी को ख्वाब सुनकर वह उल्लू फिर याद आ गया- "रेखा, तुम भी अजीब लड़की हो, तुम ख्वाब में कोई ढंग की चीज नहीं देख

सकर्ती...।"

"मौसी, ख्वाब अपनी मर्जी से कहां दिखाई देते हैं।" रेखा असहाय-सी बोली।

"अच्छा, लिफाफे में क्या है?"

"यह देखिए मेरे ख्वाव की तस्वीरें।" रेखा ने कागज निकालकर उनके सामने किया। उसने पहले वह तस्वीर दिखाई जिसमें झोपड़ी, उल्लू और सांप बना था।

"अरे, यह तो बिल्कुल तुम्हारा ख्वाब ही है।"

"अब जरा पलटकर देखिये तब आपको इस ख्वाब का हल नजर आएगा। इस पहेली का हल...।"

गंगा मौसी ने कागज पलटा और इस तरफ बनी तस्वीर देख वह एकाएक ही कांप-सी गई। उनके मुंह से बेअख्तयार

निकला- "नहीं।" और चेहरा पीला पड़ता चला गया। "क्या हुआ मौसी ?" रेखा ने पूछा "आपने इस दरवाजे को पहचाना?"

" पहचान ही तो लिया है। इसलिए ही तो ऐसी खौफजदा हो रही हूँ। "

"यह उसी कमरे का दरवाजा है ना जिसे आप हमेशा लाक रखती हैं?" रेखा ने तस्वीक चाही ।

"हां, वही है।" मौसी की जुबान में अभी भी कम्पन था ।

रेखा ने कुछ सोचते हुए पूछा- "मौसी, एक बात बताएं- क्या दादा हरि ओम जी कभी इस घर में आए हैं?"

" आज तक नहीं।" मौसी ने ठण्डी सांस भरकर कहा ।

"फिर यह कितनी हैरानी की बात है मौसी, कि उन्होंने न सिर्फ मेरे ख्याब को जान लिया बल्कि इस कमरे की ठीक-ठीक निशानदेही भी कर दी। वह अगर दरवाजे के हैण्डल पर ताबीज लटका हुआ न दिखाते तो शायद इस दरवाजे को पहचानना मुश्किल होता...।"

"सवाल यह है रेखा, कि तुम्हारे सपने से इस दरवाजे का क्या सम्बन्ध ?" मौसी ने सवाल किया।

"कोई सम्बन्ध तो जरूर है, मौसी, वरना दादा जी को उसकी तस्वीर बनाने की क्या जरूरत थी। "

"तुम उस बंद कमरे के बारे में कुछ जानती हो...?"

''मैं जब से इस घर में आई हूँ.... मैंने उसे हमेशा बन्द ही देखा है और दरवाजे पर काले कपड़े में लिपटा हुआ ताबीज़ जो हैण्डल में लटका आ है। आपने उस कमरे के बारे में यही बताया है कि उस कमरे में काठ कबाड़ पड़ा है और वह स्वाहा

एक तरह का स्टोर है। "

"नहीं रेखा! मैंने गलत कहा था। दरअसल मैं नहीं चाहती थी कि तुम उसकी हकीकत जानकर डर जाओ। लेकिन अब तुमसे कुछ छिपाना बेकार है। अब यह मामला खतरनाक हो गया नजर आ रहा है।"

" अगर वह स्टोर नहीं हैं उसमें कोई सामान नहीं है तो फिर उसमें क्या है?" रेखा ने पूछा।

. "कुछ नहीं है, बिल्कुल खाली है और बिल्कुल सादा...।"

रेखा अपनी जिज्ञासा दबा नहीं पाई, एकदम बोली- "मौसी, उसका ताला खोलें-मैं उसे अन्दर से देखना चाहती हूँ।"

"हाय नहीं, रेखा। ऐसी बात सोचना भी नहीं...?"

"क्या मतलब मौसी ! क्या हो जाएगा...?"

"यह तो मैं नहीं जानती कि क्या हो जाएगा। लेकिन इतना विश्वास जरूर है कि कुछ-न-कुछ जरूर हो जाएगा। हमें इस कमरे को खोलने से मना किया गया है।" मौसी की आवाज में फिर कम्पन भर आया था।

"किसने मना किया है मौसी?" रेखा ने पूछा।

"उस शख्स ने जिससे हमने यह मकान खरीदा था।" गंगा मौसी ने बताया 'बासूदेव नाम के उस शख्स ने इस मकान को बड़े शौक से बनवाया था, लेकिन उसे इसमें रहना नसीब नहीं हुआ। बड़ी अजीब है इस मकान की कहानी।"

"कैसी कहानी ? मुझे सुनाओ ना मौसी।" रेखा बेचैन हो उठी।

और गंगा मौसी ने कहानी सुनाई।
 
इस मकान की कहानी सच ही में बड़ी अजीब थी।

..एक हजार गज में बना हुआ यह एक दो मंजिला मकान था। इस मकान के दांए बांए कोई दूसरा मकान नहीं था। दाई तरफ केवल महज चारदीवारी थी और बांए तरफ वाले प्लाट की सिर्फ नवि भरकर छोड़ दी गई थीं। हां पिछले वाले प्लाट पर मकान बना हुआ था और वह आबाद नहीं था। इस मकान के सामने साठ फुट चौड़ी सड़क थी और इस सड़क के उस तरफ तमाम मकान बने हुए थे।

