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दरवाजे पर वह वैसे ही रखा था। उल्लू बड़े शांत भाव से बैठा हुआ था। रेखा को देखकर उस उल्लू ने अपनी गर्दन जरा-सी टेढ़ी की और एक अजीब सी आवाज निकाली। रेखा को यही लगा था जैसे उल्लू ने उसे देखकर शी दर्शाई हो।
रेखा ने कुछ सोचा और फिर कुण्डा पकड़कर पिन्जरे को उठा लिया। उल्लू ने कोई उछल-कूद न मचाई थी। रेखा पिनजरा उठाए नीचे उतर आई। उसने इधर-उधर देखा। उसे गंगा मौसी की तलाश थी। इस जीने का एक रास्ता घर के अन्दर जाता था और दूसरा रास्ता थोड़ा-सा घूमकर बाहर के लीन की तरफ। उसने पिंजरे को बाहर बाले दरवाजे की • तरफ छोड़ा और खुद गंगा मौसी के कमरे की तरफ भागी ।
गंगा मौसी अभी पूजा करके हटी ही थी कि रेखा को इस तरह बदहवास कमरे में घुसते हुए देखा तो क्षण भर के लिए घबरा गई।
"क्या हुआ रेखा! खैर तो है...?"
"खेर कहां है, मौसी !" वह नीचे कालीन पर ही उनके निकट बैठ गई।
"बीबी आपकी चाय यहीं ले आऊं या बाहर पीएंगी।" माया ने कमरे में आते हुए पूछा।
"माया, देखो वह पिन्जरा सीढ़ियों के करीब रखा है तुम उसे उठाकर बाहर दीवार के साथ रख आओ। कहते हैं-उल्लू
बड़ा मनहूस होता है। जहां बैठता है-दीरानी फैल जाती है।"
"उल्लू...!" गंगा मौसी एकदम चौंकी "कहां है उल्लू..?"
"हाय, बीबी ! मुझे डर लगता है। वह मेरे पिन्जरा उठाते ही मुझ पर झपटता है।” माया सहम सी गई।
" अच्छा तुम इसे रहने दो और मेरी चाय इधर ही ले आओ।" रेखा तेजी से बोली।
"जी, ठीक है बीबी!" माया आदरपूर्ण स्वर में बोली और तेजी से कमरे से निकल गई। यही डर था दिल में कि कहीं उसे पिन्तरा उठाने को न कह दें।
गंगा मौसी का मुंह मारे हैरत के अभी तक खुला हुआ था। यही नहीं समझ पा रही थी कि या अचानक उल्लू कहां से आ गया... और वह भी पिन्जरे में गंगा मौसी ने फिर सवाल करना चाहा कि रेखा ने हाथ के इशारे से उन्हें सब करने को कहा और बोली-
"मैं बताती हूँ, मौसी । आप परेशान न हों।"
और फिर रेखा ने मौसी को उल्लू की कहानी सुना दी कि वह कहां से आया है और कैसे आया है। इस बीच माया चाय दे गई थी।
"अरे, वह कौन मनहूस शख्स था जो अपने लगे सगे को हमारे हवाले करके चला गया।" मौसी की परेशानी, झल्लाहट बन चली थी "रेखा तुम जल्दी से इस मनहूस को अपने घर से निकालो।"
"मौसी, परेशान होने की जरूरत नहीं है, में अभी उसका कुछ बन्दोबस्त करती हूँ।" रेखा ने उन्हें तसल्ली देते हुए कहा- हालाकि खुद उसकी अपनी जान निकली जा रही थी।" मौसी, सुनिये! मैंने यह लिफाफा खोल लिया है- "रेखां ने लिफाफा उनके सामने लहराया।'
"अरे, हां? क्या निकला इसमें..?" मौसी क्षण भर के लिए उस उल्लू को भूल गई ।
" एक कागज है इसमें मौसी उस पर हाथ से दो तस्वीरें बनी हुई हैं।" रेखा ने बताया ।
"लेकिन वह तो तुम्हारे किसी सपने और उसके फल-हल की बात कर रहे थे। रेखा तुमने मुझे बताया नहीं कि कैसा ख्वाब देखा था। "
"बस मौसी में आज आपको बताती। मैं पिछले पांच दिनों से निरन्तर वह सपना देख रही थी।"
रेखा ने कुछ सोचा और फिर कुण्डा पकड़कर पिन्जरे को उठा लिया। उल्लू ने कोई उछल-कूद न मचाई थी। रेखा पिनजरा उठाए नीचे उतर आई। उसने इधर-उधर देखा। उसे गंगा मौसी की तलाश थी। इस जीने का एक रास्ता घर के अन्दर जाता था और दूसरा रास्ता थोड़ा-सा घूमकर बाहर के लीन की तरफ। उसने पिंजरे को बाहर बाले दरवाजे की • तरफ छोड़ा और खुद गंगा मौसी के कमरे की तरफ भागी ।
गंगा मौसी अभी पूजा करके हटी ही थी कि रेखा को इस तरह बदहवास कमरे में घुसते हुए देखा तो क्षण भर के लिए घबरा गई।
"क्या हुआ रेखा! खैर तो है...?"