• बंगलों व मकानों के निर्माण से पहले यहां झोपड़ियां पड़ी हुई थीं जहां भवन निर्माण में लग वे मजदूर परिवार आबाद थे जिनकी औरतें व मर्द दोनों मिलकर रोजी कमाते थे। तब कहीं जाकर शाम को उनके घरों में चूल्हे जलते थे। ये बराबर के तीनों प्लाट तीन भाईयों ने खरीदे थे। दो भाई बाहर थे और तीसरा जिसका घर परिवार यहीं था वह एक फर्नीचर की बड़ी दुकान का मालिक था। सबसे पहले उसने अपने प्लाट पर निर्माण शुरू कराया। उसने तीनों प्लाटों की बाऊंड्री वॉल बनवाई और एक चौकीदार रख दिया जो चौबीस घन्टे इन खाली प्लाटों पर रहता। चौकीदार का नाम अलीखान था।

एक रात जब अलीखान की अचानक आंख खुली तो उसने रात के सन्नाटे में घुंघरुओं की आवाज सुनी। कोई एक बजे का टाईम होगा। तेहरवीं का चांद निकला हुआ था। हर तरह चांदनी छिटकी हुई थी। अलीखान अपनी चारपाई से उठकर अपनी झोपड़ी के दरवाजे पर आया तो उसने सामने राक विचित्र अनूठा नजारा देखा।

वह कोई मलंग किस्म का बन्दा था जो अपने दोनों हाथ ऊपर उठाए एक टांग से छ: फुट ऊंची दीवार पर नाच रहा था धुंधरुओं की आवाज गूंज रही थी। वह मलंग-सा शख्स दीवार पर पूरी रक्षता व बहुन ही खूबसूरत नाच रहा था। जैसे वह दीवार न होकर जमीन या फर्श पर हो।

हालांकि यह नजारा एक अच्छे-भले आदमी के होश उड़ा देने के लिए काफी था लेकिन अलीखान पर इसका कोई खास असर नहीं हुआ। वो फौरन पलटकर अपनी झोपड़ी में आया। लालटेन की लौ को जरा तेज किया। चारपाई के सिरहाने रखी अपनी मोटी लाठी उठाई और बाहर आ गया।

बाहर आकर उसने टीन के कनस्तर में जीर-जीर से लाठी मारी। कनस्तर की आवाज से पूरा इलाका गूंज उठा। नाच करता बह मलंग देखते ही देखते दीवार पर से गायब हो गया।

उस मलंग को इस तरह नाच करते हुए अलीखान ने ही नहीं-झोपड़ियों में रहने वाले दूसरे मजदूरों ने भी देखा। उस मलंग का यूं नाचने का क्रम जारी रहा। ये लोग भी इस नाच के आदी हो गए कि अगर कोई शख्स दीवार पर नाचता है। तो नाचा करे... उनका क्या बिगड़ता है। अलीखान ने शुरु-शुरु में इस शख्स की परवाह की लाठी से कनस्तर बजाया, लेकिन जब उस मलंग ने रोज ही नाच दिखाना शुरु कर दिया तो अलीखान ने उस पर सौ बार लानत भेजी और पैर पसार कर आराम से सोने लगा।

जल्दी ही बीच वाले प्लाट पर निर्माण कार्य आरम्भ हो गया। लोगों ने देखा कि रातों-रात खाली जमीन पर एक शानदार मकान ने खड़ा होना शुरू कर दिया। दीवारें उठी फिर जल्दी ही मकान पर छत पड़ गई। छत पड़ते ही एक हादसा हुआ।

एक रात अलीखान अपनी चारपाई पर मुर्दा पाया गया।

और यह मालूम न हो सका कि यह कैसे मरा जाहिरा उसके शरीर पर किसी प्रकार के चिन्ह न थे, न ही उसकी हत्या. की गई थी। जिन लोगों ने उसकी लाश देखी थी, वे बताते हैं कि अलीखान अपनी चारपाई पर इस तरह लेटा हुआ था जैसे सो रहा हो। यह सम्भावना भी थी कि सोते में उसका हार्ट फेल हो गया हो ।

अलीखान के इस दुनिया से उठ जाने के बाद कोई चौकीदार ज्यादा समय तक इस मकान की निगरानी न कर सका। चौकीदार कुछ बताए बिना ही गायब हो जाता और सोचा यही जाता कि शायद की वजह से वे कुछ कहे सुने बिना ही वहां से रफू चक्कर हो जाते हैं।

फिर इस मकान का निर्माण कार्य रुक गया। मालिक मकान बाहर चला गया।

रात के वक्त यह अधूरा मकान बड़ा भयानक नजारा पेश करता। एक भयावह दृश्य। उस लंगड़े मलंग का नाच जारी था.
 
अब यह नाच उस निर्माणाधीन अधूरे मकान को छत पर होता । सड़क के उस पार झोपड़ियों में रहने वाले

राजस्थानी मजदूर प्राय: मलंग के इस नाच को देखा करते।

सात साल बाद फिर इस मकान का निर्माण शुरू हुआ। दो तीन माह काम हुआ। उसके वाद फिर बंद हो गया। काम बंद होने की वजह भी बड़ी माकूल थी। एक दिन मालिक मकान अपने बीवी बच्चों को बंगले का निर्माण दिखाने लाया। बीवी और उसके बच्चों नं अच्छी तरह मकान को देखा। ये लोग छत पर भी गए।

. कोई आधे फटे के बाद वीवी बच्चे घर जाने के लिए गाड़ी में बैठने लगे तो पता लगा कि चार वर्षीय लड़का अमित

गायब है। मां-बाप ने पहले तो उसे आवाजें दीं लेकिन कोई जवाब न मिला, घबराये से मां-बाप निर्माणाधीन बंगले के अन्दर भागे। मकान के हर हिस्से, हर कोने में उसे तलाश किया मगर अमित कहीं नहीं मिला। अचानक ख्याल आया कि वाटर टैंक में भी देख लिया जाए। बस देखना ही गजब हो गया। मां टैंक में झांकते ही चीख मारकर बेहोश हो गई। चार वर्षीय अमित टैंक में तैर रहा था। उसे जल्दी से निकलाकर बेहोश मां सहित फौरन

अस्पताल में पहुंचाया गया। लेकिन वह तो कभी का मर चुका था।

बंगले का निर्माण फिर रुक गया। निर्माण सामग्री पड़ी थीं लेकिन वहां कोई चौकीदार दो-तीन दिनों से ज्यादा टिकता ही नहीं था। अब यह वात सावित हो गई थी कि इस भवन पर कोई ऊपरी साया है। स्यानों व टोने-टोटके करने वालों की तलाश आरम्भ हो गई। कितने ही स्थानों को मौका-ए-वारदात पर लाया गया लेकिन कोई भी ऐसा पक्का अमल न कर सका जिससे मकान पर से बुरा प्रभाव दूर हो जाए।

तांत्रिक व आमल की तलाश जारी रही। फिर किसी ने एक 'आमिल' का पता बताया। लेकिन वो पेशेवर आमल न थे सरकार थे रूहानी अलमों में माहिर थे। जरूरतमन्दों की मदद करते थे। तावीज गण्डे देते थे लेकिन वो यह सब काम जनहित के लिये करते थे। बदले में दुआओं के इच्छुक रहते थे रुपये-पैसे के नहीं।

मकान मलिक की परेशानी देखकर उन्होंने इस मकान का 'साया' दूर करने की हामी भर ली। दोपहर को जब बेहद

तेज सख्त धूप थी वो आमिल जिसका नाम रोशन अली था मकान मालिक के साथ इस निर्माणाधीन बंगले पर

आए पूरे बंगले का एक चक्कर लगाया। उसके बाद एक कमरे में आकर खड़े हो गए। मकान मालिक का इशारा

किया कि वो बाहर गाड़ी में जाकर बैठे।

और फिर लगभग आधे घन्टे बाद रोशन अली बंगले से बाहर आए। पसीने से नहाये हुए उन्होंने इशारे से मकान मालिक को अपने साथ आने को कहा। और फिर रोशन अली फिर उसी कमरे में जा खड़े हुए, जहां पहले रुके थे। इम कमरे में अभी चौखट दरवाजे नहीं लगे थे।

"इस कमरे को गौर से देख लें। " रोशन अली ने मकान मालिक से कहा ।

"मैं समझा नहीं।" मकान मालिक ने परेशान होकर पूछा।

"आप चाहते हैं कि इस बंगले की तमीर (निर्माण) मुकम्मल हो जाए?" रोशन अली ने पूछा। "जी! इसीलिए तो मैं आपको यहां लेकर आया हूँ...।"

"फिर एक काम करना होगा।"

" हुक्म दीजिए! मैं हर काम करने के लिए तैयार हूँ...।"

"इस कमरे में कोई खिड़की नहीं होगी...।" पहली हिदायत मिली।

"ठीक है। मैं यह खिड़कियां बन्द करवा दूंगा।" मकान मालिक ने हामी भरी।

"इस कमरे में मैं जो रंग बताऊंगा वही होगा ।" दूसरी हिदायत हुई।

"जी जरूर होगा।"

"जब यह कमरा और पूरा बंगला तैयार हो जाएगा तो एक रात में इस कमरे में गुजारुगा। सुबह दिन निकलते ही मैं बाहर आऊंगा और इस कमरे को लॉक कर दूंगा। इसके हैण्डल में एक ताबीज लटका दूंगा और यूं यह कमरा हमेशा के लिए बंद हो जाएगा।" रोशन अली ने स्थिति स्पष्ट की थी।
 
"हमेशा के लिए बंद हो जाएगा।" मकान मालिक हैरान रह गया।

"जी हां-हमेशा के लिए बंद हो जाएगा।" दृढ़ निर्णायक स्वर में कहा गया। "अजीब बात है, मकान मालिक ने टिप्पणी की, फिर दबे स्वर में पूछा। फिर.... होगा?" फिर उसके बाद तो यहां कुछ नहीं

"कुछ नहीं होगा! हमेशा के लिए शान्ति हो जाएगी।" रोशन अली ने यकीन दिलाया।

" रौशन अली साहब! यह सब है क्या?"