"खेर कहां है, मौसी !" वह नीचे कालीन पर ही उनके निकट बैठ गई।
"बीबी आपकी चाय यहीं ले आऊं या बाहर पीएंगी।" माया ने कमरे में आते हुए पूछा।
"माया, देखो वह पिन्जरा सीढ़ियों के करीब रखा है तुम उसे उठाकर बाहर दीवार के साथ रख आओ। कहते हैं-उल्लू
बड़ा मनहूस होता है। जहां बैठता है-दीरानी फैल जाती है।"
"उल्लू...!" गंगा मौसी एकदम चौंकी "कहां है उल्लू..?"
"हाय, बीबी ! मुझे डर लगता है। वह मेरे पिन्जरा उठाते ही मुझ पर झपटता है।” माया सहम सी गई।
" अच्छा तुम इसे रहने दो और मेरी चाय इधर ही ले आओ।" रेखा तेजी से बोली।
"जी, ठीक है बीबी!" माया आदरपूर्ण स्वर में बोली और तेजी से कमरे से निकल गई। यही डर था दिल में कि कहीं उसे पिन्तरा उठाने को न कह दें।
गंगा मौसी का मुंह मारे हैरत के अभी तक खुला हुआ था। यही नहीं समझ पा रही थी कि या अचानक उल्लू कहां से आ गया... और वह भी पिन्जरे में गंगा मौसी ने फिर सवाल करना चाहा कि रेखा ने हाथ के इशारे से उन्हें सब करने को कहा और बोली-
"मैं बताती हूँ, मौसी । आप परेशान न हों।"
और फिर रेखा ने मौसी को उल्लू की कहानी सुना दी कि वह कहां से आया है और कैसे आया है। इस बीच माया चाय दे गई थी।
"अरे, वह कौन मनहूस शख्स था जो अपने लगे सगे को हमारे हवाले करके चला गया।" मौसी की परेशानी, झल्लाहट बन चली थी "रेखा तुम जल्दी से इस मनहूस को अपने घर से निकालो।"
"मौसी, परेशान होने की जरूरत नहीं है, में अभी उसका कुछ बन्दोबस्त करती हूँ।" रेखा ने उन्हें तसल्ली देते हुए कहा- हालाकि खुद उसकी अपनी जान निकली जा रही थी।" मौसी, सुनिये! मैंने यह लिफाफा खोल लिया है- "रेखां ने लिफाफा उनके सामने लहराया।'
"अरे, हां? क्या निकला इसमें..?" मौसी क्षण भर के लिए उस उल्लू को भूल गई ।
" एक कागज है इसमें मौसी उस पर हाथ से दो तस्वीरें बनी हुई हैं।" रेखा ने बताया ।
"लेकिन वह तो तुम्हारे किसी सपने और उसके फल-हल की बात कर रहे थे। रेखा तुमने मुझे बताया नहीं कि कैसा ख्वाब देखा था। "
"बस मौसी में आज आपको बताती। मैं पिछले पांच दिनों से निरन्तर वह सपना देख रही थी।"