"जो कुछ भी है आपके सामने हैं इतने अर्से से भुगत रहे हैं फिर भी पूछ रहे है?"

"मेरी तो अक्ल दंग है।"

" मियां साहबजादे ... रोशन अली अपनत्वपूर्ण लहजे में और समझाने वाले अंदाज में बोले।" यह दुनिया एक अजायबघर है। जो मैं देखता हूँ-अगर वह तुम देख लो तो पगलाये पगलाये फिरो । आओ, अब यहां से चलें।

रोशन अली ने कुछ न कहा और कह भी गए। वह कुछ कहते-कहते रुक गये थे।

बहरहाल, मकान मालिक वासूदेव ने हौसला किया और निर्माण कार्य फिर शुरू हो गया। दुगनी लेबर लगाई गई और बहुत तेजी से निर्माण कार्य पूरा हुआ। फिर रंग-रोगन शुरु करा दिया। वासूदेव ने उस प्रेत-ग्रस्त कमरे में कोई खिड़की नहीं रखी थी। अब रोशन अली से पूछकर उनकी हिदायत के मुताविक ही इस कमरे में रंग करवाना था। वासुदेव ने रोशन अली से बात की तो रोशन अली ने उसे शाम को अपने घर बुलाया।

वासूदेव उनके घर पहुंचा तो उन्होंने एक छोटी-सी शीशी में काले रंग का कोई घोल दिया और हिदायत दी-

"उस पूरे कमरे में काला रंग करवाना है यहां तक कि छत पर भी काला रंग होगा। इस शीशी का पानी रंग में मिलवा देना। यह मंत्र पढ़ा हुआ पानी है। एक बात का और आल रखना पेस्ट का काम एक दिन में और सूरज डूबने से पहले हर सूरत में खत्म हो जाना चाहिये। रंग होने के बाद दरवाजा बन्द करके लॉक कर देना। उसके बाद कोई भी प्राणी इस कमरे में नहीं जाएगा तुम भी नहीं। जब मकान हर तरह से पूरा हो जाये तो मुझे इत्तला देना। मैं रात को वहीं रहूँगा । समझ गए मेरी बात ?"

“जी बिल्कुल....।" वासूदेव ने कहा और फिर शकित भाव से ही शीशी के पानी को देखते हुए पूछा-

"इसमें क्या है?"

"यह उल्लू के कलेजे का पानी है।" रोशन अली ने लापरवाही से कहा- "इसके अलावा इसमें एक चीज और भी मिलाई गई है। "

"वह क्या...?"

"वह नहीं बताया जा सकता...।" रोशन अली ने कौरा जवाब दिया।

"जैसी आपकी मर्जी । "

बहरहाल, फिर वासूदेव ने रोशन अली के निर्देशानुसार अपनी निगरानी में सारे काम करवा दिए। फिर वह वक्त भी आया, जब मकान पूर्णत: तैयार था। बासुदेव ने उस आमिल रोशन अली को बंगले पर आन का निमन्त्रण दिया।

रोशन अली पहुंचे और रात ठीक बारह बजे उस कमरे में दाखिल हुए। रात भर भीतर ही रहे और सुबह पी फूटते ही. कमरे से बाहर आ गए। अन्दर कमरे में उन्होंने क्या किया वह रात उन्होंने किस तरह गुजारी, इस बारे में उन्होंने नहीं बताया। उन्होंने दरवाजा बंद किया उसे ताला लगाया और अपनी जेब से एक काले रंग का ताबीज निकालकर दरवाजे के हैण्डल पर लटका दिया और मकान मालिक बासूदेव को अपने साथ आने का इशारा किया।
 
गाड़ी में बैठकर रवाना हुए और फिर रास्ते में उन्होंने बासूदेव को बताया "भाई बासूदेव जी एक बात कहना चाहता हूँ

मगर समझ में नहीं आता कि किस तरह कहूँ।"

" रोशन अली साहब, सब कुशल तो है?" वासुदेव ने फड़कते दिल के साथ पूछा।

""वासूदेव जी, हमने तो बहुत समझाया मगर वो मान कर ही नहीं दिया। " रोशन अली मायूस से बोले ।

"कौन मानकर नहीं दिया?" वासूदेव समझ नहीं पाया।

"वही काले कमरे वाला।" रौशन अली संजीदा दिखने लगे थे, कुछ चिन्तित

भी। वासूदेव समझ गया। धीमे से पूछा - "आपने क्या और उसने क्या नहीं माना ?"

"वासूदेव जी ! मैं जानता हूँ कि आपने यह बंगला बड़े शौक से बनवाया है मगर इस मकान में रहना नसीब नहीं होगा। वह काले कमरे वाला कबूल करने को हरगिज तैयार नहीं । तुम्हें यह बंगला हर कीमत पर बेच देना होगा। अगर तुमने इस मकान में रहने की जिद की तो तबाही फैलेगी। बस हम इतना ही बता सकते हैं और यह अटल है। फिर उसकी एक हिदायत और भी है कि यह मकान ऐसे लोगों को बेचा जाए जिनका परिवार बहुत छोटा हो। बच्चे तो बिन्दुल न हों। "

"अजीब शर्त है।" वासूदेव ने अपना सिर पकड़ते हुए शिकायती लहजे में कहा--"फिर क्या फायदा हुआ इतना सब कुछ करने का, रोशन अली साहब, जब मैं उस बंगले में रह ही न सकूंगा....।"

"फायदा यह हुआ कि तुम्हारा यह बंगला बिक जाएगा। दूसरी सूरत में यह बंगला बन ही नहीं सकता था हमेशा के

लिए यूं ही पड़ा रहता जैसे दांए-बांए के प्लाट पड़े हैं। उन प्लाटों पर कभी कोई मकान नहीं बन सकेगा।" रोशन

अली ने रहस्योद्घाटन किया।

वासूदेव घबरा गया । वह... वह मेरे भाईयों के प्लाट है। कुछ कीजिए न...।"

"मैं जो कर सकता था वह कर दिया जो बता सकता था बता दिया है। वासूदेव जी, अब तुम जानो और तुम्हारा

काम। बस हमें हमारे घर तक छोड़ दें...।" इतना कह उन्होंने चुप्पी साध ली।

जब घर आ गया तो गाड़ी से उतरकर अल्लाह हाफिज कहा और पीछे पलटकर भी न देखा ।

टोने-टोटकों में माहिर इस रोशन अली के स्पष्ट निर्देशों के बावजूद वामूदेव के दिल में अविश्वास पैदा हो गया। उसने सोचा कि रोशन अली ने प्रेत को कमरे में बंद कर ही दिया है अब 'कमरे वाले' को इस बात से क्या लेना-देना कि बंगले में वासूदेव रह रहा है या कोई और।

वासूदेव के इस विचार का समर्थन उसके कुछ प्रियजनों ने भी किया।

और यूं वासूदेव ने अपने इस शौक में बनाये इस खूबफ्त मकान में शिफ्ट होने का फैसला कर लिया। अपने इस बंगले के लिए उसने नया फर्नीचर बनवाया था। सबसे पहले उसने वह फर्नीचर वहां पहुंचा दिया। कमरों में कालीन पहले ही बिछाये जा चुके थे। फर्नीचर सेट करने के बाद घर एकदम जगमगा उठा।

लेकिन अगले ही दिन जब वासूदेव और सामान लेकर आया और बंगले में पूरा तो उसकी अक्ल गुम हो गई। हर कमरे में बिछा कालीन और वेशकीमती फर्नीचर कोयले की तरह काला हो चुका था। आग लगी होने का कोई लक्षण-दीवारों पर या दरवाजो खिड़कियों पर कहीं भी नजर नहीं आते थे, लेकिन कालीन व फर्नीचर जलकर कोयला हो चुके थे।

झटका लगा तो वासूदेव को रोशन अली याद आए। उन्होंने गलत न कहा था कि वासूदेव की जिद्द तबाही को दावत

देगी। और वासूदेव यह तबाही अपनी आंखों से देख रहा था।

वासूदेव ने फौरन कान पकड़े और मकान बेचने का, विज्ञापन, अखबारों में दे दिया।
 
यह सशर्त 'एड' अमर ने पड़ी तो उसकी दिलचस्पी जागी और उसने फौरन वासूदेव को कान्टेक्ट किया। शाम को बंगला देखा। बंगला बेहद खूबसूरत था। उसे बहुत पसन्द आया । वासूदेव ने उससे कोई बात नहीं छिपाई। यह बंगला बनाने के सिलसिले से उस पर जो गुजरी थी वह सव बिना कम-ज्यादा किये सुना डाली।

बंगले के बारे में यह रोंगटे खड़े कर देने वाला विवरण सुनकर अमर थोड़ा हिचकिचाया। उसे हिचकिचाते देख वासूदेव ने उसे फौरन रोशन अली का फोन नम्बर दे दिया कि अमर उससे मिलकर, चाहें तो अपनी तसल्ली कर लें।

अमर, रोशन अली से मिला। रोशन अली के बारे में उसने पहले ही सुन रखा था। उसने रोशन अली को बताया कि वह 'काले कमरे' वाला मकान खरीदना चाहता है। यह भी बताया कि घर में सिर्फ दो प्राणी हैं- एक वह और एक उसकी गंगा मौसी और उसका शादी करने का भी कोई इरादा नहीं है। रोशन अली र्का निगाह में यह उस बंगले के लिए उपयुक्त पार्टी थी।

रोशन अली ने अमर को विश्वास दिला दिया कि अमर निःसंकोच वह बंगला खरीद सकता है कि उन्हें उस बंगले में कोई नुकसान नहीं पहुंचेगा उंघेर न ही कोई कष्ट ।

और यूं अमर ने वासुदेव से यह मकान खरीद लिया था।

इस मकान में रहते हुए उन्हें अब अर्सा हो गया था। कभी कोई बात सामने नहीं आई थी। हां, उन्होंने रोशन अली की हिदायतों व निर्देशों पर पूरा-पूरा अमल किया था। उस बंद काले कमरे के प्रति कभी कोई जिज्ञासा या दिलचस्पी भी नहीं दिखाई थी। न ही कभी किसी आने-जाने वाले को उस कमरे के बारे में कुछ बताया था। वैसे भी वह कमरा, एक तरफ हटकर व सबसे अन्त में था, मकान के पिछवाड़े जाने के लिए ही उसके सामने से गुजरना पड़ता था। बाहर का आदमी उधर जाता नहीं था और घर के लोगों को पिछले हिस्से में जाना होता तो बैडरूम का एक दरवाजा बाहर की ओर खुलता था।

नौकरानी माया को भी इस कमरे की हकीकत का पता नहीं था। उसे भी बस इतना ही पता था कि इसमें काठ कबाड़

पड़ा है। हां गंगा मौसी से अमर ने कोई बात नहीं छिपाई थी।

रेखा को इस धर में आए लगभग एक साल ही हुआ था।

गंगा मौसी ने उसे इस कमरे के बारे मैं कुछ न बताया था। और रखा के मिजाज में जिज्ञासा न थी सो उसने इस कमरे को, जैसा कि उसे बताया गया था, एक स्टोर रूम के रूप में कबूल कर लिया था ।

लेकिन आज, मौजूदा सनसनीखेज अविश्वसनीय हालत मैं जब रेखा ने गंगा मौसी को दादा हरि आम के दिये लिफाफे से निकले कागज को दिखाया और कागज पर बने रेखा चित्रों पर मौसी की नजर पड़ी तो कुछ क्षणों के लिए तो वह कांपकर रह गई।

रेखा, गंगा मौसी से इस बंगले व काले कमरे की कहानी सुन कर दहल उठी।
 
कुछ देर संगीन खामोशी रही।

रेखा तो जैसे इस सिलसिले में कुछ कहते हुए भी डर रही र थी। खामोशी हो बोझ बन गई तो रेखा ने अपने होठों पर जिव्हा फिराई व बोली- "यह... यह सब क्या हो रहा है, मौसी ?"

"मेरी ती कुछ समझ में नहीं आ रहा है।" मौसी परेशान लहजे में बोली- "तुम्हारा सपना देखना... फिर तुम्हारे दादा हरि ओम का तुम्हें लिफाफा देना... लिफाफा में काले कमर के दरवाजे की तस्वीर निकलना और फिर किसी शख्स का • पिन्जरे में वंद उल्लू दे जाना। प्रभु कृपा करें, रेखा...। जाने क्या होने वाला है।"

तभी माया कमरे में आई। वह बेहद घबराई हुई थी। वह वाली और उसके मुंह से सिर्फ इतना ही निकला था-

"बीबी...वो... उल्लू।"

"हा, क्या हुआ उल्लू को ?" रेखा ने धबराकर पूछा, वह माया की हालत देखकर सहम गई थी।

"वो...वो मर गया बीबी... उसे किसी ने मार दिया। वहां खून ही पड़ा है... खून... ही... खून...।" माया ने अटक अटक कर बताया।

"यह कैसे हो सकता हैं, माया ! यह तुम क्या कह रही हो?" रेखा का दिल कांप रहा था।

"जो देखा वही कह रही हूँ, बीबी आप खुद चलकर देख लें....।" माया भी खुद को कहां सम्भाल पा रही थी।

रेखा और माता-माया के पीछे-पीछे सीढ़ियों तक पहुंची। सीढियों के पास पहुंच कुछ क्षण नक वे गूंगा ही खड़ी रह गई। माया ने गलत न कहा था वहां पिन्तजरे में चारों तरफ खून ही खून पड़ा था।

इतना खून! एक इतने से पक्षी में बकरे जितना खून कहां से आया भला ?

उस उल्लू का एक पंख खुला हुआ था। गर्दन अजीब तरह से मुड़ी हुई थी और पेट में छेद था... एक खासा बड़ा घाव । ऐसा लगता था जैसे किसी ने किसी तेज धार हथियार से उसका पेट फाड़ दिया हो। उसका पिन्जरा बिल्कुल सही अवस्था में था। दरवाजा बन्द था। यह सदेह भी नहीं किया जा सकता था कि दरवाजे खुल जाने की स्थिति में किसी बिल्ली-बिल्ली ने उसे झंझोड़ डाला हो ।

वे तीनों अभी साकत हतप्रद इस भयावह दृश्य का ही नजारा कर रही थीं कि अचानक रेखा की नजरें उन पद चिन्हों पर पड़ी जो उल्लू के खून से निकलकर बरामदे की तरफ चले गए थे। ये नंगे पैरों के निशान थे... पैरों की पांचों उंगलियों व ऐड़ी का निशान बहुत स्पष्ट था।

"ये... ये.... पैरों के निशान किसके हैं ?" रेखा ने सहमी निगाहों से गंगा मौसी की तरफ देखा ।

गंगा मौसी भी उन पद चिन्हों को ही देख रही थी, उसने तेज आवाज में पूछा- "माया! क्या तू घुसी थी इस खून में... 1"

"क्या कह रही हैं, बड़ी बीबी ! मे... मे... जाऊंगी खून में... मेरा तो देखकर ही दम बाहर आ रहा है...।"

"मौसी !" रेखा बोली - "कदमों के निशान तो बरामदे की तरफ मुड़ गए हैं। आईए-आगे चलकर देखते हैं...।"

गंगा मौसी और रेखा हिम्मत करके आगे बढ़ी। घर की सारी लाईट्स ऑन थीं। रोशनी में खून से सने कदमों के निशान साफ स्पष्ट नजर आ रहे थे। राहदारी के घूमते ही ये निशान राहदारी में दूर तक दिखाई दिए। वे ज्यों-ज्यों आगे बढ़ते गए ये पद चिन्ह मध्यम पड़ते गए।

न तो ये निशान मकान के पिछवाड़े की तरफ गए थे और न ही दाई तरफ सीढ़ियों के नीचे उतरे थे कि सोचा जा सकता कि आने वाला फ्लांग कर, साथ वाले, खाली प्लाट के अहाते में चला गया। बल्कि ये निशान आगे जाकर आखिरी कमरे के दरवाजे पर जा खत्म हुए थे।

और राहदारी का यह आखिरी कमरा वही ताला लगा कमरा था- जिसके दरवाजे के हैण्डल पर काला तावीज लटका हुआ था
 
इस बंगले का वही काला कमरा जो आरम्भ से ही बन्द था।

पद-चिन्ह दरवाजे पर आकर रुक गये थे। यही लगता था कि वो शख्स इस कमरे में अन्दर चला गया है और उसने अन्दर जाकर दरवाजा बन्द कर लिया है।

लेकिन इस काले कपूरे का दरवाजा बन्द था ताला भी लगा था और उसके हैण्डल पर काला ताबीज पूर्ववत था जो रोशन अली ने लटकाया था। खून से सने कदमों के निशान यहां खत्म होते देखकर उन तीनों के ही दिल तेजी से । धकड़ने लगे। वे तीनों गैरइरादी तोर पर एक-दूसरे के करीब आ गई।

"मौसी यह क्या है?" रेखा ने उसकी तरफ ड़री ड़री निगाहों से देखा ।

"प्रभु कृपा करें। " गंगा मौसी भीतर से कांप उठी।

"बीबी, यह तो स्टोर में घुस गया है।" माया ने अपनी राय पेश की। वह इस वन्द कमरे की कहानी से अनजान थी, वरना वो तो शायद इस घर की नौकरी ही छोड़कर कमी की जा चुकी होती।

"आजा, मेरी बच्ची, आ जा...। " गंगा मौसी ने रेखा का हाथ पकड़ा और अपने घुटनों की तकलीफ के बावजूद,

जिस कदर तेज चल सकती थी, चलीं।

उन्होंने अपने कमरे मे आकर ही दम लिया। इतनी सी ही देर में बुरी तरह हांफने लगी थी। उन्होंने इशारे से पानी मांगा। रखा ने फ्रिज में से पानी निकालकर उन्हें पिलाया पानी पीकर उन्होंने गहरा सांस लिया फिर चिन्तित स्वर में बोली-

"यह इस घर मे क्या शुम हो गया है?"

"मैं क्या कह । मौसी ?" रेखा स्वयं सहमी हुई थी।

गंगा मौसी ने कुछ कहने को मुंह खोला ही था कि कॉलबेल बनी।

"अमर आ गया।" मौसी की नैसे जान में जान आई थी 'जाओ, जाकर दरवाजा खाली।"

"यह उन्होने घन्टी क्यों बजाई है... हमेशा की तरह गाड़ी का हॉर्न क्यों नहीं दिया...?" रेखा उलझती हुई बोली।

"ओह, हां। मौसी चौकी, तुम ठीक कहती हो, माया! जरा देख तो कौन आया है?"

दरवाजे पर अमर ही था। वह गाड़ी सर्विस के लिए गैराज में छोडकर आया था। माया ने दरवाजा खोला तो अमर भीतर आ गया उसने कदम अन्दर रखते हुए पूछा- "मौसी और रेखा वापस आ गई?"

"जी, साहब जी । वे तो बहुत पहले ही आ गई थी।"

"मौसी कहा हैं?"

" अपने कमरे में।" माया ने बताया- "बड़ी गड़बड़ हो गई है, साहब जी ।"

"क्या हुआ माया? कुशल तो है न?" अमर गंगा मौसी के कमरे की तरफ बढ़ता हुआ बोला- "रेखा, ऊपर है?"

"नही जी रेखा बीबी भी बड़ी बीबी के पास ही हैं, उनके कमरे में।"

ऊपर जब सीढ़ियों के पास पहुंचा तो पिन्जरा और उसके गिर्द फैला खून देखकर बौखला गया- "यह क्या है?" फिर उसकी नजर पिन्जरे के अन्दर उल्लू पर पड़ी, "यह पिंजरा कहां से आया? और... और इसके अन्दर यह कौन-सा पक्षी है? इसे किसने मारा? "
 
"साहब जी ! अन्दर चलें बड़ी बीबी के पास...।" माया ने इतने सारे सवालों का एक ही जवाब दिया ।

अमर जब गंगा मौसी के कमरे में तो उन दोनों के चेहरों पर हवाईयां उड़ रही थीं। गंगा बैड पर टांग लटकाए बैठी थी और रेखा उनके कदमों में कालीन पर अमर रेखा के करीब आ बैठा ।

"यह बाहर क्या हुआ है?" उसने पूछा- "यह सब क्या चक्कर है? यह मरा हुआ पक्षी, खून...पिन्जरा...?"

रेखा बोली- "जी भाई! मैं आपको सारी बात बताती हूँ।" रेखा ने कहा-फिर माया को किसी बहाने बाहर भेज दिया। और फिर उसने सारी कहानी संक्षेप में ही अमर को सुना डाली।

यह कहानी रेखा के ख्वाब से शुरू होती थी। पहले उसने अपना ख्याब सुनाया उसके बाद बड़े दादा हरि ओम के बंद लिफाफे का जिक्र किया फिर एक रहस्यमय व्यक्ति के उल्लू का पिंजरा दे जाने की चर्चा की.. फिर यह बताया कि उस लिफाफे से क्या निकला। उसके बाद उल्लू के खून की कहानी सुनाई और यह बताया कि उल्लू के खून से सने कदमों के निशान कहा जाकर खत्म हुए है।

अमर के होश उड़ गए।

कुछ ही घन्टों में बात कहां से कहां पहुंच गई थी। उसे इन घटनाओं की ज्यादा चिन्ता न थी। लेकिन यह बात काले कमरे पर खत्म हो रही थी सबसे ज्यादा फिक्र व खौफ की बात यह थी। यह बंगला खरीदे उन्हें सात-आठ साल हो चुके थे और अभी तक खौफजदा कर देने वाली कोई घटना नहीं घटी थी। हकीकत यह थी कि काले कमरे और उससे जुड़ी कहानी को वे लोग भूल ही चुके थे।

बल्कि अमर तो कभी-कभी सोचता था कि पहले वाला मकान मालिक जरूर वहमी और अंधविश्वासी शख्स था कि वामख्वाह ही भयभीत होकर उसने सस्ते दामों बंगला बेच डाला कि यहां भूत-प्रेत नाम की कोई चीज नहीं है।

लेकिन अब...? अब रेखा की इस अविश्वसनीय, होश उड़ा देने वाली कहानी ने उसके होश सचमुच ही उड़ा दिए थे।

अमर गंगा मौसी के कमरे से निकलकर काले कमरे के दरवाजे पर पहुंचा। उसने उन खून आलूदा कदमों के निशानों को बड़े ध्यान से देखा। वे वाकई इस बन्द दरवाजे पर आकर खत्म हो गए थे। फिर वह उन निशानों को गौर से देखता हुआ पिंजरे तक पहुंचा। उसने मरे हुए उल्लू पर एक नजर डाली और एक बार फिर उन रक्तिम पद चिन्हों का अनुसरण करते चला। रेखा उसके पीछे चल रही थी। गंगा मौसी अपने कमरे से नहीं निकली थी।

"रेखा क्या आपने इन कदमों के निशानों को गौर से देखा है?" अमर ने सवाल किया।

"जी देखा है। निशान नंगे पांव के हैं। यही कहना चाहते हैं न आप?"

"हा, यह बात तो ठीक है, यह शख्य नंगे पांव था ।" अमर पद चिन्हों को गौर से देखते हुए बोला "इसके अलावा एक बात और है।"

"वह क्या भाई?" रेखा उसकी सूरत देखने लगी।

"यह सिर्फ एक पैर के निशान हैं?" अमर ने बताया ।

" एक पैर के निशान ?" रेखा कुछ उलझ सी गई- "मैं कुछ समझी नहीं, भाई...!"

"यह शख्स एक टांग का है...।" अमर ने रहस्योद्घाटन किया।

और यह सुनकर रेखा के जिस्म में खौफ की एक लहर दौड़ गई।

"एक टांग का...।" वह सहमकर बोली- यह आप कैसे कह सकते हैं?"

"यह बात बस इत्तफाक से मेरे जहन में आ गई है।" अमर निशानों की तरफ देखते हुए बोला- "यहां से वहां तक . जितने भी कदमों के निशान है ये सब एक ही पैर के निशान हैं और यह दांया पैर है। क्योंकि इन निशानों के अंगूठे का निशान पैर के बाई तरफ है। अगर ये दोनों पैरों के निशान होते तो अंगूठे का निशान पैरों के दोनों तरफ होता। इस शख्स का बांया पैर नहीं है।"
 
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